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सैयद ज़ैग़म इमाम मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर उन-गिने चुने लोगों में से हैं जो न्यूज रुम के तनावों और हील-हुज्जतों के बीच भी अपनी रचनाधर्मिता को बचाए हुए हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया के फार्मूलाबद्ध पैकजों से बाहर जाकर समाज,सरोकार और पक्षधरता के सवालों पर लगातार सोचने-जाननेवाले लोगों में से हैं। राजकमल से प्रकाशित उनका पहला उपन्यास दोज़ख़ उनकी इस रचनाधर्मिता और लेखन के बीच की संभावना को स्थापित करती है। वैसे तो दोज़ख़ की कहानी चंदौली जैसे छोटे से कस्बे के छोटे से अल्लन के पास घूमती है। लेकिन उसकी मासूम ख्वाहिशों और सपनों के बीच दोज़ख़ की जो शृंखला बनती है वो मासूम अल्लन की अकेली श्रृंखला न होकर उन तमाम लोगों की श्रृंखला बन जाती है जिनके लिए मजहबों और मान्यतों के बीच से गुजरकर अपने पक्ष में इंसानियत को चुनकर जीना आसान नहीं रह जाता। इंसानियत का दामन थामकर न तो अल्लन जैसे मासूम के लिए जीना संभव है और न ही इंसानियत का पक्ष लेते हुए आम लोगों के लिए।

यह उपन्यास मज़हब और इंसानियत के बीच चलने वाली एक अजीबो गरीब कशमकश की कहानी है। एक ऐसे लड़के कि दास्तान जिसके हिंदू या फिर मुसलमान होने का मतलब ठीक से नहीं पता। मालूम है तो सिर्फ इतना कि वो एक इंसान है जिसकी सोच और समझ किसी मजहबी गाइडलाइन की मोहताज नहीं है।
असल में इस उपन्यास की कहानी के बहाने भारतीय समाज के उस धार्मिक ताने बाने को उकेरने की कोशिश की गई है जो मजहब और नफरत की राजनीति से उभरने से पहले देश के शहरों और कस्बों की विरासत था, जहां मुसलमान अपने धर्म के प्रति सजग रहते हुए भी इस तरह के बचाव की मुद्रा में नहीं होते थे जैसे आज हैं।
उपन्यास का नायक अलीम अहमद उर्फ अल्लन उसी माहौल का रुपक रचता है और अपनी सहज और स्वत स्फूर्त धार्मिकता के साथ हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों की सीमाओं से परे चला जाता है। उपन्यास में कम उम्र में होने वाले प्रेम की तीव्रता, एक मुस्लिम परिवार की आर्थिक तंगी, पीढ़ियों के टकराव और एक बच्चे के मनोविज्ञान का भी बखूबी अंकन हुआ है।(
फ्लैप से)
अल्लन के सपनों पर सामाजिक बंदिशों और रंजिशों की जो परतें चढ़ती है वो आगे चलकर दोज़ख़ में पड़े इंसान के संस्करण बनने की प्रक्रिया का उदाहरण पेश करती है। मिहिर कुमार जो कि आजतक में एसोसिएट प्रोड्यूसर हैं,उन्होंने भी इसी सवाल को उठाया है कि-
छोटा सा अल्लन...छोटे सपने-ललचाने वाले सपने...मचलने वाले अरमान...हहराती गंगा की लहरों में कूदने की ख्वाहिश...पतंगों और कंचों में बसी दुनिया...सख्त अब्बा और मुलायम मिजाज अम्मा की दुनिया..इस मासूम सी दुनिया में क्या कोई दोजख भी हो सकता है...क्या जन्नतों में भी नर्क की गुंजाइश है....ये सब सवाल जैगम चकित करने वाले भोलेपन के साथ उठाते हैं..ठीक उसी भोलेपन से जैसे वो पीली धूप के पेड़ों की तलाश में नज्म लिखते हैं....
कई सवालों के बीच आज इस उपन्यास का लोकार्पण है जिस पर कि आइबीएन7 के आशुतोष मुस्लिम मामलों से जुड़ी शोधकर्ता शीबा असलम फहमी और प्रसिद्ध कवयित्री अनामिका विस्तार से चर्चा करेगी।

सैयद ज़ैग़म इमाम का औपचारिक परिचय-
2 जनवरी 1982 को बनारस में जन्म। शुरूआती पढ़ाई लिखाई बनारस के कस्बे चंदौली (अब जिला) में। 2002 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी इलाहाबाद से हिंदी साहित्य और प्राचीन इतिहास में स्नातक। 2004 में माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ जर्नलिज्म (भोपाल, नोएडा) से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री। 2004 से पत्रकारिता में। अमर उजाला अखबार और न्यूज 24 चैनल के बाद फिलहाल टीवी टुडे नेटवर्क (नई दिल्ली) के साथ। सराय सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) की ओर से 2007 में इंडिपेंडेंट फेलोशिप। फिलहाल प्रेम पर आधारित अपने दूसरे को उपन्यास को पूरा करने में व्यस्त। उपन्यास के अलावा कविता, गजल, व्यंग्य और कहानियों में विशेष रुचि। कई व्यंग्य कवितएं और कहांनियां प्रकाशित।
संपर्कः zaighamimam@gmail.com
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आठ-आठ रुपये लेकर स्कूली बच्चों को सदभावना अभिव्यक्ति के स्टीकर बांटे जा रहे हैं। रूपनगर (दिल्ली) के सरकारी स्कूल से निकलनेवाली लड़कियों से रुक कर जब हमने पूछा कि इसे अपनी आइडी पर क्यों चिपकाया है – उसका जवाब था, टीचर ने कहा है लगाने के लिए। स्टीकर की कीमत भी उसी ने बतायी। कैंपस में कुछ लड़के हमें इसे दस रुपये में ले लेने का अनुरोध कर रहे थे।

