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लड़की के साथ यौन हिंसा और बलात्कार एक बात है और दलित लड़की के साथ बलात्कार दूसरी बात है. ये विभाजन स्पष्ट रूप से आपको हरियाणा में लगातार हो रही घटना के मामले में दिख जाएगा. दलित लड़कियां बलात्कारियों की शिकार होने के साथ उस समझ और जाति की भी शिकार हो जाती है जिसमें दलित शोषण के अन्तर्गत ये सब स्वाभाविक मान लिया जाता है. नहीं तो क्या कारण है कि जिन विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, कॉलेजों और मंचों से स्त्री हिंसा के नाम पर हजारों की भीड़ सड़कों पर उतर आती है, हरियाणा में दलित लड़कियों के साथ हो रही एक के बाद एक घटना हमें सुलगाने के बजाए इस जुमले की तरफ धकेल देती है- हरियाणा में तो ये सब कॉमन है. आप बनारस आगाह करने जा सकते हैं, कभी हरियाणा नहीं..
Photo: 23 मार्च 2014 को हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव से चार दलित लड़कियों को दबंग जाट बिरादरी के लोगों ने अपहरण कर लिया और फिर लगातार उनके साथ दो दिनों तक सामूहिक बलात्कार करते रहे. इस घटना के विरोध में अप्रैल से ही लोग जंतर-मंतर पर बैठे हैं, लड़कियों का पीड़ित परिवार वापस भगाणा लौटना नहीं चाहते. उन्हें डर है कि कभी भी उनके साथ कुछ भी हो सकता है. लेकिन
ये वही जंतर-मंतर का इलाका है जहां 16 दिसंबर की घटना को लेकर शहर का मध्यवर्ग उमड़ पड़ा था लेकिन आज वो पूरी तरह नदारद था. कुछेक लोगों को छोड़ दें तो आंदेलन और जला दो मिटा दो के नारे लगानेवाले चमकीले चेहरे दूर-दूर तक दिखाई न दिए. असल में मध्यवर्ग किसी भी आंदोलन को चमकीली शक्ल में तब्दील होने तक इंतजार करता है. अगर मुद्दे चमकीले हो गए तो उसमे शामिल हो जाता है और जो मुद्दे बेहद सादे और जमीनी स्तर से जुड़े हैं, वो उनके मतलब का नहीं होता. हरियाणा में एक के बाद एक दलित स्त्रियों के साथ यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही हैं, दुर्भाग्य से वो मध्यवर्ग के हिसाब से चमकीली नहीं है नहीं तो इसी जंतर-मंतर पर हमने बिंदास टीवी औऱ रेडियो मिर्ची द्वारा प्रायोजित स्लट वॉक में हजारों की भीड़ देखी थी और एक से एक चैनल और अखबार के लोग कवरेज के लिए आए थे.

23 मार्च 2014 को हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव से चार दलित लड़कियों को दबंग जाट बिरादरी के लोगों ने अपहरण कर लिया और फिर लगातार उनके साथ दो दिनों तक सामूहिक बलात्कार करते रहे. इस घटना के विरोध में अप्रैल से ही लोग जंतर-मंतर पर बैठे हैं, लड़कियों का पीड़ित परिवार वापस भगाणा लौटना नहीं चाहते. उन्हें डर है कि कभी भी उनके साथ कुछ भी हो सकता है. लेकिन
ये वही जंतर-मंतर का इलाका है जहां 16 दिसंबर की घटना को लेकर शहर का मध्यवर्ग उमड़ पड़ा था लेकिन आज वो पूरी तरह नदारद था. कुछेक लोगों को छोड़ दें तो आंदेलन और जला दो मिटा दो के नारे लगानेवाले चमकीले चेहरे दूर-दूर तक दिखाई न दिए. असल में मध्यवर्ग किसी भी आंदोलन को चमकीली शक्ल में तब्दील होने तक इंतजार करता है. अगर मुद्दे चमकीले हो गए तो उसमे शामिल हो जाता है और जो मुद्दे बेहद सादे और जमीनी स्तर से जुड़े हैं, वो उनके मतलब का नहीं होता. हरियाणा में एक के बाद एक दलित स्त्रियों के साथ यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही हैं, दुर्भाग्य से वो मध्यवर्ग के हिसाब से चमकीली नहीं है नहीं तो इसी जंतर-मंतर पर हमने बिंदास टीवी औऱ रेडियो मिर्ची द्वारा प्रायोजित स्लट वॉक में हजारों की भीड़ देखी थी और एक से एक चैनल और अखबार के लोग कवरेज के लिए आए थे.

