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आज वीडियोकॉन टावर,झंडेवालान में "आजतक" समाचार चैनल का आखिरी दिन है. इसके बाद से ये चैनल बल्कि टीवी टुडे नेटवर्क कंपनी नोएडा में बनी अपनी दैत्याकार बिल्डिंग में शिफ्ट हो जाएगी. आजतक के इन्टर्न के तौर पर मैंने इस इलाके में कोई तीन महीने गुजारे. ढेर सारी यादें हैं, ढेर सारी कसक,सपने, उम्मीदें, तमीज और बदतमीज होने की प्रक्रिया से गुजरना हुआ. लिहाजा लप्रेक( लघुप्रेम कथा) लिखे बिना अपने से रहा नहीं गया. तो आप भी पढ़िए. टीवी टुडे के अधिकारियों से अपील और उम्मीद है कि इसमें वो किसी भी तरह की वैधानिक पेंच न खोजने लगेंगे- विनीत

नीलिमा, चल न आज शाम वीडियोकॉन टावर चलते हैं. वीडियोकॉन टावर, अचानक ? लेकिन हमने आज शाम तो बर्फी की प्लान बनायी  थी न. तूने मीडियाखबर पढ़ा नहीं क्या ? क्यों क्या हो गया ? अरे आज वीडियोकॉन में आजतक का आखिरी दिन है. आखिरी दिन यानी हमारे टीनएज के सपनों की ठिकाने के बदल जाने की जगह. याद है, जब भी हम करोलबाग की तरफ से गुजरते थे,मैं तुम्हें दूर से ही वीडियोकॉन टॉवर के उन फ्लोर की तरफ उंगली से इशारा करके बताता था- इसी पर आजतक की ऑफिस है. हम मास कॉम करेंगे और उसके बाद यहीं काम करेंगे और थोड़े ही वक्त के लिए सही, किया भी. हां-हां याद है निखिल..और सोच न तू इस बिल्डिंग को लेकर कितना पागल रहता है अब भी. हमें जाना होता है सीपी और तू बीच में ही उतरकर इसके पास से गुजरता है. बिल्डिंग की मेन गेट पर तेरी आंखें ऐसे जाकर धंस जाती है कि खोदकर किसी न किसी परिचित को ढूंढ निकालेगी.

 और तू भी तो नीलिमा. वॉलेट में चाहे जितने पैसे हों, किसी न किसी बहाने इस बिल्डिंग में लगी आइसीआइसीआइ की एटीएम मशीन से पैसे निकालने लग जाती है. वैसे तो मैंने एक्सिस और एसबीआई के अलावे किसी दूसरे बैंक की एटीएम से पैसे निकालने कहता हूं तो साफ मना कर देती है- यार निखिल, अपने एक-एक रुपये मेहनत से आते हैं यार, क्यों दूसरी मशीन से निकालकर बीस-पच्चीस बर्बाद करेगा? निखिल, मैं इस बिल्डिंग की एटीएम मशीन से पैसे कहां निकालती हूं बल्कि उन यादों की रिवीजन करती हूं जब दिन में चार-पांच बार मिनी स्टेटमेंट निकाला करते थे फिर भी हिसाब नहीं लगा पाते थे कि आखिर डेढ़ हजार रुपये गए कहां ?

 तू एक ब्लैक कॉफी के लिए भी कह देता था तो सौ रुपये निकालती थी एटीएम से. अपना लो बजट का प्यार भी तो यही डेवलप हुआ न. ऐसे में इतना तो बनता है न कि रुककर पैसे निकाल लूं. मतलब तू यहां पैसे निकालने नहीं,सजदा करने आती है, हा हा. सही है. निखिल, लेने लगा  न मजे. अच्छा फिर तू बता. मैं जब भी कहती हूं कि दिल्ली प्रेस वाली सड़क से चलो, ज्यादा भीड़-भाड़ रहती है, इस साइड..मना क्यों कर देता है ? क्यों कहता है कि उधर गाड़ियां इतनी रफ्तार से चलती है कि टक्कर लगने का डर बना रहता है, जैसे कि दिल्ली में हम बाकी जगह पगडंडियों पर से होकर जाते हैं. ओह नीलिमा, वो तो इसलिए कि इधर से मेट्रो शार्टकट पड़ती है. मेट्रो शार्टकट पड़ती है लेकिन जब आइटेन में होते हो तब भी तो. जहां खिलौनेवाली बाइक का क्रॉस करना मुश्किल हो वहां अपनी गाड़ी अटक जाती है, आसान कहां होता है ? मेरी तो छोड़ लेकिन फिर तू क्यों सामने के पार्क में चक्कर लगाने लग जाती है और बेचैन हो जाती है जैसे कि तेरी इयर रिंग गुम हो गई हो ?

 नीलिमा, अब छोड़ न. इतनी बहानेबाजी से तो अच्छा है न, क्या हम ये एक्सेप्ट नहीं कर सकते कि हमदोनों इस वीडियोकॉन टावर को बहुत मिस्स करते हैं. होगा ये जमाने के लिए भीड़भाड़ का इलाका और एक-दूसरे की मारकाट मचानेवाली ऑफिस लेकिन अपने लिए ये कभी ऐशगाह थी बिल्डिंग. प्यार,करिअर और थोड़े पैसे सब तो यही उगे थे,खिले थे,बढ़े थे. हम इससे गुजरते कहां है, इस कोशिश में होते हैं कि इसे ज्यादा से ज्यादा अपने भीतर भर लें ताकि सात-आठ दिनों तक यादों की रसोई में,धीमी आंच में पकते रहें ख्याल.

 नीलिमा,नीलिमा..यार तू ऐसे आंखों में आंसू लेकर वीडियोकॉन टावर को याद करोगी ? क्या हुआ ? कुछ नहीं निखिल. ये वही पार्क है जहां मैं आकर बहुत रोई थी, उस कमीने प्रोड्यूसर की एटीट्यूड पर जो मुझे बुरी तरह घूरता था और हमें सुनाते हुए कहा था- अरे, लड़कियां मीडिया में सक्सेस होने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है...स्साली सब प्रोस्टी.. मैंने उसी दिन तय कर लिया था कि मुझे नहीं रहना मीडिया में, नहीं बनना एंकर..लेकिन तूने इस पार्क में आकर घंटों समझाया था और एक ही बात कई बार कही- तुम मीडिया छोड़कर मठ जाकर संतई भी करोगी न नीलिमा तो जमाने का नजरिया नहीं बदल सकती. तुम अपने को बना-बदल सकती हो, इन कमीने को नहीं. चुपचाप काम करती हो..पता नहीं तुम्हारी बात का असर था या फिर माहौल कुछ ऐसा बना कि मैं उस दिन के बाद से सिर्फ एंकरिंग के बजाय प्रोडक्शन,पैकेजिंग सबमें दिलचस्पी लेने लगी.

