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हिन्दी साहित्य समाजियों को अगर किसी चीज से डर है तो वह है बाजार। बाजार ही उसके दुख, भय, अनिद्रा, क्रोध औऱ बाकी जितने भी अभाव के भाव हैं, सबके सब के कारण ही हैं। जानने-बताने के स्तर पर तो ये कबीर के वंशज हैं, ये समाज में प्रतिरोध के स्वर को मजबूत करना चाहते हैं। कबीर की तरह ही प्रेम से पूरी दुनिया को पाट देना चाहते हैं लेकिन बाजार के मामले में कबीर से भी कट्टर हैं। कबीर तो तब से कम बाजार को खड़ा होने लायक जगह मानते ही हैं। वो जगह जहां से विरोध शुरु करनी है-

कबीरा खड़ा बाजार में.....

जो घर जारे आपना चलै हमारे साथ।।

कबीर तो बाजार को कम से कम एक ऐसी जगह मानते हैं कि जहां आदमी खड़े होकर विरोध करे तो उसका असर ज्यादा होगा लेकिन अब हिन्दी साहित्य से जुड़ी इन्हीं की पीढ़ी बाकी बातों का समर्थन करते हुए भी कबीर के इस नजरिए के सीधे विरोध में हैं औऱ मानकर चल रहें हैं कि- बाजार तो खड़े होने की भी जगह नहीं है। वो सबकुछ आज के ढंग से जीते हुए भी अपने को बाजार के बीच नहीं देखना चाहते। वे अपने को बाजार से दूर रखने के प्रयास में हैं। उऩ्हें हमेशा डर लगा रहता है कि वो बाजार में न खड़े कर दिए जाएं।

ये बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि पिछले सात-आठ दिनों में मुझे उन सात-आठ लोगों से मिलने का मौका मिला जो इस साल डीयू के हिन्दी विभाग से किसी न किसी विषय पर पीएचडी करने जा रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अभी रिसर्च-प्रपोजल विभाग में जमा किए हैं। इन सारे लोगों ने मुझे अपना यह काम दिखाया और कुछ सलाह भी मांगी। सारे लोगों के विषय एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे। कोई अस्मिता को लेकर काम करना चाह रहा है तो कोई मल्टीकल्चरलिज्म को लेकर तो कोई कार्टून की भाषा पर। विषय के स्तर पर इनलोगों का एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन लिखने के स्तर पर बहुत अधिक फर्क नहीं था।

सबों ने पहले ही पैरा में बाजार, भूमंडलीकरण, पूंजीवाद और इसी तरह के वैल्यू लोडेड शब्दों का प्रयोग किया हुआ था और दूसरे पैरा में उसका जमकर विरोध। ऐसा किए जाने से मुझे कोई आपत्ति नहीं थी। लिखने के स्तर पर, खासकर जब मामला अकादमिक स्तर का हो तो मेरा एजेंड़ा सिर्फ इतना भर होता है कि जिस विषय पर बात करनी हो, उसे लिखने के दौरान स्पष्ट कर दिया जाए। ये वो बात नहीं थी। यहां बाजार और भूमंडलीकरण का विरोध कुछ ऐसा लग रहा था कि जैसे पुराने साहित्य में और हिन्दी सिनेमा में अभी भी शुरुआत में पीतल की घंटी बजा दिया जाता है, मंगलाचरण टाइप से कुछ लिख दिया जाता जिसका कि बाद के पाठ से कोई संबंध नहीं होता। कुछ प्रगतिशील और आस्थावादियों की जीन्स से बने लोग इस संबंध में बड़ा ही खूबसूरत तर्क देते हैं कि- ऐसा इसलिए किया जाता है कि सबसे पहला रचानाकार ईश्वर है, उसके बाद कोई और है। इसलिए ये मामला आस्था और धर्म का नहीं है बल्कि पूर्वजों को दिया गया उचित सम्मान है।

