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मीडियाऔर प्रसारण के धंधे से जुड़ी खबरों पर नजर बनाए रखनेवाले लोगों के लिए साल की शुरुआत एक बड़े सवाल से हुई है। सवाल है कि देश के प्रमुख टेलीविजन समूह नेटवर्क 18 के संस्थापक और संपादक राघव बहल अगर इस बात से खुश हैं कि उनकी बैलेंस शीट इन्डस्ट्री की सबसे मजबूत वैलेंस शीट होने जा रही है और दूसरी तरफ देश के सबसे अमीर कार्पोरेट मुकेश अंबानी इस समूह में करीब 1500 करोड़ रुपये निवेश करने की घोषणा के बाद भी मीडिया की स्वायत्ता और उसकी आजादी को बचाए रखने के लिए प्रतिबद्ध होने की बात करते हैं तो इसे किस रुप में लिया जाए? अब संपादक अपनी किसी खबर से समाज पर पड़नेवाले असर के बजाय कार्पोरेट घरानों के साथ हुई डील से खुश है और इसके ठीक विपरीत कार्पोरेट ,मीडिया में करोड़ों रुपये निवेश करते हुए भी संपादक को ही मालिक बने रहने देना चाहता है तो इससे मीडिया के चरित्र पर किस तरह का असर पड़ेगा? इसी के साथ जुड़ा सवाल है कि जिस टेलीविजन समूह के संपादक और एंकर मीडिया सेमिनारों में लगातार कहते आए हैं कि वे मालिकों के हाथों मजबूर पत्रकार हैं और मीडिया पूरी तरह लाला संस्कृति का शिकार हो चुका है,क्या आनेवाले समय में उनके मुहावरे में कुछ तब्दीली आएगी? 

3 जनवरी को नेटवर्क 18( जिसमें कि टीवी 18 और उसके चैनल सीएनएन-आइबीएन,आइबीएन7,आइबीएन लोकमत,सीएनबीसी आवाज भी शामिल हैं,मनकंट्रोल डॉट कॉम और इन डॉट कॉम जैसी वेबसाइट हैं) और रिलायंस इन्डस्ट्रीज लिमिटेड के बीच हुए करार के बाद दोनों की तरफ से जो प्रेस रिलीज जारी किए गए,वह अपने आप में दिलचस्प ही नहीं बल्कि एक हद तक चौंकानेवाला है। नेटवर्क 18 ने प्रेस रिलीज के शुरुआत में ही घोषणा की कि अब वह पूरी तरह कर्जमुक्त होने जा रहा है और आनेवाले समय में इटीवी के सभी क्षेत्रीय समाचार चैनलों पर उसका कब्जा होगा। इतना ही नहीं इटीवी के सभी मनोरंजन चैनलों पर उसकी पचास फीसदी की हिस्सेदारी होगी। मीडिया धंधे की खबरों से जुड़े लोगों के लिए यह हैरान करनेवाली बात थी कि जिस नेटवर्क 18 की गर्दन कर्ज में बुरी तरह धंसी हुई है और वह महीनों से इससे उबर नहीं पा रहा है,कर्ज की रकम बढ़कर 500 करोड़ रुपये से भी ज्यादा हो गयी है,अचानक ऐसा कौन सा करिश्मा हुआ कि वह 2100 करोड़ से भी अधिक रुपये लगाकर इटीवी का अधिग्रहण करने की हैसियत में आ गया? इटीवी के अधिग्रहण से वह कैसे कर्जमुक्त हो सकता है,यह बात प्रेस रिलीज के पहले तीन पैरा को पढ़ते हुए बिल्कुल समझ में नहीं आया। आगे उसने बताया कि समूह का रिलायंस इन्डस्ट्रीज लिमिटेड की सहयोगी कंपनी इन्फोटेल के साथ व्यावसायिक समझौता हुआ है। यह ब्राडकास्ट से जुड़ी कंपनी है जो कि अपना विस्तार पैन इंडिया कंपनी के तौर पर करने की रणनीति बना रही है और साल के अंत तक 4जी सेवा शुरु करने जा रही है। समूह का करार इस बिना पर हुआ है कि इन्फोटेल नेटवर्क 18 की डिजीटल और इंटरनेट की सभी सामग्री का इस्तेमाल करेगी और आनेवाले समय में इन्टरनेट के जरिए लाइव टेलीविजन की लोकप्रियता तेजी से बढ़ेगी तो दोनों का इसका सीधा लाभ मिलेगा।


 प्रेस रिलीज में राघव बहल का कहना है कि नेटवर्क 18 के इतिहास में यह गर्व करने का समय है जब उस पर किसी तरह का कर्ज नहीं होगा और अब वह अपने को सिर्फ कंटेंट के स्तर पर मजबूत करेगी। फिलहाल नेटवर्क 18 की रगों में जब अंबानी का पैसा दौड़ना शुरु होगा तो उसकी कंटेंट पर क्या असर पड़ेगा,यह देखना हमें बाकी है। बहरहाल, इधर रिलांयस इन्डस्ट्रीज लिमिटेड ने अपनी ओर से जारी प्रेस रिलीज में जो बातें कही है,वह विश्वास करने से कहीं ज्यादा अफसोस करनेवाली है कि कार्पोरेट की जुबान कितनी साफ-सुथरी होती है कि वह अभी भी सरोकार,मीडिया की आजादी और स्वायत्तता जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए लड़खड़ाती नहीं है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि कंपनी को राघव बहल की टीम और प्रबंधन पर पूरा भरोसा है इसलिए उनके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। नेटवर्क 18 और टीवी18 पर मालिकाना हक पहले की तरह बना रहेगा। इस करार से समूह की व्यवस्था किसी भी तरह से प्रभावित न हो इसे ध्यान में रखते हुए ही कंपनी ने सीधे-सीधे निवेश करने के बजाय स्वतंत्र रुप से एक ट्रस्ट का गठन किया है जो कि कंपनी का लाभ देखते हुए भी उसके दबाव में नहीं होगा। कंपनी ने यह करार सिर्फ इसलिए किया है कि इन्फोटेल जो 4जी सेवा शुरु करने जा रही है,उसमें देश के सबसे बड़े टेलीविजन और इंटरनेट समूह की सामग्री के उपयोग का अधिकार मिल सके। इसके साथ ही निवेश किए जाने से नेटवर्क 18 के लिए इटीवी का अधिग्रहण करने में आसानी होगी और इसका लाभ मिल सकेगा। हालांकि पिछले दिनों रिलांयस इन्डस्ट्रीज लिमिटेड ने रामोजी राव की इटीवी को अधिग्रहण करने का मन बनाया था लेकिन सीधे तौर पर अधिग्रहण करने के बजाय नेटवर्क 18 में निवेश करने से भारतीय मीडिया पर उसकी पकड़ पहले से कई गुना बढ़ जाती है। 


