बहुत पहले कथादेश के एक प्रोग्राम में बताया था कि कभी मोहल्ला देखिए। मैंने उस समय इन्टर्नशिप कर रहा था। नहीं देखा लेकिन इस दिन मुझे मोहल्ला याद आ गया। मैने गूगल पर मोहल्ला टाइप किया और मोहल्ला खुल गया। सारे जाने-पहचाने और बड़े नाम। मन खुश हो गया। मैंने सीबॉक्स में मैसेज छोड़ा- अविनाश भाई मैं विनीत, याद है हमलोग कथादेश के प्रोग्राम में मिले थे। अब मैं डीयू से पीएच।डी कर रहा हूं। अविनाश भाई ने उस समय मुझे शुभकाननाएं दी। दो दिन बाद मैंने जोड़-तोड़कर अपना एक ब्लॉग बनाया। इस बीच उनसे कई बार पूछा, ये कैसे होता है, इसको क्या करना होता है।
मुझे एक प्लेटफार्म मिल गया था जहां मैं अपनी बातें लिख सकता था, बिना बॉस की झिड़की के। बिना एडिटिंग के। मैंने अविनाश भाई को फिर मैसेज भेजा- मैंने अपना ब्लॉग बनाया है। उस समय उत्साहित तो था ही, जेआरएफ ने खूब बल दिया था और मीडिया की घिसायी ने एस्टेमना कि कितना भी कोई खटाए, उफ्फ नहीं करुंगा। मैंने लिखा, अविनाश भाई मैं हिन्दी की मठाधीशी को खत्म करना चाहता हूं। भाव कुछ ऐसे ही थे। शब्द कुछ इधर-उधर हो सकते हैं। उन्होंने नए ब्लॉगर के हिसाब से मुझे राय दी और जो कि सही थी कि- आप हिन्दी की कुछ क्षणिकाएं ही हमसे शेयर करें तो अच्छा होगा। मैंने भी समझा कि जोश में मैं कुछ ज्यादा लिख गया। सच्चाई तो ये है कि हिन्दी में जितने लोग मठाधीशी करते हैं उससे दस गुना ज्याद लोग भी तोड़ने के लिए आगे आ जाएं तो भी मठाधीशी खत्म नहीं होगी। क्योंकि मठाधीशी दोहरी प्रक्रिया है। एक तरफ से टूटती है तो दूसरी तरफ बनती चली जाती है। खैर,
अविनाश भाई को मेरा ब्लॉग पसंद आया और उन्होंने मोहल्ला पर इसका लिंक दे दिया। मैं भी लोगों को बताता फिरता कि मेरा भी ब्लॉग है और जब लोग पता पूछते तो मैं बताता कि गूगल प जाओ और टाइप करो, मोहल्ला। कोने में जाओगे तो लिखा होगा-दोस्तों का मोहल्ला। उसी में मेरा भी लिंक है। ऐसा करके मैं अपने ब्लॉग को और कितना मोहल्ला को लोगों के बीच फैमिलियर बना रहा था, पता नहीं लेकिन लोग बड़ी आसानी से मेरे ब्लॉग पर आने लगे।
इसी बीच अविनाश भाई ने मोहल्ला को कॉम्युनिटी ब्लॉग घोषित कर दिया। हालांकि मोहल्ला की संरचना पहले से भी इसी तरह से थी, पहले भी कई लोग इसमें लिखते आ रहे थे। लेकिन अबकि, उन्होंने कई नए लोगों के भी नाम जोड़ दिए और एक अलग लिंक बनाया-हम हमसफर। मुझे मेल किया- मैं आपका भी नाम जोड़ रहा हूं। मैंने देखा और यकीन मानिए उस दिन मुझे कुछ ऐसी ही खुशी हुई थी जब हम बेकार को चैनल ने कहा था-छ हजार रुपये मिलेंगे। मोहल्ला को मेरे विभाग के सभी प्रबुद्ध टीचर जब तब पढा करते हैं। मुझे खुशी इस बात कि थी कि इस पर जब वो मेरी पोस्ट देखेंगे तो उन्हें कितना अच्छा लगेगा कि चलो अपना स्टूडेंट भी अपडेट हैं। अविनाश भाई के प्रति मेरे मन में सम्मान का भाव जगने लगे। मैंने कुछ पोस्ट भी लिखे। मोहल्ला की जरुरत, शैली, पाठक और गरिमा के हिसाब से। लोगों ने पसंद भी किया। एक-दो ने फोन करके भी कहा-अरे तू तो मोहल्ला पर लिखने लगा है।
धडल्ले से लिखता औऱ अविनाश भाई उस कच्ची-पक्की पोस्ट पर कोई अच्छी सी तस्वीर लगा देते, वाक्यों को दुरुस्त कर देते, कस देते। यूनिवर्सिटी में ये काम मेरे सरजी किया करते और इधर अविनाश भाई। मुझे भरोसा होने लगा कि मैं जल्द ही बेहतर हिन्दी लिखने लगूंगा। आप सोचिए न, उन दिनों मैं इतना उत्साहित रहता कि एक दिन में दो-दो और कभी तो तीन पोस्ट लिख जाता। अलग-अलग मिजाज के, अलग-अलग ब्लॉग के लिए। जब भी अविनाश के आगे जीमेल पर हरी बत्ती छेड़ देता, कैसे हैं क्या कर रहे हैं और फिर अपनी बातें बताता। दुनिया जहान की बातें, हिन्दी के लोगों को कोसता, साथ के कुछ घटिया लोगों को गरियाता।......
