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रवीश कुमार,पुण्य प्रसून वाजपेयी,आशुतोष औऱ सम्स ताहिर खान जैसे हिन्दी पत्रकारों की स्टोरी दिखाते हुए जब मैं मीडिया के बच्चों से पूछता जाता- पहचानते हैं न इन्हें आप। बच्चे बाकी जबाबों के मुकाबले कुछ ज्यादा उंची आवाज में जबाब देते- हां सर, पहचानते हैं। एक पल के लिए मुझे देखते, मानों हमसे ही सवाल करना चाह रहे हों-इन्हें कैसे नहीं पहचानेगें, इन्हें कौन नहीं पहचानेगा या फिर इनको नहीं पहचानेगा कोई तो किसे पहचानेगा। मैं ये सवाल करते हुए कोई सर्वे नहीं नहीं कर रहा था कि मीडिया पढ़नेवाले बच्चों के बीच हिन्दी का कौन-सा टेलीविजन पत्रकार सबसे ज्यादा पॉपुलर है। मैं तो सिर्फ इस बात का अनुमान लगाना चाह रहा था कि मीडिया के ये बच्चे रेगुलर टेलीविजन देखते हैं भी या नहीं। टेलीविजन देखते हैं तो किस बुलेटिन को देखते हैं, वगैरह,वगैरह......। बिना टेलीविजन देखे, टेलीविजन पर बात करना कुछ वैसा ही है जैसे पद्मावत पढ़कर सिंहलद्वीप के बारे में सोचना और कल्पना करना। जो टेलीविजन नहीं देखते उनके लिए सब हवा-हवा धुआं-धुआं-सा लगता है। खैर,
डीयू के अंबेडकर कॉलेज के बुलाने पर,जिंदगी में पहली बार मैं लेक्चर देने गया था। विषय तय था- खबरों की बदलती दुनिया और नए पत्रकारों की चुनौतियां। खबरों की बदलती दुनिया को लेकर मेरी अपनी समझ है कि आज खबरों के बारे में लिखते हुए, चुनते हुए और प्रसारित करते हुए जो सबसे बड़ी समस्या है कि आपको यह यकीन कर पाना, बता पाना मुश्किल हो जाएगा कि किस खबर को किस खेमे में रखें। महज पॉलिटिक्स की खबर कब बॉलीवुड की खबर बन जाती है, स्पोर्ट्स की खबर कब पॉलिटिक्स की खबर बन जाएगी या फिर एक ही खबर में पॉलिटिक्स, इंटरटेन्मेंट, स्पोर्ट्स औऱ एस्ट्रलॉजी का सेंस होगा, इसे समझ पाना चुनौती का काम है। तेजी से बदलती खबरों की दुनिया में पहले के मुकाबले इसे बिल्कुल अलग-अलग कर पाना इतना सहज नहीं रह गया है। इसकी एक बड़ी वजह ज्यादा से ज्यादा खबरों का सॉफ्ट स्टोरी के तौर पर बदल जाना है या फिर इन्फोटेन्मेंट की शक्ल में तब्दील हो जाना है। सीएसडीएस-सराय के लिए रिसर्च करते हुए इसे मैंने पॉलिनेशन ऑफ न्यूज टर्म दिया था और अपने स्तर से विश्लेषित करने की कोशिश की थी कि किसी भी खबर को अगर हम स्पोर्टस के सिरे से पकड़ते हैं तो संभव है उसके अंत सिरे तक आते-आते वो पॉलिटिक्स में जाकर खत्म हो। इसलिए मीडिया पर बात करनेवालों के लिए ये मामला अब इतना आसान नहीं रह गया है कि वो खबरों को लेकर सीधे-सीधे स्पष्ट विभाजन कर दें। ये अच्छा है या फिर बुरा इस बहस में न जाते हुए हमनें सिर्फ इस बात पर चर्चा की कि ऐसे में एक नए पत्रकारों के लिए कितना मुश्किल हो जाता है कि वो स्क्रिप्ट लिखते हुए किस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करे, फ्लाईओवर टूटने पर उसके विजुअल्स को काटे औऱ स्क्रिप्ट लिखे या फिर पहले बोल हल्ला की सीडी जुटाए,चांद और फिजा पर बात करते हुए चंडीगढ़ की फीड पर गौर करे या फिर..ए रात जरा थम-थम के गुजर, मेरा चांद मुझे आया है नजर जैसे गानों को फिट करने की जुगत लगाए। इस तरह से मैं बात करता जाता औऱ बारी-बारी से न्यूज चैनलों की फुटेज दिखाता जाता। मैंने ये भी कहा कि-संभव है ये सारी खबरें, खबरों को परोसने का अंदाज आपको कूड़ा लगे लेकिन क्या ये आपके हाथ में है कि आप तय करें कि हम किस चैनल को देखें औऱ किस चैनल को नहीं देखें और कौन-सी स्टोरी बनाए औऱ कौन-सी नहीं बनाएं।
इसी क्रम में मैं पुण्य प्रसून वाजपेयी की पोटा कानून को लेकर की गयी उस स्टोरी की चर्चा करने लगा, उसके पूरे विजुल्स दिखाए, जिसके लिए उन्हें सम्मान मिला, रवीश कुमार की उस स्टोरी को बच्चों के सामने रखा जिसमें वो गुरुदासपुर,पंजाब के एक ऐसे कॉलेज की चर्चा कर रहे हैं जिस इलाके की लड़कियों ने अपने दम पर खड़ा किया है जहां कोई टीचर नहीं है, क्लासरुम के नाम पर कोई फर्नीचर से लदे-फदे कमरे नहीं है। हमने रवीश की उस लाइन को दोहराया जहां वो कहते हैं कि हम बेहतर शिक्षा के नाम पर शिक्षा को औऱ मुश्किल बनाते जाते हैं..पब्लिक स्कूलों पर सीधा व्यंग्य कर रहे होते हैं। निठारी पर बनायी सम्स की उस स्टोरी की चर्चा कर रहे थे, जब विजुअल्स में एक-एक करके बच्चे गायब हो जाते हैं।
सारे चैनलों के विजुअल्स दिखाने के बाद जैसे ही मैंने इस तरह की खबरों पर बात करनी शुरु की,मीडिया के बच्चों का मिजाज बदल गया। उन्हें लग रहा था कि ये खबरों का विकासक्रम नहीं,बल्कि बिल्कुल एक अलग दुनिया है। एक ही चैनल पर एक-दूसरे से अलग ऐसी दुनिया जिसका कि एक-दूसरे से कोई सरोकार नहीं। सच कहूं, मैं इन बच्चों को ऐसी खबरें बनाने औऱ इनके जैसा बनने की कोई जबरदस्ती की अपील नहीं कर रहा था,मैं इन्हें भारी-भरकम आदर्श से लदे-फदे एप्रोच के बजाय आम पत्रकार बनने की सलाह दे रहा था,ऐसा कहते हुए मैं इनके मिजाज को पढ़ना चाह रहा था। अंत में मैंने सिर्फ यही कहा कि- सारी बातों का निचोड़ सिर्फ इतना है कि आप ऐसे पत्रकार न बनें जो हर दो-दिन चार दिन पर फोन करके अपने दोस्तों से कहता-फिरता है- अच्छा होता,हम एक बार यूपीएसी के लिए चांस लेते, एक बार यूजूसी नेट निकालने की कोशिश करते या फिर चिढ़कर कि इससे बढिया होता कि हम भडुआगिरी करते, यही तो करते हैं हम रोज।
बाहर निकलकर कुछ बच्चों ने फिर से कहा- आपने जो कुछ भी बताया, हमें व्यावहारिक लगा, सच लगा, हमें पता है कि कुत्तों की डाइट पर स्टोरी करनी पड़ सकती है, हमें रावण की ममी खोजने कहा जा सकता है, लेकिन सर पता नहीं क्यों जब भी मैं इन पत्रकारों को स्क्रीन पर देखता हूं तो जोश आ जाता है कि हमें ऐसा ही बनना है। अपने को इन्हीं के जैसा बनते देखना चाहता हूं...आपने कहा न कि ऐसा पत्रकार बनो जो दोस्तों को फोन करके फ्रसट्रेट करने के बजाय इर्ष्या पैदा करे कि- आदमी बने तो बने पत्रकार, नहीं तो कुछ भी बन जाए क्या फर्क पड़ता है।.कुछ-कुछ वैसा ही, कुछ-कुछ ऐसा ही। ....
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26 जनवरी के करीब 15 दिन पहले से ही गुड ब्ऑय के बीच से बैड ब्ऑय की छंटनी शुरु हो जाती। सुबह की प्रार्थना के बाद उन्हें लाइन से अलग एक साइड खड़ा कर दिया जाता। वो गुड़ ब्ऑय को क्लास में जाते हुए हसरत भरी नजर से देखते रहते,ग्लानि से भरकर सोचते, वो क्यों बैड ब्ऑय है। सारे बच्चे क्लास में क्लास में चले जाते। पहली पीरियड शुरु हो जाती और खत्म भी हो जाती। बैड ब्ऑय को इस हिदायत के साथ कि जितनी जल्दी हो सके,गुड ब्ऑय बनो, दूसरी पीरियड तक छोड़ दिया जाता।

