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कम से कम हंगामा तो खड़ा हो

Posted On 12:01 pm by विनीत कुमार | 3 comments



गंभीर लेखन और साहत्य के बूते क्रांति की उम्मीद करनेवालों के लिए ब्लॉगिंग में कुछ नया नहीं है। बल्कि इसे तो वो क्रिएटिव एक्टिविटी मानने से भी इन्कार करते हैं। ऐसे लोगों में आपको नामवर सिंह से लेकर दर्जनों नामचीन साहित्यकार मिल जाएंगे। पढ़े-लिखे लोगों के बीच अब भी एक बड़ा समाज बचा हुआ है जो कि प्रिंट माध्यम को अभी भी सबसे ज्यादा प्रभावी और बेहतर मानता है। बाकी सबकुछ तकनीक के दम पर कूदनेवाली हरकत भर है। इसलिए कुछ लोगों के लिए, मुझे पता नहीं कि उन्होंने कभी ब्लॉगिंग और चैटिंग की है भी या नहीं लेकिन दोनों को एक ही तरह की चीज मान बैठते हैं। इनके हिसाब से जैसे चैटिंग एक लत है कुछ इसी तरह से ब्लॉगिंग भी। इसलिए किसी के ब्लॉग में सक्रिय होने को वो ब्लॉगिया जाना कहते हैं। अगर उन्हें बताया जाए कि फलां बुद्धिजीवी आदमी है, सामयिक चीजों पर उनकी अच्छी पकड़ है तो उनके नकार का एक ही आधार बनता है- अरे, वो तो ब्लॉगर है, इस तरह से लिखने का कोई अर्थ नहीं है। न कोई एवीडेंस, न अकाउन्टविलिटी और न ही किसी तरह का गंभीर अध्ययन है। लिखने दो, जिसको जो जी में आए, इससे कुछ नहीं होनवाला, कुछ भी नहीं बदलने वाला।
लेकिन कंटेट के स्तर पर ब्लॉगिंग ने तेजी से अपने हाथ-पैर पसारने शुरु कर दिए हैं और मीडिया, साहित्य, देश और दुनिया की तमाम हलचलों से अपने को जोड़ा है, गाहे-बगाहे गंभीर औऱ प्रिंट लेखन के मोहताज रहनेवाले लोग भी उपरी तौर पर ब्लॉगिंग को नकारनेवाले लोग गुपचुप तरीके से इसके भीतर की चल रही हलचलों को जानने के लिए बेचैन जान पड़ते हैं। आए दिन फोन पर लोग मोहल्ला, चोखेरबाली,भड़ास, गॉशिप अड्डा सहित सैकड़ों ब्लॉगों की पोस्टिंग के बारे में चर्चा करते नजर आते हैं। मैंने यूनिवर्सिटी कैंपस में दर्जनों रिसर्चर को अपने गाइड और करियर गुरु के लिए इन ब्लॉगों की पोस्टिंग के प्रिंटआउट लेते देखे हैं। अपने बारे में कुछ भी पोस्ट होने पर उसकी प्रिंट प्रति के लिए छटपटाते हुए देखा है। आपलोग दिल्ली में बैठकर हम छोटे साहित्यकारों के बारे में क्या सब लिखते-रहते हैं, फोन पर अधीर होते हुए देखा है। इसलिए अब जब कोई ब्लॉगिंग की ताकत, उसके असर और उसके हस्तक्षेप के सवाल पर बात करता है तो मुस्कराना अच्छा लगता है.
