वो खून से तर-बतर था। उस बंदे के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी। पुलिस थाने में जब कांस्टेबल ने उससे पूछा कि तुम क्या चाहते हो। हम तो जिसे तुमलोगों ने मारा है उसे बंद करने जा रहे है. बंदा सिसक रहा था, डरा और घबराया हुआ था. धीरे से बोला, हम कुछ नहीं चाहते हैं. सर हम समझौता करना चाहते हैं. आप मेरा इलाज करा दीजिए,बस. समझौते के लिए आए लोगों ने कहा कि- जब इलाज ही कराना चाहते हो तो यहां क्यों बैठे हो, समझौते कर अभी तेरा इलाज करा देते हैं।
यह घटना है दिल्ली विश्वविद्यालय के ग्वायर हाल हॉस्टल में कल रात हुई मारपीट और उसके बाद पास के थाने मौरिसनगर की.
हुआ यूं कि कॉमन रूम में कुछ लोग आइपीएल मैच देख रहे थे। कुछ लोग आगे की कुर्सी पर खुलेआम पी रहे थे और मैच देख रहे थे। पीछे बैठा एक बंदा ईश्वर भी था। ईश्वर पहले इस हॉस्टल का रेसीडेंट रह चुका है और फिलहाल गेस्ट स्टेटस पर यहां टिका हुआ है. पढ़ने में होशियार वो चाहता तो डीयू से आगे रिसर्च के लिए रुक सकता था लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी, इसलिए हरियाणा के एक स्कूल में नौकरी लग जाने के बाद वहां चला गया।..और अब दिल्ली में आकर पीएच.डी. में रजिस्ट्रेशन की कोशिशें कर रहा है। तब तो मैं हॉस्टल में नहीं रहा, जब ईश्वर यहां का रेसीडेंट था लेकिन लोग बता रहे थे कि आजतक उसकी किसी ने आवाज तक नहीं सुनी। खैर,
जिस बंदे ने उसके नाक फोड़ दिए, उसके नाक से भी खून निकले और वो भी अपने को विकटिम बता रहा था। उसने पुलिस के सामने बयान दिया कि ईश्वर टीटी की टेबल पर बैठा था और मैंने उसे बस इतना कहा कि- स्साला, तुम्हें पता है ये टेबुल मंहगी आती है, चल नीचे उतर कर बैठ जा. इतने में ही उसने मुझे पंच मार दिया और बाद में जो कुछ भी हुआ, आप सब जानते हैं।
ईश्वर ने उसके इस बयान को सुधारते हुए कहा कि नहीं- इसके कहने पर मैं उतरकर कुर्सी पर बैठ गया था लेकिन उसके बाद भी ये मुझे गालियां दिए जा रहा था। मां-बहन की गालियां और मैं सुनता जा रहा था और अंत में मुझे तेज गुस्सा और मैंने उसे एक हाथ दे मारा। बाद में इसने मिलकर बहुत मारा। ईश्वर दिल्ली में रहकर भी गाली सुनने का अभ्यस्त नहीं रहा है.ये बात उसकी सजा के लिए काफी है।
घटना के समय तो लोगों ने बीच-बचाव की कोशिश की लेकिन जब मामला नहीं बना तो बात पुलिस स्टेशन तक पहुंच गयी और जब पुलिस स्टेशन तक पहुंच गयी तो देखिए वहां का नजारा।
पहले दोनों को मेडिकल चेकअप के लिए हिन्दूराव हॉस्पीटल में ले जाया गया। वहां से पुलिस रिपोर्ट और उन दोनों को साथ में लेकर आयी। रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि नहीं हुई कि जो बंदा दो घंटे पहले खुलेआम कॉमन रूम में बैठकर पी रहा था, उसने अल्कोहल ले रखी थी। ये अलग बात है कि बात करने के क्रम में उसके मुंह से अब भी शराब की गंध आ रही थी औऱ बैठी पुलिस को कोई भी अजूबा नहीं लग रहा था.
रिपोर्ट लेकर बैठी पुलिस दोनों बंदे,गवाह,हॉस्टल ऑथिरिटी और हमलोग उस पीछे वाले कमरे थे। इस बात के लिए माहौल बनाया जा रहा था कि समझौता हो जाए। ईश्वर डरकर समझौते के लिए पहले से ही तैयार बैठा था। लेकिन दूसरा बंदा सुकांत वत्स इस बात के लिए तैयार ही नहीं था। तब थाने के मक्खन सिंह ने आवाज लगायी- जा भाई,रस्सी ले आ। अरेस्ट पेपर तैयार किए जाने लगे। सुकांत की तरफ से समझौते के लिए आए लोग मक्खन सिंह को समझाने में लग गए। लेकिन मक्खन सिंह का चिल्लाना जारी था. इधर सुकांत इस बात की रट लगाए जा रहा था कि नहीं हमें बंद ही होना है।
थोड़ी देर बाद दो प्रभावी लोग कमरे में दाखिल होते हैं। लोगों ने बताया कि उनमें से एक पेशे से वकील है. आते ही मक्खन सिंह की ओर मुखातिब हुआ और कहा- क्या हो गया भाई, यही क्या दोस्ती-यारी में झगड़ा। मक्खन सिंह का गुस्सा अचानक से गायब हो गया, हां में हां मिलाते हुए कहा, हां जी बस,बस। वो बंदा मक्खन सिंह की कुर्सी के पीछे खड़ा हो गया और कई बार मक्खन सिंह के कंधे पर हाथ रखते हुए बात करने लगा. माहौल को हल्का करने की कोशिशें करने लगा,ताकि लगे कि कुछ हुआ ही नहीं है, बस दोस्ती-यारी का झगड़ा है. इसी क्रम में पास खड़े कांन्सटेबल को कहा- बाकी लोगों को कहिए बाहर जाए, बेकार में भीड़ लगाए से क्या फायदा. एक-दो लोग जो घटना के समय थे, रह जाएं। कांस्टेबल हरकत में आए और हमलोगों को थोड़ा पुश करते हुए, इतना ही पुश किया कि लगे कि हमलोग भेड़-बकरी हैं और कहा- निकलिए आपलोग यहां से। हमने कहा, आराम से बात कीजिए, आप ऐसे कैसे हमसे बात कर सकते हैं। उनका सीधा जबाब था- के कर लेगा। धीरे-धीरे हम सारे लोग कमरे से बाहर आ गए। कांस्टेबल का मन इतने में भी नहीं भरा था, वो हमें थाने से बाहर निकालकर ही दम मार पाए।
करीब बीस मिनट तक पुलिस के लोग हमलोगों को बातों में उलझाए रखा, अपनी शेखी बघारते रहे। औऱ ये भी बताते रहे कि ये दिल्ली है,भई, अगर यही मामला हरियाणा थाने में होता, तब पता चलता। हमें बाहर निकालनेवाली ये पुलिस हमसे इतनी औपचारिक हो गयी कि अपने दोस्तों-यारों की बात करने लग गयी।
बीस-पच्चीस मिनट के बाद पुलिस ने घोषणा कि- चलो भाई, चलो सब अपने-अपने ठिकाने, एक बज गए। जाओ जाकर सो जाओ, मामला निबट गया है।
वाकई में समझौता हो गया था। दोनों बाहर निकल रहे थे। और ईश्वर पुलिस के सामने मिली धमकी कि-आगे कुछ किया तो देख लिये, लिए भारी कदमों से बाहर निकल रहा था.
लौटेने पर देखा कि ह़ॉस्टल के बाहर वो बंदा जो कि अंदर बंद होने की इच्छा रख रहा था, प्रोवोस्ट से सीधे-सीधे शब्दों में कह रहा था- सर हमें न्याय नहीं मिला है, मैं आगे तक देख लूंगा।...
