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अंग्रेजी प्रकाशकों की नकलचेपी करते नए-नए फैशनेबुल हुए हिन्दी प्रकाशक लोकार्पण( बुक रिलीज) पर जितने पैसे खर्च कर रहे हैं, संजनाजी की पूरी दूकान में उस लोकार्पण में हाईटी पर खर्च किए जानेवाली रकम जितनी भी पूंजी नहीं लगी होगी..न तो उन्हें आक्सफोर्ड बुक सेंटर या इंडिया हैबिटेट, इंडिया इंटरनेशनल की सुरक्षा मिली है..इनकी न तो एफबी पर पेज है और न ही बाकी प्रकाशकों की तरह लाइक-कमेंट में अपना बाजार देख पाती हैं. जो है, सब धरातल पर, कुछ भी वर्चुअल नहीं.
आए दिन मंडी हाउस में कमाई का जरिया ढूंढती पुलिस और मंडराते ठेकेदारों के निशाने पर होती हैं. उन्हें हमेशा इस बात का डर होता है कि एक पेड़ के नीचे चंद फैली किताबें, स्कूटी पर टंगा थैला, सीट पर फैली बिल-बुक, कैल्कुलेटर भर से दूकान की शक्ल लेती ये जगह छिनी जा सकती है, उनकी इस दूकान को तहस-नहस किया जा सकता है. लेकिन
संजनाजी( संजना तिवारी ) जिस आत्मीयता से अपने पाठक-ग्राहकों से बात करती हैं, आवाज में जितनी स्थिरता और यकीं है, वो न बड़े-बड़े प्रकाशकों के मालिक, उनकी सेल्स टीम और न ही लेखकों को फ्लाईओवर सपने दिखाते डिलिंग एजेंट में कभी दिखाई दिए. संजनाजी की हिन्दी और उनकी भाषा अगर आप और हम जैसे लोग जो इसकी कमाई खाते हैं, पूरा कारोबार इसी हिन्दी पर टिका है, शर्म से सिर झुका लेंगे. दस मिनट बातचीत कर लेंगे तो आपको अंदाजा लग जाएगा कि हम हिन्दी के लोग जिन क्षेत्रीय भाषाओं को बचाने और हिन्दी का झंड़ा बुलंद करने की ऐंठन में रहते हैं, उसी अकड़ के बीच से हम भाषा के स्तर पर कितने तंग हो गए हैं.
हमने संजनाजी की शॉप पर करीब बीस मिनट बिताए जिनसे से दस मिनट उनकी बातें गौर से सुनता रहा. मैं उन्हें पिछले चौदह सालों से जानता हूं..सो कई पुरानी बातें भी जानना चाह रहा था. इस दस मिनट में उन्होंने जितनी बातें की, मैंने नोट किया कि कम से कम पच्चीस ऐसे शब्द हैं जिसका इस्तेमाल मैंने पिछले पांच-छह सालों से किया ही नहीं. जिनमे दस-बारह तो ऐसे हैं जिन्हें कि एक से एक हिन्दी सेमिनारों और पुस्तक परिचर्चा तक में नहीं सुना. हिन्दी बोलते-बरतते, उसी से रोटी-पानी का जुगाड़ करते हुए हम उससे कितने दूर होते चले गए हैं. इतना दूर कि जब वो बोल रहीं थी तो लग रहा था सामने नित्यानंद तिवारी की क्लास का छात्र खड़ा हो. इतनी सधी हुई आवाज में हिन्दी के शब्दों का उच्चारण, ठहरकर उसका चयन अच्छे से अच्छे हिन्दी के शिक्षकों में दिखाई नहीं देता. बात-बात में शमशेर की कविता की पंक्तियां, आषाढ़ का एक दिन के दृश्य की चर्चा..
