हॉस्टल ऑथिरिटी के कहने पर और खुद भी सोचकर कि ऐसा कब तक चलेगा मैंने इसकी लिखित शिकायत अपने रेसीडेंट ट्यूटर को दे दी। लेकिन इसमें हुआ यह कि ऑरिजिनल कॉपी न देकर मैंने इसकी फोटो कॉपी दी थी. जल्दी में वो मेरे पास ही रह गया। मेरी शिकायत पर कहीं कुछ नहीं हुआ। मैंने फिर फोन करके रेसीडेंट टूयूटर से कहा कि सर मैं कुछ नहीं चाहता। मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि आप मेरा कमरा बदल दें। उन्होंने कहा-तुमने तो ऑरिजिनल कुछ दिया ही नहीं। तुमने तो फोटो कॉपी दी है। ऐसा करो, तुम ऑरिजिनल कॉपी ऑफिस में जमा करा दो, मैं जल्द ही कुछ करता हूं। मैंने उनके कहे अनुसार वैसा ही किया।
अगले दिन मेरा पार्टनर मेरे पास आया और कहा-क्या आपने मेरी कोई लिखित शिकायत की है. मैंने कहा-हां की है। उन्होंने पूछा- आपको पहले हमसे पूछ लेना चाहिए था न, आपको वैसे परेशानी क्या है। मैंने उनसे साफ कहा कि इसमें आपसे पूछने वाली कौन सकी बात है और जहां तक बात परेशानी की है तो ये मैं क्या, कोई भी शराब पीने और आए दिन लगों के आते जाने से परेशान हो जाएगा।
इतना सब कुछ होने के बाद मेरा पार्टनर मेरे दोस्त मुन्ना के पास गया और कहने लगे- मेरा तो करियर डूब गया, बात मेरे गाइड तक चली गयी है। कुछ करो, विनीतजी से कहो कि वो अपनी शिकायत वापस ले लें। बाद में मुझे भी फोन करके बुलाया। मैं आया और उनके एक दोस्त और मुन्ना के साथ बैठकर यही तय हुआ कि जो कुछ भी हुआ उसे भूलते हुए समझोता कर लिया जाए क्योंकि दोनों की पढ़ाई खराब हो रही है। यही तय हुआ कि हमलोग रेसीडेट ट्यूटर के पास चलते हैं और सारी बात वहीं रखते हैं।
मैं उनके कहे अनुसार कम्प्यूटर रुम में इंतजार करता रहा कि आप खाकर आएं तब हम सब चलेंगे। मैंने करीब एक घंटे तक इंतजार किया और इस बीच कम्प्यूटर रुम में कुछ लिखने लग गया। तभी एक ही साथ चौदह-पन्द्रह लोग कमरे में आए, एक ने कम्प्यूटर बंद कर दिया और कहा- क्या ब्लॉगिआते हैं और लोगों का जीना हराम कर दिया है. दूसरे ने कहा- हम अभी तक समझ नहीं पाए कि आप आदमी किस तरह के हैं। ये वो बंदा है जिसे कि मैंने एम.फिल् में पेपर लिखने के दौरान मदद की थी, उसके साथ उन जगहों पर भी एकाध बार गया था जहां से कि उसे कुछ मदद मिल सकती थी। एक और बंदा जो कि हमसे छोटा तो है ही, पढ़ने के नाम पर कुछ भी नहीं स्पोर्टस कोटे से आया है- कहने लगा, आपको बताना होगा कि आप ये कमरा क्यों छोड़ना चाहते हैं. मेरे बगल के कमरे के भाई ने कहा कि आप मेरी हिस्ट्री नहीं जानते और बंताने लगा कि वो हर महीने हॉस्टल के पैसे जमा करता है लेकिन चार-चार महीने तक नहीं रहता. नहीं रहने से कौन सी हैसियत बनती है, मैं समझ नहीं पाया। मैं अपनी बात रखता, इसके पहले कि कई लोग एक साथ बोलने लग गए। मुझे अपनी बात कहने का कुछ मौका ही नहीं दिया। वहां मैं अकेला था, मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं था. पूरी प्लानिंग इस तरह से की गयी थी कि मैंने महसूस किया कि वो चाह रहे थे कि ऐसा करके उन पर दबाब बनाया जाए, अगर डरकर शिकायत वापस ले ले तो ठीक है, नहीं तो जरुरत हुई तो वहीं मारा जाय। इसलिए मैं अपने पार्टनर की बात से अभी भी सहमत नहीं हूं कि वो हमसे बात करने आए थे। पन्द्रह लोग मुझे कौन-सी बात करने आए, मैं अभी तक समझ नहीं पाया और अगर उन्हें हमसे बात ही करनी थी तो फिर हमें अपनी बात रखने का मौका क्यों नहीं दिया।
कम्प्यूटर रुम तक की कहानी यही बनी कि लोग हम पर दबाब बनाते रहे कि आप शिकायत वापस ले ले लें। तभी एक बंदे ने कहा कि- आपने लिखा है कि मेरे कमरे में लोग शराब पी रहे थे, अरे भाई शराब कौन नहीं पीता है. ये कोई बड़ी बात थोड़े ही है, आप हाई स्कूल के बच्चे की तरह शिकायत करने चले गए। आपसे गलती हुई है, इस बात को आप मानिए और लिखिए कि हमसे गलती हुई है और आगे से ऐसा नहीं होगा। मैं उन लोगों द्वारा सिद्ध कर दिया गया था कि गलती मुझसे ही हुई है और हमें न सिर्फ शिकायत वापस लेनी है बल्कि यह भी लिखना है कि हमसे गलती हुई है और आगे से ऐसा गकभी नहीं करेंगे. हमने एक सीधे-साधे रिसर्चर को शिकायत करके परेैशान किया है और हमें इसका एहसास होना चाहिए...