अगर इस लिहाज से हिन्दी के लोगों की लिखी बात पर गौर करें तो आज की हिन्दी पीढ़ी भी जिसे कि बाजार से बहुत अधिक विरोध नहीं है, बल्कि उसे तो लगता है कि बाजार ने बहुत ऐसे अवसर दिए हैं जो कि इसके बिना संभव नहीं है। वह बाजार में अपने करियर की एक बड़ी संभावना देखता है वह भी एमए, एम।फिल् या फिर पीएचडी के स्तर पर कुछ भी लिखना शुरु करता है तो पहले ही पैरा में बाजार की आलोचना करता है, उसके विरोध में उंची-उंची हांक लगाता है तो क्या इसका मतलब ये है कि वह उन पूर्वजों को उचित सम्मान भऱ दे रहा होता है जिनकी किताबों को पढ़-पढ़कर उसने समझा है कि साहित्य में आम आदमी की बात कैसे की जा सकती है। उसके ऐसा करने से पूर्वजों के प्रतिनिधि जो अभी भी अस्तित्व में हैं, उन्हें भी सम्मान मिलेगा औऱ उनके आशीर्वचनों से कभी बड़ा साहित्यकार हो जाएगा।...हमें तो यही लगता है कि आज की हिन्दी पीढ़ी अगर बाजार के विरोध में लिख रही है तो वह ऐसा करके पूर्वजों का ऋण उतार रही है, बाजार के विरोध में लिखकर पूर्वजों के प्रतिनिधियों को परिस्थितिवश सम्मान दे रही है, नहीं तो पाखंड से ज्यादा कुछ भी नहीं है, पढिए अगली पोस्ट में
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मजाक बना दिया है जनसत्ता को

Posted On 10:29 am by विनीत कुमार | 4 comments


क्या जनसत्ता के भीतर कुछ ऐसे लोग हैं जो इसकी छवि को लगातार खराब करने में लगे हुए हैं या फिर यहां का वर्किंग कल्चर ही बहुत ढीला-ढाला है। कोई पाठक अगर ध्यान से इसे पढ़ने लग जाए तो संभव है कि रोज कुछ न कुछ गड़बडी़ उसे समझ में आ जाए। ऐसा होने से इस अखबार के प्रति लोगों की विश्वसनीयता कितनी घटती है इसका अंदाजा शायद काम करने वालों को नहीं है। यह वही अखबार है जिसे कभी हम जैसे पाठकों को हिन्दी विभाग के टीचरों ने नियमित पढ़ने की सलाह दी थी और बताया था कि इसे आप पढ़े, आपकी हिन्दी दुरुस्त हो जाएगी. लेकिन यही क्या यही बात आज हम बीए कर रहे लोगों को उसी विश्वास के साथ कह सकते हैं. शायद नहीं। ऐसा कहना मजाक भर से ज्यादा कुछ भी नहीं होगा।
गड़बडि़यों की श्रृंखला में ही कल यानि २९ अगस्त की एक भारी गड़बड़ी पर गौर करें। मुख्य पृष्ठ पर गंगा प्रसाद की स्टोरी छपी है- कोशी की बाढ़ राष्ट्रीय आपदाः मनमोहन। इस स्टोरी के तीसरे पैरा पर आप गौर करें। नौंवे लाइन से फिर वही बात शुरु हो जाती है जो बात दूसरे पैरा के आठवें लाइन से शुरु होती है। पहली बार जब मैंने पढ़ा और दूसरे पैरा से तीसरे पैरा पर गया तो लगा कि इसी बात को दोबारा पढ़ रहा हूं। एक बार फिर से पढ़ना शुरु किया तो पाया कि स्टोरी में सात लाइन वही छापी गयी है जो कि दूसरे पैरा में भी है। यानि सात लाइन दो-दो बार छाप दी गयी है। दो बार छपे हुए अंश हैं-
... खुद मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, जल संसाधन मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव और आपदा प्रबंधन मंत्री
नीतिश मिश्र कई बार यह दोहरा चुके हैं कि चार-पांच दिन में स्थिति और बिगड़ सकती है। सात-आठ
लाख क्यूसेक पानी जिला में जमा हो जाएगा। ऐसी स्थिति में लोगों को बचाना दूभर हो जाएगा।