मेरे सहित देशभर में हजारों ऐसे हिन्दी ब्लॉगर हैं और आनेवाले समय में होंगे जो इस मुगालते से मुक्त हैं कि वो ब्लॉगिंग करके कोई क्रांति मचा देंगे। एस मामले में हम ब्लॉग विरोधियों के सुर के साथ हैं। हम रातोंरात सूरत बदल देंगे, ऐसा भी नहीं लगता। देश की करोड़ों अधमरे, आधे पेट खाकर जीनेवालें लोगों के बीच कीबोर्ड के दम पर उनके बीच हौसला भर देंगे, ऐसा भी नहीं लगता। ब्लॉग पर निजीपन और संवेदना की दुहाई देते हम एक संवेदनशील और मानवीय समाज बनाने की तरफ बढ़ रहे हैं, इस बात पर भी शक है। तो फिर क्यों कर रहे हैं ये सब।
ब्लॉगिंग के विरोधियों की छटपटाहट को देखते हुए, इससे चोट खाकर तिलमिलाए हुए लोगों को देखकर कहूं तो हंगामा खड़ा करने के लिए। सही कह रहा हूं, हंगामा खड़ा करने के लिए, क्योंकि उत्तर-आधुनिक परिवेश में कुछ भी बदलने के पहले विमर्श और क्रांति का आधार तय करने के पहले हंगामा खड़ा करना जरुरी है। अभी तक का अनुभव यही है कि ब्लॉगिंग ने अपने भीतर ये ताकत पैदा कर ली है कि वो मुद्दों को लेकर हंगामा खड़ी कर दे...आगे देखा जाएगा।
दोस्ती यारी में ब्लॉग पर मेरी प्रतिक्रिया मीडिया स्कैन,जनवरी के अतिथि संपादक गिरीन्द्र ने छापी है
साभारः मीडिया स्कैन
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एनडीटीवी इंडिया पर पंकज पचौरी ने भावुक अंदाज में बताया कि कभी अमर चरित्र गढ़ने वाले तीसरी कसम के लेखक रेणुजी की पत्नी आज खुद एक चरित्र बनकर रह गयी हैं। रेणु की पत्नी लतिकाजी की स्थिति नाजुक है औऱ वो इन दिनों पटना के एक अस्पताल में पड़ी हैं।
चैनल ने जो विजुअल्स दिखाए उससे लगा कि झरझरा चुके शरीर के भीतर भी व्यवस्था को लेकर कितना रोष है, वो बार-बार नहीं-नहीं कह रही थी। किस बात पर ऐसा कह रही थी, स्पष्ट नहीं हो पा रहा था लेकिन चेहरे पर बजबजायी हुई नाली और उसमें जमे कादो को देख लेने का जो भाव होता है, कुछ-कुछ वैसे ही भाव आ-जा रहे थे। संभव है ये भाव उन आलोचकों के लिए हों जो रेणु की रचनाओं पर आलोचना की किताबें लिखने के बाद बिसर गए, कहां से और कितनी रॉयल्टी मिल जाए, इस गणित में लग गए, अपने आलोचकीय कर्म की डंका पीटने में लग गए कि मैला आंचल, परती-परिकथा, पल्टू बाबू रोड, ठुमरी औऱ ऐसी दर्जनों रचनाएं इसलिए पॉपुलर हुई क्योंकि हमने पाठकों के बीच इसकी समझदारी पैदा की। नहीं तो यूनिवर्सिटी औऱ कॉलेजों में पढ़नेवाले लोगों को कहां मेरीगंज और पूर्णिया की भदेस बोली समझ आती।
संभव है लतिकाजी को उन प्रकाशकों को याद करके उबकाई आ रही हो जो रेणु की रचनाओं की रॉयल्टी की रकम को वृद्धा पेंशन में कन्वर्ट करते रहे हैं जबकि पीछे से उनकी रचनाओं को सहेजने और कालजयी कृतियां घोषित करने में व्यस्त हैं। पाठक उनकी किसी भी रचना से महरुम न हो जाए, उनके जीवन के किसी भी प्रसंग को जानने से जुदा न रह जाए इसके लिए रचनावली तैयार करने में लगे हैं। उनकी कहानियों, उपन्यासों, संस्मरणों को ही नहीं, घरेलू चिठ्ठियों को भी प्रकाशित करने की योजना बना रहे हैं ताकि पाठक रेणु के रेणु बनने के पीछे लगी खाद-मिट्टी की तासीर को समझ सके। प्रकाशक रेणु की एक-एक चीज को सहेजना चाहते हैं, संभव है लतिकाजी को उनके इसी रवैये पर घिना जा रही हों।