क्या हुआ उसके बाद और क्यों अब मन नहीं लगता मुझे अपने कमरे में, क्यों भागा-भागा फिरता हूं हॉस्टल से और क्यों एक बार फिर लगता है कि रिसर्च छोड़कर मीडिया में आ जाउँ..पढ़िए मेरी अगली पोस्ट में।
सिस्टम से लड़ना आसान नहीं होता, मैं परेशान भी हूं और गलत भी
Posted On 3:50 pm by विनीत कुमार | 4 comments



आप सही होते हुए भी कैसे गलत साबित कर दिए जाते हैं, आप परेशान को प्रशासन की शरण में जाने पर कैसे परेशान हो जाते हैं, पिछले आठ दिनों से यही सब झेल रहा हूं मैं। शारीरिक परेशानियों के साथ-साथ मानसिक उलझनें भी।
मेरे कमरे में चार-पांच लोगों ने रातभर शराब पीकर हंगामा मचाया, उल्टी-सीधी बातें कही। मैं परेशान होता रहा। पिछले तीन दिनों से पूरी-पूरी रात जाग रहा था। एक तो काम का प्रेशर और कुछ व्यक्तिगत कारण। मुझे रात के चार-चार बजे तक नींद नहीं आती. लेकिन उस दिन मैंने फैसला किया कि ऐसे कैसे चलेगा, काम करने के लिए मुझे ढंग से सोना ही होगा। मैंने दस बजे कमरे की बत्ती बुझा दी और सोने की कोशिश करने लगा। नींद थोड़ी आती, फिर चली जाती। तभी ठहाके और जोर-जोर से हंगामा शुरु हो गया। हारकर मैंने इस बात की शिकायत अपने रेसीडेंट ट्यूटर से कर दी और अनुरोध भी किया कि- सर आप खुद चलकर देख लीजिए कि हमारे कमरे में क्या हो रहा है। उनके यहां कुछ लोग आए हुए थे सो उन्होंने आने में अपनी असमर्थता जताई. मैं वापस आ गया।... और अपने दोस्त मुन्ना के कमरे में सो गया।
दरअसल हमारे हॉस्टल ग्वायर हॉल में पीएचडी करनेवालों को अलग कमरा दिया जाता है लेकिन कमरे की बनावट कुछ ऐसी है कि कभी महसूस नहीं होता कि हम सिंगल कमरे में हैं. कमरे में घुसते ही एक बड़ा-सा हॉल है। बहुत ही सुंदर औऱ प्यारा। जाड़े में लकडियां जलाने तक की व्यवस्था है। उसके बाद दोनों तरफ दो कमरे में हैं। दोनों कमरे में कोई दरवाजा नहीं लगा है। एक कमरे में मैं रहता हूं और दूसरे कमरे में मेरा पार्टनर।
पार्टनर के यहां की स्थिति ये है कि उनके गेस्ट स्थायी तौर पर उनके साथ रहते हैं। रहने के साथ-साथ मेस से टिफिन में भरकर खाना लाते हैं और दो या इधर डेढ़ महीने से तीन लोग दोपहर रात उसी खाने में खाते। कमरे में इस तरह से खाना लाना मना है। केवल बीमार आदमी के लिे ये सुविधा है। खैर, उनके इस तरह से खाना लाने और खाने से हमें कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन खाने के एक घंटे पहले बाहर से लोग आते और खाने के दो-ढ़ाई घंटे तक बातें करते रहते। मैं परेशान होता रहता। मेरे पार्टनर से बहुत ही औपचारिक तरीके की बात होती। क्योंकि डीयू के किसी भी हॉस्टल में पहले ही दिन से हिन्दी के लोग चूतिए मान लिए जाते हैं। मेरे आने के तीसरे दिन ही पार्टनर ने मेरे जूनियर दोस्तों को बताया कि तुम्हारा सीनियर विनीत तो चूतिया है, दिनभर रूम में घुसकर पढ़ता रहता है। खैर,