संपादक राघव बहल अगर इस बात से खुश हैं कि उनकी बैलेंस शीट और नेटवर्क सबसे मजबूत होने जा रही है तो मुकेश अंबानी के लिए यह फायदेमंद सौदा नहीं है कि एनडीटीवी और न्यूज एक्स जैसे चैनलों पर किसी न किसी रुप में अपनी पकड़ बनाए रखने के बाद अब नेटवर्क 18 और इटीवी के चैनलों पर उसकी छाया हमेशा पड़ती रहेगी। वैसे भी कंपनी ने इटीवी के मनोरंजन चैनलों पर पचास फीसदी की अपनी हिस्सेदारी सुरक्षित रखेगी। इस तरह जो देश का सबसे बड़ा कार्पोरेट है,वही मीडिया मुगल भी हो जाएगा।

इस करार को लेकर दो-तीन चिंताएं साफतौर पर दिखाई देती है? सबसे पहले तो यह कि रिलांयस की इस घोषणा के बाद भी कि वह नेटवर्क 18 के प्रबंधन और स्वायत्ता को किसी तरह प्रभावित नहीं करेंगे,यह व्यावहारिक सच्चाई नहीं है। जो मीडिया कुछेक लाख के विज्ञापन के लोभ में कार्पोरेट के खिलाफ जुबान नहीं खोलता क्या वह इतनी बड़ी सौदेबाजी के बाद ऐसा कर सकेगा? ऐसे में अंबानी ने राघव बहल और नेटवर्क 18 के बाकी संपादकों को मालिक बने रहने की जो छूट दी है,उसका क्या अर्थ है? इसका एक मतलब तो साफ है कि अंबानी को इस बात की गहरी समझ है कि मीडिया अभी भी ऐसा धंधा नहीं है जिसमें मोबाइल,पेट्रोलियम और साग-सब्जी जैसे दूसरे धंधे की तरह सीधे कब्जा किया जा सके। टीवी चैनलों खासकर समाचार चैनलों को देखते हुए दर्शकों के दिमाग में यह बात स्थायी तौर पर बनेगी कि वे अंबानी के चैनल देख रहे हैं। इससे आनेवाले समय में खबर की साख पर तो असर पड़ेगा ही इसके साथ ही मीडिया के जरिए अंबानी जो खेल करना चाहते हैं,वह आगे चलकर सीधे-सीधे कार्पोरेट,जनता और सरकार की लड़ाई हो जाएगी। मीडिया में निवेश करनेवाला कोई भी कार्पोरेट मीडिया को इस तरह की छवि से दूर रखना चाहेगा। राघव बहल को मालिक बने रहने देने में यह सुविधा अपने आप छिपी है कि अंबानी का कहीं भी नाम या छवि की चर्चा हुए बगैर देश के सबसे बड़े टेलीविजन नेटवर्क पर कब्जा होगा और वही सब होगा जो अंबानी चाहेंगे।


 मालिक बने रहने के सुख के पीछ मीडिया की धार खत्म होने का कितना बड़ा दर्द छिपा है,यह शायद राघव बहल से बेहतर उनकी कंपनी में काम करनेवाले पत्रकार ज्यादा बेहतर तरीके से बता पाएंगे जो कि अब तक डंके की चोट पर नेशन को फेस करते आए हैं।( प्लीज- फेस दि नेशन सीएनएनआइबीएन का प्रोग्राम है इसलिए नेशन का फेस का हिन्दी न करें) दूसरी तरफ 4जी सेवा के साथ मुकेश अंबानी एक बार फिर मोबाइल और इंटरनेट के बाजार में उतरने जा रहे हैं। खबर यह भी है कि उनकी कंपनी पहले की तरह ही मोबाइल उपकरण और 5-7 हजार रुपये में ऐसे टैब मुहैया कराएगी जिस पर कि 4जी तकनीक आसानी से काम करेगा। इन मोबाइल और टैब के जरिए नेटवर्क 18 की सारी सामग्री प्रसारित होगी जिसमें कि इटीवी के क्षेत्रीय चैनल भी शामिल होंगे। यह समझने वाली बात है कि ऐसा होने से क्षेत्रीय स्तर पर मुकेश अंबानी की पकड़ कितनी मजबूत बनेगी और वह किस तरह से जनमत को प्रभावित करेंगे?

करार के साथ जरुरी चिंता यह भी है कि क्या आनेवाले समय में बाकी के मीडिया संस्थान अपनी आर्थिक असुरक्षा और लाचारी से निजात पाने के लिए इसी तरह किसी दूसरे कार्पोरेट घराने की गोद में गिरेंगे? नब्बे के दशक में जिन निजी मीडिया संस्थानों की शुरुआत इस घोषणा के साथ हुई थी कि हमें सरकार से कोई लेना-देना नहीं है,वे एक-एक करके सरकार का विरोध करते हुए भी कार्पोरेट घरानों के कल-पुर्जे बन जाएंगे? ऐसे में मीडिया के भीतर जिस सरोकार,सामाजिक जागरुकता और बदलाव की बात की जाती रही है,वह उसकी ब्रांडिंग का हिस्साभर होगा ताकि कार्पोरेट मंडी में उसकी उंची से उंची बोली लगायी जा सके? रामोजी राव ने इटीवी को जिस सोच के साथ खड़ा किया और व्यवसाय करते हुए भी क्षेत्रीय स्तर पर मीडिया की साकारात्मक भूमिका निभायी,वह क्या रिलांयस के लिए अपने पक्ष में जमीन तैयार करने से ज्यादा रह जाएगा? ठीक उसी तरह राघव बहल ने नेटवर्क 18 को देश का बेहतरीन मीडिया नेटवर्क बनाने के इरादे से खड़ा किया, क्या उसकी हैसियत कार्पोरेट के रहमोकरम पर बने रहने से ज्यादा का रह जाएगा? वे अब संपादक या पत्रकार से कहीं ज्यादा उद्यमी हैं तो इस बात से खुश हो सकते हैं कि उनका कारोबार पहले के मुकाबले तेजी से बढ़ेगी लेकिन 


