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तुम दिल्ली में बैठकर मेरे बारे में कोढ़ा-कपार( मां फालतू चीजों को कोढ़ा-कपार कहती है) लिखते रहते हो लेकिन आओगे तभी जब हम मरेंगे।..फोन पर उसके ऐसा कहने पर मेरे पास अब कुछ कहने लायक नहीं रह गया था। चैनल की नौकरी बजाते समय घर नहीं जा पाने की अपने पास एक ठोस वजह होती कि बॉस छुट्टी देने से मन कर रहा है। नौकरी छोड़ने के बाद रिसर्च के काम में जुटने पर आजादी का जो पहला एहसास होता है वो ये कि हम अपने मन के मालिक हो जाते हैं। कोई बॉस-बुश नहीं होता। अब जिस बंदे को बिटिया की रेलवे टिकट कटवाने से लेकर चांदनी चौक से लंहगे में गोटा लगवाने के लिए कहने वाला सुपरवाइजर मिल जाए तब उसका क्या कहा जाए। वो तो नौकरी बजाने से भी बदतर स्थिति में है। मैंने जब अपने सुपरवाइजर से कहा- घर जाना चाहता हूं सर,कुछ दिनों के लिए तो खुश होकर बोले- अरे,जरुर जाओ। शुभकामनाएं दी और तब हमने बाय-बाय सर कहते हुए पैकिंग करने के इरादे से झूमते हुए हॉस्टल लौट आया। कहीं कोई लोचा नहीं लगाया मेरे घर जाने की बात पर।

पिछली बार जब मैं घर गया था तब मैं चैनल की नौकरी बजाता था। मेरे घर पहुंचने पर मां ने कहा-जाओ,जाके गैसवाला को हड़काकर आओ। हमेशा मेरे नाम से सिलेंडर उठाता है बीच रास्ते में ब्लैकमेल कर देता है। मां का मानना था कि मीडिया में है बोलने से वो सुधर जाएगा। वैसे भी अपने यहां मीडिया में काम करनेवाले लोगों का इससे ज्यादा बेहतर इस्तेमाल कुछ हो भी नहीं सकता है। मां के साथ दो दिन दूध लाने चला गया तो अब फोन पर बताती है कि दूधवाला अभी तक निठुर( प्योर,बिना पानी मिलाए) दूध दे रहा है। हम जैसे मीडिया से जुड़े लोगों के लिए एक मुहावरा ही फिक्स हो गया है- ज्यादा झोल-झाल करोगे तो भइयाजी टीविए में देखा देंगे सब कारनामा। नानीघर जाता हूं तो हिन्दुस्तान का संवाददाता जिसको-तिसको हड़काए फिरता है- जहां उल्टा-सीधा सामान दिए तो कल्हीं के अखबार में छापेंगे,तुमरे बारे में। वो लाल बोलकर दिए जानेवाले तरबूज के गुलाबी निकल जाने पर किसी सब्जीवाले को हड़का रहा होता है। मुझे लगता है पुलिस के बाद पत्रकार ही है जो अपने इलाके में इस ठसक के साथ( दबंगई कहें) जीता है। बहरहाल,इस बार नौकरी छोड़कर एक स्टूडेंट की हैसयत से घर जा रहा हूं।

रांची मेरा अपना घर नहीं है लेकिन जिस उम्र में हमें एहसास होता है कि हम चीजों और लोगों से जुड़ने लगे हैं,वो दौर हमने इस शहर में खपाया है। शहर की एक-एक सड़कें पत्रकारिता के नाम पर, एक-एक गलियां ट्यूशन पढ़ाने और किराए पर घर खोजने के नाम पर जानता हूं। रांची छोड़ने बाद जमाना हो गया वहां गए। अबकी बार टाटानगर की टिकट मिलने में परेशानी रही तो सोचा रांची ही चला जाए। 28 की शाम रांची पहुंच जाउंगा। 29 तक वहीं रहने का इरादा है। फिर 30 मई को टाटानगर। 2 जून तक टाटानगर में फिर 3 जून को अपनी छोटी दीदी के यहां बोकारो। 5 जून को नानीघर शेखपुरा जो कि कुछ साल पहले मुंगेर का ही हिस्सा रहा। 7 तारीख को मेरे एक दोस्त की शादी है बेगुसराय,वहीं जाने की इच्छा है। 8 को टाटानगर लौटकर 9 जून को दिल्ली के लिए प्रस्थान। 10 जून को दिल्ली।
आते ही कमरे की तलाश,हॉस्टल मे रहते-रहते अब मन उब गया है। रोज रात के खाने के लिए किसी न किसी के फोन का इंतजार करता हूं और किसी के फोन न आने पर चंद्रा दीदी को फोन करता हूं, इधर कुछ सामान खरीदने आया था दीदी,किलकारी से मिलने आ जाउं। अब ये बताने की जरुरत ही नहीं होती कि खाना भी खाउंगा। अब बाहर की दुनिया के साथ जीना चाहता हूं।
... इसलिए हे दिल्ली के ब्लॉगर्स अब तो मनमोहनजी की स्थायी सरकार भी बन गयी है,मौसम भी ठीक-ठीक सा ही है। आप संभालिए तब तक दिल्ली..मैं चला अपने घर,मैं चला रांची।

इस दौरान मेरी इच्छा है कि मैं ब्लॉगर दोस्तों से मिलूं,उनसे टेलीविजन पर,मीडिया के बदलते चेहरे पर बात करूं। अलग-अलग जगहों पर किसी न किसी का मोबाइल मेरे हाथ होगा। मैं नंबर लिख दे रहा हूं,आप मिस्ड कॉल देंगे तो मैं कॉल बैक कर लूंगा।

रांची- 9931696011
टाटानगर-06576454670,9204494661
बेगुसराय- 9868074669
ये सारे लोकल नबंर होंगे और इसमें अगर गलती से कॉल रिसीव हो गए तो 50 पैसे से लेकर एक रुपये कटेंगे।
जोहार...
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मीडिया में पनप रहा काला धन ?