एक वजह ये भी हो सकती है कि लतिकाजी का मन हम जैसे पाठकों के होने के आभास की वजह से मिचला जाता हो औऱ उल्टियों का चक्र शुरु हो जाता हो जो हाफिज मास्टर, लक्ष्मी दासिन, वामनदास जैसे चरित्रों से गुजरते हुए आंखों के कोर पोछने लग जाते हैं। हम एक स्वर में कहने लग जाते हैं....सचमुच इस तरह के चरित्रों को गढ़कर रेणु ने अपना करेजा निकालकर बाहर रख दिया है, रेणु ने इन चरित्रों को जिया है। रचना के स्तर पर इन चरित्रों में लतिकाजी भी शामिल होतीं। रेणु ने अपनी रचनाओं में जहां-तहां अपनी पत्नी को एक चरित्र के रुप में देखा है। हम इन पर भी आंखों के कोर पोछते रहे हैं।
बल्कि पाठकों के होने के आभास की वजह से तो लतिकाजी ज्यादा उबकाई महसूस करती होंगी क्योंकि आलोचक और प्रकाशकों की संख्या तो सीमित है और फिर उनकी पहचान भी निर्धारित है लेकिन पाठकों की तो कोई निश्चित पहचान तक नहीं। कौन-सा पाठक किस चरित्र को लेकर जार-जार हुआ है, इसका भला क्या हिसाब हो सकता है। औऱ कोई व्यक्ति रेणु को पढ़ा भी है या नहीं, लतिकाजी को भला इसकी जानकारी कैसे होगी। उन्हें तो बस इतना पता है कि उनके रेणुजी देश के महान साहित्यकार रहे हैं, दुनियाभर के लोग उन्हें जाननेवाले हैं। इसलिए किसी के भी आने पर पाठक समझकर लतिकाजी घृणा से मुंह फेर लेती है तो इसमें गलत क्या है।
एम ए के दौरान रेणु को दो लोगों से पढ़ा। एक तो हिन्दू कॉलेज में रामेश्वर राय से जिनकी एक लाइन अभी तक याद है कि- रेणु ने जिस गांव को अपने उपन्यासों में देखा है वो ट्रेन की सीट पर बाहर की ओर टकटकी लगाकर देखा गया गांव नहीं है और न ही हवाई दौरे हैं। रेणु गांव की पगडंडियों से होकर गुजरते हैं, कीचड़-कादो में धंसकर आगे बढ़ते हैं.....स्वयं रेणु के शब्दों में कहें तो जिसमें धूल भी है और शूल भी।
दूसरी किरोड़ीमल कॉलेज की विद्या सिन्हा मैम से। उऩका रेणु के उपन्यासों पर पीएचडी थी। वो भदेस जीवन औऱ धूल-धूसर जमीन के बीच से विदूषक औऱ जीवट चरित्रों की खोज की वजह से रेणु की कायल थीं। हम उनके सुंदर और सचेत मुखड़े पर मेरीगंज के अंगूठा छाप लोगों के लिए दर्द औऱ अफसोस की रेखाएं देखते तो एक अलग ढंग का सुकून मिलता।एक भरोसा जमता कि रेणु ने अपनी रचनाओं के जरिए संभ्रांत लोगों के दिल में भी वंचित औऱ दाने-दाने को कलटने वाले लोगों के प्रति संवेदना पैदा करने का काम किया है। लतिकाजी आज मेरी इस समझ पर भी थूक रही होंगी और क्या पता पैंतालिस से पचास मिनट तक संवेदना की मूर्ति बने देश के हजारों टीचरों पर भी जो हर साल लाखों लोगों को ये पाठ पढ़ाने का काम करते हैं- डॉक्टर प्रशांत ने बीमारी की वजह ढूंढ ली है, इसकी एक ही वजह है गरीबी औऱ जहालत।( मैला आंचल की लाइन जिसके आगे टीचर अपनी तरफ से जोड़ देते हैं....और इसे दूर किए बिना देश का कुछ नहीं हो सकता।
