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मेरी नानी बहुत गंभीर पाठक है. मैंने उन्हें बचपन से ही एक ही मुद्रा में घंटों बैठकर पढ़ते देखा है. हां, ये जरुर है कि उन्होंने हमलोगों की तरह कभी मार्शल मैक्लूहान की मीडिया थीअरि नहीं पढ़ी, आधे-अधूरे अधकचरे तरीके से देरिदा और फूको को पढ़कर गर्दन की नसें नहीं फुलाती रही, मार्क्सवाद के नाम पर चुटका साहित्य नहीं पढ़ा. उन्होंने जीवनभर, पिछले बीस-बाईस सालों से तो मैं ही देख रहा हूं, विशुद्ध पॉपुलर साहित्य पढ़ती रही जिस पर आज अकादमिक दुनिया का एक धड़ा पल्प लिटरेटचर, पटरी साहित्य के नाम से शोध करने में नया-नया रमा है. उन दर्जनों पत्रिकाओं की सालों से नियमित पाठक रही है जिसमें काम करनेवाले हमारे मीडिया साथियों को दोएम दर्जे का समझा जाता है, जिन पर बौद्धिक समाज नाक-भौं सिकोड़ता है और अगर आप उनके सामने कह दें कि मैं ये सारी पत्रिकाएं पढ़ता हूं तो नजरों से खाल उतारने की मुद्रा में आ जाएं. लेकिन मजाल है कि नानी से नंदन, बालहंस, चंपक, गृहशोभा, निरोगधाम,वनिता,चंदामाम, सरिता,सहेली और सुमन सौरभ का कोई अंक छूट जाए. इन पत्रिकाओं में छपनेवाले स्वेटर की पैटर्न को मेरी नानी जितनी सहजता से उतारती, मामी, भाभी को इसमें माथापच्ची करने में घंटों लग जाते हैं.

मैंने नानी को इन पत्रिकाओं और इसके आसपास के साहित्य को जितनी गंभीरता और तन्मयता से पढ़ते देखा है, उतनी सीआरएल( आर्टस फैकल्टी डीयू की लाईब्रेरी) और रतन टाटा लाइब्रेरी( डीइ स्कूल,डीयू) में भी साहित्य और समाजशास्त्र को पढ़ते हुए बहुत ही कम बार किसी को देख पाता हूं. अंजलि (मेरी ममेरी बहन) और मिलन (मेरा ममेरा भाई) नानी के सप्लायर थे. अब तो अंजलि अपनी गृहस्थी में व्यस्त है और मिलन गृहस्थ बसाने की जमीन तैयार करने में लगा है. खैर, अंजलि "चेतना कला केन्द्र" से सहेली, वनिता और गृहशोभा जैसी पत्रिकाएं लाती और मिलन "जागृति सांस्कृतिक केन्द्र" से चंदामामा,नंदन,चंपक, बालहंस... ये दोनों मंच मेरे नानीघर( शेखपुरा जो कि कभी मुंगेर का हिस्सा हुआ करता था) उन युवा साथियों ने खड़े किए थे जो बड़ी मुश्किल से ग्रेजुएशन करने के बाद किसी तरह की नौकरी या काम के लिए कोशिश में लगे रहते. उधर जो लड़कियां ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर लेती और एक तरह का खालीपन होता, उसे काटने के लिए चेतना जैसे मंच खड़े किए थे. अफसोस कि बाद में इस मंच का इस्तेमाल ससुराल में बक्सा भर-भरकर एम्बॉडरी, क्रूस,बुनाई और पेंटिंग की हुई चादरें, पूजा की थाली का झकना(ढंकने के लिए) बनाने-सीखने के लिए किया. ये दोनों मंच जो कि शेखपुरा जैसी जगह के लिए युवाओं के अकेले सामूहिक ठिकाने थे, पता नहीं अब भी काम कर ही रहा है, देशभर की पत्रिकाओं का बड़ा भंडार बना. मिलन और अंजलि यहां से पत्रिकाएं लाते और किसी दूसरे काम में फंस जाते लेकिन नानी नियम से नाश्ता के बाद इसे पढ़ती.

मेरा नानीघर बिल्कुल शेखपुरा के मेनबाजार में है. उपर घर और नीचे अलग-अलग चीजों की दुकानें और शोरुम. सड़क से गाड़ियां गुजरती रहती है. स्नेहा खानवलकर कभी वहां जाती है तो पक्का टैं टैं जैसी कोई धुन या साउंड ट्रिपन का मसाला ढूंढ लेगी. नानी घर के एकदम अगले हिस्से में इन पत्रिकाओं के साथ जाकर बैठ जाती. इसे छतरी कहा करते थे. हम बच्चे जब गर्मियों की छुट्टी में जाते तो वहीं बैठकर "हम्मर बस, हम्मर टरक"( मेरी बस, मेरी ट्रक ) खेला करते. मतलब कि जिसे जो गाड़ी पहले दिख जाए, जोर से बोले- हमर बस, हमर ट्रक. हरेक गाड़ी पर एक प्वाइंट मिलते. मैं छुटपन से ही भाषिक तौर पर थोड़ा बदमाश था. गाड़ियों के बजाय कहता- हम्मर आदमी, हम्मर लेडिज. इस पर प्वाइंट नहीं मिलते लेकिन ठहाकों से छतरी किसी किट्टी पार्टी जैसा गुलजार हो जाता. नानी ने मेरे पापा की तरह कभी नहीं कहा कि बहुत भच्च-भच्च करते हो तुमलोग, हम लिखा-पढ़ी कर रहे हैं. वो पढ़ती रहती और बीच-बीच में भजन गुनगुनाती जिसका कि सुमन सौरभ या गृहशोभा की सामग्री से कोई संबंध न होता.