Posted On 2:24 pm by विनीत कुमार | 0 comments



मूलतः दस्तक टाइम्स,15 मई अंक में लखनउ से प्रकाशित।

किसी खबर के निर्माण से लेकर प्रकाशन,प्रसारण तक में जितनी लागत लगती है,उसके मद्देनजर हम बिनी विज्ञापन औऱ बाजार के सहयोग के पाठक,दर्शक तक पहुंचने की उम्मीद नहीं कर सकते। इसलिए विज्ञापन के स्तर पर मीडिया की आलोचना करना पूर्णतया व्यावहारिक दृष्टिकोण नहीं होगा। गंभीर चिंता इस बात को लेकर है कि अगर मीडिया के भीतर विज्ञापन के अलावा भी खबरों को छापने,दिखाने के स्तर पर पैसों के लेनदेन हो रहे हैं तो क्या इसका हिसाब-किताब है। इन पैसों को आप किस श्रेणी में रखेंगे। दुनिया भर के काले धन का उपयोग मीडिया संस्थान चलाकर व्हाइट मनी बनाने के लिए किया जा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मीडिया हाउसों के भीतर तेजी से काला धन बढ़ रहा है। वह धन जिसे कि न तो मीडिया के विस्तार में और न ही जागरुकता बढ़ाने के काम में लाया जाना है। राजनीति और बिजनेस के भीतर जो काला धन है उसकी नॉनप्रोडक्टिविटी पर तो हम लंबे समय से बात करते आये हैं लेकिन मीडिया के भीतर बढ़ने वाले काले धन का क्या होगा,इसकी धरपकड़ कौन करेग,ये कई सारे सवाल एक साथ उठते हैं।

उस समय हमलोग अपने-अपने स्तर पर मीडिया औऱ चुनाव के बीच के अंतर्संबंधों को समझने में लगे हुए थे। 24 अप्रैल की दोपहर आनंद प्रधान सर से इस मसले में पर चैट करते हुए बातचीत हुई कि आखिर मीडिया पैसे लेकर जिस तरह से खबरों को छाप औऱ दिखा रहा है,उससे जो पैसे मिल रहे हैं, उसका क्या हिसाब-किताब है, क्या इसे हम काला धन कह सकते हैं? आनंद प्रधान से साफ कहा कि आप ये जो सारी बातें हमसे कह रहे हैं आप ऐसा कीजिए कि आप इसे एक हजार शब्दों में लिखकर शाम तक मुझे भेज दीजिए। एकबारगी तो मुझे ऐसा लगा कि भरी दुपहरी में जबकि सोने का मन कर रहा हो,कहां फंस गया। लेकिन लिखना तो था ही सो चार बजे तक मामला फिट हो गया और ठीक एक हजार से चार शब्द ज्यादा लिखकर मेल कर दिया।
आमतौर पर अपने रेगुलर पढ़नेवाले लोगों के बीच लंबे-लंबे लेख लिखने के लिए बदनाम हूं। जो मेरे दोस्त हैं वो मुझे लगातार छोटा लिखने की नसीहतें देते हैं और जो खुलेआम रुप से अपने को दोस्त साबित नहीं करते वो इसी आधार पर आलोचना भी करते हैं। यहां मैं पहली बार मांग और आपूर्ति पर खरा उतरा, क्योंकि मामला गुरु का रहा। लेख छपकर आ गया और फोन पर ही आनंद प्रधान सर ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि उनलोगों ने अपनी तरह से कांट-छांट कर दी है। लेख देखकर तो अफसोस मुझे भी हुआ। लेख के ढांचे को देखकर ऐसा लगा कि दिल्ली से भेजे गए इस लेख के हाथ-पैर,बाल,आंख,नाक,कान लखनउ तक पहुंचते-पहुंचते लोगों ने रास्ते में कतर दिए हों। नया-नया लिखनेवालों में होने पर भी मेरे लेखों के साथ ऐसा न के बराबर हुआ है। खैर, मैं लेख की मूल प्रति भी साथ में लगा रहा हूं ताकि आप मीडिया और उसके भीतर पनपनेवाले काले धन के पूरे संदर्भ को ज्यादा बेहतर तरीके से देख सकें।