वाकई समझौते की यह रात थी जिसमें दिल्ली पुलिस को एक बार फिर सफलता मिली।
तीन-चार मुलाकातों में कनकलता हमलोगों से यही कहती रही कि- मकान-मालिक, उसके दोनों बेटों और बहुओं ने जो गालियां हमें दी है, मैं आपको बता नहीं सकती। सचमुच में इन गालियों को हमारे सामने उसने नहीं रखा। इसके लिए उसने कीवर्ड खोज निकाला-अपशब्द कहे। हम अपनी तरफ से अंदाजा लगा रहे थे कि इनलोगों को वो लिंग आधारित, बाप-दादाओं को लेकर और उसकी जाति को लेकर गालियां दी होगी।
संवेदनशीलता के स्तर पर यह सुनकर कि बहुत ही अश्लील शब्द कहे होंगे, इस हम समझ सकते हैं, जरुरी नहीं कि इसे एक सभ्य समाज में दोहराया जाए, हम चुप लगा जाते हैं। हम भी अंदाजा लगाकर चुप मार गए। लेकिन बात जब कानूनी मसले के तौर पर आ जाती है तो ये जानना जरुरी हो जाता है कि- ठीक-ठीक उनलोगों ने क्या गालियां दीं। अपूर्वानंद सर ने जब उसे ये बात समझायी कि जब आप कहेंगीं कि उसने मुझे बहुत गंदी-गंदी गालियां दी, बहुत ही अश्लील शब्द कहें, तो इसका सीधा अर्थ लगाया जाएगा कि आपको किसी भी तरह की गाली नहीं दी गयी। इसलिए जब मैं उससे और उसकी और उसके भाई-बहनों की बातों को सुनकर हादसानामा लिख रहा था तो उसे पहली बार वो सारी गालियां बतानी पड़ गयी।
वो सारी बातें बताती जाती लेकिन जब उनलोगों द्वारा बोले गए शब्दों को बताने की बारी आती जिसे कि उद्धरण चिन्हों के भीतर लिखना होता, तब वो कहती, लाइए लिख देती हूं। फिर सबकुछ कागज पर लिख देती। टाइप करते समय भी जब मैंने कहा कि देखो, तुमने अपनी बहुत सारी बातें तो कागज पर लिख दी लेकिन मुझे देखकर टाइप करने की आदत बिल्कुल भी नहीं है। ऐसा करो, तुम धीरे-धीरे बोलती जाओ और मैं टाइप भी करता जाउंगा और जहां जरुरत हुई, एडीट भी करता जाउंगा। उस वक्त भी वो बोलती जाती और जैसे ही गालियां आती, कागज हमें पकड़ा देती। मैं गालियों को देख-देखकर टाइप करता। जितनी भी गालियां उस हादसानामा में शामिल थीं, वो संज्ञा या फिर विशेषण के रुप में प्रयोग नहीं किए गए थे। उन गालियों से एक क्रियात्मक अर्थ का बोध होता था। वो गालियां मकान-मालिक और उनके बेटों के हवशी चरित्र को बयान करते हैं। उन गालियों में इन लड़कियों से जो बदला लेने की भावना है वो मार-पीटकर नहीं है। मैं बीच-बीच में पूछता भी कि- इतनी गंदी-गंदी गालियां दी उनलोगों ने। सवाल आपके मन में भी उठ सकते हैं कि तथाकथित ये सभ्य लोग जिनमें उनका एक लड़का स्कूल टीचर भी है, ऐसी गालियां कैसे दे सकता है? कनकलता बड़े ही स्वाभाविक ढंग से कहती- ये लोग लड़ाई के समय अपने बेटों और बहुओं को ऐसी ही गालियां देते हैं। औऱ वो भी बहुओं के सामने। कई बार मैं खुद अपनी कानों से सुन चुकी हूं।..तो क्या ये समझा जाए कि गालियां देते समय संबंधों को लेकर कोई एतराज नहीं होता और इस स्तर पर बहू होने के वावजूद भी लड़के की पत्नियां कनकलता से कम बड़ी दुश्मन नहीं हो जाती। ये चीजे उस पुरुष प्रैक्टिस में है इसलिए इसे आप स्त्री विशेष के बजाए स्त्री-समाज के स्तर पर देख सकते हैं।
मैंने गौर किया कि जब मैं गालियां को टाइप कर रहा होता, उसका ध्यान मॉनिटर से हटकर कहीं और चला जाता, कुछ और ही सोचने लग जाती। जिन गालियों को हम रोजमर्रा की जिंदगी में अभिव्यक्ति की शैली मानकर धडल्ले से इस्तेमाल करते हैं, उससे गुजरना एक लड़की के लिए कितना असह्य हो जाता है, ये सब मुझे पहली बार एहसास हो रहा था।
जब बी मेट में गीत यानि करीना कपूर को यानि एक स्त्री को जब साजिद गुस्सा निकालने और मन हल्का करने के लिए गाली बकना सीखाता है तो पहली मर्तबा उसे वैसा करने में कितना कष्ट होता है, प्रोड्यूसर ने दिखाया है। लेकिन वही गीत जब बोल्ड होकर, तेरी मां की बोलती है तो हम दर्शक ताली बजाने लग जाते हैं। हम खुश होते हैं कि देख पुरुष, नहले पे दहला। तो क्या हम गीत के बोल्ड होने और गाली बकने पर खुश होते हैं या फिर महज गाली बकने की अदा पर फिदा होते हैं।
स्त्रियों की हिचक तोड़ने, उसके भीतर के भय को खत्म करने के लिए ये गालियां और उसके बकने का अभ्यास,हो सकता है स्त्री के बोल्ड होने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने के प्रस्थान बिन्दु हो सकते हैं। लेकिन जो स्त्री,कोई एक्ट्रेस अपने अधिकारों के लिए गाली के अलावे कोई और प्रस्थान बिन्दु तय करना चाहती है तो उसका विकल्प क्या है और क्या उसके इस पहल पर दर्शक उतनी ही तालियां बजाएंगे। हो सकता है कि उसके उस पहल को भी लोग अदा मानकर तालियां पीटने लग जाएं। क्योंकि जिनकी मानसिकता का विकास सिर्फ दामिनी और गदर जैसी फिल्मों को देखकर हुआ है, उनके लिए ये स्वाभाविक भी है। लेकिन बाकी का क्या?