तुम्हारी शिफ्ट खत्म हो गई थी, तुम वापस घर चले गए थे नाइट शिफ्ट में थककर और सुबह आते ही मेरी बकवास और रोना-धोना सुनकर..मैंने उस दिन ऑफिस में बहुत काम किया था लगातार और एक बात कहूं- तीन बार सौ-सौ रुपये निकाले थे इसी एटीएम से और तीन बार कॉफी पी थी. तुम्हारी बातें ब्लैक कॉफी के साथ घुलकर मिंट सा असर कर रही थी. तुम्हारी रोज की आदत थी कि शिफ्ट खत्म होते ही मुझे मेल करने की और हमेशा की तरह उस दिन भी तुमने मेल किया था-

 नीलिमा, मुझे लगता नहीं कि मैं मीडिया की इस वाहियात दुनिया में ज्यादा दिनों तक टिक पाउंगा. मेरी सारी काबिलियत,सारा पढ़ा-लिख इस बात पर आकर टिक गया है कि कमीने और हरामी लोगों के बीच मैं कैसे और बड़ा कमीना बन सकता हूं जबकि मेरी पूरी ट्रेनिंग एस.पी.सिंह से और बेहतर,माथुर साहब से और धारदार लिखने-सोचने और कम से कम कल्पना करने की तो रही ही है. शायद ये मेरा आखिरी दिन हो. मैं मेल पढती जा रही थी और भीतर ही भीतर रोती जा रही थी कि पास बैठे त्रिपाठी सर को अंदाा न लगे कि मुझे कुछ हुआ है. मैं उस दिन कई बार वाशरुम गई और अजीब सा सन्नाटा पाया. लेडिज वॉशरुम के बाहर कोई खड़ी होती,आहट पाकर मुझे इम्बैरेस लगता कि क्या सोच रही होगी कि ये लड़की इतनी देर अंदर क्या करती है लेकिन तुम खड़े होते तो इत्मीनान रहता कि निखिल को इन सबसे फर्क नहीं पड़ता. तुम्हें दिन में ही फोन किया था,ये जानते हुए कि नाइट शिफ्ट करके के बाद तुम थककर सो गए होगे लेकिन तुमने पहली ही बार में फोन उठा लिया था- हां नीलिमा बोलो,सब ठीक तो है न ?

नहीं निखिल,कुछ भी ठीक नहीं है. तुम मुझे चील-कौव्वे के बीच अकेला छोड़कर क्यों जाना चाहते हो और कितनी बड़ी बकवास की है तुमने मेरे साथ..खुद जाने का फैसला ले लिया और मुझे स्त्री विमर्श का ज्ञान देते रहे. तुमने गलत किया निखिल,एक्चुअली यू आर चिटर. यार, क्या सोचकर इतना घटिया मजाक किया मेरे साथ ? तुम चुपचाप सुनते रहे और आखिर में बस इतना कहा- काम ज्यादा है क्या ? श्मशान वाली मंदिर में आ सकती हो जहां हम लंच के बाद जाया करते हैं. मंदिर में तुम फिर ज्ञान देने लगे थे और कहा था- तुम्हारे लिए मीडिया छोड़ना, एक सपने से छूटना है, उससे हमेशा से दूर हो जाना है..याद करो न मीडिया की वो डमी शूट- कैमरामैन निखिल के साथ मैं नीलिमा, दिल्ली आजतक..

क्या तुम इसे यूं ही छोड़ दोगी ? नो, नेवर.. लेकिन मेरे लिए मीडिया छोड़ना,सपने का छूटना नहीं है, उसकी शिफ्टिंग भर है. मैं तुम्हारी तरह स्क्रीन पर पीटीसी न देकर भी अक्सर कहूंगा- कैमरापर्सन नीलिमा के साथ मैं निखिल, जिंदगीभर...है न नीलिमा..तुमने तब आगे कोई जवाब नहीं दिया था और जाड़े की मासूम दुपहरी में मुझसे लदकर सो गयी थी. पुजारी ने हमेशा की तरह यही समझा- ये मीडिया भी गजब की चीज है, अच्छे-भले मासूमों की नींद,चैन और रात छीन लेते हैं.
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 सच में, हसीना खाला की तरह मैं भी चाहे कितनी भी सड़ी गर्मी हो,सोते वक्त देह पर रजाई या कंबल डाले बिना सो नहीं सकता. दिनभर की थकान और मानसिक तनाव को जब खूंटी पर टांगने और आले पर रखने की कोशिश करता हूं तो उसकी एवज में शरीर के उपर इन रजाई और कंबल का बोझ साथ रख लेना जरुरी लगता है. इतना जरुरी कि शायद मैं उसके बिना दिनभर की थकान और आदिम तनाव को रात के सोते वक्त अपने से अलग कर ही नहीं सकता..

मैं यशोदा सिंह की "दस्तक" से पंक्ति दर पंक्ति गुजरता हूं और जिसे रविवार के दिन के उजाले में पढ़ना शुरु किया था और देर रात से शुरु होनेवाले सोमवार पर जाकर खत्म कर देता हूं. सॉरी, खत्म मैं नहीं करता बल्कि उसके आगे हसीना खाला की कहानी खत्म हो जाती है. शायद जिस मुकाम पर जाकर हसीना खाला सुकून पाती है, यशोदा नहीं चाहती कि वहां से उठाकर हसीना खाला को आगे भी चलने को कहे,जहमत उठाए.

 रविवार के इस पूरे दिन मैं पुरानी दिल्ली के उन इलाकों-ठिकानों में भटकता-अटकता रहता हूं जहां नजरअंदाज और नजर के बीच गहरा फासला है. हम जिस भीड़-चिल्ल-पों, हो-हल्ले के बीच फंसी-दुबकी संवेदना से महरुम रह जाते हैं, यशोदा हमें बार-बार खींचकर ले जाती है. रविवार के दिन दिनभर दरियागंज मार्केट में चक्कर काटते हुए, एयरलाइंस की चम्मचें, इय़र बड मीडिया और कल्चरल स्टडीज पर किताबें छांटते हुए जो थकान होती है और इन पैरों पर खीझ भी कि ओटोवाले को कहूं- जा,मेरे इन दोनों पैरों को डीयू पहुंचा आ, बाकी इनके भाई-बहन, हाथ-गला-मुंह-कान पीछे से आएंगे, कुछ-कुछ वैसा ही महसूस कर रहा हूं. नींद से आंखे बोझिल है लेकिन कीबोर्ड पर उंगलियां "मियां की दौड़ मस्जिद तक" के फलसफे के मानिंद एक ढर्रे में दौड़ रही है. अबकी बार आंखों को तकिए पर गिर जाने कह रहा हूं और उसके बाकी भाई-बहन बिस्तर पर पीछे से आएंगे.

 यशोदा की दस्तक में हसीना खाला पुरानी दिल्ली के एक-दूसरे से बिल्कुल कटे और निस्संग परिवारों के बीच अपने को टेलीफोन या बिजली की तार की तरह जोड़े रखती है जिसका एक के घर से गुजरने के बावजूद कोई गंभीर अर्थ नहीं है लेकिन उनका न गुजरना कई आगे वाले घरों के लिए गैरमौजूदगी. हम इसे पढ़ते हुए अपने शरीर को इसी तरह एक-दूसरे से अलग,नितांत महसूस करते हुए भी अनिवार्य रुप से जुड़ा पाते हैं और जिन कारणों और जरुरतों से जुड़ा है वो है हसीना खाला. मेरे डॉक्टर साथी और भइया ऐसी लाइनें पढ़कर क्रेक और मेंटल घोषित करने में दस मिनट भी नहीं लाएंगे शायद. लेकिन वेवजह के बीच वजह बनती हसीना खाला की तरह ही तो हम और हमारा समाज जिंदा है और जीता है.