गुड ब्ऑय और बैड ब्ऑय के विभाजन का आधार इतना भी मुश्किल नहीं होता कि कोई अपनी जमात न बदल सके। इसे एक दिन के भीतर बदला जा सकता था। इसका आधार सिर्फ इतनाभर था कि स्कूल की तरफ से जो भी ड्रेस कोड बनाए गए हैं, उसे पूरी तरह फॉलो करते हुए स्कूल में आना। आम दिनों में भी स्कूल ड्रेस में आना अनिवार्य होता लेकिन इतनी सख्ती नहीं होती। ज्यादातर बच्चों का कुछ न कुछ मिस होता। कोई सफेद शू के बजाय ग्रे पहलकर आ जाता तो कोई चप्पल पर ही नेवी ब्लू मोजे डाल लेता,ताकि झटके से आगे निकल जाए। कोई ब्लैक शू पहनकर आता तो पॉलिश करना भूल जाता। बाद में तो स्कूल ने बैज देने(बेचने) शुरु कर दिए। बीच रुपये का एक बैज जिसमें स्कूल के लोगो के साथ नाम लिखा होता। एडमीशन के वक्त ये बैज नहीं था, इसलिए पापा इसे लेकर सीरियस लेकर नहीं थे। नार्मल दिनों में तो काम चल जाता लेकिन 26 जनवरी के मौके पर भारी फजीहत होती। हमारे जैसे बच्चे,आगे गुजर गए बच्चों से सेटिंग करके लगा लेते और क्लास पहुंचते ही वापस कर देते। मैं क्लास में मॉनिटर रहा करता,हमें मॉनिटर लिखा, अलग से बैज दिया बाकी बच्चों का तो उतना पता नहीं चलता लेकिन मेरे मॉनिटर के बैज लगाने औऱ स्कूल बैज नहीं लगाने पर टीचर्स जमकर लताडते- शर्म नहीं आती, मॉनिटर होकर बैज नहीं लगाते, तुम्हारा यह हाल है तो बाकी बच्चों पर इसका क्या असर होगा। मॉनिटर को कुछ इस तरह बताया जाता जैसे स्कूल के कायदे-कानून की सुरक्षा का जिम्मा उसी के हाथों है। बैज लगाकर हम अपने को आइपीएस से कम नहीं समझते। ये अलग बात है कि स्कूल बैज न होने पर सरेआम क्लास रुम में हमारी इज्जत उतार ली जाती। कई बार खड़ा भी करा दिया जाता। इसलिए हम इग्जाम रिपोर्ट कार्ड पर गुड ब्ऑय होते हुए भी सामाजिक रुप से बैड ब्ऑय करार दिए जाते। ऐसे मौके पर वो बच्चे गुड ब्ऑय हो जाते जो सालों भर तक हमारे आगे-पीछे डोलते, अक्सर पनिश किए जाते लेकिन ड्रेस कोड पूरी होने की वजह अकड़ जाते। जिन बिना पर इन्हें सजा मिलनी होती, वो सारा काम तो दस दिन पहले से ही बंद हो जाता, उनके पनिश होने का मौका ही नहीं मिलता। सारे बच्चे कुछ न कुछ परफार्म करने की तैयारी में होते जिनमें ये रईस बच्चे फैन्सी ड्रेस कॉम्पटीशन में भाग लेते जिसके लिए तीन-चार सौ रुपये अलग से खर्च करने पड़ते।