कनकलता औऱ उसकी छोटी बहन गीत नहीं बनना चाहती क्योंकि उसने प्रस्थान बिन्दु के तौर पर गाली नहीं चुना है तो क्या वो बोल्ड भी नहीं हो सकती। प्रोड्यूसर का जबाब तो साफ होगा- बिल्कुल नहीं। आपकी क्या राय है।
|
|
संवेदनशीलता के स्तर पर यह सुनकर कि बहुत ही अश्लील शब्द कहे होंगे, इस हम समझ सकते हैं, जरुरी नहीं कि इसे एक सभ्य समाज में दोहराया जाए, हम चुप लगा जाते हैं। हम भी अंदाजा लगाकर चुप मार गए। लेकिन बात जब कानूनी मसले के तौर पर आ जाती है तो ये जानना जरुरी हो जाता है कि- ठीक-ठीक उनलोगों ने क्या गालियां दीं। अपूर्वानंद सर ने जब उसे ये बात समझायी कि जब आप कहेंगीं कि उसने मुझे बहुत गंदी-गंदी गालियां दी, बहुत ही अश्लील शब्द कहें, तो इसका सीधा अर्थ लगाया जाएगा कि आपको किसी भी तरह की गाली नहीं दी गयी। इसलिए जब मैं उससे और उसकी और उसके भाई-बहनों की बातों को सुनकर हादसानामा लिख रहा था तो उसे पहली बार वो सारी गालियां बतानी पड़ गयी।
वो सारी बातें बताती जाती लेकिन जब उनलोगों द्वारा बोले गए शब्दों को बताने की बारी आती जिसे कि उद्धरण चिन्हों के भीतर लिखना होता, तब वो कहती, लाइए लिख देती हूं। फिर सबकुछ कागज पर लिख देती। टाइप करते समय भी जब मैंने कहा कि देखो, तुमने अपनी बहुत सारी बातें तो कागज पर लिख दी लेकिन मुझे देखकर टाइप करने की आदत बिल्कुल भी नहीं है। ऐसा करो, तुम धीरे-धीरे बोलती जाओ और मैं टाइप भी करता जाउंगा और जहां जरुरत हुई, एडीट भी करता जाउंगा। उस वक्त भी वो बोलती जाती और जैसे ही गालियां आती, कागज हमें पकड़ा देती। मैं गालियों को देख-देखकर टाइप करता। जितनी भी गालियां उस हादसानामा में शामिल थीं, वो संज्ञा या फिर विशेषण के रुप में प्रयोग नहीं किए गए थे। उन गालियों से एक क्रियात्मक अर्थ का बोध होता था। वो गालियां मकान-मालिक और उनके बेटों के हवशी चरित्र को बयान करते हैं। उन गालियों में इन लड़कियों से जो बदला लेने की भावना है वो मार-पीटकर नहीं है। मैं बीच-बीच में पूछता भी कि- इतनी गंदी-गंदी गालियां दी उनलोगों ने। सवाल आपके मन में भी उठ सकते हैं कि तथाकथित ये सभ्य लोग जिनमें उनका एक लड़का स्कूल टीचर भी है, ऐसी गालियां कैसे दे सकता है? कनकलता बड़े ही स्वाभाविक ढंग से कहती- ये लोग लड़ाई के समय अपने बेटों और बहुओं को ऐसी ही गालियां देते हैं। औऱ वो भी बहुओं के सामने। कई बार मैं खुद अपनी कानों से सुन चुकी हूं।..तो क्या ये समझा जाए कि गालियां देते समय संबंधों को लेकर कोई एतराज नहीं होता और इस स्तर पर बहू होने के वावजूद भी लड़के की पत्नियां कनकलता से कम बड़ी दुश्मन नहीं हो जाती। ये चीजे उस पुरुष प्रैक्टिस में है इसलिए इसे आप स्त्री विशेष के बजाए स्त्री-समाज के स्तर पर देख सकते हैं।
मैंने गौर किया कि जब मैं गालियां को टाइप कर रहा होता, उसका ध्यान मॉनिटर से हटकर कहीं और चला जाता, कुछ और ही सोचने लग जाती। जिन गालियों को हम रोजमर्रा की जिंदगी में अभिव्यक्ति की शैली मानकर धडल्ले से इस्तेमाल करते हैं, उससे गुजरना एक लड़की के लिए कितना असह्य हो जाता है, ये सब मुझे पहली बार एहसास हो रहा था।
जब बी मेट में गीत यानि करीना कपूर को यानि एक स्त्री को जब साजिद गुस्सा निकालने और मन हल्का करने के लिए गाली बकना सीखाता है तो पहली मर्तबा उसे वैसा करने में कितना कष्ट होता है, प्रोड्यूसर ने दिखाया है। लेकिन वही गीत जब बोल्ड होकर, तेरी मां की बोलती है तो हम दर्शक ताली बजाने लग जाते हैं। हम खुश होते हैं कि देख पुरुष, नहले पे दहला। तो क्या हम गीत के बोल्ड होने और गाली बकने पर खुश होते हैं या फिर महज गाली बकने की अदा पर फिदा होते हैं।
स्त्रियों की हिचक तोड़ने, उसके भीतर के भय को खत्म करने के लिए ये गालियां और उसके बकने का अभ्यास,हो सकता है स्त्री के बोल्ड होने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने के प्रस्थान बिन्दु हो सकते हैं। लेकिन जो स्त्री,कोई एक्ट्रेस अपने अधिकारों के लिए गाली के अलावे कोई और प्रस्थान बिन्दु तय करना चाहती है तो उसका विकल्प क्या है और क्या उसके इस पहल पर दर्शक उतनी ही तालियां बजाएंगे। हो सकता है कि उसके उस पहल को भी लोग अदा मानकर तालियां पीटने लग जाएं। क्योंकि जिनकी मानसिकता का विकास सिर्फ दामिनी और गदर जैसी फिल्मों को देखकर हुआ है, उनके लिए ये स्वाभाविक भी है। लेकिन बाकी का क्या?
कनकलता औऱ उसकी छोटी बहन गीत नहीं बनना चाहती क्योंकि उसने प्रस्थान बिन्दु के तौर पर गाली नहीं चुना है तो क्या वो बोल्ड भी नहीं हो सकती। प्रोड्यूसर का जबाब तो साफ होगा- बिल्कुल नहीं। आपकी क्या राय है।
कल जब एक प्रोफेसर ने हमसे सवाल किया कि- क्या सचमुच में अविनाश और यशवंत इतने बड़े फिगर हैं कि आपलोग दुनियाभर के मुद्दों को छोड़कर उनके पीछे हो लेते हैं, तो एकबारगी तो हमें भी लगा कि क्या ये दोनों चैनलों के लिए क्रिकेट, सेक्स और सिनेमा की तरह ही अटेंशन एलिमेंट हैं।..और हम जैसे लोग पीछे-पीछे तुरही बजाते हुए इनपर पैकेज बनाना शुरु कर देते हैं या फिर ब्लॉग में इसेक अलावे भी कुछ है जो हमारे प्रैक्टिस में है और जिसके बारे में मेरी पिछली पोस्ट पर टिप्पणियां आयीं कि आप अपने हिसाब से लिखते जाइए, पाठक वर्ग तैयार कीजिए, हम तो चैनलों से भी दूर हैं और अविनाश और यशवंत के पचड़ों से भी।
प्रोफेसर साहब ने बड़े ही हल्के किन्तु रोचक ढंग से हमारे सामने एक सवाल रख दिया कि- हो सकता है ये दोनों लोग आपलोगों के हिसाब से बड़े फिगर हों भी तो आप उन कुछ घटनाओं और पोस्टों की तरफ क्यों नहीं जाते, उन्हें क्यों नहीं खोजते, जिसकी वजह से आप ऐसा महसूस करते हैं या फिर उनका नाम आते ही आपलोग उनके पीछे हो लेते हैं।
अगर ऐतिहासिकता और पुरानेपन के लिहाज से बात करें तो एक बात तो बिल्कुल साफ है कि इन दोनों के साथ ये तथ्य काम नहीं करता कि ये सबसे पुराने हैं और इसलिए लोगों का ध्यान इनके उपर चला जाता है। इनसे पुराने,सम्मानित और कई दूसरे ब्लॉगर हैं जो कि लगातार लिखते आ रहे हैं। इसलिए इस पर तो आकर बात बनती ही नहीं है। फिर अटेंशन एलिमेंट क्या है?