 रात के इस सन्नाटे में तुरंत-तुरंत पढ़कर उठने पर भला किसमें यशोदा जैसा लिखने की होड़ न मचे लेकिन लेखन कायनात तो है नहीं कि बस दस मिनट की कीबोर्ड की किटिर-पिटिर से आ जाए. वक्त लगेगा, खूब सारा वक्त..और भी क्या गारंटी कि आ ही जाए.

 यकीनन हम हसीना खाला की तरह आज क्या कभी भी इत्मीनान नहीं हो सकते क्योंकि हमने अपनी आपाधापी जिंदगी के बीच से कतर-ब्योतकर कुछ हिस्सा लोगों के बीच बिखेरने के बजाय जीवन बीमा कंपनियों और म्युचुअल फंड की मुंह में ठूंस आए हैं. जिसे लेकर, देखकर हम दावा करते हुए उसकी तरह इत्मीनान हो लें कि- इसके भीतर एक टुकड़ा मैं हूं, मैं यानी हसीना खाला. बावजूद इसके पता नहीं इस दस्तक में ऐसा क्या है कि मैं पुरानी दिल्ली के उन्हीं इलाकों से गुजरते हुए( पन्ने दर पन्ने) रश्क करने लग जाता हूं जहां पांच मिनट डीटीसी की बस या ऑटो रुक जाए तो इरिटेशन होती है. लेकिन अब है कि मुझे अपनी सोसायटी की चौड़ी सड़के वाहियात लगने लगी है,मैं अपने बिस्तर पर बिछी झकझक बेडसीट उठाकर मिट्टी में सानकर गंदला करके बिछाना चाहता हूं, मैं हर चीजों में रस्सी-पेंच-कील की जोड़ चाहता हूं और तो और अपने भीतर हसीना खाला को खोजने की हास्यास्पद कोशिश करता हूं और खुश होता हूं-
 हां, मैं भी सड़ी गर्मी में कंबल ओढ़कर सोता हूं, मैं भी औरतों के बीच घुसकर बतियाता हूं और मुझे भी आलमारियों में कपड़े सहेजकर रखना, फर्श को आइने की तरह चमकाना अच्छा लगता है..जरुरत पड़ने पर काज-बटन भी लगाना और हां दाल बघारते वक्त पतीले में जो झुन-झुन की आवाज आती है तो लगता हमारी दाल नहीं घुघरुवाली पायल बनकर तैयार हो गई,मैं खुश हो जाता हूं.

 प्रभात सर, आपका बहुत-बहुत शुक्रिया. स्नेह, लाड़ और थोड़ी बहुत उम्मीद से ये किताब मुझे भेंट करने के लिए. आप कहेंगे कि मैं प्रतिक्रिया देने के बजाय यशोदा से मुकाबला करते हुए प्रतिफिक्शन लिखने बैठ गया और उदय प्रकाश के सान्निध्य का दूसरा दावेदार बनने के लिए मचल रहा हूं. लेकिन यकीन मानिए, फिलहाल मैं इस पर किसी भी तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी नहीं कर सकता. इसके लिए फिर कभी दिन के उजाले में तैयारी होगी. फिलहाल तो हम इस खुमारी में पड़कर हसीना खाला की तरह वही टेडीवियर सी मुलायम भइया की दी हुई रजाई ओढ़कर सोने की कोशिश/ नाटक कर सकते हैं.( जाहिर है इस मुलायम/कॉटन/फाइन मटीरियल की कमीनी आदत को कोसते हुए) कानों में हसीना खाला के वो वाक्य लिए- पति-पत्नी( इसे मैं थोड़ी अल्टर करके ब्ऑयफ्रैंड और गर्लफ्रैंड कर दे रहा हूं बस) के बीच से हक शब्द हटा दें तो फिर बचता क्या है ? सुबह होते ही पता नहीं ये 'हक' शब्द बिस्तर पर पड़ा मिले या फिर निर्वात में गुम हो जाए. 

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आपको सोचकर कभी हैरानी नहीं होती कि जो हिन्दी समाज अपने स्वभाव और चरित्र से उत्सवधर्मी रहा है, हिन्दी दिवस के मौके पर इतना मातमी क्यों हो जाता है ? सालभर तक हिन्दी की रोटी/ बोटी खाने-चूसनेवाले मूर्धन्य साहित्यकार हिन्दी दिवस के मौके पर सभागार में घुसते ही ऐसी शक्ल बना लेते हैं जैसे निगम बोध घाट पर किसी कालजयी का दाह-संस्कार करके लौटे हैं. उनके माथे पर चिंता की रेखाएं कुछ इस तरह खींची रहती है कि जैसे किसी बच्चे ने बहुत ही बर्बर तरीके से अपनी मां की आइलाइनर बर्बर तरीके से चला दी हो..हाय हमारी हिन्दी मर रही है, कुछ सालों की मेहमान है, यही हाल रहा तो लोग खोजते नहीं मिलेंगे कि इसकी संतानें कहां गई ?

 आपको कभी साहित्यकारों के इस रवैये पर खुन्नस नहीं आती. साहित्यकार तो छोड़िए हिन्दी विभाग के उजाड़ मल्टीप्लेक्स में रहते हुए भी हजारों-लाखों में तनख्वाह पानेवाले उन हिन्दी अफसरशाहों के प्रति जो या तो विभागाध्यक्ष है, या तो डॉक्टर साहेब है, या तो टीचर इन्चार्ज है, सीनियर मोस्ट है, सुपरवाइजर है, गाइड है या कमेटी का अध्यक्ष है. कोरा हिन्दी का प्राध्यापक नहीं है जिसका काम हिन्दी का प्रसार करना, विस्तार देना है. प्रूफ रीडिंग,टाइपिंग, अनुवाद में दिन-रात सिर कूटनेवाले हिन्दी की दुर्दशा पर किलसते हैं तो बात फिर भी समझ आती है लेकिन जो इसी हिन्दी से दुनिया के वो तमाम ऐशोआराम की चीजें जुटा ले रहे हैं जिसके लिए अगर वीपीओ और मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करें तो सतरह से अठारह घंटे तक इस कदर काम करनी पड़े कि हिन्दी क्या अपनी ही दशा-दुर्दशा पर रोने-बिलखने का समय न मिल पाए. आपको नहीं लगता कि हिन्दी का बाजार तभी तक है, जब तक इसमे रोने-कलपने,चीखने-चिल्लाने,आंसू बहाने,हर बदलाव को नकारने और मानव विरोधी करार देने की गुंजाईश है. हिन्दी में कुछ लिखा-पढ़ा जाता रहे इसके लिए जरुरी है कि देश में बददस्तूर गरीबी,लाचारी,भूखमरी बनी रहे. जब समाज से कच्चा माल ही नहीं रहेगा जिससे कि हमारी भावनाएं जागृत होती है, हमारे भीतर की जमी हुई संवेदना पिघलती है तो फिर लिखना-बोलना कैसे संभव हो सकेगा ? ऐसे में ये सबकुछ हिन्दी समाज के लिए समस्या कम, रचना के उपादान ज्यादा हैं.