जिन सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ ऐसे पत्रकार सरकार के आगे लाइसेंस मांगने जाते हैं,सालों तक दर्शक जिन पर भरोसा करते हैं,क्या इन दोनों के आगे किसी भी तरह का जबाब देने की स्थिति इनके पास रह जाती है? यह सच है कि सरकार कभी भी ऐसे पत्रकारों से सवाल-जबाब नहीं करेगी क्योंकि यह बिजनेस के नियम और शर्तों के अधीन हुआ है और न ही दर्शक उन सरोकारों का हिसाब मांगने जा रही है जिसका कि उन्होंने बतौर ब्रांड भुनाया है लेकिन सूचना संसाधनों के विकास के साथ-साथ सामाजिक जागरुकता का सवाल तो यही खत्म हो जाता है। राघव बहल और रजत शर्मा जैसे मीडिया उद्यमियों के पास जबाब है कि जब वे खुद ही नहीं रहेंगे तो मीडिया चलाकर क्या कर लेंगे? लोगों के सामने सवाल तो फिर भी है कि जब साख और लोगों का भरोसा ही नहीं बचेगा तो मीडिया चलाकर क्या कर लेंगे?
 (मूलतः जनसत्ता में प्रकाशित)
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फेसबुक

ओ फेसबुक, आओ ना
करीब और करीब, थोड़ा और

दो जिस्म एक जान होना नहीं समझते क्या ?
तुम्हारे तो लाखों हिन्दी यूजर्स हैं
उन्होंने बताया नहीं 
कि विरह में तड़पना क्या होता है ?
नजदीक आने पर सांसों में गांठ लगाकर लेट जाना
कितना सुखद होता है ?
मैं तुम्हारे साथ वही करना चाहती हूं
फेसबुक.
मैं तुम्हारे साथ फोर प्ले
( लाइक, टैग, शेयर, अपडेट ) करना चाहती हूँ
उस मदहोश पार्टनर की तरह 

जिसकी अधखुली आंखें
आफ्टर सेव से पुते चेहरे पर जाकर ठहर जाती है.
जिसके हाथ हमेशा उतार-चढ़ाव के बीच
संतुलन बनाए रखने के लिए सक्रिय रहते हैं.
मैं अपनी आंखों में वही मदहोशी चाहती हूं
उंगलियों में वही तड़प 
कि तुम्हारे कमान्डस और हायपर पर पड़ें
तो तुम रात के सन्नाटे में सिसकारियां भरने लगो
एक फेसबुक यूजर की तड़प तुम नहीं समझोगे फेसबुक
नहीं समझोगे 
कि तुमने मेरी मरती हुई इच्छाओं को कैसे हरा किया है ?
कैसे तुमने मुझ पर वो जादू किया 
कि मैं तुम्हें आखिर कमिटेड सोलमेट मानने लगी हूं.
मैंने आर्कुट को कभी मुंह नहीं लगाया
मुझे वो शुरु से ही कोल्ड और एचआइवी पॉजिटिव लगा
थोड़ी उम्मीद बज़ से बंधी थी
पर वो जल्द ही शीघ्रपतन का शिकार हो गया.
मैं ब्लॉग,वेबसाइट,माइक्रो अपडेट्स में
पन्ने दर पन्ने भटकती रही 
लेकिन
भीतर की आग
लैप्पी के एग्जॉस्ट फैन की हवा में
और सुलगती रही.
जब तुम मेरी ज़िन्दगी में आए
स्काई ब्लू और व्हाइट से सजा गठीला शरीर देखकर ही
समझ गई कि तुम बहुत देर तक स्टे करोगे 
और मैं फ्लो-स्लो की पीड़ा से हमेशा के लिए  मुक्त हो जाउंगी.
ऐसा ही हुआ फेसबुक
सच्ची ऐसा ही हुआ.
मेरी सारी मरी इच्छाएं, अधूरे ख्बाब, टूटते सपने
एक-एक करके हरे और खड़े होने लगे 
मैं तुममे डूबती चली गयी
इतना भी पता नहीं चला
कि मैं अपने ब्वायफ्रेंड  के बिना तो जी सकती हूं
पर तुम्हारे बिना हरगिज नहीं.
उसकी बांहो में होते हुए भी
उंगलियां तुम पर ही नाचती हैं.

लेकिन
तुम नेटवर्क के मोहताज क्यों हो फेसबुक ?
मुझे डिपेंडेंट मेट बिल्कुल पसंद नहीं
जिसका वजूद इंटरनेट के होने पर टिका हो !
तुम उससे अलग होकर भी क्यों नहीं तन सकते
क्यों तुम अपने पापा जुकरवर्ग से नहीं कह सकते -
" पापा तन की खूबसूरती मेरे टाइमलाइन करने में नहीं
मुझे ऑफलाइन हग किए जाने में  है."                                                                                                  तुम मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते फेसबुक?

                       
   (उस लड़की के लिए जो चाहे किसी के बिना जी ले, फेसबुक के बिना नहीं जी सकती )
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..तो दिल्ली में लकड़ी का कोयला मिलता है,फिर तुम सुलगाए कैसे? तुम्हारे घर में जगह है कि आग जलाकर लिट्टी सेंक लो। टमाटर भी उसी पर सेंके थे कि गैस पर? सत्तू लेकिन एक नंबर का नहीं मिला होगा,उसमें खेसाड़ी का मिला दिया होगा? चटनी जब बनाए ही थे तो भर्ता नहीं भी बनाते तो काम चल जाता।.....

पापा मेरे बस इतना बताए जाने पर कि आज मैंने आप ही की तरह लकड़ी का कोयला सुलगाया है,चटनी और बैंगन का भर्ता तैयार है,लिट्टी भी भर लिए हैं,बस सेंकना बाकी है,पापा ने एक के बाद एक सवाल करने शुरु कर दिए थे। वो इस बात को लेकर बहुत उत्साहित थे कि दिल्ली में रहकर भी वो वही कर रहा है जो कभी बचपन में बिहारशरीफ में रहकर करता था। शायद हमारी किस्मत पर अंदर ही अंदर जल भी रहे हों कि देखो वो दिल्ली में रहकर भी लकड़ी का कोयला सुलगा रहा है और हम जमशेदपुर में रहकर भी ऐसा नहीं कर सकते। उनकी बात सुनते हुए साफ महसूस कर रहा था कि कहीं न कहीं इस बात की तड़प है कि वो अब जाड़े के दिनों में लकड़ी का कोयला सुलगा नहीं पाते।

कल जब मैं लकड़ी के कोयले जला रहा था तो बहुत अलग लगने लगा। पहली बात तो कि जब इतनी मेहनत और लकड़ी,मिट्टी तेल पर पैसे खर्च कर ही रहा हूं तो क्यों न कुछ ऐसा कर लूं कि रात के खाने से मुक्ति मिल जाए? आग जलाने पर धुएं की जो खुशबू(अब सच में खुशबू ही लगती है) आयी तो लगा कि जैसे सालों की खोयी हुई चीज वापस मिल गयी। अचानक पापा की याद आने लगी। पापा कभी इस तरह लकड़ी और कोयले जलाकर नहीं सेंकते। कुछ नहीं तो कम से कम चार आलू ही पकाने लग जाते। नहीं तो रोटी के आटे की चार सादी लिट्टी ही।..तो क्या,कुछ ऐसा ही किया जाए?

