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वर्चुअल स्पेस पर प्रभात रंजन और शशिकांत ने अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को संयुक्त रुप से ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने की घोषणा को उत्साह में आकर साझा किया और एक तरह से इस खबर के प्रसार की नैतिक जिम्मेदारी अपने उपर ली। प्रभात रंजन ने अपने ब्लॉग जानकीपुल और फेसबुक के जरिए इस खबर को प्रसारित किया,वही शशिकांत ने सीएसडीएस सराय की मेलिंग लिस्ट के जरिए इसे हम पाठकों तक पहुंचाया। चूंकि इस बात की जानकारी हमें सबसे पहले इन दोनों के माध्यम से ही मिली थी इसलिए हमें इनसे सवाल करना जरुरी लगा कि क्या ज्ञानपीठ ऐसा करके पुरस्कार की राशि दोनों के बीच आधी-आधी करके बांटेगा। यानी स्वतंत्र रुप से ज्ञानपीठ पुरस्कार पानेवाले की जो राशि होती है,उसकी आधी राशि इन दोनों साहित्यकारों को मिलेगी? व्यक्तिगत तौर पर ऐसा किया जाना मुझे अनैतिक लगा और हमने दीवान पर इस संबंध में सवाल छोड़े। लिहाजा शशिकांतजी ने एक के बाद एक इनसे जुड़े तथ्य हमारे सामने रखे और मैंने भी उसके साथ कुछ संस्मरण और तर्क जोड़ने की कोशिश की। शशिकांतजी का यहां तक कहना है कि ज्ञानपीठ ने ऐसा दरअसल विवाद पैदा करने और चर्चा में आने के लिए किया है। उनकी बात में सच्चाई इसलिए भी है कि ऐसा वह पहले भी कर चुका है। निर्मल वर्मा और गुरदयाल सिंह को संयुक्त रुप से पुरस्कार देते समय ऐसा ही किया और आधी-आधी राशि दोनों को मिली। सवाल है कि साहित्यकार के लिखे का आकलन क्या इतना वस्तुनिष्ठ होता है कि दो को इस धरातल पर लाकर खड़े कर दिए जाएं कि पुरस्कार की राशि आधी हो जाए? अगर ऐसा होता है तो निर्णायकों के लिए साहित्य भी कोई रचनाकर्म न होकर प्रोजेक्ट या टिकमार्क करनेवाली चीज है और हम इसका विरोध करते हैं। ज्ञानपीठ चाहे तो दो की जगह चार को संयुक्त रुप से पुरस्कार दे लेकिन राशि का बांटा जाना किसी भी रुप से सही नहीं है। इस पूरे मामले में दिलचस्प पहलू है कि जिस निर्णायक मंडल ने ये फैसला लिया है,उसमें गुरदयाल सिंह भी शामिल हैं जिनके साथ ये घटना घटित हुई। अब देखना ये हैं कि इस संयुक्त फैसले पर मुहर लगाने के बाद गुरदयाल सिंह पुरस्कार की राशि पूरी मिले,इसके लिए क्या प्रयास करते हैं? आप भी इस संबंध में अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करें। फिलहाल शंशिकातजी ने दीवान पर जो विचार हमसे साझा किए हैं,उस पर एक नजर-


शशिकांत


मित्रो, 
भारतीय ज्ञानपीठ ने बताया कि वर्ष 2009 के लिए 45 वां ज्ञानपीठ पुरस्कार हिन्दी लेखक अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को संयुक्त रूप से दिया जाएगा और वर्ष 2010 के लिए 46 वां ज्ञानपीठ पुरस्कार कन्नड लेखक चंद्रशेखर कंबर को दिया जाएगा।

यहां कल शाम सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में हुई ज्ञानपीठ पुरस्कार चयन समिति की बैठक में अन्य सदस्य प्रो. मैनेजर पांडे, डा. के सच्चिदानंदन, प्रो. गोपीचंद नारंग, गुरदयाल सिंह, केशुभाई देसाई, दिनेश मिश्रा और रवीन्द्र कालिया शामिल थे।
मालूम हो, मलयालम के प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार ओएनवी कुरूप को वर्ष 2007 के लिए 43वाँ और उर्दू के नामचीन शायर अखलाक खान शहरयार को वर्ष 2008 के लिए 44वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जा चुका है।

विनीत
पुरस्कार की राशि तब आधी-आधी हो जाएगी क्या शशिकांतजी या फिर बिग बॉस में डबल सिम(संजय दत्त और सलमान खान) होने पर भी दोनों को अलग-अलग चार्ज मिलेगा वैसा ही। ये अंदेशा सिर्फ इसलिए है कि कई बार कॉलेज के दिनों में प्रतियोगिताओं में हमें संयुक्त पुरस्कार मिला तो राशि आधी हो जाती थी और सम्मान बराबर का मिलता। इस उम्र में दोनों रचनाकारों के लिए राशि का मसला भी बराबर से मायने रखता है।

शशिकांत

भाई विनीत जी, ज्ञानपीठ ने दूसरी बार ऐसा किया है. इससे पहले निर्मल वर्मा और गुरुदयाल सिंह को भी संयुक्त रूप से दिया गया था और ख़ूब विवाद हुआ था. संभव है, ज्ञानपीठ जानबूझ कर ऐसे फ़ैसले लेता है ताकि विवाद हो. लेकिन शायद इस बार दोनों लेखक ऐसे हैं जो विवाद न खड़ा करें. पिछली बार निर्मल वर्मा तो चुप रह गए थे लेकिन गुरुदयाल सिंह जी ने विवाद खड़ा किया था भाई.

विनीत
मैंने शशिकांतजी इसलिए पूछा कि जिस शख्स को सम्मानित किया जाता है वो अपने दौर का दिन-रात एक करके रचनाकर्म में लगा लेखक होता है,जिनकी बड़े उदात्त विचार,समाज को बदलने का सपना होता है,उबाल होता है,विधा को तराशने की तड़प होती है लेकिन जब तक सम्मानित किया जाता है तब तक वो मरीज या पार्शियल मरीज की स्थिति में आ जाता है। उनेके विचार के आगे कई बार न चाहते हुए भी जरुरतें हावी हो जाती है और लगता है कुछ जोड़कर रख लेता। ऐसे में पुरस्कारों में कतर-ब्योत होने लगे तो चोट पहुंचती है। हिन्दी का साहित्यकार पैसे की मार वैसे भी शुरु से झेलता आया है,अगर वो आलोचक/विभागीय आलोचक न हो तो। कुछ ऐसे साहित्यकारों से मैं व्यक्तिगत तौर पर मिला भी हूं। इसलिए धातु की बनी प्रतिमा के आगे पैसे के मामले को नजरअंदाज करना इनके प्रति समझिए एक तरह से अन्याय ही होगा। ज्ञानपीठ अगर विवाद के जरिए चर्चा चाहता है तो आप जिनलोगों ने पुरस्कार की खबर प्रसारित करने की नैतिक जिम्मेदारी उत्साह के साथ ली है,ये बात भी स्पष्ट करें तो बेहतर होगा। ऐसा न हो कि घर जाकर लिफाफा देखने के बाद शॉल की गर्मी कनकनी में बदल जाए।

शशिकांत

भाई विनीत जी, बिल्कुल सही कहा आपने. निर्मल वर्मा जैसे बेहद शालीन, संकोची, विनम्र और एकांतपसंद रचनाकार से जब राष्ट्रीय सहारा अखब़ार के लिए 'लेखक के साथ' कॉलम के लिए लंबा इंटरव्यू लेने गया था 2002 में तो उन्होंने पूछा था, 'इस इंटरव्यू के लिए मुझे भी कुछ पैसा देंगे क्या राष्ट्रीय सहारा वाले?' उन दिनों निर्मल जी की तबीयत ख़राब थी. ढेर सारी दवाइयां राखी थीं उनके सिरहाने, उनके सहविकास सोसायटी, पटपडगंज, दिल्ली वाले घर में. मैंने यह बात सहारा के गुप एडिटर गोविन्द दीक्षित और नामवर जी को बतायी थी. नामवर जी उन दिनों सहारा के सम्पादकीय सलाहकार थे. लेकिन निर्मल जी को कोई पारिश्रामिक नहीं मिला. तब से मैं इंटरव्यू देनेवाली शख्सियत को भी पारिश्रमिक देने की बात उठा रहा हूँ. आप मीडिया के बेहद सक्रिय, उत्साही युवा आलोचक हैं. इस मसले को हिंदी अखब़ार के संपादकों तक पहुँचा सकते हैं. ऐसी उम्मीद है मुझे

विनीत


पता चला कि विष्णु प्रभाकर बहुत बीमार चल रहे हैं तो डीयू के हम कुछ छात्रों ने तय किया कि उनसे किसी दिन मिलने चलेंगे। कुछ कहना नहीं है,बस ये कि सर आपका लिखा पढ़ा है,हम आपसे मिलने आए हैं। हम जब वहां पहुंचे तो हम जान नहीं पाए कि वो उनकी बहू थी या फिर बेटी लेकिन अचानक से छ-सात लड़के लड़कियों को दरवाजे पर देखकर घबरा गईं। हमने आने का मकसद बताया तो कहने लगी- सॉरी,वो बहुत बोल नहीं पाएंगे। हमलोगों ने कहा-हम उनका न तो कोई इंटरव्यू लेंगे और न ही उन्हें ज्यादा कुछ बोलने के लिए कहेंगे। तब हम अंदर दाखिल हुए। पीतमपुरा में उनका घर चारों तरफ से समृद्ध नजर आ रहा था लेकिन उन्होंने जमीन खरीदने से लेकर घर बनने तक की पूरी कहानी विस्तार से बतायी। ये भी बताया कि कैसे-कैसे लोग आए,कलाम से लेकर वाजपेयी तक से मदद दिलाने की बात कर गए,आपलोग बहुत बड़े होते तो आपसे मिलता भी नहीं। बच्चे हो,उत्साह में हो तो मना नहीं कर सका। इस दौरान वो बार-बार अपनी टोपी(गांधी टोपी) संभालते रहे। हमें कभी कोई बड़ा सम्मान नहीं मिला,जो मिला उसे लेकर कई तरह के विवाद हुए,हमने कुछ नहीं कहा...फिर आंखों में आंसू। साहित्य में कई बार गांधीवादी होना तकलीफदेह हो जाता है। हम सब सुनते रहे,नोट करते रहे। एक साथ रिकार्ड भी करता रहा जिसकी चिप हॉस्टल आते ही खराब हो गयी। हम तब ब्लॉग की दुनिया में नहीं आए थे। हम चाहते थे कि वो कहीं छपे। बाद में जब हम वापस कैंपस पहुंचे तो कई साथियों को इस बात पर गुणा-गणित करने में दिक्कत होने लगी कि प्रभाकरजी तो गांधीवादी हैं,अगर हमने जहां कुछ इन पर लिखा तो हमारे गाइड नाराज हो जाएंगे। प्रगतिशील और मार्क्सवादी शिक्षक का छात्र भला गांधीवादी साहित्यकार से कैसे प्रभावित हो गया? मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