लेख की मूल प्रति-
अखबार के पहले पन्ने पर अक्सर कोई खबर न देखकर किसी बड़ी कम्पनी या संस्थान का विज्ञापन देखकर मुंह से एक ही शब्द निकलता है- विज्ञापनों के आगे पत्रकारिता ने घुटने टेक दिए हैं। पाठक खबर पढ़ने के लिए अखबार खरीदता है लेकिन पहले पन्ने पर ही खबर नदारद होती है। अखबार के मालिक को इस बात का अंदाजा है भी या नहीं कि उसका पाठक सुबह-सुबह झल्ला जाता है लेकिन विज्ञापन आसानी से साबित कर देता है कि हम अखबार से भी बड़े हैं,अखबार की खबरें हमारे आगे कुछ भी नहीं है,हममें वह ताकत है कि देश के किसी भी बड़े अखबार का नक्शा बदल दें। यही हाल समाचार चैनलों के कार्यक्रमों को लेकर है. आप देश और दुनिया की हलचल जानने के लिए टीवी के आगे बैठे हैं लेकिन आलम ये है कि टेलीविजन स्क्रीन का आधा से ज्यादा हिस्सा विज्ञापनों से भरा है। स्क्रीन को देखकर ऐसा लगेगा कि किसी महानगर के मेला-पूजा पंडाल की तरह टेलीविजन के लोग स्क्रीन के एक-एक इंच को विज्ञापन के लिए इस्तेमाल करने के लिए परेशान हैं। बात यहीं तक खत्म नहीं होती, किसी भी कार्यक्रम के पहले आपको कंपनियों का नाम लेना होता है। कार्यक्रम के नाम की शुरुआत ही कंपनी के नाम के साथ शुरु होती है- बजाज एलयांस वोट इंडिया वोट, हीरो होंडा हमलोग या फिर आइडिया हेडलाइंस। कोई चैनल देश का पीएम खोजने निकला है तो देश की जनता से ज्यादा हीरो होंडा और बनियान के फुटेज प्रसारित होते हैं। अब तो चैनलों ने प्रजेन्टस औऱ प्रस्तुत करता है जैसे योजक शब्द भी लगाने छोड़ दिए हैं, सीधे विज्ञापन कंपनी और कार्यक्रम का एक-दूसरे से मिलाकर नाम होता है। मीडिया,बाजार औऱ विज्ञापन के आपसी गठजोड़ औऱ एक-दूसरे की अनिवार्यता को समझने के लिए पाठकों औऱ दर्शकों के सामने मौजूदा स्थिति में यह मजबूत उदाहरण है। सच पूछिए तो अब ये मुहावरा से ज्यादा कुछ भी नहीं है कि विज्ञापन के आगे मीडिया लाचार है। इस लिहाज से मीडिया की आलोचना करने में कुछ नयापन भी नहीं है.

लेकिन इधर चुनावी महौल और आइपीएल सीजन में कुछ नए तरह की बहस मीडिया के भीतर चलनी शुरु हो गयी है। कल रात हिन्दी के एक समाचार चैनल पर पैनल डिशकशन के लिए आए राजनीतिक पुरुष ने कहा कि-आप सिर्फ नेताओं पर आरोप लगाने पर क्यों तुले हुए हैं,अखबार का एक-एक कॉलम बिका हुआ है, सब पैसों के हाथ बिक गए हैं। प्रश्न पूछनेवाले पत्रकार ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की और कहा कि आपके पास ऐसा कहने का कोई आधार नहीं है। अगर ऐसा है तो आप प्रेस कांफ्रेस कराइए लेकिन यहां आकर आप इस तरह की बातें नहीं कर सकते। साथ में बैठे राष्ट्रीय दैनिक के संपादक महोदय ने पक्ष लेते हुए कहा- आपलोगों ने खुद पैसे दे-देकर लोगों को भ्रष्ट किया है औऱ आप जबरदस्ती हम पर आरोप लगा रहे हैं. खैर, उस परिचर्चा में इस बात को बहुत अधिक तूल नहीं दी गयी कि मीडिया और पैसे के बीच का आपसी रिश्ता क्या है लेकिन राजनीतिक पुरुष का संकेत विज्ञापन के आधार पर मीडिया के बिकने की ओर नहीं था। उनका साफ मानना था कि बिकने का यह मामला, खबरों औऱ कॉलम तक को लेकर भी है। इस बाबत रांची से प्रकाशित प्रभात खबर अखबार के संपादक हरिवंश ने अपने एक लेख के जरिए करीब डेढ़ महीने पहले ही खुलासा कर चुके हैं कि राजनीतिक पार्टियों की ओर से खबर,इंटरव्यू,फीचर और कवरेज को लेकर रेट तय कर दिए गए हैं। इस बात की खबर आने पर इस बात की भी चर्चा होनी शुरु हो गयी कि अंग्रेजी के कुछेक बड़े अखबार अपने यहां इंटरव्यू छापने की मोटी रकम लेते हैं।

इन सब बातों की चर्चा मैंने ब्लॉग के जरिए शुरु ही की थी कि एक पत्रकार ने कमेंट के जरिए यह साफ किया किया कि आइपीएल की कवरेज को लेकर मुंबई के कुछ चैनलों ने पैसे लिए हैं और जिस भी टीम से पैसे लिए हैं,उनके पक्ष में खबरें दिखा रहे हैं।