इस तरह की गड़बड़ियों को आप तकनीकी स्तर की गड़बड़ी मानकर नजरअंदाज कर सकते हैं औऱ कह सकते हैं कि पेज लगाने वाले की नजर नहीं गयी है। लेकिन इस तरह से किसी व्यक्ति या फिर विभाग को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराना संस्थान का काम है। पाठक इतनी बारीकी में नहीं जाता, उसे सीधे-सीधे इतना ही समझ में आता है कि ये अखबार की गड़बड़ी है। जनसत्ता के भीतर जिस तरह से लापरवाही नजर आ रही है इससे इसकी साख जरुर कमजोर होती है। साथ ही पाठकों के बीच एक असुरक्षा का भी भाव बढ़ता है कि अब किस अखबार की ओर जाएं। बचा-खुचा एक ही तो अखबार रहा जिस पर कि भरोसा किया जा सकता था, अब वो भी लापरवाह होता जा रहा है। मुख्य पृष्ठ पर १८५७ की बजाय १९५७ छाप रहा है, तस्वीर किसी और चीज की है और कैप्शन किसी और चीज की लगा रहा है. इन सारी बातों पर विचार किया जाना जरुरी है.
और इन सबके बीच दुखद स्थिति ये है कि जनसत्ता कभी भी अपनी इन गड़बड़ियों को अगले दिन सुधार के साथ पाठकों से क्षमा मांगते हुए प्रकाशित नहीं करता। ये काम दि हिन्दू करता है और संपादकीय के ठीक बगल वाले पेज पर स्पेस ही तय कर रखा है. पाठक गलतियां खोजकर उसे पोस्ट या मेल कर सकते हैं. जनसत्ता में अगर सबकुछ सही-सही छापने की क्षमता नहीं है तो कम से कम ये काम तो कर ही सकता है।
दुनियाभर के अखबारों के ऑफर को छोड़कर, बाकी के अखबारों से पच्चीस-पचास पैसे ज्यादा देकर महज १२ पेज के अखबार के लिए पाठक अगर ३ रुपये खर्च कर रहा है तो ऐसा नहीं है कि वो मूर्ख है। वो ये कीमत खबरों की प्रामाणिकता, भाषाई दक्षता और विश्लेषण की परिपक्वता के लिए दे रहा है और अगर अखबार से धीरे-धीरे यही सब गायब होने लग जाए, बेसिक चीजों को लेकर ही भारी गड़बड़ी हो तो फिर कोई आधार नहीं है कि पाठक इसे विशिष्ट मानकर खरीदे। पाठक जिस मूल्य के चलते सादे-सपट्टे इस जनसत्ता खारीदाराहे है, उसे इस मूल्य को बचाए रखना बहुत जरुरी है। नहीं तो बाजार की दौड़ में तो वो कब का पिट चुका है।
इसके पहले जनसत्ता की गड़बड़ियां-
गलत स्पैलिंग के आगे जनसत्ता फुस्स
'जनसत्ता' देखकर जोशीजी का मन रोता नहीं ?


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आकाशवाणी के ऑडियो रिसर्च यूनिट में पहुंचा तो देखा कि अधिकांश लोग टीए डीए बिल बनाने में व्यस्त हैं। दो दिन पहले रांची से किसी कार्यक्रम में शामिल होकर आए थे और इस बीच जो भी खर्चा हुआ था, उसका सब अपना-अपना हिसाब दे रहे थे। सिंहजी ने कुछ रुपये अपनी जेब से खर्च किए थे लेकिन उसका बिल लेना भूल गए। अब उऌकी समस्या थी कि वो कहां से बिल लाएं. बाकी के लोगों से इस समस्या का सामाधान मांग रहे थे। इसी बीच मैंने उनसे पूछा- सर यहां एम एन झा कहां मिलेंगे। एम एन झा ऑडियो रिसर्च यूनिट के डायरेक्टर थे और संभवतः अभी भी हों। उन्होंने कहा- सामने उनका चैम्बर है, वो अभी आए नहीं होंगे, मैं भी उनका ही इंतजार रहा हूं। वैसे काम क्या है?