Photo: लड़की के साथ यौन हिंसा और बलात्कार एक बात है और दलित लड़की के साथ बलात्कार दूसरी बात है. ये विभाजन स्पष्ट रूप से आपको हरियाणा में लगातार हो रही घटना के मामले में दिख जाएगा. दलित लड़कियां बलात्कारियों की शिकार होने के साथ उस समझ और जाति की भी शिकार हो जाती है जिसमें दलित शोषण के अन्तर्गत ये सब स्वाभाविक मान लिया जाता है. नहीं तो क्या कारण है कि जिन विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, कॉलेजों और मंचों से स्त्री हिंसा के नाम पर हजारों की भीड़ सड़कों पर उतर आती है, हरियाणा में दलित लड़कियों के साथ हो रही एक के बाद एक घटना हमें सुलगाने के बजाए इस जुमले की तरफ धकेल देती है- हरियाणा में तो ये सब कॉमन है. आप बनारस आगाह करने जा सकते हैं, कभी हरियाणा नहीं..

भगाणा( हरियाणा ) में चार दलित लड़कियों के साथ हुए बलात्कार को घटना कहकर चर्चा करना बेमानी होगी. ये दरअसल हरियाणा में सालों से दलित स्त्रियों के साथ चल रहे बलात्कार वर्कशॉप का एक घिनौना नमूना है. जब आप इसे घटना कहते हैं तो इसके साथ सालों से चल रहे उस वर्कशॉप पर पर्दा पड़ जाता है जहां यह बेहद ही मामूली ढंग से देखा जाता है. यकीन न हो तो अखबार की पुरानी फाइलें उठाकर देख लें, दलित स्त्रियों/लड़कियों के साथ बलात्कार की पूरी सीरिज मिलेगी और दबंग गुंडे दोषियों के खिलाफ होनेवाली कार्रवाई पर गौर करेंगे तो लगेगा कि प्रशासन और बलात्कारियों की जुबान में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है.

8 मई 2010 को हमलोग मिर्चपुर( हरियाणा) में 12 वीं कक्षा में पढ़ रही सुमन के खाक हो चुके कमरे में थे. सुमन की सिविक्स की किताब के पन्ने को समेटते हुए जिसमे कि हमारा संविधान का अध्याय छपा था, जनसत्ता के पत्रकार अरविंद शेष की दो अलग-अलग आंखे अलग-अलग भाव व्यक्त कर रहे थे, एक में गाढ़े आंसू थे और दूसरे में धधका देनेवाला गुस्सा.

21 अप्रैल 2010 को मिर्चपुर के दबंग जाति के लोगों ने दलितों के कुल 18 घरों में आग लगा दी थी. एक पैर से लाचार दलित लड़की सुमन के साथ उन्होंने दुष्कर्म किया और बाहर से कुंडी लगाकर जलती गैस सिलेंडर बाहर से फेंक दिया. सुमन कमरे में तड़प-तड़पकर मर गयी. बाहर के कमरे में पड़े उनके पिता पर हमला किया गया और आग लगा दी गई. दोनों बेटी-बाप की मौत हो गई. जले घर के बाहर लड़की की तख्ती पर सुमन की दीदी ने जब पूरा हाल हमें सुनाया तो लगा हम किस मुल्क में रहते हैं और दलित विमर्श के नाम पर विश्वविद्यालयों में आखिर कर क्या रहे हैं ? पता नहीं हम कौन सी शोध प्रविधि पर बहस कर रहे होते हैं लेकिन यहां तो दलितों को सीधे जिंदा जला दिया जाता है.

हमें महा खाप पंचायत में किसी तरह का सवाल नहीं करने दिया गया. उल्टे चारों तरफ से घेर लिया गया कि तुम दिल्लीवाले पत्रकार हमें तालिबानी बोलते हो..सबकी जान अटक गयी थी जबकि वहीं दैनिक भास्कर, अमर उजाला और बाकी के अखबार के प्रतिनिधि पत्रकार आराम से नाश्ते के साथ खाप के समर्थमन में और सुमन के साथ जो हुआ, वो कोई गुनाह न होकर दलित की ही गलती की बात सुन रहे थे. बाद में मिर्चपुर की इस घटना के साथ जो औऱ जैसा व्यवहार हुआ, हमें तभी अंदाजा लग गया कि हरियाणा में दलित स्त्रियों के साथ बलात्कार की पृष्ठभूमि तैयार हो गई है