उस दौरान हमलोगों में इन पत्रिकाओं में छपने का भी भूत सवार हुआ था. हम इन्हीं पत्रिकाओं में छपकर प्रेमचंद, फनीश्वरनाथ रेणु और महादेवी वर्मा होना चाहते थे. मैंने ईमानदारी से कोई कोशिश तो नहीं की लेकिन मिलन की पेंटिंग बालहंस में छपने लगी थी और नानीघर के पड़ोस के कुछ बच्चों की भी. चूंकि नानी सबसे पहले पत्रिका देखती तो उत्साह में कहती- इ ओही अंशुआ के कहानी छपले ह, जे गजोधर के छोटकी बेटिया है.( ये उसी अंशु की कहानी छपी है जो गजोधर की बेटी है ). मिलन या अंजलि कहती- हां मां. दोनों मेरी नानी को दादी न कहकर मां कहा करते. इसी में किसी ने कह दिया कि हां पहिले देखे हैं तो नानी का उत्साह थोड़ा मर जाता. दोपहर का खाना खाने के बाद और ठाकुरबाड़ी जाने के पहले भी नानी इन पत्रिकाओं और घर में मौजूद किताबें पढ़ती.

रसोई में मैंने अक्सर देखा कि नानी अखबारों और रद्दी से बने जो ढोंगे आते जिसमें नाना या पिंटू मामू बर्फी, मुरब्बा या सेब-बुनिया लाते, नानी उसे डिब्बे में डालने के पहले ढ़ोंगे में लिखे को पढ़ती. ये काम मैंने कैलाश भइया की मां को भी करते देखा और अपनी रजनी दीदी को भी. मुझे लगता है कि अगर मेहनत की जाए तो इस देश में हजारों ऐसी महिलाएं मिल जाएंगी जो रसोई में आनेवाले ढ़ोंगे को पढ़ा करती थी. वो "ढोंगा या लिफाफा रीडर" हैं और इस पर अलग से काम करने की जरुरत है. अब जिस तेजी से रसोईघर में इसके बजाय पन्नी या पॉलीथिन पहुंच रहा है, आप सोचिए कि ये कैसे पढ़ने से वंचित रह जाती होंगी. नहीं तो जब तक दाल खदक रही है, एक ढोंगा पढ़ लिया. जो कटा हिस्सा अधूरा रह गया, उसे कल्पना से पूरी कर ली. भात का अध्धन( गर्म पानी) चढ़ा दिया और हल्दी के ढोंगे पढ़ लिए. नानी भी ऐसा ही करती.
मैं दिल्ली में बैठे बड़े-बड़े लेखकों/साहित्यकारों/ आलोचकों की जीवनचर्या के बारे में पढ़ता हूं, उनके लिखने-पढ़ने की आदतों के बारे में सुनता हूं, उन पर बनी फिल्में देखता हूं तो अक्सर ख्याल आता है- अगर मेरी नानी ये सब पढ़ते हुए यूजीसी नेट की परीक्षा पास कर लेती तो किसी कॉलेज में पॉपुलर लिटरेचर की एक्सपर्ट होती. दिल्ली के इंडिया हैबिटेट और मंडी हाउस के सभागारों में खुदरा-खुदरा पढ़कर जो महानुभाव पॉपुलर जर्नलिज्म औऱ लिटरेचर के नाम पर देह को ऐचाताना करते हैं( show-off), उनके आगे मेरी नानी सालों से पढ़ी जानेवाली सामग्री पर बात करती, मास कल्चर और लिटरेचर पर व्याख्यान देती तो पानी भरते. यकीन मानिए, इतनी गंभीरता से हम नहीं पढ़ते और खासकर वो सब जिसे पढ़ने के बाद न तो हमें किसी पत्रिका के लिए कॉलम लिखना होता है, जिसे पढ़कर हम सेमिनारों में हवा काटनी होती है और जिसे पढ़कर प्राइम टाइम में जाकर टीवी पर चमकाना होता है. हममें से अधिकांश मौके-बेमौके के पाठक हैं. परीक्षा आने पर कोल्हू की तरह पन्द्रह-बीस दिन पढ़ते हैं. ऑफिसों में बाबू और कार्पोरेट में "एग्जिक्यूटिव" बनने के लिए जिस कट्टरता से पढ़ते हैं कि आंख के साथ-साथ देह की सारी हड्डियों को भी पढ़ने में लगा दें, बाद में उतनी ही लापरवाही से सब छूट जाता है. नानी और उनकी जैसी हजारों पाठक सिर्फ इसलिए पढ़ती रही क्योंकि उन्हें पढ़ना अच्छा लगता है..संभव है कि इसलिए वो हमसे कहीं ज्यादा पढ़ने को इन्ज्वाय करती होगी. स्कूल-कॉलेज कब का छूट गया, कईयों ने तो मुंह तक नहीं देखा लेकिन पढ़ना जारी रहा. बड़े-बड़े सिद्धांत औऱ दर्शन न सही, क्या सिर्फ पढ़ना अपने आप में कम सुखद है. पढ़ना क्यों सिर्फ पढ़ने के लिए. ये कुछ इसी तरह से है जैसे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने "हिन्दी साहित्यः उद्भव और विकास" में भक्तिकाल का विश्लेषण करते हुए लिखा है- लीला,लीला के लिए. ये जस्ट फॉर फन से कितनी आगे की चीज है.

मेरी नानी इन दिनों मेरी लिखी किताब "मंडी में मीडिया" पढ़ रही है. कितना पढ़ा है और आगे पढ़ेगी, नहीं पता लेकिन पढ़ते हुए तस्वीरें मेरे पास है. मेरा मन करता है कुछ दिनों के लिए नानी को अपने पास बुलाउं. उनके आगे रेणु, निराला, अमृतलाल नागर, नागार्जुन, शमशेर, मुक्तिबोध,अज्ञेय, उदय प्रकाश, मैक्लूहान, अडोर्नो,ग्राम्शी, वर्जिनिया की किताबें रख दूं. समय-समय पर नींबू-पानी, शर्बत, जूस, लस्सी सर्व करता रहूं और एकांत में छोड़ दूं. नानी आप सिर्फ पढ़िए. संयोग से मेरा घर बिल्कुल शांत है, कोई बस-कोई ट्रक खेलनेवाला नहीं है, कोई कितना आदमी का चावल बनेगा मांजी पूछ-पूछकर तंग करनेवाली बहुएं नहीं, कोई ससुराल से आई बेटी नहीं जिसकी विदाई की टेंशन में नानी के पढ़ने का क्रम टूट जाए. कोई बिगडैल पोता नहीं जो वैसे तो इधर-उधर खेलता रहता है लेकिन जब मूतना होता है तो नानी की झकझक साड़ी से बेहतर कोई जगह नहीं मिलती. यकीन मानिए, मैं ऐसा करके नानी को नहीं, उस एक गंभीर पाठक के साथ कुछ वक्त बिताना चाहता हूं जिसके लिए पढ़ना स्वांतः सुखाय है, कोई लोभ-लाभ नहीं.