महीना भी नहीं गुजरा था,विष्ण प्रभाकर गुजर गए। हममे से एक साथी दौड़ते-भागते मेरे पास आया और मैंने जो कुछ भी नोट किया था,ले गया। उसके बाद विष्णु प्रभाकर का विशेषांक निकाला। विष्णु प्रभाकर की पूरी बातचीत में पैसा बहुत बार आया। कई-कई तरीके से,मानो की जीवन के अंतिम समय में आकर यही उनकी निर्णायक काबिलियत का हिस्सा था जहां आकर वो मार खा गए। शशिकांतजी,आपने निर्मल वर्मा को लेकर जो संस्मरण सुनाया,कैसा कचोटता है सुनकर। मैंने तो उपर के कमेंट बस आशंका के तौर पर की लेकिन आपके पास तो संस्मरण हैं। हम अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को लेकर ऐसा ही सोच रहे हैं। ये अलग बात है कि हमें उनकी वस्तुस्थिति की जानकारी नहीं।

शशिकांत

"जब हम वापस कैंपस पहुंचे तो कई साथियों को इस बात पर गुणा-गणित करने में दिक्कत होने लगी कि प्रभाकरजी तो गांधीवादी हैं,अगर हमने जहां कुछ इन पर लिखा तो हमारे गाइड नाराज हो जाएंगे। प्रगतिशील और मार्क्सवादी शिक्षक का छात्र भला गांधीवादी साहित्यकार से कैसे प्रभावित हो गया? मामला ठंडे बस्ते में चला गया।" भाई विनीत जी दुर्भाग्य से यह सोच डीयू में हमें विरासत में मिलती है. हमें इसका प्रतिकार करना है. अपनी समझ, अपने विवेक से काम लेना है चाहे अंजाम जो भी हो. मेरे मार्क्सवादी गाइड प्रो नित्यानंद तिवारी, विश्वनाथ तिवारी और कई मार्क्सवादी साथी मुझे समाजवादी समझते रहे और समाजवादी शिक्षक मार्क्सवादी. एक शेर है इस पर- 'जाहिद तंगनज़र समझते हैं कि मैं काफ़िर हूँ और काफ़िर ये समझते हैं मुसलमाँ हूँ मैं.' यह हमारी उपलब्धि है. हम विचारधारों के पिछलग्गू नहीं हैं. मार्क्सवादी गाइड नाराज़ हों तो हों हम नंदीग्राम और सिंगूर में सीपीएम के जुल्मों का विरोध करेंगे, और समाजवादी जार्ज के बीजेपी के साथ जाने तथा कॉंग्रेस के परिवारवाद का विरोध करनेवाले समाजवादी लालू और मुलायम के परिवारवाद का भी. हमारा वैचारिक स्टैंड किसी लाल किताब, झंडे या गांधी, लोहिया, जेपी की मूर्ति  से नहीं आज की ज़मीनी हकीक़त से तय होता है और उसी के आधार पर हम लिखते हैं और लिखते रहेंगे.    

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आज से चार साल पहले इसी तरह बारिश के बाद की ठहरी हुई सी सुबह थी। घर में कोई हलचल नहीं। रसोई से न प्रेशर कूकर की आती आवाज और न बाथरुम से फुलस्पीड में बहते पानी की आवाज। न तो रेडियो सिटी पर प्रताप की आवाज और न ही दूसरे कमरे में अपने चैनल पर क्या चल रहा है,देखने की तड़प। सब शांत। मीडिया के 15-16 घंटे लगातार घिसते रहने की नौकरी छोड़ने के बाद की पहली सुबह। रात में ही तय था कि अगली सुबह नहीं जाना है लेकिन नींद उसी तरह साढ़े चार बजे खुल गयी थी। मेरे दोस्त को अपनी नाईट शिफ्ट से लौटने में अभी तीन घंटे बाकी थे और मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या करुं? अखबारों के वेब संस्करण सरसरी तौर पर पढ़ गया था लेकिन आगे क्या...? पा नहीं क्यों अचानक से याद आया। एनडीटीवी वाले अविनाश ने कथादेश सम्मान में जैसे और लोगों को कहा था,वैसे मुझे भी कहा- कभी मोहल्ला देखिएगा। सीएसडीएस-सराय में जब मैं निजी चैनलों की भाषा पर अपना पर्चा पढ़ रहा था,उस वक्त भी राकेश कुमार सिंह(जो कि तब सराय में ही थी) ने भी कहा था-मौका मिले तो कभी ब्लॉग पर भी टहल आइए,वहां नए किस्म की भाषा बन रही है,आपको कुछ आइडिया मिलेगा। तब वो खुद हफ्तावार नाम से ब्लॉग चला रहे थे। ये सारी बातें दिमाग में चल ही रही थी और तब मैंने गूगल सर्च पर ब्लॉग टाइप किया जिसमें एक लिंक आया-क्रिएट योर ब्लॉग और फिर जैसे-जैसे निर्देश दिए थे,मैं करता गया औऱ दस मिनट के भीतर मेरा भी अपना ब्लॉग हो गया- गाहे बगाहेः हां जी सर कल्चर के खिलाफ। बाद में जब मैंने अपना डोमेन लिया तो इसे हुंकार कर दिया। दोपहर तक पांच-छः कमेंट आ गए थे और ब्लॉग बिरादरी में पहले से जमें हुए लोगों ने स्वागत किया था और लगातार लिखते रहने के लिए शुभकामनाएं दी थी। फिर तो ब्लॉग का ऐसा चस्का लगा कि ठुकदम-ठुकदम जारी ही है।

मैं शुरु से ही तकनीक और गुणा-गणित के मामले में फिसड्डी छात्र रहा हूं। आर्टस की पढ़ाई करने से काम चल गया लेकिन ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखते ही इस बात का एहसास हो गया कि हम जिस रचनात्मक तरीके से सोचते हैं,जिन रंगों,तस्वीरों और कलेवर में अपनी बात रखना चाहते हैं,उसके लिए तकनीकी समझ जरुरी है। हमारी इस कल्पना को तकनीक की भाषा में कैसे व्यक्त किया जाए,ये एक बहुत मुश्किल तो नहीं किन्तु नया काम था। न्यूज चैनल में काम करते हुए इतनी समझ तो आ गयी थी कि लिखने की शर्तें और किसी माध्यम की तकनीक संस्कृति के साथ लिखने की शर्तें दो अलग-अलग चीज है। कुछ दिन अपने मन से उटपटांग तरीके से ब्लॉगिंग करते हुए पता चलने लग गया था कौन किस बात का मास्टर है,ये सब किससे सीखा जा सकता है? हमने तब उनलोगों ो मेल करके अपनी समस्याएं साझा करना शुरु किया। चेन्नई में बैठे पीडी को तंग किया,कानपुर में अनूप शुक्ल तो सीखाने के लिए जनता दरबार ही खोल रखा था,मेल और चैट पर बात समझ नहीं आयी तो कहा अपना मोबाईल नंबर भेजो और फिर फोन पर समझाते,शैलेश भारतवासी की तो मैंने न जाने कितनी बार नींद खराब की होगी-सो रहे थे क्या,सॉरी देखिए न पिक्चर की साइज बढ़ ही नहीं रही,एक जगह जाकर फिक्स हो गई है। गिरीन्द्र आइएनएस न्यूज एजेंसी की कोल्हू के बैल जैसी थका देनेवाली नौकरी से लौटकर सुस्ता रहा होता कि हम मैसेज करते- ए हो गिरि,देखो न हमसे ऑडियो अपलोड हो ही नहीं रहा,ललित आप कविताकोश जैसा मेरा ब्लॉग भी थोड़ा सुंदर कर दीजिए न। जयपुर में बैठा कुश मेरे ब्लॉग की टेम्प्लेट मुहैया कराता। रवि रतलामी तो वर्चुअल स्पेस पर तकनीक की लंगर ही चलाते,जिसको जो फांट,सॉफ्टवेयर,एचटीएमएल कोड चाहिए,मेल करो और ले जाओ। वो लिखने के साथ-साथ अपने ब्लॉग को सजाने-संवारने का भी जमाना था। किसी ने अपने ब्लॉग पर रीडर्स मीटर लगा दी है,किसी ने स्लाइड शो लगा दिया है किसी के ब्लॉग के नीचे पीटीआइ या रेलवे स्टेशन की तरह स्क्रॉल चलते रहते और हमारा मन ललच जाता और हम पूछते-कैसे किया ऐसे और वो फिर हमें बताते और एचटीएमएल कोड भेज देते। बाद में हम समझने लग गए कि ये सब एचटीएमएल का मामला है तो सीधा मेल करते -आपके यहां जो मोंटाज है,उसका एचटीएमएल कोड भेजें। ये सब बताने-समझाने में हमें आज दिन तक कभी किसी ने मना नहीं किया बल्कि लोग इतने उत्साहित होते कि चैट के बाद खुद ही नंबर लेकर फोन पर आ जाते और न केवल मेरी तात्कालिक समस्याओं का निबटारा करते बल्कि इसके पहले क्या तरीका था,अब कैसे बदल गया और इसके एडवांस तरीके क्या हो सकते हैं,सब बताते। कई बार मैं उब जाता या बड़ा ही उलझाउ लगता तो कहता- सर/भईया/गुरुजी/दोस्त मुझे इतना समझ नहीं आता,फिलहाल आप ऐसा करें,मैं आपको अपने ब्लॉग-पासवर्ड दे देता हूं,आप उसे दुरुस्त कर दें,बाद में मैं इसे बदल लूंगा। लोग ऐसा भी कर देते,पर कुछ मना कर देते और समझाते इस तरह से पासवर्ड मत दिया करो किसी को। मैं बस इतना ही कह पाता-अरे नहीं सर,बातचीत से ही समझ आ जाता है कि ऐसा कुछ नहीं करेंगे। कंटेंट के स्तर पर लोगों के बीच चाहे जितनी भी मारकाट मची रहती हो लेकिन तकनीक बताने-समझाने और साझा करने में एक खास किस्म की आत्मीयता थी और लोग बड़े उदार तरीके से बताते।