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साथियों, टेवीवजिन पर मुक्कमल बातचीत के लिए कल रात मैंने एख नया ब्लॉग शुरु किया है। आमतौर पर हम मीडिया विश्लेषण के नाम पर स्टिरियो तरीके से कभी सास-बहू सीरियलों को लेकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं तो कभी न्यूज चैनलों के स्वर्ग की सीढ़ी और क्या एलियन पीते हैं गाय का दूध दिखाए जाने पर आपत्ति दर्ज करते हैं। एक आम मुहावरा चल निकला है- इसलिए तो अब हम टीवी देखते ही नहीं है, बकवास है, सब कूड़ा है।

लेकिन अव्वल तो टेलीविजन में सिर्फ सास-बहू के सीरियल ही नहीं आते औऱ न ही सिर्फ सांप-सपेरे, स्वर्ग की सीढ़ी दिखाए जानेवाले चैनल हैं। इसके अलावे हैं भी है बहुत कुछ। टेलीविजन ऑडिएंस काएक हिस्सा वो भी है जो टेलीविजन के इस रुप की आलोचना करते हुए भी टेलीविजन देखना बंद नहीं करते। वो डिशक्वरी, एनीमल प्लैनेट, हिस्ट्री या फिर नेशनल जियोग्राफी जैसे चैनलों का रुख करते हैं। वहां भी वो सो कॉल्ड ग्रैंड नरेटिव के मजे लेते हैं, देश औऱ दुनिया को नेचुरल स्पेस के तौर पर समझने की कोशिश करते हैं। इसलिए मीडिया,जिसमें सूचना और मनोरंजन दोनों शामिल हैं, इऩके बीच टेलीविजन को सीधे-सीधे गरियाना किस हद तक जायज है, इस पर फिर से विचार किया जाना जरुरी है।
दूसरी बात समाज का एक बड़ा तपका टेलीविजन को किसी भी तरह की इन्टलेक्चुअलिटी से प्रभावित होकर नहीं देखता। इसमें सिर्फ कम पढ़े-लिखे लोग ही शामिल नहीं है। कई ऐसे लोग हैं जो बौद्धिक स्तर पर समृद्ध होते हुए भी टेलीविजन के उन कार्यक्रमों को देखते हैं जिसे अगर लॉजिकली देखा जाए तो समय बर्बाद न भी कहें तो महज टाइम पास होता है। उन्हें पता होता है कि इसका कोई सिर-पैर नहीं है, वाबजूद इसके वो ऐसे कार्यक्रमों को देखते हैं। क्या कोई दावा कर सकता है कि पढ़े-लिखे लोग इंडिया टीवी के उन कार्यक्रमों को नहीं देखता जिसमें भूत-प्रेत खबर के तौर पर शामिल किए जाते हैं। संभव है ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक न हो लेकिन तय बात है कि टेलीविजन देखने में बौद्धिकता औऱ क्लास फैक्टर काम नहीं कर रहा होता है। किस ऑडिएंस को टेलीविजन में क्या अच्छा लग जाए, इसका कोई ठोस आधार नहीं है, इसलिए एकहरे स्तर पर इसका विश्लेषण भी संभव नहीं है।

इससे बिल्कुल अलग वो ऑडिएंस जो अब भी टीवी की सारी बातों को तथ्य के रुप में लेती है। उनके बीच अभी भी ये भरोसा कायम है कि टेलीवजिन दिखा रहा है तो झूठ थोड़े ही दिखा रहा होगा। हॉ, थोड़ा-बहुत इधर-उधर करता है लेकिन असल बात तो सच ही होती है। ये नजरिया आमतौर पर न्यूज चैनलों को लेकर होता है जबकि मनोरंजन चैनलों को वो उम्मीदों की दुनिया के रुप में देखते हैं, रातोंरात हैसियत बदल देनेवाली ऑथिरिटी के रुप में देखते हैं। देश के पांच-छ बड़े शहरों में इसके कार्यक्रमों की ऑडिशन देने आए लोगों को देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि तकदीर बदल देने, बेहतर जिंदगी देने औऱ जिंदगी का सही अर्थ देने के दावों में टेलीविजन राजनीति से भी ज्यादा असर कर रहे हैं। फिलहाल इस बहस में न जाते हुए भी कि चंद लोगों की तकदीर बदल जाने से भी क्या पूरे देश की तस्वीर बदल जाती है, इतना ही कहना चाहूंगा कि देश की एक बड़ी आबादी इस मुगालते में आ चुकी है। वो टेलीविजन के जरिए विकास की प्रक्रिया में शामिल होना चाहती है।