आप करते रहिए इस बात पर थै-थै कि अस्मितामूलक विमर्श के तहत अब दलित विमर्श-स्त्री विमर्श और साहित्य पाठ्यक्रम का हिस्सा हो गया. मुझे तो ऐसे पाठ्यक्रम पर बेहद अफसोस होता है जो खुलेआम सड़कों पर होनेवाले संघर्ष, बहस और मुठभेड को एसाइनमेंट, पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन और इन्टरनल एस्सेमेंट का हिस्सा बनाकर इसकी धार को मार देने का काम करते हैं. देशभर में होनेवाले सेमिनार सर्टिफिकेट बटोरने के धत्कर्म बनकर रह जाते हैं. ये सिलेबस विमर्श कम सड़कों पर लड़ी जानेवाली हक की लड़ाई की मॉर्चरी है, शवगृह है.
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धार छूटती कि इसके पहले ही उल्टियां शुरू हो गई. हारकर मैंने जिप बंद की और तेजी से बाहर भागा. बाहर आकर सांस ली और सामान्य होने की कोशिश करने लगा. बाहर निकलकर बार-बार मैं यही सोचने लगा-
क्या चार घंटे के इस कार्यक्रम में नवभारत टाइम्स, एबीपी न्यूज, साधना न्यूज के किसी भी मीडियाकर्मी को शू-शू नहीं लगी होगी, वॉशरूम की जरुरत नहीं पड़ी होगी ? इन मीडिया संस्थानों के नाम इसलिए कि ये इस रूहानी एहसास करानेवाले कार्यक्रम के मीडिया पार्टनर और प्रायोजक थे. इनके नुमाइंदे मंच पर जाकर आयोजक की ओर से दी जानेवाली मोमेंटो ले रहे थे और बेहद ही खराब हिन्दी में अपने पक्ष में पढ़ी जानेवाले कसीदे सुनकर थै-थै होकर लौट रहे थे. इन मीडिया संस्थानों की होर्डिग्स इंसान से दुगनी कद के चारों तरफ लगे थे. वाशरूम को छोड़कर चारों तरफ धूपबत्ती, इत्र और गुलाब की खूशबू फैल रही थी. लेकिन उस चमकीली दुनिया के बीच ये वॉशरूम ऐसी अकेली जगह थी जहां आप घुसते ही उल्टियां करनी शुरू कर देंगे.

वैसे तो खुली जगह में पेशाब करना समाज के लिए बेहद अशोभनीय काम माना जाता है और है भी. लोग इसे रोकने के लिए देवी-देवताओं की मूर्तियां लगाने से लेकर खुलेआम मां-बहन की गालियां तक लिख देते हैं. रेड एफएम ने तो खुले में पेशाब करनेवाले को बैंड बजाने की सीरिज तक चलायी थी. लेकिन आप बताइए न कि दिल्ली के बेहद पॉश इलाके की वॉशरूम की जह ये हालत है तो कोई क्या करे ? आप तर्क दे सकते हैं कि ये संभव है कि कार्यक्रम में अचानक से इतने लोग आ गए होंगे तो इसकी ये हालत हो गई लेकिन दरवाजे देखकर आपको अंदाजा नहीं लग जा रहा है इसकी पहले से क्या हालत है और इसकी मेनटेनेंस को लेकर कितनी गंभीरता बरती जा रही है.

वैसे तो सीलमपुर, शहादरा की सड़कों से गुजरने पर आपके नाम पर बदबू से कहीं ज्यादा नफरत और नफासत से झकझक सफेद रूमाल चढ़ जाते हैं लेकिन यहां ? दिल्ली के लुटियन जोन और पॉश इलाके की वॉशरूम का ये हाल और उसी में लोग आ-जा रहे हैं. ये विकास का एक छोटा सा सच है जिसे ढंकने के लिए राजनीतिक पार्टियों की तरह ही चैनल और अखबारों के होर्डिंग्स लगते हैं और यकीन मानिए जितने पैसे इन पर खर्च होते हैं, उतने में ऐसे कितने वॉशरूम की सफाई, मरम्मत और नयी तक बन जाए.. लेकिन किसी मीडिया संस्थान को कहीं कुछ दिखाई नहीं देता.