तभी से मैं बहुत संभलकर कम बातचीत किया करता।
इधर जब मैं कमरे में रहता, मेरे या फिर मेरे किसी भी सामान से उन्हें कोई मतलब नहीं होता. लेकिन जैसे ही रातभर के लिए कहीं गया, वापस आने पर कोई न कोई कांड जरुर हो जाता। उस रात मंडली मेरे ही कमरे में जमती. रातभर लोग दारु पीते और हंगामा करते। एक रात मैं जेएनयू गया था। वापस आया तो देखा कि कमरे के शीशे टूटकर फर्श पर बिखरे हुए हैं। आने पर मैंने पूछा कि- सर ये सब क्या है, उन्होंने साफ कहा कि हमें कुछ भी नहीं पता. जब मैंने सबकुछ समेटा तो देखा कि कमरे के चारो तरफ शराब की बोतलों के ढक्कन बिखरे पड़े हैं। मैंने कुछ कहा नहीं और सारे शीशे लगवाए.
बेला रोड़ से अपने दोस्त को अंतिम विदाई देकर लौटा ही था कि कमरे में कुछ लोग आए, साथ में ऑफिस के लोग
और रेसीडेंट ट्यूटर भी थे। हुआ यों था कि आज किसी भाई के कमरे से लैपटॉप की चोरी हो गयी थी और वो और कमरों की तरह मेरे कमरे की भी तलाशी लेना चाह रहे थे। इसी बीच उनमें से किसी ने कहा-यार नयी फ्रीज खरीदी है तुमने, आरटी सर को पानी तो पिलाओ। मैंने जैसे ही फ्रीज खोला, देखा- पूरे फ्रीजर में बीयर की बोतलें और केन भरी हुई है. मैंने फ्रीज को तुरंत लगाया और बाहर से पानी लाने चला गया। अभी से दस मिनट पहले उसमें ऐसा कुछ भी नहीं था. उस रात भी किसी दूसरे कमरे में जमकर बीयर और शराब पी गयी।
मैं अपने पार्टर के साथ परेशान होने की बात ऑथिरिटी से लगातार करता रहा। इस बीच कमरे से पैनकार्ड, कैश सहित रेलवे की टिकट की भी चोरी हुई लेकिन कुछ नतीजा नहीं निकला।
लेकिन आठ दिन पहले हुई घटना ने मुझे बुरी तरह परेशान कर दिया और हारकर मैंने फिर से इसकी शिकायत की।
कैसे लगता है कि ऑथिरिटी नाकाम है और मैं बली का बकरा बनाया जा रहा हूं। आसान नहीं होता सिस्टम से लड़ना, पढिए मेरी अगली पोस्ट में।



तो सास-बहू सीरियल को गरियाने के बाद मां एक बार फिर से टीवी देखने लग गयी है। रामायण, महाभारत, श्रीकृष्णा और जो भी धार्मिक सीरियल आने शुरु हुए हैं। मां ने अब से दस-बारह साल पहले जो कुछ देखा था, उसे याद करते हुए अब का अनुभव बताती है। उस समय मैं भी मां के साथ ही होता और साथ बैठकर देखता.