डीयू कैंपस की आर्ट्स फैकल्टी के मेन गेट के आगे बहुत भीड़ है। किसी छात्र राजनीतिक पार्टी के लोग जमा होकर वहां मोमबत्तियां जलाने का काम करने जा रहे हैं। हवन की तरह लकड़ियां पहले से जल रही है। देश के कई मीडिया चैनल पहले से तैनात हैं। पीछे से एक बंदा दूसरे बंदे को धक्का देता है – भैनचो… बार-बार आगे आ जा रहा है,टीवीवाले क्या तुम्हारे… की फोटो खींचेंगे…
अबे सुन, ये ले, इतने में जितनी कैंडिल आ जाए, ले लियो।
चैनल की माइक लिये लोगों के पास ही बंदे मंडरा रहे हैं। कुछ को इसका फल भी मिला है और उसकी बाइट ली जा रही है। चारों तरफ दैनिक जागरण के बैनर पाट दिये गये हैं। बैनर टांगता हुआ एक बंदा कहता है- अबे भोसड़ी के हंसा मत, ठीक से बंध नहीं रहा।

ये सब कुछ देश के उन शहीदों को याद करने के लिए किया जा रहा है, जिन्होंने शायद ही कभी सोचा होगा कि मेरे शहीद होने के साथ ही किसी खास पार्टी के खांचे और रंगों की लकीरों से बने बैनरों के बीच फिट कर दिया जाएगा?

दो दिन पहले मुंबई के लियोपोल्ड कैफे ने 26/11 के चिन्हों और शहीदों की याद में 300 रुपये के पैग की सेवा शुरू की। पैग मग पर शहीदों की तस्वीरें और धमाके और खून के धब्बों को प्रतीक के तौर पर मग पर छपवाया। अफ़सोस कि एनडीटीवी इंडिया ने कैफे की समझ को पहल बताया। कल रात एनडीटीवी के फुटेज में 26/11 के शहीदों को याद करने के लिए क्या तैयारियां चल रही हैं, इसके बारे में विस्तार से बताया गया। एंकर रुचि डोंगरे ने बताया कि शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए कॉलेजों के स्टूडेंट सड़कों पर उतर आये हैं। कुछ एमटीवी टच के स्टूडेंट्स अंग्रेज़ी में स्लोगन लिख रहे थे, एंकर हम हिंदी समझनेवाली ऑडिएंस को उसका हिंदी तर्जुमा करके बता रही थी। इस फुटेज को देखते हुए मुझे रंग दे बसंती का पूरा का पूरा डीजे ग्रुप याद आ जा रहा था। वो भी ऐसे ही स्प्रे पेंट करते हैं। गृहमंत्री की लापरवाही और दलाली के चलते फ्लाइट लेफ्टीनेंट अजय राठौर की मौत पर इंडिया गेट पर कैंडल जलाते हैं।

मैं ये बिल्कुल भी नहीं कहता कि इस दिन ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन इस फिल्म का मीडिया पार्टनर एनडीटीवी इंडिया, 26/11 के मौके को सिनेमाई अंदाज़ में पेश करता है। सवाल है कि हम इस रवैये को मीडिया मैटर मानकर चलता कर जाएं या फिर इससे आगे भी सोचने की ज़रूरत है?

26/11 को लेकर टेलीविजन चैनलों ने लाइव कवरेज के नाम पर जो कुछ भी दिखाया, उसकी कई स्तरों पर समीक्षा हुई है। इस बार के इंडिया टुडे ने इस पर विशेषांक निकाला है। पिछले साल मीडिया मंत्र ने कैमरे में 26/11 पर विशेषांक निकाले हैं। टेलीविजन चैनलों ने जिस तरह इसके कवरेज दिखाये, उसकी जमकर आलोचना हुई। एक साल होने पर सप्ताह भर पहले से ही टीवी चैनलों ने जिस तरह के महौल बनाने शुरू किये, उसे देखते हुए संयमित होकर प्रसारण का (23 नवंबर) सरकारी फरमान जारी किया गया। ये सारी बातें ठीक है कि मीडिया किसी भी घटना को एक कन्जप्शन मोड तक ले जाता है। वो उसे सिर्फ सूचना और देखे जाने तक का हिस्सा बनने नहीं रहने देना चाहता। वो एक दर्शक को बाज़ार के दरवाजे तक लाकर पटक देना चाहता है। इस पूरी अवधारणा को समझने के लिए ऑर्थर असा बर्जर की किताब मैनुफैक्चरिंग डिजायर पढ़ना दिलचस्प होगा। यहां आकर देश के चैनलों से हम ये सवाल कर सकते हैं कि क्या 26/11 का आतंकवादी हमला मीडिया इवेंट भर है? ऐसा पूछा जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि जिस तरह के मैलोड्रामा और मैनुपुलेशन जारी हैं, उसमें मानवीय संवेदना की सही समझ ग़ायब हो जाती है। छवि के जरिये यथार्थ के दावे को लेकर सूसन सौंटगै की पूरी अवधारणा है, इस पर बात होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही कुछ सवाल और हैं कि

♦ 26/11 को लेकर बच्चों के बीच आठ रुपये के सदभावना टिकट बेचा जाना क्यों ज़रूरी है?
♦ इसके पीछे के सांकेतिक अर्थे क्या हैं?
♦ क्या ये आतंकवादी घटनाएं दो कौमों के बीच की पैदाइश है?
♦ ये किसने शुरू किया कि आज के दिन इस तरह के टिकट जारी किए जाएं और बच्चों के बीच सद्भावना बनाये रखने के पाठ पढ़ाये जाएं। ये समाज में किस तरह के असर पैदा करेंगे, इस पर चर्चा ज़रूरी है।
♦ दूसरी बात कि आठ रुपये के इस टिकट से जो पैसे आएंगे, उसके पीछे का क्या हिसाब है? ये काम तो आइडिया मोबाइल फोन भी करने जा रहा है। हम आतंकवाद से बचने के लिए कोई और पाठ और महौल तो तैयार नहीं कर रहे?