मैंने कभी एक पोस्ट लिखी थी- इस देश को मंदिर की नहीं मूत्रालय की जरूरत है(http://mohallalive.com/2010/04/13/vineet-kumar-on-toilet-issue/) और उसके बाद लोगों ने जमकर गरिआना शुरू किया लेकिन इस नंगे सच के बीच घिरकर आप मुझसे सहमत होंगे. बाकी दिल्ली के इस बेहद पॉश इलाके की वॉशरूम में गांधीजी की तस्वीर तैर ही रही है, नकली नहीं है हुजूर, अपनी आंखों से देखा- असली है जिसे कि उठाकर बेसिन पर रखते ही लोग उठाकर ले गए जैसा कि आकर गार्ड ने बताया. आंख से देखी चीज की कोई रिपोर्टिंग नहीं है तो आपको लगता है जो हमें नहीं दिखता वो मीडिया को भी दिखता है ? आपने अतउल्ला खां और हर्षदीप कौर की रूहानी आवाज की तारीफ के बीच इस वॉशरूम की कोई खबर देखी हो तो बताइगा, प्लीज.
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कथाकार प्रेमपाल शर्मा को किताबोंवाले बाबा कहते हैं, ये बात मैं पहले नहीं जानता था. उनकी रचनाओं के बजाय जनसत्ता में छपे लेख और उनकी ही रचनाओं पर लिखी समीक्षा ही पढ़ी है.आज से कोई दस साल पहले एमए के दिनों में एक-दो बार बेहद ही औपचारिक मुलाकात हुई है. हमारे सीनियर( हालांकि उन्हें ये कहलाना बिल्कुल भी पसंद नहीं, दोस्त कहो ऐसी हिदायत देते, फिर भी) उमाशंकर सिंह से उनके बारे में चर्चा सुनी थी और एकाध बार उनके साथ रेलवे भवन में मिला भी. बातचीत में बेहद सहज और आत्मीय लगे मुझे. इन सबको जोड़-जाड़कर कह सकता हूं कि मैं उन्हें एक हद तक जानता हूं. लेकिन ये अपने गांवघर और लोगों के बीच किताबोंवाले बाबा के नाम से एक खास कारण से मशहूर हैं, इसकी जानकारी आज सुबह एफएम गोल्ड से मिली.

एआइआर एफएम गोल्ड ने बताया कि प्रेमपाल शर्मा को बचपन से किताबों का शौक था. छुटपन के दिनों में अपने पिताजी की किताबें, धार्मिक पुस्तकें जो कुछ भी घर में पड़ी होती थी, उन्हें पढ़ना शुरू किया. किताबों के प्रति लगाव गहराता गया. रेलवे में बतौर अधिकारी होने के बाद ये शौक और बढ़ता ही चला गया जो कि सिर्फ अपनी लाइब्रेरी बनाने और पुस्तकें लिखने तक सीमित नहीं रही बल्कि गांवघर में भी लाइब्रेरी बनाने का ख्याल आया. एफएम गोल्ड ने बताया कि प्रेमपाल शर्मा की बनायी लाइब्रेरी का असर ये है कि वहां नियमित आनेवाले छात्रों खासकर लड़कियों के परिणाम पहले के मुकाबले काफी बेहतर आने लगे. हममे से अधिकाश लोग जिस लाइब्रेरी गैरजरूरी मानने लगे हैं और वहां जाकर वक्त नहीं बिताते, प्रेमपाल शर्मा की इस लाइब्रेरी से कई छात्रों की जिंदगी बेहतर हो रही है.

एफएम गोल्ड पर जब मैं प्रेमपाल शर्मा के बारे में ये सब सुन रहा था तो दो बातें मेरे दिमाग में बार-बार आ रही थी- पहली तो ये कि क्या प्रेमपाल शर्मा या किसी भी हिन्दी के साहित्यकार पर कोई दूसरा निजी एफएम चैनल मुफ्त में ऐसी स्टोरी प्रसारित करेगा ? मुफ्त का आशय बिजनेस टाइअप से हैं जहां प्रेमपाल शर्मा जैसे किसी भी हिन्दी के साहित्यकार पर चैनल के अपने स्टीगर चिपकाने की शर्त न हो या फिर वहां किसी प्रकाशन संस्थान के साथ टाइअप करके न आया हो ? और दूसरा कि एक लेखक, एक साहित्यकार अपनी जिंदगी में जो लिखता है, उसका थोड़ा ही सही हिस्सा असल जिंदगी में जीना शुरू कर देता है तो उससे कितनों की जिंदगी बदल जाती है ? शब्दों के प्रति यकीन कितना गुना बढ़ जाता है ? तभी मुझे "एक्टिविस्ट राइटर" होने की जरूरत सही संदर्भ में दिखलाई पड़ती है.