संजनाजी सिर्फ किताबें बेचती नहीं हैं. उन किताबों में छपे शब्दों, छिपे भावों को जीती हैं. यकीन न हो तो आप जाकर कोई भी किताब उठाकर उसके बारे में पूछिएगा. उस किताब का हिन्दी साहित्य में महत्व और उसके लिखे जाने की प्रासंगिकता पर जिस गंभीरता से बात करेंगी, आपको सहज अंदाजा लग जाएगा कि आप आलोचना के नाम पर फर्जीवाडे और प्रायोजित दुनिया से निकलकर एक ऐसी जगह पर आ पहुंचे हैं जहां किताब के बारे में प्रकाशक को खुश करने या बिक्री बढ़ाने के लिए कोई उसके बारे में नहीं कह रहा है बल्कि रचनाकार की रचना की उस जमीन तक पहुंचाने के लिए कह रहा जिसकी जिम्मेदारी उस हर शख्स को है, जिसके हाथ से वो पाठ, वो रचना गुजरती है.
संजनाजी किताबों को पाठकों के हाथ में थमाते हुए उसके प्रति गहरी संवेदना और लगाव भी सौंपने का काम कर रही हैं. वो उस किताब के बारे में इतना कुछ बता देती हैं कि यदि आप राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र नहीं है जिसे कि सिलेबस की मांग के तहत खरीदनी ही हैं तो आप मन भी बदल सकता है कि रहने देते हैं जब मूल बातें जान ही लीं..ये भी संभव है कि उन्हें सुनने के बाद सिर्फ अपने लिए नहीं, अपने उन तमाम नजदीकी लोगों के लिए एक प्रति खरीदना चाहें जिनका साहित्य के प्रति थोड़ा भी लगाव है.
संजनाजी के साथ और उनकी इस दूकान के आसपास जितनी देर तक रहा, एक मिनट खाली बैठा नहीं देखा..हमसे भी वो एक तरफ बात करती जा रही थीं तो दूसरी तरफ मेरे दोस्त की खरीदी किताबों के लिए बिल बना रहीं थीं. एक के बाद एक पाठक-ग्राहक उनके पास आते रहे.
आज से चौदह साल पहले जब उनसे श्रीराम सेंटर की बुक शॉप पर पहली मुलाकात से लेकर ज्ञानपीठ प्रकाशन, दरियागंज की मुलाकात, इतनी सारे संदर्भ और मुद्दे थे कि दो घंटे भी बैठ जाता तो बातें खत्म नहीं होती..लेकिन लगातार आ रहे लोगों को देखकर खुद ही थोड़ा बुरा लग रहा था कि ये इनके काम का समय है...शाम को ही ज्यादा लोग आते हैं तो विदा लिया.
पूंजी की कमी और पुलिस के डर से इस अस्थायी दूकान में संजनाजी बहुत ज्यादा किताबें नहीं रखतीं..ज्यादातर वो किताबें जिन्हें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लोग बतौर पाठ्य पुस्तक या अपने मतलब के लिए जरुरी मानते हैं..लेकिन संजनाजी किताबें खरीदने लगभग रोज दरियागंज जाती हैं. उनके पाठक-ग्राहक उनसे फोन पर किताब का नाम लिखवा देते हैं और वो उन्हें अगले दिन उपलब्ध करा देतीं हैं.
...अच्छा संजनाजी, अभी आपके काम का समय है. किसी दिन दोपहर के वक्त आता हूं जब कम लोग होंगे..मेरी भी एक किताब आनेवाली है, लप्रेक की..लेकर आउंगा छपने पर..अच्छा वो जो रवीश की इश्क में शहर होना है, आयी है, उसी श्रृंखला में ? हां, ठीक है. वैसे मैंने आपकी मंडी में मीडिया भी रखी थी..जरूर आइएगा.
आप जो मुझसे और बाकी लोगों से किताब कहां मिलेगी की बात इनबॉक्स किया करते हैं न, मैं आपको इनबॉक्स में इनका नंबर दूंगा, आप अपनी जरुरत की किताबें इनसे खरदीएगा..आपको किताब के अलावा भी बहुत कुछ पढ़ने-समझने को मिलेगा.
चलते-चलते मैंने संजनाजी की इस अस्थायी दूकान की तरफ एक बार फिर से नजर डाली. स्कूटी की हैंडल में टंगा उनका बैग औरसीट पर बिल बुक और कैल्कुलेटर.. बार-बार एक भी चीज कचोट रही थी- दिनभर में उन्हें कितनी बार बैग हटाकर दूसरी स्कूटी या बाईक की हैंडल में टांगना पड़ता होगा और कितनी बार सीट से ये चीजें उठानी पड़ती होगी..दिल्ली की कितनी स्कूटी-बाईक थोड़े वक्त के लिए संजनाजी के लिए कैश काउंटर बनती होंगी. 