ब्लॉगिंग करते हुए जो तकनीक हम सीख रहे थे,वो सिर्फ ब्लॉगिंग भर के काम का नहीं थी। फॉन्ट से लेकर इंटरनेट और कम्प्यूटर की ऐसी सारी चीजें थी जो कि अभी बेहतर तरीके से काम आ रही है। एक तरह से कहें तो हम निट या एरिना जैसे प्रोफेशनल कम्प्यूटर ट्रेनिंग सेंटर में गए बिना वो सबकुछ सीख रहे थे जिसकी हमें जरुरत थी। हम इस तकनीक को बहुत ही घरेलू स्तर पर सीख रहे थे। जब हम चैट या फोन पर बात कर रहे होते तो ये भी बताते-पता है सर,आज रात में मेरे हॉस्टल की मेस बंद है तो मैं बाहर रहूंगा,आपसे देर रात ही फिर बात हो पाएगी। अरे दोस्त,मुझे ऑफिस के लिए निकलना है,वापस आकर कॉल करुं? मैं पूछ लेता-ब्रेकफास्ट किया कि नहीं। देखो इतनी सारी बातें हो गयी लेकिन याद ही नहीं रहा कि बेटी को स्कूल से लाने जाना है। तकनीक औऱ समस्याओं पर बात करते हुए भी देशभर में फैले ब्लॉगरों की गृहस्थी और हलचलों से होकर गुजरते। बाद की बातचीत तो इतनी अनौपचारिक हो गयी कि पटना में बैठा ब्लॉगर बताता कि आज हमने मुनगे की सब्जी खायी,मजा आ गया,धनबाद की लवली बहुत दिनों से गायब क्यों है,शायद बीमार होगी? तकनीकी मदद करने के अलावे फिर कंटेंट के स्तर पर भी बातचीत होने लगी। लोग कमेंट तो करते या मांगते ही लेकिन जी नहीं भरने की स्थिति में फोन तक करते और कहते-चैट पर कमेंट के लिए कहा था,तीन घंटे हो गए,तुमने कुछ किया ही नहीं या फिर-फोन बस ये कहने के लिए किया था कि सही पोस्ट लिखी है तुमने,दीयाबरनी वाली बात पढ़कर तो हम सेंटी हो गए। हम वर्चुअल स्पेस की एक अनंत दुनिया के बीच ही उसी तरह के घरेलू संबंधों से भावनात्मक स्तर पर बंधने लगे थे जैसे कि परिवार के सदस्यों से बंधे होते हैं। मार्शल मैक्लूहान ने जिस ग्लोबल विलेज की बात कही थी,औद्योगिक स्तर पर नहीं किन्तु तकनीकी और भावनात्मक स्तर पर ज्यादा बेहतर समझ आने लगा था। तीन-चार दिनों तक किसी ने पोस्ट नहीं लिखी तो चिंता होने लगती,क्या हो गया मनीषा पांडे को,कहीं बीमार तो नहीं हो गई? अरे युनुस खान ने तो रेडियोनामा को गांव का ट्रांसफार्मर ही बना दिया है,तीन दिन हो गए,कोई अपडेट ही नहीं है। तब ब्लॉगरों को लेकर कई किस्म के मिथक भी अपने आप बन गए थे,मसलन-ब्लॉगर वह है जो चौबीसों घंटे ऑनलाइन रहता है,जिसे कभी नींद नहीं आती है,जो कभी खाता भी है तो अपनी डेस्क या स्टडी टेबल पर ही। ब्लॉगर कभी बीमार नहीं पड़ता है,वो अजर-अमर है और जब तक ब्लॉगिंग करता रहेगा,यमराज को भी हिम्मत नहीं है कि उसे उठा ले जाए। ये एक किस्म से चौबीस घंटे की नौकरी में जीने जैसी संस्कृति थी जिसे कि किसी ने किसी पर थोपा नहीं था बल्कि लोगों ने अपनी खुद की इच्छा,दिलचस्पी और चस्के की गिरफ्त में आकर पैदा की थी।
आगे भी जारी.....

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निजी चैनलों पर सरकार एक बार फिर से लगाम कसने का मन बना रही है। इस मामले में दिलचस्प पहलू है कि इसके पहले सरकार ने जब भी इन चैनलों पर लगाम कसने की बात की तो उसमें सीधे तौर पर जनहित के सवाल जुड़े रहे लेकिन अबकी बार अन्ना हजारे अनशन को लेकर चैनलों ने जिस तरह से कवरेज दी,सरकार का पक्ष है कि वह तटस्थ होने के बजाय एकतरफा रही और उसमें सरकार की ओर से कही गयी बातों का या तो गलत संदर्भ दिया गया या फिर उसकी बातों की अनदेखी की गई। दूसरी तरफ अन्ना की टीम ने मंच से बार-बार मीडिया और इन निजी चैनलों का शुक्रिया अदा किया, अन्ना समर्थक तिहाड़ जेल से लेकर रामलीला मैंदान तक थैंक्यू टू ऑल मीडिया की अलग से तख्ती दिखाते नजर आए। इसका सीधा मतलब है कि जिस कवरेज को लेकर सरकार नाराज है,उसी कवरेज से अन्ना की टीम,समर्थक और अनशन में  शामिल लोग संतुष्ट हैं जिसे कि भारतीय जनमानस की अभिव्यक्ति करार दिया जा रहा है।

निजी समाचार चैनलों पर लगाम कसने और उसे नियंत्रित करने की बात कोई नई घटना नहीं है। सरकार अपनी तरफ  से नैतिकता,सरोकार,जागरुकता और संप्रभुता जैसे सवालों के साथ जोड़कर इसे नियंत्रित करने की कई कोशिशें करती आयी हैं। लेकिन अबकी बार नियंत्रण करने का जो मामला बन रहा है,वह पहले से अलग इस अर्थ में है कि 2 जुलाई को भ्रष्टाचार और मीडिया की भूमिका पर बोलते हुए देश के सैंकड़ों पत्रकारों के बीच सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने कहा था कि वह स्वयं और सरकार नहीं चाहती है कि मीडिया पर किसी तरह का उनकी तरफ से नियंत्रण हो। अंबिका सोनी ने मौजूदा चैनलों में कुछ कमियों की चर्चा जरुर की थी लेकिन उसे भी इनके लिए काम कर रहे लोगों को ही दुरुस्त करने की सलाह दी थी। लेकिन अब सरकार अन्ना अनशन के एक सप्ताह भी नहीं बीते कि दोबारा से नियंत्रण लाने की बात कर रही है तो इसका सीधा मतलब है कि इस दौरान हुई कवरेज को लेकर उसे दिक्कत है और चैनलों ने देश की भारी भीड़/जनता को दिखाते हुए मौजूदा सरकार की जिस तरह की छवि पेश की है,संभव है उससे एक हद तक खतरा भी हो।

इधर चैनलों का अपना तर्क है कि उन्होंने यह सब देश में फैले भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए किया है। इस दौरान चैनलों ने न केवल अन्ना अनशन और भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही गतिविधियों का प्रसारण किया बल्कि दर्शकों से इस बात की अपील भी कि आप इनके साथ आएं। एक अंग्रेजी चैनल ने अपने ही संस्थान के अखबार में विज्ञापन छपवाया- सपोर्ट अन्ना और चैनल पर भी लगातार इसे फ्लैश करता रहा। जाहिर है चैनलों ने इस घटना की जिस तरह से कवरेज की,उसमें कई बार यह साफतौर पर झलक रहा था कि वह अन्ना की टीम के तौर पर ही काम कर रहे हैं जिसे कि अब वे जनभावना के साथ होने का नाम दे रहे हैं। ऐसे में सरकार जिस नीयत से इन चैनलों को नियंत्रित करना चाहती है,उसकी मंशा तो हमें एक हद तक समझ आती ही है कि यह भी कोई व्यापक जनसरोकार के पक्ष में नहीं है लेकिन चैनलों का जो रवैया रहा है और जिस तर्क से वे खबरों का प्रसारण करते रहे, ऐसे में अन्ना के इस अनशन,जनलोकपाल बिल और उसे लागू किए जाने के तरीके से जिन्हें असहमति रही है,उनके शामिल होने की गुंजाइश मीडिया के इस रुप में कहां थी, चैनल अपने भीतर के विपक्ष को जिस तेजी से खत्म कर रहा है,वह क्या लोकतंत्र के लिए कम खतरनाक है? क्या इस पर सरकार से अलग,दर्शकों की तरफ से कोई सवाल नहीं बनते हैं?

अब अपने को जनसरोकारों का प्रतिनिधि बताकर सरकारी नियंत्रण की बात शुरु होते ही मीडिया संस्थानों से जुड़े लोग आपस में लामबंद होने शुरु हो गए हैं,मीडिया और चैनलों का प्रतिनिधित्व करनेवाले संगठनों के बयान आने शुरु हो गए हैं जिसमें सरकार के इस कदम की कठोर निंदा की जा रही है। बीइए(ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एशोसिएशन) के महासचिव एन.के.सिंह का कहना है कि खुदा के लिए इस कवरेज को मुनाफे और बिजनेस के लिहाज से फायदे का हिस्सा मानकर मत देखिए,सरकार का कहना है कि हमने एकतरफा खबरें दिखाई लेकिन सवाल है कि भ्रष्टाचार का भला दूसरा पक्ष क्या हो सकता है?