नानी की तस्वीर मेल करने के लिए रुचि( रुचि प्रबोधिनी) का बहुत-बहुत शुक्रिया.
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साल 2002 में हमने रांची शहर छोड़ दिया था. झारखंड जब बिहार से अलग राज्य बना था, हमारे  संत जेवियर्स कॉलेज रांची में उत्सव का माहौल था. पूरे दिन हम पेड़ों की टहनियां तोड़कर आदिवासी नृत्य करने की कोशिश करते रहे. उंचा-नीचा पहाड-पर्वत नदी-नाला गाते रहे..कितने दोस्तों ने न जाने कितनी मिठाईयां खायी होगी. पता ही नहीं चल रहा था, किसने मंगाई है ये मिठाइयां. फादर प्रिंसिपल ने हमलोगों को बाहर मैंदान में बुलाया था, शुभकामनाएं दी थी और कहा था- और इस राज्य को सुंदर और बेहतर बनाने की बात कही थी.

प्रभात खबर ने अपने विशेषांक में लिखा था- झारखंड, जहां बोलना ही संगीत है और चलना नृत्य. उसके बाद अस्मिता की जो लड़ाई सालों से लड़ी जाती रही और जिस संभावना को ध्यान में रखकर बिहार से अलग होने की मांग की गई थी, उस पर सेंधमारी का भी काम तेजी से शुरु हो गया.

एचइसी का इलाका जो सबसे शांत और खूबसूरत इलाका हुआ करता था, रसियन हॉस्टल के विधान सभा बन जाने के बाद राजनीति,दलाली और गुंडागर्दी का अखाड़ा हो गया. मेरे इस शहर को छोड़ते-छोड़ते आभास हो गया था कि कैसे इस राज्य में लूटपाट और तबाही होनी है. कार्पोरेट के डिब्बाबंद चमकीले इरादे जहर की तरह फैलेंगे..आज वो सबकुछ हो रहा है. इन सबके बीच यूट्यूब पर इस वीडियो को जरुर देखिए. इसकी सीडी आज से कोई तीन साल पहले इंसाफ के साथियों ने बेर सराय,दिल्ली में वीडियो दिया था. हम वहां जल,जंगल,जमीन की लड़ाई लड़ती आयी दयामणि बारला दीदी से मिलने गए थे.
गांव छोड़ब नहीं, जंगल छोड़ब नहीं
 माय माटी छोड़ब नहीं, लड़ाय छोड़ब नहीं..
 बांध बनाए, गांव डुबोए,कारखाना बनाए
 जंगल काटे, खदान कोडे, सेंचुरी बनाए
जल,जंगल जमीन छोड़ी हमिन कहां कहां जाए
 विकास के भगवान बता हम कैसे जान बचाएं.
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सॉरी दिल्ली की पहली बारिश !

Posted On 10:47 pm by विनीत कुमार | 5 comments

सॉरी दिल्ली की पहली बारिश ! मैं तुम्हारे साथ रेन डांस नहीं कर सका. तुम्हारे साथ भीगते हुए, नाजायज सी दिखती टमी को अंदर करके, सीने को लपलपाती जीभ सी आगे करके, लोकट शार्टस और स्लीवलेस टी में इरॉटिक पिक खिंचवाकर एफबी वॉल पर नहीं टांग सका. मुझे न त पकौड़े का ध्यान आया और न ही कॉफी की तलब हुई.


जब तुम बरस रही थी, मैं "सबसे तेज" की गलियों से गुजर रहा था. वहां ऑफिस में तब एंकर ब्रेकिंग न्यूज की कडाही में गर्मागरम खुशखबरी तल रहे थे. क्या पता चैनल का एक धड़ा इंडिया गेट,जीके-1, बसंत कुंज में बॉक्स पॉप लेने चला गया हो. मैं डीटीसी की ठुकदम-ठुकदम चाल से आजीज आकर पैदल ही चलने लग गया था. बाइक पर रेंगती हजारों गृहस्थियों को बड़े गौर से निहार रहा था. हाथ में दूध की थैली, कागज के ढोंगे पर तेल के निशान, क्या पता अंदर समोसे या पकौड़े हों. सैकड़ों माएं चिकनी फैब्रिक की सलवार सूट पर से फिसलते बच्चे को तौलिए की तरह खींच-खींचकर गोद में अटकाने की कोशिश कर रही थी. 

तभी ठीक बगल से होंडा सीटी, तवेरा गुजरती और पेशाब,थूक,खखार, गोबर, पोट्टी से सनी सेनेटरी नैपकिन से छनकर आयी तुम्हारी बूदें उनके चेहरे पर जाकर थप्पड़ से लगते. वो एक हाथ से बच्चे और दूध की थैली संभालती और दूसरे हाथ से पोछने की कोशिश करती..मैं धक्क से कर जा रहा था. वो गिर जाती तो ? क्या पता, आज घर जाकर फिर अपने जीवनसाथी को उलाहने देगी- कब से कह रही हूं, अपनी हैसियत बढ़ाओ, चौपाया गाड़ी लो. आखिर मैं कब तक जिसके-तिसके गू-मूत को चेहरे पर झेलती रहूंगी ? तुम रिक्शेवाले के पसीने के साथ ऐसे घुल-मिल गयी थी कि उसका कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया था. गाड़ियों के बाहर से लगातार पों-पों की आवाज आ रही थी और भीतर से बैनचो.. ये रिक्शेवाले भी न ... की लौड़ी, कहां बीच में अटका देते हैं. तुम्हारे आने पर सबसे ज्यादा यही परेशान नजर आ रहे थे.

