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अन्ना सीजन वन और सीजन टू में टाटा से लेकर महिन्द्रा कंपनी ने अन्ना का समर्थन करके सरकार को आगाह कर दिया था कि अगर संसद के भीतर की चीजें हमारे मुताबिक नहीं हुई तो हम संसद के बाहर का मौहाल इतनी गर्म कर देंगे कि संसद के भीतर के लोग अपने आप महत्वहीन हो जाएंगे. टाटा डोकोमो ने ब्रांड अन्ना ऑफर और कॉलर ट्यून जारी किए, रतन टाटा ने देश के उद्योगपतियों से इस आंदोलन में साथ आने की अपील की. बजाज हमेशा साथ खड़े होने की बात की. ये वो सारी कार्पोरेट कंपनियां हैं जो तथाकथित भ्रष्ट सरकार के अपने साथ न दिए जाने पर भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ी हो गई थी.



चूंकि मीडिया और कार्पोरेट ममेरे-फुफेरे भाई हैं तो मीडिया ने भी जमकर इस अन्ना सीजन 1 और 2 का साथ दिया. न्यूजरुम के सारे सूरमा शीतप्रभाव(एसी) से निकल जंतर-मंतर पर जमा हुए. कटिंग चाय और कीन्ले की दम पर घंटों पीटूसी देते-करते रहे..चैनल के मालिकों के लिए ये भले ही मिले सुर मेरा तुम्हारा था लेकिन कुछ मीडियाकर्मियों के लिए जंतर-मंतर और रामलीला मैंदान कॉन्फेशन सेंटर थे जहां वे अपनी गर्दन की नसें फुलाकर पहले के कर्मों की प्रायश्चित इस सीजन के पक्ष में बात करके कर रहे थे. एक ही साथ कई सुरमाओं ने आवाज लगायी जिसमें सबसे उंचा स्वर अर्णव गोस्वामी का था. वो इसलिए भी कि उनकी मदर कंपनी की साख राष्ट्रमंडल खेल की ठेकेदारी न मिलने और पेड न्यूज प्रस्ताव की बात कैग की रिपोर्ट में सामने आने के बाद बुरी तरह मिट्टी में मिल चुकी थी और उन्हें ये दाग धोने थे. इस उंचे स्वर में अपने आइबीएन7 के आशुतोष का स्वर इतना गहरा गया कि जॉन रीड की "दस दिन दुनिया जब हिल उठी" की तर्ज पर अन्ना आंदोलन के पक्ष में पूरी की पूरी एक किताब ही लिख डाली और अगर उस दौरान की बहसों की फुटेज देखें तो आशुतोष आपको अन्ना कार्यकर्ता की भूमिका में नजर आएंगे. आशुतोष को अगर अपनी सैलरी की चिंता नहीं व्यापती तो जिस तरह जे पी आंदोलन में कई पेशेवर पत्रकार शामिल हुए थे, सब छोड़-छाड़कर वो भी इस सीजन में कूदते. लेकिन

अब यही चैनल आइबीएन7 भरी-पूरी भीड़ दिखाते हुए भी कह रहा है कि मैंदान खाली है. लोग नहीं जुट रहे हैं. आम आदमी नजर नहीं आ रहा. सवाल ये नहीं है कि लोग जुट रहे हैं कि नहीं. सवाल है कि क्या अब तक मीडिया जिस भ्रष्टाचार की मुहिम का साथ दे रहा था( हालांकि वो सिर्फ डैमेज कंट्रोल का हिस्सा था), अब सब दुरुस्त हो गया. हमें तो लगा था कि कोई नहीं तो कम से कम नेटवर्क18 ग्रुप के चैनल सरकार के विरोध में खड़े होंगे क्योंकि उस पर सीधे अंबानी का हाथ है लेकिन नहीं. उसकी वेबसाइट ने रिपोर्ट प्रकाशित की है कि अन्ना आंदोलन के बाद भ्रष्टाचार बढ़ा है..तो जनाब ये होती है सत्ता के पक्ष की जुबान. भूतपर्व स्टार न्यूज जो अब एबीपी न्यूज है ने सुपर लगाया- अन्ना का फ्लॉप शो ? जिस मीडिया और चैनल के लिए पिछले साल अन्ना का रियलिटी शो आंदोलन था और जब ये बात हम-आप कहते थे लोग कोडे बरसाने की मुद्रा में आ जाते थे. आज एक चैनल इस आंदोलन को शो बता रहा है तो कोई उससे सवाल करनेवाला नहीं है कि जिस आंदोलन में हजारों लोग शामिल हैं, उसे आप शो कैसे कह सकते हैं और सारी बहस परफॉर्मेंस पर क्यों हो रही है, मुद्दों पर बात क्यों नहीं हो रही ? क्या लोगों के कम जुटने से सारे मुद्दे खत्म हो गए और फिर जो बेशर्म मीडिया बार-बार सवाल कर रहा है कि लोग कहां गए, कोई उनसे भी तो पूछे कि लोगों का तो छोड़िए, आप कहां गए ? कल तक तो आप टीम अन्ना के चीयरलीडर और कार्यकर्ता बने फिरते थे.