जगह-जगह संगठनों और पार्टियों की ओर से कैंडिल जलाये जा रहे हैं। चैनलों ने एक लौ जलाने का कॉन्सेप्ट ईजाद किया है। क्या ये देश के किसी भी शहीद को याद करने का सही तरीका है, जब इसमें ताम-झाम पैदा करके शहर के हर चौक को जाम कर दें। लौ जल जाने के बाद भी कैमरे के चूक जाने पर दोबारा जलाएं… हम चाहते क्या हैं?

दरअसल हमारा देश कर्मकांडों को इतनी तवज्‍जो देता आया है कि हर घटना को एक कर्मकांड में बदल देने के लिए हम बेचैन हो उठते हैं। हम अपनी भावनाओं का, संवेदना और अनुभूतियों का एक मूर्त रूप (physical form) चाहते हैं। हम इन अनुभूतियों को निराकार रूप में संजोने के अभ्यस्त नहीं हैं। हमारी इसी मानसिक कमज़ोरी से कर्मकांड के विस्तार की गुंजाइश बढ़ जाती है। समाज की हर घटना कर्मकांडों का हिस्सा बन जाती है। उसके बाद एक पैटर्न हमारे सामने तैयार होता है कि हमें किसी के शहीद होने पर या मर जाने पर क्या करना है। यहां पर आकर कर्मकांड और बाज़ार के बीच एकरूपता कायम होती है। कर्मकांड का काम है हमारी हर भावनाओं और अनुभूतियों को एक जड़ रूप देना और बाज़ार का काम है हमारी इन अनुभूतियों को वस्तु (comodity) के आगे रिप्लेस करके कर्मकांड के साथ गंठजोड़ कर लेना। शायद यही वजह है कि इस देश में कभी और आज भी हर मुसीबत को लेकर एक नया देवता पैदा होता जाता है और उसे खुश करने की पूजन विधि, तो दूसरी तरह हर घटना के पीछे सैकड़ों सिंबॉलिक प्रोडक्टस और बाज़ार की हरकतें। उसके बाद हमारी भावनाएं हवा हो जाती हैं, सब कुछ इस कर्मकांड और वस्तुओं में रिप्लेस हो जाता है। दुर्भाग्य से देश का टेलीविजन इसी के बीच अपनी भूमिका खोजता नज़र आता है। इससे आगे वो कभी नहीं जाता।

ये सच है कि टेलीविजन अपने मतलब की बात करता है, लेकिन आखिर क्यों शहीदों को याद किये जाने की घटना, समाज को मदद करने के तरीके, हाशिये पर के समाज की सुध लेने के अंदाज़ मीडिया स्ट्रक्चर में रह कर ही किये जाते हैं। हम ये सब कुछ इसी अंदाज़ में फॉर्मेट करते हैं, जिससे कि मीडिया कवरेज में आसानी हो। इस नज़रिये से अगर आप सोचें तो दिन-रात मीडिया को कोसने, गरियाने और कोसनेवाली संस्थाएं, विचार और लोग काम करने के तरीके में उसी के स्ट्रक्चर को फॉलो करते हैं। इसलिए सवाल सिर्फ इस बात का नहीं है कि मीडिया किसी भी बात को हायपरबॉलिक बना देता है, सवाल इस बात का भी है कि हम मीडिया के फॉर्मेट में रह कर क्यों एक्ट करना शुरू कर देते हैं, सोचना शुरू करते हैं? सिविल सोसायटी में शहीदों के नाम पर एक मोमबत्ती जला देने और टीवी के फ्रेम के आ जाने से उन माओं की आंखों के आंसू थम जाते हैं, उन विधवाओं के दर्द ख़त्म हो जाते हैं, जिसके जवान बेटे और पति ने अपनी जान गंवायी? सवाल इस बात का है कि संवेदना के स्तर पर समाज इस दर्द को किस हद तक महसूस करता है? क्या कोई भी इसलिए शहीद होता है कि उसके नाम पर कर्मकांडों के जाल बिछाये जाएं और शहादत को एक ब्रैंड में तब्दील करके बाज़ार पैदा किये जाएं।..
मूलतः प्रकाशित- मोहल्लाlive
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26/11 के जिन शहीदों की तस्वीरों को देखकर उनके बच्चे,पाल-पोसकर बड़ा करनेवाली माएं और उनकी विधवा हो चुकी पत्नी अब भी बिलख रही हैं,देश का तथाकथित संभ्रांत समाज उन तस्वीरों के शराब के मग पर छापे जाने से खुश है। वो उस मग में में बीयर और शराब पीकर उन्हें याद कर रहा है। ये अलग और नए किस्म से शहीदों को याद करना है। इसके लिए उन्हें तीन सौ रुपये देने पड़ रहे हैं। एनडीटीवी इंडिया ने मुंबई के लियोपोल्ड कैफे की इस पहल का विरोध करने के बजाय सराहा है। शिव सेना के खिलाफ स्टोरी एंगिल लेने के चक्कर में इसके खिलाफ एक लाइन भी बोलना-बताना जरुरी नहीं समझा।..और तो और उसके पक्ष में कसीदे पढ़ने का काम किया।

