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6 जून की जनार्दन द्विवेदी की प्रेस कांफ्रेंस में जिन पत्रकारों ने शिक्षक-पत्रकार सुनील कुमार की बेरहमी से पिटाई की, वो अभी इस नशे में घूम रहे होंगे कि उन्होंने पत्रकारिता के भीतर जूते फेंकने की एक गलत परंपरा पर लगाम लगाने का काम कर दिया है। सुनील कुमार की जिस तरह से धुनाई की गयी, उसके बाद से कोई भी पत्रकार इस बात की हिम्मत नहीं करेगा कि वो प्रेस कांफ्रेंस में किसी नेता, मंत्री या अधिकारी से असहमत होने की स्थिति में जूते फेंके। संभव है ये पत्रकार इस नशे में ये भी सोच रहे हों कि अबकी बार कांग्रेस सरकार उनके इस महान काम के लिए भारतेंदु हरिश्‍चंद्र पत्रकारिता पुरस्कार भी प्रदान करे। लेकिन इस पूरी घटना पर गौर करें तो कई ऐसे सवाल हैं, जिस पर कि बहुत पहले से भी विचार किया जाना चाहिए था और अब तो किया जाना अनिवार्य है ही।

सबसे पहला सवाल कि क्या सुनील कुमार राजस्थान के दैनिक नवसंचार, जिसकी कोई ब्रांडिंग नहीं है, मीडिया बाजार में जिसका कोई दबदबा नहीं है, का पत्रकार होने के बजाय दैनिक जागरण, अमर उजाला, भास्कर या आजतक जैसे किसी संस्थान का पत्रकार होता तो भी कांफ्रेंस में मौजूद पत्रकार उन पर जूते चलाने की हिम्मत कर पाते? क्या इससे पहले ऐसी कोई घटना हुई है कि किसी बड़े मीडिया संस्थान से जुड़े पत्रकार की किसी दूसरे पत्रकारों ने इस तरह से पिटाई की हो? दूसरी बात कि घटना के कुछ ही मिनट के बाद दैनिक नवसंचार ने सफाई दे दी कि सुनील कुमार का इस अखबार और संस्थान से कोई संबंध नहीं है। क्या ऐसे मीडिया संस्थान जहां सारी चीजें बहुत ही व्यवस्थित तरीके से काम करती हों, नियमित वेतन के साथ पीएफ कटते हों, वो संस्थान इतनी आसानी से इस बात से मुकर सकता है। दैनिक जागरण और जरनैल सिंह के मामले में हमने देखा था कि अखबार ने मामले को इधर-उधर करने की लाख कोशिशें कर दी लेकिन किसी भी हाल में इस बात से इनकार नहीं किया जा सका कि जरनैल सिंह जागरण का पत्रकार नहीं है। लोगों के बीच अपनी छवि बचाने के लिए उसने ये जरूर कहा कि उस दिन की घटना में आधिकारिक तौर पर उन्हें पी चिदंबरम की प्रेस कांफ्रेंस कवर करने के लिए नहीं भेजा गया था।

यहां जरूरी सवाल है कि दैनिक नवसंचार ने जितनी आसानी से ये कह दिया कि सुनील कुमार का संबंध उसके अखबार से नहीं है, इसका एक अर्थ ये भी निकाला जाना चाहिए कि इस देश में ऐसे हजारों अखबार हैं, जो पत्रकारों को एकमात्र आइडी कार्ड बांटने के अलावा ऐसी कोई भी सुविधा, अधिकार या कागजात नहीं देते, जिसके बिना पर वो दावा कर सकें कि वो अमुक संस्थान का पत्रकार है। सुनील कुमार को दोषी करार देते हुए [ जैसा कि मेनस्ट्रीम मीडिया ने जमकर किया और कांग्रेस को खुश करने की कोशिश की ] अगर ऐसे मीडिया संस्थान की खबर लें और ये जानने की कोशिश करें कि जब ये शख्स दैनिक नवसंचार के लिए काम करता आया है, तो फिर इतनी आसानी से अखबार इस बात के लिए कैसे मुकर सकता है – तो मीडिया के भीतर की सडांध इस तरह से बजबजाकर सामने आता है कि हमें मीडिया भ्रष्टाचार के विरोध में अलग से अनशन करने की जरूरत महसूस होगी।