हमारे जैसे कुछ और भी बच्चे थे जो पढ़ने में बहुत ही होशियार लेकिन 26 जनवरी जैसे दिनों में मात खा जाते। बैड ब्ऑय कहलाते। एक-दो दोस्त ऐसा कि पढ़ने में तेज होने के साथ-साथ थोड़ा शोवी नेचर का था। भाषण देने और वाद-विवाद में भाग लेने का मन उसका नहीं होता, वो भी और बच्चों की तरह ऐसे इवेंट में भाग लेना चाहता, जिसे की स्टेज पर परफार्म किया जा सके, स्कूल की सारी लड़कियों के मां-बाप देखें। ये बात जैसे ही वो अपने क्लास टीचर के सामने करता, उनका जबाब होता- 20 रुपये का बैज औऱ 25 रुपये के मोजे तो तुम्हारे पापा खरीद नहीं पाते औऱ कहां से लाओगे, उस दिन परफार्म करने के अलग से ड्रेस। इस बार तो चीफ गेस्ट डीएम साहब आ रहे हैं,हमें पब्लिक स्कूल में कबीर और फकीर थोड़े ही दिखाना है। वो चुप हो जाता औऱ मन मारकर हमारे साथ भाषण की तैयारी में जु़ट जाता। भाषण प्रतियोगिता क्लास रुम में होती औऱ उसके प्राइज स्टेज पर मिलते। हम बस एक मिनट के लिए स्टेज पर जाने लायक होते औऱ वो भी डांस,फैशन शो आदि की तैयारियां पीछे से ऐसे चल रही होती कि उस चकाचौंध में हमारा चेहरा गुम हो जाता। प्राइज लेकर नीचे उतरता- लोग बधाई देते, कहते जरुर नेता बनेगा, पत्रकार बनेगा,लेक्चरर बनेगा। इसके अलावे ऐसा हम कुछ नहीं कर पाते कि कुछ औऱ बनने की गुंजाइश हो।
हमलोग भाषण देने या फिर वाद-विवाद में भाग लेते। पूरे इवेंट में यही दो इवेंट थे जिसके लिए अपनी तरफ से चवन्नी नहीं लगानी होती। हिन्दी, अंग्रेजी या फिर संस्कृत के टीचर को पकड़ो औऱ एक भाषण तैयार करा लो। पब्लिक स्कूल में वैसे भी हिन्दी के टीचरों को कोई बहुत पूछता नहीं, सो वो भी हमसे खुश रहते। हम उनके पास इज्जत से जाते औऱ एक ही बात करते- सर किसी तरह इस साल हिन्दी में भाषण देने की परमीशन दिलवाइए। वो पूरा भाषण तैयार करवाते औऱ हौसला देते- हो जाएगा। लेकिन एक-दो दिन पहले धीरे से आकर कहते- नहीं हो पाएगा, बेटे। कोई नहीं, तुम अंग्रेजी में ही बोल दो। अंग्रेजी के भाषण पहले से तैयार होता, एक-दो दिन पहले हम दिन-रात एक करके उसे याद कर लेते। उस भाषण में क्या है, क्या उसके भाव हैं,इससे हमें कोई मतलब नहीं होता,बस बोल देते। मेरे मन में कसक बनी रह जाती कि-26 जनवरी के दिन अपने मन की बात कहूं।
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बहन-बेटियों के बिगड़ जाने का हवाला देते हुए, हजारों चीजों पर पाबंदी लगाने और फतवा जारी करनेवाले लोगों से अगर सीधा सवाल किए जाएं कि क्या समाज का काम सिर्फ संस्कारी लड़कियों के होने से चल जाएगा। ये सवाल मेरे दिमाग में फिलहाल क्यों आया, इसकी चर्चा बाद में करेंगे, पहले एक-दो अपनी उन आदतों पर गौर करें, जब हम छोटे बच्चों को सिखा रहे होते हैं।