फिलहाल जो स्थिति बनी है वह यह कि अगर आप अन्ना के अनशन के समर्थन में हैं तो आपको मौजूदा न्यूज चैनलों के इस तर्क के साथ खड़ा ही होना होगा। चैनलों ने इस अनशन के दौरान अपनी जो शक्ल पेश की है,उससे अलग होने का मतलब है कि आप भ्रष्टाचार खत्म किए जाने की भूमिका के साथ नहीं है। अन्ना,मीडिया और भ्रष्टाचार विरोधी गतिविधियां एक-दूसरे से कुछ इस तरह घुल-मिल गए हैं कि इनमें से एक से भी असहमत होने का अर्थ है उस अनशन,उस पहल से अपने को अलग करना जिसके माध्यम से एक बेहतर स्थिति बनने की पूरी-पूरी गुंजाईश है और जिसे कि समाचार चैनलों ने तमाम अन्तर्विरोधों को नजरअंदाज करके लगभग प्रस्तावित कर दिया है। ऐसे में कुछ जरुरी सवाल तो जरुर हैं जिसे कि न्यूज चैनलों सहित उनका प्रतिनिधित्व करनेवाले संगठनों से पूछे ही जाने चाहिए या फिर उन तथ्यों की तरफ ईशारा किया जाना चाहिए जो कि भ्रष्टाचार खत्म होने की मुहिम के पहले बनती दिखाई दी?

सबसे पहला सवाल कि क्या इस अनशन के भीतर टीआरपी की संभावना नहीं होती तो भी इस की कवरेज जारी रहती और दूसरा कि चैनल अन्ना अनशन के साथ ही भ्रष्टाचार के सवाल के साथ क्यों खड़े हुए? अगर चैनल भ्रष्टाचार के सवाल को लेकर इतनी चौकस है तो फिर चैनल का चरित्र उससे अलग क्यों नहीं है?

पहले सवाल के जबाब में अगर हम अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के उस संदर्भ पर गौर करें जहां उनकी टीम मुख्यधारा की मीडिया पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय अपने स्तर से न्यू मीडिया को लेकर लोगों के बीच अपनी पकड़ बना चुकी थी। फेसबुक के इंडिया अगेन्सट करप्शन के पन्ने पर भारत सहित दुनियाभर के देशों से जिस तरह की लाखों में सकारात्मक प्रतिक्रिया आ रही थी,उससे यह स्पष्ट हो गया था कि सड़कों पर उतरने से पहले ही वर्चुअल स्पेस पर यह आंदोलन पूरी तरह खड़ा हो चुका है। ऐसे में फेसबुक की कुल संख्या का 20 से 30 फीसदी लोग भी सड़कों पर उतरते हैं तो यह एक असरदार मुहिम होगा। इसका सीधा मतलब है कि अन्ना की टीम ने फेसबुक पर इंडिया अगेन्स टरप्शन की जो शुरुआत की थी,टेलीविजन के लिए टीआरपी के बीज उसी में छिपे थे। चैनलों को इसकी लोकप्रियता से इस बात का अंदाजा लग गया था कि इस मसले पर लोगों की गहरी दिलचस्पी है और अगर यह चल निकला तो लंबे समय के लिए टीआरपी के लिहाज से स्थायी सामग्री होगी। इसके साथ ही चैनल के अपने पुराने एजेंड़े को भी अंजाम दिया जा सकता है।

3 अप्रैल से जब अन्ना का अनशन जंतर-मंतर,दिल्ली में शुरु हुआ और इस टीम के अपने नेटवर्क प्रबंधन से लोगों का जमावड़ा शुरु हुआ। अगले दिन से एक-एक करके चैनलों की टुकड़ियां कवरेज के लिए हाजिर होने लगी और 8 अप्रैल तक अन्ना के अलावे कोई दूसरी खबर प्रमुखता से नहीं चली। इस दौरान चैनलों ने कुल 6000 क्लिप्स दिखाए जिसमें कि 65 को छोड़कर बाकी 5592 क्लिप्स अन्ना के समर्थन में थे। चैनलों के इन क्लिप्स की अगर विज्ञापन राजस्व के लिहाज से हिसाब लगाएं तो इसमें करीब 175 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। आप कह सकते हैं कि अन्ना अनशन के पहले दौर में चैनलों ने इतनी मोटी रकम निवेश कर दिया था जिसमें कि भविष्य के लिए स्थायी तौर पर टीआरपी मिलती रहने की संभावना थी। 8 अप्रैल के बाद आईपीएल शुरु होते ही चैनल अन्ना की खबरों से हटकर वही आइपीएल, मनोरंजन,क्रिकेट और रियलिटी शो की खबरों पर वापस लौटने लगे लेकिन अन्ना की कवरेज के दौरान जो टीआरपी चैनलों को मिली,उससे उनकी कई तकलीफें दूर होने की संभावना बनती दिखाई दी। फिक्की-केपीएमजी की रिपोर्ट पर गौर करें तो समाचार चैनल,मनोरंजन चैनलों से लगातार मार खाते आ रहे हैं,लोग खबरों के बजाय मनोरंजन और दूसरे कार्यक्रमों की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। दूसरा कि राष्ट्रीय चैनल के बजाय क्षेत्रीय चैनलों की तरफ लोगों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है,ऐसे में दो ही रास्ता है- एक तो नेशनल चैनल एक-एक करके क्षेत्रीय स्तर पर चैनल शुरु करे या फिर क्षेत्रीय स्तर पर जो चैनल सफल हैं,उनके साथ व्यावसायिक समझौते करे। अन्ना के अनशन की सफलता में कई मोर्चे पर फंसे राष्ट्रीय चैनलों के उबरने की गुंजाईश बनती दिखायी दी।

इस संदर्भ में टीआरपी के साथ-साथ एक बड़ा मसला था कि इस दौरान समाचार चैनलों की साख 2जी स्पेक्ट्रम मामले में पूरी तरह मिट्टी में मिल चुकी थी। सरकारी जांच एजेंसियों ने जिस तरह से एक के बाद एक टेप जारी किए थे और उसमें एक से एक मीडिया दिग्गजों के नाम सामने आने लगे थे, ऐसे में देखते-देखते बड़े-बड़े समाचार चैनल पूरी तरह बेपर्द हो गए। उनकी साख इतनी नहीं रह गयी थी कि वे लोगों के सामने इस अधिकार से सामने जा सकें कि वे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के तौर पर काम करते हैं। समाचार चैनलों की साख गिरने की पुष्टि इस बात से भी हो जाती है कि जब 8 अप्रैल को अन्ना के अनशन के सफल होने की जश्न में इंडिया गेट पर 2जी स्पेक्ट्रम मामले में अपनी साख गंवा चुके पत्रकार ने जब लाइव कवरेज करने की कोशिश की तो लोगों ने उसका प्रतिरोध किया और उन्हें बिना कवर किए वहां से जाना पड़ा। 2 जी स्पेक्ट्रम में दागदार हुए पत्रकारों और संस्थानों की याद अब भी लोगों के बीच बनी हुई थी। चैनलों के लिए अन्ना का यह अनशन उस डैमेज कंट्रोल की तरह था जिसे मजबूती से पकड़े रहने की स्थिति में खोई हुई साख को वापस लाने की संभावना बनती।

जून आते-आते अन्ना की टीम के सदस्यों पर कई तरह की वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगने शुरु हुए जिसमें कि कुछ राजनीतिक लोगों के नाम जुड़कर आने से विवाद गहरे होते चले गए। अप्रैल महीने में जो चैनल अन्ना की टीम की लगभग एकतरफा कवरेज करते आए थे और भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई प्रतिपक्ष की खबर नहीं होती की तर्ज पर आगे जा रहे थे,अब उनकी दिलचस्पी विवादों को प्रसारित करने में होने लगी। थोड़े देर के लिए चैनल यह भूल गया कि उसे अन्ना के अनशन के साथ जुड़कर अपनी छवि बेहतर करनी है। इसी बीच 7 जून को लाइव इंडिया ने अन्ना हजारे,अरविंद केजरीवाल के साथ दो घंटे की इंडिया की सबसे बड़ी बहस नाम से लाइव बहस चलायी जिसकी रिकार्डतोड़ टीआरपी करीब 37 रही। चैनल सहित दूसरे मीडिया संस्थानों के बाद बेहतर ढंग से समझ आ गयी कि अन्ना मौजूदा दौर के सबसे बड़े टीआरपी तत्व हैं और एक के बाद एक दूसरे चैनलों ने भी अन्ना के अनशन को प्रमुखता से कवर किया। दूसरी बात कि अन्ना ने इस शो में जिस तरह से पूरी टीम को लेकर बात कही,चैनलों को यह फार्मूला पकड़ते देर नहीं लगी कि फिलहाल विवादों के बजाय अन्ना के सुर के साथ होना ही बेहतर है क्योंकि इस खबर को तर्क,नियम और संवैधानिक प्रावधानों पर चर्चा करने के बजाय भावनात्मक रुप देने से ज्यादा सुरक्षित स्थिति हो सकती है। ऐसा करने से जनभावनाओं के टीआरपी में बदलने,सीरियल और मनोरंजन चैनलों के दर्शकों को तोड़कर यहां लाने और पूरे मुद्दे को राष्ट्रीय बनाने में मदद मिलेगी। तभी एक-एक करके चैनलों ने लोगों से अन्ना के साथ रामलीला मैंदान में जुटने की अपील की।