अब कोई अर्णव से जाकर पूछे कि मीडिया इज अन्ना और अन्ना इज मीडिया का नारा कहां गया. वी सपोर्ट अन्ना के सुपर कहां गए और द टाइम्स ऑफ इंडिया का इश्तहार. भाईजी, हम ऐसे ही नहीं कहते हैं कि मीडिया शरीर का बुखार तक मुफ्त में नहीं देता,कवरेज कहां से देगा ? अब देखिएगा केजरीवाल और उनके वृंदों की जुबान उस मीडिया के खिलाफ जल्द ही खुलेगी जिसे अब तक मसीहा मानकर थै-थै कर रहे थे. चैनलों के एक-एक स्लग,सुपर,पीटूसी और एंकर लाइन अन्ना सीजन4 को कमजोर करने में जुटे हैं और इस हालत तक ला छोड़ेगे कि विजयादशमी तक केजरीवाल के पुतले फूंके जाएंगे और क्या पता अबकी बार सोनियाजी लाल किला जाकर रावण के पुतले में नहीं, उनके ही पुतले में बत्ती लगा आए.
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जिसकी निष्ठा खुद कटघरे में हो

Posted On 12:19 pm by विनीत कुमार | 3 comments

नौ जुलाई को गुवाहाटी की बीस साल की छात्रा के साथ हुई छेड़छाड़ और हमले के मामले में मीडिया को बराबर का अपराधी माना जा रहा है। सूचना अधिकार कार्यकर्ता और अण्णा समूह के सदस्य अखिल गोगोई ने गुवाहाटी के समाचार चैनल न्यूज लाइव के संवाददाता गौरव ज्योति नेओग पर आरोप लगाया कि उसने लोगों को उकसाया और फिर उसकी वीडियो रिकार्डिंग की। गोगोई ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस और फिर वीडियो स्क्रीनिंग के जरिए इसे सार्वजनिक किया, जिसमें इस घटना में शामिल बीस से ज्यादा लोगों के बीच गौरव ज्योति को पहचाना जा सकता है। फिलहाल दबाव बनने की स्थिति में 19 जुलाई को जमानत याचिका खारिज होने के एक दिन बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।


समाचार चैनलों के हितों की रक्षा करने वाली संस्था बीइए (ब्रॉडकास्टर एडीटर्स एसोसिएशन) ने 17 जुलाई को प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए बताया कि गुवाहाटी मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय (वरिष्ठ टीवी एंकर दिबांग, बीइए के सचिव एनके सिंह और आईबीएन 7 के प्रबंध संपादक आशुतोष) जांच समिति गठित की गई है। यह समिति वहां जाकर पता लगाएगी कि इस पूरे मामले में क्या वाकई किसी मीडियाकर्मी की भूमिका शामिल है। जरूरत पड़ने पर वह निर्देश भी जारी करेगी कि ऐसे मामलों में पत्रकारिता-धर्म का किस तरह से निर्वाह किया जाना चाहिए?

बीइए की इस पहल पर गौर करें तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि गौरव ज्योति, गोगोई और न्यूज लाइव चैनल का जो मसला पूरी तरह कानूनी दायरे में आ चुका है, उसके बीच वह अपनी प्रासंगिकता स्थापित करने की कोशिश में है। आमतौर पर मीडिया की आदतन और इरादतन गड़बडि़यों को नजरअंदाज करने वाली संस्था बीइए अगर ऐसे कानूनी मामले के बीच अलग से जांच समिति गठित करने और रिपोर्ट जारी करने की बात करती है तो इसके आशय को गंभीरता से समझने की जरूरत है। इसके साथ ही ऐसे कानूनी मामले में बीइए अब तक क्या करती आई है, इस पर गौर करें तो स्थिति और साफ हो जाती है। 


13 अगस्त, 2010 को दिन के करीब डेढ़ बजे उनतीस वर्षीय कल्पेश मिस्त्री ने गुजरात के मेहसाणा जिला के उंझा पुलिस स्टेशन परिसर में आत्मदाह कर लिया। उसी शाम करीब सवा चार बजे उसकी मौत हो गई। घटना के दो दिन बाद पंद्रह अगस्त को उंझा पुलिस स्टेशन में दो मीडियाकर्मियों कमलेश रावल (रिपोर्टर, टीवी 9, मेहसाणा) और मयूर रावल (स्ट्रिंगर, गुजरात न्यूज) के खिलाफ कल्पेश मिस्त्री को आत्मदाह के लिए उकसाने के मामले में एफआईआर दर्ज की गई। इस घटना को लेकर भी बीइए ने सात सदस्यीय जांच समिति गठित की थी, जिसमें टाइम्स नाउ के अभिषेक कपूर और आईबीएन 7 के जनक दवे अपने व्यक्तिगत कारणों से इस पूरी प्रक्रिया से दूर रहे। समिति ने इस घटना से जुड़े लोगों से बात करने, घटनास्थल का जायजा लेने और कल्पेश मिस्त्री के परिवार वालों से मिलने में कुल एक दिन का समय लगाया और अगले दो दिन बाद रिपोर्ट तैयार कर दी। 25 से 27 अगस्त के बीच यह सारा काम हो गया और दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में आधे-अधूरे मीडियाकर्मियों की मौजूदगी में रिपोर्ट जारी कर दी गई। कल्पेश मिस्त्री और मयूर रावल का जो मामला पूरी तरह कानूनी दायरे में था, उसे बीइए की समिति ने मीडिया की नैतिकता और पत्रकारों का दायित्व जैसे मुद्दों में तब्दील करने की कोशिश की। उसने जो तथ्य दिए उससे कहीं से भी इन दोनों मीडियाकर्मियों को कानूनी प्रावधान के तहत सजा देने की जरूरत नहीं रह जाती है।