‪#‎दरबदरदिल्ली‬
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स्त्री छवि की पुश-बैक

Posted On 10:40 am by विनीत कुमार | 1 comments

"यू ऑर श्यो अबाउट दिस ? आय एम श्यो अबाउट अस एंड आइ डोन्ट वॉन्ट टू हाइड एनिथिंग मोर"…
ऑनलाइन शॉपिंग वेंचर मिन्त्रा डॉट कॉम ने बोल्ड इज बियूटिफुल के तहत लेसबियन पर आधारित देश का पहला विज्ञापन जारी किया तो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर ये वीडियो वायरल हो गई. ये स्वाभाविक ही था क्योंकि एक तरफ दुनियाभर में समलैंगिकता को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण से बहस चल रही हो और भारत जैसे देश में बहस का आधार नैतिकता और संस्कृति रही हो वहां ये विज्ञापन इस संबंध को बेहद स्वाभाविक और साहसिक तरीके से डिफेंड करता है. लिहाजा, एक-एक करके इस पर देश के प्रमुख समाचारपत्रों, वेबसाइट ने फीचर प्रकाशित किए.

इस विज्ञापन में घर से बाहर रहनेवाली जिन दो स्त्री के आपसी रिश्ते को बेहद खुलेपन और सामाजिक रुप से स्वीकार करने की साहस तक दिखाया गया है, इस पर दूसरे कई एंगिल से बहस हो सकती है लेकिन दो अलग-अलग पृष्ठभूमि से आनेवाली स्त्री के पारिवारिक पसंद-नापसंद को ध्यान में रखकर संतुलन बनाने की जो कोशिशें दिखाई जाती हैं, वो बेहद दिलचस्प है. आपको पूरे प्रसंग में चेतन भगत के लिखे उपन्यास और उस पर बनी फिल्म टू स्टेट्स का ध्यान हो आएगा.. विज्ञापन में अपनी मेट की इच्छा और पसंद पर शॉर्ट हेयर कट रखनेवाली महिला उसकी मां के आगे उसी की तरह दिखने की कोशिश में उसका कुर्ता  पहनती है, उनके लिए कॉफी बनाने की बात करती है..

लेकिन हर मोर्चे पर उनके नापसंद किए जाने की संभावना के बाद निराश हो जाती है..और यही वो बिन्दु है जहां माता-पिता के इन चीजों के पसंद-नापसंद किए जाने की संभावना के बीच इस समलैंगिक रिश्ते, बोल्ड इज बियूटिफुल और तब मिन्त्रा डॉट कॉम की प्लेसिंग की जाती है..यानी महिलाओं की ऐसी दुनिया जो फैशन के स्तर पर चुनाव करते वक्त भले ही अपने या अपनी मेट के माता-पिता की पसंद का ख्याल करती हो लेकिन जिंदगी के फैसले लेते वक्त  खुद की और एक-दूसरे को अंतिम सत्य मानती हैं. यहां आकर मिन्त्रा के प्रोडक्ट से ज्यादा उसे इस्तेमाल करनेवाले चरित्र यूनिक दिखाए जाते हैं. इस विश्वास के साथ कि यदि दर्शक ने इस छवि को अपना लिया तो प्रोडक्ट उसके पीछे-पीछे अपने आप चले आएंगे. 

गौर करें तो समलैंगिकता के इस सवाल से थोड़ा हटकर पिछले साल के कुछ उन विज्ञापनों पर गौर करें तो दूरदर्शन के आदिम विज्ञापनों ने आधुनिक स्त्री, कुशल और स्मार्ट पत्नी-बहू और मां की जो छवि स्थिर कर दिए थे, उन्हें ध्वस्त करते नजर आते हैं. दूरदर्शन पर सालों से प्रसारित विज्ञापनों में वो स्त्री आधुनिक और कुशल है जो पति की शर्ट की कॉलर पर घिसनेवाली टिकिया में अठन्नी-सिक्के बचा लेती है, छुन्नू-मुन्नू के धब्बे लगे कपड़े के दाग छुड़ाना जानती हैं, रोहन को ऐसे साबुन से नहलाती है कि कभी बीमार नहीं होता. ऐसी हेल्थड्रिंक देती हैं कि हमेशा टॉप करता है, गर्लचाइल्ड के लिए ऐसी सेनेटरी नैपकिन चुनती है कि वो दिनभर टेंशन फ्री रहती हैं..अादि-आदि.