 मेरे दिमाग में ये योजना सालों से चल रही है कि हमारे आसपास जो भी बड़े लेखक हैं, उनसे आग्रह करें कि आप उन किताबों को हमें दे दीजिए जो आपके लिए उतने महत्व के नहीं, बिना आपकी इच्छा के आपतक सेवार्थ लिखकर आ गए हैं. हम उन्हें जमा करेंगे और सही पाठक तक पहुंचाएंगे, उन पीढ़ी तक मूल पाठ पहुंचाएंगे जो अभी तो मुक्तिबोध, नागार्जुन, रेणु को "चुटका पुस्तक" के माध्यम से पड़ रहे हैं और उच्च शिक्षा की जो हालत है, जल्द ही पीपीटी( पावर प्वायंट प्रेजेंटेशन ) के माध्यम से अंधेरे में, अकाल और उसके बाद और मैला आंचल का गहन अध्ययन करेंगे. प्रेमपाल शर्मा पर सुबह-सुबह ये फीचर सुनकर खोई हुई चीज मिल जाने का एहसास हुआ और खत्म होती चीजों के सहेजने की ललक भी.. बस आखिर में मामला थोड़ा गड़बड़ा गया और पूरे फीचर को एक मिनट में कसैला कर दिया जब रेडियो प्रस्तोता ने कहा-

किताबों की बात तो बहुत हो गई, अब सुनिए ये गाना- किताबें बहुत सी पढ़ी होगी तुमने
मगर तुम्हें चेहरा भी पढ़ा है
पढ़ा है मेरी जां, नजर से पढ़ा है
बता मेरे चेहरे पे क्या-क्या लिखा है..



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ब्रांड राजनीति के औजार

Posted On 10:49 am by विनीत कुमार | 1 comments


मूलतः प्रकाशित- जनसत्ता, 6 अप्रैल 2014

आगामी लोकसभा चुनाव 2014 को लेकर किए जा रहे विज्ञापन, रैली एवं प्रचार की पूरी रणनीति किसी भी दूसरे व्यवसाय के लिए की जानेवाली मार्केटिंग एवं ब्रांड पोजिशनिंग की ही तरह है. यह रणनीति न केवल माध्यमों और लोकवृत्त के प्रचार संसाधनों पर कब्जा जमाने को लेकर है बल्कि इसके लिए उन्हीं विज्ञापन एवं मार्केटिंग एजेंसियों की मदद ली जा रही है जो कि साबुन, मोबाइल सेवा, कार या दूसरे उत्पाद के लिए व्यावयायिक रणनीति बनाने का काम करते हैं. मतदान आधारित राजनीति को राजनीति एवं छवि की मार्केटिंग मे तब्दील करने के पीछे यह स्पष्ट है कि जिसका विज्ञापन और माध्यमों पर कब्जा होगा, उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर सरकार गठन करने का मौका मिलेगा. ऐसे में जरूरी है कि संवैधानिक प्रावधान के तहत मतदान के जरिए चुनाव लड़ने और जीतने से पहले माध्यम और विज्ञापन आधारित चुनाव जीत लिए जाएं. बाजार में कोई भी ब्रांड लोगों को इसी तरह उत्पाद के पहले उसकी छवि का उपभोग करने की मानसिकता तैयार करता है और उसके भीतर यह भरोसा पैदा करता है कि अगर उसने सचमुच इसका उपभोग करना शुरु किया तो वह संतुष्टि के चरम तक पहुंच सकता है.

ब्रांड मार्केटिंग की इस रणनीति के आधार पर कार्पोरेट और बिजनेस के लोकतंत्र में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनाए जा चुके हैं. अब जो कुछ दिनों बाद से जो चुनाव और मतदान प्रक्रिया शुरू होने जा रही है, वह नागरिक समाज के लिए चुनाव भले ही हो और उनके मतदान को अंतिम निर्णय के रूप में परिभाषित किया जा रहा हो लेकिन कार्पोरेट और बिजनेस के लोकतंत्र के लिए यह औपचारिकता और खानापूर्ति से ज्यादा कुछ भी नहीं है. ऐसा कहना इस चुनावी माहौल में एक रुपक का गढ़ लेना भर नहीं है बल्कि इसकी जमीन ठोस रूप से आंकड़े और उनके विश्लेषण पर तैयार की जा चुकी है.