इस घटना के अलावा बीइए गठित होने के बाद से पिछले साल तक, सवा दो सालों में, किए गए उसके कुल नौ फैसलों पर गौर करें तो एक भी ऐसा नहीं है जिसकी बिना पर बीइए यह दावा कर सकती है कि उसने मीडिया के भीतर की गंदगी और गड़बडि़यों को दूर करने का काम किया है। उसका एक ही उद्देश्य है- इस बात की पूरी कोशिश कि पत्रकारों और टीवी चैनलों से जुड़े मामले किसी भी रूप में कानूनी प्रावधान के अंतर्गत न आएं और अगर आ जाते हैं तो उन पर आनन-फानन में रिपोर्ट जारी कर या फिर मामूली सजा देकर पूरे मामले को मीडिया की नैतिकता की बहस में घसीट लाओ। इस कोशिश में इंडिया टीवी पर किया गया फैसला भी शामिल है।

बीइए की ओर से अब तक की सबसे सख्त सजा इंडिया टीवी पर लगाया गया एक लाख रुपए का जुर्माना है। 26/11 के मुंबई हमले के दौरान इंडिया टीवी ने पाकिस्तानी मूल की फरहाना अली से इंटरव्यू प्रसारित किया। यह इंटरव्यू रायटर न्यूज एजेंसी से कॉपीराइट का उल्लंघन करते हुए लिया गया था, जिसमें उसे सीआईए की आतंकवादी घटनाओं की विशेषज्ञ के बजाय पाकिस्तान का जासूस बताया गया। फरहाना अली की शिकायत के बाद बीइए ने जब एक लाख रुपए का जुर्माना किया तो रजत शर्मा, (सीइओ और एडीटर इन चीफ, इंडिया टीवी) ने बीइए के कामकाज के प्रति अविश्वास जताते हुए अपनी सदस्यता वापस ले ली। बाद में बीइए के मान- मनौव्वल पर उन्होंने कुछ शर्तें रखते हुए स्थायी सदस्यता ली।

 इस पूरे घटनाक्रम में इंडिया टीवी ने साबित कर दिया कि बीइए की हैसियत क्या है! कोई मीडिया संस्थान बीइए के फैसले को नहीं मानता या फिर उसकी सदस्यता नहीं लेता तो उसके पास ऐसा कोई प्रावधान या अधिकार नहीं है कि वह इसके लिए बाध्य करे। इससे ठीक विपरीत जब वह किसी एक मीडिया संस्थान के खिलाफ फैसले करता है तो उसकी कमजोर स्थिति खुल कर सामने आ जाती है। ऐसे दर्जनों चैनल हैं, जिन्हें बीइए की गतिविधियों और फैसले से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि उल्टे उसके द्वारा जारी निर्देशों का जब-तब खुलेआम धज्जियां उड़ाने से भी नहीं चूकते। लेकिन बीइए है कि ऐसे मामलों में अपनी प्रासंगिकता साबित करने की भरपूर कोशिश करता है। शायद यही कारण है कि जो मीडिया संस्थान और चैनल उसके सदस्य नहीं होते, उनके मामलों में भी हस्तक्षेप करता है। जो मीडिया संस्थान कानूनी मामलों में फंसा रहता है, वह इस उम्मीद से उसकी कार्यवाही को स्वीकार कर लेता है कि उसके पहले के फैसले और रिपोर्टों से समझ आ रहा होता है कि संगठन कानूनी मसले को नैतिकता के सवाल में तब्दील करने की पूरी कोशिश करेगी।
सपाट शब्दों में कहें तो ऐसा करके बीइए दरअसल, अपने को कानून और न्यायिक जांच प्रक्रिया से अपने को ऊपर स्थापित करना चाहता है, जबकि खुद मीडिया संस्थानों के बीच न तो उसकी मजबूत पकड़ है, न ही साख है और न ही कोई विशेष अधिकार। अगर ऐसा होता तो वह मीडिया की उन गड़बडि़यों को सबसे पहले दुरुस्त करने का काम करता। इससे लोगों में यह संदेश जा रहा है कि मीडिया में जो जितना गलत तरीके से काम करता है, वह उतना ही आगे जाता है। जो जितना नैतिकता और पत्रकारीय दायित्व की धज्जियां उड़ाता है, उतना ही तरक्की पाता है।