बच्चों और टीनएजर्स की एक बड़ी जमात उन विधाओं में जी-जान से जुटी है जिसे की रियलिटी शो में स्पेस मिलता है। एक लड़की की यही तमन्ना है कि जितेन्द्र औऱ हेमा मालिनी जैसे जज उसके बाप के सामने हॉट और सेक्सी कहे। आप औऱ हम जिस टेलीविजन को बच्चों के करियर चौपट कर देने के कारण कोसते रहे, आझ वही टेलीविजन एक रेफरेंस के तौर पर उनके बीच अपनी जगह बना रहा है, उसे देखकर अपनी स्टेप दुरुस्त कर रहा है।

पहले के मुकाबले सोशल इंटरेक्शन बहुत कमता जा रहा है। पड़ोस क्या घर के भी लोग टीवी देखते हुए बातचीत नहीं करते, मल्टी चैनलों ने विज्ञापन के बीच के लीजर को खत्म कर दिया है। एक हिन्दी दैनिक ने कुछ दिनों पहले लिखा कि ज्यादातर वो लोग टीवी देखते हैं जो आमतौर पर अकेल और फ्रशटेटेड होते हैं लेकिन इसी दैनिक ने बदलती सामाजिक संरचना औऱ घटते मनोरंजन स्पेस पर एक लाइन भी नहीं लिखा।
इसलिए पहले के मुकाबले आज टेलीविजन के विरोध में दिए जाने वाले तर्कों का आधार कमजोर हुआ है औऱ ये हमारी जिंदगी में पहले से ज्यादा मजबूती से शामिल होता चला जा रहा है। कल की पोस्ट पर घुघूती बासुती ने लिखा कि ये अब घर का देवता होता जा रहा है, लेकिन कुछ घरों में ये जगह कम्प्यूटरों ने ले ली है। लेकिन कम्पयूटर पर शिफ्ट हो जानेवालों की संख्या टीवी के मुकाबले कुछ भी नहीं है।
कुल मिलाकर स्थिति ये है कि टेलीविजन एक स्वतंत्र संस्कृति रच रहा है जो कि इस दावे से अलग है कि अगर ये नहीं होता तो भी संस्कृति का यही रुप होता। हम जिसे संस्कृति का इंडीविजुअल फार्म कह रहे हैं, उसे रचने में टेलीविजन लगातार सक्रिय है। इसलिए मेरी कोशिश है कि टेलीविजन को लेकर लोग अपनी-अपनी राय जाहिर करें, इस पर एक नया विमर्श शुरु करें। नए ब्लॉग टीवी प्लस http://teeveeplus.blogspot.com/
करने के पीछे यही सारी बातें दिमाग में चल रही थी। पहले तो हमने सोचा कि इस पर गाहे-बगाहे पर ही लिखा जाए बाद में लगा कि व्यक्तिगत स्तर पर शुरु किया गया ये ब्लॉग कुछ महीनों बाद एक साझा मंच बने। लोग बेबाक ढंग से टेलीविजन, मनोरंजन, संस्कृति और लीजर पीरियड पर अपनी बात औऱ अनुभव रख सकें।
इस देश को टेलीविजन का देश के रुप में विश्लेषित करने पर समाज का कौन-सा रुप उभरकर सामने आता है, इसे जान-समझ सकें। मेरी ये कोशिश आपके सामने है, आप बेहिचक अपने सुझाव दें।
लिंक है- http://teeveeplus.blogspot.com/
देन