दर्जन भर से ज्यादा घरों में मैंने देखा है कि लोग अपने बच्चों को हाय, हैलो, नमस्ते के अलावे कुछ बातें इस तरह से भी सिखाते हैं- बेटा,आंख कैसे मारते हैं, चलो, चारु बुआ को आंख मारकर दिखा दो। किन्नी मौसी को एक फ्लाइंग किस दे दो। ये बातें जो भी सिखा रहे होते हैं और जिसके लिए ऐसा करने को कहते हैं, उससे उनका मजाक करने का रिश्ता होता है. बच्चा, बताए गए निर्देश के अनुसार ही काम करता है और वो उन्हें शाबाशी देते हैं। देखा,ये भी जानता है कि आप खूबसुरत हैं औऱ आपको फ्लाइंग किस देना चाहिए। मौसी, बुआ यानि एक लड़की या तो झेंप जाती है या फिर जीजाजी आप भी न...बोलकर बच्चे को पुचकारने लग जाती है। उन्हें अपने लौंडे पर गुमान होता है औऱ अभी से ही पुरुषत्व मिजाज के होने पर खुशी होती है। मैंने एक-दो बार उन्हें टोका भी है- ये क्या सीखा रहे हैं आपका रिश्ता किम्मी से मजाक का है तो उसमें अपने लौंडे को भी क्यों घसीट रहे हैं। भाई साहब का सीधा जबाब होता- क्या बैकवर्ड की तरह बात कर रहे हैं, बच्चा थोड़े ही समझता है इन सब चीजों का मतलब, हम तो बस टाइम पास के लिए कर रहे थे।
लौंडे को एक लड़की के लिए भद्दे और बेहुदा हरकतें सीखाकर टाइम पास करना बहुत आसान है लेकिन लड़कियां ऐसे टाइम पास करने की कला नहीं सीखती,न सिखायी जाती है। इसके पीछे का तर्क है कि वो अभी से ही ये सब सिखेगी तो बर्बाद हो जाएगी। यानि समाज के लिए जो भी चीजें कथित रुप से बुरा है, अश्लील है, बेकार है, उसे लड़कियां जल्द ही समझ लेती है। उस उम्र में ही उसका मतलब समझ लेती है जबकि उसी उम्र के लड़के इन सब चीजों का कोई मतलब नहीं समझते। समाज की बुराइयों को, लड़कियों के जल्दी सीख जाने की मान्यता साबित करते हुए कहीं हम उस पर पाबंदी औऱ वहीं लड़कों को गुपचुप तरीके से ही सही पितृसत्तात्मक समाज को मजबूत करने की ट्रेनिंग तो नहीं दे रहे होते हैं।
मैं नहीं कह रहा कि जब वो लड़कों को किस लेने या उड़ाने,तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त गाने के लिए, आंख मारकर बुआ या मौसी पर तिरछे ढंग से मुस्कराने की कला सिखा रहे होते हैं तो अपनी लड़कियों को भी वही सब सिखाएं। बात बस इतनी है कि लौंड़ों के लिए जो चीजे सहज,कैजुअल औऱ मजाक करने की है, लड़कियों के लिए वही चीजें संस्कार, मर्यादा, खानदान की इज्जत कैसे साबित हो जाती है।

