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जनसत्ता को लेकर जोशीजी को भावुक हुए अभी १५ दिनों से ज्यादा नहीं हुए, त्रिवेणी सभागार में मीडिया जगत के नामचीन लोगों को इसे प्रेरणा बिन्दु स्वीकार करने का मामला अभी भर जी थमा भी नहीं है कि कल जनसत्ता ने फिर भारी गड़बड़ी कर दी। इस गड़बड़ी पर अगर आप गौर करेंगे तो आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि यहां किस तरह से खबरें तैयार की जाती है।दो-तीन बार जनसत्ता की कमजोरियों पर लिख देने के बाद कुछ लोगों को लगने लगा है कि मैं इस अखबार की गड़बडियों के बारे में लिखने का जिम्मा सिर्फ मेरा ही है। कल ही एक भाई साहब ने फोन पर भड़कते हुए बताया- लीजिए अब आपको एक और मसाला मिल गया, आज का अखबार पढ़िए और लिखिए कि क्या कर रहे हैं जनसत्ता के लोग. मैंने तय कर लिया था कि अब नहीं लिखना है, लिखने को तो लिख दे लेकिन बेवजह परेशानी झेलनी पड़ती है। दिनभर दूसरे कामों में व्यस्त रहा और इस बीच भाईजी कोचते रहे- लिख दिए, कब लिख रहे हैं, काहे चुप हैं अब, सेटिंग हो गयी है क्या। मैं समझ गया कि लिखे बिना भाईजी को चैन नहीं मिलेगा।मामला जनसत्ता ७ अगस्त २००८ के पेज नं- ७ पर छपी खबर को लेकर है। यह संपादकीय पेज का ठीक पड़ोसी पन्ना है। जो अखबार में संपादकीय पढ़ते हों, उनकी नजर अपने आप इस पन्ने पर भी चली जाएगी।दो तस्वीरें हैं- एक तस्वीर है जिसमें छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं औऱ दूसरी तस्वीर है विश्व शांति के लिए छात्र प्रार्थना कर रहे हैं। आप तस्वीर देखिए जिसमें छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं, उसके कैप्शन में लिखा है- विश्व शांति के लिए अमदाबाद में बुधवार को प्रार्थना करते छात्र । कोई भी आदमी तस्वीर देखकर पूछेगा कि- कहां प्रार्थना कर रहे हैं, ये तो नारे लगा रहे हैं। दूसरी तस्वीर में मोमबत्तियां जल रही है और वो इस रुप में रखीं हैं कि पीइएसीइ, पीस यानि शांति शब्द बन जा रहा है। चारो तरफ छात्र हाथ जोड़े हैं। इसका कैप्शन है- अखिल भारतीय छात्र संघ के कार्यकर्ता अपनी मांगों के समर्थन में बुधवार को पटना के हिमगिरी एक्सप्रेस के सामने प्रदर्शन करते हुए। इस तस्वीर को देखकर भी लोग यही कहेंगे कि कहां कोई प्रदर्शन कर रहा है।हुआ यह है कि दोनों तस्वीरों के नीचे जो कैप्शन लगा है, वह उल्टा है। वैसे उलट जाना कोई भारी बात नहीं है लेकिन पाठक के सामने जो संदेश जाता है वह यह कि क्या जनसत्ता में भी वही सब हो रहा है जो कि हिन्दी के बाकी अखबारों में हो रहा है। जो लोग उस दिन जोशीजी के पांच किताबों के लोकार्पण में गए और इस पेज को देखा होगा, वे दो ही बातें कहेंगे- एक तो यह कि जनसत्ता को अलग बने रहने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी, नहीं तो दावे बड़े पाखंड लगेंगे। अभी छपाई की गड़बड़ी पर नजर जा रही है, कल को खबरों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे। लापरवाही जब आती है तब छांट-छांटकर तो आती नहीं। दूसरा वे यह भी कहें कि क्या जोशीजी का मन आज की जनसत्ता को देखकर कभी रोता नहीं।
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1 Response to ''जनसत्ता' देखकर जोशीजी का मन रोता नहीं ?'
  1. Anshu Mali Rastogi
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/08/blog-post_08.html?showComment=1218197460000#c2586821918745296845'> 8 अगस्त 2008 को 5:41 pm बजे

    विनीतजी
    कोई कुछ कहे पर आप इन गड़बड़ियों पर लिखें जरूर।

     

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