( आगे पढिए, एक ब्लॉगर दो-दो ब्लॉग का निर्वाह नहीं कर सकता और रोचक बात कि भड़ासी बिना मोहल्ला भी सूना है। अविनाश भाई को भी याद आते हैं भड़ासी।)
हिन्दी मीडिया में एक और बीमारी है। आपको अगर बीमारी कहने से परहेज है, दिक्कत लगती है कहने में तो कहिए कि रिवाज है कि लोग मीडिया में अंदर लाने के पहले और अंदर आ जाने के बाद आप से जरुर पूछेंगे कि आप कहां से हो। अगर जानकारी के स्तर पर पूछ रहे हैं तब तो कोई बात नहीं लेकिन आगे पूछना तब तक जारी रहेगा जब तक कि उनकी जानकारी का फलक आपसे मेल नहीं खाता हो। कुछ न कुछ तो उनके हिसाब से मिलना ही चाहिए। मसलन आपने कहा कि मैं बिहार से हूं तो फिर आगे का सवाल होगा- बिहार में कहां से। आपने कहा रांची से तब वो सीधे अड़ जाएंगे। अजी रांची बिहार में कहां है उ तो झारखंड है। आप दलील दें कि मेरे मैट्रिक की सर्टिफिकेट में तो रांची बिहार ही लिखा है। आज अलग हुआ है न, मानता अपने को बिहारी ही हूं। आपके मानने से दुनिया मानने लग जाएगी क्या। हमलोग के मुंह का निवाला छीन लिए, बिहार का बंटवारा करके आपलोग महाराज और कह रहे हैं कि बिहारी है।
खैर, आगे अपनी अकड़ बरकरार रखते हुए कहेंगे कि- हमरे छोटके चचा भी थे रांची में। अब तो अशोकनगर में कोठी भी बनवा लिए हैं। वो अपने चाचा की कोठी का हवाला रांची के ऐसे इलाके का देंगे जो कि सबसे मंहगे, पॉस इलाके में हो। आप जी जी करते रहेगें और वो आपको इस बात का एहसास कराते रहेंगे कि मीडिया में वो घसीट कर नहीं आए हैं। वाकायदा एक प्लॉनिंग के तहत आए हैं। मेरी तरह बिलटउआ नहीं है कि कहीं कुछ नहीं हुआ तो मुंह उठाकर चले आए मीडिया में। उनके मामू भी लम्बे समय तक प्रभात खबर में लिखते रहे हैं। पूरा पढ़ा-लिखा बैग्ग्राउंड रहा है।
खैर, आगे आपसे कहेंगे कि पूरा नाम बताइए। आप या हम जो कि आमतौर पर बिहार-झारखंड के लोग करते हैं कि नाम के बाद सीधे कुमार लिखते हैं। आप भी अपने नाम के साथ कुमार जोड़कर बताएंगे। तब वो आपके बाबूजी का नाम पूछेंगे, इस उम्मीद से कि बाबूजी के नाम के बाद तो जरुर कुछ ऐसा पुच्छल्ला लगा होगा जिसके कि आगे का सूत्र समझा जा सके। आपने कह दिया सेठ, भदानी या फिर कुछ ऐसा पुच्छल्ला जिससे कि उनका कोई मैच नहीं खाता हो तो सीधे कहेंगे। त हियां क्या करने आ गए। बढिया था, बाबूजी के काम में हाथ बंटाते, गलत जगह फंस गए दोस्त। यहां तुमको कितना मिल जाएगा। बीस हजार, पच्चीस हजार, बहुत हुआ तो तीस हजार। एकदम से प्रणव राय या प्रभु चावला तो बन नहीं जाओगे। चौदह घंटे-पंद्रह घंटे रगडोगे, तब जाकर गिनकर रोटी मिलेगी महीने के अंत में।बाबूजी के बिजनेस में कोई गिनती है, बताऔ। थोड़ी देर के लिए मैं भी याद करता हूं कि कैसे पापा रोज अलमारी में उतने पैसे रखते हैं जितने एक मीडियावाले को महाने भर में देखने को मिलते होंगे। एक मन करता है ठीक ही तो कह रहे हैं कि कौन-सा तीर मार लूंगा मैं। फिर पापा का चेहरा और उनकी बातें याद आ जाती है कि गए हो मुंह में माइक घुसानेवाला पेशा अपनाने तो वहीं रहो, दिल्ली में । घर वापस आने की कोई जरुरत नहीं है। बाप रे...रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सो हिम्मत समेट कर कहता हूं, सर कुछ अलग करना चाहता हूं। मुझे बिजनेस मैन का छ-पांच करना अच्छा नहीं लगता। हमसे किसी को झूठ बोलकर माल बेचा नहीं जाता। वो हुं हुं करेंगे।...मूड में होगें तो कहेंगे॥ लीजिए, तिवारीजी आपका एक और भतीजा, बात विचार से ही राजा हरिशचन्द्र लग रहा है और फिर ठहाके। अच्छा इंटरव्यू लेनेवालों में सब एक तरह के नहीं होगें। कुछ नरम मिजाज के भी होंगे, थोड़ा अपनापा दिखाएंगे। बीच-बीच में कहेंगे॥बच्चा है जरा नरम होकर ही पूछिए सिंहजी। आप तो लहुलूहान करने पर लगे हैं। आपको अच्छा लगेगा।