यशवंत की भाषा, जिसे कि भाषाई उपद्रवता भी आप कह सकते हैं क्योंकि उनकी पोस्ट को पढ़ते हुए आपको एक अलग किस्म का एहसास होगा कि- अच्छा है बंदा लिखकर ही अपनी बात कह रहा है, नहीं तो साक्षात होता तो मामला लप्पड़-थप्पड़ और कॉलर पकड़-पकड़ी तक आ जाती। वैसे भी गाली-गलौज के बाद का स्वाभाविक विकासक्रम यही है। इसके साथ ही लोगों की कमीज उतारने की बेचैनी और मनोहरश्याम जोशी के पात्र की तरह सू-सू करते हुए धार पर होड़ लगाने की प्रतियोगिता कि- किसकी धार कितनी देर तक और लम्बी जाती है, एक अटेंशन बनाती है। जो बंदा ब्लॉग और पत्रकारिता की दुनिया में कच्चा-कच्चा है, एक घड़ी के लिए मोहित हो जाता है कि इसे कहते है हिम्मत और लिखते हुए कुछ कर गुजरने की ताकत। यशवंत के साथ-साथ ब्लॉग के बाकी साथियों की मानसिकता भी इसी किस्म की रही और भड़ास अटेंशन बनाए रखा। या यों भी कह लें कि इसी किस्म की मानसिकता के लोग यशवंत के साथ हुए और अटेंशन बनाए रखा. इसके अलावा मीडिया जगत में हुए हलचलों के लिए यहां एक अलग से स्पेस रहा और लोगों का ध्यान इसकी ओर गया। बड़ी खबर और ब्रकिंग न्यूज के नाम पर जो चैनलों में बासीपन आ गया है, इसे पढ़ते हुए हुए थोड़ी देर के लिए तो राहत जरुर मिल जाती कि नहीं कुछ ताजा माल भी तैयार हो रहा है। और इससे भी मजे कि बात कि मीडिया, खबरों के नाम पर जिस तरह से चटखारे लेती है, पहली बार भड़ास और यशवंत ने खबर बनानेवालों की स्थितियों पर चटखारे लेने लगे। तबादले की भाषा आप देखिए, आपको अंदाजा लग जाएगा कि ये सिर्फ खबर भर नहीं है, पूरा का पूरा मजे का मसाला है।.. तो क्या ये कहा जा सकता है कि यशवंत और भड़ास के ये अटेंशन एलिमेंट रहे और मन हल्का करने के चक्कर में सबकुछ जिसे देखकर आज चोखेरबालियों सहित कईयों को एक सड़न का एहसास हो रहा है, हमारे सामने पसरता गया।
इधर अविनाश के साथ कौन-सा अटेंशन एलिमेंट काम कर रहा है? एक बार दिल्ली से बहुत दूर के ब्लॉगर साथी दिल्ली आए तो हमसे भी मिलने चले आए। वो अविनाश के नाम पर पहले से ही बहुत खीजे हुए थे, हमसे मिलने के बाद जो उन्होंने अपनी बात रखी, उससे और भी साफ हो गया कि वो उनसे किताना खुन्नस खाए बैठे हैं। उन दिनों मैं मोहल्ला पर लिखनेवालों की टीम से अपना नाम हटाए जाने पर अविनाश भाई बोल-बोलकर लगातार पोस्ट लिख रहा था और उनको एक सही ब्लॉगर मिल गया था जिससे अपने मन की बात कही जा सकती थी।
ब्लॉग की दुनिया में आने पर मेरे साथ एक बेहतर स्थिति रही है कि मैं यहां संबंधों की गठरी और ऐतिहासिकता का बोझ लेकर यहां नहीं आया. अगर मैं इस बात का दावा करुं कि ब्लॉग लिखने के पहले मैं एक भी व्यक्ति को पहले से पर्सनली नहीं जानता था तो शायद बात झूठी नहीं होगी। कुछ के नाम पहले से सुन रखे थे लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मिलना ब्लॉग लिखने के बाद ही हुआ। खैर, इस बातचीत में साथी ने जो बात कही,उससे लग रहा था किवो अविनाश और मोहल्ला के अटेंशन एलिमेंट की बात कर रहे हैं।
उनका कहना था कि- अविनाश जब मोहल्ला लेकर आए तो काम्युनिस्टों की पूरी टीम लेकर आए। बातचीत से लग रहा था कि शायद वो इसलिए भी अविनाश के विरोधी हैं। उसके बाद तो पूछिए मत। मैंने पूछा भी नहीं। काम्युनिस्टों को लेकर आए मतलब क्या, वो गरीब किसान, मजदूर और समाज के दूसरे शोषितों की बात करने लग गए। कला और विचारधारा के नाम पर एक खास तरह के ग्लोबल पैटर्न को फॉलो करने लग गए। यानि शुरुआती दौर में ब्ल़ॉग पर जो लोग लिख रहे थे कि किसके घर में किस दाल की छौंक लगी है, उससे अलग होते गए। लेकिन मुझे तो ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता। अगर ब्लॉग को धीरे-धीरे एक पर्सनल, वेरी-वेरी पर्सनल माध्यम बनाते जाने, जैसा कि मेरे एक टीचर ने मुझसे कहा, का मामला है तो ये आरोप अविनाश भाई पर भी उतना ही जायज ठहरता है और अगर कल को कोई इस बात पर बहस छेडे कि किस-किसने ब्लॉग को पर्सनल बनाया है तो उसमें इनका भी नाम होगा। हम तो इससे उनको बरी नहीं कर सकते। जाहिर है साथी,अविनाश भाई के संदर्भ में जिस काम्युनिस्ट होने की बात कर रहे थे उसमें कहीं से भी उसके साकारात्मक पक्ष शामिल नहीं थे। यानि काम्युनिज्म यहां थे ही नहीं। इसलिए अटेंशन का ये एलिमेंट यही खारिज हो जाता है और अभी तक काम्युनिज्म, दक्षिण पंथ या फिर कोई भी विचारधारा अटेंशन का एलिमेंट नहीं बन पायी है। चोखेरबाली को आप विचारधारा का ब्लॉग नहीं कह सकते क्योंकि वो प्रैक्टिस पर आधारित है न कि विचारधारा पर। ये अच्छा है या खराब बता नहीं सकता। लेकिन अविनाश भाई का एटेंशन एलिमेंट कॉम्युनिज्म नहीं हैं, ये तो साफ है।..
तो फिर क्या है अविनाश और मोहल्ला का अटेंशन एलिमेंट, पढ़िए हमारी अगली पोस्ट में।
|
|
प्रोफेसर साहब ने बड़े ही हल्के किन्तु रोचक ढंग से हमारे सामने एक सवाल रख दिया कि- हो सकता है ये दोनों लोग आपलोगों के हिसाब से बड़े फिगर हों भी तो आप उन कुछ घटनाओं और पोस्टों की तरफ क्यों नहीं जाते, उन्हें क्यों नहीं खोजते, जिसकी वजह से आप ऐसा महसूस करते हैं या फिर उनका नाम आते ही आपलोग उनके पीछे हो लेते हैं।
अगर ऐतिहासिकता और पुरानेपन के लिहाज से बात करें तो एक बात तो बिल्कुल साफ है कि इन दोनों के साथ ये तथ्य काम नहीं करता कि ये सबसे पुराने हैं और इसलिए लोगों का ध्यान इनके उपर चला जाता है। इनसे पुराने,सम्मानित और कई दूसरे ब्लॉगर हैं जो कि लगातार लिखते आ रहे हैं। इसलिए इस पर तो आकर बात बनती ही नहीं है। फिर अटेंशन एलिमेंट क्या है?