मैंने उन्हें फिर से वो सारी बातें बतायी जो कि एफ।एम. गोल्ड और रैनबो, लाइब्रेरी की मैम और गार्ड को बताया था।सिंहजी को दो बातों को लेकर बड़ी दिलचस्पी बनी- एक तो ये कि मैंने एम.ए. हिन्दू कॉलेज से किया है और दूसरा कि मैं भी उनकी ही तरफ का हूं. आज झारखंड भले ही अलग हो गया है लेकिन हमें कोई बिहारी मान ले और कह दे कि मिट्टी-पानी से तो बिहारी ही हैं तो बमकते नहीं हैं. उनकी बिटिया भी हिन्दू कॉलेज में ही पढ़ रही थी। ये बात ढंग से पुख्ता औऱ तब हुई जबकि मैं चार-पांच दिनों बाद हिन्दू गया तो जूनियर्स ने कहा- क्या सर, कहां-कहां लग्गी मारते हैं आप, सुना है खूब आकाशवाणी जाकर मौज कर रहे हैं, सिंहजी से गपिया रहे हैं। एगो लड़की पूछ रही थी आपके बारे में।

सिंहजी ने सम्मान से बिठाया। बाकी बातें पूछने के बाद गाइड जिन्हें कि मैं मेंटर कहता हूं , का नाम पूछा और नाम बताने पर औऱ ज्यादा इम्प्रैस हुए। एकदम जोर से बोले- तब फिर आपको क्या चिंता है, इधर एम।फिल जमा कीजिए, उधर नौकरी पक्की। मैं अपने काम पर आना चाह रहा था सो पूछा- सर होगा कुछ जो मेरे रिसर्च के काम आ सके। उन्होंने कहा- होगा क्यों नहीं, आपको वो चीज दे देते हैं जिसके बाद किसी भी चीज की जरुरत नहीं रहेगी। वो शायद नबम्बर का महीना था और कुछ ही दिनों पहले साल २००४ का आकाशवाणी वार्षिकांक आया था। उन्होंने उसकी एक प्रति हमें दी। वाकई ये बहुत ही मेहनत, स्पष्टता औऱ सुलझे तरीके से छापी गयी थी. जिस किसी को भी रेडियो के बारे में बेसिक जानकारी लेनी हो, उसके लिए ये अंक बेजोड़ है। सबकुछ अंग्रेजी में था। मैंने अपनी जरुरत के हिसाब से हिन्दी में अनुवाद करके इस्तेमाल कर लिया।

इसी बीच सिंहजी ने बताया कि झाजी आ गए हैं। चलिए उनसे आपको मिलवा लाते हैं। मैं उनके कमरे में गया। मैं कुछ बोलूं, इसके पहले सिंहजी ने मेरे बारे में जो कुछ मुझसे सुना था, उसे और अलंकारिक बनाकर झाजी को बताया. झाजी ने कहा- हमको तो ताज्जुब होता है कि अभी भी लोग इस तरह से भटक-भटककर रिसर्च कर रहे हैं. उन्होंने पूछा- ये सब जो खर्चा होता है, वो कहां से मिलता है. मैंने कहा- सर, मेरा तो जेआरएफ नहीं है, इसलिए सारे पैसे घर से ही लगाने पड़ते हैं। मतलब रहने-खाने का खर्चा अलग और रिसर्च का अलग, आपको तो बहुत मंहगा पड़ जाता होगा। मैंने कहा- जी सर। उसके बाद वो रांची के अपने विद्यार्थी जीवन की बात विस्तार से बताने लगे जिसमें सिविल सर्विसेज में उनकी सफलता से लेकर संघर्ष तक की कहानी जुड़ी हुई थी। बातचीत के बीच में ही उन्होंने पूछा- सिंहजी, आपने इनको कुछ खिलाया-पिलाया कि नहीं औऱ थोड़ी देर बाद ही मैं बिस्कुट भकोस रहा था।

झाजी ने बहुत ही मजबूती से कहा- आप एकदम परेशान मत होइए, मन लगाकर काम कीजिए, जहां परेशानी होगी, हमें बताइएगा। झाजी ने भी रांची से ही पढ़ाई की थी, रांची कॉलेज से और मैंने भी रांची से ही ग्रेजुएशन किया है, संत जेवियर्स कॉलेज से। इस लिहाज से भी वो हमें सम्मान दे रहे थे। झाजी ने कहा- आप मीडिया में रिसर्च कर रहे हैं तो प्रभाष जोशी और शिलर को पढ़ना मत भूलिएगा। शिलर की किताब तो मैंने खरीद भी ली लेकिन प्रभाष जोशी को पढ़ने का तुक यहां पर मैं समझ नहीं पाया।