तब तक तीसरा सवाल-बायोडाटा में लिखे हो कि हिन्दू कॉलेज से एमए हो। हिन्दू कॉलेजवाला तो रामजस कॉलेज वाले को बहुत गरियाता है। एक बार की बात है, सिंहजी। हमरे साथ एगो लड़की थी...शोभा। पढने में तो ठीक थी ही लेकिन बाकी चीज में भी....हाहहाहाहाहा.....उसको एगो हिन्दू का लड़का ऐसा सिखा पढ़ा दिया कि अगले दिन से हमको देखे तो मुंह फेर ले। फिर हमसे ताजा जानकारी लेंगे। अभी कौन है प्रेसीडेंट वहां। हम बताते हैं कोई रावत या अहलावत। वो बिफर जाते हैं। तू तो नहीं ही दिया होगा बिहारी को वोट। तुम्ही जैसे लोगों के कारण दिल्ली में इ हाल हुआ है।
अब हिन्दी से हूं तो थोड़ा मनोरंजन भी तो करनी हैं उनकी। पहले पूछते हैं कौन-सा कवि पसंद है। हमने सीधे कहा-जी मुक्तिबोध, नागार्जुन और रघुवीर सहाय। उन्होंने फिर सवाल किया- काहे। मैंने कहा- जी इसलिए कि उनको पढ़ते हुए लगता है कि वो सिर्फ कवि की हैसियत से नहीं लिख रहे हैं बल्कि समाज को बेहतर करने में खुद भी शामिल हो जाते हैं, जनविरोधी सत्ता से सीधे टकराते हैं और साफ कहते हैं-
अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे
तोड़ने ही होंगे मठ और गढ सब।.....
उनकी रचनाओं में वो सारी बातें शामिल हैं जो एक पत्रकार के ज़ज्बे को बनाए रखता है। सिंहजी कहगें- बहुत खूब। लेकिन तिवारीजी का कहना होगा- वाजपेयीजी की कविताओं में कौन खराबी है। सर, खराबी तो नहीं लेकिन मुझे बस यही पसंद हैं। तिवारीजी का अगला सवाल होगा-लाल उल झंडे के टच में हो क्या।.... और अगले ही मिनट मुझे लगता है कि ये तो सिंहजी से भी ज्यादा.......... हैं। एक दो इसी तरह के कुंडली मिलान सवालों को पूछने के बाद छोड़ दिया जाता हूं।....एक स्वर में सारे लोग कहते हैं-जैसा होगा, बताएंगे, फोन ऑफ मत रखना।
अगले दिन फोन आता है- एक भी चीज ऐसी तुम नहीं बोले जिससे कि तुमको रखने का ग्राउंड बने। न जात ही मिलता है, न फारवर्ड ही हो, न तो ठीक से बिहारी ही हो। डीयू में पढ़े भी हो तो ऐसे कॉलेज से जहां सब हमरा दुश्मन ही था, कोई पनपने नहीं दिया। शोभा से अलगाया सो तो अलगाया ही, ५५ प्रतिशत नं भी नहीं बनने दिया एमए में भी कि पीएचडी और लेक्चररशिप के लिए सोचते। सिंहजी तो बमक गए थे। हम सब संभाल लिए। बोले कि कंडीडेट ठीक-ठाक है। हम पर छोड़ दीजिए। तब जाकर बात बनी है। अब अंदर जाकर कुछ गड़बड़ मत करना, कोई परेशानी हो तो हमको बताना और हां सिहंजी से भी बहुत लुस-फुस करने की जरुरत नहीं है। ससुराल के आदमी मिल गए और घर जाकर मिसेज को बताए कि तुमरे नैहर का एक लड़का मिल गया इंटरव्यू में तो उसने कहा कि कर दीजिए। तब जाके हुआ है।
लीजिए, अब हमको इतना भी अधिकार नहीं है कि मैं अपनी योग्यता पर ताल ठोककर कह सकूं कि-देखो दुनियावालों अपने दम-खम पर पत्रकार बनके दिखा दिया। बाबूजी आपका लड़का माइक और कलम घुसाकर इन दो कौड़ी के नेताओं और दलालों से सच उगलवा लेगा....समझे सरजी। कुछ ऐसे ही अनुभव रहे थे जब एमफिल् की डिग्री के लिए मैंने अपने रिसर्च पेपर जमा किए थे और सोच रहा था कि आगे कि नैय्या पार कैसे लगेगी।....और दो दिन बाद ही देश के सबसे ज्यादा बिकनेवाले( तब, अभी का पता नहीं) अखबार ने मुझे बतौर ग्यारह हजार की नौकरी पर रख लिया था। ये अलग बात है कि सबकुछ हो जाने के बाद कभी चंड़ीगढ़, कभी, दिल्ली, कभी राजस्थान और कभी भोपाल के नाम पर टरकाता रहा और अंत में कहा-जैसा होगा, फोन करेंगे।.....
