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आचार्य अरस्तुजी के अनुसार

Posted On 1:55 am by विनीत कुमार |

हिन्दी मी काव्यशास्त्र का एक पेपर होता है जिसमे अपने मन का लिखने कि गुंजाइश न के बराबर होती है । इसलिये हर दूसरे -तीसरे वाक्य के साथ जोड़ना पड़ता है- फलां के अनुसार । कल के इस पेपर मई कुछ बच्चे यह भी क्रियेटिव नज़र आये। पूरी बात तो वही लिखी जो बात हिन्दी पड़ने वाले शुरू से करते आ रहे है लेकिन इन्त्रो मी सबको मौका मिल गया अपनी बात झोकने कि तो देखिये उनकी बानगी-
सबाल है, काव्य लक्षण क्या क्या है, परिभासित करे । बन्दे ने लिखा-
कविता सब लोग अपने-अपने मतलब के लिये करते है। किसी को मन होता है कि इससे धन-दौलत कमाये, कोई नाम के लिये लिखता है और कोई लोग कविता का नाम पर काओवं- कावों करके पोल्तिस मी अपनी पकड़ बनाना चाहता है। बन्दा मुझे उत्तर- आधुनिक जान पड़ा , उसने सारे मेटा नर्रेतिव को तोड़ दिया और अपने इस उत्तर मी कही भी कुन्तक, विश्वनाथ का नाम नही लिया , और आज के हिसाब से जो कवी , कविता और सम्मान के लिये मार-काट मच रही है, सब लिख दिया । संस्कृत का खुल्ला नकार। इंग्लिश का भी कही कोई नाम नही। भाई ये है क्रेअतिविटी । आप बताते रहे क्लास मी कि हमारी परंपरा ये , वो , लेकिन आज कि हिन्दी फसल आपके हिसाब से नही चलेगी।
एक बन्दे ने रस को लेकर प्रेमचंद के क्या विचार है, पूरे सात पन्ने मे लिखा। क्यो नही लिखेगा, आप भी तो बात-बात मे मार्क्स और लोहिया को पेलते हो। पेपर भले ही संस्कृत कि किताब पड़कर तैयार कि गयी हू लेकिन जबाब भी संस्कृत के हिसाब से हो, जरुरी तो नही.
एक बन्दे ने पूरे भारतीय काव्यशास्त्र को शोषण का मामला बताया और कम्युनिस्ट मनिफेस्तो झोक डाला।
और एक बन्दे ने तो लिखा आचार्य अरस्तूजी के अनुसार। वो हिंदूवादी तरीके से पेपर को देख रह था, लेकिन आप ये नही कह सकते कि उसे ये बात पता नही कि अरस्तू भारतीय नही थे.
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