किसी के भी घर में लड़कियों के लिए जो मैं सबसे ज्यादा शब्द सुनता हूं वो ये कि- निम्मी,पीउ,जिया, अब बड़ी हो रही है, उसके सामने ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, उसके सामने फलां चीजें नहीं रखनी चाहिए, आउटलुक का ये अंक आप बेड के नीचे ही रखिए, टेबुल पर रखने से वो पलटने लगेगी। कितना डर है हमें लड़कियों के समझदार हो जाने का, कितना भरोसा है हमें कि ये सब चीजें लड़कियां लड़कों से जल्दी समझ लेती है। लेकिन, लड़कियों को गैर समझदार औऱ बुराइयों से दूर रखने, उसकी इज्जत को लेकर लगातार चिंतित होने की विभाजन रेखा स्पष्ट नहीं होती। अपनी तरफ से लाख कोशिश करने के बाद हम उसे घालमेल कर देते हैं। हम जिस बहन-बेटी के इज्जत की बात करते हैं, उसकी रक्षा की बात करते हैं,ठीक उसी समय कैसे उसकी धज्जियां उड़ा रहे होते हैं,पोस्ट लिखने की तात्कालिक वजह के तौर पर इन्हें देखें-
साभारः- मोहल्ला

विनाश said...
सही काम कर रहे हो आखिर तुम्हारी बिटिया भी बडी हो रही है उसे भी खुला समाज चाहियेगा . इसकी एक शाखा अंतर्वासना डाट काम का भी विज्ञापन कर डालो ना जहा बेटी और बाप आपस मे सेक्स कैसे करते है कि कहानिया छपती है
January 24, 2009 6:56 PM