इस हिसाब से देखें तो पिछले कुछ सालों से प्रसारित विज्ञापनों ने तथाकथित इन आधुनिक  लेकिन स्त्रियों को घर के कामकाज से मुक्त एक ऐसी दुनिया की ओर ले जाते हैं जहां वो चूल्हें-चौके, साफ-सफाई के काम से मुक्त है. वो पत्नी के पहले बॉस है और पति उसके मातहत काम करता है( संदर्भ एयरटेल), वो ऐसा जीवनसाथी चुनती है कि उसके साथ-साथ पिछली शादी से हुई पांच-छह साल की बेटी को भी अपना लेता है( तनिष्क जूलरी), वो आत्मविश्वास से इतनी लवरेज है कि एक दिन ऐसे मुकाम पर पहुंचेगा कि होनेवाला जीवनसाथी खुद चलकर आएगा( फेयर एंड लवली). ऐसे विज्ञापनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जहां स्त्रियां खुलेपन और हैसियत के मामले में बहुत आगे जा चुकी है  जिसे सामाजिक स्तर पर हासिल करने में पता नहीं कितने साल लग जाएं.

दिलचस्प है कि ऐसे विज्ञापनों की जब खेप आती है तो विज्ञापन जिसे बाजार की चालबाजी कहकर नजरअंदाज किया जाता रहा है,  उसे खींचकर विमर्श की चौखट तक लाया जाता है. इन पर एक के बाद एक स्त्री विमर्श और सशक्तिकरण के फॉर्मूले फिट किए जाते हैं और इस सुकून के साथ निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है कि ऐसे विज्ञापनों से आनेवाले समय में सामाजिक स्तर पर भी स्त्रियों की स्थिति मजबूत होगी. विज्ञापन में जो स्त्री छवि एक्सक्लूसिव है, वो असल जिंदगी में दिखने लगेगा और तब इसके तार स्वाभाविक रुप से लोकतंत्र के साथ जुड़ जाएंगे. लेकिन 


विज्ञापन में स्त्री छवि एकरेखीय और हमेशा आगे की तरफ नहीं बढ़ती. वो बार-बार पीछे की ओर लौटती है. इतना पीछे कि समलैंगिक संबंध को सहज माननेवाली स्त्री के बरक्स ऐसी स्त्री छवि शामिल की जाती है जो न केवल टिपिकल अरेंज मैरिज में यकीन रखती हैं बल्कि अपने ही जीवनसाथी के साथ उस संकोच के साथ पेश आती है जिससे भारतीय सिनेमा के दर्शक छोड़ न,कोई देख लेगा..क्या कर रहे हो, मां-बाबूजी आते ही होंगे जैसे संवादों और सुहागरात के बिस्तर से उतरकर धरती में समा जानेवाले शर्मीलेपन से बड़ी मुश्किल से मुक्त हुआ है.
कोका कोला की विदाई सीरिज विज्ञापन में आलिया भट्ट जो कि अपनी अब तक की सारी फिल्मों में बिंदास और खुलेपन के लिए टीनएजर्स के बीच पॉपुलर है, एक ऐसी ब्याहाता की छवि लिए शामिल है जो अपने पति के साथ तभी सहज हो पाती है जब वो उसकी पसंद-नापसंद जाहिर करने की बात करता है..और तब एयरटेल,तनिष्क,फेयर एंड लवली और अब मिन्त्रा ने विज्ञापन में स्त्री की जो छवि बनाई, उससे धड़ाम से गिरकर वहां पहुंचती है जहां "पिया वही जो कोक मन भाए" की जमीन तैयार है. अब आप कर लीजिए विज्ञापन के जरिए स्त्री की खुलती नई दुनिया की बात.
