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हम भी बात कलेंगे. पापा,हम भी बात कलेंगे. मम्मी हमको भी हैलो बोलना है. हम हैलो बोलके फोन वापच कल्ल देंगे. विनीत चाचा छे हम भी बात कलेंगे. हैलो, विनीत चाचा..क्या कल्ल लहे हैं आप ? मैं बाबू, मैं होमवर्क कर रहा हूं और तुम क्या कर रहे हो ? हम कुच नहीं कल्ल लहे हैं..अरे बाबू, दो फोन. कोई फोन करता है तो तुम चाटने लग जाते हो उसको, इधर दो..नय,हम भी बात कलेंगे, हम भी,हम भी,हम भी, मम्मी हम भी.

सुबह सात बजे से लेकर रात के ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे जब भी घर फोन करो, क्षितिज की ये आवाज कॉलर ट्यून की तरह पीछे से सुनाई देती है. कई बार हम उसकी इस आदत पर झल्ला जाया करते हैं. ठीक उसी तरह जैसे किसी बूढ़े-बुजर्ग की मोबाईल में सेवा देनेवाली कंपनी या घर का कोई शरारती बच्चा अपने मन से "चिकनी चमेली" या "हलकट जवानी" की कॉलर ट्यून लगाता देता है और वो झल्ला उठते हैं. कई बार बहुत ही जरुरी बात करनी होती लेकिन वो शुरु हो जाता- हम भी बात कलेंगे. भैय्या, भाभी, मां उसकी इस आदत से अक्सर परेशान होकर कहते- रुको, जब क्षितिज सो जाएगा तब दोबारा कॉल करते हैं. रुको, दूसरे मोबाईल से कॉल करते हैं, दूसरे कमरे में जाकर कॉल करते हैं, घर से बाहर निकलते हैं तो कॉल करते हैं.....मेरी मां कहती- ये क्षितिज नहीं, ठाकुरबाड़ी का घंटा है, कभी भी फोन करो तो पहिले इसको हिलाना पड़ेगा. मां कहती, रुको तुमको भी भेज देते हैं विनीत चाचा के पास,रहना वहीं. हम सब कोई नहीं रहेंगे. बोलो, जाएगा ? उसकी आवाज आनी बंद हो जाती. मैं यहां दिल्ली में बैठकर अनुमान लगा रहा होता- बेचारा,पिद्दी सा बच्चा डर गया होगा. मां और दादी से दूर होकर भला कहां जी पाएगा ? पापा तो अक्सर उसे इस तरह से डराते कि मुझे खुद भी डर लगा रहता है कि बड़ा होने पर क्षितिज से उसकी क्लास टीचर उनकी तस्वीर दिखाकर पूछेगी कि ये कौन है तो कहीं वो पापा की तस्वीर देखकर ये न कह दे- टेर्ररिस्ट( आतंकवादी).

पिछले दो दिनों से उसकी कॉलर ट्यून बजनी बंद हो गयी है. इन दो दिनों में मैंने कम से कम बारह से चौदह बार भैय्या,भाभी,मां और पापा से बात की होगी. पीछे से कोई आवाज नहीं. एकदम ही सन्नाटा. हम जो भी बात करते वो लोग सुन रहे होते और मां को बार-बार ऐं,ऐं नहीं बोलना पड़ता. क्षितिज की पीछे से कोई आवाज न आने से लगता है जैसे जमशेदपुर शहर का सबस बड़ा शोर वही है.

कल पापा का फोन आया.कैसे हो, क्या सब चल रहा है और फिर धीरे-धीरे बात क्षितिज तक चल गयी. उसकी हरकतों पर बात करते हुए लग रहा था कि अब वो रो देंगे. बदमाशिए बहुत करता है. बहुत मना करते रहे लेकिन मानता कहां है, पैर में चक्करघिन्नी लेकर घूमता है. एक मिनट स्थिर नहीं. अब बस जब दूकान जाने लगते हैं तो बेड पर पड़े-पड़े रोता है- बाबा हम भी तलेंगे,हम भी जाएंगे..हमको भी ले तलिए. मेरे पापा के भीतर भावनाओं की बहती एक नदी है जिसे मां ने सालों पहले सरस्वती घोषित कर दिया है और मैं भी उसे लुप्त नदी मानकर बैठ गया था..लेकिन इधर कुछ महीनों से देखता हूं कि वो नदी बिना शोर किए बहती चली जा रही है, फिर से पानी का सोता फूटा है या फिर हम उस तह तक जाकर समझ नहीं सके, पता नहीं लेकिन उस सोते से मुझे कई बार फोन पर ही हहाती हुई सी आवाज सुनाई देती है. खैर,

