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बाटा के जूते का इससे मजबूत और भावनात्मक स्तर पर विज्ञापन शायद ही पहले कभी हुआ हो। देश के गिने-चुने सरोकारी और समाज के हक के लिए लड़नेवालों में से रंगकर्मी अरविंद गौड़ ने बाटा कंपनी के जूते को ऐतिहासिक जूता करार दे दिया है। एक रंगकर्मी के दिमाग में मार्केटिंग और विज्ञापन की इतनी बारीक समझ हो सती है,सोचकर हैरानी भी हो रही है और अंदर से भय भी कि आनेवाले समय में रंगकर्म बाकी चीजों की तरह ही कार्पोरेट की जूती बनकर रह जाएगा। इस साल कोटेक महिन्द्रा के नाटक फेस्टीवल में जब मैंने पहला नाटक देखा,वहां नाटक देखनेवाले लोगों के तबके को देखा, तब भी यही बात महसूस कर रहा था कि नाटक जो कभी कम से कम खर्चे या लगभग मुफ्त देखी जानेवाला माध्यम रहा है,अब वो सामान्य लोगों की पहुंच से बाहर हो जाएगा। लेकिन अरविंद गौड़ के निर्देशन में आज से जिस नाटक "दि लास्ट सैल्यूट" का मंचन होने जा रहा है,वो इससे भी कहीं खतरनाक कहानी की ओर ईशारा करते हैं।


मोहल्लाlive कल से ही इस नाटक को इतिहास रच देने के तौर पर रेखांकित करता आ रहा है। अंडरटोन ये है कि विश्व पटल पर इतनी बड़ी घटना हो गयी लेकिन उसे सर्जनात्मक रुप से लोगों के सामने लाने का काम भारत की पवित्रभूमि में हो रहा है। ऐसे में भारत,यहां के रंगकर्मी और खासकर अरविंद गौड़ इतिहास रचने का काम कर रहे हैं। चूंकि इतनी बड़ी रिस्क के साथ महेश भट्ट ने पैसा लगाया है,प्रोडक्शन किया है तो उन्हें कम बड़ा योद्धा साबित नहीं किया जा सकता? बहरहाल,मोहल्लाlive पर इसकी प्रशस्ति में छपी पोस्ट को पढ़ने के बाद ऐसा संयोग बना कि हम कल ही शाम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तरफ से गुजरे और तब हमने देखा कि वहां दि लास्ट सैल्यूट की बहुत बहुत पोस्ट/कीऑस्क लगी है। 

विश्वास कीजिए,उस पोस्टर में जो सबसे आकर्षित करनेवाली बात थी वो ये कि ठीक कोने में,बहुत ही बड़ी साईज में एक जूता बना है जो कि शान से सिर ताने खड़ा है और नीचे डार्कब्रैग्ग्राउंड होने की स्थिति में सफेद रंग से लिखा है- बाटा। इस नाटक के औऱ भी कई स्पांसर हैं लेकिन सबों के लोगो और नाम बहुत छोटे हैं। बाटा के इस जूते और पोस्टर में खास बात ये है कि जूते की साईज उतनी ही बड़ी है जितनी बड़ी कि बाटा कंपनी अपने शोरुम पर बोर्ड लगाने के लिए छपवाते हैं और पोस्टर की खास बात ये कि उसने जूते को उसी डार्क ब्राउन रंग और बैग्ग्राउंड के साथ एकाकार किया है,जिस रंग का पोस्टर है। ऐसा करने से जूता अलग से दिखने के बजाय उस नाटक का ही हिस्सा बल्कि एक चरित्र के तौर पर दिखाई देता है। जिनलोगों को भी ये घटना याद है कि 14 दिसंबर 2008 को बगदादिया टीवी के पत्रकार मुंतजिर अल जैदीने जार्ज बुश पर जूता फेंका था और तब हंगामा मच गया था,उनके मन में पहला सवाल यही उठेगा कि क्या वो जूता बाटा का था? 