सुनील कुमार को पत्रकारों ने जिस तरह से पीटा, उसके पीछे का तर्क यही था कि ऐसा करते हुए वो पत्रकारिता पर जो दाग लग रहे हैं, उसे रोकने की कोशिश की जा रही है। संभव है, कल को कोई और पत्रकार जूते मारने का काम करे, ऐसा होने के पहले उसे रोका जाना जरूरी है। यहां पर भी ये विचार करने की जरूरत है कि आज सुनील कुमार ने जूते फेंके नहीं बल्कि दिखाये ही तो पत्रकारिता शर्मसार हो गयी और पत्रकारों के भीतर की जमीर जाग उठी… लेकिन क्या जब जरनैल सिंह ने पी चिदंबरम पर जूते फेंके थे और 14 दिसंबर 2008 को बगदादिया टीवी के पत्रकार मुंतजिर अल जैदी ने जार्ज बुश पर जूता फेंका था, तो इनके साथ भी पत्रकारों ने यही सलूक क्‍यों नहीं किया था? प्रशासन की तरफ से इन्हें चाहे जितना भी प्रताड़ित किया गया हो, लेकिन मीडिया ने इन दोनों को रातोंरात सेलेब्रेटी की कैटेगरी में लाकर खड़ा कर दिया। मुंतजिर की द लास्ट सैल्यूट और जरनैल सिंह की आई एक्यूज नाम से किताब आ गयी। चैनलों ने इन पर घंटों स्टोरी चलायी और करीब 15 दिनों पहले अरविंद गौड़ ने मुंतजिर को भगत सिंह की तरह साहसी करार दिया। जरनैल सिंह आज सिक्ख समाज का मसीहा माने जाने लगे हैं। हालांकि इन दोनों को जो भी सम्मान मिल रहे हैं, उसके पीछे सिर्फ जूते फेंकना ही वजह नहीं है, इन दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र में बेहतरीन काम किया है लेकिन मौके पर जो असहमति, जो गुस्सा उन्होंने जाहिर किया, उनकी पहचान इसी से बनी है। ऐसे में ये सवाल तो जरूर है कि किसी पत्रकार के जूते फेंकने पर वो सिलेब्रेटी, महात्मा, मसीहा और लोकतंत्र की आवाज बचानेवाला बन जाता है और कोई ऐसा जिसे कि सुनील कुमार बनकर पत्रकारों के हाथों ही मार खानी पड़ती है। क्या ये पत्रकारों के भीतर के वर्ग-भेद, हैसियत के आधार पर विभाजन, संस्थानों के हिसाब से रिएक्ट करने का मामला नही है?