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मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो गर्मी में पंखा चलाने के पहले टीवी ऑन करते हैं। घर का दरवाजा खोला और सीधे रिमोट हाथ में थाम लिया। अगर आप उनके साथ हैं, गर्मी से बेचैन हो रहे हों, तब आपका मन नहीं मानता औऱ कहते हैं- जरा पंखा चला दो। उनका जबाब होता है-थोड़ा दम मारो, पहले देख तो लो कि कहां क्या आ रहा है। उन्हें पूरे चैनलों की परिक्रमा करने में करीब ५-६ मिनट लग जाते हैं औऱ मजबूर होकर आप ही पहले बल्ब फिर ट्यूब लाइट औऱ अंत में पंखा चलाते हैं।
आगे वो इस बात का खयाल कि हमने अपने घर किसी को साथ में लाया है, भूल जाते हैं, टीवी के नजदीक औऱ आपकी उपस्थिति से जुदा होते चले जाते हैं। आधे घंटे बाद आपको लगने लगता है कि बेकार ही यहां आए, जब टीवी ही देखनी थी तो बेहतर होता, अपने यहां होते, कम से कम मन-मुताबिक प्रोग्राम देखने को तो मिलता। आप आगे से कभी नहीं आने की प्रतिज्ञा के साथ जाने के लिए मचल उठते हैं।

इसके ठीक उलट जब ऐसे लोग मेरे यहां आते हैं। अव्वल तो मैं चाहता ही नहीं कि ऐसे लोग मेरे यहां आएं। मैं खुद भी टेलीविजन का कट्टर दर्शक हूं, कुछ भी दिखाओगे, देखेंगे वाली जिद के साथ टीवी देखनेवाला। लेकिन लोगों के रहते मैं टीवी देखना पसंद नहीं करता। बल्कि इस बारे में सोचता भी नहीं कि कोई हमसे मिलने आए और हम टीवी के साथ लगे पड़े हैं। लेकिन ऐसे लोग न चाहते हुए भी आते हैं। उन्हें पता है कि लोगों के रहते मुझे टीवी देखना अच्छा नहीं लगता, इसलिए सीधे-सीधे न कहकर पहले सिर्फ इतना ही कहेंगे- बस, स्कोर पता करके बंद कर देंगे, जरा चालू कीजिए न। मैच के बीच विज्ञापन आ जाएगा, सो फिल्मी चैनलों पर स्विच कर जाएंगे, उसके बाद दस मिनट तक दोनों चैनलों के बीच कूद-फांद मचाते रहेंगे। आगे कुछ कहने की जरुरत नहीं, उनके ठीठपने को दोहराने की कोई जरुरत नहीं। अंत में स्कोर औऱ न्यूज अपडेट्स को भूलकर ये वो देखते हैं जो देखना चाहते हैं।
वो एक अलग दौर था, जब हम भाग-भागकर दूसरों के यहां टीवी देखने जाते थे। इसके पीछे दो ही वजह होती, या तो अपने घर में टीवी नहीं होता,टीवी होते हुए भी लाइट जाने पर बैटरी नहीं होती या फिर घर में देखने ही नहीं मिलता। हिन्दूस्तान में टेलीविजन का जब शुरुआती दौर रहा तब लोगों ने इसे सामूहिक माध्यम के रुप में इस्तेमाल किया। एक ही टीवी से पचास-साठ जोड़ी आंखे चिपकी होती, सबके सब रामायण और महाभारत की ऑडिएंस, सबों को बीच में विज्ञापन आने पर खुन्नस होती लेकिन अब करें तो क्या करें, उसे भी देखते रहे। इस कॉमर्शियल गैप में लोग संवाद की स्थिति में आ जाते। औरतें आपस में बातें करने लग जाती- आपके यहां किस ग्वाले के यहां से दूध आता है, एक किलो दूध सुखाने से कितना खोआ बन जाता है, लंगटुआ के पापा बोले कि अबकि बार दू रजाई एक ही बार भरवा लेंगे। बच्चे इस बीच टीवी कार्यक्रमों की नकल करने लग जाते, विज्ञापन की लाइन आगे-आगे बोलते। बगल में बैठी कोई औरत बोल पड़ती- चारे साल में सबकुछ याद रखता है, बच्चा प्रशंसा पाकर फुलकर कुप्पा हो जाता। दस मिनट तक खिसके रहे पल्लू का ध्यान इसी बीच जाता, समीज के उपरी हिस्से पर पिन्टुआ कोढिया टकटकी लगाए हुए है, ध्यान आते ही लड़की दुपट्टे को इसी वक्त संभालती।