अगस्त में अन्ना के अनशन की जिस उत्साह से कवरेज किया गया,वह जून में मिले उसी फार्मूले और अंक 37 तक पहुंचने के लक्ष्य का नतीजा था। यह अलग बात है कि बाद में अन्ना की दर्जनभर लाइव कवरेज चली लेकिन लाइव इंडिया सहित कोई भी दूसरा चैनल इस लक्ष्य हो हासिल नहीं कर सका। अन्ना की टीम ने पहली बार की तरह इस बार भी मुख्यधारा की मीडिया से जुड़ने के साथ-साथ न्यू मीडिया के मोर्चे को मजबूती से पकड़े रहा जिसका नतीजा खुलकर सामने आया। जिस इंडिया अगेन्सट करप्शन के फेसबुक पन्ने से अन्ना की टीम ने शुरुआत की थी,उस पर करीब चार लाख लोगों ने पसंद का चटका लगाया, पांच लाख लोग इस अनशन के समर्थन में जुड़े, तिहाड़ जेल से दिए अन्ना के इंटरव्यू को यूट्यब पर एक लाख से ज्यादा लोगों ने देखा। अन्ना कौन है,इसे जानने के लिए गूगल पर दुनियाभर से करीब 12 करोड़ 20 लाख क्लिक किए गए। इसका एक मतलब तो साफ था कि अन्ना के अनशन ने अपने तरीके से एक मीडिया नेटवर्क खड़ा कर लिया था जिसका असर बढ़ रहा था और यहां तक आते-आते समाचार चैनलों के अप्रसांगिक हो जाने का खतरा झलकने लगा था। यह खतरा इसलिए भी था क्योंकि न्यू मीडिया के तौर पर विकीलिक्स ने दुनियाभर की मुख्यधारा की मीडिया को पहले ही प्रेस रिलीज की मीडिया साबित कर चुका था। बावजूद इसके अन्ना की टीम अगर मुख्यधारा मीडिया से जुड़ रही थी तो इसका सबसे बड़ा लोभ इस बात से था कि इसे शहरी मध्यवर्ग,इन्टरनेट से जुड़नेवाले नागरिक के अलावे उन लोगों तक पहुंचाया जाए जो कि तथ्यों से हटकर भावनात्मक और छवि निर्माण के स्तर पर जुड़ सकें। देशभर की गलियों और पार्कों में बच्चे वंदे मातरम के नारे लगाते दिखआई दिए,वह इसी स्ट्रैटजी का हिस्सा था जिसमें कि अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने बच्चों के बीच पकड़ बनाने के लिए सारेगमप लिटिल चैम्पस जैसे रियलिटी शो में आकर अपील की थी। दूसरी तरफ न्यूज चैनलों में खबरों की वापसी( यह अलग बात है कि इसकी प्रकृति रियलिटी शो और मेलोड्रामा के करीब रही) और राजनीतिक खबरें कवर करनेवाले जो लोग रियलिटो शो और ग्लैमर की खबरों के आगे लगभग अप्रासंगिक हो चले थे,उन्हें अपनी जगह हासिल करने में सहूलियतें हुई। बालिका वधू और कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों को छोड़कर इन खबरों के प्रति दिलचस्पी और लोकप्रियता से उनका भरोसा कायम हुआ कि लोग अभी भी खबर ही चाहते हैं और भूत-प्रेत-सांप-नागिन और यमराज का आंतक जैसी खबरों का अंत करीब है। टीआरपी मीटर के लिहाज से भी यह सब दिखानेवाले चैनलों के लिए अन्ना का अनशन शोक ही साबित हुआ।

इन सबके बीच मई महीने में कैग ने राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी अपनी रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में खेलों और प्रबंधन को लेकर हुई गड़बड़ियों के साथ-साथ मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए। किस तरह मीडिया के दिग्गज संस्थानों ने कवरेज को लेकर सौदेबाजी करने की कोशिश की और सफल न होने की स्थिति में खिलाफ में खबरें दिखायी,इसे विस्तार से बताया। लेकिन न तो मीडिया में और न ही बीइए और एडीटर्स गिल्ड जैसे संगठनों ने इस संबंध में कुछ भी कहना जरुरी समझा और चुप्पी साधे रहे। मीडिया संगठन इस दौरान सरकार की ओर से न्यू मीडिया को नियंत्रित करने के संबंध में जो नियम लाए,उस पर भी कुछ नहीं कहा और वे सारे नियम बिना तर्क और असहमति के लागू हो गए। जो मुख्यधारा की मीडिया ब्लॉग,ट्विटर,फेसबुक जैसे माध्यमों का बड़ा हिस्सा अपने लिए इस्तेमाल करता आया है,वह इसके नियमों के लाने जाने पर चर्चा तक नहीं की। 

इसके अलावे, 2 जी स्पेक्ट्रम मामले से लेकर 13 अगस्त 2010 को आग लगाकर आत्महत्या करने के लिए उकसाने और उसकी लाइव कवरेज दिखाने के मामले में बीइए जैसे संगठन ने आधी-अधूरी कमेटी गठित करके कैसे दस दिनों के भीतर शामिल चैनल को क्लिनचिट दे दी,ये सब हमारे सामने स्पष्ट है। चैनलों के भीतर मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाते हुए किस तरह से लोगों से काम लिए जाते हैं, चैनल बंद होने की स्थिति में सैंकड़ों पत्रकार कैसे सड़कों पर आ जाते हैं और वह चैनल में एक लाइन की खबर नहीं बन पाती, मीडिया संगठन उनसे किसी भी तरह का सवाल-जबाब नहीं करते, ऐसे में सरकार अगर इन समाचार चैनलों पर नकेल कसने जा रही है तो इसका विरोध एक हद तक बिल्कुल जरुरी है लेकिन साथ में यह सवाल है कि क्या सरकार सचमुच उस मीडिया पर लगाम लगाने जा रही है जो कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है या फिर वह कार्पोरेट मीडिया है जिसका लक्ष्य अपनी मिट्टी में मिल चुकी साख और मुनाफे को दोबारा से हासिल करना है? फिर भी अन्ना की टीम इस मीडिया का बार-बार शुक्रिया अदा कर रही है तो हैरानी हो रही है और सवाल भी पैदा हो रहे हैं कि क्या प्रतिरोध के स्वर के साथ खड़ा होने का का हक उसे है जो खुद भी मुजरिम है लेकिन जिसमें खुद के लिए वकील बनने की भी काबिलियत है? जाहिर है इसमें चैनल के साथ-साथ उसकी रक्षा में खड़े गठित संगठन भी हैं।


(मामूली फेरबदल के साथ मूलतः जनसत्ता में 4 सितंबर 2011 को प्रकाशित) 
      
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पिछले करीब पांच सालों में हिन्दी फिल्मकारों ने जिनमें कि मैं जान-बूझकर एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार को भी शामिल कर रहा हूं, एक बिल्कुल ही अलग और बेहतर काम किया है कि दिल्ली को सियासत और सपनों का पर्याय शहर की छवि से बाहर निकाला है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि दिल्ली में राजनीति और सियासत को लेकर पहले की तरह जोड़-तोड़ नहीं होते लेकिन सिनेमा हमें लगातार इस बात का एहसास कराने लगा है कि आमफहम जिंदगी में इसकी तासीर पहले से कम होने लगी है जबकि आमफहम जिंदगी ज्यादा शामिल होने लगी है। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि खुद राजनीति ही लोगों के जीवन में पहले की तरह कम शामिल है। राजनीति अब लोगों के लिए करने से ज्यादा ढोने या उसके नीचे दबे रहकर जीने की आदत ज्यादा हो गयी है,शायद यह भी कारण हो सकता है कि तब वो सिनेमा के लिए धीरे-धीरे कम प्रासंगिक होता चला जा रहा है या राजनीति के अलावे दूसरी ऐसी चीजें हैं जो ज्यादा असर करने लगी है।

दूसरी तरफ दिल्ली अब सपनों से कहीं ज्यादा हकीकत का शहर ज्यादा लगने लगा है। देशभर के अलग-अलग प्रांतों से,दूरदराज से आनेवाले लोगों के दिमाग में ये बात पहले से ज्यादा साफ होने लगी है कि ऐसा बिल्लुकल नहीं है कि यहां एक फैंटेसी की दुनिया है जहां शामिल होते ही हमारे सारे संघर्ष घुलकर खुशनुमा एहसास में तब्दील होते चले जाएंगे। अब सिनेमा में सात साल का रतन(अब दिल्ली दूर नहीं) नहीं होता जो सपनों को बतौर एनर्जी ड्रिंक के तौर पर इस्तेमाल करते हुए नेहरु से मिल आता है। पहले जो सारा संघर्ष दिल्ली आने भर का था,अब वो संघर्ष यहां रहते हुए और एक स्थायी भाव के तौर पर दिखाए जाने लगे हैं। ये भले है कि ये हमें उन संघर्षों को एक आदत के साथ बनाकर जीने की समझ पैदा करता है। इसलिए अब ये दिल्ली सोने की चिड़िया कहे जानेवाले भारत की राजधानी या दुनिया के दूसरे सबसे बड़े लोकतंत्र का केन्द्र ही नहीं, आदतों का शहर भी है जहां परिस्थितियों के साथ-साथ हील-हुज्जतों के बीच से जीने की आदत पैदा होने लग जाती है। कुछ लोग इसे मुंबई की जीवटता की तर्ज पर कला भी कह सकते हैं लेकिन ये कहना तभी सही होगा, जब वो कला में रोजमर्रा की घटनाओं को शामिल किया जाना अनिवार्य मानते हों।

इधर के हिन्दी सिनेमा ने दिल्ली के उपर से सियासत और सपनों का शहर का जो मुल्लमा हटाया,उसके बदले रोज की जिंदगी को पहले से कहीं ज्यादा शामिल किया है। हमने सिनेमा और दिल्ली के संदर्भ में रवीश कुमार को बतौर फिल्मकार के खांचे में इसलिए शामिल किया कि उन्होंने पिछले महीनों रवीश की रिपोर्ट में जिस तरह की दिल्ली को बतौर एक चरित्र और कहीं-कहीं खालिस परिवेश के तौर पर परिचय कराया है,छोटे पर्दे पर के कुछेक एपीसोड की इस अभिव्यक्ति को अगर साट दें तो बड़े पर्दे पर के सिनेमा से कहीं ज्यादा असर पैदा करती है। उसमें पहली बार दिल्ली का वो नक्शा उभरकर सामने आता है जिसमें लुटियन जोन गायब है,वो चमक-दमक गायब है जिसे दिखाकर हुक्मरान अपनी छाती फुलाते फिरते हैं फिर भी दिल्ली नायक है। ये वो दिल्ली है जिसमें कि देशभर का अभावग्रस्त समाज इकठ्ठे समाया हुआ है और टूरिस्टों को आकर्षित करनेवाली दिल्ली के बजाय यहां के अलग-अलग इलाके में जीनेवाली दिल्ली शामिल हुई है। इसे आप ओए लक्की लक्की ओए में बहतर तरीके से देख सकते हैं जहां दिल्ली नेशनल के बजाय लोकल हो जाती है।