मुगलसराय एक ऐसी जगह है जहां से आपको कहीं की भी बस, ट्रेन पकड़नी हो, जर्नी ब्रेकअप करनी हो, तफरी के लिए बनारस जाना हो या फिर थकान मिटाने के लिए यहां सुस्ताना हो...इन सब कामों के लिए भारतीय रेल के पास इससे बेहतर कोई स्टेशन नहीं है। यहां इस बात से कोई मतलब नहीं है कि आपने पहले से टिकट लिया है या नहीं, रिजर्वेशन कराया है या नहीं। यहां सबकुछ आपके मूड पर डिपेंड करता है। गाड़ी में बैठ जाओ, समय के साथ सब मैनेज हो जाएगा। क्या हिन्दी मीडिया के साथ भी कुछ ऐसा ही है।
कोई सा भी कोर्स करो, कभी भी मन करे, कोई भी बैग्ग्राउंड है यहां आप आ सकते हो। ये तो अब हो गया है कि कहीं से आपको मीडिया में सालभर का डिप्लोमा या ऐसे ही किसी कोर्स कोर्स का सर्टिफिकेट आपके पास होनी चाहिए। और इसके लिए दुनिया भर के संस्थान पहले से तैयार बैठे हैं।...अजी इंस्टीच्यूट तो ऐसे भरे पड़े हैं जो परीक्षा के समय दरवाजा सटा देंगे और कहेंगे लिखो...मगर हल्ला मत करो और जब लगेगा कि वो गलत करवा रहें हैं तो आपसे साफ कहेंगे, भाई मीडिया में परिक्षा कोई बड़ी चीज नहीं है, असल चीज तो है कि आप चैनल या अखबारों में जाकर कैसा परफार्म करते हो, आपकी स्क्रिप्ट कैसी है, ये अलग बात है कि सालभर के कोर्स में आपसे एक दिन भी स्क्रिप्ट पर काम नहीं करवाया जाएगा। कईयों के तो मामू या चाचू पहले से ही मीडिया में जड़ जमाए हुए हैं और उन्हें गेट पास के रुप में एक डिग्री चाहिए बस। दो-तीन बंदों को पता चला कि मैं झारखंड से हूं तो सीधे मेरे पास आए और कहा कि- सुना है झारखंड में दस हजार रुपये में सर्टिफिकेट मिल जाता है, आप कुछ कीजिए। कोर्स तो आप भी कर ही रहे हैं, वैसा कुछ जुगाड़ बन गया तो आपको भी कहीं न कहीं सेट करा देंगे।....उपरी स्तर पर वो कुछ कोशिश करते भी नजर आएंगे। एकाध बार मामू से मिलवाया भी। हिन्दी मीडिया में काम करनेवालों की अकड़ का एक और नमूना देखिए- मिलते ही आपसे पूछेंगे कि तुम्हारी अंग्रेजी कैसी है, काम कर लोगे अंग्रेजी में। साहब जिस समय बंदा मीडिया का कोर्स कर रहा होता है अगर उसे पता चल जाए कि फलां काम सीखने से नौकरी मिल जाएगी तो अंग्रेजी क्या फ्रेंच भी सीख लेगा। मामू को पता है कि हिन्दी से एमए है, बैग्ग्राउंड सेंट बोरिस का ही रहा होगा। गरीब राज्य के बच्चे बचपन में जूट या बोरी बिछाकर पढ़ते हैं, दिल्ली में आकर उनकी इज्जत बनी रहे इसलिए मैं सेंट बोरिस लिखता हूं। सो कहेंगे कि दि टाइम्स में एक पोस्ट तो है जो रिक्र्यूटमेंट देखती है, मेरी क्लासमेट भी है। अगर अंग्रेजी बहुत अच्छी है तो आगे बात करते हैं। आप स्वाभाविक तौर पर पिछड़ जाएंगे। लेकिन मैं तो यहां भी जड़ जमाने के चक्कर में रहता। सीधे कहता-मामू आप बात कीजिए, बाकी हम सब देख लेंगे। बाद में मामू खबर भिजवाते कि बोलने का थोड़ा ठीक-ठीक अभ्यास करे, पता नहीं कब इंटरव्यू के लिए निकलना पड़े। उन्हें ये भी पता होता कि अपने तरफ का है तो जरुर घोड़ा को घोरा और श को स बोलता होगा।...साइड से लड़के को समझा देते, थोड़ी दूरी ही बनाए रखना इससे। है तो झारखंड से लेकिन दो साल से डीयू में है, पॉलिटिक्स में माहिर होगा। अपने तो सेट हो जाएगा और तुम बिना सर्टिफिकेट के लटक जाओगे। इधर जब मैं मामाडी की कुंडली पता करता तो इग्नू से बीए हैं, सिविल में जाना चाहते थे लेकिन भ्रष्टाचार के मारे गए ही नहीं, कुछ हटकर करना चाहते थे।