शराब के लिए ड्रिंक मग पर 26/11 के चिन्हों और शहीदों की फोटो छापे जाने और तीन सौ रुपये पैग बेचे जाने पर शिव सैनिकों ने एक बार फिर हंगामा किया। मुंबई के 26/11 आतंकवादी हमले में मुंबई का लियोपाल्ड कैफे भी हमले का शिकार रहा है। उसकी दीवारों पर आज भी आतंकवादियों की गोलियों के निशान मौजूद है। मैनेजमेंट उसे याद के तौर पर बचाकर रखना चाहता है। इसी क्रम में उसने ड्रिंक मग के पर इस घटना के कुछ चिन्ह प्रिंट करवाकर ग्राहकों के लिए उपलब्ध करवाए। टेलीविजन फुटेज पर कोका कोला के डिश पेपर के उपर रखे ये मग धमाके और खून के धब्बे के तौर पर दिखाई दे रहे थे। शिव सैनिकों ने इसका विरोध इस आधार पर किया कि रेस्तरां याद के नाम पर शहीदों की शहादत को भुनाना चाह रहा है। उसका भी बाजारीकरण किया जा रहा है। जाहिर है ये देश की संस्कृति के खिलाफ है। ये संभव था कि अगर शिव सेना इस पर विरोध नहीं जताती और मीडिया से जुड़े लोगों ने इसकी नोटिस ली होती तो वो भी इससे असहमति जताते हुए इसके खिलाफ स्टोरी बनाते,दिखाते।

लेकिन एनडीटीवी इंडिया में सात बजे के शो में पहले एंकर रुचि डोंगरे ने इसे चुनावी हार की बौखलाहट से जोड़कर दिखाया,बताया उसी बात को विनोद दुआ ने अपने खास कार्यक्रम विनोद दुआ लाइव में भी इसी अंदाज में पेश किया। उन्होंने तो इस हमले का ऐतिहासिक विकासक्रम बताते हुए विधान सभा हंगामा,एक निजी चैनल पर हमला तक ले गए। स्थिति साफ है कि शिव सेना अब चाहे जो कुछ भी कर ले,जिस भी मुद्दे की बात कर लें,मीडिया उसके खिलाफ आग उगलने का फार्मूला गढ़ लिया है। मीडिया का ऐसा करना जरुरी भी है क्योंकि जब तो वो विरोध के तरीकों में बदलाव नहीं लाती है,उसका विरोध करना अनिवार्य है। शिव सेना ने इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा। मीडिया और कांसीराम के प्रकरण को कभी याद नहीं किया कि मीडिया से पंगा लेने का क्या अंजाम होता है? लेकिन एक सवाल तो बनता ही है कि क्या एनडीटीवी इंडिया जैसा चैनल लियोपोर्ड के इस तीन सौ रुपये के पैग और मग का विरोध इसलिए नहीं करता कि वो शिव सेना को उत्पाती दिखाना चाहता है? अगर उसने भी इसके विरोध में एक लाइन भी कहा होता तो शिव सेना के समर्थन में खड़ा नजर आता? मामला चाहे जो भी हो लेकिन लियोपोर्ड का समर्थन इसलिए ज्यादा जरुरी और बाजिब है क्योंकि वो भी वही कर रहा है जो कि चैनल के लोग कर रहे हैं। अपने-अपने स्तर से भुनाने की कोशिश। ऐसे में निष्पक्ष होकर बात करने की गुंजाइश ही कहां बच जाती है?

स्टिल फोटो- पुष्कर पुष्प के सौजन्य से
मूलतः प्रकाशित- मीडिया मंत्र
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मूलतः प्रकाशित मोहल्लाLIVE
पोस्टर- साभारः मीडियाखबर डॉट कॉम

IBN7 और IBN7 लोकमत के मुंबई और पुणे दफ्तर में शिवसेना के गुर्गे ने जो कुछ भी किया, वेब लेखन के जरिये हम उसका विरोध करते हैं। दफ्तर के अंदर घुसकर शिव सैनिकों ने महिला मीडियाकर्मियों के साथ जो दुर्व्यवहार किया, हम उसके ख़‍िलाफ़ न्याय की मांग करते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर गुंडई और जाहिलपने को लेकर आये दिन किये जानेवाले प्रयोग और पेश किये जानेवाले नमूनों का हम पुरज़ोर विरोध करते हैं। पिछले 15 दिनों के भीतर और उससे भी पहले शिवसेना और उसी की कोख से पैदा हुआ मनसे ने लोकतंत्र के दो स्तंभों – विधायिका और मीडिया को कुचलने और ध्वस्त करने की जो कोशिशें की है, हम उसका विरोध करते हैं। संजय राउत जैसे देश के उन तमाम संपादकों और पत्रकारों को धिक्कारते हैं, जिनकी औकात रहनुमाओं के पक्ष तक जाकर ख़त्म हो जाती है। दिमाग़़ी तौर पर सड़ चुके लोगों के लेखन को फर्जी करार देते हैं जिनके भीतर तर्क करने की ताक़त नहीं रह गयी है। हम चाहते हैं कि ऐसे लोगों को पत्रकारिता बिरादरी से तत्काल बेदखल किया जाए। हमारे इस विरोध के बावजूद अगर मुंबई सरकार इस दिशा में सक्रिय होकर कार्यवाही नहीं करती है तो हम अपनी आवाज़ और तेज़ करेंगे। हम मीडिया की आवाज़ को किसी भी स्तर पर दबने नहीं देंगे। हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी के हाथों का खिलौना बनने नहीं देंगे। हम देश की मीडिया को किसी भी रूप में तहस-नहस नहीं होने देंगे।