यशवंत की भाषा, जिसे कि भाषाई उपद्रवता भी आप कह सकते हैं क्योंकि उनकी पोस्ट को पढ़ते हुए आपको एक अलग किस्म का एहसास होगा कि- अच्छा है बंदा लिखकर ही अपनी बात कह रहा है, नहीं तो साक्षात होता तो मामला लप्पड़-थप्पड़ और कॉलर पकड़-पकड़ी तक आ जाती। वैसे भी गाली-गलौज के बाद का स्वाभाविक विकासक्रम यही है। इसके साथ ही लोगों की कमीज उतारने की बेचैनी और मनोहरश्याम जोशी के पात्र की तरह सू-सू करते हुए धार पर होड़ लगाने की प्रतियोगिता कि- किसकी धार कितनी देर तक और लम्बी जाती है, एक अटेंशन बनाती है। जो बंदा ब्लॉग और पत्रकारिता की दुनिया में कच्चा-कच्चा है, एक घड़ी के लिए मोहित हो जाता है कि इसे कहते है हिम्मत और लिखते हुए कुछ कर गुजरने की ताकत। यशवंत के साथ-साथ ब्लॉग के बाकी साथियों की मानसिकता भी इसी किस्म की रही और भड़ास अटेंशन बनाए रखा। या यों भी कह लें कि इसी किस्म की मानसिकता के लोग यशवंत के साथ हुए और अटेंशन बनाए रखा. इसके अलावा मीडिया जगत में हुए हलचलों के लिए यहां एक अलग से स्पेस रहा और लोगों का ध्यान इसकी ओर गया। बड़ी खबर और ब्रकिंग न्यूज के नाम पर जो चैनलों में बासीपन आ गया है, इसे पढ़ते हुए हुए थोड़ी देर के लिए तो राहत जरुर मिल जाती कि नहीं कुछ ताजा माल भी तैयार हो रहा है। और इससे भी मजे कि बात कि मीडिया, खबरों के नाम पर जिस तरह से चटखारे लेती है, पहली बार भड़ास और यशवंत ने खबर बनानेवालों की स्थितियों पर चटखारे लेने लगे। तबादले की भाषा आप देखिए, आपको अंदाजा लग जाएगा कि ये सिर्फ खबर भर नहीं है, पूरा का पूरा मजे का मसाला है।.. तो क्या ये कहा जा सकता है कि यशवंत और भड़ास के ये अटेंशन एलिमेंट रहे और मन हल्का करने के चक्कर में सबकुछ जिसे देखकर आज चोखेरबालियों सहित कईयों को एक सड़न का एहसास हो रहा है, हमारे सामने पसरता गया।
इधर अविनाश के साथ कौन-सा अटेंशन एलिमेंट काम कर रहा है? एक बार दिल्ली से बहुत दूर के ब्लॉगर साथी दिल्ली आए तो हमसे भी मिलने चले आए। वो अविनाश के नाम पर पहले से ही बहुत खीजे हुए थे, हमसे मिलने के बाद जो उन्होंने अपनी बात रखी, उससे और भी साफ हो गया कि वो उनसे किताना खुन्नस खाए बैठे हैं। उन दिनों मैं मोहल्ला पर लिखनेवालों की टीम से अपना नाम हटाए जाने पर अविनाश भाई बोल-बोलकर लगातार पोस्ट लिख रहा था और उनको एक सही ब्लॉगर मिल गया था जिससे अपने मन की बात कही जा सकती थी।
ब्लॉग की दुनिया में आने पर मेरे साथ एक बेहतर स्थिति रही है कि मैं यहां संबंधों की गठरी और ऐतिहासिकता का बोझ लेकर यहां नहीं आया. अगर मैं इस बात का दावा करुं कि ब्लॉग लिखने के पहले मैं एक भी व्यक्ति को पहले से पर्सनली नहीं जानता था तो शायद बात झूठी नहीं होगी। कुछ के नाम पहले से सुन रखे थे लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मिलना ब्लॉग लिखने के बाद ही हुआ। खैर, इस बातचीत में साथी ने जो बात कही,उससे लग रहा था किवो अविनाश और मोहल्ला के अटेंशन एलिमेंट की बात कर रहे हैं।
उनका कहना था कि- अविनाश जब मोहल्ला लेकर आए तो काम्युनिस्टों की पूरी टीम लेकर आए। बातचीत से लग रहा था कि शायद वो इसलिए भी अविनाश के विरोधी हैं। उसके बाद तो पूछिए मत। मैंने पूछा भी नहीं। काम्युनिस्टों को लेकर आए मतलब क्या, वो गरीब किसान, मजदूर और समाज के दूसरे शोषितों की बात करने लग गए। कला और विचारधारा के नाम पर एक खास तरह के ग्लोबल पैटर्न को फॉलो करने लग गए। यानि शुरुआती दौर में ब्ल़ॉग पर जो लोग लिख रहे थे कि किसके घर में किस दाल की छौंक लगी है, उससे अलग होते गए। लेकिन मुझे तो ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता। अगर ब्लॉग को धीरे-धीरे एक पर्सनल, वेरी-वेरी पर्सनल माध्यम बनाते जाने, जैसा कि मेरे एक टीचर ने मुझसे कहा, का मामला है तो ये आरोप अविनाश भाई पर भी उतना ही जायज ठहरता है और अगर कल को कोई इस बात पर बहस छेडे कि किस-किसने ब्लॉग को पर्सनल बनाया है तो उसमें इनका भी नाम होगा। हम तो इससे उनको बरी नहीं कर सकते। जाहिर है साथी,अविनाश भाई के संदर्भ में जिस काम्युनिस्ट होने की बात कर रहे थे उसमें कहीं से भी उसके साकारात्मक पक्ष शामिल नहीं थे। यानि काम्युनिज्म यहां थे ही नहीं। इसलिए अटेंशन का ये एलिमेंट यही खारिज हो जाता है और अभी तक काम्युनिज्म, दक्षिण पंथ या फिर कोई भी विचारधारा अटेंशन का एलिमेंट नहीं बन पायी है। चोखेरबाली को आप विचारधारा का ब्लॉग नहीं कह सकते क्योंकि वो प्रैक्टिस पर आधारित है न कि विचारधारा पर। ये अच्छा है या खराब बता नहीं सकता। लेकिन अविनाश भाई का एटेंशन एलिमेंट कॉम्युनिज्म नहीं हैं, ये तो साफ है।..