पिंड बालुची में बिरयानी और फ्राइ चिकन के लिए लगी लाइन देखकर लगा सबके सब एफ एम चैनलों से मिले जैसे मुफ्त के टोकन इन्कैश कराने आए हों. सामने की फुटपाथ पर पड़ी मुन्नी बुझे कोयले के बीच से अधपके भुट्टे समेटकर जाने की तैयारी कर रही थी. एफ एम की लगातार कमेंटरी और ठहाकों के बीच मैं अपने इस अपडेटस को घुसाना चाह रहा था लेकिन गुंजाईश नहीं थी. 

विडियोकॉन टॉवर की भट्टी से निकले डे शिफ्ट के मीडियाकर्मी कॉफी में थकान घोलने में लग गए थे. मैं उनके चेहरे पर नजर टिकाए था. मन किया पूछूं- क्या चला रहे हो उपर ? सिर्फ हैप्पी-हैप्पी और यूट्यब के बताशे और बैक से रोमैंटिक गाने या फिर इन हजारों रेंगती गृहस्थी के विहवल कर देनेवाले नजारे भी. फिर लगा- पता नहीं उनमें से कोई कह दें- अव्वल दर्जे का फ्रस्टू है. गर्मी होती है तो एफबी रंग देता है और अब बारिश हुई तो विधवा विलाप लेकर बैठ गया..

लेकिन एक बात बताउं. तुम जब तक नहीं आती हो न, यहां के लोग,मीडिया से लेकर सरकार तक तुम्हारा ऐसा इंतजार करते हैं, जैसे तुम पेड न्यूज जैसी बेशकीमती हो. गर्लफ्रैंड या ब्ऑयफ्रैंड से भी ज्यादा मोहब्बत है तुमसे. जैसे कि सारी राजनीति तुम पर ही टिकी हो. लेकिन देखो न. कायदे से तुम्हें आए दो घंटे भी नहीं होते हैं कि लोग बेहाल हो जाते हैं. सड़कें जाम हो जाती है, शहर हांफने लग जाती हैं. सरकार की सारी धोखेबाजी सीवर,सड़कों और गलियों में तैरने लग जाती है. मीडिया की सारी काबिलियत और जुमले टांय-टांय फिस्स हो जाते हैं. लोग बेदम हो जाते हैं. ये शहर तुम्हारे साथ फ्लर्ट करता है कि उसे तुम्हारे आने का बेसब्री से इंतजार रहता है. तुम शाम आयी नहीं कि शीघ्रपतन का शिकार हो गया. इस शहर में तुम्हें कैरी करने की हैसियत ही नहीं है, बस हवाबाजी करता है.
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खिलौने पर अरविंद गुप्ता के प्रयोग और विश्लेषण सुनकर लगा कि हम जिस समाज में रह रहे वो बड़ी तेजी से हमारी क्रिएटिविटी को बाजार के हाथों बहुत ही औने-पौने दामों पर बेच आते हैं जिसमें कि हमारे मां-बाप और टीचर सबसे ज्यादा शामिल हैं.


ये क्रिएटिविटी बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, एसी ट्वायज शोरुम और आखिर में कार के पिछवाड़े, अस्त-व्यस्त ड्राइंगरुम और मेड के बच्चों के हाथों जाकर तिरोहित हो जाती है. ऐसा करते हुए विज्ञान के नाम पर हम सिर्फ और सिर्फ कबाड़ पैदा करते हैं और समाज के नाम पर उतरन. इस कबाड़ और उतरन के बीच हमारी कल्पना के, हमारी रचनात्मकता के चिथड़े-चिथड़े न हो जाए, इससे बचने के लिए हजारों अरविंद गुप्ता का होना जरुरी है. अरविंद गुप्ता ने कबाड़ के बीच खिलौने, कला, विज्ञान और उत्साह को खोजने का काम किया और रवीश ने टीवी के कबाड़ कार्यक्रमों के बीच अरविंद जैसे शख्स को लाने का. दोनों का बहुत-बहुत शुक्रिया. 

अरविंद गुप्ता के इस शो को अगर थोड़ी भी सावधानी के साथ देखें तो ये समझना मुश्किल नहीं है कि वो हिन्दुस्तान जैसे मुल्क के बीच किस जिद के साथ अपना काम कर रहे हैं ? रोटी में सबों की हिस्सेदारी, कविता में रोटी की तरह सबों की हिस्सेदारी कहनेवाले फिर भी सभ्य समाज में हजारों लोग मिल जाएंगे लेकिन बार्बी,पोकेमॉन( ऑरिजनल और पायरेटेड) के बीच गरीब बच्चों का हक कैसे मारा जाता है, उनके बचपन पर कैसे सभ्रांत समाज से आनेवाला बच्चा कब्जा कर जाता है और तब वह अवस्था की मासूमियत के बावजूद अपनी स्टेटस में उतना ही क्रूर हो जाता है, जितने उनके मां-बाप, अरविंद को सुनते हुए आप शिद्दत से महसूस करेंगे...दो पैसे-चैर पैसे की पन्नी,स्ट्रॉ,माचिस की तिल्ली और रिफिल से उन्होंने जिन खिलौने को बनाकर दिखाया और हम जैसे ठस चेहरे पर भी लगातार खुशी और कई बार आंखों में आंसू आते रहे. आमिर खान अगर इस शो को देखते हैं तो उनकी जुबान से पता नहीं कितनी बार "ओ तेरी की" निकलेंगे.
आपको अनायास राजेश जोशी की कविता "बच्चे काम पर जा रहे हैं" याद आने लगेगी.

कोई सौ बच्चों के बीच एक प्रयोग करके देखे- आधे बच्चे को डोरेमॉन,पोकेमॉन,स्पाइडर और बार्बी के खिलौने दे दे और आधे को अरविंद के खिलौने के साथ छोड़ दे और फिर उनकी खिलखिलाहट और मुस्कान की नाप इंच में करे..यकीन मानिए, इस नतीजे के बीच शॉपिंग मॉल के खिलौने के शोरुम ध्वस्त नजर आएंगे. कॉन्वेंट स्कूलों की साइंस क्लासेज इनह्यूमन बनाने के कारखाने लगेंगे और स्टेटस के साथ जीनेवाला मां-बाप का घर कन्ज्यूमर बनाने की फैक्ट्री लगेगी.

