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टेलीविजन पर जिस तरह से नकली और गलत सामान के फेर में न पड़ने के लिए जागो ग्राहक जागो नाम से तेजी से अभियान चल रहे हैं,ठीक उसी तरह इमोशनल अत्याचार जैसे कार्यक्रम हैं जो इस बात से आगाह करते हैं कि कहीं आप प्यार और रिलेशनशिप के नाम पर झूठे,मतलबी और नकली संबंधों की गिरफ्त में तो नहीं हैं? आप जिससे प्यार करते हैं,कहीं वो आपके साथ धोखा तो नहीं कर रहा? अगर ऐसा है तो उसके साथ आगे जिंदगी बिताने का फैसला करने से ज्यादा जरुरी है कि उसकी लॉयल्टी टेस्ट करायी जाए। शुक्र है कि अभी तक जागो ग्राहक जागो की तरह ऐसे शो ने प्रेमी और प्रेमिका में आइएसआइ के निशान देखने की बात नहीं कही है।



जो टेलीविजन अपने शुरुआती दौर से प्यार पर पहरेदारी बिठानेवाले लोगों को आधार बनाकर कार्यक्रम पेश करता रहा,प्यार करनेवालों के पक्ष में सामाजिक बंदिशों के विरोध में अपनी बात कही,आज उसे लग रहा है कि ये पहरेदारी पहले के मुकाबले थोड़ी ढीली पड़ी है,शहरों में ही सही सामाजिक स्थितियों और लोगों की सोच के बदलने से लड़के-लड़की के बीच की दोस्ती और प्यार एक हद तक स्वाभाविक माना जाने लगा है। ऐसे में अगर सामाजिक पहरेदारी पर ही कार्यक्रम पेश करते रह गए तो संभव है कि टेलीविजन की दूकानदारी बहुत जल्द ही बंद हो जाएगी। लिहाजा उसे जरुरी लगा कि प्यार करनेवालों के बीच ही सेंधमारी की जाए। इसलिए अब टेलीविजन, इस प्यार में समाज और नाते-रिश्तेदारों की असहमति से विरोध करने के बजाय इस बात को लेकर चिंतित है कि आप जिससे प्यार कर रहे हैं,वो लंबे वक्त तक आपके साथ होगा
/होगी भी कि नहीं या फिर वो रिलेशनशिप के नाम पर आपके साथ चीट तो नहीं कर रहा, इमोशनल अत्याचार के मुकेश की गर्लफ्रैंड की तरह आपकी भी गर्लफ्रैंड सिर्फ खर्चा चलाने और टाइमपास के लिए आपके साथ होने का नाटक तो नहीं कर रही। आपका ब्ऑयफ्रैंड  आपको सिर्फ अपनी सफलता के लिए सपोर्ट सिस्टम की तरह इस्तेमाल तो नहीं कर रहा? यह सब करते हुए हर एपीसोड में वह लड़के या लड़की में से किसी एक को विलेन साबित कर कर देता है।

उपरी तौर पर देखें तो ऐसा करके यह शो उन तमाम लोगों के लिए आंख-कान खोलने का काम करता है,जो हायली प्रोफेशनल दुनिया में जीते हुए भी अभी भी प्यार अंधा होता है के फार्मूले पर रिलेशनशिप में आना चाहते हैं जहां अपने पार्टनर की सारी कमियों को एक समय तक नजरअंदाज करते हैं लेकिन जब उनसे परेशानी होती है तो आपसी समझदारी के तहत निबटाने के बजाय टेलीविजन को संरपंच की भूमिका निभाने का मौका देते हैं। यहा सवाल है कि क्या टेलीविजन को आपसी संबंधों के बीच इतनी स्पेस दी जानी चाहिए कि उस आधार पर हम अपने फैसले लेने लगें? 

सोशल रिस्पांसिबिलिटी के एजेंडे पर शुरु किया गया टेलीविजन अपने इस एजेंडे से जमाने पहले दूर हो गया है,सिर्फ और सिर्फ अधिक से अधिक टीआरपी और उसके दम पर विज्ञापन ही इसकी स्ट्रैटजी है लेकिन दर्शकों के लिए गार्जियन बने रहने की इसकी आदत और खुद दर्शकों को इसे गार्जियन मानने की लाचारी अभी तक बरकरार है। नहीं तो जिस टेलीविजन की खबरों पर आपका भरोसा नहीं रहा,वही टेलीविजन आपके व्ऑयफ्रैंड या गर्लफ्रैंड की लॉयल्टी पर शक करता है,उसे आप कैसे मान लेते हैं और दिन-रात सामाजिक खुलेपन के नाम पर अश्लीलता और फूहड़पन परोसनेवाले टेलीविजन में यह नैतिकता कहां से आ जाती है कि वो हमारी-आपकी लायल्टी टेस्ट कर सके?