अपनी बात कहने और सच बयान करने की इच्छा रखनेवाले देश के बाकी पत्रकारों और मानव अधिकारों के पक्ष में बात करनेवालों की तरह मैं भी शिवसेना की बर्बरता का विरोध करता हूं। हम सबों को अपने-अपने स्तर से इस तरह की गतिविधियों को रोका जाना चाहिए। लेकिन ये सब लिखते-कहते हुए मैं उन शब्दों, अभिव्यक्तियों और मेटाफर पर थोड़ा इत्‍मीनान होकर सोचना चाहता हूं, जिसे कि मीडिया के लोग इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में मैं समर्थन के स्तर पर जज़्बाती होते हुए भी अभिव्यक्ति के स्तर पर तटस्थ होना चाहता हूं। मुझे लगता है कि ऐसा करना शिवसेना जैसी बवाल मचाने वाली पार्टी के समर्थन में जाने के बजाए मीडिया और खुद को देखने-समझने की कोशिश होगी। इसलिए तोड़फोड़ की घटना का लगातार दो दिनों तक विरोध किये जाने के बाद अब इस स्तर पर विचार करें कि हम किस लोकतंत्र पर हमले की बात कर रहे हैं? लोकतंत्र के पर्याय के तौर पर बतायी जानेवाली मीडिया के किस हिस्से पर हमला किये जाने का विरोध कर रहे हैं? मीडिया अपने ऊपर हुए हमले को लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बता रहा है, इसे किस रूप में समझा जाए? कुल मिलाकर हम पहले तो लोकतंत्र को रिडिफाइन करना चाहते हैं और उसके बाद उसके खांचे में काम कर रही मीडिया को समझना चाहते हैं?

एजेंडा (IBN7 का कार्यक्रम) में एंकर संदीप चौधरी ने कहा कि आगे जब हिंदी पत्रकारिता का इतिहास लिखा जाएगा तो इसे काला शुक्रवार के तौर पर समझा जाएगा। इसके पहले भी जो फ्लैश चलाये गये, उसमें बार-बार इस हमले को लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बताया गया। संदीप चौधरी ने काला शुक्रवार शब्द रूस की बोल्शेविक क्रांति से उधार के तौर पर लिया। बाकी के न्यूज़ प्रोड्यूसरों और रिपोर्टरों ने भी लोकतंत्र पर हमला या चौथे स्तंभ पर हमला जैसे शब्दों का प्रयोग कहीं न कहीं ऐतिहासिक संदर्भों से उठा कर किये। यहां दिक्कत इस बात की बिल्कुल भी नहीं है कि इतिहास से इस तरह के शब्द नहीं लिए जाने चाहिए। इतिहास के शब्दों और अभिव्यक्तियों को अगर मीडिया के लोग खींचकर वर्तमान तक लाते हैं तो हमें उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन असल सवाल है कि क्या जिस लोकतंत्र पर हमले और उसे बचाने की बात की जा रही है, वो महज कुछ वैल्यू लोडेड शब्दों के प्रयोग कर दिए जानेभर से जिंदा रहेगा? क्या हम लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आजादी इन सबों को सिर्फ शब्दों के तौर पर जिंदा रखना चाहते हैं? हम इसे बोलने के लिहाज से चटकीला भर बनाना चाहते हैं? क्या हम लोकतंत्र, सरोकार, मानवीयता और इस तरह के वैल्यू लोडेड शब्दों को पुतलों की शक्ल में बदलना चाहते हैं? ऐसे पुतले जिसे कि दागदार, धब्बे लगे, बदबूदार समाज और फ्रैक्चरड डेमोक्रेसी के बीच लाकर रख दिया जाए, तो सब कुछ अचानक से चमकीला हो जाए। चित्ते-चित्ते रंगों के बीच एकदम से चटकीले रंगों का प्रभाव पैदा हो जाए। क्या इन शब्दों का प्रयोग अपनी ज़ुबान को सिर्फ चटकीला बनाने भर के लिए है?

टेलीविजन मीडिया से ये सवाल पूछा जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि लोकतंत्र कोई वैक्यूम में पैदा हुई चीज नहीं है। इसके भीतर हाड़-मांस, दिल-दिमाग़, जज़्बात और सोच लिये लोग मौजूद होते हैं। इसलिए जैसे ही आप लोकतंत्र शब्द का प्रयोग करते हैं, आपको लोकतंत्र को लोकेट तो करना ही होगा। पहले तो आपको और फिर हमें समझाना होगा कि आप लोकतंत्र से क्या समझ रहे हैं? आप जिस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं, उसके भीतर कौन से लोग शामिल हैं? आप किसके वीहॉफ पर अपने को लोकतंत्र का पर्याय बता रहे हैं? क्या आप खुद से पैदा किये जानेवाले लोकतंत्र को संबोधित कर रहे हैं या फिर अभी भी देश के भीतर बहाल लोकतंत्र को लेकर बात कर रहे हैं? मुझे नहीं लगता कि मीडिया पर किये जानेवाले हर हमले को लंबे समय तक लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बताया जाना आगे जाकर आसान होगा। तत्काल जज़्बाती होकर हम मीडिया के पक्ष में होते हुए भी इत्‍मीनान होने पर सवाल तो ज़रूर करेंगे कि हम किस मीडिया के पक्ष में खड़े हैं? उसके सालभर का चरित्र क्या है? हम न तो लोकतंत्र को मुहावरे की शक्ल देना चाहते हैं और न ही मीडिया को मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल करने देना चाहते हैं? इसलिए ज़रूरी है कि हम ऐसे में हम मीडिया हमलों के बीच लोकतंत्र के संदर्भों को समझने की कोशिश करें।