यहां सवाल इस बात का नहीं है कि मीडिया जिसने अपने उपर सामाजिक जागरुकता और सच को सामने लाने की जिम्मेवारी ली है,वह स्वयं ही पूंजी के खेल में बुरी तरह फंस गया है। खबर निर्माण से लेकर प्रसारण तक में जितनी लागत लगती है, हम बिना विज्ञापन और बाजार के सहयोग के बड़े स्तर पर मीडिया के पहुंच की उम्मीद नहीं कर सकते,इसलिए विज्ञापन के स्तर पर मीडिया की आलोचना करना पूर्णतया व्यावहारिक दृष्टिकोण नहीं होगा। गंभीर चिंता इस बात को लेकर है कि अगर मीडिया के भीतर विज्ञापन के अलावे वाकई खबरों को छापने,दिखाने के स्तर पर पैसों के लेनदेन हो रहे हैं तो क्या इसका कोई हिसाब-किताब है। इन पैसे को आप किस श्रेणी में रखेंगे। दुनियाभर के काले धन का उपयोग मीडिया संस्थान चलाकर व्हाइट मनी बनाने के लिए किया जा रहा है,अब कहीं ऐसा तो नहीं है कि मीडिया हाउस के भीतर तेजी से काला-धन बढ़ रहा है। वह धन जिसका कि न तो मीडिया के विस्तार में और न ही जागरुकता बढ़ाने के काम में लाया जाना है। राजनीति और बिजनेस के भीतर जो काला धन है, उसकी नॉनप्रोडक्टिविटी पर तो हम लंबे समय से बात करते आए हैं लेकिन मीडिया के भीतर बढ़नेवाले काले धन का क्या होगा,यह हमारी वित्तीय व्यवस्था को कैसे खोखला कर देगा और फिर इसकी धर-पकड़ कौन करेगा, ये कई सारे सवाल एक साथ उठते हैं.

दूसरी बात कि देश के दूरदराज इलाके में बैठे पाठक और दर्शक, अखबार और टेलीविजन की जिन सामग्री से गुजरकर अपनी राय बना रहे हैं,उनकी विश्वसनीयता का आधार क्या होगा। उन्हें इस बात का अंदाजा कहां है कि वह जिस इंटरव्यू,फीचर या रिपोर्ट को खबर के स्तर पर पढ़ रहा है,वह पैसे के दम पर छापा और प्रसारित किया गया है। कंपनियां या फिर राजनीतिक पार्टियां मार्केटिंग स्ट्रैटजी के तहत लाख विज्ञापन कर लें लेकिन एक स्तर पर आकर उसके प्रभाव के सीमित हो जाने की चिंता को वे समझते हैं. शायद इसलिए उन्होंने एडविटोरियल औऱ लिटरेचर के रुप में अपना विज्ञापन करवाना शुरु किया। सरस सलिल से लेकर दैनिकपत्रों, पत्रिकाओं में प्रकाशित इस विज्ञापन को लोग शुरुआती दौर में खबर की तरह पढ़ते रहे,एक हद तक छले भी जाते रहे लेकिन यह जानने पर कि वह वाकई कोई खबर नहीं,विज्ञापन है,छिटकते चले गए। अब पाठकों के लिए यह जानना मुश्किल होता जाएगा कि वे खबर नहीं पेडस्टोरी (paid story)पढ़ रहे हैं। क्या ऐसी स्थिति में रेडियो औऱ टीवी की तरह खबरें भी”बिग खबरें ” नहीं हो जाएगी जिस पर कि देश के गिने-चुने लोगों का कब्जा होगा। अब तक कि स्थिति यही रही कि माध्यम औऱ संचार के तमाम संसाधन पूंजीपतियों के हाथ होते चले गए लेकिन एक हद तक खबरें अभी भी आम लोगों के बीच रही। लेकिन जो स्थिति तेजी से बन रही है उसमें खबरें भी बिकती चली जाएगी। माध्यमों पर बाजार और विज्ञापन का कब्जा होने पर ही हम मीडिया के जरिए बड़े स्तर पर सामाजिक सरोकर की बात नहीं सोच सकते,अब जबकि खबरें ही बिकने लगें तो फिर सामाजिक जागरुकता औऱ लोकतंत्र की अभिव्यक्ति आदि की बातें कैसे सोच सकते हैं। यह पूरी तरह एक छलना है जिसे कि अब तक हमारी आंख खोलते रहनेवाला मीडिया के हाथों होने की आशंका जाहिर की जा रही है, अब इससे बचने का विकल्प क्या हो, सोचना जरुरी है।
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खबर के नाम पर देश की न्यूज एजेंसी आइएनएस ने आम लोगों के साथ कितना बड़ा घपला किया है इसकी जानकारी दीवान की मेलिंग लिस्ट के जरिए अभी थोड़ी देर पहले ही मिली। प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने अंग्रेजी में शपथ ली जिसे कि हम सबों ने टेलीविजन पर देखा लेकिन एजेंसी ने इसे पहले हिन्दी में और फिर अंग्रेजी में शपथ लिया जाना बताया। इस मामले पर ब्रजेश कुमार झा ने दीवान पर लिखा- सभी ने सुना-देखा की डा. सिंह ने शपथ के लिए जिस भाषा का उपयोग किया वह अंग्रेजी थी। हिन्दी-अंग्रेजी का मामला न बने इसलिए शायद तान छेड़ा गया कि शपथ लेते समय डा. सिंह ने हिन्दी भाषा का भी प्रयोग किया। अब जिस आम जनता के वास्ते खबर लिखी गई है वही फैसला करे यह खबरनविशी है य़ा फिर शुरू हो गई मख्खनबाजी।

एजेंसी की तरफ से जारी की गयी लाइन है- "डा. मनमोहन सिंह ने लगातार दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शुक्रवार को शपथ लेकर एक बार फिर देश की बागडोर अपने हाथों में थाम ली है। राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने उन्हें पद व गोपनीयता की शपथ दिलाई। उन्होंने पहले हिन्दी और फिर अंग्रेजी में शपथ ली।”