राजधानी होने का जो घाटा दिल्ली अब तक सहती आयी है कि इसके कोई भी संदर्भ जब तक 28 राज्यों की इच्छाओं को तृप्त नहीं करते,तब तक ये तटस्थ शहर कैसे हो सकता है,ये जिद इधर के फिल्मों ने तोड़ा है। ऐसे में दिल्ली कहीं ज्यादा स्वाभाविक और विश्वसनीय लगती है। इसी तरह रंग दे बसंती की अपनी दिल्ली है जहां पुराने किले पर यंगिस्तान सवार है लेकिन गुजरते हुए जहाज को देखकर उसी तरह से हूट करता है जैसे कोई चालीस-पचास साल पहले जहाज देखने घरों से निकलकर देखने आने पर किया करते थे। पिछले महीने ही आयी फिल्म डेली-वेली, दिल्ली इतिहास के अपने उस हिस्से से हमें जोड़ती है जिसमें कि अभी भी वर्तमान गुलजार है। उत्तर-आधुनिकता और भारतीयता के नाम पर घिसे हुए चीकट संस्कार एक ही फिल्म में कैसे एडजेस्ट करती हुई जान पड़ती है,ये इस फिल्म की दिल्ली की खास बात है। वहीं दिल्ली-06 की दिल्ली में लोग से ज्यादा खबर और दिल्ली के बजाय मुंबई और रिएलिटी शो के सपने घुस आए हैं। दिल्ली में रहकर भी कोई सपना ऐसा है जो कि वहां से दूर जाकर पूरे होंगे,ये फिल्म रेखांकित करती है।..

 कुल मिलकर वैसकोप में कैमरे की निगेटिव(फिल्म) घुमाकर दिल्ली देखने का जो चस्का लंबे समय तक रहा और इसी वैसकोप ने दिल्ली की एक स्थिर छवि बनाने में भूमिका अदा की,उसे अब का सिनेमा छुड़ाकर उसे ज्यादा ईमानदार तरीके से पेश कर रहा है बल्कि लव,सेक्स और धोखा में तो दिल्ली क्या एनसीआर तक का ईलाका बड़ी ईमानदारी से छू जाता है। मतलब साफ है, आज जो दिल्ली को सिर्फ और सिर्फ त्रिमूर्ति लाइब्रेरी की सामग्रियों के दम पर समझने की कोशिश करेगा तो ये फिल्में उसे खुलेआम चैलेंज करेगी। इन फिल्मों ने ये स्थापित करने की कोशिश की है कि दिल्ली का कोई एक संस्करण नहीं है जिसे कि युवा फिल्म समीक्षक मिहिर पंड्या अपने शोध के जरिए लगातार समझने की कोशिश कर रहे हैं।

मिहिर की इसी कोशिश में आज यानी 9 अगस्त को हिन्दी सिनेमा में दिल्ली विषय पर मोहल्लालाइव की ओर से एक बातचीत का आयोजन किया जा रहा है। जाहिर है इसमें जो भी वक्ता शामिल हैं, दरअसल दिल्ली को लेकर उनके अपने-अपने एक संस्करण है और जो लोग सुनने आएंगे,टुकड़ों-टुकड़ों में उनके संस्करण तो होंगे ही। ऐसे में हम कहें कि हर दिल्ली रहनेवाले और उसके बारे में सोचनेवाले की अपनी एक दिल्ली है और उसको लेकर एक अपनी समझ है तो कुछ गलत न होगा। अब सवाल है कि सिनेमा एक-एक करके उस समझ और नजरिए को कैसे पेश कर रहा है और ये संख्या कहां तक जाएगी,इस पर बात हो। जितनी फिल्में बन गयी,सो बन गयी। उसमें दिल्ली किस रुप में आयी है,इस पर भी बहस चलती रहे लेकिन और कितने एंगिल हो सकते हैं जिसमें दिल्ली को  परिवेश के अलावे चरित्र,संवाद और वक्तव्य के तौर पर देखा-समझा जा सकता है,इस पर भी बहस होगी,ऐसी हमारी उम्मीद है। हमें इस बात की खुशफहमी है कि अगर हम आज की इस बातचीत में शामिल नहीं होते हैं तो दिल्ली के किसी एक संस्करण पर बातचीत छूट जाएगी,ठीक उसी तरह से अफसोस भी रहेगा कि अगर आप नहीं आते हैं तो कई संस्करण को समझने से हम चूक जाएंगे।.तो आइए आज,हम दिल्ली के और कई संस्करणों पर बातचीत करें। देश के कुछ फिल्मकार भी शामिल हो ही रहे हैं,क्या पता उन्हें मेरी समझ की दिल्ली जंच जाए और वो कल को फिल्म का हिस्सा बने।
आपको कब और कहां आना है-
Time : 09 August, 6:30
Location : Stein Auditorium, India Habitat Center
[ near gate no. 3 ]
Lodhi Road, New Delhi
कैसे आएंगे-
मेट्रो से तो जोरबाग उतरकर दस मिनट की चहलकदमी के साथ
कौन बोलेंगे और कौन आपकी दिल्ली पर फिल्म बना सकते हैं
Akshat Verma | writer : Delhi Belly
Mahmood Farooqui | Historian & co director : Peepli Live
Ravikant | Historian & CSDS Fellow
Ravish Kumar | Excutive Editor : NDTV INDIA
in conversation with
Mihir Pandya | Research Fellow, DU
किसे हमें सहयोग और संपर्क करना है-
any query, plz call on 9811908884
सारी तथ्यात्मक सूचनाएं मोहल्लाlive से नकलचेपी
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हं
स जैसी पत्रिका के 25 साल के इतिहास को इतने लिजलिजे और पनछोट तरीके से याद किया जाएगा, ये देख-सुनकर भारी निराशा हुई। हम हंस की रजत जयंती कार्यक्रम से लौटकर सदमे में हैं। हंस की वार्षिक संगोष्ठी, हिंदी साहित्य से जुड़ा अकेला कार्यक्रम होता है, जिसका इंतजार हमें मेले-ठेले की तरह कई दिनों पहले से होता है। इसकी बड़ी वजह तो ये है कि हिंदी और मीडिया के वे तमाम भूले-बिसरे चेहरे एक साथ दिख जाते हैं जिनकी हैसियत, जिंदगी और चैनल बदल चुके होते हैं और दूसरा कि संगोष्ठी में कुछ गंभीर बातें जरूर निकल कर आती हैं, जिस पर कि आगे विचार किया जाना जरूरी होता है। अबकी बार तो और भी 25 साल होने पर कार्यक्रम का आयोजन किये जाने का मामला था, सो लग रहा था कि कुछ अलग, बेहतर और गंभीर बातचीत होगी। निर्धारित समय से करीब एक घंटे बाद यानी छह बजे कार्यक्रम शुरू होने पर ये धारणा और भी मजबूत हो गयी कि अबकी बार तो हंस की यादगार संगोष्‍ठी होने जा रही है। वक्ता के तौर पर अकेले नामवर सिंह को अपनी बात रखनी थी, तो हम निश्चिंत थे कि हर साल से अलग इस बार एक-दूसरे से नूराकुश्ती होने के बजाय एक रौ में सिर्फ उन्हें ही सुनने को मिलेगा। लेकिन…