पहले टमाटर पकाया,फिर एक बैंगन भी। लकड़ी के कोयले ने आग सही तरीके से पकड़ ली थी तो मेरा मन और बढ़ गया। लगा लिट्टी भी बना ही ली जाए।..लेकिन सत्तू,सत्तू तो नहीं है। पटना का कमल ब्रांड और रांची का जालान सत्तू। इन तमाम नामों को याद करने के बाद जो कुछ बचता है,वो दिल्ली में रिक्शे के पीछे चिपके स्टीगर-सतेन्द्र सत्तू में जाकर चिपक जाता है। लगा, प्रभात रंजन( जानकीपुल) सर को फोन किया जाए। लिट्टी या फिर मेरे स्नेह,दोनों में किसी एक वजह से शायद सत्तू के साथ आ ही जाएं। पहले कई बार ह चुके थे -हमारे इलाके में एक नंबर का सत्तू मिलता है,कभी आपको टेस्ट कराउंगा। फिर लगा,दिल्ली की ठंड भावनाओं से उपर की चीज है। इसके आगे अगर उन पर इन दोनों कारणों का असर नहीं हुआ तो..पापा फिर बुरी तरह याद आने लगे।

मैं बचपन में सत्तू,लिट्टी,चना,गजा-बरा ये सारी चीजें बिल्कुल भी पसंद नहीं करता था बल्कि इससे इतनी नफरत थी कि मां जरा सा भी मुंह में डालती तो मैं नाली पर जाकर थूक आता। मेरी मां कहती- जहर दे दिए थे मुंह में तो थूक आया। दुनियाभर के बाल-बच्चा को अपने बाप से लगाव रहता है। इसको सारा विख(बिष) इ सत्तू औ चना पर ही उगलना होता है। मां समझ गयी थी कि इसे ये सारी चीजें स्वाद के कारण नहीं बल्कि पापा की पसंद की होने से नापसंद है। कल आकर वो बार-बार आलू की पूड़ी खाने लगें तो वो भी इसे थूकने लगेगा।  खाने-पीने की बहुत सारी चीजें इसी तरह मैंने छोड़नी शुरु कर दी थी कि पापा को वो सब बहुत पसंद थे। फिर मुझे पता होता कि अगर मैं नहीं खाउंगा तो मां मेरे लिए कुछ अलग से बनाएगी। पापा के चेहरे पर ये सब देखकर जो भाव उभरते,उसे देखकर मुझे कैडवरी खाने से भी ज्यादा सुख मिलता।

समय बीता,पापा का अपना इलाका छूट गया और मेरे बचपन का वो घर जहां एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने में भी हम मां के साथ होते,अकेले डर लगता। भइया लोगों के अच्छी तरह सेटेल्ड हो जाने पर भी पापा जमशेदपुर के चार कमरे की फ्लैट में आकर अनसेटेल्ड हो गए। अक्सर कहते, पूरा फ्लैट बिहारशरीफ के एक कमरे लायक भी नहीं होगा और जाड़े में तो उनकी तड़प हम शिद्दत से महसूस करते। वो किसी हाल में अपार्टमेंट में लकड़ी नहीं जला सकते थे। एक बार उन्होंने ऐसा किया था और पूरी बिल्डिंग धुएं से भर गया था। अफरा-तफरी मच गयी थी। शहर में धुएं रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा नहीं है। धुएं और आफवाहें साथ-साथ उठती है। लोग घर से बाहर निकलने लगे। पापा को आग जलाता देखकर कुछ ने फब्तियां भी कसी थी और लगभग हिकारत भरी नजर से देखा था। एक-दो ने शिकायत के लहजे में कुछ कहा भी था। पापा जाड़े में बिना लकड़ी जलाए बेचैनी से मौसम के खत्म होने का इंतजार करते।

मैट्रिक के बाद ही घर छोड़ने के बाद मेरे साथ संयोग ऐसा रहा कि पिछले 10-12 सालों में रांची से लेकर दिल्ली तक जिन-जिन जगहों पर रहा,लकड़ी जलाने की सुविधा स्वाभाविक तौर पर रही। ग्वायर हॉल(डीयू हॉस्टल) जब छोड़ रहा था तो एक चीज जो बार-बार मिस्स कर रहा था कि शायद आगे कभी दिल्ली में लकड़ी जलाने की अय्याशी न कर पाउं। वहां तो हद ही करता। बगीचे से खोज-खोजकर सूखी लकड़ियां लाता और आग लगाकर भुट्टे और आलू पकाता। गजब की जमघट लगती और उसके बाद मुंहचोदी का दौर शुरु होता। जितने लौंडे उतने गांव और कस्बे वहां जुटने लग जाते। बलिया,बक्सर,लहरियासराय से लेकर डगमगपुर तक के किस्से और फिर उसमें उस स्पेस की खोज जहां अश्लील हरकतों और प्रसंगों को शामिल किया जा सके।

मई की गर्मी में जब मयूर विहार विहार आया तो अपने दोस्त के साथ जिस घर को साझा करना था,देखकर पहले ही इत्मिनान हो गया कि ग्राउंड फ्लोर के इस घर में मजे से आग जला सकते हैं। सालभर बाद जब वो घर छूटा तो फिर ऐसे घर की तलाश में लगा,जहां हम आग जला सकते हैं। मैं इसी बहाने पापा को याद भी कर सकता था और फोन कर-करके जला भी सकता था कि देखिए पापा,आज हमने फिर से आग सुलगाया है। पापा से प्यार होने का ये मतलब थोड़े ही है कि उन्हें जलाना और उनसे अपनी हैसियत बेहतर बताना छोड़ दें। अब दुकानों में फर्नीचर का काम होने पर दुनियाभर की जलाने की लकड़ी निकलती है और पापा अफसोस से बताते हैं-क्या करते,अपने यहां तो जला नहीं सकते तो दे दिए चेलवा को कि जलाना।     

सत्तू का जुगाड़ नहीं बन पाया लेकिन दिमागी रुप से तैयार था कि लिट्टी बनानी है। ध्यान आया,पापा को आलू की चीजें सख्त नापसंद है। क्यों न सत्तू की जगह आलू की ही लिट्टी बना ली जाए। पापा को याद करने के बीच चिढ़ाने का भी काम पूरा हो जाएगा। कूकर में पांच आलू डालकर चूल्हे पर चढ़ा दिया औऱ पच्चीस मिनट के भीतर लिट्टी भरने का आइटम तैयार। जाली पर लिट्टी सेंकने का काम शुरु। लेकिन इतनी बड़ी उपलब्धि पापा के अलावे दीदी और मां को बताए कैसे रहा जा सकता था?