मूलतः प्रकाशित- लाइव इंडिया पत्रिका
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प्रिया और टुम्पा जिसे शायद ये भी नहीं पता कि एक्स्ट्रा को कैरिकुलर एक्टिविटी किसे कहते हैं और यदि यही आवाज किसी कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ रही बच्ची की होती तो आज कहां होती ? उसने शायद ही कभी डांस या सिंगिंग फ्लोर का नाम सुना हो..उसके पास जो हुनर है, उसका रास्ता सीधे सारेगमप लिटिल चैम्प्स की तरफ खुलता है. वो बस इतना जानती है कि दरी-चटाई पर बैठी होने के बीच उनकी मैम गाने कहेगी तो पहले थोड़ा लजाते-शर्माते हुए लेकिन फिर बस गा देना है.
बृजकिशोर नेत्रहीन बालिका विद्यालय,रांची में पढ़ाई कर रही टुम्पा जिसकी यूट्यूब पर मूल वीडियो की दो लाख से भी ज्यादा हिट्स मिल चुके हैं और न्यूज चैनलों और अन्य वीडियो को शामिल कर लें तो पांच लाख से भी ज्यादा. आप रियलिटी शो में शामिल किसी बच्चे की वीडियो हिट्स पर गौर करें, शायद ही किसी की हिट्स महज तीन-चार दिनों में इतनी होगी.
प्रिया जो कि पूर्णिया, बिहार में स्कूली पढ़ाई कर रही है..बेंच क्या ढंग की दरी-चटाई भी नहीं है बैठने के लिए..टेलीविजन के रियलिटी शो के बच्चे की तरह बोलने में होशियार नहीं है. फर्राटेदार अंग्रेजी क्या हिन्दी तक ट्यून्ड नहीं है कि गायन भले ही बी ग्रेड की हो लेकिन भाषणबाजी में नंबर वन..वो लजाती है, मासूमियत और एनोसेंसी उससी पूरी बॉडी लैंग्वेज में है. अभी कुछ ही घंटे पहले उसकी वीडियो अपलोड हुई और हिट्स तेजी से बढ़ रहे हैं.
यूट्यूब पर इन दोनों को जो लोग भी सुन रहे हैं और किसी भी रियलिटी शो की वोट से कई गुना ज्यादा हिट्स मिल रहे हैं, उसके लिए किसी ने बार-बार टीवी स्क्रीन पर अपील नहीं की है. रियलिटी शो के आयोजक से लेकर जजेज और खुद प्रतिभागी की पूरी मशीनरी इसके पीछे नहीं लगी है. हम इन्हें सुन रहे हैं क्योंकि ये आवाज कला और दैत्याकार बाजार व्यवस्था के बीच सेंध लगा रही है. ये आवाज ये साफ-साफ इशारा कर रही है कि गायन की जो आखिरी उपलब्धि रियलिटी शो में सेलेक्ट हो जाना हो गया है जिसके पीछे देश के लाखों बच्चे सहित उनके गार्जियन बेतहाशा भाग रहे हैं..जिसके पीछे ट्रेनिंग सेंटर के नाम पर सैंकड़ों दूकानें खुल गई हैं, कला की दुनिया उससे इतर भी आबाद है. ये दोनों और इनकी आवाज एक ही साथ उन कई मान्यताओं को ध्वस्त करती हैं जिसकी फेर में पड़कर पांच-छह साल के बाकी बच्चे तनाव और डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं.
प्रिया और टुम्पा की इस कला के पीछे स्कूल का कोई दावा नहीं है. स्वाभाविक भी है कि जो स्कूल बैठने तक ही बेंच मुहैया नहीं करा सकता, वो किस मुंह से क्रेडिट ले..लेकिन सोचिए जरा उन पब्लिक स्कूलों के बारे में जहां इससे कई गुना कमतर बच्चे किसी शो, प्रतियोगिता के लिए चुन लिए जाते हैं तो उनके नाम पर वो अपनी कैसी ब्रांडिंग करते हैं, फीस बढ़ाने से लेकर आयोजकों से गलबईयां करके कैसे अपना ढांचा मजबूत करते हैं कि आगे चलकर प्रतिभाओं के लिए उसी स्कूल में पढ़ना मुश्किल हो जाता है.
