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आप सही होते हुए भी कैसे गलत साबित कर दिए जाते हैं, आप परेशान को प्रशासन की शरण में जाने पर कैसे परेशान हो जाते हैं, पिछले आठ दिनों से यही सब झेल रहा हूं मैं। शारीरिक परेशानियों के साथ-साथ मानसिक उलझनें भी।
मेरे कमरे में चार-पांच लोगों ने रातभर शराब पीकर हंगामा मचाया, उल्टी-सीधी बातें कही। मैं परेशान होता रहा। पिछले तीन दिनों से पूरी-पूरी रात जाग रहा था। एक तो काम का प्रेशर और कुछ व्यक्तिगत कारण। मुझे रात के चार-चार बजे तक नींद नहीं आती. लेकिन उस दिन मैंने फैसला किया कि ऐसे कैसे चलेगा, काम करने के लिए मुझे ढंग से सोना ही होगा। मैंने दस बजे कमरे की बत्ती बुझा दी और सोने की कोशिश करने लगा। नींद थोड़ी आती, फिर चली जाती। तभी ठहाके और जोर-जोर से हंगामा शुरु हो गया। हारकर मैंने इस बात की शिकायत अपने रेसीडेंट ट्यूटर से कर दी और अनुरोध भी किया कि- सर आप खुद चलकर देख लीजिए कि हमारे कमरे में क्या हो रहा है। उनके यहां कुछ लोग आए हुए थे सो उन्होंने आने में अपनी असमर्थता जताई. मैं वापस आ गया।... और अपने दोस्त मुन्ना के कमरे में सो गया।
दरअसल हमारे हॉस्टल ग्वायर हॉल में पीएचडी करनेवालों को अलग कमरा दिया जाता है लेकिन कमरे की बनावट कुछ ऐसी है कि कभी महसूस नहीं होता कि हम सिंगल कमरे में हैं. कमरे में घुसते ही एक बड़ा-सा हॉल है। बहुत ही सुंदर औऱ प्यारा। जाड़े में लकडियां जलाने तक की व्यवस्था है। उसके बाद दोनों तरफ दो कमरे में हैं। दोनों कमरे में कोई दरवाजा नहीं लगा है। एक कमरे में मैं रहता हूं और दूसरे कमरे में मेरा पार्टनर।
पार्टनर के यहां की स्थिति ये है कि उनके गेस्ट स्थायी तौर पर उनके साथ रहते हैं। रहने के साथ-साथ मेस से टिफिन में भरकर खाना लाते हैं और दो या इधर डेढ़ महीने से तीन लोग दोपहर रात उसी खाने में खाते। कमरे में इस तरह से खाना लाना मना है। केवल बीमार आदमी के लिे ये सुविधा है। खैर, उनके इस तरह से खाना लाने और खाने से हमें कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन खाने के एक घंटे पहले बाहर से लोग आते और खाने के दो-ढ़ाई घंटे तक बातें करते रहते। मैं परेशान होता रहता। मेरे पार्टनर से बहुत ही औपचारिक तरीके की बात होती। क्योंकि डीयू के किसी भी हॉस्टल में पहले ही दिन से हिन्दी के लोग चूतिए मान लिए जाते हैं। मेरे आने के तीसरे दिन ही पार्टनर ने मेरे जूनियर दोस्तों को बताया कि तुम्हारा सीनियर विनीत तो चूतिया है, दिनभर रूम में घुसकर पढ़ता रहता है। खैर,
तभी से मैं बहुत संभलकर कम बातचीत किया करता।
इधर जब मैं कमरे में रहता, मेरे या फिर मेरे किसी भी सामान से उन्हें कोई मतलब नहीं होता. लेकिन जैसे ही रातभर के लिए कहीं गया, वापस आने पर कोई न कोई कांड जरुर हो जाता। उस रात मंडली मेरे ही कमरे में जमती. रातभर लोग दारु पीते और हंगामा करते। एक रात मैं जेएनयू गया था। वापस आया तो देखा कि कमरे के शीशे टूटकर फर्श पर बिखरे हुए हैं। आने पर मैंने पूछा कि- सर ये सब क्या है, उन्होंने साफ कहा कि हमें कुछ भी नहीं पता. जब मैंने सबकुछ समेटा तो देखा कि कमरे के चारो तरफ शराब की बोतलों के ढक्कन बिखरे पड़े हैं। मैंने कुछ कहा नहीं और सारे शीशे लगवाए.
बेला रोड़ से अपने दोस्त को अंतिम विदाई देकर लौटा ही था कि कमरे में कुछ लोग आए, साथ में ऑफिस के लोग
और रेसीडेंट ट्यूटर भी थे। हुआ यों था कि आज किसी भाई के कमरे से लैपटॉप की चोरी हो गयी थी और वो और कमरों की तरह मेरे कमरे की भी तलाशी लेना चाह रहे थे। इसी बीच उनमें से किसी ने कहा-यार नयी फ्रीज खरीदी है तुमने, आरटी सर को पानी तो पिलाओ। मैंने जैसे ही फ्रीज खोला, देखा- पूरे फ्रीजर में बीयर की बोतलें और केन भरी हुई है. मैंने फ्रीज को तुरंत लगाया और बाहर से पानी लाने चला गया। अभी से दस मिनट पहले उसमें ऐसा कुछ भी नहीं था. उस रात भी किसी दूसरे कमरे में जमकर बीयर और शराब पी गयी।
मैं अपने पार्टर के साथ परेशान होने की बात ऑथिरिटी से लगातार करता रहा। इस बीच कमरे से पैनकार्ड, कैश सहित रेलवे की टिकट की भी चोरी हुई लेकिन कुछ नतीजा नहीं निकला।
लेकिन आठ दिन पहले हुई घटना ने मुझे बुरी तरह परेशान कर दिया और हारकर मैंने फिर से इसकी शिकायत की।
कैसे लगता है कि ऑथिरिटी नाकाम है और मैं बली का बकरा बनाया जा रहा हूं। आसान नहीं होता सिस्टम से लड़ना, पढिए मेरी अगली पोस्ट में।
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8 Response to 'आसान नहीं होता सिस्टम से लड़ना, परेशान हूं मैं'
  1. नीरज गोस्वामी
    https://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_30.html?showComment=1217412000000#c2500738052985373451'> 30 जुलाई 2008 को 3:30 pm