क्षितिज, जिसे कि मैंने उसकी दो साल की आयु में सिर्फ एक बार देखा है. दुबला-पतला, अपनी मां की ही तरह सुंदर,बड़ी-बड़ी आंखें और रग-रग में बदमाशी भरी हुई. आप पूरे घर को सजा-सवांर दें, झाडू-पोछा मार दें, उसे उस सजे-संवरे घर को "घटनास्थल", "दंगाक्षेत्र" में तब्दील करने में दस मिनट भी नहीं लगेंगे. उसका मन करेगा तो उन तस्वीरों के आगे भी अपनी धार छोड़ सकता है जिसके आगे मां गंगाजल चढ़ाया करती है. बहुत बदमाश है, बहुत बदमाश की जयकार से घर गूंजता रहता. दीदी, मां,भाभी सबके सब एक सुर से उसके इस यश का गान करते और बीच-बीच में बेचारे को पुरस्कार( धमाधम) भी मिलते. मैं चुपचाप देखता रहता, मुस्कराता रहता. मेरी किताबें पलटता रहता और नामवर सिंह की "दूसरी परंपरा की खोज" के पन्ने पलटते हुए जोर से बोलता- ए,बी,छी,डी.मन किया कि उसकी इस हरकत को कैमरे में कैद कर लूं,नामवर सिंह से इस पर प्रतिक्रिया लूं या फिर यूट्यूब पर इसकी वीडियो डालकर लोगों के कमेंट्स का इंतजार करुं. दिनभर मेरे बैग में पता नहीं क्या-क्या खोजता रहता और कुछ निकालकर कहता- दीदी, ये क्या है ?

भाभी मुस्कराती देख पूछती- आपको गुस्सा नहीं आता है इसकी बदमाशी देखकर ? मैं कहता नहीं तो और उल्टे उसे जो जैसे बिगाड़ रहा होता, करने देता. हां देर रात जब वो जोर-जोर से रोता तो जरुर मन करता कि पुरस्कार दूं. वैसे मैं भाभी को इतना जरुर कहता- इसकी वीडियो बनाकर किसी हेल्थड्रिंक कंपनी को दे दें, आपको वो बहुत पैसे देगा. इतनी एनर्जी कहां से आती है इसमे. बिल्कुल भी सोता नहीं, दिनभर हमलोगों के पीछे-पीछे डोलता फिरता है. मैं दिनभर में उसे दो-चार बार अचानक गोद में उठाता और जोर से किस करके वापस जमीन पर उतार देता..वो अवाक सा रह जाता फिर अपने कालजयी कर्म में लग जाता.

भाभी ने जब फोन पर बताया कि क्षितिज का पैर टूट गया है तो ये सब सोचकर मन उदास हो गया. वो अपनी मां के साथ लुकाछिपी खेल रहा था. कहां घुस गया,पैर में क्या लग गया कि अचानक से फिसलकर घिर गया. पहले तो मामूली दर्द मानकर सहज करने की कोशिश की लेकिन फिर डॉक्टर ने बताया कि पैर ही टूट गए हैं. हालांकि ये कोई बड़ी बात नहीं है, महीने-दो महीने में सबकुछ पहले की तरह सामान्य हो जाएगा और उसकी कॉलर ट्यून से फिर से मुझे परेशानी होगी लेकिन अभी उस बेचारे को कितनी बेचैनी होती होगी, कहीं आ-जा नहीं सकता. किसी के पीछे लग नहीं सकता और जो उसे जितनी चॉकलेट दे,संतोष करना होगा..अपनी दीदी खुशी और सौम्या से लड़ नहीं सकेगा.

अब घर बात करते हुए पीछे से कोई शोरशराबा नहीं होता है. आप जिससे बात करना चाहें, वो आसानी से बात करेंगे..हम भी बात कलेंगे की जिद और आपकी बातचीत में दखल देनेवाला कोई नहीं मिलेगा. क्षितिज अपने बिस्तर पर लेटा होता है, रोता है, मां से हमेशा पास रहने की जिद करता है. लेकिन शांत होकर क्षितिज ने घर में जो सन्नाटा पैदा किया है, उससे घर के लोगों के बीच अजीब किस्म की बेचैनी हो गई है. वो दूकान जाते वक्त अक्सर पापा के पैर पकड़कर ही खड़ा हुआ करता- बाबा, हम भी तलेंगे और पापा मां या भाभी से गोद लेने कहते. कभी प्यार से पुचकारकर वापस बिस्तर पर बिठा देते. अब फोन पर बस इतना ही कहते हैं- बहुत चंचल है. कैसे कहें कि रोज दूकान पहुंचने में लेट करनेवाला क्षितिज बाबा के समय पर पहुंच जाने पर भी समय पहले से कहीं ज्यादा खराब कर रहा है ? कैसे कहें कि उसका हम भी तलेंगे कि जिद और उनकी झल्लाहट के बीच एक लत पकड़ती जा रही थी..और इसके बिना बाबा और पोता दोनों बेचैन है.