मीडिया में हर कोई आता भी इसलिए ही है कि वो कुछ हटकर करना चाहता है। क्योंकि दुनिया में कुछ भी हटकर करने की गुंजाइश मीडिया में ही है। जो बंदा सुबह-शाम ध्वज लगा रहा है, उतार रहा है वो भी और जो बंदा मुट्ठी भर तान देने से क्रांति आ जाने के सपने देखता है वो भी। एक ध्वज लगाते-लगाते बोर हो गया है तो दूसरा मुट्ठी तानते-तानते। सालभर हो गए, कहीं कुछ भी तो नहीं बदला, चलो मीडिया में ही कुछ किया जाए। कुछ नहीं तो समाज को देखने-समझने का अनुभव तो उनके पास है ही और मीडिया में काम करने के लिए इतना क्या कुछ कम है। उनसे तो बेहतर ही हैं जो भैंस बांधकर बगल में एसएससी या बैंकिग की तैयारी करने बैठे हैं।....अब उनको कौन बताए कि अपार्टमेंट के पांचवें तल्ले पर रात के तीन-तीन बजे तक लाइट जलती है वो भी मीडिया में आना चाहते हैं और व्यूजी कॉन्टेस्ट जीत चुकी पड़ोस की नीदिमा भी हमें फाइट देगी, सीधे एंकर बनेगी।
जो बंदा दो-तीन बार यूपीएसी में बैठ चुका है। पीटी निकाल चुका है लेकिन मेन्स में अटक जाता है वो भी हिन्दी मीडिया में जाने का मन बना चुका है। उसके दिमाग में बस बात बैठ गई है कि सब चुतियापा है, सिविल में कुछ भी नहीं रखा है। आइएस बन भी जाओगे तो क्या कर लोगे। ऑपरेशन पर गए हो और लौटे तो पता चला कि पत्नी गायब। इधर से फोन पर २० लाख की डिमांड हो रही है। अपने मन का कुछ कर नहीं सकते। मीडिया में आदमी कम से कम अपने मन का लिख-पढ़ तो सकता है।...और कौन कर लेगा किडनैप।
इधर तीन साल तक यूनिवर्सिटी में झोला ढोनेवाला हमारा रिसर्चर मीडिया में आने के लिए बेताब हुआ जा रहा है। पीएचडी होने को है लेकिन गाइड उससे पहले ही रिटायर हो गए। उनका जो कुछ भी बना-बनाया था सब खत्म हो गया। अब कोई नौकरी क्यों देगा। बेचारे ने कोशिश तो बहुत की लेकिन कुछ नहीं हो सका। अच्छा ही है, मीडिया में रहूंगा तो कम से कम अपडेट रहूंगा। वैसे भी सूर-कबीर पढ़ते और गेस्ट लेक्चरर बनकर पढ़ाते-पढ़ाते पक गया हूं। मेरी मां के शब्दों में इतना पढ़कर पढाएगा और कोई दूसरी नौकरी नहीं मिलेगी। जेनरेशन भी सुधरेगा, बच्चों को भी सोसाइटी में बताने में अच्छा लगेगा- माई डैड इज जर्नलिस्ट।
इसी तरह मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, रेलवे में अजमाकर हताश हुए लोगों की एक लम्बी फौज हिन्दी मीडिया में अपनी हैसियत बनाने आते हैं। सब पीछे की जिंदगी, करियर से उबे हुए, थके हुए, निराश और परेशान। लेकिन मीडिया को लेकर उत्साहित। मीडिया उनके लिए विरेचन का काम करता है। क्योंकि यहां क्या नहीं है, पैसा, पावर, स्टेटस, लाइफ और कुछ हटकर करने का मौका।
ये वो खेप होते हैं जो कुछ नहीं बन पाए तो हिन्दी मीडिया में आ गए। इनकी आस्था एक बार टूट चुकी है सही तैयारी करके, रगड़कर पढ़कर और लाल बत्ती औऱ कोलगेट के विज्ञापन में आने सपने देखकर। अब वो उतना ही कर पाएंगे जितने से वो पत्रकार होने की सैलरी पाते हैं। न तो चैनलों में कुछ एडवेंचरस करने के स्पेस हैं और न ही उनमें कुछ करने का ज़ज्बा। जो चल रहा है, जैसे चल रहा चलने दो।
चैनलों का ध्यान इस थकेली खेप पर चली जाती है। इसलिए वो हमेशा फ्रेश का डिमांड करती है। कभी-कभी ग्रेजुएशन कर रहे बच्चों को ही सीधे बिना कोर्स के रख लेती है। लेकिन तीन-चार महीने बाद या तो वो खुद छोड़ देते हैं या फिर चैनल खुद ही जबाब दे देते हैं कि आप चल नहीं पाएंगे। ऐसा इसलिए होता है कि चैनल फ्रेश का मतलब उम्र या क्लास से लगा लेती है जबकि ग्रेजुएशन के बच्चे भी साल, दो साल, तीन साल मेडिकल या इंजीनियरिंग में झक मारकर ग्रेजुएशन करने आते हैं और बाद में यहां भी कुछ कर नहीं पाते तो मीडिया में।...