 अगर ऐसा नहीं होता तो 2007 में लाइव इंडिया के जिस रिपोर्टर प्रकाश सिंह ने उमा खुराना फर्जी स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया, वह मामूली सजा के बाद रसूखदार व्यवसायी और सांसद का मीडिया सलाहकार नहीं बन जाता। उमा खुराना फर्जी स्टिंग ऑपरेशन की फुटेज से अगर गुवाहाटी वाली घटना की फुटेज का मिलान करें तो दोनों में एक ही तरह से स्त्री के कपड़े फाड़ने की कोशिश हो रही है। एक में स्कूली छात्राओं की इज्जत बचाने के नाम पर और दूसरे में एक स्कूली छात्रा के साथ सरेआम यौन उत्पीड़न के लिए। तब दिल्ली के तुर्कमान गेट की भीड़ को नियंत्रित नहीं किया जाता तो दंगे की प्रबल संभावना थी। लेकिन चैनल के जिस सीइओ और प्रधान संपादक सुधीर चौधरी ने इस पूरे मामले से पल्ला झाड़ते हुए मीडिया में बयान दिया कि उसके रिपोर्टर ने उसे अंधेरे में रखा वही बाद में उस चैनल के रियल इस्टेट के हाथों बिक जाने के बाद तरक्की पाकर जी न्यूज का संपादक और बिजनेस हेड नहीं बन पाता। इतना ही नहीं, यही संपादक सालों से बीइए का खजांची भी है। दिलचस्प है कि यह सब उसी महीने हुआ जब चैनलों पर गुवाहाटी मामले के बहाने मीडिया की नैतिकता पर बहस हो रही है।
मामला बहुत साफ है कि जो संस्था मीडिया के धतकर्मों पर परदा डालने और कानूनी मामले को नैतिकता के दायरे में लाने पर अक्सर आमादा रही है, उससे गुवाहाटी जैसे मामलों में निष्पक्षता की कितनी उम्मीद की जा सकती है? खुद ऐसे संगठन कब तक मीडिया की साफ़- सुथरी छवि का भ्रम बनाए रख सकते हैं? 

( मूलतया जनसत्ता 22 जुलाई 2012 में प्रकाशित. )
फांट परिवर्तन और तस्वीर- मीडियाखबर.कॉम
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मंटो पर फ्रॉड शब्द चढ़ा रहता. वो बात-बात में फॉड है, कहते. ये मीराजी के दोनों हाथों में गोले क्या हैं ? सब फ्रॉड है..कुछ हेपतुल्ला करो यार, इसमें हेपतुल्लइज्म नहीं है, थोड़ा हेपतुलाइजेशन होनी चाहिए. ये हेपतुल्ला क्या है ?..मंटो मानते थे कि एक बार शब्द चल निकला तो वो शब्द अर्थ तो अपने आप अख्तियार कर लेगा. एक मंटो बम्बई में है तो एक मंटो पाकिस्तान में भी होना चाहिए ताकि वहां के हराम हुकुमरान की भी नुक्ताचीनी कर सके.



ये है महमूद फारुकी और दानिश हुसैन की "मंटोइयत". मंटों पर दास्तानगोई जिसे हमने आज शाम सुना. यकीन मानिए मंटो पर इससे बेहतरीन शायद ही कुछ हो. मंटो को लेकर आमतौर पर जो स्टीरियोटाइप की छवि लिए हम घूमते हैं, उससे काफी कुछ अलग और विस्तृत जिसमें उनकी आवारगी के बीच भी एक चिंता मौजूद रहती है. एक लेखक और फक्कड़ इंसान के बीच ये एहसास बराबर बना रहता है कि वो सोफिया का पति और तीन बच्चों का बाप है. जो शादी की रात जब थककर सो जाता है और सुबह उठता है तो महसूस करता है कि उसके शरीर का एक हिस्सा शौहर हो चुका है और वो इस बात से संतुष्ट है. आगे वो लगातार इस चिंता में होता है कि अगर उसे कुछ हो गया तो ये मुश्किल में पड़ जाएंगे. एक शख्स जो सबकुछ बर्दाश्त कर सकता है लेकिन बेकद्री बिल्कुल भी नहीं. 

एक शख्स जो हमेशा विलोम में जीता है, जीना चाहता है लेकिन व्यवस्था की तथाकथित व्यवस्थित ढांचे के भीतर की अश्लीलता को उघाड़कर रख देता है. जिसकी अश्लीलता के आगे आप मंटो की भाषा पर एतराज करने के बजाय स्वयं से सवाल करेंगे- तो क्या इसके अलावे भी कोई शब्द और भाषा है जिसके जरिए कोई अपनी बात रख सकता है ? जिसका जीवन एक ही साथ दुनियाभर के उपन्यासों,कहानियों के बीच उलझा हुआ था लेकिन वो इतना जरुर जानता था कि अगर उसका नायक कोई आदर्श रुप धारण करता है,नैतिक दिखने लगता है तो उसका कैसे मुंडन किया जा सकता है और उन्होंने ये रस्म बहुत ही खूबसूरती से निभायी. और ये सब किसी दावे के साथ नहीं, यूं ही. जिसका कि एक सवाल के साथ कि हर बात पर रुस क्यों, हम जिस जमीन पर खड़े हैं उस हिस्से की बात क्यों नहीं सीधा मानना है कि जमाने को सिखाने से बेहतर है उससे बहुत कुछ सीखा जाए.