 देश की अर्थव्यवस्था की नब्ज अगर शेयर सूचकांक से निर्धारित होती है जिसे कि राजनीतिक गलियारे में आगे चलकर विकास के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है तो पिछले 27 मार्च को जो उछाल आया और 22,307 (बीएसइ)) तक चला गया, इसके पीछे मौजूदा सरकार की कहीं भूमिका नहीं बतायी जा रही. इसकी व्याख्या इस रूप में की जा रही है कि नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय हो गया है और देश के निवेशक सहित विदेशी निवेशक इस बात को लेकर आश्वस्त हो रहे हैं कि अब अगले पांच साल तक सिर्प विकास आधारित कार्य होंगे और जाहिर है विकास का अर्थ अधिक से अधिक निवेश, संसाधनों की खपत और वस्तु एवं सेवाओं में मांग तो सरकार बनते-बनते ये सूचकांक आसमान छूने लग जाएगा. स्वाभाविक है कि शेयर सूचकांक को ही विकास का पर्याय मान लेने की स्थिति में नागरिक के बीच यह नैतिक दवाब पहले से ही बनाने का काम शुरू हो गया है कि अगर वे आनेवाले समय में इस सूचकांक को और उपर देखना चाहते हैं तो हर हाल में बीजेपी और नरेन्द्र मोदी के लिए ही वोट करना होगा. यह किसी भी उत्पाद की ब्रांड रणनीति से अलग नहीं है जहां क्रमशः चार चरण में पहला अभाव, हताशा एवं बेचैनी, दूसरा मौजूदा उपायों और उत्पादों के प्रति नकारात्मक भाव, तीसरा प्रस्तावित उत्पाद या ब्रांड को अंतिम विकल्प और चैथा उस उत्पाद के उपभोग के बाद आनंद और समस्या से मुक्ति अपने प्रति अनुकूल परिवेश की निर्मिति करता है. यह सब माध्यम के जरिए दर्शक/श्रोता को उपभोक्ता की शक्ल में तब्दील करने की प्रक्रिया में किया जाता है. 

नरेन्द्र मोदी को ब्रांड बनाने की प्रक्रिया में उन विज्ञापनों, रैली में कहे गए शब्द और उनकी ही शारीरिक भंगिमा पर गौर करें तो इन चारों चरण से मतदान आधारित राजनीति पॉलिटिकल मार्केटिंग में बदलने की कोशिश करती दिखाई देती है. भ्रष्टाचार का नरेन्द्र मोदी के प्रति बेहद ही सम्मानजनक संबोधन के साध वो आनेवाले हैं से लेकर क्योंकि मोदीजी को हम लानेवाले हैं की विज्ञापन श्रृंखला इसी प्रक्रिया का लगातार दोहराव है जहां नागरिक को पहले चक्र में दर्शक और श्रोता में बदलने की कोशिश होती है और जब वह इस स्तर पर जुड़ जाए तो उसे वापस नागरिक के रूप में परिवर्तित करके वोट के लिए अपील की जाए. विज्ञापन और माध्यमों के जरिए इस छवि निर्माण का दिलचस्प पहलू है कि पूरी राजनीति लोकवृत्त की सामाजिक संरचना, समस्याओं और मुद्दे से हटकर अतियथार्थ के उस धरातल पर जाकर टिकनी शुरू हो जाती है जहां प्रसारण ही सत्य और आक्रामक मौजूदगी ही लोकतंत्र के मूल्य के रूप में प्रस्तावित किए जाने लगते हैं जबकि ये सारी गतिविधियां पूरी तरह व्यावसायिक जमीन पर होती हैं जिसका कि सामाजिक प्रक्रिया से सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं होता है. लेकिन इसे माध्यमों द्वारा दिखाया/बताया उसी रूप में जाता है जैसा कि राजनीति के मार्केटिंक का हिस्सा बनने के पूर्व से दिखाया जाता रहा है.

यह अकारण नहीं है कि जिस बिजनेस चैनल पर अर्थव्यस्था और व्यवसाय से जुड़ी छोटी-छोटी घटनाओं, नए उत्पाद एवं सेवाओं की चर्चा ब्रांड में तब्दील होने की प्रक्रिया के रूप में प्रसारित किया जाता रहा है, ऐसे दौर में कि एक राजनीतिक पार्टी और उसका प्रत्याशी अपनी पुरानी और लंबे समय तक स्थिर छवि को पूरी तरह ध्वस्त करके ( स्वाभाविक है जनसंपर्क कंपनी एवं मीडिया प्लानर की मदद से) नयी छवि निर्मित करने की कोशिश में आक्रामक तौर पर 360 डिग्री माध्यमों( माध्यम के जितने भी रूप हैं) पर मौजूद हो, इस काम के लिए करोड़ों रूपये के निवेश किए गए हों, उसकी चर्चा अर्थव्यवस्था, राजस्व और ब्रांड बनने की प्रक्रिया को लेकर न होकर उसी जाति, क्षेत्र, भाषा और सम्प्रदाय आधारित राजनीतिक विश्लेषण को लेकर किया जा रहा है जो काम समाचार चैनलों पर होते आए हैं. इतना ही नहीं, एक ही मीडिया संस्थान ने जो समाचार चैनल और बिजनेस चैनल की अलग-अलग लाइसेंस ले रखा है, दोनों पर एक ही सामग्री का प्रसारण करते हैं जिनमे बिजनेस की चर्चा नहीं है. उपभोक्ता चाहे तो सवाल कर सकते हैं कि अगर दोनों चैनलों पर एक ही सामग्री का प्रसारण किया जाना है तो बिजनेस चैनल के लिए अलग पैकेज की कीमत क्यों दी जाए और दूसरा कि अगर राजनीति भी बिजनेस का अनिवार्य हिस्सा है तो राजनीति के राजनीति मार्केटिंग में तब्दील हो जाने और प्रत्याशी के ब्रांड पोजिशनिंग की प्रक्रिया को क्यों प्रसारित नहीं किया जा रहा ? स्पष्ट है कि चुनावी अभियान जिस जमीन पर खड़े होकर चलाए जा रहे हैं, उस जमीन से दर्शक/श्रोताओं को पूरी तरह काटकर उन संदर्भों में शामिल करने की जबरदस्ती कोशिश की जा रही है जो व्यावसायिक एवं ब्रांड रणनीति के आगे अपने आप गौण होते चले गए हैं.