तो फिर क्या है अविनाश और मोहल्ला का अटेंशन एलिमेंट, पढ़िए हमारी अगली पोस्ट में।
मेरे एक ब्लॉगर साथी ने कहा कि अविनाश और यशवंत पर कोई भी लिख दे, उसकी पोस्ट हिट हो जाएगी और उसके ब्लॉग को लोग जानने लगेंगे। तो क्या एक तरीका ये है कि जितने भी नौसिखुए ब्लॉगर हैं जिनकी पोस्ट इस अंतर्जाल में खो जाती है, वो लोगों को अपनी ओर ध्यान खींचने के लिए अविनाश, मोहल्ला, भड़ास और यशवंत के उपर लिखें।
हो सकता है हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में यह बात एक फार्मूले की तरह काम आए। वैसे भी इस भीड़-भाड़ वाले इलाके में लोगों की समझ यही बनती है कि जितनी उंची हांक लगाओगे, ग्राहक उतने अधिक आएंगे। ये अलग बात है कि बाद में तुम्हारा माल देखकर बिदक जाएं। लेकिन एक बार अटेंशन तो बनेगा ही। यानि अब तक साहित्य या मीडिया में हम जिस प्रभाव की बात करते रहे हैं वो अब एटेंशन में शिफ्ट हो गया है।चैनल भी ऐसा ही कुछ करते हैं। हो न हो ब्लॉगर की मानसिकता भी इसी को देखकर बनी है। जरुरी नहीं कि सबकी, बहुत थोड़े की ही, लेकिन बनी तो सही है जिसमें मैं भी शामिल हूं।
आप सबको याद होगा कि इंडिया टीवी ने इंडस्ट्री में इन्ट्री कैसे मारी थी। वो भी लोगों पर एकदम से अपना प्रभाव बनाने की फिराक में नहीं थी। वो सिर्फ इतना चाहती थी कि एक बार लोग उनकी तरफ एटेंशन लें।॥और फिर देखिए की लोगों के जेहन में एक नाम बस गया कि इंडिया टीवी बोलकर भी कोई चैनल है। आप उसकी खबरों की गुणवत्ता और कंटेंट पर मत जाइए। लेकिन इतना तो आप भी समझते हैं कि जब भी बात की जाती है कि- अजी अब तो खबरों के नाम पर सांप-संपेरे, भूत-प्रेत और सेक्स दिखाए जाते हैं तो किस चैनल पर अटेंशन बनाकर बात की जाती है। आप देखिए कि कैसे उसने बातों ही बातों में खबर के लिए मुहावरा ही बदल दिया और हम इस्तेमाल करने लग गए। अच्छा- खराब छोड़ दीजिए, लेकिन इस चैनल ने अपना एक अटेंशन तो बनाया ही है लोगों के बीच में। आज वो टीआरपी के खेल में शामिल हैं, तमाम फूहड़पन के बाद भी तो आप कह सकते हैं कि उसने अपना प्रभाव जमा लिया है।
चैनल भी इस बात को समझने लगी है कि अब जो ऑडिएंस की पीढ़ी तैयार हो रही है उसमें फ्लोटेड ऑडिएंस की संख्या ज्यादा है। आप कह सकते हैं कि ऑडिएंस अब रिलॉयवल नहीं रह गए हैं। जहां आपने इधर-उधर किया या फिर आपने नहीं तो किसी और चैनल ने बेहतर तरीके से इधर-उधर कर दिया तो ऑडिएंस आपके चैनल से तुरंत कूदकर कहीं और चली जाएगी। अब ऑडिएंस की वो पीढ़ी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है जो कि सालों से एक ही चैनल पर अपनी पसंद बनाए हुए है। ऐसे में चैनल प्रभाव से ज्यादा अटेंशन पर काम करता है। प्रभाव जिसका कि असर लम्बे समय तक होता है और इसके बदौलत चैनल लंबी पारी खेल सकता है, जबकि अटेंशन का संबंध तात्कालिकता से है। जिस भी चैनल ने अपने यहां तात्कालिता को डाला, ऑडिएंस तुरंत वहां शिफ्ट हो जाएगी। चैनलों के लिए तात्कालिता एक जरुरी और निर्णायक एलीमेंट है।इसलिए आप देखेंगे कि चैनल प्रभाव से ज्यादा एटेंशन पर काम करते हैं। रोज के अटेंशन के लिए रोज अटेंशन एलिमेंट खोजने होंगे। इसलिए खबरों के नाम पर आपको जो कुछ भी हमें नसीब होता है वो स्वाभाविक ही है।
प्रभाव, जिसके लिए होमवर्क करने होते हैं, खबरों के प्रति संजीदा होना होता है, एक-एक खबर पर रिसर्च करना होता है, इनपुट्स डालने होते हैं। अच्छी-खासी मेहनत तरनी पड़ती है। जबकि सच्चाई ये है कि हिन्दी चैनल दूसरे किस्म की मेहनत के अभ्यस्त हो चले हैं। वो एक पैकेज बनाने के लिए फिल्मों की पचास सीडी देख जाएंगे, एफेक्ट्स डालने के लिए कलर, टोन और पूरी म्यूजिक गैलरी घूम आएंगे। मोन्टाज के लिए पूरी शिफ्ट लगा देंगे। ऐसा नहीं है कि चैनल्स मेहनत कम करते हैं, बल्कि पहले से कई गुना ज्यादा करते हैं। नहीं तो खबरों में इतनी रोचकता कहां से आने पाती। लेकिन वो एसेंस आपको नहीं मिलेंगे जिसके अभाव में आप निराश होते हैं। तो आप कह सकते हैं कि चैनल अटेंशन के लिए काम करते हैं, प्रभाव के लिए नहीं, और फिर स्थायी प्रभाव के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। यहां एक झलक आप देख लीजिए हमें की होड़ है, बस दस सेकेंड।
तकनीकी चकमक के साथ-साथ अटेंशन का एक तरीका और भी है। कंटेंट के स्तर पर क्रिकेट, सेक्स, भूत-प्रेत, धर्म और स्टंट तो है ही। ये सारी ऐसी चीजें हैं जिसके लिए कोई हिन्दी चैनल कुछ भी न करे, सिर्फ अंग्रेजी चैनलों से मटीरियल लेकर हिन्दी में अनुवाद भर कर दे तो भी ठीक-ठीक ऑडिएंस जुटा लेगी। और ये हो भी रहा है। ये फिक्स एलीमेंट हैं। जो भी इसे चलाएगा, उस पर लोगों का अटेंशन तो बनेगा ही। बहुत नहीं भी तो और खबरों से ज्यादा ही। जैसे इमैजिन ने यह सोचकर रामायण चलाया कि चाहे कितना भी सामाजिक बदलाव आ जाए, हमेशा एक पीढ़ी रहेगी जो कि रामायण देखेगी ही, कुछ वैसा ही। इस चक्कर में आप देखेंगे कि जिन सैंकड़ों चैनलों के होने के होने पर सैंकड़ों अलग-अलग मुद्दे और खबरें होनी चाहिए, वो सबके सब फिक्स एलीमेंट की तरफ चले गए हैं। क्रिकेट की खबर है तो सब पर वही, क्राइम है तो सब पर वही। थोड़ा बहुत ट्रीटमेंट बदलता है जिसे कि आप अटेंशन एलीमेंट के तौर पर समझते हैं।
तो क्या अविनाश, यशवंत, मोहल्ला और भड़ास चैनल के फिक्स एलीमेंट की तरह हो गए है। क्या ये चैनलों की तरह क्रिकेट, क्राइम और सेक्स एलीमेंट की तरह हैं। इन पर बात करने का मतलब है अपने ब्लॉग को लेकर अटेंशन की मानसिकता में शामिल हो जाना। इन पर कोई भी लिख दे और कैसे भी लिख दे, गलत स्पेलिंग के साथ, अशुद्ध वाक्य के साथ, कमजोर फैक्ट्स के साथ रीडर्स सुधारकर अपनी सुविधानुसार पढ़ लेगी। तो क्या फिर हिन्दी ब्ल़ॉगिंग भी हिन्दी चैनलों की राह पर चल निकला है।
|
|