एक बात पर आप लगातार ग़ौर कर रहे होंगे कि पहले के मुकाबले निजी चैनलों पर राजनीतिक पार्टियों, धार्मिक संगठनों और संस्थाओं की ओर से हमले तेज़ हुए हैं। नलिन मेहता ने अपनी किताब INDIA ON TELEVISION और पुष्पराज ने अपनी किताब नंदीग्राम डायरी में सकी विस्तार से चर्चा की है। हाल ही में हमने देखा कि गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार ने आजतक को लंबे समय तक केबल पर आने से रोक लगा दी। आसाराम बापू के चेले-चपाटियों ने आजतक की संवाददाता पर हमले किये और घायल कर दिया। इसके पीछे की लंबी रणनीति हो सकती है। लेकिन एक समझ ये भी बनती है कि जिस तरह मीडिया और चैनलों के कार्पोरेट की शक्ल में तब्दील होने की प्रक्रिया तेज़ हुई है, राजनीतिक पार्टियों के प्रति उसकी निर्भरता पहले से कम हुई है। साधनों के स्तर पर तो कम से कम ज़रूर ही ऐसा हुआ है। दूसरी तरह कार्पोरेट और विश्व पूंजी की ताकत से इन चैनलों का मनोबल भी बढ़ा है। इसके आगे राजनीतिक पार्टियों की क्षमता का आकलन इनके लिए आसान हो गया है। इसलिए अब ये स्थिति बन जाती है कि कोई भी चैनल किसी राजनीतिक पार्टी, धार्मिक संगठन या संस्थानों पर बहुत ही साहसिक तरीके से स्टोरी कवर करता है, प्रसारित करता है। ऐसे में ये बिल्कुल नहीं होता कि राजनीति स्तर की निर्भरता उसकी एकदम से ख़त्म हो जाती है, लेकिन इतना ज़रूर होता है कि मैनेज कर पाना और संतुलन बना पाना पहले के मुकाबले आसान हो गया है। यहां राजनीति और मीडिया की ताक़त की आज़माइश होने के बजाय राजनीति और कार्पोरेट की आज़माइश होनी शुरु होती है। कार्पोरेट का पलड़ा मज़बूत होने की स्थिति में चैनल और मीडिया बहुत आगे तक राजनीतिक पार्टियों की धज्जियां उड़ाते हैं, धार्मिक संगठनों पर बरस पाते हैं। हमें ये सबकुछ लोकतंत्र का पक्षधर होने के स्तर पर दिखाया-बताया जाता है। एक हद तक सही भी है कि कम से कम राजनीतिक मामलों में दूरदर्शनी दिनों के मुकाबले निजी चैनल ज़्यादा मुखर हुए हैं। चैनल की इस बुलंदी का स्वागत किया जाना चाहिए।

लेकिन दूसरी स्थिति पहली स्थिति से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हैं। अगर बारीकी से समझा जाए तो ये लोकतंत्र के नहीं बचे रहने से जितना नुक़सान नहीं है उससे कहीं ज़्यादा नुकसान टेलीविज़न की ओर से पैदा किये जानेवाले और तेज़ी से पनपनेवाले लोकतंत्र से है। टेलीविज़न का लोकतंत्र, जनता के लोकतंत्र को लील जाने की फिराक में है। इसके हाल के कुछ नमूनों पर गौर करें तो हमें अंदाजा लग जाएगा। तालिबान और आतंकवाद पर स्पेशल स्टोरी दिखाते हुए एनडीटीवी इंडिया के रवीश कुमार ने कहा कि तालिबान में देश का कोई भी रिपोर्टर नहीं है लेकिन वहां की ख़बरें रोज़ दिखायी जा रही है। ये खबरें यूट्यूब की खानों से फुटेज निकालकर बनायी जा रही है। हंस के वार्षिक समारोह में अरुंधति राय ने कहा कि सलवाजुडूम इलाके में देश के किसी भी पत्रकार को जाने की इजाज़त नहीं है। पाखी के वार्षिकोत्सव में पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि विदर्भ को आइडियल शहर घोषित किया गया लेकिन वहां चालीस हज़ार किसानों ने आत्महत्याएं की। आज मीडिया में गांव नहीं है, मीडिया से जुड़े लोग गांव की स्थितियों को संवेदना के स्तर पर नहीं ला पा रहे हैं। 2 नवंबर को जब शर्मिला इरोम को बर्बर प्रशासन के खिलाफ़ अनशन पर बैठे दस साल पूरे हो गये, देशभर के अनुभवी मीडियाकर्मी शाहरुख खान के बर्थ केक काटने के फुटेज लेने के लिए बेकरार होते रहे। एक ही साथ नक्सलवाद और सरकारी कार्रवाइयों के ख़ौफ़ में झारखंड के आदिवासी आशंका के दिन खेप रहे होते हैं, देशभर के चैनल पी.चिदंबरम की बाइट को उलट-पुलट कर सुलझाने में जुटे रहे। देश के एक चैनल पर ताला लग जाने से करीब चार सौ मीडियाकर्मी रातोंरात सड़कों पर आ जाते हैं, वो कभी भी लोकतंत्र का हिस्सा नहीं बनने पाता। तो क्या ये मीडिया तय करेगा कि लोकतंत्र के भीतर का कौन सा हिस्सा टेलीविजन पर आकर लोकतंत्र की शक्ल लेगा और कौन सा नहीं? अगर सचमुच ऐसा है तो हमें मीडिया के लोकतंत्र पर नये सिरे से विचार करना होगा।