दरअसल पोस्टर ने बाटा के जूते को इस रुप में शामिल किया है कि वो नाटक की घटना का हिस्सा जान पड़ता है। मुझे नहीं पता कि नाटक के इस पोस्टर को डिजाइन करने में अरविंद गौड़ जैसे सरोकारी रंगकर्मी की क्या भूमिका रही होगी लेकिन जन-मजदूर,हक,संघर्ष,पूंजीवाद के खिलाफ सालों से बात करते रहनेवाले अरविंद गौड़ की आंखों में ये पोस्टर अभी तक चुभा नहीं कैसे,इस बात को लेकर हैरानी जरुर होती है।
मुझे पता है कि मेरी ये पोस्ट पढ़ने के बाद कुछ लोग हमें मिट्टी का लोंदा जानकर ये दलील देने की कोशिश करेंगे कि आज अगर दूसरी बाकी विधाओं और कला की तरह नाटक को जिंदा रहना है तो उसे बाजार से हाथ मिलाने ही होंगे,समझौते करने ही पड़ेंगे। ऐसे में अरविंद गौड़ निर्देशित नाटक "दि लास्ट सैल्यूट" का स्पांसर बाटा है तो क्या दिक्कत है? एक हद तक सचमुच इस बात में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन क्या इस नाटक का स्पांसर बाटा सिर्फ इसलिए हो जाना चाहिए क्योंकि इसमें जूता फेंकना ही सबसे बड़ी घटना है और वो भी बुश पर। फेसबुक पर हमने सटायर करते हुए जब लिखा कि-बुश पर जूते मारने की दास्तान पर मंचित होनेवाले नाटक दि लास्ट सैल्यूट जिसके निर्देशक अरविंद गौड़ है का प्रायोजक बाटा है। एनएसडी में जो पोस्टर लगी है उसमें बाटा का जूता उसी तरह शान से और बड़े साइज में है जैसे बाटा की साइन बोर्ड में होते हैं। इंडिया में भी पी चिदंबरम पर जरनैल सिंह ने जूते फेंके थे,उस पर नाटक बनने पर कौन स जूता कंपनी स्पांसर होगी,एनी गेस? तो कई लोगों ने उसी व्यंग्य के अंदाज में जूते कंपनियों के नाम गिनाने लगे? 

अरविंद गौड़ से हमारा सवाल सिर्फ इतना भर है कि क्या उन्हें एक ऐतिहासिक घटना को अपने हित में एक जूते कंपनी के लिए प्लेटफार्म बनाने देने का अधिकार है? क्या अरविंद गौड़ को इस बात का अधिकार है कि मुंतजिर अलग जैदी ने बुश की नीतियों और रवैये के खिलाफ जो प्रतिकार किया,अपना विरोध दर्ज किया,उसे बाटा की झोली में डाल दें। माफ कीजिएगा,मैं यहां पर आकर अरविंद गौड़ से कहीं बेहतर रिबॉक कंपनी को मानता हूं जिसने अपने विज्ञापन में ये कहीं नहीं शामिल किया कि जरनैल सिंह ने जो जूते पी चिंदमबरम पर फेंके थे,वो उसकी कंपनी के बनाए जूते थे। मतलब जो जूता देश के गृहमंत्री से टक्कर ले सकता है,वो धूप-बरसात,सड़क के पत्थरों और धूल से क्यों नहीं? मुझे यकीन है कि कल को रिबॉक अगर इस चूकी हुई क्रेडिट को भुनाने की कोशिश करे तो अरविंद गौड़ जैसे ही सरोकारी रंगकर्मी इसके खिलाफ नाटक का मंचन करेंगे।..ऐसे में ये सवाल जरुर बनता है कि बाटा के जूते को दि लास्ट सैल्यूट की पोस्टर में बतौर एक चरित्र क्यों शामिल किया गया?

अरविंद गौड़ जैसे देश के किसी भी रंगकर्मी,कलाकार,समाजसेवी या लेखक से ये सवाल इसलिए भी पूछा जाना चाहिए क्योंकि इन्होंने अपनी जमीन,पहचान( बाजार की भाषा में कहें तो ब्रांडिंग) इन्हीं सारी बातों का विरोध करते हुए बनायी है। देश के लोगों ने अगर इन्हें एक पहचान दी है तो उसमें कहीं न कहीं उनकी भी हिस्सेदारी शामिल है।..इसलिए ये बाकी लोगों की तरह बाजार से,कार्पोरेट से,पूंजीपति घरानों और कंपनियों से उसी तरह हाथ नहीं मिला सकते,जिस तरह कोटेक महिन्द्रा के साथ हाथ मिलाकर फ्रेमवर्क नाट्योत्सव और जयपुर लिटरेचर फेस्टीबव आयोजित कराता है। अगर वो ऐसा करते हैं तो फिर उन्हें वो जमीन छोड़नी होगी जहां से वो सरोकार का दावा करते हैं,समाज के बुनियादी ढांचे को बदलने की बात करते हैं। आखिर हम ये बात कैसे बर्दाश्त कर लें कि जो शख्स समाज की दुनियाभर की सडांध,कार्पोरेट की अंधी नीतियों और बाजार के खिलाफ बात करता आया हो और देखते ही देखते हमारा प्रवक्ता बन गया हो,आज वही उसके पक्ष में जाकर,उसके साथ गलबहियां करने लग जाए। 