आप किसी भी हिन्दी के सेमिनार में चले जाइए, बातचीत की शुरुआत ही बाजार के विरोध से होती है. समस्या के केन्द्र में एक ऐसा बाजार होता है, जिसे कि उखाड़ फेंकने के साथ ही सारी चीजें अपने आप दुरुस्त हो जाएगी. इस बाजार ने ही एक ही साथ हिन्दी, साहित्य और साहित्यकारों का जीना हराम कर दिया है और तिल-तिलकर मारता जा रहा है. अगर बाजार इतना ही खराब है, गैरमानवीय है तो हिन्दी समाज ने उससे विलग होने के लिए किस स्तर के प्रयत्न किए हैं ? जहां-तहां बाजार से प्रभावित हुए बिना अगर सादगी को थोड़े वक्त के लिए ढोया भी है तो वो वैचारिक समझ का हिस्सा है या फिर अभाव का क्रंदन, समझना मुश्किल नहीं होता. अगर ऐसा नहीं है तो फिर प्रत्येक हिन्दीसेवी और हिन्दीप्रेमी का साल-दर-साल के भीतर उसी तरह से मेकओवर कैसे हो जाता है जैसे कि मार्केटिंग और मैनेजमेंट में तरक्की पानेवाले कर्मचारी का. इस हिन्दी प्रेमी के लिए भी आखिर तरक्की औऱ विकास का पैमाना भी वही सबकुछ क्यों है जो किसी दूसरे धंधे में लगे लोगों के लिए होते हैं और जिसका नियामक बाजार है. बाजार की गोद में गिरे बिना न तो हुलिए में बदलाव संभव हो पाता है और न ही समृद्ध कहलाने के स्टीगर उन पर लग पाते हैं.

हम ये बिल्कुल भी नहीं कहते कि जो हिन्दी के काम में किसी न किसी रुप में लगा है, वो अतिरिक्त नैतिकता के बीच दबे-फंसे रहकर फटेहाल बना रहे. दुनिया की उन सारी चीजों का परित्याग कर दे जिसका संबंध भौतिक सुख से है. एक तो ऐसा करने की न तो जरुरत है और न ही चाहकर कर सकता है. सेमिनारों और कक्षाओं में भले ही बाजार के विरोध में घुट्टी पिलायी जाती रही हो लेकिन आसपास का जो परिवेश बनता है, जिस माहौल में बाजार के विरोध में बतायी-समझायी जाती है, उसकी अंडरटोन भी यही होती है कि बाजार के विरोध में भी आप तभी बात कर सकते हो जब आपने बाजार को साध लिया है या फिर बाजार ने आपको अपनाया लिया है. बाजारविरोधी बयान भी वही बुद्धिजीवी और साहित्यकार जारी करते हैं जो बाजार के दुलरुआ हैं.

यहां बाजार का मतलब लक्स,निरमा, कामसूत्र,हन्ड्रेड पायपर्स और स्कोडा की खरीद-बिक्री होनेवाली जगह भर से नहीं है. उन सभाओं,संगोष्ठियों और कक्षाओं से भी है बल्कि ज्यादा उसी से है जहां विचारों की दुकानें सजती है. जहां इन सबके विरोध में बोलना एक सांस्कृतिक उत्पाद भर है जिसकी गुणवत्ता ग्रहण करने या जीवन में शामिल करने से नहीं "परफार्म " करने भर से है. ऐसे भाषण और व्याख्यायान सहित कोई एक ऐसी चीज होती है जिसका संबंध बाजार से अपनी असहमति जताते हुए उससे अलग खड़े होकर जीने से होती है ? अव्वल तो जब हम सीधे बाजार का विरोध करते हैं तो जरुरत और हावी होने के लिए उपभोग करने के फर्क को खत्म कर देते हैं और दूसरा कि हम इतिहास की व्यावहारिक सच्चाई से काटकर एक यूटोपिया रचने की कोशिश में लग जाते हैं और ये सबकुछ जाहिर है परफार्म करने के स्तर पर ही. कुछ समझदार से दिखनेवाले साहित्यकार/आलोचक इसके लिए बाजार के साथ वाद जोड़ देते हैं और सुधारकर कहते हैं, हम बाजार नहीं बाजारवाद का विरोध करते हैं. ये अलग बात है कि ऐसा करने से भी हिन्दी समाज के बीच बन रहे परिवेश में कुछ खास फर्क नहीं पड़ता.

बाजार को एक हअुआ की तरह खड़ा करके हिन्दी और साहित्य की पूरी बातचीत को उसमें डायल्यूट कर देना फिर भी बहुत ही आसान तरीका है जबकि सुनने और उससे गुजरनेवाला शख्स ये समझ रहा होता है कि ऐसे सेमिनारों और लेखों का जीवन के धरातल पर कोई गंभीर अर्थ नहीं रह जाता. शायद यही कारण है कि बीए प्रथम वर्ष के हिन्दी छात्र तक को ये समझने में मुश्किल नहीं होती कि उसे साहित्य पढ़कर करना क्या है ? हिन्दी विभाग के जिन खादानों में वो सात साल-आठ साल चीजों को कोड़-कोड़कर शोध प्रपत्र और लेख लिखता है, वो जानता है कि इसका बाजार कहां है और क्या कैसे करना है ? ऐसे में हिन्दी भाषा में लिखी गई सामग्री का बड़ा हिस्सा विश्वसनीय नहीं रह जाता. बड़ी सामग्री जिनमे से कि महान और कालजयी जैसे शब्दों से अलंकृत भी है, उसकी कोई साख नहीं रह जाती. हिन्दी का रोना अगर आप रोते हैं तो भाषाई स्तर पर उसके भ्रष्ट और खत्म होने का रोने के बजाय इस बात पर रोइए कि भाषाई शुद्धता और व्याकरणिक प्रांजलता के बावजूद समाज के बीच उसकी पकड़ क्यों नहीं है ? मेरे ख्याल से इसमें साख का सवाल अनिवार्य रुप से जुड़ा है. साहित्यकारों की छोटी-छोटी क्षुद्रता, देशभर में सरकारी,अर्धसरकारी हिन्दी अधिकारियों के धत्तकर्मों ने इस हिन्दी को जितना कमजोर और लिजलिजा किया है, उतना व्याकरणिक दोष से अटे पड़े वाक्यों ने नहीं और न ही सतही और स्तरहीन लेखन ने.