यह अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि छवि आधारित ब्रांड पोजिशनिंग की यह राजनीति( मार्केटिंग) नागरिक को  दर्शक/श्रोता में तब्दील करके ब्रांड उत्पाद की तरह ही किसी भी तरह का सवाल, चयन और असहमति दर्ज करने का हक छीन लेता है और आखिर में उपभोक्ता की जरूरत, फैशन. इच्छा और विवशता एक-दूसरे से गड्डमड्ड होती चली जाती है. राजनीति की जमीन का बदल जाना और उसके भीतर से पूरी प्रक्रिया को काटकर अलग कर देना बहस के नए संदर्भ की ओर ले जाता है जो कि चुनाव विश्लेषकों को एक हाथ में जाति, क्षेत्र और समुदाय की सूची रखने के साथ-साथ दूसरे हाथ में राजनीतिक दलों और माध्यमों की बैलेंस शीट रखने की मांग करता है. 
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विकल्प, तुम पागल तो नहीं हो गए हो, इस टी को पहनकर जाओगे चायना वॉल डिनर करने ?

क्यों, इस टीशर्ट में क्या प्रॉब्लम है, ब्लू जींस पे ये डार्क यलो, ठीक तो है.

ठीक है लेकिन पीछे जो इतने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है- मोदी फॉर पीएम..इट्स सो फनी. उतारो ये टी, नहीं तो मैं नहीं जा रही तुम्हारे साथ. उठा लाए मुफ्त की टीशर्ट और डाल लिया, कुछ तो ख्याल करो विकल्प कि तुम बीजेपी के सिम्पथाइजर के अलावे एक इन्डीविजुअल भी हो, विकल्प हो. क्यों किसी ऐसे शख्स के लिए अपनी पीट को होर्डिंग्स बना रहे हो जो अपने आगे किसी को समझता नहीं, तानाशाह है. इट्स रियली डिसगस्टिंग.

तन्हाई, पहले तुम एक बीत क्लियर करो, तुम्हें इस टीशर्ट से प्रॉब्लम है या फिर नरेन्द्र भाई से ? टीशर्ट से प्रॉब्लम है तो मैं तो उतारने नहीं जा रहा और नरेन्द्र भाई से तो डिनर यहीं ऑर्डर करते हैं और बैठकर इस पर बात करते हैं ?

हुंह, बैठकर बात करते हैं, ऐसा क्या है इस शख्स को लेकर बात की जाए, पिछले जस सालों से जो कारनामेऔर अब नौटंकी करता आया है, उसके बाद भी इस पर बात करने के लिए कुछ बचा है ? मैं कुछ सुनना नहीं चाहती, तुम्हें चायना बॉल चलना होगा, उसके पहले ये टी बदलनी होगी और ये नरेन्द्र भाई-नरेन्द्र भाई की जो कंठी माला पहन रक्खी है न, कम से कम डिनर तक उतार फेंकनी होगी. अब चल, जल्दी कर फटाफट..नहीं तो अभी तेरी पिछाड़ी गर्म करती हूं..आय एम सीरियस नाउ.

सुन लो तन्हाई, अभी तक मैं तुम्हारी बात को हल्के में ले रहा था लेकिन हर चीज की कोई सीमा होती है. अब मुझे लग रहा है कि हमें इस मुद्दे पर सीरियसली सोचना होगा. मेरी हर बात के पीछे तुम्हें दिक्कत होती है. मेरी सोच से, मेरी पसंद से, मेरे कपड़े से सबकुछ से तुम्हें प्रॉब्लम है. तुम्हें तब पता नहीं था जब मैं हर डिबेट में तुम्हारे ही साथ वाजपेयीजी की कविताएं कोट करता था, गोलवलकरजी, रज्जू भैय्या के उद्धरम शामिल करता था, मेरे साथ के सारे लोग एबीवीपी से थे..तब तो तुझे कोई प्रॉब्लम नहीं थी और अब हर बात पर ये स्साले संघी, ये दक्षिणपंथी, फक्क यार..क्या है ये सब ?