हो सकता है हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में यह बात एक फार्मूले की तरह काम आए। वैसे भी इस भीड़-भाड़ वाले इलाके में लोगों की समझ यही बनती है कि जितनी उंची हांक लगाओगे, ग्राहक उतने अधिक आएंगे। ये अलग बात है कि बाद में तुम्हारा माल देखकर बिदक जाएं। लेकिन एक बार अटेंशन तो बनेगा ही। यानि अब तक साहित्य या मीडिया में हम जिस प्रभाव की बात करते रहे हैं वो अब एटेंशन में शिफ्ट हो गया है।चैनल भी ऐसा ही कुछ करते हैं। हो न हो ब्लॉगर की मानसिकता भी इसी को देखकर बनी है। जरुरी नहीं कि सबकी, बहुत थोड़े की ही, लेकिन बनी तो सही है जिसमें मैं भी शामिल हूं।
आप सबको याद होगा कि इंडिया टीवी ने इंडस्ट्री में इन्ट्री कैसे मारी थी। वो भी लोगों पर एकदम से अपना प्रभाव बनाने की फिराक में नहीं थी। वो सिर्फ इतना चाहती थी कि एक बार लोग उनकी तरफ एटेंशन लें।॥और फिर देखिए की लोगों के जेहन में एक नाम बस गया कि इंडिया टीवी बोलकर भी कोई चैनल है। आप उसकी खबरों की गुणवत्ता और कंटेंट पर मत जाइए। लेकिन इतना तो आप भी समझते हैं कि जब भी बात की जाती है कि- अजी अब तो खबरों के नाम पर सांप-संपेरे, भूत-प्रेत और सेक्स दिखाए जाते हैं तो किस चैनल पर अटेंशन बनाकर बात की जाती है। आप देखिए कि कैसे उसने बातों ही बातों में खबर के लिए मुहावरा ही बदल दिया और हम इस्तेमाल करने लग गए। अच्छा- खराब छोड़ दीजिए, लेकिन इस चैनल ने अपना एक अटेंशन तो बनाया ही है लोगों के बीच में। आज वो टीआरपी के खेल में शामिल हैं, तमाम फूहड़पन के बाद भी तो आप कह सकते हैं कि उसने अपना प्रभाव जमा लिया है।
चैनल भी इस बात को समझने लगी है कि अब जो ऑडिएंस की पीढ़ी तैयार हो रही है उसमें फ्लोटेड ऑडिएंस की संख्या ज्यादा है। आप कह सकते हैं कि ऑडिएंस अब रिलॉयवल नहीं रह गए हैं। जहां आपने इधर-उधर किया या फिर आपने नहीं तो किसी और चैनल ने बेहतर तरीके से इधर-उधर कर दिया तो ऑडिएंस आपके चैनल से तुरंत कूदकर कहीं और चली जाएगी। अब ऑडिएंस की वो पीढ़ी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है जो कि सालों से एक ही चैनल पर अपनी पसंद बनाए हुए है। ऐसे में चैनल प्रभाव से ज्यादा अटेंशन पर काम करता है। प्रभाव जिसका कि असर लम्बे समय तक होता है और इसके बदौलत चैनल लंबी पारी खेल सकता है, जबकि अटेंशन का संबंध तात्कालिकता से है। जिस भी चैनल ने अपने यहां तात्कालिता को डाला, ऑडिएंस तुरंत वहां शिफ्ट हो जाएगी। चैनलों के लिए तात्कालिता एक जरुरी और निर्णायक एलीमेंट है।इसलिए आप देखेंगे कि चैनल प्रभाव से ज्यादा एटेंशन पर काम करते हैं। रोज के अटेंशन के लिए रोज अटेंशन एलिमेंट खोजने होंगे। इसलिए खबरों के नाम पर आपको जो कुछ भी हमें नसीब होता है वो स्वाभाविक ही है।
प्रभाव, जिसके लिए होमवर्क करने होते हैं, खबरों के प्रति संजीदा होना होता है, एक-एक खबर पर रिसर्च करना होता है, इनपुट्स डालने होते हैं। अच्छी-खासी मेहनत तरनी पड़ती है। जबकि सच्चाई ये है कि हिन्दी चैनल दूसरे किस्म की मेहनत के अभ्यस्त हो चले हैं। वो एक पैकेज बनाने के लिए फिल्मों की पचास सीडी देख जाएंगे, एफेक्ट्स डालने के लिए कलर, टोन और पूरी म्यूजिक गैलरी घूम आएंगे। मोन्टाज के लिए पूरी शिफ्ट लगा देंगे। ऐसा नहीं है कि चैनल्स मेहनत कम करते हैं, बल्कि पहले से कई गुना ज्यादा करते हैं। नहीं तो खबरों में इतनी रोचकता कहां से आने पाती। लेकिन वो एसेंस आपको नहीं मिलेंगे जिसके अभाव में आप निराश होते हैं। तो आप कह सकते हैं कि चैनल अटेंशन के लिए काम करते हैं, प्रभाव के लिए नहीं, और फिर स्थायी प्रभाव के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। यहां एक झलक आप देख लीजिए हमें की होड़ है, बस दस सेकेंड।
तकनीकी चकमक के साथ-साथ अटेंशन का एक तरीका और भी है। कंटेंट के स्तर पर क्रिकेट, सेक्स, भूत-प्रेत, धर्म और स्टंट तो है ही। ये सारी ऐसी चीजें हैं जिसके लिए कोई हिन्दी चैनल कुछ भी न करे, सिर्फ अंग्रेजी चैनलों से मटीरियल लेकर हिन्दी में अनुवाद भर कर दे तो भी ठीक-ठीक ऑडिएंस जुटा लेगी। और ये हो भी रहा है। ये फिक्स एलीमेंट हैं। जो भी इसे चलाएगा, उस पर लोगों का अटेंशन तो बनेगा ही। बहुत नहीं भी तो और खबरों से ज्यादा ही। जैसे इमैजिन ने यह सोचकर रामायण चलाया कि चाहे कितना भी सामाजिक बदलाव आ जाए, हमेशा एक पीढ़ी रहेगी जो कि रामायण देखेगी ही, कुछ वैसा ही। इस चक्कर में आप देखेंगे कि जिन सैंकड़ों चैनलों के होने के होने पर सैंकड़ों अलग-अलग मुद्दे और खबरें होनी चाहिए, वो सबके सब फिक्स एलीमेंट की तरफ चले गए हैं। क्रिकेट की खबर है तो सब पर वही, क्राइम है तो सब पर वही। थोड़ा बहुत ट्रीटमेंट बदलता है जिसे कि आप अटेंशन एलीमेंट के तौर पर समझते हैं।
तो क्या अविनाश, यशवंत, मोहल्ला और भड़ास चैनल के फिक्स एलीमेंट की तरह हो गए है। क्या ये चैनलों की तरह क्रिकेट, क्राइम और सेक्स एलीमेंट की तरह हैं। इन पर बात करने का मतलब है अपने ब्लॉग को लेकर अटेंशन की मानसिकता में शामिल हो जाना। इन पर कोई भी लिख दे और कैसे भी लिख दे, गलत स्पेलिंग के साथ, अशुद्ध वाक्य के साथ, कमजोर फैक्ट्स के साथ रीडर्स सुधारकर अपनी सुविधानुसार पढ़ लेगी। तो क्या फिर हिन्दी ब्ल़ॉगिंग भी हिन्दी चैनलों की राह पर चल निकला है।
आप अगर अपने मां-बाबूजी के पैर छूकर या फिर दोस्तों को हाथ हिलाकर नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन से विदा करना चाहते हैं तो इसके लिए आपको 250 रुपये देने पड़ेगें। हो सकता है इस काम के लिए आपको बहुत जिल्लत भी उठानी पड़े।
कल रात भैया को छोड़ने नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन गया। हम दोनों बहुत थके थे। लेकिन मेरे से ज्यादा खराब स्थिति भैया की थी। उन्हें एक बड़ा-सा जख्म हो गया था। मजबूरन हमें भी साथ जाना पड़ा। स्टेशन पहुंचने पर मैं प्लेटफार्म टिकट के लिए भटका। पुलिस से लेकर कुली तक पूछा तो सभी का एक ही जबाब था कि अब प्लेटफार्म टिकटें नहीं मिलती। मैं सबसे एक ही सवाल कर रहा था कि अगर टिकटें नहीं मिलती तो कोई प्लेटफॉर्म तक जाएगा कैसे। कोई तो बढ़ गया, किसी ने कहा-हमसे नहीं लालूजी से पूछिए तो किसी ने कहा, आप जाइए ही मत, जिनको यात्रा करनी है उन्हें जाने दीजिए। ऐसे कैसे हो सकता था कि मैं भइया को बिना ट्रेन में बिठाए लौट जाता।