इतना ही नहीं, 6 जून की जनार्दन द्विवेदी की प्रेस कांफ्रेंस को मैं भी बहुत ध्यान से देख रहा था। तब तक पत्रकारों ने दो-तीन सवाल ही किये थे लेकिन द्विवेदी जिस तरह से उन सवालों को या तो इग्नोर कर रहे थे या फिर उपहास उड़ाने के अंदाज में जवाब दे रहे थे, मेरे दिमाग में बस एक ही सवाल आ रहा था कि कोई कुछ बोल क्यों नहीं रहा? कोई ये क्यों नहीं कह रहा कि द्विवेदी साहब, आप इस तरह से सवालों से बच नहीं सकते। वो लगातार एक ही बात दुहरा रहे थे – मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। जिस बारे में देश के एक औसत शख्स को जानकारी नहीं है, उस बारे में इन्हें जानकारी नहीं है, यही सवाल कोई क्यों नहीं करता? यकीन मानिए, उस वक्त मुझे इतना गुस्सा आया कि लगा कि कोई न कोई जूते मारेगा। चूंकि मीडिया के लोगों की ओर से प्रतिरोध में जूते मारना एक प्रतीक सा बन गया है, तो कुछ और जेहन में नहीं आता। जनार्दन द्विवेदी जिस बदतमीजी और बेहूदे की तरह बात कर रहे थे, मुझे शर्म आ रही थी कि इस शख्स का संबंध कभी डीयू के अध्यापन और हिंदी अकादमी से रहा है। मसखरेपन के अलावा सामनेवाले की औकात बताने के अंदाज में वो जो कुछ भी बातें कर रहे थे, उसके हिसाब से सवाल करनेवाले पत्रकार अपने संस्थानों के चाकर हैं, उनके मालिकों की गर्दन उनकी टांगों के नीचे फंसी है और ऐसे में उनके सवाल टाइमपास से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। साफ झलक रहा था कि वो पत्रकारों की बातों को बहुत ही हल्के में ले रहे हैं। कुछेक सवालों के बाद जनार्दन द्विवेदी ने कहा – अब बस बहुत हो गया यार… और तभी हाथ में जूते लिये सुनील कुमार मंच पर चढ़कर उन्हें दिखाने लगा। वो दिखाना ही था, मारने की कोशिश बिल्कुल भी नहीं थी, जो कि मारने से ज्यादा अपमानजनक और गुस्से की स्थिति को व्यक्त करता है।

टेलीविजन पर हमने दर्जनों प्रेस कांफ्रेंस देखी है, जिसमें साफ तौर पर झलक जाता है कि सेलेब्रेटी, नेता, मंत्री या अधिकारी सवाल कर रहे पत्रकारों का लगभग उपहास उड़ाते हुए या उन्हें हल्के में लेते हुए जवाब देते हैं। लेकिन कभी किसी मीडिया संस्थान ने ऐसे लोगों की प्रेस कांफ्रेंस का बहिष्कार नहीं किया। कुछेक प्रेस कांफ्रेंस में मैं जब खुद शामिल रहा, तो देखा कि कुछ चैनलों के पत्रकार उनसे ऐसे पर्सनली पेश आते हैं, जैसे वो उनसे सवाल-जवाब करने नहीं बल्कि मेहमाननवाजी करने आये हैं। वो हमलोगों को ही डिक्टेट कर देते, प्रेस रिलीज मिली है न, उस पर बना लो स्टोरी। बाकी टेप से विजुअल्स ट्रांसफर कर लो। ऐसे पत्रकारों और हमारे बीच फर्क सिर्फ अनुभव के आधार पर नहीं था। उसमें हैसियत, चैनल की ब्रांडिंग, पत्रकार की पहुंच और सांठ-गांठ बहुत कुछ शामिल होते। इस पर कभी किसी ने सवाल नहीं खड़े किये। आज सुनील कुमार ने जूते दिखाने की कोशिश की तो लगभग सारे चैनलों ने उसकी शक्ल हमारे सामने ऐसे पेश करने की कोशिश की, जैसे कि उससे बड़ा अपराधी कोई नहीं है जबकि सच्चाई ये है कि ऐसा करके मीडिया के भीतर के बड़े अपराध ढंकने की कवायदें जारी हैं। कभी प्रेस कांफ्रेंस का नजारा गौर से देखिए, आपको अंदाजा लग जाएगा कि प्रेस किट के बोझ और चाय की अतिरिक्त मिठास के नीचे दबे ये पत्रकार कैसे लिजलिजे और उन मंत्रियों और अधिकारियों के दुमछल्लों नजर आते हैं। न हो तो, तब तक के लिए पीपली लाइव के दीपक को ही याद कीजिए…
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