मां आज लिट्टी सेंक रहे हैं लकड़ी के कोयले पर। आमतौर पर मां खुश हो जाती है कि चलो कोई तो कुल खानदान में ऐसा निकला जो कि भदेस खाने-पीने की परंपरा जिलाए हुए है। लेकिन अबकी बार मां एकदम से चिंतित हो गयी- कहां से लाए लकड़ी का कोयला? जो सोसायटी में प्रेस करता है न,उसी से। नय बेटा,उस पर लिट्टी-फिट्टी मत सेंको। समसान से चुनकर लाता है कोयला। धत्त मां,क्या लिट्टी में मुर्दा घुस जाएगा। मां आगे कहती है-फिर भी,नय खाना चाहिए।..कुछ नहीं तो सेका जाने पर गंगाजली छींट लेना लिट्टी पर।.

मेरी छोटी दीदी ने पहला ही सवाल किया-सब अकेले कर रहे हो? मैंने कहा-नहीं साथ में तुम्हारी भाभी भी है और अपनी ननद को लिट्टी खिलाने के लिए बुरी तरह बेचैन हो रही है। दीदी न ठहाके लगा दिए थे- अच्छा बना ही रहे हो तो थोड़ा ज्यादा बना लेना,सुबह के नाश्ते से बच जाओगे। सुलेखा दीदी इन सब बातों से कम्पटीशन करने लगती है। मां की भाषा में कहूं तो ओदाउद ऑब्लिक जोड़ती करने लगती है। कहने लगी-हां हम भी परसों बनाए थे...।

इस फोना-फोनी के बीच लिट्टी बनकर तैयार हो गयी। क्या गुलाबी रंग और अपने आप ही फट गयी। लिट्टी फट जाने का मतलब है बहुत ही अच्छी तरह पक गयी है।..पापा फिर याद आए। बहू लिट्टी के नाम पर ऐसा तेल चहबोर कर देती है कि पेट में डहडही होने लगता है। लिट्टी ये सब तेल में छानकर खाने का चीज थोड़े है,लकड़ी पर पकाकर खाने का है। पहले कौर में ही स्वाद से कहीं ज्यादा ये सोच-सोचकर तृप्ति हो रही थी,चलिए पापा आपको लगता था कि घर छोड़कर पढ़ाई करेंगे तो ढंग से पानी तक नसीब नहीं होगा। ये लीजिए,दिल्ली जैसे शहर में आग पर पकायी लिट्टी। खाते हुए मेरा मन कर रहा था होटल सांगरिला,दि लीली पैलेस के आगे जाकर जोर से चिल्लाउं-रईसजादों,अय्याशी इसे कहते हैं,उसे नहीं जो तुम दो लाख फॉर वन नाइट के कमरे लेकर कर रहे हो।.
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मेरी हालत पर तरस खाकर मेरी उस दोस्त ने आज से पन्द्रह दिन पहले फोन करके कहा- खाना बनाने के लिए मुन्नी भेज रही हूं,आदमी की तरह पेश आना और ठीक से खाना बनवाना..जल्द ही शीला भी भेजती हूं और फिर ठहाके लगाकर हंसने लगी थी। उसे पता था कि उन दिनों मेरी तबीयत ठीक नहीं है और मेरे यहां काम करने जो दीदी आती है वो पिछले बीस दिनों से गायब है। मैंने हां-हां कहा और अगले दिन  मुन्नी सुबह सात बजे हाजिर।

जमाने से सुबह सात बजे सुबह उठने की आदत छूट चुकी थी। चैनल की नौकरी बजाते वक्त मार्निंग शिफ्ट के लिए उसी तरह सुबह उठते,जैसे बचपन में मां पूजा के फूल के लिए भेजती और हम चोरी-चकारी करके मां की भक्ति में चार-चांद लगाते या फिर भइया के निकम्मेपन पर पर्दा डालने के लिए रउदिया के यहां दूध लाने के लिए। लेकिन वो सारी बातें किसी दूसरे जमाने की कहानी लगती है।

बात बस इतनी है कि आपको जी में आए तो दो-चार डंडे मारकर मेरी चूतड़ लाल कर दीजिए लेकिन सुबह छह-सात बजे उठने का काम हमसे न हो सकेगा।. सो पहले दिन जब मुन्नी आयी तो बिना उसके कुछ कहे, भीतर से भड़क गया। सुबह मैं न तो अचानक उठ सकता हूं और न ही उठते के साथ बोल सकता हूं। मुझे नार्मल होने में आधे घंटे लग जाते हैं।

मुन्नी ने आते ही कुछ सवाल किए- भइया-आटा कहां है,लाइटर कहां है,सब्जी क्या बनेगी,किस कड़ाही में बनावें। मैं अपनी आदत के अनुसार बिना कुछ कहे, सब इशारे से बताता या फिर आप ही देता जा रहा था। लगा,सात बजे बुलाकर आप ही टेंशन ले ली जिसे कि मेरी मां मंगुआ दुख कहती है। लगा-मना कर देते हैं कि कल से मत आइएगा या फिर थोड़ी देर में। थोड़ी देर का सवाल ही नहीं था क्योंकि उसके बाद वो सीधे एक बजे आती। क्या करें,कल फिर सुबह सात बजे उठना होगा। ओफ्फ..

मुन्नी ने खाना बनाया,टिपिकल दिल्ली का खाना। जमकर मसाले,खूब तेल और फूलगोभी की तो ऐसी रेड पीट दी थी कि सोचा इससे बढ़िया था कि सारे गोभी को सींक में धंसाकर टिक्का बना लेता और सिरके में डुबोकर खा लेता। मंहगी मटर की बनी सब्जी देखकर आत्मा कलप उठी। अगले दिन मैंने कहा- दीदी,आपको पता है मैंने आपको खाना बनाने के लिए क्यों कहा? उसने कहा नहीं भइया। मैंने कहा क्योंकि मुझे खुद ही बहुत अच्छा बनाने आता है लेकिन मैं इतनी देर किचन में रह नहीं सकता,बस इसलिए। वो बोली,ओह..क्यों? मैंने कहा-मेरी तबीयत ठीक नहीं है इन दिनों,आपको फोन पर बताया था न।..उसने कहा हां भइया-तभी हम सोचे कि ठंडा मार दिया होगा तो थोड़ा मसाला खाइएगा त आराम होगा। मैंने कहा नहीं-आप बस उबाल देंगी तो ज्यादा अच्छा लगेगा मुझे,तेल-मसाले मत दीजिए प्लीज। सच्चाई ये थी कि मैं उससे इसलिए खाना बनवाना चाहता था कि मेरी दोस्त ने बताया था कि वो बिहार की है और अपनी तरफ का जोरदार खाना बनाती है। अपनी तरफ का खाना,मतलब मां की तरह का बनाया खाना। मैं मुन्नी के खाने में मां के बनाए खाने का स्वाद खोज रहा था और मुन्नी हमें बाकी लौंडों की तरह जीभचट्टा समझकर खूब झाल-माल के साथ खाना बनाकर दे रही थी।..खैर,मेरी बात वो समझ गयी और ये भी कि कुछ-कुछ आदत से भी ठस्स आदमी है।