विज्ञापन खत्म होता और बिना किसी को कुछ कहे लोग एकदम से चुप हो जाते।
कई बार तो स्थिति ऐसी भी बनती कि जिस किसी का भई अधूरा गप्प रह जाता वो थोड़ी औऱ देर तक रुक जाती। तब तक उसका बच्चा शक्तिमान,टीपू सुल्तान या फिर चंन्द्रकांता देखता। औऱतों की भी भीड़ रामायण, महाभारत या फिर जय कृष्णा के बाद से छंट जाती। बाद में एक कल्चर-सा हो गया कि इतवार को या फिर शनिवार को सिनेमा देखने का इंतजार लोग इसलिए करते कि इसी बहाने आपस में बोलने-बतियाने का मौका मिल जाता। इसमें भी टीवी देखने से कम रस नहीं मिलता।
अब स्थितियां बदली। लोगों के पास लिक्विड मनी बढ़ने के साथ इगो का भी सवाल उठा। अब जिसके पास थोड़ा भी पैसा है उसके लिए टीवी कोई बड़ी बात नहीं। ज्यादा नहीं तो हजार-पन्द्रह सौ में भी अपनी ये शौक पूरी कर लेते हैं। लोगों के पास टीवी खरीदने के बहाने भी अलग-अलग हैं, इसकी चर्चा फिर कभी। लेकिन अब लोगों को पसंद नहीं कि किसी के घर जाकर टीवी देखे औऱ झटाझट चैनल बदलने को टुकुर-टुकुर देखता रहे। टीवी देखने का तो मजा तभी हैजब रिमोट अपने हाथ में हो, एक ही घर में एक से ज्यादा टीवी होने की भी यही वजह है।
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टेलीवजिन देखकर बनता है देश

Posted On 9:23 pm by विनीत कुमार | 3 comments


करीब डेढ़ साल तक भारी मशक्कत के बाद मैंने करीब ६०० घंटे की रिकार्डिंग पूरी कर ली। ये रिकार्डिंग मनोरंजन प्रधान चैनलों पर दिखाए जानेवाले कार्यक्रमों की है। जिसमें टीवी सीरियलों से लेकर रियलिटी शो, विज्ञापन,स्टंट औऱ झगड़े-झंझट और स्ट्रैटजी शामिल हैं। इसकी रिकार्डिंग मैंने अपनी पीएच।डी की जरुरतों के हिसाब से की है। इसलिए पूरे टॉपिक के हिसाब से २००७-२००८ में मनोरंजन चैनलों पर प्राइम टाइम में प्रसारित होनेवाले कार्यक्रमों को शामिल किया है। मुझे विश्लेषण सिर्फ प्राइम टाइम के कार्यक्रमों की करनी है। लेकिन अब तक दूरदर्शन के हिसाब से प्राइम टाइम का जो समय रहा है उसे मैंने छोड़ा और आगे तक खींचा है। क्योंकि कई ऐसे कार्यक्रम हैं जो कि रात के दस बजे के बाद आते हैं लेकिन ऑडिएंस इफेक्ट के मामले में ये आठ बजे के कार्यक्रमों पर भारी पड़ते हैं। इस दौरान मैंने न्यूज चैनलो से ज्यादा मनोरंजन चैनलों को देखा है। न्यूज चैनलों को देखा भी तो ये जानने-समझने के लिए कि वो मनोरंजन से जुड़ी खबरों को किस रुप में प्रसारित करते हैं। आप में से कई लोग न्यूज चैनलों पर इस बात से नाराज हो सकते हैं कि वो प्राइम टाइम में हंसगुल्ले,कॉमेडी सर्कस का भौंडापन औऱ रियलिटी शो की चिक-चिक दिखाते हैं,सब वकवास है। लेकिन मैंने इस बात को समझने की कोशिश की है कि मनोरंजन चैनलों से जुड़ी खबरों को जब न्यूज चैनल प्रसारित करते हैं तो टेलीविजन का एक नया संस्करण उभरकर सामने आता है। दोनोंमें आपको एक हद तक समानता भी देखने को मिल जाएंगे। उसकी स्ट्रैटजी में एक हद तक समानता भी दिखेगी। इसलिए मेरी