दूसरा कि हिन्दी का एक बड़ा कोना है जहां सीधे-सीधे बाजार नहीं है लेकिन वहां भी कुछ कमाल का नहीं हो रहा है ? साहित्य अकादमी, हिन्दी अकादमी, राज्य स्तर की अकादमियां, हिन्दी संरक्षण के लिए देशभर में फैले सैंकड़ों संस्थान क्या सीधे-सीधे बाजार की मार के शिकार हैं. साहित्य अकादमी क्या उन प्रकाशकों और वितरकों के अधीन है जो बाजार में किताब पहुंचाएंगे तो उनकी किताबें बिकेंगी, साहित्यकारों के प्रति माहौल बनेगा और नहीं तो सड़ता रह जाएगा. ये सब एक जमाने में मजबूत संस्थाएं रही थी और सिर्फ प्रकाशन के स्तर पर नहीं, वितरण और लोकप्रियता के स्तर पर भी. इसे कुछ मठाधीशों ने जान-बूझकर अपने तात्कालिक सुख और स्वार्थ के लिए खत्म किया. जब तक संभावना रही और अब भी थोड़ी बची है, लूटते हैं और जब बहुत अधिक गुंजाईश नहीं बचती है तो फिर बाजार का हअुआ खड़ी कर देते हैं. साहित्य अकादमी और हिन्दी अकादमी के पास करोड़ों रुपये की बजट होती है जिससे कि हिन्दी को भाषा के स्तर पर ही नहीं बल्कि उसके जरिए सामाजिक प्रक्रिया को हिन्दी सहित देश की दूसरी भाषाओं के जरिए व्यक्त किया जा सके लेकिन क्या ऐसा हो पाता है ? निजी प्रकाशकों सहित बाजार के दूसरे अवयवों का दवाब होता है और ये इन संस्थानों को पटकनी देने की कोशिश में लगे रहते हैं, ठीक बात है..लेकिन क्या कभी ऐसी संस्थाएं पलटकर अपने को तैयार कर पाती है ? सारी कवायदें शाल और कुछ लाख रुपये सहित अदना कांसे पीतल,तांबे के मिलनेवाले पुरस्कारों के पीछे की राजनीति में उलझकर रह जाती है. वही युवा रचनाकार बेहतर है जिनमें चेले-चमचे-चपाटी बनने के नैसर्गिक गुण मौजूद हैं.

आप देशभर के किसी कॉलेज में चले जाइए और हिन्दी विभाग के बारे में बात कीजिए. संभव है कि अब यहां लोग मल्टी-डिसीप्लीन, विमर्श और दुनिया-जहान की बातें करने लगे हैं जिससे कि हिन्दी मतलब सिर्फ कविता-कहानी-हवा-हवा-धुआं-धुआं है का मुल्लमा छूट रहा है लेकिन इसके साथ ही इसकी जो मजबूत छवि बन रही है वो ये कि यहां सिर्फ और सिर्फ चेला-चमचा संस्कृति है, बीए-एम के तक अभिव्यक्ति की आजादी की घुट्टी पिलायी जाती है और फिर उस घुट्टी को दास मानसिकता में बदल जाने के लिए घसीटा जाता है. आप हिन्दी पर बात करते हुए इससे संबद्ध संस्थानों,विभागों और लाभ के पदों को छोड़कर बात कर ही नहीं सकते क्योंकि हर कोई भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के योगदान और मुक्तिबोध की सभ्यता समीक्षा के जरिए हिन्दी को नहीं जा रहा होता है. वो हमारे-आपके जैसे हिन्दी सपूतों और वयोवृद्ध महंतों के जरिए ही राय कायम करता है.

आप कुछ मत कीजिए, सिर्फ एक सूची बनाइए कि सालभर में हिन्दी के प्रसार के नाम पर सरकारी, अर्धसरकारी और दूसरे संगठनों के जरिए कितने करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं और उन खर्चे से क्या फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट आती है. आपको अंदाजा लग जाएगा कि ये चंद लोगों की ऐशगाह बनकर रह जाता है. ऐसे चंद लोगों के लिए हिन्दी एक भाषा नहीं ऐशगाह है जो 364 दिनों तक इसे नोचने-खसोटने के काम आते हैं और एक दिन पूरी दुनिया को उघाड़कर दिखाने के कि देखो इस भाषा की क्या हालत हुई है ? मेरे ख्याल से कम से कम शर्म न सही नहीं लेकिन इतनी अक्लमंदी तो दिखानी ही चाहिए कि अपने ही हाथों से नोची-खसोटी गई हिन्दी के घाव "हिन्दी दिवस" के मौके पर दिखाने बंद कर दें.कुछ न हो तो इस दिन सभागार में घुसने से पहले एक कफन लेकर पहुंचें जिसकी कीमत सम्मान में मिले शॉल से पन्द्रह से बीस गुणा कम होते हैं. आखिर हमें भी तो बुरा लगता है न कि जिस हिन्दी को हमने मुक्तिबोध,नागार्जुन,रेणु को ध्यान में रखकर पढ़-लिख रहे हैं, उसकी अर्थी इतने सादे ढंग से क्यों सजायी जा रही है ?
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जहां तक मुझे याद है असीम त्रिवेदी के जिन कार्टूनों को लेकर विवाद हो रहा है, उसी मिजाज के कार्टून्स की प्रदर्शनी उन्होंने जंतर-मंतर पर चल रहे अन्ना आंदोलन के दौरान लगायी थी. कुछ कार्टून्स उन्होंने प्रदर्शनी के तौर पर लगाए थे और उनकी पोस्टकार्ड बनाकर लोगों को बांट रहे थे. इसी क्रम में एक कार्टून उन्होंने मुझे भी दिया था..और पिछले दिनों के एक कार्यक्रम को लेकर शिकायत भी की थी आपलोगों ने हमें बहुत ही गलत ढंग से ट्रीट किया. हमदोनों की बातचीत बीच-बीच में थोड़ी तल्ख हो जा रही थी. लिहाजा अरविंद गौड़ ने उनकी तरफ से कहा- विनीत, ये बहुत ही भावनात्मक जुड़ाव के साथ काम कर रहे हैं, बहुत ही संवेदनशील तरीके से देश और समाज के मुद्दे को हमारे सामने रख रहे हैं. ऐसे में लोगों की तरफ से पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं मिलता तो थोड़ी तकलीफ होती है. फिर मेरे संबंध में उन्होंने असीम से भी यही बातें दोहरायी और कहा- आपदोनों एक ही तरह से काम कर रहे हैं इसलिए मतभेद होने के बावजूद कभी मनभेद न रखें. धीरे-धीरे माहौल हल्का होता चला गया और बात चाय पीने-पिलाने पर आ गयी. असीम ने उस दिन( 27 जुलाई) चाय क्या पिलाई, बारहदड़ी का हुक्का या बीरबल की खिचड़ी थी, करीब सवा घंटे लग गए एक कप चाय आने और पीने-पिलाने में. खैर, इस बीच मैं उनके बनाए सारे कार्टून्स देखता रहा और छोटी सी इस प्रदर्शनी को लेकर लोगों के बीच किस तरह की प्रतिक्रिया है, जानने-समझने की कोशिश करने लगा.

