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लखनऊ का रिफह-ए-आम क्लब, ये वो जगह है जहां 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए प्रेमचंद ने साहित्य का उद्देश्य, जनपक्षधरता और साहित्य को राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल कहकर सभा को संबोधित किया था. रिफह-ए-आम का मतलब ही है जन कल्याण.
उस दौरान अंग्रेजों /रईसों का जो एमबी क्लब था जिसमे कुर्ता-पाजामा पहनकर भीतर घुसने तक की इजाजत नहीं थी, रिफह-ए-आम उसके विरोध में बनाया गया था. यही वो क्लब है जहां 1920 में सभा करके महात्मा गांधी ने लखनऊ वालों से असहयोग आंदोलन में जुड़ने की अपील की थी. खिलाफत काॅन्फ्रेंस भी यहीं हुई थी. हिमांशु वाजपेयी ने अपनी तहलका की रिपोर्ट उपेक्षा का दर्द( http://tehelkahindi.com/rifah-e-aam-club-lucknow/) में इन सबकी विस्तार से चर्चा की है.
देर शाम हिमांशु के साथ जब हमने वहां का नजारा देखा तो आत्मा कलप उठी. मुख्य द्वार बजबजाती ऐसी नालियां, सडांध और कीचड़ हैं कि एकदम से उबकाई आने लगी. उसी से सटे दर्जनों परिवार टहनियां,तिनके बटोरकर खाना पका रहे थे..सबों के बच्चे उसी गंदगी में लोट रहे थे. गुलजार की मुंशी प्रेमचंदः एक तकरीर में जिस खादी ग्रामोद्योग के कपड़े में होरी, झुनिया, गोबर चकाचक दिखते हैं, उनसे बिल्कुल उलट. गंदगी, गरीबी और लाचारी का अंबार.
असल में ये जो एमसीडी की कूड़ेदान से भी बदतर स्थिति इस पूरे परिसर की हुई है, उसकी बड़ी वजह है कि इसके भीतर शादी-ब्याह के जलसे होने लगे हैं. बांड्री वॉल जहां-तहां से तोड़ दी गई है. सामने शामियाने लगे होते हैं और जहां से ये इमारत शुरु होती है, वहां खाना बनाने-पकाने का काम. बर्तन धोने से लेकर साग-सब्जी के छिलके पोलिथीन सब यहीं छोड़ दिया जाता है. लोग आगे से दावत का मजा लेते हैं और हाथ पोंछकर निकल लेते हैं..लेकिन एक बार भी जाकर देख लें कि किस तरह से कीचड़ के बीच आलू छीले जा रहे हैं, दूध उबाले जा रहे हैं तो खाना तो दूर, उल्टियां कर दें.
दूसरी बात ये कि ये पूरा परिसर दादागिरी,जोर-जबरदस्ती और कब्जे का बुरी तरह शिकार हो गया है. सबने अपने-अपने तरीके से इस परिसर पर कब्जा जमा लिया है. स्वच्छ भारत की जो कंठीमाला लेकर देखभर में घुमा जा रहा है और जिस गांधी के चश्मे को इसकी लोगो बनायी गई है, एक बार कोई इसे देख ले तो चित्कार कर उठेगा. ये वो देश है जो अपने इतिहास पर तो रेस्टलेस तरीके से गर्व करता है लेकिन उसकी ऐतिहासिकता जहां सुरक्षित रहनी चाहिए वो इस हालत में है कि आपके दिमाग में बस एक ही सवाल उठेगा- आखिर आजाद होकर भी हमने क्या कर लिया ? १९३६ के होरी महतो की हालत २०१५ में आकर भी वैसी की वैसी ही है. ‪#‎दरबदरलखनऊ‬
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0 Response to 'मुंशी प्रेमचंद, आपका होरी,धनिया,गोबर,घीसू अभी भी यहीं पड़े हैं:'

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