कांग्रेस के देश की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरकर सामने आने पर एनडीटीवी इंडिया की ओर से बड़े ही इत्मीनान अंदाज में घोषणा की गयी कि अब देश के पत्रकारों को बहुत सारे नेताओं के पीछे भागने से छुट्टी मिल जाएगी। निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर या फिर क्षेत्रीय पार्टियों की ओर से जीतकर आनेवाले एमपी सरकार बनाने के मामले में जितनी ड्रामेबाजी किया करते हैं,वो सब खत्म हो जाएगा। एनडीटीवी की बात एक हद तक सही है। अब तक होता यही रहा है कि चुनाव होने से लेकर सरकार बनने की प्रक्रिया तक इतनी छोटी-छोटी पार्टियां औऱ निर्दलीय उम्मीदवार हो जाते कि उनके पीछे भागते रहने से चैनलों के पसीने छूट जाते। साधन और समय के मामले में मीडिया के लोग पस्त हो जाते। इन्हें इग्नोर भी नहीं किया जा सकता क्योंकि सरकार बनाने में इनकी भूमिका सबसे बड़ी पार्टियों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती। ये टोमैटो-ऑनियन टाइप के एमपी होते जो अपनी शर्तों के साथ किसी भी पार्टी में खपने को तैयार होते। बहरहाल
एनडीटीवी इंडिया ने ये नहीं बताया कि रात-दिन ऐसे नेताओं के पीछे भागनेवाले मीडियाकर्मी अब नहीं भागने की जरुरत की स्थिति में क्या करेंगे। क्या अब या तो बहुमत हासिल करनेवाली कांग्रेस के नगाड़े बजाएंगे,उनके चमचे हो जाएंगे या फिर आइएनएस के पत्रकारों की तरह गलती पर पर्दा डालने का काम करेंगे।

चुनावी परिणाम के बाद समाचार चैनलों सहित मीडिया के दूसरे माध्यमों को लगातार देख-सुन रहा हूं। मुझे इस बात पर हैरानी हो रही है कि राजनीतिक स्तर पर विपक्ष की झार-झार हो जाने की स्थिति में मीडिया भी शामिल होता चला जा रहा है। चुनाव के पहले जिस कांग्रेस और उनके सहयोगी दलों में कदम दर कदम ऐब नजर आते रहे अब उनके पक्ष में तुरही बजाने में जुटा है। ये सिर्फ खबरों को लेकर नहीं उसकी प्रस्तुति को लेकर भी साफ झलक जाता है। लगभग सारे चैनलों का एक ही सुपर या स्लग है- सिंह इज किंग। क्या साबित करना चाहते हैं आप ? हार औऱ जीत,पक्ष औऱ विपक्ष राजनीतिक पार्टियों के लिए है मीडिया के लिए तो विपक्ष की भूमिका तब तक स्थायी तौर पर है जब तक कि राजनीति में आम आदमी की आवाज नहीं सुनी जाती चाहे सरकार किसी की भी हो। आइएनएस जैसी न्यूज एजेंसी को कांग्रेसी उत्सव और रफ्फूगिरी करने की क्या जरुरत है। चुनाव के पहले तो पैसे ले-लेकर खबरें छापी-दिखायी ही गयी,अब तो कम से कम आम आदमी को बख्श तो या फिर पांच साल तक के लिए दाम लेकर बैठ गए हो?
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विस्फोट.कॉम के मामले में संजय तिवारी के इकरारनामा की शुरुआती पंक्तियों को पढ़कर मेरी तरह कोई भी पाठक भावुक हो जाएगा। उसका भी मन करेगा कि वो उनके पक्ष में संवेदना जाहिर करे,सहानुभूति के कुछ ऐसे शब्द सामने रखे जिससे उन्हें लगे कि वो संजयजी के साथ है। ये शब्द गहरे तौर पर साबित करे कि फिलहाल विस्फोट.कॉम के काम को रोक देने के फैसले से न सिर्फ संजयजी का नुकसान हुआ है बल्कि एक पाठक की हैसियत से उनका भी भारी नुकसान हुआ है,पूरी पत्रकारिता को एक गहरा झटका लगा है। इसलिए नीचे मिली टिप्पणियों में आप ऐसे शब्दों के प्रयोग को देख रहे हैं तो इसमें कहीं कोई अचरच ही बात नहीं है। वैसे भी हिन्दी समाज इस स्तर पर अभी तक संवेदनशील बना हुआ है कि जब कोई इंसान यहां आकर अपना कलेजा निकालकर सामने रख दे तो सामनेवाले की आंखों के कोर अपने आप भींग जाते हैं। ऐसी स्थिति में दोस्त-दुश्मन से उपर उठकर भावना के स्तर पर एक हो जाना बुहत ही कॉमन बात है। यह बहुत ही स्वाभाविक स्थिति है। संजयजी के प्रति लोगों के संवेदना के स्वर इसी भावना के स्तर पर एक हो जाने का नतीजा है।

लेकिन इस संवेदना के शब्द से भला उनका क्या होना है। स्वयं संजय तिवारी के शब्दों में बात करें तो- विस्फोट के कारण बहुत सारे ऐसे लोगों से मिलना हुआ जो मानते हैं कि यह अच्छा और निष्पक्ष प्रयोग है और किसी भी कीमत पर यह बंद नहीं होना चाहिए. उनकी इच्छा और सद्भावना भी सिर आखों पर. लेकिन केवल सद्भावना से अच्छे काम चल जाते तो आज देश समाज की हालत ऐसी नहीं होती.