इन ऑर्गेनिक हुनरमंदों का( ग्राम्शी के ऑर्गेनिक इन्टलेक्चुअल से साभार) सोशल मीडिया जैसे मंच पर जहां एक समय के बाद रिश्तेदारियां और रैकेट काम नहीं करते, प्रोत्साहित करना बेहद जरूरी है जिससे कि हम न केवल इन प्रतिभाओं को बल्कि धंधेबाजों के बीच बुरी तरह फंसी प्रतिभाओं का आत्मविश्वास वापस ला सकें..ये मंच भी आखिर काफी हद तक लोकप्रियता का लोकतंत्र तो रचता ही है.
प्रिया को सुनने के लिए चटकाएं-https://www.youtube.com/watch?v=aLQmcVFEWgM
टुम्पा को सुनने के लिए चटकाएं- https://www.youtube.com/watch?v=zOl6N0TTAjA
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आप मेरी बात पर यकीन मत कीजिए लेकिन सच तो यही है कि मध्यप्रदेश का ये बेशर्म मंत्री टेक्नीकली प्रधानसेवक का लघु संस्करण है. वो आजतक के पत्रकार अक्षय सिंह की मौत के सवाल पर बेशर्मी से सिर्फ ये नहीं कह रहा है कि हमसे बड़ा पत्रकार कौन है बल्कि साथ में ये भी बता रहा है कि पत्रकारों को हम क्या समझते हैं, हमारे सामने औकात क्या है ?
याद कीजिए, प्रधानमंत्री का पत्रकारों के साथ दीवाली मिलन एपीसोड और जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी की प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी ट्विट. सुधीर चौधरी ने जिस अंदाज में प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी की बात ट्वीट की और फर्स्ट ट्विट का दावा पेश किया, क्या उसमे मध्यप्रदेश के इस बेशर्मी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की बेशर्मी का एक हिस्सा शामिल नहीं है. जी न्यूज ने इस मिलन की जो कवरेज दी, उसमे ये बात भी शामिल थी कि ये चैनल और संपादक की बड़ी उपलब्धि है.
आज आप इस मंत्री पर शब्दों के कोडे बरसा सकते हैं, एक के बाद एक चैनल माइक तान सकते हैं लेकिन एक मंत्री को इस बेशर्मी तक पहुंचने में क्या सुधीर चौधरी जैसे दर्जनों मीडियाकर्मियों ने खाद-पानी का काम नहीं किया ? आपने दीवाली मिलन के दौरान पत्रकारों के आगे नरेन्द्र मोदी की बॉडी लैंग्वेज पर गौर किया होगा..साफ महसूस कर रहे होंगे कि मैं सिर्फ इस देश को ही नहीं, देश के इन संपादकों-पत्रकारों को भी चलाता हूं जिसका भरपूर प्रमाण आगे पत्रकारों ने दे भी दिया.
नेताओं,मंत्रियों के साथ चाय-बीड़ी करने और मिलन को उपलब्धि बताने की मीडियाकर्मियों के बीच जो आपाधापी मची रहती है, वो इनके सामने ऐसे पेश आते हैं कि कैलाश विजयवर्गीय क्या, किसी भी दूसरे नेता-मंत्री को ये आत्मविश्वास पैदा हो जाए कि उनके आगे पत्रकार-संपादक क्या हैं ?
मैं कल रात जयपुर में चल रहे दो दिवसीय जर्नलिज्म टॉक से होकर आया हूं. मैंने बहुत करीब से देखा कि सेशन के दौरान आम आदमी पार्टी के राघव चढ्ढा से लोगों ने सवाल किए, सेशन के बाद कुछ मीडियाकर्मी हाथ मिलाने-फोटो खिंचाने, कुछ देर साथ खड़े रहने के लिए मरे जा रहे थे. सवाल इसका है ही नहीं कि कौन नेता सही है या कौन गलत लेकिन पेशे का हवाला देकर आप उनसे दोस्ती गांठेंगे तो वो ऐसी बेशर्मी करने का दुस्साहस बेहद स्वाभाविक है.