इसलिए सीधे-सीधे ये मान लेना कि मीडिया में आकर लोग बोर हो जाते हैं गलत होगा। सच्चाई तो ये है कि मीडिया डितनी उदारता से सारे लोगों को बिना बैग्ग्राउंड की तफसील में गए ले लेता है, उतनी शिद्दत से उनके इन्टरेस्ट को बनाए रख नहीं पाता और लोग हाय,हाय करते हैं, डिप्रेशन में जाते हैं। तब उन्हें लगता है कि जो सोचकर मीडिया में आए थे वैसा कुछ भी नहीं हैं और इतिहास उन्हें बार-बार कोडे मारता है कि-तुम वहीं ठीक थे।
दलील- जो लोग हिन्दी मीडिया में पैशन के तौर पर काम कर रहे हैं, उन्हें सलाम। उनकी तरक्की होती रहे, देश का बच्चा-बच्चा उन्हें जाने और मन में उत्साह बना रहे कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं, इससे समाज पहले से बेहतर बन रहा है। उनपर मेरी पोस्ट का एक भी शब्द लागू नहीं होता।...दोस्त की शुभकामनाएं साथ है।
हिन्दी के मसले को साहित्य की दुनिया में भी देखेंगे, अभी कुछ आगे तक हिन्दी मीडिया को ही जाने दें।
हिन्दी मीडिया में खबरें बासी नहीं होंती, गरीब के घर चिकन सड़ता नहीं
Posted On 1:19 am by विनीत कुमार | 7 comments
तो आपने देखा कि कैसे हिन्दी मीडिया अंग्रेजी न्यूज एजेंसियों, रॉयटर या एपीटीएन से खबरों को उठाकर, उसका अनुवाद करके अपना लेबल चस्पा देते हैं। मीडिया की नौकरी करते हुए ऐसा हमसे खूब करवाया जाता रहा। एक प्रोग्राम आया करता था हमारे चैनल पर अराउंड द वर्ल्ड। उसमें अजीबोगरीब खबरें चलाये जाते थे, जिसका कि यहां के लोगों से कोई लेना-देना नहीं होता था और न ही उससे किसी तरह का जीएस ही मजबूत होता था। जिसके संदर्भ अपने से बिल्कुल नहीं मिलते थे। ऑफिस जाते ही चार-पांच देशों की ऐसी खबरें पकड़ा दी जाती और कहा जाता कि पैकेज बनाओ। खून के आंसू रोते थे हमलोग और रोज मनाते कि कब ये प्रोग्राम बंद हो। लेकिन बेअक्ल प्रोड्यूसर समझ ही नहीं पाता था कि इसका कोई मजसब ही नहीं है। जिस दिन प्रोग्राम बंद हुआ था, हम तीन-चार साथियों ने मंदिर मार्ग पर जमकर पराठे खाए थे।
अभी भी कोई बंदा किसी हिन्दी चैनल या अखबार में नौकरी के लिए जाए तो उसे इंटरनेट से एक-दो पन्ने प्रिंट आउट निकालकर दे दिया जाता है और फिर कहा जाता है इसकी खबर या पैकेज बनाओ। मजेदार, ऐसा कि एक-दो लाइन ही देख-पढ़कर आगे के लिए बंदा मचल जाए। एक बार मैंने भी एक बड़े अखबार के लिए डॉगी डिनर पर ऐसी खबर बनायी थी। वो पसे बार-बार कहेंगे कि खबर ऐसी लगे कि टची लगे, मन को छू जाए। आप उसे ऐसे समझो कि, खबर को इस तरह से लिखना है कि लगे नहीं कि वो अंग्रेजी का अनुवाद है, वहां से टीपा गया है। एकदम से परकाया प्रवेश लगे।॥और अखबार या चैनल आपपर रौब जमा जाए कि- देखिए कहां-कहां से खबरें हम खोज-खोजकर लाते हैं। इंडिया टीवी जब शराबी बकरे की खबर दिखाता है तो आप उसे गाली देते हो लेकिन सच कहूं ये खबर इंडिया टीवी की अपनी नहीं नहीं थी, किसी बड़े अंग्रेजी न्यूज एजेंसी से ली गयी थी।...यानि हिन्दी चैनल जब अंग्रेजी से कुछ लेते हैं तो ये भी नहीं सोच पाते कि क्या बेहतर है या हो सकता है। वो इस मानसिकता से अब बी ग्रसित हैं कि अंग्रेजी में है तो कुछ भी , बढिया ही होगा। ....और तारीफ देखिए जनाब कि जब कभी वो ऐसी खबरें लेते हैं तो एक बार सोर्स का नाम देना तक जरुरी नहीं समझते। यानि की ऑडिएंस को मूर्ख समझने वाली हिन्दी मीडिया कभी-कभी अपने को भी मुर्ख मान लेती है और अंग्रेजी ने जैसे जो कुछ रख दिया उसे मान लेती है। मैने कभी नहीं देखा कि इन अंग्रेजी न्यूज एंजेंसियों की खबरों की क्रॉस चेकिंग होती हो। चाहे वो खबर उड़ीसा या फिर हिन्दुस्तान के किसी दूसरे हिस्से की ही क्यों न हो।। आप इसे अंग्रेजी पर अतिरिक्त निर्भरता नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे। सेकेंडरी सोर्स के बूते कूदनेवाली हिन्दी मीडिया लोग के बीच जिस तरह से अकड़ कर खड़ी होती है और एक गांव का आदमी चैनल के रिपोर्टर को तोप समझ बैठता है, यह रिपोर्टर के लिए भले ही सुखद क्षण होते होगें लेकिन कम पढे-लिखे समाज को और अधिक जाहिल बनाने में चैनल भी जिम्मेवार हो जाता है।