इतना सबकुछ होते- हवाते तीन बज गए। मैं जल्दी से अपने कमरे में पहुंचना चाह रहा था। सबको दुआ सलाम करके बाहर निकला। उनलोगों को शायद बहुत दिनों के बाद ऐसा लड़का मिला जो उन्हें बहुत गौर से सुन रहा था। रास्ते में बस में बैठते हुए मैं दो बातें एक साथ सोच रहा था- एक तो ये कि कितनी आत्मीयता से बात की इनलोगों ने, लगा ही नहीं कि किसी अंजान जगह में आया हूं. औऱ दूसरी ये कि मीडिया के लिए काम करते हुए भी इनलोगों के पास कितना समय होता है कि हम जैसे लोगों को पांच-छह घंटे यूं ही दे देते हैं। रेड एफ एम गया था तो ४५ मिनट में करीब पांच लोगों से बात कर ली थी। थोडी़ देर बात करने के बाद सबने यही कहा था- सॉरी अब ज्यादा टाइम नहीं दे सकते। इनलोगों के रिस्पांस से मैं जितना भावुक हो गया था, आकाशवाणी की वर्किंग कल्चर से उतना ही चिंतित। कुछ भी नया नहीं, कुछ भी क्रिएटिव नहीं. टशन देने की छटपटाहट नहीं। सबके सब पंजाब केसरी लिए बैठे हैं. दस मिनट के काम में तीन घंटे लगा रहे हैं। क्या आकाशवाणी एक निश्चिंत माध्यम है, बार-बार झाजी की बात याद आ रही थी- विनीतजी आकाशवाणी को आप ही जैसे लोगों की जरुरत है. प्राइवेट चैनलों पर बात करते हुए तो उन्होंने इसकी जमकर आलोचना की थी लेकिन जैसे मैंने वर्किंग कल्चर पर बात शुरु की थी तो वो भी प्राइवेट चैनलों पर सहमत नजर आए।
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ये देश का आकाशवाणी भवन है

Posted On 8:02 am by विनीत कुमार | 2 comments


समय मिले तो कभी आकाशवाणी के चक्कर लगा लेना, शायद कुछ काम की चीजें निकल आए। मेरे मेंटर ने मुझे जब ऐसा कहा तो मुझे भी लगा कि रिसर्च के नाम पर आकाशवाणी तो जाना ही चाहिए। इसके पहले मैं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की लाइब्रेरी कई बार जा चुका था। मैं यह सोचकर वहां गया था कि रेडियो को लेकर जितने भी सरकारी फैसले लिए गए होगें और जो भी प्रसार हुए हैं, उन सबके संबंध में जानकारी मिल जाएगी। कुछ-बहुत तो सामग्री मिली लेकिन रिसर्च के लिहाज से कुछ खास नहीं।

दिल्ली के आकाशवाणी भवन में मैं पहली बार गया था। रांची के आकाशवाणी केन्द्र की रजिस्टर में इतनी बार अपना नाम लिख आया था कि दिल्ली आकर इसे रिपीट नहीं करना चाहता था। युवावार्ता के लिए कई बार नाम दिए, वहां के लोगों से पूछता कि कब बुलाएंगे। बड़े प्यार से वहां के इन्चार्ज जबाब देते, अरे बुला लेंगे, आपके जैसे लोग बिना किसी के रेफरेंस के आते कहां हैं। यहां तो सब चाचा-ताउ का नाम लेकर आते हैं। हमें तो आप जैसे लोगों की ही जरुरत है।॥ लेकिन आकाशवाणी रांची ने कभी नहीं बुलाया। मेरे से लल्लू लोग अकड़ के वहां जाते और आंय-बांय बोलकर कुछ राशि की पर्ची लेकर कॉलेज में चौड़े होकर घूमते। उनमें से कुछ तो ऐसे भी थे जिन्हें बुलाया जाता था, वे हमारी तरह अपनी मर्ज से नहीं चले जाते। मेरे मन में बार-बार बस एक ही सवाल उठता कि-क्या देखकर इन लोगों को बुलाया जाता है। बाद में व्यावहारिक वजह जान लेने पर मन उचट गया और फिर कभी भी रजिस्टर में नाम लिखवाने नहीं गया। दिल्ली आकर इसलिए मैंने कभी कोशिश नहीं की।