दूसरी बात, आप चले जाइए मीडिया की नौकरी के किसी इंटरव्यू में. बातचीत की शुरुआत ही इस सिरे से होती है कि आप किस नेता, किस मंत्री को पर्सनली जानते हो.. ये पर्सनली जानना साथ में चाय-शराब से आगे तक की भी हो सकती है. मैं कई दिग्गज पत्रकारों से मिलता हूं. दस मिनट की मुलाकात में ही बता देते हैं कि कौन नेता, कौन मंत्री उनके यहां आ चुका है और किस-किस की पार्टी में वो फैमिली मेंबर की तरह शरीक होता है.
आज आपको कैलाश विजयवर्गीय की ये बेशर्मी बुरी लग रही है जो कि स्वाभाविक भी है लेकिन आप कभी मीडियाकर्मियों के अपने चाल-चलन पर गौर कीजिएगा, लगेगा ये ऐसा करने के लिए शह देते आए हैं..इस भोथरे मंत्री ने घासलेटी बेशर्मी दिखाई, बाकी कई बारीकी से करते हैं लेकिन भाव कुछ अलग नहीं होता, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक का नहीं. ‪#‎मीडियामंडी‬
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डॉ.चन्द्रप्रकाश द्विवेदी निर्देशित फिल्म "मोहल्लाअस्सी" अभी पूरी तरह तैयार हुई भी है या नहीं, नहीं मालूम लेकिन प्रोमो के आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने इस फिल्म के रिलीज होने पर पाबंदी लगा दी है. भारतीय नागरिक गुलशन कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट फिलहाल इस नतीजे पर पहुंची कि प्रोमो में जिस तरह बनारस और संस्कृति को दिखाया गया है, इससे लोगों की धार्मिक भावना आहत होने की पूरी संभावना है.

इससे पहले पिछले शुक्रवार इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ पीठ ने प्रोमो को लेकर सेंसर बोर्ड को एक नोटिस जारी किया ही जिसमे इसी भावना के आहत होने की बात कही गयी थी. फिल्म अभिनेता सन्नी देओल पर लोगों की भावना को ठेस पहुंचाने के कारण एफआइआर तो दर्ज हो ही गई है.

साल २००४ में काशीनाथ सिंह की आयी किताब काशी का अस्सी पर आधारित इस फिल्म के आने के पहले ही इस तरह के विवाद और प्रतिबंध को लेकर जब आप सोचते हैं तो पहला सवाल दिमाग में यही आता है कि क्या याचिकाकर्ता गुलशन कुमार ने इन बारह-तेरह सालों में एक बार भी इस किताब को हाथ में लेकर देखा होगा कि इसमे लिखा क्या है ? पूरी किताब तो छोड़ ही दीजिए, भूमिका और शुरुआत के एकाध पेज ही पढ़ लेते तो अंदाजा लगा लेते कि जिस भारतीय संस्कृति( संभवतः हिन्दू संस्कृति) पर उन्हें गुमान है और प्रोमो से उनकी भावना आहत हुई है, उस संस्कृति में लिथड़े लोगों की पहचान कुछ इस तरह है- जमाने को लौडे पर रखकर चलना बनारसियों की आइडेंटिटी है.
यकीन मानिए, गुलशन साहब और उनके जैसे बाकी संवेदनशील नागरिकों के लिए काशी का अस्सी का एक ही पन्ना काफी है. उन्हें न तो प्रोमो तक पहुंचने की नौबत आती और न ही चंद्रप्रकाश द्विवेदी तब उस सूरत में होते कि इस पर फिल्म बना सकें..तब तक काशी का अस्सी की एक-एक प्रति शाहजहांपुर के पत्रकार गजेन्द्र सिंह की तरह पेट्रोल झिड़कर जला दी जाती. वैसे भी जिस देश में जीते-जागते इंसान को जिंदा जला दिया जाना पांच-सात मिनट का काम हो, वहां एक किताब की प्रतियां जलाने में क्या मुश्किल आ सकती है ?