इसी बीच मैंने एक अजीब नजारा देखा। एक पुलिसवाला जेनरल क्लास की टिकट काउंटर के पीछे किसी को पैसे लेकर दे रहा है। पहले तो मैंने सोचा कि हो सकता है इसे जाना नहीं होगा, इसलिए टिकट दे दिया होगा। लेकिन एकदम पास जाकर साइड में खड़ा हुआ तो उस बंदे को बोलते सुना कि- आप ज्यादा मांग रहे हैं। मैंने उस पुलिसवाले को गौर से देखा और मुझे भी जल्दी थी, आगे बढ़ गया। मैं बिना टिकट के उपर चढ़ गया और जो पुलिसवाले सामान चेक करते हैं, उनसे पूछा- भइया जब टिकटें मिलती ही नहीं तो हम जाएं कैसे। बंदे ने नोटिस की तरफ इशारा किया और अपने काम में लग गया।
नोटिस में साफ लिखा था कि- अगले आदेश तक प्लटफार्म टिकट नहीं मिलेगी और जो भी बिना टिकट के प्लेटफार्म पर आते हैं उन्हें २५० रुपये देने होगें। मैंने कहा, भाई साहब ये तो बहुत गड़बड़ है। उनका जबाब था, गड़बड़ क्या है, आप भी २५० रुपये दीजिए और जाइए। बगल में एक बंदा खड़ा था। उसने हंसते हुए कहा कि- हम भी २५० रुपये अभी दिया है। उसके हुलिए से साफ झलक रहा था कि वो २५० रुपये फाइन देने के बाद ऐसे हंसने की हैसियत नहीं रखता है। उसने पुलिसवाले से कहा- है तो दे दीजिए न और फिर हंसा। पुलिसवाले ने कहा- इनको कैसे दे दें, वो तो बहुत परेशान, दूसरे लोगों के लिए है। मुझे शक हुआ कि कहीं कोई और बात तो नहीं। मैं दुबारा पूछा-क्या ? दोनों ने एक साथ कहा- आपको कुछ नहीं कह रहे हैं। मजबूरन भइया को दो भारी बैग पकड़ाकर वापस उतरना पड़ा।
नीचे आकर पता नहीं मेरा क्या मन हुआ। जबसे मैंने पुलिसवाले को पैसे लेकर टिकट देते देखा था, तभी से मन में खटका हो रहा था। मैं नीचे उतरकर जेनरल टिकट काउंटर की लाइन में लग गया। भयानक भीड़ थी। सभी लाइनों में एक-दो पुलिसवाले दिख गए। तभी मेरे आगे खड़े एक पुलिसवाले ने पीछे मुड़कर देखा। ये वही पुलिसवाला था जो जिसे कि मैंने टिकट बेचते देखा था। मुझे देखते ही लाइन से बाहर हो गया और उल्टे मुझे ही कहने लगा-लाइन में रहिए और फिर दो-तीन बार यही बात दोहरायी। सभी लोग पहले से ही लाइन में लगे थे, उसे बोलने की कोई जरुरत नहीं थी। थोड़ी देर बाद मैं वापस आ गया।
मेरे दिमाग में ये सवाल अब भी बना हुआ है कि अगर ये पुलिसवाला ऑनड्यूटी था तो फिर टिकट क्यों कटा रहा था। औऱ अगर इसे कहीं जाना था तो फिर टिकट बेचकर, फिर से लाइन में क्यों खड़ा हो गया। सभी लाइनों पर एक-दो एक दो पुलिसवाले खड़े थे और टिकट खरीद रहे थे। कहीं ऑनड्यूटी पुलिसवाले की कमाई का जरिया जेनरल टिकट तो नहीं जिसे कि वो पीछ जाकर ज्यादा दामों पर बेचते हैं।
|
|
कल रात भैया को छोड़ने नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन गया। हम दोनों बहुत थके थे। लेकिन मेरे से ज्यादा खराब स्थिति भैया की थी। उन्हें एक बड़ा-सा जख्म हो गया था। मजबूरन हमें भी साथ जाना पड़ा। स्टेशन पहुंचने पर मैं प्लेटफार्म टिकट के लिए भटका। पुलिस से लेकर कुली तक पूछा तो सभी का एक ही जबाब था कि अब प्लेटफार्म टिकटें नहीं मिलती। मैं सबसे एक ही सवाल कर रहा था कि अगर टिकटें नहीं मिलती तो कोई प्लेटफॉर्म तक जाएगा कैसे। कोई तो बढ़ गया, किसी ने कहा-हमसे नहीं लालूजी से पूछिए तो किसी ने कहा, आप जाइए ही मत, जिनको यात्रा करनी है उन्हें जाने दीजिए। ऐसे कैसे हो सकता था कि मैं भइया को बिना ट्रेन में बिठाए लौट जाता।
इसी बीच मैंने एक अजीब नजारा देखा। एक पुलिसवाला जेनरल क्लास की टिकट काउंटर के पीछे किसी को पैसे लेकर दे रहा है। पहले तो मैंने सोचा कि हो सकता है इसे जाना नहीं होगा, इसलिए टिकट दे दिया होगा। लेकिन एकदम पास जाकर साइड में खड़ा हुआ तो उस बंदे को बोलते सुना कि- आप ज्यादा मांग रहे हैं। मैंने उस पुलिसवाले को गौर से देखा और मुझे भी जल्दी थी, आगे बढ़ गया। मैं बिना टिकट के उपर चढ़ गया और जो पुलिसवाले सामान चेक करते हैं, उनसे पूछा- भइया जब टिकटें मिलती ही नहीं तो हम जाएं कैसे। बंदे ने नोटिस की तरफ इशारा किया और अपने काम में लग गया।
नोटिस में साफ लिखा था कि- अगले आदेश तक प्लटफार्म टिकट नहीं मिलेगी और जो भी बिना टिकट के प्लेटफार्म पर आते हैं उन्हें २५० रुपये देने होगें। मैंने कहा, भाई साहब ये तो बहुत गड़बड़ है। उनका जबाब था, गड़बड़ क्या है, आप भी २५० रुपये दीजिए और जाइए। बगल में एक बंदा खड़ा था। उसने हंसते हुए कहा कि- हम भी २५० रुपये अभी दिया है। उसके हुलिए से साफ झलक रहा था कि वो २५० रुपये फाइन देने के बाद ऐसे हंसने की हैसियत नहीं रखता है। उसने पुलिसवाले से कहा- है तो दे दीजिए न और फिर हंसा। पुलिसवाले ने कहा- इनको कैसे दे दें, वो तो बहुत परेशान, दूसरे लोगों के लिए है। मुझे शक हुआ कि कहीं कोई और बात तो नहीं। मैं दुबारा पूछा-क्या ? दोनों ने एक साथ कहा- आपको कुछ नहीं कह रहे हैं। मजबूरन भइया को दो भारी बैग पकड़ाकर वापस उतरना पड़ा।
नीचे आकर पता नहीं मेरा क्या मन हुआ। जबसे मैंने पुलिसवाले को पैसे लेकर टिकट देते देखा था, तभी से मन में खटका हो रहा था। मैं नीचे उतरकर जेनरल टिकट काउंटर की लाइन में लग गया। भयानक भीड़ थी। सभी लाइनों में एक-दो पुलिसवाले दिख गए। तभी मेरे आगे खड़े एक पुलिसवाले ने पीछे मुड़कर देखा। ये वही पुलिसवाला था जो जिसे कि मैंने टिकट बेचते देखा था। मुझे देखते ही लाइन से बाहर हो गया और उल्टे मुझे ही कहने लगा-लाइन में रहिए और फिर दो-तीन बार यही बात दोहरायी। सभी लोग पहले से ही लाइन में लगे थे, उसे बोलने की कोई जरुरत नहीं थी। थोड़ी देर बाद मैं वापस आ गया।
मेरे दिमाग में ये सवाल अब भी बना हुआ है कि अगर ये पुलिसवाला ऑनड्यूटी था तो फिर टिकट क्यों कटा रहा था। औऱ अगर इसे कहीं जाना था तो फिर टिकट बेचकर, फिर से लाइन में क्यों खड़ा हो गया। सभी लाइनों पर एक-दो एक दो पुलिसवाले खड़े थे और टिकट खरीद रहे थे। कहीं ऑनड्यूटी पुलिसवाले की कमाई का जरिया जेनरल टिकट तो नहीं जिसे कि वो पीछ जाकर ज्यादा दामों पर बेचते हैं।