आप अगर चैनल की इन ख़बरों के बीच सरोकार से जुड़ी ख़बरों और हिस्सेदारी की मांग करेंगे तो टीआरपी का शैतान सामने आ जाएगा। इनमें से सारी घटनाएं टीआरपी पैदा करने के लिहाज से बांझ है। इसलिए टीआरपी तो उन्हीं ख़बरों से पैदा होती है, जिनमें कि मेट्रो और मध्यवर्ग की ऑडिएंस दिलचस्पी ले। संकेत साफ है। मंजर साफ है। फीदेल कास्त्रो के पद को उधार लेकर कहा जाए तो ये सांस्कृतिक संप्रभुता का संकट है। टेलीविज़न देश की संप्रभुता को बचाये रखने के दावे से लैस है। लेकिन उसके भीतर के ठोस के जार-जार हो जाने की चिंता बिल्कुल भी नहीं है।

देश की सत्तर फीसदी आबादी को जब पीने को पानी नहीं है, बच्चों के हाथों में स्लेट नहीं है, स्त्रियों की आंखों में सपने नहीं है – टेलीविजन पर कीनले है, विसलरी है, पॉकेमॉन है, बार्बी है, मानव रचना यूनिवर्सिटी है, लक्मे है, झुर्रियों को हटाने के लिए पॉन्डस है। एक धब्बेदार, बदबूदार और लाचार लोकतंत्र टेलीविज़न पर आते ही चमकीला हो उठता है। पिक्चर ट्यूब से गुज़रते ही देश का सारा मटमैलापन साफ हो जाता है। सवाल यहां बनते हैं कि टेलीविज़न के दम पर जो आइस संस्कृति (information, entertainment, consumerism) एक ठंडी संस्कृति के बतौर पनप रही है, क्या उसी लोकतंत्र पर हमला हो रहा है और उसी को बचाये जाने की बात की जा रही है? हम वर्गहीन समाज जैसे मार्क्सवादी यूटोपिया से बाहर निकलकर भी सोचें तो क्या ज़रूरी है कि इस आइस संस्कृति के बूते देशभर के लोगों को खींच-खींचकर मध्यवर्गीय मानसिकता के खांचे में लाया जाए। ये मानसिकता चार रुपये लगा कर अपनी पसंद और नापसंद जाहिर करे। क्या हमें इस लोकतंत्र पर हमला किये जाने से अफ़सोस होगा? दुर्भाग्य से इस लोकतंत्र पर हमला कभी नहीं होना है लेकिन बदकिस्मती है कि जिस लोकतंत्र पर हमले हो रहे हैं उसे शायद ही कभी बचाया जा सकेगा। इसलिए लोकतंत्र के रैपर में मीडिया जिसे बचाना चाहती है, पहले उसे साफ कर दे, तो पक्षधरता कायम करने में आमलोगों को सहूलियतें होगी। क्योंकि जज़्बाती होने की वैलिडिटी जल्द ही ख़त्म होने जा रही है।
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मीतू खुराना की जो कहानी है वो पितृसत्तात्मक समाज में लिंग-भेद और पुत्र कामना में अंधे हो चुके परिवार की कहानी से बिल्कुल भी अलग नहीं है। अलग है तो सिर्फ इतना भर कि मीतू खुराना खुद पेशे से डॉक्टर है,उसका पति भी डॉक्टर है। तथाकथित सभ्य समाज से ताल्लुक रखता है। लेकिन लड़का-बच्चा जनने और लड़की के पैदा होने की स्थिति में अपने परिवारे के लोगों के साथ वो खुद भी कितना बर्बर हो जाता है,ये हमारी उम्मीद को ध्वस्त करता है। उस कल्पना को चकनाचूर करता है जो कि साक्षरता को लेकर भारत सरकार की ओर से जारी किए गए विज्ञापनों में दिखाया-बताया जाता है। हम पढ़-लिखकर भी मानवीय नहीं हो सकते,संवेदनशील नहीं हो सकते। हम उसी बर्बर समाज का हिस्सा बने रहेंगे। ये सबकुछ सोचकर-जानकर कैसा लगता है?

मीतू खुराना की दर्दनाक कहानी को झारखंड की चर्चित और जुझारु पत्रकार अनुपमा ने मोहल्लाlive पर पेश किया है। हम उसके एक हिस्से को साभार के साथ यहां पेश कर रहे हैं,बाकी आप सीधे लिंक के जरिए वहां जाकर पढ़ सकते हैं। पेश करने के पीछे सरोकार है कि हम अपने-अपने स्तर से मीतू की इस लड़ाई में समर्थन और सहयोग दे सकें।