मां बताती है कि जो मजा पहले रामायण देखने में आता था, अब वो बात नहीं है। भले टीवी सादा था उ भी कम भोलटेज से हनुमानजी तक हिलने लगते थे. एक ही घंटा में दू से तीन बार लैन चल जाता लेकिन एक अलग ढंग का मजा आता। मोहल्ले में कई लोगों ने सिर्फ रामायण देखने के लिए टीवी खरीदी थी। पापा के हिसाब से टीवी खरीदने का मतलब पैसा फंसाना था, सो लाख कहने पर टीवी नहीं खरीदी गयी. तभी रुपा ( बनियान बनानेवाली कंपनी ) ने कुछ ऑफर दिया कि इतने डिब्बे माल खरीदो तो ब्लैक एन व्हाइट टीवी मिल जाएगी और पापा ने ऐसा ही किया। हमारे घर टीवी आ गयी।
मोहल्ले में कई रईस थे। उनके यहां भी लोग देखने जाते। एक तो उनके यहां टीवी रंगीन थी और दूसरा कि उनके यहां जेनरेटर की सुविधा थी। लेकिन वहां लोग हमारे घर में किसी तरह की मजबूरी हो जाने पर ही जाते। लोगों का कहना था कि वहां अपनापा जैसा नहीं लगता है. लगता है कि नौकर-चाकर हैं और आए हैं। घर का कोई भी आदमी जाने पर बात नहीं करता। शुरु-शुरु में एक-दो बार उस घर में लोगों को चाय मिली जिसे कि रागिनी दीदी की मां बकड़ी का मूत(बकरी का पेशाब) कहती। वहां लोगों को चिकने मोजाइक के फर्श पर बैठने को मिलता और हमारे घर में सीमेंट के पक्के पर। उपर से गर्मी इतनी लगती कि अब तो हमें चक्कर आने लगे लेकिन लोग मेरे यहां ही ज्यादा आते। कभी-कभी बैठने के लिए दरी कम पड़ जाती और मां धुले हुए बेडसीट निकालती तो मिथिलेश भैय्या की मां या फिर मीरा दीदी की मां हाथ पकड़ लेती। सीधा कहती- इ सब काहे करते हैं बहुरिया, हमलोग बाहर के थोड़े ही हैं औऱ जूट के बोरे पर बैठ जाती जो कभी-कभी गीला भी होता।
मां उस दिन ग्वाले से खुशामद करके दो किलो दूध ज्यादा मंगाती जिसके लिए बाद में वो तैयार नहीं होता लेकिन एक दिन जब मैंने भी रविवार को सुबह नौ बजे रामायण देखने के लिए बिठा दिया तो अगली बार से लोगों को ज्यादा दूध मांगने पर साफ कह देता कि- नहीं है दूध, आज रमैण देखनेवालों के लिए जाएगा। तब रामायण देखना एक धार्मिक कार्य होता और देखनेवाले लोग समाज की नजर में ऑडिएंस होने के बजाय राम या हनुमान भक्त होते।
इधर रामायण खत्म हुआ और उधर चाय छनने लग जाती. कोई स्टील के गिलास में, कोई टूटे कप में, कोई कटोरी में तो कोई मिट्टी के चुक्के में चाय का मजा लेने लग जाते। बाद मे मां ने जब एक ही साथ तीन दर्जन कप खरीदे तो कोई निकालने ही नहीं देता। सब कहते- इसको काहे निकाल रहे हैं, आनेजाने वालों के लिए रहने द, मत घोलटाओ. घोलटाने का मतलब झूठा करना। चाय-पीने के बाद सब बगीचे में लगे चापानल से अपना-अपना बर्तन धोकर मां को पकड़ा देते. बाद में तो महौल ऐसा जमा कि लोग अपने घर से कुछ-कुछ खाने का लाने लग गए। कोई मकुनी( सत्तू की पूडी) तो कोई चूडे की लिट्टी।.
इस दौर में टीवी पर रामायण और महाभारत देखना एक बहाना भर होता। हमें इस पूरे प्रसंग में दो ही चीजें अच्छी लगती। एक तो विज्ञान को धत्ता बताकर आशीर्वाद में मिले एक तीर का राम के छोड़ते ही हजारों तीर में बदल जाना और दूसरा कि आनेवाले लोगों से घर में मजमे का लग जाना। कुछ लोग तो दोपहर तक रह जाते और एक-दो खाकर भी जाते। रविवार की यह सुबह पड़ोसियों से जुड़ने का एक बढ़िया बहाना होता। इसके बाद से लेकर अब तक टीवी से सामूहिक रुप से लोग कभी नहीं जुड़ पाए। तब टीवी बरामदे या फिर दालान में रखी जाती। अब तो बेडरुम में ऱखी जाने लगी है। कई घरों में तो एक कॉमन टीवी और बाकी अपने-अपने कमरों के लिए थोड़ी छोटी और अपनी-अपनी। तब टीवी पर्सनल एसेट नहीं हुआ करती। कुछ लोग बड़े साइज की इसलिए भी लेते कि पड़ोस के लोगों को देखने में परेशानी न हो.