यह सहानुभूति बटोरने के लिए नहीं बल्कि अपने समर्पित पाठकों के सामने अपनी वास्तविक स्थिित बयान कर रहा हूं. मैं थक चुका हूं. इसलिए इस काम को फिलहाल अस्थाई तौर पर रोक रहा हूं.
। जाहिर है खुद संजय तिवारी भी ये नहीं पसंद करते कि कोई खालिस संवेदना जाहिर करे। ये उन्हें मानसिक स्तर पर लगातार काम करने के लिए उर्जा तो दे सकता है लेकिन साधन के स्तर पर इससे कोई इजाफा नहीं होनेवाला है।......अच्छे कामों को चलने के लिए भी धन की जरूरत होती है. साधन की जरूरत होती है. आज विस्फोट जितना काम कर रहा है यह हमारे पास मौजूद साधन का अधिकतम उपयोग है. लेकिन अब मैं भी छीज गया हूं. कुछ बचा नहीं है. महीने दर महीने का संघर्ष अब रोज-ब-रोज के संघर्ष में बदल गया है. हालांकि चतुर खिलाड़ी की तरह इतना खोलकर हमें बात नहीं करनी चाहिए लेकिन आप हकीकत को कब तक छिपा सकते हैं? किसी न किसी दिन सच्चाई को स्वीकार करना ही होता है. और हमारी सच्चाई यह है कि अब हम इस काम को स्तरीय और सम्मानजनक तरीके से चलाये रखने में असमर्थ हैं.

लेकिन इंटरनेट और डॉट कॉम के जरिए पत्रकारिता में एक बड़ी संभावना देख रहे लोगों के लिए संजय तिवारी का ये इकरारनामा भावुक होने से ज्यादा चिंता पैदा करनेवाला है। पूरी पोस्ट को पढ़ने के बाद गश खाकर गिर जानेवाला है। जुम्मा-जुम्मा अभी दो-तीन साल ही हुए है जब हिन्दी डॉट कॉम चलानेवाले लोग मैंदान में उतरे हैं और अगर इंटरनेट हिन्दी पत्रकारिता की बात करें तो ये दुधमंहा बच्चा ही है। ऐसे में अभी ये पांव पसारने की गुंजाइश पैदा कर ही पाता कि ये खबर मिल रही है कि विस्फोट.कॉम जैसी चर्चित साइट को फिलहाल के लिए रोका जा रहा है लोगों के बीच क्या संदेश पैदा करता है,इस बात पर विचार किया जाना जरुरी है। इस सवाल पर विचार करने के क्रम में जाहिर है कि न तो संजय तिवारी की समझ को और न ही भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह के समर्थन को कि-आज के दौर में 100 फीसदी इमानदारी से जीना बहुत मुश्किल है, वो भी दिल्ली में खासकर को एक मानक स्थिति मानकर सोचा जा सकता है। इन लोगों के अनुभव,तर्क और नजरिए पर जरुर विचार किए जाने चाहिए लेकिन बार-बार ईमानदारी का झंड़ा लहराने से पहले इस बात पर जरुर समझ विकसित करनी होगी कि क्या अगर कोई डॉट कॉम,साइट या पत्रकारिता का कोई भी रुप व्यावसायिक और प्रसार के स्तर पर सफल होता है तो उस पर बेइमान हो जाने का लेबल चस्पा देने चाहिए। क्या ऐसा करना जायज होगा? सफल होने का उदाहरण पेश करनेवाले यशवंत भी मेरी इस बात के पक्ष में होगें। हिन्दी की ये वही मानसिकता है जहां पर आकर हम हर सफल पुरुष को बेइमान,दो नंबर का आदमी और हर स्त्री को किसी न किसी के साथ समझौता करनेवाली मान लेते हैं। संभव है कि एक हद तक इसमें सच्चाई भी हो लेकिन इसे पर्याय या मानक के तौर पर स्थापित तो नहीं ही किया जा सकता है कि हर सफलता का मतलब है बेइमान हो जाना, झूठा और मक्कार हो जाना। इसका तो यही मतलब होगा कि जो असफल है वो सबसे बड़ा इमानदार है और जब तक उसने जो भी कुछ किया, सौ फीसदी ईमानदारी के स्तर पर किया। क्या पत्रकारिता करते हुए या फिर जीवन जीते हुए इस तरह की फिलटरेशन हो पाता और ऐसा होना संभव भी है?