आपने कभी किसी कस्बे या गांव के लोगों के बीच पॉलिटिक्स पर बहस और दावे करते हुए सुना है। जब वो बात करते हैं और सामने वाला बंदा बात नहीं मानता तो हवाला देता है कि क्या फलां चैनल झूठ बोलेगा। अगर आप उसी चैनल से हैं जिस चैनल का बंदे ने नाम लिया है तब तो आप फुलकर कुप्पा हो जाएंगे कि भई ये है खबर का असर।॥और उंचे ओहदे पर हैं तो आकर तुरंत चलाएंगे फ्लैश- खबर का असर। लेकिन कभी इस एंगिल से सोचिए कि कितना भरोसा करती है ऑडिएंस आप पर औ कितनी बड़ी भारी जिम्मेवारी आप पर लाद देती है, ढाई-तीन सौ रुपये की झिंग्गा ल॥ ला लगाकर। उस बंदे को क्या पता कि जिस खबर को वो देख रहा है उसे बनानेवाला न जाने कितनी बार डिक्शनरी पलटकर हिन्दी तर्जुमा किया है, न जाने किस अखबार की कतरन को न्यूज में ढाला है, न जाने किस बेबसाइट से चेपा है। इसलिए आप देखेंगे कि कभी-कभी चैनलों पर जो खबरें आती हैं उसकी हिन्दी भूली-भटकी हिन्दी होती है। जैसे किसी बाहर के आदमी को दिल्ली के मूलचंद फ्लाई ओवर की सारी सड़के एक सी लगती है और मरीज को लगता है कि सारे रास्ते एम्स को जाते हैं। ठीक उसी तरह हिन्दी मीडिया के कुछ शब्द हमेशा हवा में तैरते रहते हैं। आपको जब जरुरत पड़े उसे उठा लें।
ऐसे में अगर आप चैनल की खबरों पर गौर करें तो आप देखेंगे कि सारी चीजें चैनल के पास तैयार होतीं हैं- रिपोर्टर, ओबी, एंकर, बाइट, पैकेज, शब्द, सिर्फ घटनाएं होनी बाकी होती है। इधर हत्या हुई नहीं कि खबर तैयार। ऑडिएंस को चैनल के प्रति अपार श्रद्धा उमड़ जाता है कि वाह, क्या तेजी है, क्या चुस्ती है। उसे क्या पता कि दिल्ली की अभ्यस्त दुनिया में सारी चीजें पहले से कटी होती हैं बस छौंक लगानी होती है, मामला चाहे शाही पनीर का हो या फिर चाउमिन का। खबरें भी ऐसे ही तैयार होती है। विश्वास न हो तो आप किसी पैकेज को गौर से देखें और नोट करें कि इसके किपने फुटेज बासी यानि साल, दो साल या छ महीने पहले के हैं। अब रोज-रोज कहीं कोई शूट करने नहीं जाता, नहीं हुआ तो बेबसाइट से कुछ ताजा माल ले लो।
इन सबके बावजूद भी हिन्दी मीडिया ताल ठोकने के लिए तैयार है। क्योंकि मीडिया है ही ऐसी चीज कि इसमें चाहे लाख गड़बड़ी हो, सामाजिक जागरुकता के कुछ हिस्से निकल ही आते हैं और हिन्दी मीडिया को दावे करने के लिए इतना पर्याप्त है।
आगे पढिए साहित्य की दुनिया में चेपा-चेपी और हिन्दी-अंग्रेजी
हिन्दी समाज भले ही इस बात को ताल ठोककर हेकड़ी भरता रहे कि संवेदना के मामले में वो अंग्रेजी से आगे है। भाषा की बात आने पर अंग्रेजीवालों का मुंह नोचने पर आमादा हो आए, हिन्दी को लेकर कितना सीरियस है इस पर बात न करके अंग्रेजी के नाम पर कितना जल्दी खून खौल जाए में अपना बडप्पन समझता है। लेकिन सच्चाई यही है कि इतने प्रयासों के बावजूद हिन्दी के लोग अंग्रेजी के मुकाबले बहुत पीछे हैं।
अपनी समझ से शुरु से ही मैं मानकर चलता हूं कि जब कभी भी हम भाषा पर विचार करते हैं तो सवाल सिर्फ अभिव्यक्ति में आए फर्क को लेकर नहीं होता है बल्कि कंटेंट और संदर्भ भी पूरी तरह बदल जाते हैं। यहां अगर बात अंग्रेजी और हिन्दी को ध्यान में रखकर की जाए तो यह मामला साहित्य, मीडिया और टीवी चैनलों में साफ दिखाई देता है। इस बात पर मुझे कुछ भी कहने की जरुरत महसूस इसलिए हुई कि मेरी पोस्ट पर एक साथी ने लिखा कि आप बताएं- देश में क्या सिर्फ अंग्रेजीवाले सीरियस न्यूज देखना चाहते हैं। साथ विकास का सवाल इस मामले में था कि हिन्दी चनलों को जब भी कहा जाता है कि ये सांप-सपेरों या फिर जलवों में फंसकर रह गए हैं तो इनका सीधा जबाव होता है कि दर्शक जो देखना चाह रही है वही हम दिखा रहे हैं। विकास का कहना बिल्कुल जायज है कि अगर अंग्रेजी चैनलों में अनर्गल चीजें कम आतीं हैं तो इसका मतलब तो यही हुआ न कि अंग्रेजी के दर्शक हार्ड कोर सीरियस न्यूज देखना चाहते हैं।