 
आप भी इस शो को देखिए और उस सभावना के साथ खुश होइए..कोई तो है जो कबाड़ के भीतर सोई आत्मा को जगाने का काम कर रहा है. कोई तो है जिसे इस कबाड़ को पैदा करनेवाले से शिकायत नहीं, वो अकादमिक समाज के बाकी लोगों की तरह पर्यावरण बचाओ के नाम पर सेमिनार करके हजारों किलो कचरा पैदा नहीं करता. कला और कविता की तरफदारी करते हुए भी इंडिया हैबिटेट और इंडिया इंटरनेशल जैसे ठिकाने को "उपभोग करने के अड्डे" नहीं बना डालता बल्कि उसके भीतर "मतलब" पैदा करने की कोशिश करता है. जिस शख्स का वजूद कबाड़ के बीच ही है. पता नहीं क्यों मुझे अरविंद सौंदर्य विधान,नायिका भेद करनेवाले और मोटे-मोटे पोथे लिखनेवाले सैंकड़ों कवि-आचार्यों के बीच भी ज्यादा करीब और विश्वसनीय लगे. हक और सरोकार की बात करनेवाले जनवादी कवियों के बीच के लगे. फर्क सिर्फ इतना है कि ये कवि हमारे कोर्स में आकर बेदखल होने से (छोटे ही सही हिस्से में) बच गए जबकि अरविंद कबाड़ होती जिंदगी के बीच जहां हम खुद ही बेदखल होते जा रहे हैं, उसमें बहुत कुछ बचा लेने की बात कर रहे हैं. यकीन मानिए अरविंद गुप्ता का काम और उसके पीछे का तर्क उन तमाम रचनाकारों के लिए खुली चुनौती है जो कविता और साहित्य के जरिए आए दिन एक खूबसूरत दुनिया की कल्पना करते हैं. हम निराशावादियों के लिए कबाड़ के बीच खिलौने यानि उत्साह यानि जिजीविषा बनाए रखनेवाले अरविंद गुप्ता बच्चों के "बाबा नागार्जुन" जैसे लगे. पूरी बातचीत और एप्रोच में भी और काफी हद तक कद-काठी और हुलिए से भी.

पूरा शो देखने के लिए चटकाएं- कबाड़ के जुगाड़ से बने अरविंद के खिलौने
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पिछले दिनों 27 जून को मीडियाखबर डॉट कॉम द्वारा आयोजित कार्यक्रम "एस पी सिंह स्मृति समारोह" का कार्ड देखकर पुण्य प्रसून वाजपेयी बुरी तरह आहत हुए. आहत होने की मुख्य वजह थी कि जिस गेस्ट लिस्ट में रामबहादुर राय जैसे वरिष्ठ पत्रकारों के नाम शामिल थे, उसी लिस्ट में कार्पोरेट से भी जुड़े लोगों के नाम शामिल किए गए थे. पुण्य प्रसून ने मंच पर आते ही अपनी इस नाराजगी को जाहिर करते हुए कहा- "आज एस पी होते तो ऐसा कार्ड नहीं छपवाते." उसके बाद अब उन्होंने अपने ब्लॉग पर एस पी की पत्रकारिता क्यों पीछे छूट गई एस पी को याद करते हुए शीर्षक पोस्ट के जरिए जाहिर की और इसमें कोई शक नहीं कि कुछ बहुत ही बुनियादी सवाल खड़े किए.


ये अलग बात है कि इसके पहले राहुल देव, आशुतोष और शैलेश जो कि एस पी सिंह से लंबे समय तक जुड़े रहे कह चुके थे कि एस.पी. बहुत ही व्यावहारिक पत्रकार थे और जानते थे कि बाजार के बीच रहकर कैसे काम किया जा सकता है. आशुतोष ने तो एस पी सिंह की इस व्यावहारिकता को स्थापित करने के लिए उन वामपंथी रुझान के पत्रकारों का उपहास तक उड़ाया जो वामपंथ का लबादा ओढ़कर रोटी की तरह मीडिया में भी आमजन और हाशिए के समाज की हिस्सेदारी की बात करते हैं. जिनके आगे बाजार भूत नजर आता है. खैर, एक तरह अगर एस पी व्यावहारिक पत्रकार थे और बाजार को साधना जानते थे और दूसरी तरफ पुण्य प्रसून के हिसाब से ऐसा कार्ड नहीं छपवाते वाली बात एस पी की प्रतिबद्ध पत्रकार की छवि स्थापित करते हुए भी एक गंभीर सवाल की तरह पूरे मसले को ले जाता है. सवाल है कि अगर एस पी सिंह एक तरफ बाजार को भी साध लेते थे और दूसरी तरफ अपनी यानि पत्रकारिता की प्राथमिकता को भी ज्यों का त्यों बरकरार रखते थे तो आखिर वो तरीका क्या था ? 

अगर हम गंभीरता से सोचें तो किसी भी मीडिया सेमिनार की पूरी बहस इसी मसले पर आकर ठहर जाती है कि आखिर वो ऐसा कौन सा तरीका हो जिससे कि बाजार के बीच रहकर व्यावहारिक कौशल भी मजबूत होता रहे और इधर पत्रकारिता, सरोकार और सामाजिक प्रतिबद्धता भी बरकरार रहे. मुझे लगता है कि जिस दिन ये फार्मूला चैनलों के हाथों लग गया, उसी दिन मीडिया सेमिनारों में बहस के लिए और मीडिया पर आरोप लगाने के लिए कुछ खास बचेगा नहीं.