Anonymous said...
बहन बेटियाँ भी तो पढ़ रही थी तेरा ये ब्लॉग .
मादरचोद तेरी वजह से अब नेट कनेक्शन ही हटवाना पड़ेगा.
छि छि छि
शर्म आनी चाहिए तू तोह एक पत्रकार (तथाकथित ही सही) है न.
January 24, 2009 11:26 PM

("सविता भाभी डॉट कॉम पर आपका स्‍वागत है!" पोस्ट की प्रतिक्रया)
ये वो लोग हैं जो बहन-बेटियों को बिगड़ने सबचाना चाहते हैं, इस बात से निश्चिंत होकर कि उनके द्वारा की गयी टिप्पणियों को पढ़कर बहन-बेटियों पर कोई असर नहीं होगा,मन एकदम से कसैला नहीं होगा कि देश के किसी बाप या भाई ने उसके संस्कारी बनाने की मांग को किस तरह लोगों के सामने रखा।
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तब तक हमलोगों के उपर किसी एक एक टीचर के लिए समझदार,बफादार औऱ बाकियों के लिए बेकार होने का ठप्पा नहीं लगा था। आमतौर सभी टीचरों से अपनी बात होती,सबों के छोटे-मोटे काम करने के लिए हमलोग मुंह बाये रहते। आज भले ही कोई भी कुछ करने को कह दे तो इगो, आइडेंटिटी,दूसरे टीचरों से उनके गणित, कहां तक पावरफुल है आदि सवालों पर विचार करने लग जाते हैं। नहीं तो एमए के दौरान हम उन टीचरों के लिए भी घंटेभर तक इंतजार कर ऑटो रुकवाते जो सालों भर कासिम की दवाई के भरोसे हमें पढ़ाने आते। क्लास में बार-बार कहते भी कि बेटा, क्लास लेने के अलावे कहीं भी बाहर नही जाते. सीनियर लोग इस कहीं नहीं जाने का अर्थ इंटरव्यू के लिहाज से फुके हुए पटाखे के तौर पर बताते. ये वहां भी नहीं जाते और अगर जाते भी हैं तो इनकी चलती नहीं है, कहकर हमलोगों के गुरु प्रेम पर तरस खाते। एक ही बात करते, अपनी तरफ से आनेवालों के साथ यही दिक्कत है कि वो प्रैक्टिकल नहीं होता।
हमलोग इमोशनल के नाम पर इमोशनल फूल कह जाते। जिन लोगों ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई डीयू से की है, वो तो इस मामले में पहले से ही समझदार थे। लेकिन एमए करने आए हमलोगों में व्यक्तिगत स्तर पर लगभग सारे टीचरों से पहचान बनाने की ललक बनी रहती। वो हमें डराते भी, फलां मास्टर के साथ घूमते हो, एम.फिल् में बहुत दिक्कत होगी लेकिन हम इस बात पर अड़ जाते कि हमें एमए के आगे पढ़ना ही नहीं है- अब बोलो। वो चुप हो जाते। जब यही मन है तो फिर है उस तुलसीदास वाले मास्टर के लिए इतनी जहमत उठाने की क्या जरुरत है जो दो साल पहले ही रिटायर्ड हो गया है। पकड़ों जवान और पावरफुल को जो कहीं अखबार-उखबार में लगा दे। हम अपनी मर्जी की करते रहे और मास्टरों से अपनी बात होती रहती।

इसी क्रम में आगे चलकर पुराने लोग धीरे-धीरे आने बंद हो गए और नए टीचर आने शुरु हो गए। हमने भी आगे की पढ़ाई जारी रखने का मन बनाया, बाकी मीडिया में जाने की कीड़ा को साइड से पोसते रहे। अपना फिर वही पुराना फार्मूला कि सबसे बात करेंगे, सबके साथ घूमेंगे। लेकिन एम.फिल् आते-आते इतना समझने लग गया था कि काम करने के लिए मुंह बाये रहना छोड़ना पड़ेगा।

एम.फिल् के शुरुआती दौर तक सबके साथ वाला फार्मूला काम करता रहा औऱ होता ये कि बुक फेयर में प्रगति मैंदान के गेट नं 5 से एक टीचर के साथ घुसते तो 7 नंबर हॉल में किसी और के साथ घुमने लग जाते। हमे अच्छा लगता औऱ मन ही मन जमकर जेएनयू वाले को गरियाते कि- उनके यहां का खेल ही अलग है, एक से बात करो तो दूसरे मास्टर मुंह फुला लेते हैं, अपने यहां मामला सही है। हम अपने विभाग पर फुलकर कुप्पा रहते।