लम्बे समय तक आकाशवाणी में साहित्यकारों, शास्त्रीय संगीतकारों और शहर के रंगमंच से जुड़े लोगों का वर्चस्व रहा है। कहने को लगभग हरेक केन्द्र में अलग-अलग कार्यक्रमों के लिए रजिस्टर रखे मिलेंगे, जिसमें आप अपनी रुचि और क्षमता को के हिसाब से कार्यक्रम के लिए नाम लिख आएं। आकाशवाणी जरुरत के हिसाब से आपको बुलाएगा लेकिन अंदर इतना अधिक तोड़-जोड़ है कि ये चीजें व्यवहार में नहीं आने पाती। आकाशवाणी के भीतर नए लोगों को सामने लाने की स्पिरिट ही नहीं है। विश्वविद्यालय से कम मठाधीशी नहीं है। दिल्ली के बारे में बहुत दावे के साथ तो नहीं कह सकता लेकिन बिहार और झारखंड के केन्द्रों में ये सारी चीजें देखकर आया हूं। खैर,


दिल्ली में आकाशवाणी भवन के भीतर मैं पहली बार गया था। गेट पर जब पास बनवा रहा था तो गार्ड ने पूछा-किससे मिलना है। मैंने कहा- मैं डीयू से आया हूं और रेडियो पर रिसर्च कर रहा हूं, मैं यहां के कुछ लोगों से मिलना चाहता हूं। गार्ड को मेरी बात समझ में आयी और उसने पास बनवाने में मेरी मदद की और इज्जत से अंदर जाने दिया। आकाशवाणी भवन की पास टिकट लेकर मैं इतना भावुक हो गया था कि मैंने सोचा- रिसर्च के लिए पहली बार मैं यहां आया हूं, मैं इसे फेंकूगा नहीं। जब कभी रेडियो के उपर किताब लिखूंगा तो इसे फ्लैप पर लगाउंगा और सचमुच वो मेरे पास मेरी फाइल में सुरक्षित है।


सबसे पहले मैं एफएम गोल्ड और रेनवो की तरफ गया। वहां बैठे एक सज्जन से बात की औऱ बताया कि मैं ऐसे-ऐसे काम कर रहा हूं। उन्हें लगा कि कोई सोसियो या फिर दूसरे विषय से होगा। बड़ी रुचि के साथ सारी बातें बताने लगे लेकिन इसी बीच उन्होंने पूछा- आप डीयू में किस डिपार्टमेंट से हैं। मैंने कहा- हिन्दी। उन्होंने कहा- अच्छा, हिन्दी। तब आप इस पर क्या रिसर्च कीजिएगा, कुछ शब्द-बब्द पकड़कर लिख मारिएगा सौ पेज, रेडियो की बात तो आ ही नहीं पाएगी। मैंने फिर कहा-ऐसा नहीं है सर, काम तो तरीके से ही करना है। मैं तो यहां आया था कि बेसिक चीजों की जानकारी मिल जाएगी। उनका अंदाज अब हमसे कट लेने का था। अगर बेसिक चीजों के लिए आए हैं तो फिर यहां की लाइब्रेरी चले जाइए, वहां आपको कुछ न कुछ जरुर मिल जाएगा। मैं भारी मन से उठा और लाइब्रेरी की तरफ चल दिया।

लाइब्रेरी पहुंचते ही मुझे धक्का लगा। तो ये है देश की राजधानी का आकाशवाणी भवन और ये है इसकी लाइब्रेरी। लाइब्रेरी बिल्कुल भी अपडेट नहीं। बेतरतीब ढंग से रखी किताबें। डेस्क पर एक मैडम पंजाब केसरी खोलकर बैठी थी। मैंने उन्हें सारी बातें बतायी। उन्होंने साफ कहा- जो है सो यही है, देख लो। मैं करीब घंटेभर तक में पूरी किताबों पर एक नजर मार लिया। रेडियो पर किताबें नहीं मिलेगी इसका अंदाजा तो मुझे शुरु के पांच मिनट में ही लग गया था लेकिन कुछ साहित्य की किताबें रखी देखकर उसमें उलझ गया। अंत में दिस इज ऑल इंडिया रेडियो, एच।सी। बरुआ की किताब को उलट-पलटकर बाहर आ गया।