अरविंद गौड़ की अगर यही इच्छा है कि उनके नाटक को बाटा(आज नाटक में अगर जूता है तो), किर्लोस्कर( नाटक में जहर की सीन होने पर) जैसी कंपनियां स्पांसर करे तो उन्हें अपने सारे दावों के साथ ये भी घोषित करना होगा कि उनका नाटक दरअसल एक ब्रांड प्रोमोशन का हिस्सा है,इसे आप खाटी सरोकार से जोड़कर देखने की भूल न करें। विज्ञापन कंपनियां हमानी तमाम अनुभूतियों को अगर एक कंपनी की पंचलाइन या सिग्नेचर ट्यून तक जकड़कर रख देना चाहती है,ऐसे में अरविंद गौड़ भी वही काम कर रहे हैं तो उन्हें फिर सरोकारी होने पर मिलनेवाली सुविधा और शोहरत को इन्ज्वाय करने का क्या हक है? बेहतर हो कि वो बाजार से ही अपने लहलहाने के खाद-पानी लेते रहें और सरोकार की जमीन छोड़ दें।

हम ये बात कैसे मान लें कि अरविंद गौड़ के इस नाटक की पोस्टर में जो चेहरा खुलकर सामने आया है वो कार्पोरेट की स्ट्रैटजी से अलग है। मीडिया की उस रणनीति से अलग है जो कि सरोकार के नाम पर सरकार और कार्पोरेट की करोड़ों की दलाली का काम कर रहा है। इन दिनों एनडीटीवी और कोका कोला का स्कूल बनाने औऱ बच्चों को पढ़ाने का संयुक्त अभियान चल रहा है। एनडीटीवी पर धुंआधार विज्ञापन आ रहे हैं। इससे पहले चैनल ने टोएडा के साथ मिलकर पर्यावरण बचाने को लेकर अभियान चलाया था। क्या ये बात एनडीटीवी को पता नहीं है कि इस देश में पर्यावरण को कौन दूषित कर रहा है और कौन पानी के संकट को भयानक तरीके से बढ़ा रहा है। लेकिन वो उन्हीं कपंनियों के साथ मिलाकर अभियान चला रहा है,जो कि इसके लिए जिम्मेवार है। कई बार तो लगता है कि इस देश को कानून नहीं,लोगों के इमोशन्स चलाते हैं। आखिरी तभी तो ऐसे जिम्मेवार और अपराधियों का विरोध करने के बजाय लोग इनके फेंके जानेवाले टुकड़ों के पक्षधर हो जाते हैं। अरविंद गौड़ नाटक के बहाने एनडीटीवी और कोका कोला से क्या अलग कर रहे हैं? माफ कीजिएगा,मुझे न तो नाटक की बारीकियों की गहरी समझ है और न ही कला की..इसलिए इसे बचाने के लिए मैं बाकी जानकार लोगों की तरह विह्वल नहीं हो सकता।

..लेकिन इतना जरुर जानता हूं कि अरविंद गौड़ अपने नाटकों में जिन चीजों को बचाने की बात करते हैं,वो अगर सिर्फ पटकथा लेखन और संवाद में खूबसूरती पैदा करने के लिए नहीं है तो अरविंद गौड़ के नाटक को बचाने से कहीं ज्यादा जरुरी है कि वो बचाए जाएं जिसके बचाने की बात वो लगातार सालों से करते आए हैं। ऐसे में, आज अरविंद गौड़ अगर अपने नाटकों में झांककर देखें तो खुद ही उसके विरोध में नजर आएंगे।
खेद- तब मेरे पास कैमरा नहीं था कि मैं दि लास्ट सैल्यूट के उस पोस्टर की  तस्वीर ले सकूं जिसका कि मैंने जिक्र किया है। अभी कुछ घंटे में उधर जाना हुआ तो वो तस्वीर जल्द ही मुहैया कराता हूं।


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