तीन-चार दिन हुए कि मेरी सुबह सात बजे उठने की आदत पड़ गयी और उठना अच्छा भी लगने लगा। कभी-कभी तो मुन्नी आती कि उसके पहले ही हम उठकर अखबारों में खोए रहते और कभी देर से आने पर हम सोए ही रह जाते। वो मेरे लिए अलार्म की तरह हो गयी थी। एक बार उठने की आदत पड़ गयी तो मुन्नी का सुबह आना भी अच्छा लगने लगा। मुझे पता था कि ये सबसे पहले मेरे यहां आती है और फिर बाकी घरों में उसे जाना होता है। जिन लड़कियों के यहां जाती है,वो सब ऑफिस गोइंग है। मैं नहीं जानता कि वो कौन लड़कियां हैं लेकिन लगाव का बंधन ऐसा बंधा कि हमें लगता- अगर मेरे यहां देर कर दी तो मुन्नी दूसरी जगहों पर जाने में लेट हो जाएगी और फिर वो ऑफिस जानेवाली लड़कियां भी। क्या पता कोई ज्यादा देर होने के चक्कर में बिना ब्रेकफास्ट किए या लंचपैक लिए बिना ही चली गई तो ऑफिस में कैसे काम कर पाएगी?  क्या बैचलर लड़के ही लड़कियों की इतनी चिंता करते हैं या फिर इंसानियत के नाते हर कोई करता है? मुझे नहीं पता और न ही इसमें मैं कोई स्त्री-विमर्श का पेंच फंसाना चाहता हूं। बहरहाल,

मैं पहले से मटर छीलकर रख देता। जो सब्जी बननी होती,फ्रीज से निकालकर चूल्हे के पास रख देता। दाल बननी होती तो भगोने में पानी डालकर छोड़ देता। भाव बस इतना कि मुन्नी लेट न हो जाए और तब वो लड़कियां भी लेट न हो जाए। क्या मुन्नी उन लड़कियों से मेरी इस आदत के बारे में बात करती होगी? अगर करती होगी तो वो लड़कियां क्या सोचती होगी? हाउ कूल या फिर सो फन्नी? कहीं मुन्नी को हिदायतें तो नहीं देती होंगी- सुनो मुन्नी,उस लड़के की कहानी तो हमें सुनाती हो लेकिन हमारे बारे में कुछ मत बताना। सब लड़के एक ही तरह के चीप होते हैं। उपर से स्वामी अग्निवेश बनते हैं और भीतर से बिग बॉस में जाकर अय्याशी करने के सपने देखते हैं।

मुन्नी को मेरा शायद ये सब करना अच्छा नहीं लगता था। वो हमसे शुरु के दिनों से ही कुछ नहीं बोलती,अपना काम करती और चली जाती लेकिन एक दिन उसने कहा- भइया,जब आप सब कर ही लेते हैं तो हमको किसलिए रखे हैं? आप इ सब मत किया कीजिए। मैं उस दिन बहुत खुश हुआ-चलो,मुन्नी के मुंह से बकार तो निकला। कुछ तो बोली। मैं उससे कुछ और भी बातें करना चाहता था। अच्छा दीदी- आप कहां से आती है। उसने कहा-यहीं बगल से। आपके पति क्या करते हैं? वो बहुत साल तक डागडर के यहां रहा था तो अब मोहल्ला में डागडरी करता है। मुझे अच्छा लगा कि चलो,मुन्नी से सुबह-सुबह थोड़ी बात की जा सकती है। दिनभर तो भूत-पिशाच की तरह दिन काटने ही होते हैं।

दीदी,आपको मसाला देने का मन हो तो फ्रीज से निकालकर थोड़ा दे दिया कीजिए।..मुन्नी ने जबाब में दूसरी बात कह दी- भइया,आप हमको दीदी मत बोला कीजिए,मेरा नाम मुन्नी है। आपकी जो दोस्त हैं न,उ दीदी भी हमको मुन्नी ही बोलती है। अच्छा नहीं लगता है,आप हमको दीदी बोलते हैं तो। मैंने पूछा, क्यों? मुन्नी का जबाब था- काहे कि आप हमसे बड़े हैं न। मैंने कहा-मुन्नी,जिसकी शादी पहले हो जाती है,वो बड़ा हो जाता है। आपकी पहले हो गयी तो आप हमसे बड़ी हो गई। नहीं भइया,ऐसे थोड़े होता है,गांव में तो 12-14 साल में बहतों का शादी हो गया है तो क्या हम उ सबको दीदी बोलेंगे। आप हमको मुन्नी बोलिए। मुन्नी से बात करके आज उत्साह के बजाय भीतर से बहुत ग्लानि हुई।

दीदी बोलकर हम मुन्नी की पूरी पहचान को निगल जा रहे थे। कोई भी काम करने आए,ये क्या कि हम सबको दीदी ही बोले। मुन्नी को इस संबोधन से ही शायद चिढ़ थी। मेरी एक दूसरी दोस्त जो मेरी आंखों के सामने करीब पांच लोगों को घर का काम करने के लिए बदला लेकिन सबों को राम नाम से ही बुलाती। मैंने उससे पूछा था- यार,ये कैसे संभव है कि तुम जिस किसी को भी काम पर रखती हो,उसका नाम राम ही रहता है। उसने कहा- नहीं,नाम तो कुछ और होता है,लेकिन हम उसे राम नाम रख देते हैं,उसके आते ही। मैं दिनभर में सबसे ज्यादा उसे ही बुलाती हूं तो अच्छा है न इधर-उधर का नाम लेने के बदले राम ही नाम ले लो। इसी बहाने कुछ तो पुण्य अर्जित हो जाता है। मुझे तब नौकर की कमीज बार-बार याद हो आता और फिर ऐसा हुआ कि उसके यहां मेरा जाना इसी कारण से छूट गया कि वो बहुत ही तंग दिमाग की लड़की है। आज दीदी के बदले जब मैंने मुन्नी कहा तो अटपटा तो जरुरु लग रहा था लेकिन सोच रहा था- कहीं मुन्नी ने भी तो नौकर की कमीज नहीं पढ़ ली है? औऱ नहीं तो फिर ऐसा क्यों है कि वो नौकर की कमीज न पढ़कर भी पहचान को लेकर हमसे ज्यादा सतर्क है जबकि हम पढ़कर वैसे ही तंग के तंग रह गए जैसे कि न भी पढ़ते तो होते। रचना का हमारे उपर अपनी दोस्त से घृणा करने तक का असर हुआ,खुद अपने उपर नहीं।