कोशिश है कि जब मैं मनोरंजन चैनलों की भाषिक एवं सांस्कृतिक निर्मितियों पर बात कर रहा हूं तो इसे टेलीविजन से ऑपरेशनलाइज करते हुए,सिर्फ मनोरंजन चैनलों पर बात करने के बजाए ओवर ऑल टेलीविजन संस्कृति पर बात करुं। टेलीविजन किस तरह से एक स्वतंत्र संस्कृति गढ़ रहा है जो कि आगे सजाकर समाज से पैदा न होते हुए भी सोशल प्रैक्टिस के रुप में स्वीकार कर लिया जाएगा, इसे समझना जरुरी है। हालांकि ये हमारे रिसर्च का एक छोटा-सा हिस्सा होगा लेकिन इसे ट्रेस करना जरुरी है कि अब जब लोग टेलीविजन पर अपनी राय देते और बनाते हैं तो उनके दिमाग में मनोरंजन चैनल और न्यूज चैनल को लेकर क्या तस्वीर बनती है।
यही सबकुछ जानने की कोशिश में मैंने अपने ब्लॉग के कोने में टेलीविजन का देश भारत नाम से एक छोटी-सी नोट डाल रखी है। इस नोट का एक हिस्सा है-
गांवों का देश,गरीबों का देश,किसानों का देश,अंधविश्वास और पाखंडों का देश,भावनाओं का देश नाम से हिन्दुस्तान और यहां के लोगों बारे में काफी कुछ लिखा गया। मेरी कोशिश है कि अब इस देश को टेलीविजन का देश के रुप में देखा जाए,ये जानने की कोशिश की जाए कि देश के लोग टेलीविजन को किस रुप में लेते हैं, किस रुप में प्रभावित होते हैं। 2009 में देश के अलग-अलग हिस्सों में करीब एक हजार लोगों से इस संबंध में बात करना चाहता हूं। आपके सहयोग से ये संख्या बढ़ सकती है। मेल के जरिए आप हमें जितनी अधिक राय देंगे,हमें उन लोगों से बात करने के लिए ज्यादा वक्त मिलेगा जो नेट पर नहीं आते,टीवी देखते हैं और सीधे सो जाते हैं, टीवी पर बात भी की जा सकती है, ऐसा नहीं सोचते।
एक बड़ी सच्चाई के साथ मैं इस रिसर्च को आगे बढ़ना चाहता हूं कि आप चाहें या न चाहें, आप माने या न माने टेलीविजन का हमारी जिंदगी पर गहरा असर है। जब मैं तीन साल की किलकारी को कार्टून नेटवर्क के बजाय बिग बॉस के लिए मचलता देखता हूं, चार साल की खुशी के सवाल से टकराता हूं कि चाचू काकुल का अफेयर टूट जाएगा क्या, ७६ साल की अपने एक टीचर की अम्मा की बात सुनता हूं कि- बढ़िया है न बेटा, इधर-उधर की लाय-चुगली से तो अच्छा है कि आदमी अपने घर में बैठकर टीवी ही देख ले। कई घरों में गया हूं, बच्चों की मम्मियां बात को टालने के लिए, उसकी जिद से पिंड छुडाने के लिए टीवी के आगे पटक देती है। कई घरों में टीवी आया,चाइल्ड अटेंडर के तौर पर इस्तेमाल में लाए जाते हैं। ये देश की वो ऑडिएंस है जिनके आगे हमारी इन्टलेक्चुअलिटी मार खा जाती है।
इसलिए अब जरुरी है कि टेलीविजन से बननेवाले इस समाज पर बहस की जाए, एक नया विमर्श शुरु हो और ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें शामिल हो। २००९ में मैं पूरे साल तक देश के अलग-अलग हिस्सों की ऑडिएंस से बात करना चाहता हूं, मिलना चाहता हूं। शहर से लेकर दूरदराज तक के लोगों से। उनके साथ बैठकर टीवी देखना चाहता हूं,बेतहाशा रिमोट पर दौड़ती उनकी उंगलियों का तर्क समझना चाहता हूं।
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