इस"मंटोइयत" में सिर्फ मंटो नहीं है. स्वयं महमूद फारुकी के शब्दों में जो यहां इस उम्मीद से पहुंचे हैं कि इस दास्तानगोई सुनने के बाद मंटों की किताब पढ़ने से बच जाएंगे, उनसे गुजारिश है कि द एट्टिक,कनॉट प्लेस, नई दिल्ली( जहां दास्तानगोई हो रही थी) के नीचे चले जाएं, वहां उन पर कुछ किताबें रखी है. इस मंटोइयत में दरअसल मंटो का वो मिजाज है जिसके जरिए वो एक ही साथ मनमोहन सिंह द्वारा शासित भारत,जरदारी की हुकुमत का पाकिस्तान और बराक ओबामा के अमेरिका को देखता है. हिन्दी पाठों की चर्चा करते हुए हम अक्सर कहते हैं न- व्यक्ति नहीं विचार है, कालखंड की घटना नहीं पूरी प्रक्रिया है, कुछ-कुछ वैसा ही.

इस "मंटोइयत" में एक वो लेखक और पिता शामिल है जिसे एक समय के बाद हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों देशों के प्रति मन उचट जाता है. जो दोनों देशों के भौगोलिक विभाजन के बावजूद संस्कृति और जीवन के स्तर पर जिंदगी भर भेद नहीं कर पाता..जो अक्सर अपनी बेचैनी को लेखन के बीच खत्म करना चाहता है. वो पैसे के लिए लिखता है,यारों के सपनों के लिए लिखता है,जीने के लिए लिखता है, बेचैन होने पर लिखता है..वो हर मौके पर लिखता है लेकिन कभी इस दावे से नहीं लिखता कि वो लिखकर समाज को बदल देगा..एक फ्रीलांसर की हैसियत से,पेशेवर लेखक के तौर पर जिसके भीतर जिंदगी के फलसफे अपने आप समाते चले जाते हैं.

सिनेमा की दुनिया, विभाजन, एक पेशेवर लेखक के बीच स्वतंत्र और अपने मन का लेखन और पेशगी लेकर लिखने की बीच के मानसिक तनाव को समझने के लिए चाहे देश के किसी भी हिस्से में ये "मंटोइयत" हो, जरुर देखा जाना चाहिए.

हमने महमूद और दानिश की बिना इजाजत लिए करीब दो घंटे की इस "मंटोइयत" की रिकार्डिंग कर ली है लेकिन बिना उनकी इजाजत के साझा नहीं करेंगे.ये शायद सही भी नहीं होगा. फिलहाल इतना ही. मंटो की इस गिरफ्त में चूल्हे पर चढ़ी मैगी जलकर राख हो गई और रसोई धुएं से भर गया है. आंखें नींद से बोझिल हो जा रही है.पूरी रात में इसे "मंटोइयत" में कैद रहना है. सच में मंटो से मोहब्बत करने के लिए आपको कुछ न कुछ बर्बाद करना होता है. अगर मैगी क्या खुद को ही बर्बाद कर लें तो इससे बेहतर शायद ही कुछ हो. विस्तृत रिपोर्ट और महमूद से इजाजत मिलने पर ऑडियो वर्जन जल्द ही.

तस्वीर- मिहिर की ट्वीट से सेंधमारी
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दीदी अपना काम खत्म कर चुकी थी और रोज की अपेक्षा आज कुछ ज्यादा ही जल्दी में थी. रोज काम के बाद थोड़ी ही देर सही, मेरे पास बैठती. दुख-सुख, गर गृहस्थी की बातें बताती. मेरी हरकतों पर हंसती. विम जब खत्म हो गया है भइया तो इसकी शीशी रखकर क्या करोगे. अरे दीदी, मैंने सुप्रीम एन्क्लेव के सामने देखा कि झालमूढ़ी बनानेवाले ने इसमें सरसों तेल रखे हुए है और उससे पहली की कफ सिरप की बोतल के ढक्कन पर छेद नहीं करने होते. मेरी उससे बात हुई तो उसने कहा आपके पास खत्म होगा तो हमें दे दीजिएगा इसलिए ऱकने कहा था.हा हा...


रुक जाइए दीदी, बस ये नींबू-पानी पीकर चले जाइएगा. नहीं भइया, आज नहीं. घर में बिटिया अकेली है, इंतजार कर रही होगी. घर के काम निबटाने के बाद मैं उनके साथ चाय,नींबू-पानी या ऐसा ही कुछ साथ पीना अच्छा लगता.

 लेकिन आज रुकने के लिए तैयार नहीं थी. साढ़े दस बजे से मुझे हर हाल में टीवी देखनी थी,मैं देखने लगा. थोड़ी देर तो वो पर्दे पकड़कर खड़ी रही फिर मोढ़े पर इत्मिनान. से बैठ गयी. आमतौर पर मैं किसी के साथ टीवी देखना पसंद नहीं करता. हो-हल्ले या किसी के साथ मैं पढ़ाई तो कर सकता हूं लेकिन टीवी नहीं देख पाता लेकिन दीदी का साथ बैठकर देखना अच्छा लग रहा था. इससे पहले मेरे साथ वो सत्यमेव जयते के तीन एपीसोड देख चुकी है.