कल मुन्नी का आखिरी दिन है। उसके बाद से वो नहीं आएगी। पहले से ही तय था कि वो मेरे यहां सिर्फ 15 दिनों के लिए ही आएगी। मेरा मन करता है कि कल जब वो जाने लगेगी तो हिम्मत जुटाकर पूछ ही लूंगा- मुन्नी,एक बात पूछूं? तुमने बताया कि तुमने बिहार बोर्ड से मैट्रिक की परीक्षा पास की है,क्या तुमने नौकर की कमीज पढ़ी है? नहीं पढ़ी है तो पढ़ना न,तुम्हें पता चलेगा कि हम जैसे सरोकारी बननेवाले लोग दिमागी तौर पर कितने तंग और कमीने होते हैं। 

तस्वीरः आर्टिस्ट ऋचा लखेड़ा( एंकर, ग्लैमर शो. एनडीटीवी इंडिया) की वेबसाइट से साभार
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कड़वे से परहेज क्यों?

Posted On 12:32 pm by विनीत कुमार | 4 comments

पिछले कुछ सालों से निजी समाचार चैनलों की साख और प्रासंगिकता को लेकर जो सवाल खड़े हुए हैं, वह उसके लिए अब स्थायी चिंता का विषय बन गए हैं। हाल की  घटनाओं को देखें तो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले में अपनी साख बुरी तरह गंवा चुकने के बाद चैनलों ने अन्ना के कार्यकर्ता बनकर अनशन को डैमेज कंट्रोल की तरह इस्तेमाल करके की जो कोशिश की,वह फार्मूला भी काम नहीं आया। 7 अक्टूबर को केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से प्रस्तावित अपलिंकिंग-डाउनलिंकिंग गाइडलाइन को मंजूरी दी और अब भारतीय प्रेस परिषद के नए  अध्यक्ष  मार्कण्डय काटजू ने चैनलों के चरित्र पर जो बयान जारी किए,उससे स्पष्ट है कि आनन-फानन में स्ट्रैटजी तय करके चैनलों के लिए अपने किये पर पर्दा डालना पहले जैसा आसान नहीं रह जाएगा। इतना ही नहीं,आनेवाले समय में सरोकार और लोकतंत्र के नाम पर मुनाफ़ा कमानेवाले कार्पोरेट चैनलों की जिन गड़बड़ियों को महज नैतिकता और कर्तव्य के दायरे में बात करके छोड़ दिया जाता रहा, अब इसके लिए आर्थिक रुप से भारी कीमतें भी चुकानी पड़ सकती है।  


टीवी चैनलों में गंभीरता लाने की घोषणा के साथ 7 अक्टूबर को मंत्रिमंडल ने टेलीविजन चैनलों के लिए जिस नई अपलिंकिंग-डाउनलिंकिंग गाइडलाइन को मंजूरी दी है,वह दरअसल 11 नबम्बर 2005 से लागू गाइडलाइन का ही संशोधित लेकिन अधिक ताकतवर रुप है। इस कड़ी में एक तो पंजीकरण के लिए शुद्ध संपत्ति की राशि 3 करोड़ से बढ़ाकर 20 करोड़ कर दी गयी है वहीँ दूसरी ओर यह शर्त रखी गई है कि चैनल के लिए लाइसेंस मिलने के एक साल के भीतर संबंधित संस्थान को प्रसारण शुरू करना होगा. सबसे जरुरी बात यह है कि अगर कोई चैनल कार्यक्रम और विज्ञापन से संबंधित निर्धारित नियमों का उल्लंघन करता है तो उसका लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा और अगले दस साल के लिए दिए जाने वाले लाइसेंस को दोबारा जारी नहीं किया जाएगा।

समाचार चैनलों से जुड़े लोगों और संगठनों ने 7 अक्टूबर से ही इस गाइडलाइन के खिलाफ माहौल बनना शुरु कर दिया और इसे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा बताया। चैनलों ने इसका विरोध दो स्तरों पर किया- एक तो यह कह कर कि सरकार मीडिया की आवाज को दबाना चाहती है और दूसरा कि वह अफसरशाही के तहत इसे चलाना चाहती है,जबकि उसमें शामिल लोगों को इसकी बिल्कुल भी समझ नहीं है। इस विरोध के दौरान चैनलों के पक्ष में काम करते आए संगठनों ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका को एक बार फिर से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और सामाजिक सरोकार का वाहक के तौर पर प्रस्तावित किया और इस गाइडलाइन की तुलना आपातकाल के दौरान सरकारी नीतियों से की। गाइडलाइन की मंजूरी और इस विरोध के तीन दिन बाद सूचना और प्रसारण मंत्री ने आश्वासन दिया कि जिन पांच गलतियों पर सजा देने की बात की गई है,उसके निर्णय में चैनलों से संबंधित लोगों को भी शामिल किया जाएगा और उनके विचारों को भी ध्यान में रखा जाएगा। इसका मतलब है कि जिस गाइडलाइन को चैनल और उनके संगठन हमारे सामने लोकतंत्र पर हमले के तौर पर प्रचारित कर रहे हैं,उसके भीतर चैनल से जुड़े लोगों की भूमिका बनी रहेगी।

चैनलों के हितों के लिए काम करनेवाले संगठन जब इस गाइडलाइन का विरोध कर रहे थे,उस समय यह भी कहा गया कि यह गाइडलाइन दरअसल अन्ना आंदोलन में सरकार की हार की परणति है और चूंकि मीडिया ने सच का साथ दिया इसलिए उस पर शिकंजा कसा जा रहा है। यह एक हद तक संभव हो सकता  है कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल  ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से प्रस्तावित इस गाइडलाइन को ठीक ऐसे समय में मंजूरी दी है जब चैनलों ने सरकार को छोड़  भावावेश में आई आम जनता का साथ दिया। लेकिन इस गाइडलाइन के बनने की प्रक्रिया और समय पर गौर करें तो 22 जुलाई 2010 को ही भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण(ट्राई) ने अपलिंकिंग-डाउनलिंकिंग से संबंधित गाइडलाइन की रुप-रेखा तैयार की थी और उसी के परामर्श पर यह नई गाइडलाइन लाई गई. यह अन्ना से नहीं चैनलों के धंधे में ताकतवर रीयल इस्टेट से निबटने के लिए था। ऐसे में चैनल इसे अन्ना की कवरेज की परिणति बताकर दरअसल राजनीतिक रंग देना चाह रहे हैं।। लेकिन