लेकिन स्थिति इससे अलग है. बाजार के बीच व्यावहारिक होने की जो तस्वीर हमारे सामने उभरकर आ रही है उसका एक पक्ष तो बहुत ही मजबूत दिख रहा है कि जहां मीडिया संस्थान को घाटा होता दिखाई दे रहा हो तुरंत कार्पोरेट के हाथों अपनी हिस्सेदारी बेच दो या फिर सरकार से सॉफ्ट लोन ले लो. नेटवर्क 18 में रिलांयस इन्डस्ट्रीज का करीब 1700 करोड़ रुपये का निवेश,लीविंग मीडिया जो कि आजतक जैसे चैनल कां सचालन करता है के 27 फीसद शेयर को आदित्य बिड़ला ग्रुप के हाथों बेचा जाना, एनडीटीवी ग्रुप का ओसवाल के हाथों शेयर बेचना और फिर सरकार से सॉफ्ट लोन लेना कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो मीडिया संस्थानों की व्यावहारिक और व्यावसायिक कुशलता को रेखांकित करती है. लेकिन इसका दूसरा पक्ष जिसे कि पुण्य प्रसून ने एस. पी. सिंह की 20 मिनट की बुलेटिन में विज्ञापनों की संख्या बढ़ने के बजाय लगातार उसकी कीमत में बढ़ोतरी के जरिए हमें समझाने की कोशिश की है, वो बिल्कुल अलग है. पुण्य प्रसून ने सही ही कहा है कि एस पी ने विज्ञापन की संख्या बढ़ाने के बजाय 10 सेकंड के विज्ञापन की कीमत 90 हजार तक कर दी. ऐसा किए जाने से उनकी और पत्रकारिता की प्रतिबद्धता बनी रही. अगर आप फिक्की-केपीएमजी की मीडिया और मनोरंजन उद्योग की रिपोर्ट पर गौर करें तो अंग्रेजी-हिन्दी चैनलों के विज्ञापन दर में जो जमीन-आसमान का फर्क है, वो आपको इसी फार्मूले के आसपास की चीज दिखाई देगी लेकिन क्या हिन्दी चैनलों के मुकाबले अंग्रेजी चैनल ज्यादा सरोकारी है,ये बात दावे के साथ कही जा सकती है ? मुझे इसमें न केवल शक है बल्कि घोर असहमति है. ऐसे में पुण्य प्रसून का ये उदाहरण बेहतर तरीका दिखते हुए भी आज के संदर्भ में न केवल अव्यावहारिक दिखता है बल्कि वे खुद जानते हैं कि वस्तुस्थिति क्या है ?

जिस आजतक में एस पी सिंह ने ये काम किया, बाकी चैनलों को तो छोड़ दीजिए, स्वयं आजतक इस फार्मूले पर कायम रह सका ? उसने इस रणनीति पर काम किया क्या कि चाहे कुछ भी हो  जाए, विज्ञापन दर कम नहीं करनी है. ऐसा क्यों नहीं हो सका, इसक जवाब हम आजतक के बजाए इंडिया टीवी की केस स्टडी बनाकर बेहतर समझ सकते हैं. हां, इस पूरे प्रसंग में हम एस पी के जमाने में आजतक को शिकस्त देनेवाले कितने कार्यक्रम थे और बाजार के स्तर पर उन्हें कैसी टक्कर मिल रही थी, इसे शामिल किया जाना जरुरी है. कैसेट संस्कृति के दौरान तो लगभग वही स्थिति रही जो स्थिति आज हम न्यूज चैनलों के बीच देख रहे हैं. तब अपनी कैसेट बेचने के लिए कोई कपिल देव की छपी टीशर्ट मुफ्त देता था तो कोई खरीदने के बजाय किराये पर कैसेट ले जाने की सुविधा शुरु कर दी थी लेकिन बतौर एक कार्यक्रम "आजतक" को कितनी चुनौती मिल रही थी, इस पर बात होने से शायद हम कुछ ज्यादा जान-समझ सकें. बहरहाल

 14 अगस्त 2010 को अंग्रेजी पत्रिका ओपन ने इंडिया टीवी को लेकर एक स्टोरी छापी- the world according to india tv. इस स्टोरी में राहुल भाटिया ने इंडिया टीवी के शुरु होने से लेकर मौजूदा स्थिति तक को लेकर अपनी बात तो रखी ही है साथ ही चैनल के सर्वेसर्वा रजत शर्मा का भी वर्जन शामिल किया. रजत शर्मा का कहना था कि शुरुआत में हमने इस चैनल को तरुण तेजपाल की खोजी पत्रकारिता, मेनका गांधी की पशुओं के प्रति गहरी संवेदना और आदिवासी से जुड़े गंभीर मसले को लेकर शुरु किया और हम इसी तरह की जरुरी स्टोरी प्रसारित करते रहे. लोगों के बीच इस बेहतर छवि थी लेकिन हमारे पास विज्ञापन नहीं थे. मार्केटिंग के लोग कहते कि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे कि विज्ञापनदाताओं का लाभ हो सके. रजत शर्मा ने न्यूज वैल्यू और चैनल इमेज के दम पर बाकी चैनलों के मुकाबले अधिक विज्ञापन दर की कोशिश जरुर की थी लेकिन वो मॉडल पूरी तरह फ्लॉप हो गया. आगे उन्होंने इंडिया टीवी और खुद के बने रहने का जो तर्क दिया वो मेरे हिसाब से अश्लील होते हुए भी व्यावहारिक था. उनका कहना था कि जब हम खुद ही नहीं रहेंगे तो पत्रकारिता करके क्या कर लेंगे ?  मेरी तरह शायद प्रसूनजी भी यही कहेंगे कि तो फिर आपको किस शख्स ने अवतार लेकर पत्रकारिता करते रहने के लिए कहा है ? किसने कहा कि जब आप आदिवासी से जुड़ी खबरों के दम पर चैनल नहीं चला सकते तो यूट्यूब से "शैतान की आंखे" उठाकर दिखाएं और विज्ञापन का सस्ता रास्ता अपनाएं. लेकिन नहीं. इंडिया टीवी की सफलता और नंबर वन होकर आजतक को लगातार ठोकने-पीटने की कलाबाजी के बीच न तो आजतक के भीतर एस पी सिंह का आदर्श बचा रह सका, न ही रजत शर्मा के तर्क को अश्लील करार देने का कोई मतलब रह गया और न ही अब पुण्य प्रसून की रेखांकित आदर्श स्थिति की किसी को परवाह है.