मुझे अच्छा लग रहा था असीम के साथ के लोग सादा कागज लोगों को मुहैया करा रहे थे और चार-पांच साल के बच्चे तक उन पर अपने तरीके से ड्राइंग कर रहे थे. उन्हीं में से कोई भगत सिंह स्केच कर रहा था तो कोई अन्ना की टोपी. मैंने सारे कार्टून्स को करीब से देखे. उन सारे कार्टून्स में वही सारी बातें थी जो मंच से अन्ना आंदोलन के कार्यकर्ता और शामिल लोग कह रहे थे. सरकार को उसी तरह से पोट्रे किया गया था जिस तरह से अन्ना, अरविंद केजरीवाल सहित कुमार विश्वास और बाकी लोग कहते आए हैं. अगर सरकार की छवि खराब करने और उसे वेवजह बदनाम करने की नीयत से असीम ने कार्टून बनाए थे तो उन्हें 25-26 जुलाई को ही गिरफ्तार कर लेना चाहिए था. उनकी गिरफ्तारी अब जाकर हुई है तो इसके दो मायने हैं. एक तो ये कि बाकी मामले की तरह ही इस मामले में भी सरकार की सुस्ती बरकरार रही और उसे बहुत बाद में इन कार्टूनों पर नजर गई और दूसरा कि अगर उनकी गिरफ्तारी अब जाकर हुई है और खासकर उन दो कार्टूनों को लेकर( एक जिसमें कि अशोक स्तंभ के शेर की जगह भेड़िए को दिखाया गया है और दूसरा कि संसद की जगह कमोड दिखाया गया है) तो इस पर हमें थोड़ा ठहरकर सोचना चाहिए. ये सिर्फ और सिर्फ मौजूदा सरकार का विरोध नहीं है बल्कि उस संसदीय व्यवस्था के प्रति हिकारत का भाव है जिसके भीतर लोकतंत्र के होने के दावे किए जाते हैं और जो संवैधानिक प्रावधान के अन्तर्गत है. इसका सीधा मतलब है कि असीम इस व्यवस्था को उसी तरह से देख रहे हैं जिस तरह से कि हिन्दी साहित्य में नई कविता के कवियों ने आजाद भारत को देखा था और मोहभंग की स्थिति में लिखा था- ये आजादी झूठी है, आधी पीढ़ी भूखी है.

आजादी जिसे कि एक मूल्य के रुप में प्रस्तावित किया गया और उसे संवैधानिक स्तर पर सुनिश्चित किए जाने के बावजूद अगर उसके न होने पर रचनाकार इसके प्रतिरोध में कविताएं लिखते आए हैं तो फिर असीम को इस बात की छूट मिलनी चाहिए कि वो जिन संस्थाओं के भीतर आजादी और लोकतांत्रिक मू्ल्यों को बचाए रखने की बात की जाती है, उसके विफल होने की स्थिति में अपनी असहमति जताते हुए कार्टून बनाएं. जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को परम सत्य मानते हैं और होनी भी चाहिए, उनके लिहाज से असीम त्रिवेदी के ये कार्टून किसी भी रुप में गलत नहीं है. लेकिन सवाल है कि क्या आजादी,लोकतंत्र के क्षरित होने की स्थिति में और इनसे जुड़ी संस्थाओं के विफल होने की स्थिति में एक तरह का रवैया अपनाया जा सकता है और उसी मिजाज में उसकी अभिव्यक्ति की जानी चाहिए ?

साहित्य और अवधारणाओं के बीच जीनेवाले थोड़े ही सही लेकिन एक तबका राष्ट्र जैसी किसी भी तरह की अवधारणा को नहीं मानता, नेशन स्टेट यानी राष्ट्र राज्य की अवधारणा को पूरी तरह खारिज करता है और ये प्रस्तावित करता है कि भौगोलिक रुप से अगर इसे मान भी लें तो सामाजिक-सांस्कृतिक रुप से इसे इस तरह सीकचे में बांध नहीं सकते. लेकिन क्या वे इसी अंदाज में संवैधानिक प्रावधानों को खारिज कर सकते हैं ? असीम के कार्टून और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संबंध इसी से जुड़ा है. मेरे ख्याल से असीम के कार्टून्स में जो बात मैंने खासतौर पर गौर किया, वो ये कि जिस व्यवस्था के तहत ये देश चल रहा है, वो सही नहीं है. उन कार्टूनों में उन्होंने सरकार की जो आलोचना की वो तो अपनी जगह पर सही है लेकिन जिस तरह से राज्य के अंगों को दिखाया-बताया, सरकार के बदल जाने पर भी उनके प्रति असहमति बनी रहती. ये सही है कि संसद में जिस तरह के नजारे हमें आए दिन देखने को मिलते हैं, उसे देखते हुए असीम के कार्टून्स से अलग कोई छवि हमारे जेहन में नहीं उभरते. लेकिन उसे उसी रुप में व्यक्त कर देना उन प्रावधानों के अनुकूल है जो किसी भी संप्रभु राज्य के बने रहने के लिए जरुरी हैं ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले तर्क के लिहाज से सोचें तो कुछ भी लिखने-पढ़ने-बोलने और रचने की आजादी होनी चाहिए लेकिन उसी ढांचे को गिरा देने की आजादी क्यों जिससे ये सुनिश्चित होता है कि हमारी आजादी बनी-बची रहने की संभावना है. क्या संसद स्थायी रुप से कमोड है, सौ फीसद कचरा है या फिर अशोक स्तंभ के शेर भेड़िए हैं ? 

इन सवालों पर मैं गौर से सोचना शुरु करता हूं तो अरविंद गौड़ की वो बात फिर से याद आती है कि- असीम जैसे लोग बहुत ही भावनात्मक ढंग से काम करते हैं और अगर लोग उन्हें इसी रुप में नहीं लेते तो थोड़ी तकलीफ होती है. मैं इसे थोड़ा पलटकर-बदलकर कहूं तो शायद गलत नहीं होगा. असीम जिस वक्त संसद को कमोड और अशोक स्तंभ के शेर के मुख को भेड़िए के मुख की शक्ल दे रहे थे, मुझे नहीं लगता कि उनके भीतर एक बार भी ये ख्याल नहीं आया होगा कि सार्वजनिक होने पर हंगामा मच जाएगा ? हम जब चैनलों पर,मीडिया पर पोस्टें लिखते हैं, लेख लिखते हैं तो पूरी तरह तो नहीं लेकिन मोटे तौर पर अंदाजा लग जाता है कि इसे लेकर क्या होगा ? कायदे से इसी साल के जुलाई महीने में जिन कार्टूनों की प्रदर्शनी उन्होंने लगायी थी, हंगामा मच जाना चाहिए था लेकिन उस वक्त ऐसा कुछ नहीं हुआ. इसकी एक वजह तो ये हो सकती है कि इस प्रदर्शनी को अलग से देखने के बजाय अन्ना आंदोलन का ही हिस्सा मान लिया गया और दूसरा कि इसके पहले भी "कार्टून अगेन्सट करप्शन" पर पाबंदी लगने औऱ चर्चा में आने के बाद मामला आया-गया हो गया तो लगा अब इसे तूल देने की जरुरत नहीं है. इधर असीम कार्टून के जरिए जो संदेश लोगों तक प्रसारित करना चाह रहे थे, वो बहुत ही प्रभावशाली ढंग से प्रसारित हो रहा था. करीब डेढ़ घंटे तक रुकने पर मैंने खुद भी देखा कि लोग चारों तरफ से उन कार्टून्स को घेरे हुए थे और पूछताछ कर रहे थे. असीम सहित आलोक दीक्षित और उनके साथी सबों को बहुत ही प्यार से सब बता रहे थे. मतलब कार्टून के जरिए वो जो कुछ भी संदेश देना चाह रहे थे, वो अपने स्तर से जा रहा था. लेकिन