हम मस्ती से तीन-चार लोगों औऱ एक सरजी के साथ घूम रहे थे। सामने से मनोहरश्याम जोशी जी गुजरे- मैं तेजी से लपका। सबों से कहा- मुझे एक मिनट पहले राजकमल जाने दो, जोशीजी के सारे उपन्यास खरीदने हैं, सब पर उनके ऑटोग्राफ लूंगा, मैं अधीर हो उठा था। कभी किसी के ऑटोग्राफ लेने के लिए मैं इतना बेचैन नहीं हुआ, न हिन्दू कॉलेज में आए नामचीन साहित्यकारों के औऱ न ही मीडिया में रहते हुए सिलेब्रेटी के। जोशीजी को लेकर पता नहीं क्या हो गया था।

पीछे से एक बंदे ने जबरदस्ती मुझे खींचा- तुम्हें जिससे भी और जब भी साइन लोना हो, ले लेना लेकिन अभी चलो, जिस मास्टर के साथ तुम जा रहे हो, वो जोशीजी को एक रत्ती भी पसंद नहीं करते हैं, जानते ही भड़क जाएंगे। आअभी चल हमारे साथ। मैं उनलोगों के साथ चला गया लेकिन मुड़-मुड़कर जोशीजी को देखता रहा। बुकफेयर में दोबारा वो नहीं दिखे। करीब दस दिन बाद मैं हांफते हुए किसी तरह हिन्दी भवन में जाकर उनकी तस्वीर के आगे फूल चढ़ाने पहुंच गया।

हिन्दी किताबों की सेल्फ से कामायनी खोजते हुए कसप हाथ लग जाने पर एक ही बात सोचने लगा- इस पर जोशीजी की साइन होती तो कितना अच्छा होता, कितना अच्छा होता उस दिन हम किसी मास्टर के साथ न होकर अकेले होते।
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वेब गर्ल की नयी आजादी

Posted On 1:39 pm by विनीत कुमार | 8 comments


सविताभाभी.कॉम के फैन क्लब में एक लड़की ने स्क्रैप लिखा कि- मैं सविताभाभी को रेगुलर पढ़ती हूं, मैं लेसबियन हूं और चाहती हूं कि सविताभाभी को लेसबियन के साथ संबंध दिखाए जाएं। संभव है लड़की ने जो नाम फैन क्लब में दिए हों वो गलत हो और अपनी पहचान छुपाने की कोशिश की गयी हो लेकिन एक बात तो समझ में आती ही है कि सेक्स को लेकर लड़कियों ने भी अपनी पसंद औऱ नापसंद जाहिर करनी शुरु कर दी है।

अपने यहां देखें तो स्त्री औऱ पुरुषों को लेकर सेक्स और शारीरिक संबंधों के मामले में अलग-अलग मानदंड रहे हैं। स्त्रियों के लिए सेक्स या सहवास वंशवृद्धि के लिए है, खानदान के चिराग को जलाए रखने के लिए है,बुढ़ापे के लिए लाठी की टेक के रुप में औलाद पैदा करने के लिए है। इसके आगे सहवास का उसके जीवन में कोई अर्थ नहीं है। इसमें न तो उसकी इच्छा, न खुशी औऱ न ही सैटिस्फेक्शन शामिल है। स्त्रियों के लिए सहवास धर्म की तरह है और जिस तरह धर्म का पालन इच्छा पूर्ति के बजाय साधना के लिए की जाती है, उसी तरह स्त्रियों के लिए सहवास साधना के तौर पर परिभाषित होकर रह जाती है जिसकी अंतिम परिणति है, मातृत्व को प्राप्त करना, बस।

पुरुषों के लिए भी सहवास एक धर्म की तरह है जिसमें सिर्फ संतान पैदा करना औऱ वंशवद्धि करना तो होता ही है लेकिन उसके जरिए आनंद प्राप्त करने की छूट मिलती नजर आती है। नहीं तो तथाकथित माहन ग्रंथों में, एक पुरुष के लिए कई स्त्रियों के विधान को धार्मिक कलेवर न दिया जाता। खैर,