तुम हर डिबेट में मार्क्स, एंगिल से लेकर मुक्तिबोध, धूमिल को कोट करती थी..मुझे ये लोग पसंद नहीं है..ये परिवार, समाज और संस्कार खत्म करने का काम करते आए हैं. मैंने तो कुछ नहीं कहा तुझे. तू अशोका रोड में हॉट पैंट के उपर उस दढ़ियल चे ग्वेअरा की टीशर्ट पहनकर खुलेआम घूमती थी, फैशन से ज्यादा मुझे जलाने के लिए, मैंने तो कभी नहीं मना किया. तुम बात-बात में ऐसा क्यों मेरे साथ कर रही हो ?

यस, यस..मेको पहले से पता था कि तू एक दिन मुझे उस टीशर्ट की याद जरुर दिलाएगा जिस पर छपी तस्वीर देखकर तू खुद ट्रिमिंग किया करता था. मैं तेरे से मजाक में कहती भी- स्साले जब जीता गोलवलकर को है तो दाढ़ी चे ग्वेएरा जैसी क्यों रखना चाहता है ? तब तो पलटकर जवाब देता- इस दाढ़ी, लुक, कुर्ते और टीशर्ट को आयडलॉजी में मिक्स मत करो, ये दोनों अलग चीजें हैं. तू ही तो कहता था कि मेरी उस चे-ग्वेएरी वाली टीशर्ट से प्रॉब्लम नहीं होती क्योंकि मुझे पता है जब तू इसे हॉट पैंट के साथ पहनती हो तो वो विचारों की प्रतिबद्धता न होकर फैश्टिच फैशन हो जाता है..अब क्या हो गया ?

अब क्या हो गया ? यही तो मैं पूछ रहा हूं कि अब क्या हो गया ? क्यों डेनिम जींस के साथ ये टीशर्ट पहनी है, तू भी तो कन्सिडर कर सकती है कि ये फैशन है..तुझे क्या प्रॉब्लम है ?

कर सकती हूं, बिल्कुल कर सकती हूं..लेकिन ये एलेक्शन के पहले ही "मोदी फॉप पीएम". तेको नहीं लगता कि ये खुद डेमोक्रेसी के खिलाफ है कि, वोटर का अपमान है कि एलेक्शन के पहले ही सब पहले से डिसाइड कर लिया. न जनता की फीलिंग्स समझनी है, न पार्टी की. सॉरी, तेरे ये नरेन्द्र भाई जितने सेलफिश इंसान की टी पहनकर घूमना कहीं से भी जस्टिफायड नहीं है..और सुन, चे-ग्वेएरा की टी मेरे लिए आयडलॉजिकल कमिटमेंट न सही, फैशन ही है तो उस फैशन की भी तो एक सेंस है न यार- मार्क्स की कहे दो शब्द- डाउव्ट एवरीथिंग..क्या गलत है इसमे ? इस अकेले दो शब्द की कितनी अहमियत है लाइफ है, समझता है..और ये किसी कॉमरेड के लिए ही नहीं, संघी के लिए भी..सभी के लिए. बोल क्यों न बने ये फैशन. तू फैशन उसको बनाएगा जो शक्स स्वार्थ के पीछे इतना पागल हो चुका है कि जिन लीडर्स ने उसे यहां तक लाया, वो आज उसके लिए डस्टबिन मटीरियल हो गया..तू ऐसे भी सोच न ? और हां, मैं शुरु से जानती थी कि तू दक्षिणपंथी है, आगे इसी की पॉलिटक्स करेगा, तब भी तेरे साथ थी..हर वक्त क्योंकि हमने आपस में जो किया वो दक्षिणपंथ-वामपंथ से बहुत अलग और आगे की चीज थी, बोल मानता है न इसे ? मुधे तेरे दक्षिणपंथी होने में दिक्कत नहीं है, दिक्कत उसकी लुम्पेन बन जाने में है और ये टी पहनकर तू यही प्रूव कर रहा है. तू दिन-रात हेडगेवार पढ़, डूबा रहा गोलवलकर संचयन में, देवरस की जीवनी चाटता रह, कोई दिक्कत नहीं है..लेकिन ये दक्षिणपंथ के नाम पर एक शख्स की बैनरबाजी छोड़ दे, अपनी पीठ को उस शख्स के लिए एमसीडी की दीवार मत बनने दे विकल्प प्लीज..





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