प्रसूनजी, आफ यकीन कीजिएगा, आपकी तरह ही मैं मीडिया के भीतर इस आदर्श स्थिति और बाजार के घिनौनेपन के बीच मीडिया का कमल कैसे खिला रहे, खूब सोचा-समझा. बहुत तनाव में रहा और जिस किसी से भी इस संर्दभ में बात की, मार्क्सवादी यूटोपिया जैसे शाब्दिक प्रयोग से मजाक का हिस्सा बना. मैं बिना किसी निष्कर्ष तक पहुंचे ये नहीं कह सकता कि ऐसा कोई तरीका है नहीं. लेकिन इतना जरुर देख पा रहा हूं कि आप और हम जिस साख की बात कर रहे हैं, मीडिया ने समझ लिया है कि उसे बेहतर स्टोरी, सरोकार से जुड़े कार्यक्रम दिखाकर हासिल करने के बजाय मार्केटिंग और पीआर के लोगों के जरिए ज्यादा आसानी से अर्जित किए जा सकते हैं. ये सचमुच खतरनाक स्थिति है कि जिस मीडिया की बुनियाद ही साख पर टिकी है, वह भी बाजार में खड़ें लंपटों के जरिए ही हासिल किया जा सकता है. अभी मीडिया इसे इन्ज्वॉय कर रहा है लेकिन जिस तरह डिस्ट्रीब्यूशन के मामले में केबल ऑपरेटर के गुंड़ों के हाथों विवश हुआ है, आनेवाले समय में पीआर एजेंसियों के हाथों होगा. गौर से देखें तो टुकड़ों-टुकड़ों में मीडिया अपने को बाजार के हाथों गिरवी रखता जा रहा है. ठीक उसी तरह जैसे हम चैनलों की हिस्सेदारी को टुकड़ों-टुकड़ों में रिलांयस, आदित्य बिड़ला, टाटा म्युचुअल फंड के हाथों बिकते देख रहे हैं. ये संभव है और इसके अपने खतरें भी हैं कि जब भी हम मीडिया के भीतर घुसे बाजार,मुनाफा और इनके बीच होनेवाले धत्तकर्म को छेड़ने की कोशिश करते हैं, एक समय बाद हम खुद ही उसके पक्ष में खड़े होते नजर आते हैं. इस पोस्ट का प्रभाव भी शायद ऐसा ही हो बावजूद इसके मुझे लगता है आदर्श स्थिति की कामना के बीच हमें ऐसी जहमत उठानी चाहिए.

अब थोड़ा पर्सनल हो रहा हूं, इस भरोसे के साथ कि इसे किसी भी दूसरे संदर्भ के साथ जोड़कर नहीं देखा जाएगा. आपने न्यूजलॉड्री में मधु त्रेहन को दिए इंटरव्यू में कहा कि मैंने आजतक छोड़कर सहारा इसलिए नहीं ज्वायन किया कि मुझे पैसे ज्यादा मिल रहे थे. आप पता कर लीजिए, मुझे वहां मुझे आजतक से ज्यादा एक पैसा भी ज्यादा नहीं मिला. मैं वहां सिर्फ इसलिए गया था कि काम करना चाहता था. आखिर जिस चैनल पर भूत-प्रेत चल रहे हों, वहां हम दिन-दिनभर चाय पीकर कैसे काट सकते थे ? सही बात है. मैंने आपको स्क्रीन पर, फील्ड में और यहां तक कि ऑफिस में गंभीरता से अपना काम पूरी प्रतिबद्धता के साथ करते देखा है. मैं आपकी इस बात पर बिना किसी अतिरिक्त श्रद्धा के भरोसा करता हूं कि आपने काम करने के लिए आजतक के बजाय सहारा का चुनाव किया. लेकिन असल सवाल है कि आपके इस फैसले से व्यक्तिगत तौर पर आपको मिली संतुष्टि के अलावे न्यूज चैनल की भीतरी संरचना पर क्या फर्क पड़ा ? 

आपसे मसीहा होने की उम्मीद किए बिना सिर्फ इतना भर जानना चाहता हूं कि अगर देश के नंबर वन चैनल को आप जैसे सजग और दुर्लभ भारतीय टेलीविजन पत्रकार वैसा करने से रोक नहीं सकते थे, अपने लिए स्पेस बरकरार नहीं रख सकते थे तो फिर सहारा में ये जमीन शुरुआती दौर में तैयार किए जाने के बावजूद लंबे समय तक बनी रह सकती थी. मैंने आपके समय के सहारा को लगातार देखा है. सिंगूर और नंदीग्राम की घटना की कवरेज के लिए उस "समय" चैनल को अलग से रेखांकित किया जाना चाहिए. देशभर में तब जहां भी गया, संसद से बड़ी आपकी तस्वीर भी देखी लेकिन एक उदाहरण के अलावे वो पत्रकारिता मेनस्ट्रीम न्यूज चैनल की रगो में खून बनकर कहां दौड़ सका ? हम उम्मीद भी नहीं करते कि ऐसा हो सकता है. ऐसा इसलिए कि हम आपकी नियत के प्रति शक न करते हुए भी इतना जरुर जानते हैं कि न्यूज चैनलों का जो चरित्र है उसमें किसी पत्रकार की व्यक्तिगत ईमानदारी और प्रतिबद्धता घंटे-आध घंटे के लिए चैनल को फिर भी अलग कर सकती है लेकिन वो चौबीस घंटे के चाल-चलन को नहीं बदल सकती. एस पी सिंह की बीस मिनट की बुलेटिन ही क्यों, मुझे तो घंटे भर का आपका शो "बड़ी खबर" और रवीश कुमार का "प्राइम टाइम" उतना ही प्रभावी,बेबाक और साफ-सुथरा लगता है. तो क्या हम इस बिना पर एनडीटीवी इंडिया और जी न्यूज के प्रति एकतरफा राय कायम कर सकते हैं ?