हिन्दी मीडिया और साहित्य दोनों को लेकर बात करें तो जो मेरी अपनी समझदारी बनती है वो यह कि जो बंदा अंग्रेजी में न्यूज देख-समझ रहा है, उससे इस बात की उम्मीद की जाती है कि वो केवल भाषा ही नहीं समझ रहा है बल्कि मुद्दों के स्तर पर भी मैच्योर है, समझदार है, पढ़ा-लिखा है। ये वो दर्शक है जिसे कि आप कुछ भी दिखा देंगे और वो देख लेगी ऐसा नहीं है, वो सीधे आपके चैनल को छोड़कर कहीं और चली जाएगी। इसलिए अंग्रेजी चैनल खबरों या पैकेजों को चलाते समय इस बात का ध्यान रखती है कि उसका ऑडिएंस भाषा के साथ-साथ कटेंट को लेकर भी सजग है। जबकि हिन्दी मीडिया के साथ बात बिल्कुल दूसरी है। जो हिन्दी जानता है, समझता है उससे इस बात की अपेक्षा नहीं होती कि वो मुद्दे को लेकर भी उतना ही समझदार है, वो सारे मसलों को उतनी ही सजींदगी से समझता है। ये वो दर्शक है जो अभी-अभी सूचना की दुनिया से जुड़ा है या फिर पहले भी जुड़ा गै तो भी शिक्षित हो जरुरी नहीं। इनमें नेगलेंस क्षमता नहीं होती, इन्हें जो भी दिखा दो, देश लेगी। यानि एक स्तर पर हिन्दी मीडिया मानकर चलती है कि हमारी ऑडिएंस मूर्ख हैं, इम्मैच्योर है। ऐसे मैं अगर बात ईमानदारी की जाए तो कायदे से हिन्दी मीडिया को अपनी ऑडिएंस को ज्यादा समझदार बनाना चाहिए, उसे मैच्योर बनाए लेकिन मीडिया अगर ऐसा करने लगे तो फिर उसका काम तो हो गया। ये लम्बी प्रक्रिया है, बहुत पेशेंस का काम है। और फिर अगर ऑडिएंस उतनी समझदार हो भी गई तो फिर इनका कौन-सा भला होगा, उल्टे इनका नुकसान ही होगा। वो आगे से इनके अधकचरे ज्ञान को, खबरों को, जल्दीबाजी में बटोरे गए आंकड़ों और बाइटों पर भरोसा करना छोड़ देगी। वो समझने लगेगी कि आधे से ज्यादा खबर अंग्रेजी तैनलों, बेबसाइटों और न्यूज एजेंसियों की कॉपी है, उनका सीधे-सीधे अनुवाद हुआ है। अगर ऑरिजिनल कॉपी हाथ लग जाए तो अंग्रेजी बहुत अच्छी न होने पर भी बात ज्यादा समझ में आएगी। जिस दिन हिन्दी मीडिया की ऑडिएंस समझदार हो गई उस दिन हिन्दी मीडिया के दावों की जो कि सीना तानकर कहते-फिरके हैं कि हमने खोजा, हमने दिखाया की हवा निकाल देंगे। उस दिन उन्दें हिन्दी चैनलों की स्टोरी पायरेटेड लगने लगेगी।
अब इसी बात का कोई विरोध करे और बताए कि हिन्दी मीडिया में दोयम दर्जे का काम होता है तो हिन्दी भक्तों को सीधा लगेगा कि ऐसा लिखनेवाले बंदे का हाथ तत्काल काट लिए जाएं। वो सीधा-सीधा उसे अंग्रेजी का पिछलग्गू समझ बैठेगा। जबकि गड़बड़ी कहां है, आप सब जानते हैं और ये भी जान रहे हैं कि यहां विरोध भाषा को लेकर नहीं है। बल्कि गड़बड़ी इस बात को लेकर है कि हिन्दी मीडिया अपने होमवर्क को लेकर अंग्रेजी चैनलों से बहुत पीछे है। हिन्दी का रिसर्च वर्क बहुत कमजोर है। वो किसी भी असर को घटना के तौर पर देखना-समझना चाहती है जबकि असर को रिसर्च करते हुए देखने की जरुरत होती है। इसमें भाषा का कहीं कोई दोष नहीं है और न ही हिन्दी में शब्दों की कोई कमी है। लेकिन आप खुद महसूस करेंगे कि हिन्दी पट्टी, मान लीजिए बनारस में कोई घटना होती है तो उसकी कवरेज आमतौर पर किसी हिन्दी अखबार या चैनलों के मुकाबले अंग्रेजी के चैनलों, न्यूज एजेंसियों में ज्यादा बेहतर तरीके से आती है। क्यों, क्योंकि अंग्रेजी चैनलों को इस बात का एहसास है कि हमारी ऑडिएंस रेशनल है, वो ऐसे सिर्फ खबरों से नहीं मानने वाली है, उसे सारी चीजें बड़ी लॉजिकल तरीके से समझानी होगी। जबकि हिन्दी चैनलों के सामने दूसरे तरह की सिरदर्दी है, उससे लोगों के बीच सबसे पहले जाने की हड़बड़ी है। उसके सामने अभी भी बाजार की प्रायरिटी अंग्रेजी के मुकाबले ज्यादा है, वो अभी भी अपने को जनता के सामने स्थापित नहीं कर पायी है। कोई चैनल चार-पांच सालों से नंबर वन पर है तो भी लगातार डर बना हुआ है कि पता नहीं कब ताज छिन जाए। इसलिए एक घबरायी हुई, बौखलाई हुई स्थिति में जो खबरें मिलती हैं हमारे सामने परोस दी जाती है, बिना किसी रिसर्च के, बिना ऑडिएंस के इश्यू को ध्यान करके। इसलिए आप देखेंगे कि
हिन्दी मीडिया रामनामी बेचनेवाली खबर और रंडी की दलाली करनेवाली खबरों में फर्क नहीं कर पाती।।।
आगे पढ़िए, साहित्य के स्तर पर हिन्दी और अंग्रेजी