चुनाव शुरु होने के पहले विस्फोट.कॉम की तरफ से ये घोषणा की गयी कि उन्हें इसकी कवरेज के लिए पत्रकारों की जरुरत है। खबर लाने,खोजने,लिखने और विश्लेषण करने के स्तर पर इस काम के लिए उन्हें मानदेय दिए जाएंगे। कुछ उत्सुक और जरुरतमंद लोगों ने एप्रोच भी किया। विस्फोट.कॉम ने इस बीच विज्ञापन जुटाने की भी कोशिशें की। जाहिर है ये सब कुछ व्यावसायिक शर्तों के आधार पर ही होता रहा। बाद में पैसे के अभाव में मानदेय देने की बात टाल दी गयी। विज्ञापन को लेकर भी विस्फोट.कॉम को कोई खास सफलता नहीं मिल पायी,ये तो इकरारनामा से ही साफ हो जाता है। आज विस्फोट व्यावसायिक तौर पर असफल हो गया लेकिन संजयजी इस असफलता को सिर्फ अच्छा काम के बंद हो जाने का मलाल के रुप में जाहिर कर रहे हैं। क्या आपको नहीं लगता कि हिन्दी पत्रकारिता में ऐसा करते हुए व्यवसाय और पत्रकारिता को एक-दूसरे से घालमेल करते हुए ऐसी स्थिति पैदा कर दी जाती है कि अंत आते-आते एक महान कार्य के अंत होने की घोषणा करने में सुविधा हो। क्या ये सही तरीका है कि कोई इंसान भगवान की मूर्तियों की दूकान खोले और जब मूर्तियां नहीं बिके तो हर सामने गुजरनेवाले बंदे से इस बात की उम्मीद करे कि वो भगवान के दर्शन के नाम पर कुछ चढ़ावा चढ़ाता चला जाए ? विस्फोट पत्रकारिता के स्तर पर एक बेहतर काम करता आया है, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता लेकिन इसकी व्यावसायिक असफलता को अच्छी पत्रकारिता के असफल हो जाने का करार देना ज्यादती होगी। हम ये मानकर क्यों नहीं चल पाते कि हम पत्रकारिता के नाम पर जो भी कुछ कर रहे हैं वो बाजार की बाकी गतिविधियों की तरह ही एक हिस्सा भर है और हमें उसे व्यावसायिक शर्तों के आधार पर ही चलाए रखना होगा। ये बातें सभी क्षेत्रों में समान रुप से लागू होती हैं। साधना,संस्कार और दूसरे धार्मिक, आध्यात्मिक कंटेट को लेकर चलनेवाले चैनल भी बाजर की शर्तों को फॉलो करते हैं न कि आध्यात्म और प्रवचन के शब्दों को। पत्रकारिता करते हुए ये साफ करना देना होगा कि ये न्यूज प्रोडक्शन और डिस्ट्रीव्यूशन से जुड़ा व्यवसाय है। एक पत्रकार के तौर पर महान होने और बदलाव की आवाज बुलंद करनेवाले मसीहा के रुप में अपने को प्रोजेक्ट करने का मोह हर हाल में छोड़ना ही होगा।

सच्चाई ये है कि बेबसाइट की संभावना और पत्रकारिता के लंबे अनुभव को साथ लेकर जिस उत्साह से कुछ नया और बेहतर करने की उम्मीद से हमारे पत्रकार मैंदान में उतरते हैं,बाजार,विज्ञापन,मार्केटिंग और रीडर रिस्पांस को लेकर उतना होमवर्क नहीं करते। यही वजह है कि अच्छा काम करते हुए भी मार खा जाते हैं। अचनाक से या तो कर्मचारियों की छंटनी या फिर उस काम को बंद करने की ही नौबत आ जाती है। हम इस उम्मीद में क्यों रहें कि किसी को सपना आएगा कि फलां पत्रकार बहुत बेहतर काम कर रहा है तो चलो उसकी मदद की जाए. ऐसा सोचनेवाले लोग तो अपने हिसाब से कमेंट और सामग्री के स्तर पर सहयोग तो करते ही हैं लेकिन जिनके पास साधन है उन्हें ये सपने न के बराबर आते हैं। उन्हें सपने आते भी हैं तो कुछ इस तरह से कि अगर हमने फलां डॉट कॉम की मदद की तो उसकी सीधा लाभ हमें क्या मिलनेवाला है? पत्रकारिता करते हुए हमें ऐसे लोगों को साधने की जरुरत है।

आज संजय तिवारी ने विस्फोट.कॉम का काम कुछ दिनों के लिए रोक देने की बात की. ये उनका व्यक्तिगत फैसला है। लेकिन फर्ज कीजिए कि उनके इस काम से दस-बारह नौजवान पत्रकार जुड़े होते तो उनके भरोसे का क्या होता? वो अभी कहां जाते, उनके पास तो कोई खास अनुभव भी नहीं होता कि यहां छूटते ही कहीं और लग जाते। एक बेहतर पत्रकार होने के नाते हममें से किसी की भी जिम्मेवारी सिर्फ खबर जुटाने, बेहतर लिखने और बोलने भर तक नहीं है। हमारी जिम्मेवारी इस बात की भी है कि इस प्रोफेशन में आनेवाले उन तमाम लोगों के बीच ये भरोसा कायम रखने की भी है कि पत्रकारिता से अच्छा कोई दूसरा प्रोफेशन नहीं है और तुम्हें इसे औऱ आगे ले जाने के लिए जी-जान से जुटे रहना होगा। अब इस लिहाज से आप वेब पत्रकारिता की संभावना पर बात करते हुए सिर्फ भावुक होना चाहेंगे या फिर इसे पत्रकारिता की असफलता मानने के बजाय मार्केटिंग के स्तर पर दुरुस्त होना चाहेगें।...
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पिछले साल मदर्स डे पर मैंने लिखा- मां की बातें और मां की बातों का अंत नहीं है। लेकिन इतना तो जरुर है कि अगर मां को सिर्फ भावुक न होकर, तर्क पर, किताबी ज्ञान और डिग्रियों की गर्मी को साथ रखकर भी याद करुं तो भी मां से लगाव में रत्तीभर भी कमी नहीं आएगी। मेरी बात रखने के लिए वो हां में हां मिला भी दे तो भी चीजों को देखने और समझने का उसका अपना नजरिया है, न जाने कितने मुहावरे हैं, जिसे विश्लेषित करने के लिए मुझे न जाने कितने वाद पढ़ने पड़ जाएं और कितनी किताबों के रेफरेंस देने पड़ जाएं।(
अतरा में पतरा नहीं खोलेगा मेरा बेटा।) इस साल मैं चाहता हूं कि उन शब्दों औऱ मुहावरों को याद करुं जो कि दिल्ली में रहते हुए अक्सर याद आते हैं,मौके-बेमौके उन्हें इस्तेमाल करने का मन करता है लेकिन शहरीपन के दबाब में जीने के कारण फिर रुक जाता हूं।