कार्यक्रम की शुरुआत की औपचारिक घोषणा के साथ ही हमारी सारी उम्मीदों पर अजय नावरिया ने पानी फेर दिया। घर जाकर ईमानदारी से अगर वो इस पर सोच रहे होंगे कि उन्‍होंने ज्यादा बोल दिया और पता नहीं क्या-क्या बोल दिया, तो तैयारी के साथ संयमित और संक्षिप्त बोलने के अभ्यास का मन जरूर बना रहे होंगे। उन्हें ऐसा करने में शायद लंबा वक्त लगे। उन्होंने कार्यक्रम की भूमिका ही कुछ इस तरह से रखी कि लगा कि आगे का सारा मामला बहुत ही बोझिल होने जा रहा है। राजेंद्र यादव स्कूल से दीक्षित हुए अजय नावरिया ने इस बात का बार-बार दावा किया कि हंस जैसी पत्रिका ने साहित्यिक लोकतंत्र बहाल किया। लेकिन यादवजी के स्कूल से निकले इस शख्स की भाषा और प्रयोग किये गये शब्द इतने सामंती, मर्दवादी ठसक, बजबजाये हुए, परंपरागत और घिसे-पिटे होंगे, इसे सुनकर मेरी तरह लोगों का भी कलेजा छलनी हो रहा होगा। आज से ठीक दो साल पहले जब नामवर सिंह ने हंस के युवा विशेषांक और अजय नावरिया के संपादन का लगभग माखौल उड़ाते हुए दोहा पढ़ा था – ‘नये युग का नया नजरिया, पेश कर रहे हैं अजय नावरिया’, तो हमें नामवर सिंह पर भारी गुस्सा आया था। गुस्सा तब और बढ़ गया, जब उन्होंने राजेंद्र यादव को लगभग आगाह करने के अंदाज में कहा था – इन लौंडों को ज्यादा सिर पर न चढ़ाओ, ये तुम्हारे किसी काम नहीं आएंगे, काटकर ले जाएंगे और तुम्हें पता तक नहीं चलेगा। लेकिन इस बार जब अजय नावरिया का मंच संचालन देखा और उसमें लगातार आत्मश्लाघा के अंदाज में खुद को प्रोजेक्ट करने की छटपटाहट देखी, तो लगा कि बाबा ने उस वक्त शायद ठीक ही कहा था।
अतिलोकतांत्रिक परिवेश की उपस्थिति कई बार कैसे उच्छृंखलता और उथलेपन में तब्दील हो जाती है, ये साफ तौर पर झलक जा रहा था। दूसरा कि ये सही है कि राजेंद्र यादव स्कूल ने आलोचना की धार के आगे तारीफ करने की कला नहीं सिखायी लेकिन अजय नावरिया ने वाजिब तरीके से तारीफ करने की कला को चमचई और चाटुकारिता के पर्याय के तौर पर कैसे सीख लिया, ये अलग ही गंभीर मसला है। राजेंद्र यादव को लेकर वो जिस तरीके से बात कर रहे थे, उससे हम न केवल बोर हो रहे थे बल्कि खुद राजेंद्र यादव बहुत ही असहज महसूस कर रहे थे और उन्हें बार-बार ऐसा करने से रोक रहे थे। लेकिन अजय नावरिया उनके इस संकेत का विस्तार थेथरई में कर जाते हैं और सुन लीजिए, सुन लीजिए कहकर आगे भी जारी रहते हैं।
मामला तब हद के पार हो जाता है जब वो राजेंद्र यादव की तुलना सुकरात से करने लग जाते हैं। ये पूरे कार्यक्रम का बड़ा ही भद्दा हिस्सा था। राजेंद्र यादव के बारे में वो कुछ इस तरह से बातें कर रहे थे जैसे कि उम्र ढल जाने पर लोग घर के बूढ़े-बुजुर्गों से मजे लेने लग जाते हैं। माफ कीजिएगा, इतने बड़े मंच से राजेंद्र यादव से मजे लेने के अंदाज में अजय नावरिया ने जिस तरह से परिचय कराया, उससे इस संगोष्ठी के स्तर में काफी गिरावट आयी। आपसी बातचीत का मामला अलग होता है लेकिन संगोष्‍ठी की अपनी एक गरिमा होती है, जो कि उन्होंने पूरी तरह खत्म कर दी।
तीसरी बात कि इस मौके पर हंस से जुड़े लोगों जिनमें कि कार्यालय के लोग भी शामिल थे, उन्हें सम्मानित किया गया। सम्मान के तौर पर किसे क्या दिया गया, ये सार्वजनिक तौर पर बताकर उन्हें भले ही लग रहा होगा कि उन्‍होंने एक बार फिर लोकतांत्रिक सोच का परिचय दिया है लेकिन ऐसा करते हुए अजय नावरिया भूल गये कि खैरात देने और सम्मानित करने की भाषा अलग होती है।
बहरहाल, संचालन के नाम पर अजय नावरिया ने लंबे-लंबे पकाऊ संस्मरण और चमचई के अंदाज में राजेंद्र यादव को हंस के 25 साल के अनुभवों को साझा करने के लिए आमंत्रित किया।
राजेंद्र यादव को बोलने में अब काफी तकलीफ होने लगी है और जब वो लंबी-लंबी सांस लेते हुए बड़ी मुश्किल से बोल रहे थे, तो हमें ग्लानि और बेचैनी हो रही थी कि हम फिर भी उनसे सुनने के लिए बेचैन हो रहे हैं। राजेंद्र यादव ने जो कुछ भी कहा, वो हंस के संपादक की हैसियत से उसका ईमानदार आत्मकथन था…
हमने इतने सालों में क्या कमाल किया, क्या झंडे गाड़े, मेरा इस पर बोलना उचित नहीं है, बाकी लोग बोलते रहेंगे लेकिन कुल मिलाकर मैं बहुत खुश नहीं हूं। हंस निकालने के पहले मेरी योजना कंस निकालने की थी जो कि अब भी है…
इस तरह से अपनी बातचीत की शुरुआत करते हुए उन्होंने हंस निकालने की योजना कैसे बनी, क्या परेशानियां आयीं और मकान-मालिक से लेकर पाठकों तक ने किस तरह से मदद की, इस संबंध में बातें की। राजेंद्र यादव का उदास मन से निकला वक्तव्य दरअसल जुलाई के हंस के संपादकीय में कही गयी बातों का दोहराव ही था और जो लोग घर से पढ़कर इसे गये थे, उन्हें महसूस हो रहा होगा कि यादवजी ने कुछ नया नहीं कहा।
सम्‍मान के दौरान अर्चना वर्मा को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया।
अर्चना वर्मा ने बहुत ही कम समय में जिस एक संस्मरण का जिक्र किया, उसकी चर्चा जरूरी है। वो हंस के स्त्री विशेषांक का संपादन कर रही थीं और उन्होंने राजेंद्र यादव की ही रचना को लौटा दी। आगे चलकर अर्चना वर्मा का जब भी परिचय कराया जाता, तो कहा जाता कि इन्होंने राजेंद्र यादव की रचना लौटा दी थी। अर्चना वर्मा ने कहा कि इसका श्रेय मेरे निजी साहस से ज्‍यादा इस बात को जाता है कि हंस में राजेंद्र यादव ने कैसा लोकतांत्रिक माहौल तैयार किया था। इस तरह के प्रसंगों को खोज-खोजकर और हर बात के पीछे हंस के ऊपर लोकतंत्र की वर्क छिड़कने की बचकानी कोशिशें अजय नावरिया लगातार कर भी रहे थे… ऐसा प्रोजेक्शन शायद राजेंद्र यादव के न चाहते हुए भी हंस की परंपरा का हिस्सा बन गया हो।
गौतम नवलखा भी हंस की शुरुआत के दिनों में जुड़े थे और उन्हें भी मंच पर बिठाया गया था। उन्होंने कहा कि राजेंद्र यादव की ये बात अक्सर याद आती है कि हंस में छपने के लिए तुम्हें हिंदी में लिखना होगा, भले ही तुम जैसे-तैसे लिखो, गलतियां होती हैं, होने दो और मेरी हिंदुस्तानी भाषा के प्रति दिलचस्पी बढ़ी… वैसे गौतम नवलखा बहुत ही अच्छी और प्रभावित करनेवाली हिंदी बोल रहे थे।
टीएम ललानी जो हंस से जुड़े लोगों को सम्‍मानित करने के लिए विशेष तौर पर आमंत्रित किये गये थे, उनके बारे में बताया गया कि अपने रोजगार, राजनीति और दुनियाभर के ताम-झाम के बीच भी हंस और राजेंद्र यादव से उनके रिश्‍ते जीवंत बने रहे। राजेंद्र यादव ने कहा कि हालांकि ये दूसरे धार्मिक कार्यक्रमों के लिए जितनी उदारता से दान और चंदे देते रहे हैं, उतनी उदारता से हंस के लिए नहीं, लेकिन भावनात्मक स्तर का सहयोग लगातार बना रहता। ललानी साहब ने मंच से एक बात कही और इस बात का व्यक्तिगत तौर पर मुझ पर बहुत ही अलग किस्म का असर हुआ। मैं अभी भी इस संदर्भ से अपने को अलग नहीं कर पा रहा हूं। ललानी ने कहा कि आज मन्नू भंडारी को भी सम्मानित किया जाना चाहिए था, हम अब भी कर सकते हैं। उनके ऐसा कहने पर हमने नजरें घुमायी। सबसे आगे की कतार में बैठीं मन्नू भंडारी ने हाथ जोड़ दिये। हमें मन्नू भंडारी के मंच तक आने का रत्तीभर भी इंतजार और भरोसा नहीं था और ऐसा करके उन्होंने आपका बंटी, त्रिशंकु और महाभोज जैसी रचनाएं पढ़कर जो छवि हमारे मन में उनके प्रति बनी थी, उसे ध्वस्त होने से बचा लिया। इस संदर्भ में सारा आकाश मंच से खिसककर मन्नू भंडारी की झोली में छिटक गया था। हमें भीतर से एक टीस के बावजूद सुकून मिला।
जनसत्ता के अपने कॉलम कभी-कभार में अशोक वाजपेयी ने लिखा कि हंस पत्रिका की बाकी सामग्री जिस तरह से पढ़ी जाती थी, उसी तरह से संपादकीय भी, बाकी की पत्रिकाओं के संपादकीय इस तरह से नहीं पढ़े जाते थे, उस पत्रिका का कार्यक्रम बहुत ही बेतरतीब सा लगा। जहां-तहां से बिखरा हुआ और लोगों के बोलने में कहीं से कोई पूर्व तैयारी नहीं। हमने ऊपर इसलिए पनछोट शब्द का इस्तेमाल किया। एक तो सम्मानित किये जानेवाले कई लोग इस मौके पर नहीं आये, आसपास की खुसुर-पुसुर से निकलकर आ रहा था कि काफी लोग नाराज भी हैं। अब हमारी सारी उम्मीदें नामवर सिंह पर टिकी थीं और लग रहा था कि इन्होंने अगर उम्मीद के मुताबिक बोल दिया तो सारा मामला सहज हो जाएगा।
मेरे दुश्मन राजेंद्र यादव और हंस के प्रिय पाठकों… नामवर सिंह के इस संबोधन के साथ ही सभागार की डूबती नब्ज में अचानक से हरकत आ गयी। उबासी ले रहे श्रोता सतर्क हो गये और गौर से सुनने लगे…
ये आयोजन वैसे तो हंस के 25 साल पूरे होने का है, लेकिन ऐसा लगा रहा है कि ये हंस का नहीं बल्कि 82 साल के राजेंद्र यादव का जन्मदिन मनाया जा रहा है, ये बात शायद आप भी महसूस कर रहे होंगे। हंस और राजेंद्र यादव यहां आकर पर्याय हो गये है। खैर, बिना किसी आर्थिक मजबूती के इस तरह से पत्रिका निकलती रही, इसके लिए मैं सिर झुकाता हूं। राजेंद्र यादव के आगे नहीं, हंस के आगे…
नामवर सिंह ने बताना शुरू किया कि जिस हंस की शुरुआत प्रेमचंद ने 1930 में की, आगे जब पत्रिका बंद हो गयी, तो इसे दोबारा शुरू करने की हिम्मत अमृत राय ने भी नहीं की। बाद में माधुरी, सारिका जैसी दुनियाभर की पत्रिकाएं शुरू हुईं लेकिन हंस की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। कमलेश्वर अपने को तीसमार खां समझते थे, बाद में द टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रिका से जुड़े लेकिन हंस का कोई ध्यान नहीं आया। ये बड़ी ही हैरान करनेवाली बात है कि हंस का कहीं कोई नामलेवा नहीं, ये नाम किसी को ध्यान में नहीं आया कि दोबारा इसे शुरू किया जाए। राजेंद्र ने अक्षर प्रकाशन से किताबें निकालने के साथ, बिना किसी स्थायी साधन के 1986 में हंस निकालने का इरादा किया। कहा कि अब हंस निकालेंगे। इस आदमी की हिम्मत देखिए कि सिर्फ निकाला ही नहीं बल्कि 25 सालों तक चलाया भी। हिंदी में ये बात स्वर्ण अक्षरों में लिखी जाएगी। ये सिर्फ हंस की नहीं, राजेंद्र यादव की भी जयंती है।
नामवर सिंह ने जिस ऐतिहासिक मोड़ से हंस की साहित्यिक पत्रकारिता के बारे में बताना शुरू किया, तो लगा कि मामला बहुत आगे तक और बहुत ही गंभीर तरीके से जाएगा लेकिन नामवर सिंह इसकी लीक छोड़कर दूसरे सिरे की तरफ मुड़ गये।
अशोक वाजपेयी तो कविता के अलावा किसी दूसरी चीज को साहित्य मानते ही नहीं, पढ़ते भी हैं तो अंग्रेजी लेखकों को लेकिन ये राजेंद्र यादव और हंस का ही लोकतंत्र है कि उसने अशोक वाजपेयी से भी हंस पर लिखवाया। अशोक वाजपेयी ने तो कभी पूर्वग्रह में राजेंद्र यादव को नहीं छापा। नया ज्ञानोदय और हंस के बीच सौतिया डाह है और रवींद्र कालिया भी बहुत खुश नहीं रहते हैं लेकिन मौजूदा अंक में उनसे भी लिखवाया। अखिलेश जो कि तद्भव जैसी पत्रिका बड़ी मेहनत से निकालते हैं, राजेंद्र से असहमति रखते हैं, उन्हें भी हंस के इंस अंक के लिए लिखवाया और असहमति में ही सही लिखा। निंदक नीयरे राखिए, आंगन कुटी छवाय वाली जो बात कबीर ने कभी कही थी, उस पर इस पत्रिका और राजेंद्र यादव ने व्यावहारिक तौर पर अमल किया। ये लोकतंत्र है।
नामवर सिंह राजेंद्र यादव को लेकर जो बोल रहे थे, वो भी उनकी तारीफ ही थी लेकिन वो अजय नावरिया की तरह फूहड़ नहीं थी। आलोचना के साथ-साथ तारीफ करने की भी शैली नामवर सिंह से सीखी जानी चाहिए।
शुरू के डेढ़ दशक में पत्रिका ने बहुत ही तेवर के साथ काम किया। लेकिन उसके बाद ढलान आने लग गयी। ऐसा होता है। हर कोई ढलान की तरफ बढ़ता है। आगे हम या राजेंद्र यादव ही पता नहीं ये बात कहने के लिए रह जाएंगे भी या नहीं। जीव-जंतुओं की तरह पत्रिका को भी कई योनियों से होकर गुजरना पड़ता है। हंस भी उसी तरह से गुजरा। उसे कभी कौआ बनना पड़ा, कभी बगुला और कभी कुत्ते की तरह चौकस रहना पड़ा। मुझे लगता है कि हंस में तीन योनि – कौआ, बगुला और कुत्ते के गुण हमेशा मौजूद रहे। मैं आप नये लोगों से एक बार फिर कहूंगा कि इस भीष्म (राजेंद्र यादव) के पास अभी भी मौका निकाल कर जाइए – लेकिन कहानी छपवाने के लिए नहीं, कहानी लिखने की कला सीखने के लिए।
नामवर सिंह पिछले दो-तीन बार से अपने आगे होने न होने की बात करने लगे हैं, एक बहुत ही भावनात्मक अप्रोच के साथ। राजेंद्र यादव के संदर्भ में उन्होंने इसी लहजे में बात कही। चलते-चलते उन्होंने कुछ इस तरह से कहा…

