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स्मृति इरानी की अंग्रेजी जितनी अच्छी है और जितना धैर्य है( आठ साल तक देश की आदर्श बहू बने रहना आसान काम नहीं है) डिग्री जुटाने और पढ़ी-लिखी साबित करने की चुटकुलेबाजी में फंसने के बजाय एक बार अंतोनियो ग्राम्शी की "प्रीजन नोटबुक्स" जरूर पढ़नी चाहिए.पूरी नोटबुक तो तीन हजार पन्ने से भी थोड़ी ज्यादा है लेकिन रोज सुबह उठकर दो-दो पन्ने करके भी पढ़ती है तो अपने कार्यकाल तक बहुत ही आराम से पूरा पढ़ लेंगी. पूरी न भी पढ़ पाती हों तो सिर्फ "इन्टलेक्चुअल एंड एडुकेशन" अध्याय ही अच्छी तरह पढ़ लें. यकीन मानिए ये जो हर महीने-दो-महीने में कोई न कोई डिग्री दिखानी पड़ जाती है, जिससे कि न तो उनकी प्रतिष्ठा में इजाफा होता है और न ही लोगों का यकीन बढ़ता है बल्कि उल्टें ट्विटर पर ट्रेंड होकर रह जाता है, सोशल मीडिया पर संता-बंता रहकर जाता है, उससे मुक्ति मिल जाएगी. 
ग्राम्शी ने इन्टलेक्चुअल की विस्तार से चर्चा की है और जिस तरह से अकादमिक डिग्री हासिल करके बुद्धिजीवी होने का दंभ लोगों के बीच पनपता है, उस पर गहरा चोट किया है. वहीं दूसरी तरफ जो जीवन की सहजता, संघर्ष और अनुभव के बीच से ज्ञान हासिल किया है उसे ऑर्गेनिक इन्टलेक्चुअल के रुप में परिभाषित करते हुए समाज में ऐसे लोगों की जरूरत को अलग से रेखांकित किया है. जो पैटर्न इन्टलेक्चुअल नहीं हैं.जो सचमुच रचनात्मकता, आलोचकीय पक्ष और तार्किकता को गहराई से समझ पाते हैं.
ऐसा नहीं है कि ग्राम्शी ने ऑर्गेनिक इन्टलेक्चुअल को जिस रूप में परिभाषित किया है, उन तर्कों को स्मृति इरानी को आनन-फानन में भी ऐसा ही घोषित कर दिया जाए लेकिन इतना जरूर है कि अगर इत्मिनान से इस अध्याय को पढ़ जाती हैं तो अपने तर्क को और बेहतर ढंग से लोगों के बीच रख पाएंगी और जो डिग्री को ही ज्ञानवान होने के अंतिम सत्य के रूप में निर्धारित करते हैं, उनकी इस समझ को सीमित साबित कर सकती हैं..और वैसे भी ये बात ग्राम्शी में कही जरूर है लेकिन "मसि-कागद छुओ नाहिं" की घोषणा के साथ ज्ञानी तो अपने यहां हुए ही हैं. स्मृति इरानी को अगर ग्राम्शी से दिक्कत है( हो सकता है क्योंकि एक तो विदेशी हैं और दूसरा कि हार्डकोर कम्युनिस्ट) तो कायदे से बैठकर कबीर की रमैणी, साखी और सबद ही पढ़ लें..तर्क के नए आधार मिलेंगे.. ये डिग्री की चुटकुलेबाजी में फंसने से तो अच्छा ही है न..
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