दूसरी बात. आप जब कार्यक्रम में आए, आपके सामने ही आशुतोष और एकाध वक्ता बाजार का नगाड़ा पीट रहे थे. आशुतोष के साथ दिक्कत है कि वो राजदीप सरदेसाई की तर्ज पर अपने को मालिकों के हाथों मजबूर बताते और ईमानदार जाहिर करते हुए भी( जो कि निश्चिंत रुप से हो सकते हैं) आखिर में उसी मालिक का चारण करने लग जाते हैं जो उन्हें गंध मचाने के लिए मजबूर करता है. ये तीसरा मौका था जब उन्होंने भारतीय टेलीविजन के आधुनिक होने और भाषायी तरलता के लिए अरुण पुरी की जमकर तारीफ की. आशुतोष को इतना तो समझना ही चाहिए कि जब मालिक शब्द का प्रयोग किया जाता है तो उसका मतलब सिर्फ अरुण पुरी या राघव बहल नहीं होता बल्कि एक व्यापक स्तर पर उस चरित्र की बात होती है जिसके लिए मुनाफा अंतिम सत्य है...और इसके बीच पत्रकार सेल्फ रेगुलेशन,बीइए और एनबीए के जरिए मीडिया के दुरुस्त होने की बात करते नजर आते हैं तो समझना मुश्किल नहीं है कि वे किसकी खाल बचा रहे हैं. सच बात तो ये है कि मीडिया के भीतर जिस किस्म का धंधा और उसकी संरचना बन रही है, ऐसे में चैनल और अखबार के संपादकों की रत्तीभर की औकात नहीं रह जाती कि वो इस मामले में दखल दे. मुझे नहीं लगता कि पांच सौ करोड़ के कर्ज में डूबे नेटवर्क 18 में रिलांयस इन्डस्ट्रीज का खून चढ़ाने के पहले आइबीएन7 के संपादक आशुतोष से राय ली गई होगी. खैर, आपने अपने पूरे वक्तव्य में उनलोगों की बातचीत का सीधे तौर पर कोई विरोध नहीं किया. कायदे से आपको बाजार की दुदुंभी बजानेवाले इन महान संपादकों के प्रति अपनी असहमति जाहिर करनी चाहिए थी. लेकिन आपने पूरी बातचीत एस पी सिंह के मीडिया और उसके राष्ट्रीय होने की समझ तक केंद्रित रखा. निस्संदेह, वो सब भी बहुत जरुरी था और हमें इसे हर हाल में जानना चाहिए. कार्ड पर नाम और मौजूदा वक्ताओं के विचार से आपको झल्लाहट हुई थी. आपने कार्ड की बात की, वक्ताओं की नहीं की. अचानक से उठकर चल दिए.

दरवाजे से बाहर जाने के क्रम में कार्यक्रम के संयोजक ने आपसे पूछा- सर, आप जा रहे हैं? आपने जवाब में कहा- तो क्या यहां बैठकर लफ्फेबाजी करें ? उसी से काम चल जाएगा. जाहिर है, उससे काम नहीं चलेगा. लेकिन मेरा सवाल सिर्फ इतना है कि अगर मंच पर बैठे लोग लफ्फाजी ही कर रहे थे तो ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि आपने कार्ड का तो विरोध किया लेकिन इस पर चुप्पी मार गए ? मुझे ये बात थोड़ी अटपटी इसलिए लगी और आपके व्यवहार से सिर्फ इसलिए आहत हुआ कि आपके जिस तेवर का मुरीद रहा हूं और पिछले साल आपने जिस तरह से उदयन शर्मा के कार्यक्रम में भाषिक चारण कर रहे पत्रकारों की धज्जी उड़ायी, एस पी सिंह के इस कार्यक्रम में आपने तेवर के बजाय रुखापन दिखा. आपने सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी को अपनी बात सुने बिना वहां से न जाने के लिए मजबूर कर दिया था और उनके रुकने पर उनके सामने मंत्रालय की नाकामी का तार-तार कर दिया. ये सब देखकर आयोजक ने जिस भावना में आकर आपको आमंत्रित किया और आपके इस जवाब से उसकी आंखों में आंसू छलछला गए,इन सबकी गिरफ्त में पड़े बिना मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि सोशल मीडिया में सक्रिय लोगों की कीबोर्ड अभी इतनी भोथरी नहीं हुई है कि अभी ये कार्यक्रम अगर गहरी भावुकता और ईमानदार कोशिश के साथ शुरु हुआ है, कल को चमकीले चेहरे का रैंप शो और महज धंधा बनने लग जाएगा तो दबने से मना कर देगी. हमने जब आपको पिछले 15 सालों से सुना-पढ़ा है तो अब हम पर आपको इतनी उम्मीद तो करनी हो होगी.

आपने इस कार्यक्रम से जुड़ी रिपोर्टिंग की चर्चा के क्रम में लिखा कि सोशल मीडिया पर वो सारी बातें क्यों नहीं आयी जो समारोह में श्रोताओं की ओर से सवाल की शक्ल में आईं थी ? मुझे लगा कि इन रिपोर्टों के बीच मेरी पोस्ट ताकि एस.पी.सिंह के आगे बाकी पत्रकार भी छाती कूट सकें पढ़ी होगी. लेकिन आपकी पोस्ट की तासीर से ऐसा लगा नहीं. ऐसी बहुत सारी चीजें हम कई बार पढ़ नहीं पाते और राय कायम कर लेते हैं. इसी सोशल मीडिया पर सालों से मेनस्ट्रीम मीडिया के चमकीले चेहरे और मंडी को लेकर काफी कुछ लिखा जा रहा है.दूसरा कि आपके तमाम गंभीर सवालों के बीच मैं ऐसा महसूस कर रहा हूं कि आपने फोटो न खिंचवाने,आयोजक को झिड़क देने का जो काम किया, वो आपका एरोगेंस है जिसे कि आप वैचारिक असहमति के नाम पर ढंकना चाह रहे हैं. ये बहुत स्वाभाविक है और उतना ही स्वाभाविक कि स्क्रीन पर मौजूद मीडियाकर्मियों के काम और भाषा के हिसाब से दर्शक राय कायम कर लेते हैं. उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. .लेकिन मैं आपकी इस राय से निराश नहीं हूं. उम्मीद करता हूं कि आगे आप इस पर गौर करेंगे. 
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