    आसान तो नहीं होता...लेकिन सिस्टम से लड़ना तो पड़ता ही है...आख़िर कब तक आप शराफत से ये सब सहते रहेंगे??? हिम्मत से एक दिन आरपार की लडाई कर ही डालिए...रोज रोज की जिल्लत से अच्छा है एक बार ही सबकुछ होजाये...या फ़िर छोडिये ये जगह...क्या दुनिया में और कहीं रहने की जगह नहीं है?
    नीरज

     

  2. ab inconvenienti
    https://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_30.html?showComment=1217414940000#c6854768667964360953'> 30 जुलाई 2008 को 4:19 pm

    अकेले बहार रहना और शराफत दिखाना मुसीबत को बुलावा देना है. मेरे भी अनुभव यही रहे है, पर लड़ें भी तो किस किस से, कहाँ तक?

     

  3. Anil Kumar
    https://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_30.html?showComment=1217415060000#c7885184730005337920'> 30 जुलाई 2008 को 4:21 pm

    कुछ लातों के भूत होते हैं, कुछ बातों के।

     

  4. जितेन्द़ भगत
    https://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_30.html?showComment=1217417880000#c7428449705323229947'> 30 जुलाई 2008 को 5:08 pm

    हॉस्‍टल की राजनीति‍ में अच्‍छे लोग हमेशा से पि‍सते रहे हैं,आपका पि‍छला अनुभव भी बुरा रहा है। ये वक्‍त भी निकल जाएगा। अच्‍छा होगा यदि‍ कमरा बदल लें।

     

  5. bhuvnesh sharma
    https://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_30.html?showComment=1217430120000#c2150361715896948990'> 30 जुलाई 2008 को 8:32 pm

    लगता है कि आपका कमरा अब कमरा कम धर्मशाला ज्‍यादा बन गया है.....ये आपके पार्टनर कौन हैं....वैसे आप शरीफ आदमी हैं इसलिए आपको चूतिया बनाया जा रहा है....एक काम कीजिए जरा उंगली को टेड़ा कर लीजिए....कुछ मेहमान आप भी रख लीजिए दो-एक दिन के लिए इंटेंशनली...अपने पार्टनर को मजा चखाने के लिए...अपने झारखंडी मित्रों को ही छुट्टी मनाने बुला लीजिए
    मेरे घर में जब मेरे कमरे की किसी चीज को कोई हाथ लगाता है तो मेरा पारा सातवें आसमान पर चढ़ जाता है...आपके साथ तो अजनबियों ने ऐसा किया है.
    इसीलिए कहते हैं जमाना खराब है

     

  6. Udan Tashtari
    https://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_30.html?showComment=1217431860000#c6871807578151696189'> 30 जुलाई 2008 को 9:01 pm

    आपकी शराफत का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है. थोड़ा उँगली टेढ़ी किजिये.

     

  7. मुन्ना कुमार पाण्डेय
    https://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_30.html?showComment=1217493300000#c3375134842325028395'> 31 जुलाई 2008 को 2:05 pm

    jitna hi shareef baniyega unki badmashiya badhti jayegi.aur ssaali system hai hi .....samjhe .to jo karna hai dimag se aur himmat se kijiye

     

  8. आशीष सिंह
    https://taanabaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_30.html?showComment=1217632200000#c5215577945578305843'> 2 अगस्त 2008 को 4:40 am

    main bhi kuch aisi hi pira se trast hu.bas apka room mate hai to mere neighbours...kuch jada pareshaan kar rahe ho to iska hal bhi nikala jai..tarike bahut hain, aur apke pathak bhi ek baar ishara to kijiye!!

     

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