कोर्ट की नियत और फैसला सर माथे पर लेकिन क्या गुलशन कुमार जैसे छुई-मुई नागरिक से ये सवाल करना नहीं बनता कि जनाब आपने उस किताब को कभी हाथ में लेकर देखा जिस पर ये फिल्म बनी है ? ..और यदि सचमुच उनकी नजर से ये किताब गुजरी है तो उनकी धार्मिक भावना की दाद देनी होगी कि पिछले बारह-तेरह सालों तक वो सुरक्षित रही और अब फिल्म की शक्ल में आने पर ऐसी सुलगनी शुरु हुई कि सीधे फिल्म के रिलीज होने के पहले ही उसे चिता बनाने पर आमादा है.

इस पूरे प्रकरण में जो दूसरा सवाल बनता है वो ये कि हम सचमुच अपने साहित्य को कितना कम जानते हैं, हम उससे कितने कटे हैं ? चंद आलोचकों और स्वयभूं मठाधीशों की लॉबी को छोड़ दें जो आपस में ही थै-थै करती फिरती है तो साहित्य में जो कुछ भी लिखा जा रहा है, वो कितना कम बल्कि नहीं ही लोगों तक पहुंच पा रहा है. रचना तो छोड़िए, जिंदगी भर तक लेखक लिखते-लिखते मर-खप जाता है, कुछेक पत्रिकाओं जिनका प्रसार हजार के भीतर है, का टुकड़ा बनकर रह जाता है.. काशीनाथ सिंह ने २००४ में काशी का अस्सी लिखा..लेकिन उस पर नए सिरे से चर्चा तब शुरु हुई( खासकर मेनस्ट्रीम मीडिया में) जब कि उन्हें रेहन पर रग्घू के लिए साहित्य अकादमी मिला और इस नाम से भी एक लेखक है, सामान्य पाठक-दर्शक को इसकी जानकारी तब हुई जब डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा इस पर फिल्म बनाने की बात मीडिया में आनी शुरु हुई...और अब तो सूचना की एक परत चढ़ जाने के बाद अलग से काशनाथ सिंह की इस फिल्म के संदर्भ में चर्चा भी नहीं होती. विवादों की परतें इतनी मोटी हो गई हैं कि लेखक काशीनाथ सिंह तो बहुत नीचे दब गए. साहित्य और लिखने-पढ़ने की दुनिया जिस तेजी से हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से कटते चले जाएंगे, हम ऐसी बेहूदगियों के अंबार के बीच खड़े होंगे कि सांस लेने में मुश्किल होने लगेगी.

आखिर ये कैसे संभव है कि जिन छपे हुए शब्दों से लोगों की धार्मिक भावना आहत नहीं होती, उन्हीं शब्दों के सिनेमा में आते ही ऐसी भावना आहत होती है कि मीडिया विवादों क्या, दंगे के अखाड़े में तब्दील हो जाता है..दुनियाभर की जरुरी खबरों से समझौते कर इस पर पिल पड़ती है और कोर्ट की तत्परता मुखर हो उठती है. कहीं ऐसा तो नहीं कि हम साहित्य,सिनेमा तो छोड़िए लोगों की मेहनत तक की कद्र करना नहीं जानते और अपने निकम्मेपन के बीच से लोगों के बीच खास दिखने का फॉर्मूला गढ़ने लग जाते हैं. पीआर एजेंसी, उनकी स्ट्रैटजी पर अगर सरकार चलती है तो फिर भी बात समझ आती है कि उन्हें लोकतंत्र को मैनेजमेंट की शक्ल में बदलने की जल्दीबाजी है लेकिन आम नागरिक और उसके साथ-साथ कोर्ट की सहमति जिस पर कि हमारी गहरी आस्था और यकीन है ? ये कहीं हमारे व्यक्त की जानेवाली दुनिया को समेटकर व्यक्त हो रही दुनिया की शक्ल खतरनाक बनाने की ओर बढ़ते कदम तो नहीं है ? ..नहीं तो इसी दिल्ली शहर में दिनभर में एक नागरिक मां-बहन से शुरु होनेवाली गालियों को इतनी बार सुनता है कि आत्मग्लानि से मर जाए. हम इस बहाने एक माध्यम को दूसरे माध्यम से और एक व्यावसायिक तंत्र को दूसरे तंत्र से पिटते देख रहे हैं.
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