मां इन सब बातों को आज रामायण देखते हुए याद करती है और उसके साथ मैं भी। मैं मां को टीवी का एक बेहतर दर्शक मानता हूं इसलिए रिसर्च के साथ-साथ घर गृहस्थी के साथ-साथ कभी-कभी सिर्फ टीवी और रेडियो पर बात करने के लिए फोन करता हूं. आपको यकीन नहीं होगा, कल ही वोडाफोन का रिचार्ज कूपन १२० रुपये का भरवाया और अभ वैलेंस एक रुपये दस पैसे हैं। सारी बातें मां से टीवी पर होती रही।
मां का कहना है कि- अब रमैन देखे में उ मजा थोड़े है। अकेले के चीज है ही नहीं। जब तक दस-बीस आदमी साथ नय देखे तब रामायण की। आज घर में रंगीन टीवी है, चौबीस घंटे बिजली भी। बेक्र में पीने के लिए फ्रीज में ऱखा जूस भी। लेकिन मां को रामायण देखने पर भी उससे पहले जैसा मजा नहीं आ रहा।... मां बताती है कि उसके कहने पर भाभी साथ में बैठ जाती है लेकिन थोड़ी देर चटने के बाद यह कहते हुए कि- मांजी खुशी के लिए दूध बनाना है, हल्के से कट लेती है। मां समझती है कि उन्हें धार्मिक सीरियल पसंद नहीं है और अफसोस जताती है- कहां से होगा अकिल-बुद्दि, बड़ा- छोटा के इज्जत करके लूर। जे बढ़िया चीज टीवी पर आता है उ नय देखके तलाक देखती है। इतना सब कहने के बाद मां करती है- आज के रामायण और महाभारत की समीक्षा। पढ़िए मेरी अगली पोस्ट में


मेरी मां की अब मौज हो गयी है। एक बार फिर वो अपना अच्छा-खासा समय टेलीविजन को देने लगी है। नहीं तो अब तक मेरी भाभी कहती कि अकेले सीरियल देखने में बोर हो जाते हैं, मां जी आप भी मेरे साथ देखिए न तो मेरी मां साफ बहाने बना जाती- देर तक बैठा नहीं जाता, टीवी देखने से आंख से पानी झरने लगता है।
एनडीटीवी इमैजिन पर रामायण एक अच्छी आदत शुरु होने के बाद लगभग सारे चैनलों पर धार्मिक सीरियलों का दौर शुरु हो गया है। मां का इस मामले में साफ कहना है कि सभी चैनलों को एहसास हो गया है कि दर्शकों को भगवान से लम्बे समय तक दूर नहीं रखा जा सकता। कोढा-कपार दिखाने से तो अच्छा है कि भगवान का सुमरन करे। सब चैनल को अपनी गलती का एहसास हो गया है।
मेरी मां टीआरपी के खेल को नहीं समझती औऱ न ही चैनलों की मार्केट पॉलिसी को समझती है। उसके हिसाब से चैनल को जो मन आए भले ही दिखा दे लेकिन उसको पता नहीं है कि रोज कितनी औऱतों का हाय उसमें काम करने वालों को लगती है। जो बुढ़िया सास अपनी बहू से एक गिलास पानी के लिए तरस जाए, लाचार को छोड़कर टीवी देखने बैठ जाए उसका हाय टीवी को तो जरुर लगेगा। इ सास-बहू का सीरियल दिखा-दिखाकर केतना आदमी का घर फोड़ दिया है, टीवीवालों को इसका अंदाजा थोड़े ही है।
मां का साफ मानना है कि सास-बहू टाइप का सीरियल औरत को नागिन बना देता है, वो अपनी सास से बातचीत करने के बजाय फुफकारना जानती है। मेरे बार-बार पूछने पर कि- देखो तो मां, भाभी अभी तक नागिन तो नहीं हुयी। मां एकदम से फोन पर ही बोल पड़ी- अभी नहीं तो देर-सबेर तो हो ही जाएगी, उ टीवी कम थोड़े देखती है, ट्रेनिंग तो ले ही रही है। बताओ श्रवण कुमार जैसे लड़के को सीरयल में दुःशासन बनाने में लगा है। एक आदमी का तीन-तीन औरत से चक्कर। अब किसी को इ सब करम करके बुढ़ापा में कोढ़ी फूट जाए तो उस पर किसको तरस आएगा। इ तीन साल के बितनी खुशी को तो देखो, भगवान जाने केतना समझती है लेकिन कहती है कि उस लड़की से किसी और का अफेयर है। बड़ा होके आग लगावेगी नहीं तो और क्या करेगी। इसलिए मां के लिए चूल्हा में जाए टीवी उसने लम्बे समय से देखना छोड़ दिया।