जो हो सकता है इससे वो किसी से हो नहीं सकता
मगर देखो तो जो हो सकता है, वो आदमी से हो नहीं सकता।
नामवर सिंह को सुनना अच्छा लगा लेकिन बहुत फायदेमंद नहीं रहा। खासकर उनलोगों के लिए जो कि साहित्यिक पत्रकारिता और हंस शीर्षक को ध्यान में रखकर सुनने आये थे। अशोक वाजपेयी पर ली गयी चुटकी, रोचक प्रसंग और काक चेष्टा जैसे सहज श्लोक से लोगों का ध्यान जरूर खींचा लेकिन जिस मुद्दे पर हम उनसे गंभीर व्याख्यान की उम्मीद कर रहे थे, ऐसा कुछ भी नहीं कहा। हंस ने किस तरह के विमर्श पैदा किये, उस समय की बाकी पत्रिकाएं क्या कर रही थीं, हिंदी पत्रिका का मुख्य स्वर क्या था, इन सब मसले पर कोई बात नहीं की। इस लिहाज से नामवर सिंह के व्याख्यान से कुछ निकल कर नहीं आया, हां थोड़े समय के लिए स्वस्थ मनोरंजन जरूर हो गया। नामवर सिंह अगर कायदे से साहित्यिक पत्रकारिता पर बोलते तो कुछ नहीं तो विश्वविद्यालय में हर साल 10-20 नंबर के सवाल का जवाब हल करने में मीडिया के छात्रों को मदद मिलती, लेकिन वैसा भी नहीं हो सका।
कुल मिलाकर देखें तो इस संगोष्ठी का निष्‍कर्ष ऐसा कुछ भी नहीं रहा, जिससे हम भरा-भरा महसूस कर पाते। हम इस उम्मीद में थे कि हंस ने 25 साल में जो बहसें खड़ी की हैं, जो विमर्श पैदा किये हैं, उस दौर में जो संपादकीय आये और उसे लेकर जो हंगामा खड़ा हुआ, उन पर पर संक्षेप में ही सही, बात होती लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हंस ने कितने कहानीकार और लेखक पैदा किये, लेकिन एक का भी कहीं कोई जिक्र नहीं। सामयिकता का मोह हंस के इतिहास को इतनी जल्दी बिसार देगा, इसकी कल्पना हमें नहीं थी। वो सारे लोग और उनकी चर्चा सिरे से गायब थी, जिन्हें हमने नब्बे के दशक में पढ़ा। इस मौके पर राजकमल की ओर से तीन किताबों… 1) पचीस वर्ष पचीस कहानियां | शृंखला संपादक : राजेंद्र यादव | संकलन-संपादक : अर्चना वर्मा, 2) हंस की लंबी कहानियां | शृंखला संपादक : राजेंद्र यादव | संकलन-संपादक : अर्चना वर्मा, 3) मुबारक पहला कदम (हंस में प्रकाशित कथाकार की पहली कहानी) | शृंखला संपादक : राजेंद्र यादव | संकलन-संपादक : संजीव का लोकार्पण जरूर हुआ लेकिन इस पर कोई बात नहीं हुई। हम हंस की साहित्यिक पत्रकारिता के सफर को सुनने गये थे लेकिन हमें मौजूदा हंस बहुत ही बेतरतीब नजर आया, इतिहास की तो बात ही छोड़िए।
हंस की संगोष्ठी के लिए ये गर्व और संतोष देनेवाली बात होती है कि बिना कोशिश के जो श्रोताओं का हुजूम चला आता है, मीडिया, संस्कृति और साहित्य से जुड़े जिस तरह से लोग आते हैं, उनके बीच बहुत गंभीरता से कई मसले पर साझा-विमर्श किया जा सकता है लेकिन हंस की गोष्ठी इन श्रोताओं के होने का फायद नहीं उठा पाती। उनके बीच बात रखने से शायद असर भी हो लेकिन वो अक्सर चूक जाते हैं। ऐसे श्रोताओं को जुटाने में अच्छे-अच्छे आयोजकों के पसीने छूट जाते हैं। हंस को इन श्रोताओं का लाभ लेते हुए संगोष्ठी को गंभीर शक्ल देने की जरूरत है।
हर बार से अलग हंस की इस गोष्ठी को इस बार खुला और लोकतांत्रिक बनाने की कोशिश में मंच की तरफ से घोषणा की गई कि श्रोता सवाल-जबाब भी कर सकते हैं। पत्रकार उमाशंकर सिंह ने सवाल किया कि- हंस के अगले अंक के लिए इस बात की घोषणा है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की कहानी छापी जा रही है,क्या हंस के 25 साल के बाद आगे पत्रिका की परिणति निशंक जैसे लोगों को छापकर ही होगी? ध्यान रहे कि पिछले कुछ महीनों से निशंक का नाम उत्तराखंड में घोटाले का पर्दाफाश करनेवाले पत्रकारों को कुचलने के तौर पर लगातार लिया जाता रहा है।.राजेन्द्र यादव ने उमाशंकर सिंह के सवाल का जबाब दिया कि हम अपने से अलग विचारधारा और समझ के लोगों को न छापकर उससे लेखक होने का अधिकार नहीं छिन सकते।..यादवजी का कहना बिल्कुल सही है लेकिन क्या हंस ने पिछले 25 सालों से सचमुच ऐसा किया है? अगर हां तो फिर निर्मल वर्मा हंस के लिए कभी कथाकार क्यों नहीं रहे। बहरहाल,ऐसे मौके पर हंस की रणनीति पर सवालिया निशान लगता ही है।..सिर्फ एक सवाल के बाद धन्यवाद ज्ञापन के लिए राजेन्द्र यादव को आमंत्रित किया जाता है। अगर इधर-उधर की ताम-झाम के बजाय ये सत्र लंबा होता तो गोष्ठी में जान आ जाती।
चलते-चलते हंस को एक सुझाव कि अब उसे प्रेमचंद जयंती के नाम पर संगोष्ठी आयोजन करने का दावा छोड़ देना चाहिए। जब आप ढाई-तीन घंटे की संगोष्ठी में सालों से एक बार भी प्रेमचंद और उनकी परंपरा का नाम तक नहीं लेते, तो उनके नाम पर संगोष्ठी आयोजित करने का क्या लाभ?
मूलतः प्रकाशितः-मोहल्लाlive
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