मैडम को मैंने बताया कि- मैम, कितने लोग रेडियो सुनते हैं, कहां-कहां ये काम करता है औऱ भाषा के स्तर पर क्या कुछ चल रहा है, इन सारी बातों की जानकारी मुझे कहां से मिलेगी। उन्होंने कहा- आप ऑडियो रिसर्च सेक्शन चले जाओ। उधर पल्ली साइड, शायद पांचवे तले पर है। मैं वहां की तरफ बढ़ गया।


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रेडियो का जब भी पक्ष लिया जाता है तो एक बात बहुत ही मजबूती से की जाती है कि यह डिस्टर्विंग माध्यम नहीं है। यानि इसके साथ लोग रोटी बनाते हुए, आयरन करते हुए, खेतों में बीज बोते हुए, दर्जी कपडो़ की सिलाई करते हुए भी जुड़ सकते हैं। मीडिया की किताबों में वाकायदा इस तरह के उदाहरण दिए होते हैं। गूगल इमेज पर जाएंगें तो आपको कई ऐसी तस्वीरें मिलेंगी जिसमें लोग काम करते हुए रेडियो सुन रहे हैं। बाकी माध्यमों के साथ ऐसा नहीं है।एफ।एम। के प्रचलन से लोग ऑफिस जाते हुए बसों और अपनी निजी गाडियों में मजे से एफ.एम. सुनते हुए जाते हैं। अब तो लोग मोबाइल में भी रेडियो होने से देश-दुनिया से बेखबर एफ।एम. सुनते हुए निकल लेते हैं।स्टूडेंट हल्के से रेडियो बजाते हैं और रौ में काम करते चले जाते हैं। लेकिन रेडियो सुनने के मामले में मेरा अनुभव कुछ अलग किस्म का है।

पढ़ाई करते हुए जब भी मैं रेडियो सुनता हूं तो थोड़ी देर के बाद जब पढ़ने में मन रम जाता है तब मैं इसे बंद कर देता हूं। तब मुझे तमाम अच्छे गाने और कार्यक्रम आने के बावजूद ये डिस्टर्विंग लगता है। दूसरी स्थिति ये होती है कि रेडियो बजाकर पढ़ने बैठता हूं और उसके बाद पढ़ने में मन नहीं लगता तो पढ़ना बंद कर देता हूं और पूरे मन से रेडियो सुनने लग जाता हूं। कई बार तो पढ़ाई और रेडियो सुनने के बीच रस्साकशी चलने लग जाती है और दोनों में साथ-साथ मजा आता है।

पढ़ाई करते हुए जब भी मैं रेडियो सुनता हूं तो थोड़ी देर के बाद जब पढ़ने में मन रम जाता है तब मैं इसे बंद कर देता हूं। तब मुझे तमाम अच्छे गाने और कार्यक्रम आने के बावजूद ये डिस्टर्विंग लगता है। दूसरी स्थिति ये होती है कि रेडियो बजाकर पढ़ने बैठता हूं और उसके बाद पढ़ने में मन नहीं लगता तो पढ़ना बंद कर देता हूं और पूरे मन से रेडियो सुनने लग जाता हूं। कई बार तो पढ़ाई और रेडियो सुनने के बीच रस्साकशी चलने लग जाती है और दोनों में साथ-साथ मजा आता है।एम।फिल रिसर्च के लिए विषय तय हो जाने के बाद मेरे मेंटर प्रो.सुधीश पचौरी सर मुझसे बार-बार एक ही बात कहते, अरे भइया रेडियो सुनते हो कि नहीं, खूब सुना करो, उसी से बातें निकलकर आएगी. वो रेडियो को ऑडियो लिटरेचर और टीवी को विजुअल लिटरेचर कहा करते हैं जिससे कई साहित्यप्रेमियों को असहमति भी हो सकती है।रिसर्च के विषय में ये तय नहीं था कि मुझे किस वक्त के रेडियो कार्यक्रमों की रिकार्डिंग करनी है और कब तक की करनी है. इसलिए अपनी सुविधा के अनुसार रिकार्डिंग करता। लेकिन एक बार मेंटर ने कहा कि- कभी तुमने २४ घंटे लगातार रेडियो सुना है, सुनकर देखो, अलग ढंग का अनुभव होगा। पहले तो मुझे लगा कि ये बहुत ही अटपटा किस्म का काम है लेकिन उत्साह भी बना कि देखें क्या होता है और कैसा लगता है।