इधर मेरे लगातार फोन करने पर कि- मां तुम्होरे सारे देवी-देवता टीवी के मैंदान में हैं, इधर टीवी देखना शुरु कर दो। पहले तो मां पलटकर मुझसे ही सवाल कर दिया- काहे टीवी को सब लड़की-औरत को पतुरिया बनाने से फुर्सत मिल गया। देखा ही तो रहा था कि- दिन में किसी और के साथ चुम्मा-चाटी और रात को एकदम से सती-सावित्री बनके सीधे मरद को दूध का गिलास पकड़ा रही है। जो काम कर रहा है, भोगेगा एक दिन जरुर।
मां जब भी टीवी के बारे में बात करती उसे इस तरह से कोसती, जैसे घर का बच्चा किसी की कुसंगति में पड़ गया हो या फिर घर की औरतें में चरित्र को लेकर कोई ऐब शुरु करने का काम करता हो। सबसे -ज्यादा चिंता उसे तीन साल की खुशी की होती- एतना टीवी जेखेगी तो बहुत जल्दी पम्पाल( धूर्त,बदतमीज) हो जाएगी। हमको तो छोड़ो- दू चार साल में मर-खप जाएंगे लेकिन माय-बाप को भी रत्ती भर भी इज्जत नहीं करेगी। कहती है नीचे जो अंशु रहता है न दादी वो पूछता है कि तुम्हारा कोई ब्ऑयफ्रैंड है।
मेरे जाने पर भाभी खाने को लेकर अक्सर आजमाइश किया करती है। दुर्भाग्य कहिए कि हमेशा ऐसी चीजें बनाती जो मां के देहाती मुंह के खिलाफ होता। उपर से उसमें लागत भी अधिक लगती। मां को क्या, कभी-कभी तो घर में मुझे छोड़कर किसी को पसंद नहीं आता। मुझे तो घर का उबला पानी भी बेहतर लगता है और फिर भाभी का मन रखने के लिए मैं पहले से ही बहुत अच्छा-बहुत अच्छा की रट लगाने लग जाता। मां को भाभी से कोई शिकायत नहीं है। दो-चार बात मां के विरोध में बोलने के बाद कहती है- ऐसन थोड़े थी। केतना बढ़िया नया-नया में दाल-भात दू-तीन तरह के सब्जी-दाल बनाती, तब अब क्या बनाती है, उनियन पिज्जा, सब्जी कौन त मचूरियन, सबके सब कोढ़ा-कपार। इ सब टीविया देख-देख के हुआ है। अरे देखावे जो देखाना है, जिए-मरे के खिस्सा। त नय- रोज नया-नया खाना के नाम बतावेगा।
मेरी मां टेलीविजन के इस रवैये से इतनी खफा है कि अगर कोई कहे कि वो टीवी सीरियल बनाता है तो उससे चाय-पीनी पूछने के पहले सीधे पूछे कि- काहे तुम्हारे घर में लड़का-बच्चा नहीं है और तुम जो अभी हिआ आए हो, घरवाली कहां है....किसी के साथ गई है सिनेमा ?
अब धार्मिक सीरियलों के शुरु हो जाने पर कैसे बदला है टीवी को लेकर मेरी मां के विचार, पढ़िए अगली पोस्ट में।।।
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एनडीटीवी इमैजिन पर रामायण एक अच्छी आदत शुरु होने के बाद लगभग सारे चैनलों पर धार्मिक सीरियलों का दौर शुरु हो गया है। मां का इस मामले में साफ कहना है कि सभी चैनलों को एहसास हो गया है कि दर्शकों को भगवान से लम्बे समय तक दूर नहीं रखा जा सकता। कोढा-कपार दिखाने से तो अच्छा है कि भगवान का सुमरन करे। सब चैनल को अपनी गलती का एहसास हो गया है।
मेरी मां टीआरपी के खेल को नहीं समझती औऱ न ही चैनलों की मार्केट पॉलिसी को समझती है। उसके हिसाब से चैनल को जो मन आए भले ही दिखा दे लेकिन उसको पता नहीं है कि रोज कितनी औऱतों का हाय उसमें काम करने वालों को लगती है। जो बुढ़िया सास अपनी बहू से एक गिलास पानी के लिए तरस जाए, लाचार को छोड़कर टीवी देखने बैठ जाए उसका हाय टीवी को तो जरुर लगेगा। इ सास-बहू का सीरियल दिखा-दिखाकर केतना आदमी का घर फोड़ दिया है, टीवीवालों को इसका अंदाजा थोड़े ही है।