मीडिया में इन कार्टूनों की चर्चा ठीक उसी तरह से नहीं हो रही थी, जिस तरह से पाबंदी लगने के दौरान हुई थी. ऐसे में संदेश प्रसारित होने के बावजूद पब्लिसिटी के स्तर पर इन कार्टूनों को असीम की निगाह में शायद कोई असर नहीं रहा हो. लिहाजा, अतिरेक( इक्सट्रीम) में जाने के अलावे असीम ने कोई दूसरा रास्ता नहीं देखा. अरविंद गौड़ जिसे उसी भाव से न लिए जाने पर तकलीफ होने की बात कर रहे थे, वो दरअसल नोटिस न लिए जाने की बैचानी में विस्तार होता दिखाई देता है और चर्चा में आए ये दोनों कार्टून्स कहीं न कहीं इसी की परिणति है.

सवाल है कि असीम या कोई भी दूसरे कार्टूनिस्ट जब कार्टून बनाते हैं, क्या इस बात से परिचित नहीं होते कि वो इसे किसी नैसर्गिक प्रतिभा की अभिव्यक्ति के तहत नहीं बना रहे हैं. जो कुछ भी बना रहे हैं, उसका सामाजिक-सांस्कृतिक और संवैधानिक संदर्भ है. इसकी मल्टी रीडिंग होगी और इस बात पर सोचना होगा कि ये कहीं संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ तो नहीं चला जाता ? ये बात बहुत थोथी लग सकती है और निरा आदर्श का पाठ लग सकता है कि अभिव्यक्ति की आजादी के तर्क के पहले इस एंगिल से सोचा जाना चाहिए लेकिन अगर सरकार और न्यायपालिका प्रावधानों का खतरा जैसे ढाल बनाकर अक्सर ऐसे मामलों का निपटारा करती है तो फिर इन कार्टूनों के समर्थन में बात करना भी उससे अलग नहीं है न.

लेकिन मुझे तो हैरानी हो रही है कि जिस असीम के कार्टून बनाए जाने पर एक ही साथ लोकतंत्र से लेकर संसद तक के भीतर की कई चीजें टूटती और चटकती नजर आती है( फैसले लिए जाने के तर्क पर गौर करें तो) तो फिर ये जो सांसद इसके समर्थन में खड़े हो रहे हैं, विपक्षी पार्टियां समर्थन कर रही है, उससे संविधान और संसद के किन प्रावधानों का बचाव हो रहा है ? अगर सरकार इस पूरे मामले को राजनीतिक रंग दे रही है तो विपक्ष सहित बारीक दिमाग रखनेवाला बुद्धिजीवी समाज इसे अलग कोई दूसरा रंग कहां चढ़ा रहा है ? आखिर वो भी तो संविधान को अपनी दुर्गा और सरस्वती( एम एफ हुसैन के संदर्भ में रवैये पर गौर करें तो) से नीचे ही रख रहा है. वो भी तो भक्त फिर भी हो सकता है( राजनीति भर के लिए ही सही) लेकिन नागरिक नहीं.
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मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा माननेवाले और उसके प्रति उसी भाव से आस्था रखनेवाले हमारे मीडिया श्रद्धालु पाठकों को ये सुनकर शायद झटका लगे कि वो देश के जिन तीन बड़े और लोकप्रिय अखबार को खबर और उसकी विश्सनीयता के लिए पढ़ते आए हैं वे कोयले के धंधे में भी शामिल हैं. उसी कोयले के धंधे में जिसके भीतर करोड़ों रुपये के घोटाले होने की बात सामने आने पर पिछले दस दिनों से संसद में हंगामा मचा हुआ है. सरकार से लगातार इस बात की मांग की जा रही है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफा दिए बगैर संसद में किसी भी तरह की कार्यवाही संभव नहीं है. मीडिया इसे रोज प्राइम टाइम के तमाशे की शक्ल में पेश करता आ रहा है और एक तरह से कहें तो ऐसा माहौल भी बना रहा है कि सचमुच इस्तीफे के अलावे कोई दूसरा रास्ता नहीं है. लेकिन

आज प्रभात खबर, दैनिक भास्कर और लोकमत अखबार के संबंध में जो खबर आयी है, उससे गुजरने के बाद सबसे पहले और बुनियादी सवाल मन में आ रहा है कि क्या समाचार चैनल जो पिछले पन्द्रह दिनों से कोलगेट( कैग की रिपोर्ट के बाद कोयला घोटाले से संबंधित) की खबर को डेली रुटीन का हिस्सा मानकर प्राइम टाइम में इससे जुड़ी खबरें दिखा रहा है, बहसें हो रही है, आज इन अखबारों के कोयला धंधे पर बात करेगा ? क्या जिस तरह से वो सरकार पर इस्तीफे की मांग को लेकर दबाव बनाने से लेकर विपक्षी पार्टियों की राजनीति के लिए स्पेस तैयार कर रहा है, आज इन अखबारों की ऐसे दलाली के धंधे के पीछे की सक्रियता को हम दर्शकों के सामने रखेगा ? जिस नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इस्तीफे की मांग की जा रही है, उसी आधार पर गर्दन की नसें फुलाकर टीवी चैनलों से लेकर सेमिनारों में मीडिया की नैतिकता पर बात करनेवाले  इन अखबारों के संपादक हरिवंश( प्रभात खबर), लोकमत( कुमार केतकर) और श्रवण गर्ग( भूतपूर्व लेकिन आबंटन इनके कार्यकाल में ही हुआ होगा) से इस्तीफे और पत्रकारिता के पेशे से अलग हो जाने की मांग की जा सकती है ? चैनल इस बात पर बहस करा सकता है कि ऐसे संपादकों को अपने पद पर बने रहने का क्या अधिकार है जब उसका अखबार मुनाफे के लिए दलाली और ठेकेदारी के धंधे में लगा हुआ है ?

खबर है कि कोयला ब्लॉक की ठेकेदारी और मुनाफे में  इन तीनों अखबारों की मदर कंपनी/सहयोगी कंपनियां शामिल है. दैनिक भास्कर की कंपनी डीवी पावर लिमिटेड ने छत्तीसगढ़ में कोयले के ब्लॉक लिए वहीं प्रभात खबर की अपनी कंपनी उषा मार्टिन लिमिटेड ने झारखंड में कोयले जैसे मुनाफे के धंधे में हाथ डाला. इधर मराठी अखबार लोकमत की जेएलडी यावतमल्ल लिमिटेड ने छत्तीसगढ़ में कोयले के धंधे में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित की. मतलब साफ है कि ये कंपनियां कोयले के जरिए बिजली और दूसरे उर्जा निर्माण, स्टील और दूसरे धंधे में अपनी दखल मजबूत करना चाहती है. 