हॉस्टल में एक कमरे में दो लोग रहते थे और अगर मैं रातभर रेडियो सुनता तो मेरे पार्टनर को परेशानी हो सकती थी, सो प्रेसीडेंट से सेटिंग करके कुछ दिनों के लिए यूनियन रुम की चाबी ले ली।.....और पन्द्रह अगस्त की सुबह ९ बजे रेडियो, रिकार्डर, पानी, जूस, कुछ टेबलेट्स, ब्लैंक ऑडियो टेप लेकर कमरे में बैठ गया और चार बजे शाम तक बिना पेशाब-पानी के रेडियो सुनता रहा औऱ रिकार्डर का टेप बदलता रहा। चार बजे के बाद हल्का हुआ और जूस पिया। फिर चार बजे से रात के एक बजे तक लगातार रेडियो सुनता रहा। एक बजे के बाद से सिर्फ गाने आने लगते हैं और बीत-बीच में चैनल का नाम कि ये है रेडियो सिटी फ ९१ fm .. . सुबह के छ बजे से फिर नई सुबह के साथ कार्यक्रम शुरु होते।

पहली बार मैं चौबीस घंटे तक सिर्फ रेडियो सिटी सुनता रहा। उसके दस दिन बाद फिर वैसा ही किया और अबकि बार चौबीस घंटे तक सिर्फ रेडियो मिर्ची सुनता रहा। इस बीच मैं खाने की कुछ भी चीजें नहीं लेता। एक तो नींद आने का खतरा और दूसरा कि बदहजमी होने का डर। लेकिन तीसरी बार जब मैं फिर चौबीस घंटे के लिए दोनों चैनलों के अलावे बाकी चैनलों को बदल-बदलकर सुनने का मन बनाया तो गड़बड़ी हो गयी।

मैं एक बजे के बाद नींद बर्दाश्त नहीं कर पाया औऱ आंख लग गयी। कमरा खुला था औऱ किसी ने रिकार्डर मार लिया। नींद खुलते ही देखा-रिकार्डर गायब। थोड़ी देर के लिए हो-हल्ला हुआ लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला। मैं रिकार्डर चोरी होने से ज्यादा रिदम के टूट जाने को लेकर परेशान था और इस बात की चिंता थी कि फिर से जुगाड़ करना होगा। खैर,

चौबीस घंटे तक लगातार रेडियो सुनने का जो मेरा अनुभव रहा उसमें ध्यान और पूजा को लेकर जो पाखंड फैलाए जाते रहे हैं, उसकी बात में समझ में आ गयी और वो यह कि- आप एक मन से पूजा करें या फिर रेडियो सुने, आप संतुलित जरुर हो जाते हैं, आपको शांति का एहसास हो जाता है। रेडियो पर लगातार कुछ न कुछ बजते रहने के बाद भी अंदर से मैं बहुत शांत और भराभरा महसूस कर रहा था।...औऱ समझ गया था कि कोई पूजा न करके ध्यान से रेडियो सुने, कोई और काम करे, उसकी एकाग्रता बनेगी। इसलिए इसका कोई अर्थ नहीं होता कि आप किस मंत्र का जाप कर रहे और कौन से देवी-देवता का नाम ले रहे हैं। महत्वपूर्ण है कि आप प्रोसेस में शामिल होते हैं। इसलिए चौबीस घंटे की इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद कॉन्फीडेंस से कह पाता हूं कि- ये ध्यान, पूजा सब बकवास है, पाखंड है, कोई चाहे तो एक बार रेडियो के नाम पर जागरण करके देख ले।




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