हर लड़की यह सोचती है कि उसकी शादी अच्छे घर में हो। पति उसे चाहनेवाला हो और एक सपनों का घर हो। जिसे वह सजाये-संवारे और एक खुशहाल परिवार बनाये। मैंने भी कुछ ऐसे ही ख्‍़वाब बुने थे। अभी-अभी तो उसे संजोना और बुनना शुरू ही किया था मैंने। पर कब सब कुछ बिखरना शुरू हुआ, पता ही नहीं चला। खैर… सीधी-सीधी बात बताती हूं। शादी नवंबर 2004 में डॉ कमल खुराना से हुई। कहने को तो अच्छा घर था, पर यहां आते ही मुझे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा। मैं यह सब जुल्म चुपचाप सहती रही कि चलो कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। शादी के दो महीने बाद ही यानी जनवरी 2005 में मैं गर्भवती हो गयी। गर्भ के साथ ही मेरे सपने भी आकार ले रहे थे। छठवें सप्‍ताह में मेरा अल्‍ट्रासाउंड हुआ और यह पता लगा कि मेरे गर्भ में एक नहीं बल्कि दो-दो ज़‍िंदगियां पल रही हैं। मेरा उत्साह दुगना हो गया। मैं बहुत खुश थी। परंतु मेरी सास मुझ पर सेक्‍स डिटर्मिनेशन करवाने के लिए दबाव डालने लगीं। मैंने इसके लिए मना कर दिया। ऐसा करने पर मुझे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाने लगा। इसमें मेरे पति की भूमिका भी कम नहीं थी। मेरा दाना-पानी बंद कर दिया गया और रोज़-रोज़ झगड़े होने लगे। मुझे जीवित रखने के लिए रात को मुझे एक बर्फी और एक गिलास पानी दिया जाता था। गर्भावस्था में ऐसी प्रताड़ना का दुख आप खुद समझ सकते हैं। इस मुश्किल घड़ी में भी मेरे मायके के लोग हमेशा मेरे साथ रहे। शायद इसी वजह से मैं आज जीवित भी हूं।....

जब मैं गर्भ चयन के लिए प्रताड़ना के बाद भी राज़ी नहीं हुई तो इन लोगों ने एक तरकीब निकाली। यह जानते हुए कि मुझे अंडे से एलर्जी है, उन्होंने मुझे अंडेवाला केक खिलाया। मेरे बार-बार पूछने पर कि इसमें अंडा तो नहीं है, मुझसे कहा गया कि नहीं, यह अंडारहित केक है। केक खाते ही मेरी तबीयत बिगड़ने लगी। मुझमें एलर्जी के लक्षण नजर आने लगे। मझे पेट में दर्द, उल्टी व दस्त होने लगा। ऐसी हालत में मुझे रात भर अकेले ही छोड़ दिया गया। दूसरे दिन पति और सास मुझे अस्पताल ले गये। लेकिन वो अस्पताल नहीं था। वहां मेरा एंटी नेटल टेस्ट हुआ था। मुझे लेबर रूम में ले जाया गया। यहां पर गायनेकेलॉजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) ने मेरी जांच कर केयूबी (किडनी, यूरेटर, ब्लैडर) अल्‍ट्रासाउंड करने की सलाह दी। लेकिन वहां मौजूद रेडियोलॉजिस्ट ने सिर्फ मेरा फीटल अल्‍ट्रासाउंड किया और कहा कि अब आप जाइए। जब मैंने देखा और कहा कि गायनेकेलॉजिस्ट ने तो केयूबी अल्‍ट्रासाउंड के लिए कहा था, आपने किया नहीं, तो उसने कहा कि ठीक है आप लेट जाइए और उसके बाद उसने केयूबी किया।

इस घटना के बाद तो प्रताड़नाओं का दौर और भी बढ़ गया। मेरे पति व ससुराल वाले मुझे गर्भ गिराने (एमटीपी) के लिए ज़ोर देने लगे। मेरी सास ने तो मुझसे कई बार यह कहा कि यदि दोनों गर्भ नहीं गिरवा सकती, तो कम से कम एक को तो गर्भ में ही ख़त्म करवा लो। दबाव बनाने के लिए मेरा खाना-पीना बंद कर दिया गया। मेरे पति मुझसे अब दूरी बरतने लगे और एक दिन तो उन्होंने रात के 10 बजे मुझे यह कह कर घर से निकाल दिया कि जा अपने बाप के घर जा। जब मैंने उनसे आग्रह किया कि मुझे मेरा मोबाइल और अपने कार की चाभी ले लेने दीजिए, क्‍योंकि गर्भावस्था में मैं खड़ी नहीं रह पाऊंगी तो उन्होंने कहा कि इस घर की किसी चीज़ को हाथ लगाया तो थप्पड़ लगेगा… मेरे ससुर ने हस्तक्षेप किया और कहा कि इसे रात भर रहने दो, सुबह मैं इसके घर छोड़ दूंगा। उनके कहने पर मुझे रात भर रहने दिया गया। सास की दलील थी कि दो-दो लड़कियां घर के लिए बोझ बन जाएंगी, इसलिए मैं गर्भ गिरवा लूं। अगर दोनों को नहीं मार सकती तो कम से कम एक को तो ज़रूर ख़त्म करवा लूं। जब मैं इसके लिए राज़ी नहीं हुई तो उन्होंने मुझसे कहा कि ठीक है यदि जन्म देना ही है, तो दो, लेकिन एक को किसी और को दे दो।

आज भी मुझे वह भयानक रात याद है। तारीख थी 17 मई 2005… इतना गाली-गलौज और डांट के बाद मैं घबरा गयी थी और उस रात को ही मुझे ब्लीडिंग शुरू हो गयी। इतना खून बहने लगा कि एबॉर्शन का ख़तरा मंडराने लगा। खुद तो मदद करने की बात छोड़िए, चिकित्सकीय सहायता के लिए मेरे पिता को भी मुझे बुलाने की इजाज़त नहीं दी गयी। मैंने किसी तरह तड़पते-कराहते रात गुज़ारी और सुबह किसी तरह फोन कर पापा को बुला पायी। पापा के काफी देर तक मनुहार के बाद मेरे पति मुझे नर्सिंग होम ले जाने को तैयार हो गये। लेकिन खीज इतनी कि गाड़ी को सरसराती रफ्तार से रोहिणी से जनकपुरी तक ले आये। उस बीच मेरी जो दुर्गति हुई होगी, उसकी कल्पना आप खुद भी कर सकते हैं।

आगे पढ़ने के लिए चटकाएं- बेटा दो या तलाक दो
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