 मुकेश ने अपनी गर्लफ्रैंड की फुटेज देखकर कहा- ये सचमुच लड़की के नाम पर कलंक है? सास-बहू सीरियलों के मेलोड्रामा और असल जिंदगी के दो लोगों को इस तरह पेश किए जाने पर फिर फर्क कहां है? अपनी रिलेशनशिप और प्यार की बात साझा करके कहीं ऐसा तो नहीं कि जो टेलीविजन हमें एक तमाशबीन समाज का हिस्सा बनाना चाहता है,हम उसके लिए अपने को परोस दे रहे हैं? हम अगर सचमुच चाहते हैं कि हमारी रिलेशनशिप में अगर कहीं से दरार आ रही है तो इसकी पूरी केसस्टडी टेलीविजन के हाथों से इस उम्मीद से सौंपने से कि सब अच्छा हो जाएगा,एक बार गंभीरता से विचार करने की जरुरत है? ऐसे शो को लेकर अगर यह अफवाहें ही हैं तो ज्यादा बेहतर है कि सबकुछ प्लांटेड होते हैं,लोग अपनी पब्लिसिटी के लिए वहां जाते हैं और चैनल को रियलिटी शो के मुफ्त में मसाले मिल जाते हैं। इससे कम से कम कुछ लोगों का तो टेलीविजन के जरिए करिअर बन जा रहा है और दर्शक इसे बस टाइमपास का हिस्सा मानकर देख ले रहे हैं। नहीं तो

अगर ऐसे शो रिलेशनशिप के नाम पर सावधानी बरतने का ढोल पीट रहे हैं तो यकीन मानिए ये प्यार करनेवाले लोगों को शक्की और एक हद तक साइकी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। ऐसा किए जाने से प्यार जो कि सामाजिक जड़ मान्यताओं,रीति-रिवाजों,जाति-प्रथा का प्रतिरोध करते हुए ज्यादा प्रोग्रेसिव सोसाइटी बनाने में मददगार साबित होते हैं,एक संवेदशील समाज बनाने की दिशा में करते हैं, यह उसकी गति कुंद करने का काम करता है।..और इस तरह

 कहानी वहीं घूम-फिरकर आ जाती है कि प्यार के प्रति समाज में पहले से कहीं अधिक घृणा पैदा की जाए जिसमें इसके नाम पर टेलीविजन की दूकान तो चलती रहे लेकिन सामाजिक तौर पर इसके विरोध का माहौल बना रहे। प्रेम जब समाज के खुलेपन और प्रोग्रेसिव वैल्यू का हिस्सा बनने लग जाता है तो टेलीविजन उसके आगे दुश्मन की तरह खड़ा हो जाता है। आज वही काम इस शो के जरिए हो रहा है।

 संभव है प्यार में धोखा होता है,किसी के पार्टनर कई बार वफादार नहीं हो सकते लेकिन प्यार में सब के सब दगाबाज,चालू,मतलबी और मक्कार ही होते,ऐसा मानना और इस धारणा का प्रसार करना गलत है। प्रेम करनेवालों का आंख खोलने के नाम पर ऐसे शो यही काम करते हैं।..और तब आपको अंदाजा लगता है कि आज का टेलीविजन प्रेम के मामले में पहले से कहीं ज्यादा जड़ और रुढ़िवादी हो गया है। जिन कविता और कहानियों को पढ़ते हुए आप अपने को प्रेम के प्रति मानसिक रुप से तैयार करते हैं,ऐसे शो के एपीसोड आपको इसके प्रति बुरी तरह डराते हैं,फोबिया पैदा करते हैं। प्रेम,रोमांस,डेटिंग और शादी के नाम पर करोड़ों की दूकान चलानेवाले ऐसे टेलीविजन पर यदि प्रेम को लेकर इतनी निगेटिव समझ  है तो वो दर्शकों के लिए कितना लॉयल रह जाता है? हम जैसे दर्शक तो चाहेंगे कि हमारी रिलेशनशिप की लॉयल्टी टेस्ट होने के पहले ऐसे टेलीविजन शो की ही लॉयल्टी टेस्ट हो जाए ताकि पार्टनर से भरोसा उठ जाने पर भी इसकी गोद में सिर रखकर बिसूरने का विकल्प बचा रहे।.

मूलतः प्रकाशित- आइनेक्सट, 1 जुलाई 2011 
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