सेक्स को लेकर किसी गंभीर अवधारणा में न भी जाएं औऱ फिलहाल इस बात को शामिल कर लें कि सेक्स शुरु से ही सिर्फ और सिर्फ संतान पैदा करने के लिए जरुरी विधान नहीं रहा है। पुरुषों के मामले में तो बिल्कुल भी नहीं। दबे-छुपे ही सही लेकिन इसे आनंद के साथ स्वीकृति मिलती रही है। अब तो ये कॉन्सेप्ट के तौर पर है-कि सेक्स इज फॉर प्लेजर। सेक्स आनंद के लिए है। इस कान्सेप्ट का सबसे मजबूत उदाहरण आपको देशभर के पुरुष टॉयलेटों में चिपके सफेद-काले इश्तेहारों में मिल जाएगें जहां किसी क्रीम, तेल या कैप्शूल के बाकी गुणों को बताने के साथ-साथ मस्ती का पूरा एहसास जैसे पेट वर्ड शामिल किए होते हैं। देशभर में प्रकाशित होनेवाले दैनिक समाचार पत्रों में छपे विज्ञापनों में मिल जाएंगे। इस तरह की चीजों के विज्ञापन जहां कहीं भी आपको दिखेंगे उससे कभी भी आप एहसास कर पाएंगे कि तेल,कैप्सूल और क्रीम की जरुरत संतान पैदा करने के लिए सहवास के दौरान आएंगे। खोई हुई दुर्बलता, पौरुष ताकत हासिल करने का नुस्खा, आनंद और मस्ती का एहसास ऐसे शब्दों से भरे विज्ञापन ये आसानी से स्थापित कर देते हैं कि सेक्स सिर्फ संतान के लिए ही नहीं प्लजेर के लिए भी किए जाते हैं। इस संदर्भ में कंड़ोम को सेक्स एज ए प्लेजर की संस्कृति को बढ़ाने का सबसे मजबूत माध्यम मान सकते हैं। इन सबके वाबजूद भी अगर कोई अभी भी इसे धार्मिक कार्य औऱ साधना जैसे शब्दों से जोड़कर देखता है तो वो इसके बहाने दर्शन औऱ आध्यात्म पर बहस करना चाहता है या फिर पाखंड फैलाने का काम करना चाहता है। और मैं इन दोनों से बचना चाहता हूं।

लेकिन प्लेजर का यही कॉन्सेप्ट जरा स्त्रियों के मामले में लागू करके देखिए। लागू तो दूर,समाज का एक बड़ा तबका कैसे आपको काट-खाने के लिए दौड़ता है। कृष्णा सोबती ने अपने उपन्यास मित्रो मरजानी में एक स्त्री को अपने पति से शारीरिक तौर पर असंतुषट होने औऱ उसे इसी आधार पर अस्वीकार कर देने की बात की तो पूरा हिन्दी समाज पिल पड़ा। स्त्री-विमर्श का एक सिरा जब ये कहता है कि देह के जरिए भी मुक्ति संभव है तो पितृसत्तात्मक समाज आग-बबूला हो उठता है। तमाम तरह की मुक्ति और बदलावों की बात कर लेने के बाद स्त्री-मुक्ति औऱ सेक्स के स्तर पर बात करने की कोशिश की जाए तो समाज उसे पचा ही नहीं पाता। वो इतना घबरा जाता है कि उसे लगता है कि स्त्रियों को आड़े हाथों लेने के लिए, उसे,यौन-शुचिता जैसे सवालों से घेरकर ही तो बेडियों को मजबूत बांधे रखा जा सकता है। अब जब वो सेक्स को भी रोजमर्रा की चर्चा में शामिल करने लग गयी, उसमें भी अपनी पसंद और नापसंद बताने लग गयी तो फिर ऐसा क्या बच जाएगा जिससे कि सामंती और गुलामी की संस्कृति को जिंदा रखा जा सकेगा।

अब आप ही बताइए,ऐसे में, कोई लड़की नियमित अपडेट होनेवाले सविताभाभी.कॉम के पन्ने पढ़ती है, और तो और अपनी पसंद भी फैन क्लब में ठोंक जाती है तो ऐसी लड़कियों का क्या कर लेगें आप। सिवाय दिन-रात ये मनाने के कि हे भगवान ऐसी लड़कियों की संख्या न बढ़े।
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