 राजेश खन्ना की शवयात्रा देखकर उनकी आंखें छलछला जा रही थी. हम बदल-बदलकर हिन्दी चैनल देख रहे थे लेकिन सबसे सही आइबीएन7 लग रहा था..न्यूज24 के पास पचास उनसुनी कहानियां का पहले से माल पड़ा है सो बार-बार उसे ही दिखाए जा रहा था. आजतक पर अभिसार का कुछ खास असर था नहीं.हम आइबीएन7 पर ही टिके रहे.
जानते हैं भइया, जब अराधना फिल्म आयी थी न तो हमारा रिश्ता आया था. देख-सुन लेने के बाद हमारी होनेवाली नन्दें हमें सिनेमाहॉल ले गई थी दिखाने. हम चौदह साल के थे, शर्ट और पैंट पहनते थे. अम्मी से पूछकर चले गए देखने.नन्दें बाहर निकलकर मजाक करने लगी. निकाह तो नहीं हुई थी लेकिन तभी से भाभी मानने लगी थी..मैं चैनल की वीओ भूल चुका था और स्क्रीन पर चल रही फुटेज में दीदी की कहानी समाती चली जा रही थी. एक बार लगा भी कि इसीलिए मैं किसी के साथ टीवी नहीं देख पाता लेकिन जब चैनल पर सब मोनोटोनस होता गया, दीदी की बातों को ज्यादा गौर से सुनने लगा.
शवयात्रा में पता नहीं क्या सम्मोहन होता है कि लगता है एक-एक चीज देखें. जीवन में पहली बार राजीव गांधी की शवयात्रा की पल-पल की तस्वीरें दूरदर्शन पर देखी थी. उसके बाद तो निजी समाचार चैनलों पर कई हस्तियों की. खैर, टीवी देखते हुए दीदी के चेहरे पर कई तरह के भाव चढ़ते-उतरते जा रहे थे. इंसान कहां सब दिन रह जाता है भइया, जो करके जाता है, वही याद रह जाता है.

अरे,साढ़े ग्यारह बज गया. हम चलते हैं अब भइया, मरा आदमी को तो इतनी देर देख ही लिया, हम तो ये देखने बैठे थे कि आपलोगों में अंतिम विदाई कैसे करते हैं,टीवी पर देखते इनको. ये तो दिखाया ही नहीं. अब घर जाकर जिंदा लोगों को देख लें,छोटा लड़का स्कूल से आता होगा.

दीदी के जाने पर अंग्रेजी चैनलों पर शिफ्ट होता हूं. हिन्दी चैनलों में खराब पैकेज और अतिवाद के बावजूद तरलता ज्यादा है. अंग्रेजी चैनलों पर प्राइम टाइम जैसी बहस होने लगी है. मसलन आप ये नहीं कह सकते कि शरीर राजेश खन्ना का था जबकि आत्मा किशोर कुमार. किशोर कुमार ने देवानंद के लिए भी गाया है. मीडिया को एक निश्चित सीमा के बाद आगे जाने की इजाजत नहीं है. जाहिर है वो बची-खुची सामग्री से ही काम चला रहे थे. जिससे एक समय बाद संवेदना के बजाय खीज पैदा होने लगी. रात में तो उनके निजी संबंधों और रिश्तों को लेकर जैसी-जैसी और जिस तरीके से बात कर रहे थे, घिन आ रही थी. ऐसा क्यों है कि सिनेमा,कला, रंगमंच का कोई शख्स हमारे बीच से चला जाता है तो सबसे ज्यादा गंध उसके संबंधों को लेकर मचाई जाती है जबकि भ्रष्ट से भ्रष्ट नेता के गुजरने पर चैनल महानता के कसीदे गढ़ने में कहां से शब्द ढूंढ लाते हैं ? कल से अब तक चैनलों ने राजेश खन्ना को लेकर जो कुछ भी दिखाया, कहीं से वो श्रद्धांजलि जैसा नहीं लग रहा था या तो मास हीस्टिरिया पैदा करने की कोशिश थी या फिर चैनलों का वो फूहड़पन जो ग्रेट इंडियन लॉफ्टर चैलेंज या कॉमेडी सर्कस जैसे शो से तैरकर इधर आ गया था.

इन सबके बीच हेडलाइंस टुडे को देखना अच्छा लगा. स्टूडियो से एंकर अपनी रिपोर्टर को राजेश खन्ना के अंदाज में ही पुष्पा की जगह बार-बार रश्मा-रश्मा संबोधित कर रहा था.
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रुपक कभी मरते नहीं पुष्पा

Posted On 4:00 pm by विनीत कुमार | 10 comments

दोस्तों और अपनी पत्नी के काका और हमारे राजेश खन्ना हमारे बीच नहीं रहे. महेश भट्ट के शब्दों में आज थोड़े-थोड़े हम भी मरे हैं. मेरी आंखें भी छलछला गई हैं. सिर्फ राजेश खन्ना के लिए नहीं, सत्तर-अस्सी के दशक में शादी हुई उन दीदी और बुआ के लिए जिनसे एक बार बिना पूछे कि उनके पापा और भाईयों ने एक अंजान शख्स से जिंदगी भर के लिए बांध दिया. आज वो हम सबसे ज्यादा रोएगी, वो आज राजेश खन्ना को कुछ ज्यादा ही मिस करेगी.