मां का साफ मानना है कि सास-बहू टाइप का सीरियल औरत को नागिन बना देता है, वो अपनी सास से बातचीत करने के बजाय फुफकारना जानती है। मेरे बार-बार पूछने पर कि- देखो तो मां, भाभी अभी तक नागिन तो नहीं हुयी। मां एकदम से फोन पर ही बोल पड़ी- अभी नहीं तो देर-सबेर तो हो ही जाएगी, उ टीवी कम थोड़े देखती है, ट्रेनिंग तो ले ही रही है। बताओ श्रवण कुमार जैसे लड़के को सीरयल में दुःशासन बनाने में लगा है। एक आदमी का तीन-तीन औरत से चक्कर। अब किसी को इ सब करम करके बुढ़ापा में कोढ़ी फूट जाए तो उस पर किसको तरस आएगा। इ तीन साल के बितनी खुशी को तो देखो, भगवान जाने केतना समझती है लेकिन कहती है कि उस लड़की से किसी और का अफेयर है। बड़ा होके आग लगावेगी नहीं तो और क्या करेगी। इसलिए मां के लिए चूल्हा में जाए टीवी उसने लम्बे समय से देखना छोड़ दिया।
इधर मेरे लगातार फोन करने पर कि- मां तुम्होरे सारे देवी-देवता टीवी के मैंदान में हैं, इधर टीवी देखना शुरु कर दो। पहले तो मां पलटकर मुझसे ही सवाल कर दिया- काहे टीवी को सब लड़की-औरत को पतुरिया बनाने से फुर्सत मिल गया। देखा ही तो रहा था कि- दिन में किसी और के साथ चुम्मा-चाटी और रात को एकदम से सती-सावित्री बनके सीधे मरद को दूध का गिलास पकड़ा रही है। जो काम कर रहा है, भोगेगा एक दिन जरुर।
मां जब भी टीवी के बारे में बात करती उसे इस तरह से कोसती, जैसे घर का बच्चा किसी की कुसंगति में पड़ गया हो या फिर घर की औरतें में चरित्र को लेकर कोई ऐब शुरु करने का काम करता हो। सबसे -ज्यादा चिंता उसे तीन साल की खुशी की होती- एतना टीवी जेखेगी तो बहुत जल्दी पम्पाल( धूर्त,बदतमीज) हो जाएगी। हमको तो छोड़ो- दू चार साल में मर-खप जाएंगे लेकिन माय-बाप को भी रत्ती भर भी इज्जत नहीं करेगी। कहती है नीचे जो अंशु रहता है न दादी वो पूछता है कि तुम्हारा कोई ब्ऑयफ्रैंड है।
मेरे जाने पर भाभी खाने को लेकर अक्सर आजमाइश किया करती है। दुर्भाग्य कहिए कि हमेशा ऐसी चीजें बनाती जो मां के देहाती मुंह के खिलाफ होता। उपर से उसमें लागत भी अधिक लगती। मां को क्या, कभी-कभी तो घर में मुझे छोड़कर किसी को पसंद नहीं आता। मुझे तो घर का उबला पानी भी बेहतर लगता है और फिर भाभी का मन रखने के लिए मैं पहले से ही बहुत अच्छा-बहुत अच्छा की रट लगाने लग जाता। मां को भाभी से कोई शिकायत नहीं है। दो-चार बात मां के विरोध में बोलने के बाद कहती है- ऐसन थोड़े थी। केतना बढ़िया नया-नया में दाल-भात दू-तीन तरह के सब्जी-दाल बनाती, तब अब क्या बनाती है, उनियन पिज्जा, सब्जी कौन त मचूरियन, सबके सब कोढ़ा-कपार। इ सब टीविया देख-देख के हुआ है। अरे देखावे जो देखाना है, जिए-मरे के खिस्सा। त नय- रोज नया-नया खाना के नाम बतावेगा।
मेरी मां टेलीविजन के इस रवैये से इतनी खफा है कि अगर कोई कहे कि वो टीवी सीरियल बनाता है तो उससे चाय-पीनी पूछने के पहले सीधे पूछे कि- काहे तुम्हारे घर में लड़का-बच्चा नहीं है और तुम जो अभी हिआ आए हो, घरवाली कहां है....किसी के साथ गई है सिनेमा ?