इन शूरवीर संपादकों का ये तर्क शायद कुछ लोगों को प्रभावित करे कि हमारा काम अखबार के कामकाज को देखना है न कि उसकी मदर कंपनी कौन-कौन से और क्या-क्या धंधे में लगी है, उस पर नजर रखना. लेकिन फिर सवाल ये भी उठते हैं कि जब आपको इतना भी नहीं पता तो फिर अखबार को आंदोलन और डंके की चोट पर अपनी बात कहने का दावा कैसे कर सकते हैं ? दूसरा कि अगर आपको ये सब पता है बावजूद इसके चुप्पी साधे हैं तो इसका साफ मतलब है कि आपके नाक के नीचे से दलाली का साम्राज्य विकसित हो रहा है और आप वेवजह मीडिया की नैतिकता की कंठी-माला लिए घूम रहे हैं ? एक तीसरी बात ये भी हो सकती है कि संपादक दूसरे पदों पर काम करनेवाले मीडियाकर्मियों की तरह ही एक कर्मचारी है और वह अपने संस्थान के खिलाफ नहीं जा सकता. बिल्कुल सही बात है और पद को बनाए रखने के लिए व्यावहारिक भी. लेकिन कोई इन संपादकों से पूछे तो सही कि तब आप किस नैतिक साहस के तहत मीडिया सेमिनारों और टेलीविजन पर होनेवाली मीडिया नैतिकता की बहस में गर्दन की नसें फुला-फुलाकर न केवल सरोकारी पत्रकारिता करने का दावा करते हैं बल्कि दागदार मीडियाकर्मियों पर फैसला सुनाने का काम करते हैं. अगर आपने 2जी स्कैम मामले में बरखा दत्त से लेकर वीर सांघवी के घेरे में आने और उनकी साख में बट्टा लग जाने के बाद होनेवाली टेलीविजन बहसों को देखा होगा तो लोकमत के संपादक कुमार केतकर और दैनिक भास्कर के तत्कालीन संपादक श्रवण गर्ग छाए रहे. श्रवण गर्ग ने तो आगे जस्टिस काटजू के बयान पर यहां तक कहा था कि तो फिर हम छोड़ देते हैं ये काम, सरकार और जस्टिस काटजू ही मीडिया चलाएं, दर्जनों चैनल चलाएं.

इससे ठीक पहले साल 2007 में हुए पेड न्यूज मामले में प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश मीडिया के मसीहा बनकर अखबारों और चैनलों पर छाए रहे. ये अलग बात है कि पेड न्यूज मामले में प्रभात खबर का भी नाम आ चुका है. इसके बाद इसी साल मार्च- अप्रैल महीने में निर्मल बाबा धोखाधड़ी मामले में हरिवंश तमाम चैनलों पर पाखंड विनाशक संपादक-पत्रकार की हैसियत से छाए रहे. इन अखबारों से जुड़े इन तीनों संपादकों ने अपनी छवि इस तरह से निर्मित करने की कोशिश की है कि मीडिया मंडी में तमाम तरह की उठापटक और बिकवाली होती रहने के बावजूद इनका दामन न केवल बिल्कुल साफ-सुथरा है बल्कि दूसरे के दामन दागदार होने पर फैसला सुनाने का महान काम भी इन्हीं का है.

सवाल ये नहीं है कि इस खबर के आते ही हम अखबार का सार्वजनिक विरोध करने के बजाय इनसे जुड़े संपादकों/ मीडियाकर्मियों पर पिल पड़ें. सवाल है कि इनके संस्थान जब तमाम तरह के उल्टे-सीधे धंधे जिसका कि एकमात्र ध्येय धन की उगाही है में सक्रिय हैं तो फिर इनके भीतर ये नैतिक साहस कहां से बचा रह जाता है कि वो दूसरे मीडियाकर्मियों और संस्थानों पर फैसले सुनाने का काम करें. इसका साफ मतलब है कि ऐसा वे अपने ही संस्थान के धंधे को मजबूत करने के लिए करते हैं. दूसरा कि ये कैसे न समझा जाए कि वे सरकार, राज्य, प्रशासनिक अधिकारियों और संगठन के जिन फैसले का विरोध करते हैं, उनके पीछे अपने संस्थान को लाभ पहुंचाना नहीं रहता है और संपादक के पद पर एक तरह से मालिक के जमूरे बनकर काम करते हैं. नमूने के तौर पर सामाजिक प्रतिबद्धता की पैकेजिंग कर देते हों, ये अलग बात है.

कोयले की ब्लॉक लेने से जुड़ी इस खबर को पढ़ने के बाद क्या ये बात अलग से बताने-समझाने की जरुरत रह जाती है कि इन मीडिया संस्थानों की मदर कंपनी ने इसके लिए वे तमाम कर्म-कुकर्म और हथकंडे अपनाए होंगे, जो कोई ठेकेदार, राजनीतिक या रसूकदार अपनाता है ? मीडिया संस्थान ने अपने लोकतंत्र के चौथे खंभे की ताकत का इस्तेमाल ऐसे धंधे को चमकाने के लिए नहीं किया होगा, कर रहा है या आगे भी करेगा ? सरकार की नाकामी और उसके भीतर का भ्रष्टाचार तो फिर भी तमाम तरह के मीडिया मैनेजमेंट के बावजूद मसककर सामने आ जाता है लेकिन इन मीडिया संस्थानों की वो तमाम हरकतें जिनकी प्रकृति राजनीति और कार्पोरेट में सक्रिय संगठनों और संस्थानों से अलग नहीं है, उसका क्या ? आज हिन्दुस्तान टाइम्स ने इन तीन अखबारों के लेकर खबरें प्रकाशित की है. हमें जानकारी मिली और इसके लिए अखबार का शुक्रिया अदा करें लेकिन ये खबर भी पत्रकारीय कर्म का हिस्सा है या फिर मदर कंपनियों की टकराहट और प्रतिस्पर्धा की प्रतिध्वनि, ये कौन जानता है ? उपर से हम जो अखबार बनाम अखबार का मामला देख रहे हैं क्या वो उतना ही  ठेके और उद्योग के धंधे में लगी दो मदर कंपनी के बीच की टकराहट नहीं है जिसमें कि मीडिया कहीं नहीं है ?
खैर, इस खबर का शायद आगे भी विस्तार हो लेकिन फिलहाल ये न मानने की गुंजाईश नहीं रह जाती है कि इस देश में जितने भी धंधें हैं, मीडिया के हाथ और गर्दन उसमें सक्रिय है और इसलिए जितने भी घोटाले सामने आएंगे, उसमें अनिवार्यतः किसी न किसी मीडिया संस्थान का जिक्र आएगा. कोई चाहे तो घोटाले-दर-घोटले मीडिया संस्थानों की लिस्ट बनाकर शोध कर सकता है.

हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के लिए चटका लगाएं-http://paper.hindustantimes.com/epaper/viewer.aspx
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