अरेंज मैरिज का चलन ऐसा जिसमें फूल जैसी दीदी, मासूम,निर्दोष लेकिन पढ़ी-लिखी तेजतर्रार दीदी का पल्लू उमरदराज, आगे के उड़े हुए बाल, एक पैर से भटक कर चलनेवाला, एक आंख से तिरछी देखनेवाला, थुलथुल मोटे और इन सबसे कहीं ज्यादा हैवान के साथ बांध दिया जाता. इन दीदीयों को जब विदा होते देखता तो वो बछड़े की तरह मां से, हमसे बिलख-बिलखकर रोती. मेरे घर के आगे गायें काटी जाती थी तो मैं उस सीन से अक्सर इस विदाई के दृश्य को जोड़कर देखता था. कितना चिपटकर रोती थी दीदी हमसे. बुआ लोगों का अल्हड़पन कैसे इस अकेली एक घटना के बाद हमेशा के लिए खत्म हो जाता था. आज देश में जिन-जिन महिलाओं का बेमल विवाह हुआ है, उनकी इच्छा को जाने बिना या उसके विरोध में हुआ है, वो सबके सब राजेश खन्ना की मौत पर बहुत रोएगी. वो ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगी.

दीदी,बुआ बुझे मन से पहली बार मायके आती. उन्हें अपनी सहेलियों से जीजाजी,फूफा को मिलवाने में शर्म आती. क्या कहेंगी,मोहल्ले की लड़कियां ? ये जानते हुए भी कि सबों के साथ लगभग ऐसा ही होना है, फिर भी कितनी चिंतिंत रहती दीदी. कई बार बिना बुलाए ही मोहल्ले की लड़कियां इस नए-नवेले जीजाजी से मिलने आ जाती..मैंने कई बार जब दूसरे के घरों में होता तो उनकी मांए हिदायत देती- जा रही हो जूली,जीजाजी अधभैसु( दीदी से उम्र में लगभग दुगुना) हैं, कुछ ऐसा हंसी-ठठ्ठा मत कर देना कि मीरा अफड़ने लगे( बिलख-बिलखकर रोने लगे). ऐसा सबों के साथ होता..लेकिन जब एकमुश्त दस-बारह सालियां जुटती तो ये हिदायतें कहां याद रह जाती हैं. हां उन लड़कियों को इस बात का ध्यान जरुर रह जाता कि जीजाजी कि किसी एक बात की ऐसी तारीफ की जाए कि दीदी को लगे कि ये शख्स मेरे लिए सही है...और किसी भी एक खूबी को बताने के लिए उदाहरण देती- दीदी, जीजाजी तो बिल्कुल राजेश खन्ना हैं.

आज अगर एक पैर से भटककर चलनेवाले या सिर के बाल उड़े हुए जीजाजी के बारे में कोई साली कह दे कि दीदी, जीजाजी तो बिल्कुल शाहिद कपूर या जॉन इब्राहिम लग रहे हैं तो दीदी इस अश्लील मजाक से सदमे में आ जाएगी लेकिन राजेश खन्ना से तुलना करने का मतलब ऐसा नहीं था. राजेश खन्ना से तुलना करने का मतलब होता था कोई एक ऐसी बात है जो जीजाजी में कि वो बिल्कुल राजेश खन्ना जान पड़ते हैं. उनकां हंसना, उनका बोलना, दर्जनों सालियों के बीच भी बात करने का एक खास सलीका. कुछ नहीं तो बाल ही, बाल न सही तो अपनी बात पर गौर फरमाने के लिए दीदी की ठुड्डी पकड़कर उपर की ओर उठाना. अधेड़ उम्र का, अनपढ़, दीदी के आगे राक्षस दिखनेवाला शख्स कैसे एक रुपक से इतना बेहतर दिखने लग जाता कि दीदी जब मायके से विदा होकर जाने लगती तो कहती- जाने दो, जो हैं जैसे हैं, जिंदगी तो इन्हीं के साथ बितानी है न. ऐसे में आप कह सकते हैं कि राजेश खन्ना ने ऐसी हजारों,लाखों लड़कियों के मन में अरेंज मैरिज के प्रति आस्था बनाए रखा और उसका विस्तार ही किया. तब आप राजेश खन्ना को शायद माफ भी नहीं कर पाएं. लेकिन एक अकेले रुपक के भरोसे इन लड़कियों पूरी जिंदगी अपनी पसंद से बिल्कुल उलट शख्स के साथ बिता देना स्वयं राजेश खन्ना के व्यक्तित्व का कितना बड़ा जादुई हिस्सा है, इस पर सोचने की जरुरत है.