मां द्वारा प्रयोग किए गए शब्द/पद , मूल अर्थ और मेरी टिप्पणी


1. जौरे-साथे रहनाः किसी के साथ अफेयर होना-मां प्रेम,प्यार,लव या अफेयर जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करती, ऐसा करते हुए उसे संकोच महसूस करती।

2. लेडिज गंजीः ब्रा-शर्म के मारे वो ब्रा नहीं बोल पाती।

3. दूध में दू दाना चौर डालनाः खीर बनाना- आमतौर पर घर में जब खीर बहुत तैयारी से नहीं बनायी जाती तो मां खीर की इज्जत रखते हुए इसे खीर नहीं कहती।


4. अनपढ़वा आदमी को बूढ़बक बनानाः अनपढ़ इंसान को बेबकूफ समझना-इस शब्द का प्रयोग वो अपने लिए करती

5. कोढ़ा-कपार उठाकर ले आनाः फालतू चीजें खरीद लाना-आमतौर वो खिलौने,सीटी,बाजा जिससे नाश्ते के बाद उससे सोने में खलल पड़ती हो

6. जया भादुड़ीः नाटी लड़कियां-उन लड़कियों के लिए जो नाटी होती हुई भी इधर-उधर इतराती फिरती

7. कुलबोरनीः कुलच्छनी,बदचलन- इस शब्द का वो अर्थ संकुचन कर देती है क्योंकि कोई लैंप का सीसा फोड़ दे, तेल की शीशी गिरा दे तो भी कुलबोरनी है


8. सिहकी पदलकै आदी गुड़ बंटलकैः डींग मारनेवाली औरतें- जो औरतें छोटी-छोटी बातों को भी बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताती।

9. खपतानः बदमाश- छोटे बच्चे जो निगरानी न करने की स्थिति में काम बिगाड़ देते हैं।

10. भीतरघुन्ना/ भीतरघुन्नी/गुम्माहुड़ारः अपनी बात मन में रखनेवाले लोग- जो लड़का या लड़की उपर से कुछ और भीतर ही भीतर कुछ और सोचते रहते।

11. करेजा दू टुकरी या छलनी कर देनाः मन को चोट पहुंचाना- पापा द्वारा कहे गए वो शब्द जिसे लेकर वो घंटो सोचा करती और कहती इ आदमी करेजा चुकरी करनेवाली बोत बोलकर गए।

12. नेमान होना या करनाः किसी चीज को पहली बार खाना या चखना- ये मूलतः खाने-पीनेवाली चीजों के लिए इस्तेमाल करती और खासतौर से जो मौसमी फल या मिठाइयां होती

13. गेंदरा के सुत्तल गेंदरा नहीं रहनाः चालाक हो जाना- घर के पुराने कपड़ों से बच्चों के सोने के लिए बिस्तर बनाए जाते। मां किसी के बचपन को याद करते हुए जबकि वो नंग-धडंग पड़ा होता,कहती अब वो चालाक हो गया है।

14. अचरा का हवा लग जानाः पत्नी की के इशारे पर चलना- जब किसी लड़के की नई-नई शादी होती है और वो घर से झाड़कर पत्नी के साथ सिनेमा या शॉपिंग के लिए जाता है या फिर पत्नी के पक्ष में बात करने लग जाता है,ऐसे समय में मां इसका प्रयोग करती।

15. मर्द नहीं मौगा या मौगमेहरा होनाः औरतों की बातों में रुचि लेना- मां इसे बहुत बड़ा अवगुण मानती है,मेरे एक फूफा का उदाहरण देकर हुए कहती है- वो मर्द नहीं मौगा हैं।

16. पेट काटनाः बचत करना- अपने उन बुरे दिनों को याद करने के क्रम में जब उसने बचत करके मुझे पब्लिक स्कूल में पढ़ाया

17. निमला पइयो हाड़-गोड़ चिबईयोः कमजोर को सब सताता है- खासकर मेरे लिए इसका प्रयोग करती जब घर के सारे लोग मुझे छोटा और कमजोर जानकर परेशान करते

18. दीदा में पानी नहीं रहनाः शर्म नहीं आना- उस पीढ़ी के लिए जो मां-बा के बहुत करने पर भी सब भूल जाते हैं

19. अरझो-परझो मारनाः अप्रत्यक्ष तौर पर कहना- जब बात किसी और से कही जा रही हो और किसी और के लिए कहना हो

20. कैफट्टा,भुजगल्लाः जिसकी काया या शरीर फट जाए- एक तरह की गाली जो हमलोगों को मारनेवाले लोगों के लिए इस्तेमाल करती लेकिन घर के लोगों के लिए नहीं, मोहल्ले के उन लोगों के लिए जिनसे अपनी दुश्मनी होती

अब ये कहना कि मां याद आती है बकवास बात होगी। ऐसा कौन सा दिन होता है जब मां याद नहीं आती या फिर ऐसा कौन सा दिन होता है जिस दिन बात नहीं होती। लेकिन इस विशेष मौके पर मैं उसे याद करने से ज्यादा उसके शब्दों को, उसकी अभिव्यक्ति को याद करता हूं जो मुझे अक्सर एहसास कराती है कि हमसे दूर होने पर तुम पूरे एक शब्दकोश से महरुम रहते हो।
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