भारतीय प्रेस परिषद् के नए चेयरमैन मार्कण्डेय काटजू ने टेलीविजन चैनलों के रवैये पर चिंता जाहिर करते हुए इसे नियंत्रित करने के लिए मौजूदा सरकार सहित विपक्ष के नेताओं से विमर्श करके परिषद् को और अधिकार दिए जाने की जो बात की है,वह चैनलों की सिर्फ हाल की घटनाओं पर बात करने के बजाय उसके पूरे चरित्र पर की गई टिप्पणी है जिसके विस्तार में जाने पर उसकी नीयत पर बात की जा सकेगी। काटजू ने अपने बयान में स्पष्ट तौर पर कहा कि चैनल सनसनी फैलाने के लिए गलत संदर्भों को शामिल करते हैं,तथ्यों को सीमित दायरे में लाकर प्रस्तुत करते हैं और घटनाओं की प्रस्तुति इस तरह से करते हैं कि वे अंत में जनविरोधी साबित होती  हैं। काटजू के इस बयान को चैनलों से संबंधित संगठन बीइए( ब्राडकास्ट एडीटर एशोसिएशन) ने तर्कहीन करार देते हुए उन्हें मीडिया का अज्ञानी कहा और अपने पक्ष में कुछ उदाहरण पेश किए। यह अलग बात है कि जस्टिस मार्कण्डय काटजू 'द हिन्दू' सहित दूसरे मंचों पर मीडिया,समाज और संस्कृति पर लंबे समय से लिखते आए हैं।

इस पूरे मामले पर गौर करें तो मूलभूत सवाल यही है कि क्या करीब 314 बिलियन के  टेलीविजन चैनल उद्योग को सचमुच लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जा सकता है जिसमें वे समाचार चैनल शामिल हैं जिनकी खबरें,कार्यक्रम,एजेंड़े और पक्षधरता बैलेंस शीट की सेहत और टीआरपी चार्ट के हिसाब से तय होती हैऐसे में इस नई गाइडलाइन को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर कसनेवाली नकेल के बजाय मीडिया उद्योग पर लागू की जानेवाली शर्तें के तौर पर देखा-समझा जाए तो क्या इसके मायने वही निकलेंगे जो कि चैनलों और उनके पक्ष में खड़े संगठनों की ओर से प्रचारित किए जा रहे है?
दूसरी बात,चैनल अपनी जरुरत के अनुसार बनाए गए संगठनों को पारदर्शिता बरतने और मीडिया के बेहतर बने रहने के लिए पर्याप्त मानते हैं। क्या जब से ऐसे संगठन निर्मित हुए हैं,ऐसा कोई  उदाहरण हमारे सामने आया  है  जिसकी बिना पर इन्हें यह वैधता दी जा सके कि इनकी मौजदूगी से चैनलों के भीतर के कंटेंट और स्थिति में सुधार हो सकेगामसलन

 22 जुलाई 2008 को अमेरिका से परमाणु करार मामले पर संसद में वोट के बदले नोट कांड हुआ और सीएनएन-आइबीएन ने भाजपा के साथ मिलकर स्टिंग ऑपरेशन किया,जिसे उस दिन तो लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर प्रसारित नहीं किया लेकिन भारी दबाव के कारण तीन सप्ताह बाद इस टेप को प्रसारित किया गया जिसमें कि कई जगहों पर छेड़छाड़ की बात सामने आयी और चैनल ने अपनी तरफ से कुछ हिस्सों को हटा दिया। इस संबंध में चैनल से लिखित वजह मांगी गयी लेकिन उसने आज तक इस संबंध में कुछ भी नहीं बताया। चैनलों के हितों के लिए काम करनेवाले संगठनों ने क्या इस संबंध में कोई बात हम तक पहुंचाई?

13 अगस्त 2010 को गुजरात के मेहसाना में एक शख्स आग लगाकर आत्महत्या कर लेता है जिसके पीछे एक मीडिया संस्थान के दो पत्रकारों पर आरोप है कि उसने उसे इस काम के लिए उकसाया। इस बाबत ठीक दस दिन बाद यानी 27 अगस्त को दिल्ली में ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एशोसिएशन की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट आ जाती है। कुल दस पन्ने की रिपोर्ट में जो कि एक ही तरफ छपाई है, 4 पन्ने कवर,कंटेंट और सिग्नेचर के पन्ने हैं। सिर्फ 6 पन्ने पर केस स्टडी है,उसमें सारी बातें समेट दी जाती है और टीवी-9 के जो एक्यूज्ड पत्रकार है कमलेश रावल,उनसे फोन पर बात करने के अवसर का जिक्र भर है। यह सब खानापूर्ति से ज्यादा कुछ भी नहीं है। इस रिपोर्ट के बाद हमें मेहसाना में आत्महत्या करनेवाले शख्स के बारे में मीडिया की तरफ से कोई जानकारी नहीं है। अगर ये मामला कोर्ट,पुलिस के अधीन है तो इसकी फॉलोअप स्टोरी हमें कहीं दिखाई नहीं दी और चैनलों के संगठन ने उसके बाद से इस पर कहीं कोई चर्चा नहीं की।

इसके अलावे उमा खुराना फर्जी स्टिंग ऑपरेशन में फंसा पत्रकार औऱ चैनल आज भी मौजूद हैं ,2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में दागदार हुए मीडियाकर्मी पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर बनकर काम कर रहे हैं। कार्यवाही के नाम पर सिर्फ चैनल या उनके पद बदल गए हैं। ऐसे में सवाल है कि सरकार जिन चैनलों के लोगों को गड़बड़ियों पर निर्णय लेने के लिए शामिल करेगी,उनका अब तक का रवैया कैसा रहा है और क्या वे अब तक पर्दा डालने से अलग कुछ कर पाएंगे? क्या ऐसे मीडियाकर्मी और संगठन गड़बड़ी करनेवाले चैनलों और मीडियाकर्मियों के खिलाफ निर्णय लेने की स्थिति में हैं?फिलहाल चैनलों की प्रेस रिलीज पर भरोसा करके अगर हम सरकार के बजाय इनके पक्ष में खड़े भी होते हैं तो क्या सच में हम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के साथ होते हैं  
(मूलतः प्रकाशित- जनसत्ता,6 नवम्बर 2011)
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