क्या दीदी और बाकी लड़कियां राजेश खन्ना के बाल, मुस्कराहट,चलने के तरीके, छवि, आवाज आदि से तुलना किए जाने भर से अपने उस जीवनसाथी से प्यार करने लग जाती थी जिसे कि न तो उसने चुना था और न पहले कभी जाना था. जो दीदी स्कूल-कॉलेज के अच्छे से अच्छे और एक से एक स्मार्ट लड़के को फटीचर कहकर हड़का दिया करती, एक से एक होनहार और मेधावी लड़के को बात-बात में गदहा कहा करती,आखिर वो सचमुच के लद्दड़, घाघ से बंधकर कैसे पूरी जिंदगी काटती आयी ? नहीं, ये सिर्फ राजेश खन्ना कद-काठी और हुलिए से की जानेवाली तुलना का असर नहीं था. आखिर दीदी मासूम जरुर होती, इतनी भी वेवकूफ नहीं कि जिसके पति के सिर पर बाल ही नहीं, वो राजेश खन्ना की तुलना पाकर कैसे खुश हो जाती. सच बात तो ये है कि कभी चाचियों के साथ, कभी दबे-छुपे ढंग से सहेलियों के साथ राजेश खन्ना की उन सारी फिल्मों को देखती आयी थी जिसमें राजेश खन्ना एक भरोसा हुआ करता- इस शख्स से प्यार करोगे तो जिंदगी भर निभा ले जाएगा, दगा नहीं देगा. अभी चंकी पांडे की बाइट सुनी. उन्होंने कहा- जो एक बार राजेश खन्ना का हो गया, किसी और का हो ही नहीं सकता. सत्तर-अस्सी के दशक की दबी और अपनी इच्छाओं की दबाकर रखनेवाली हमारी दीदी कभी कह नहीं सकती थी खुलकर कि वो राजेश खन्ना की दीवानी है लेकिन हां उसके भीतर के बनने और परिपक्व होनेवाले सपने में किसी भी शख्स को राजेश खन्ना मानकर तो देखा ही जा सकता था न. इसकी क्रेडिट आप चाहें तो उस दौर की फिल्मों को दे लें जहां प्यार,समर्पण,एकनिष्ठा,प्रतिबद्धता एक दूसरे से इस कदर गुथे होते कि लगभग एक-दूसरे के पर्याय जान पड़ते. इसे प्रेम का मूल्य भी आप प्रस्तावित कर सकते हैं जो कि अब विमर्श की दुनिया में बौद्धिक पिछड़ापन और प्रेम जैसा बुनियादी विद्रोह कर्म करते हुए भी दकियानूस हो जाना है.

लेकिन दीदी, प्यार के इस रुप और निभा ले जाने की क्रेडिट निर्देशक को नहीं दे सकती थी. सिनेमा में जो हीरो है, वही सबकुछ है कि तर्ज पर राजेश खन्ना का व्यक्तित्व उनके दिलोदिमाग पर छाया रहता. वो दो ही काम कर सकती थी या तो अपने जैसे-तैसे जो भी मिले पति को राजेश खन्ना मान ले या फिर भीतर की उस भावना को संजोए जीती रहे- जाने दो, जीना ही है न, इसी के साथ जी लेती हूं, राजेश खन्ना से प्यार करने से हमें कौन रोक सकता है ? आप सोचें तो राजेश खन्ना ने कैसा असर अपने इन दर्शकों पर छोड़ा जो कि आज के सलमान,शाहरुख, ऋतिक के खंड़ित व्यक्तित्व और क्रश से बिल्कुल जुदा है. आपको मैचोमैन पसंद है तो जॉन इब्राहिम,चॉकलेटी पसंद है तो शाहिद कपूर, फैमिली-फैमिली मैरिज मटिरियल भाता है तो शाहरुख खान..राजेश खन्ना को जिसने पसंद किया,टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं, एक कम्प्लीट मैन के रुप में जिसका एक हिस्सा भी अपने जीवनसाथी से मैच कर जाए तो जिंदगी निकाल ली जा सकती है.

अभी से लेकर कल-परसों तक न्यूज चैनलों पर उनकी फिल्मों की क्लिप्स चलेंगी, फिल्माए गाने चलेंगे, वॉलीवुड की दिग्गज हस्तियों की बाइट चलेगी. पूरा का पूरा वीकिपीडिया टीवी स्क्रीन पर तैरने लग जाएगा लेकिन उन महिलाओं की बात शायद ही हो जो अपने जीवनसाथी में राजेश खन्ना का अक्स देखकर उसके साथ निभाती रही..जिसका मुर्झाया चेहरा सिर्फ इस एक रुपक से खिल गया कि दीदी,जीजाजी तो राजेश खन्ना जैसे दिखते हैं. जिन मांओं का कलेजा सूप की तरह बड़ा हो गया कि पड़ोस में सबसे ज्यादा डाह रखनेवाली ने भी कमेंट किया- खुद ही चाहे कितनी भी लड़ाकिन हो लेकिन दामाद राजेश खन्ना खोजकर लाई..देश के लाखों राजेश खन्ना, आज तुम्हारी पत्नी तुम्हारे थोड़े-थोड़े मरने का मातम मना रही है, उसे एकदम से मर जाने मत देना. 
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