अब धार्मिक सीरियलों के शुरु हो जाने पर कैसे बदला है टीवी को लेकर मेरी मां के विचार, पढ़िए अगली पोस्ट में।।।



एकः
तुमने ही तो पहले कुत्ता, कमीना कहा था। नहीं पहले तूने कहा था कि एक दूंगा कनपटी पर। एक बच्चे की मम्मी दूसरे की मम्मी से शिकायत करने उसके घर पहुंचती है कि आपके लड़के ने मेरे बच्चे को मारा। उपर के संवाद इस दौरान के हैं। दोनों की मांएं कुछ बोले इसके पहले ही दोनों बच्चे आपस में शुरु हो जाते हैं। मां को बोलने का मौका ही नहीं देते। अंत में पीछे से वीओ चलता है..क्या सीख रहे हैं आपके बच्चे।
दोः
एक छह-सात साल की बच्ची टीवी देख रही है इसी बीच उसकी मम्मी उसकी दीदी के बारे में पूछती है कि कहां है वो। बच्ची का जबाब होता है- गई होगी कलमुंही अपने ब्ऑयफ्रेंड के साथ। उसी सुर में वो और भी लगातार बोलती चली जाती है। पीछे से फिर वीओ चलता है- क्या सीख रहे हैं आपके बच्चे ?
तीनः
एक फैमिली के घर कुछ लोग खाने पर आए हैं। उस फैमिली में छह -सात साल का एक लड़का भी है। आमतौर पर जैसा की भारतीय परिवारों में होता है कि आपके जाते ही बच्चे के मां-बाप कहते हैं कि- अंकल या फिर दीदी को सुनाओ तो राइम्स। अगर बच्चा स्मार्ट है तब तो चालू हो जाता है...बा बा ब्लैक सिप या फिर और कुछ लेकिन अगर फूद्दू है तो फिर लेडिज होने पर आप अपना पर्स खोलती हैं और कैडवरी देते हुए कहती है..अच्छा चलो, अब सुनाओ। यहां बच्चा स्मार्ट है। सीधे कहता है- पापा एक गाना सुनाउं। फिर सुनाता है-
ए गनपत, चल दारु ला
ए गनपत, चल दारु ला
आइस थोड़ा कम, सोड़ा ज्यादा मिला
जरा टेबुल-बेबुल साफ कर दे न यार..
टेबुल साफ कर देने की बात पर वो गेस्ट की तरफ हाथ लहराता है। इस बीच उसके मम्मी-पापा तरह-तरह से मुंह बनाते हैं। उन्हें लगने लग जाता है कि उनकी इज्जत मिट्टी में मिल गयी। फिर वीओ चलता है- क्या सीख रहे हैं आपके बच्चे ?
इन तीनों दृश्यों में ये बताने की कोशिश है कि टीवी देखकर आपके बच्चे खराब हो रहे हैं। उनके संस्कार पर बुरा असर पड़ रहा है। टीवी के जिन कार्यक्रमों से बच्चों के संस्कार बिगड़ रहे हैं उसमें सास-बहू टाइप सीरियल, रियलिटी शो के नोक-झोंक और म्यूजिक चैनल के गाने हैं। इसलिए इन सबको छोड़कर जरुरी है कि बच्चे रामायण देखें। एनडीटीवी इमैजिन रामायण को किसी पौराणिक कथा के रुप में नहीं बल्कि एक अच्छी आदत के रुप में देखने-समझने की बात करता है। चैनल की समझदारी बढ़ी है. उसे इस बात का अंदाजा हो गया है कि अब रामायण के वो दर्शक नहीं रहे हैं जो कि रामायण शुरु होने पर टीवी के आगे अगरबत्ती जलाते थे और अरुण गोविल के आगे मथ्था टेकते थे।
रामायण और दूसरी पौराणिक, धार्मिक कथाएं जिस पर कि अपनी-अपनी ऑयडियोलॉजी के आधार पर बहसें होतीं है और स्थापित मान्यताओं पर संदेह किया जाता है। इसलिए इसे लेकर अब एक सर्वमान्य धारणा नहीं रह गयी। अब यह विवाद और उन्माद का विषय हो गया है। इन सबके बावजूद इन सारी धार्मिक कथाओं को संस्कार और बच्चों के लिए आदर्श के रुप में स्थापित करने की एक बार फिर फिर से कोशिशें की जा रही है। अब तक ये कोशिशें परिवार के लोग किया करते रहे लेकिन अब इसमें टेलीविजन भी शामिल है, बाजार भी शामिल है, बड़ी पूंजी भी शामिल है। इसलिए बौद्धिक बहसों के बीच अगर ये कथाएं अपना व्यावसायिक रुप ले रही हैं तो ये मानकर चलिए कि चाहे कोई भी वाद आ जाए और बाजार का कोई भी स्वरुप हो ये कथाएं अपने समय अनुसार खपने लायक बन जाएंगे। इसे आप इन कथाओं की ताकत कहिए या फिर इंसान की उपयोगितावादी दृष्टि लेकिन रामायण, महाभारत और इस तरह के धार्मिक कथाओं की मार्केटिंग और खपत हमेशा रहेगी। अब तक का अनुभव तो यही रहा है।