क्षितिज की ढेर सारी तत्वीरें मेरे मोबाइल में थी. स्क्रीन खराब होने की स्थिति में, एक भी तस्वीर सेव नहीं कर पाया..बहुत मन था कि इस पोस्ट के साथ उसकी कोई प्यारी सी तस्वीर लगाउं लेकिन फोटो खींचने पर रोनेवाले क्षितिज की तस्वीर हम नहीं डाल पा रहे..
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आज दि टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने का आधा हिस्सा "लाइव इंडिया" चैनल के विज्ञापन से रंगा है. अपने मीडियाकर्मियों का खून चूसनेवाला चैनल आज देशभर में रक्तदान कराने और उसका लाइव प्रसारण का काम करने जा रहा है. इस चैनल से कोई पूछनेवाला नहीं है कि तुम जो महीनों अपने मीडियाकर्मियों का वेतन नहीं देते, सालों से बारह हजार-चौदह हजार में बैल की तरह पीसते हो, तुममे ये नैतिक अधिकार कहां से आ गया कि रक्तदान शिवि लगवाओ, उसका प्रसारण करो.

दर्शकों की नजर में आने और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का ये कितना घिनौना और घटिया तरीका है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि जिस चैनल में सालों से वहां काम करनेवाले लोगों का हक मारा जाता रहा,चैनल के पूर्व सीइओ सुधीर चौधरी जोड़-तोड़ से बाकी लोगों को उसी हाल में काम करते रहने,मैनेजमेंट से सांठ-गांठ करके खुद ही कुर्सी बचायी रखी और शोषण की चक्की में सब पिसते रहे, आज वही चैनल रकतदान शिविर लगाने जा रहा है. कोई चैनल के मालिक और मुखिया से पूछे तो सही कि क्या वहां के मीडियाकर्मियों के शरीर में इतना खून बचा भी है कि वो दान कर सकें ?

एक, दूसरा ये कि चैनल की इतनी साख है कि हम औऱ आप जैसे लोग रक्तदान करेंगे तो वो सही जगह पहुंच पाएगा ? मुझे याद है रॉटरी क्लब जैसा संगठन जिसक कि दुनियाभर में साख है, रक्तदान के समय एक फ्रूटी और एक फल देने के बाद वापस हमें ऐसा कुछ भी नहीं देती जिससे कि प्रामाणित हो सके कि हमने रक्तदान किया है. ऐसे में लाइव इंडिया रक्तदान करनेवालों के साथ क्या करेगा ? कहीं ये खून इसलिए तो नहीं बचा रहा कि आगे उसे पीने की किल्लत न हो जाए ?

आपको नहीं लगता कि मीडिया और चैनलों के बीच इस तरह की चोचलेबाजी इसलिए शुरु हुई है कि क्योंकि वे अपने मूल काम "रिपोर्टिंग और उसका प्रसारण" को या तो बिल्कुल ही महत्व नहीं देते या फिर उनके भीतर दलाली का धंधा इस कदर बढ़ गया है, कार्पोरेट से लेकर सरकार तक उसमें इस तरीके से आकंठ डूबे हैं कि जरुरी मुद्दों पर खबर नहीं कर सकते. ऐसे में चैरिटी के जरिए लोगों के बीच अपनी पकड़ और पहचान बनाए रखना चाहते हैं. ये काम देश में सालों से होता आ रहा है. व्यापारी और सेठ पहले तो जमकर इस देश को लूटते हैं, मुनाफे के लिए तमाम तरह के धत्तकर्म करते हैं और फिर धर्मशाला,प्याउं और मंदिर बनवाते हैं. कार्पोरेट दलाल मीडिया इसी फार्मूले पर काम करने लग गया है.

 एनडीटीवी इंडिया एयरसेल से गंठजोड़ करके बाघ बचा रहा है, टोएटा से हाथ मिलाकर कोस्टल एरिया बचा रहा है, कोक के साथ मिलकर स्कूल का बाथरुम दुरुस्त करने में लगा है और लोगों से मार धुंआधार अपील कर रहा है कि स्कूल जाइए. पहाड़ बचाने में जुटा है ताकि आप भविष्य में उस पर चढ़कर माउंटेन ड्यू पी सकें. खाने के पोषक तत्व को बचा रहा है. कभी किंगफिशर के साथ टाइअप करके एनडीटीवी गुडटाइम चैनल शुरु किया था और तब एनडीटीवी जितना टीवी स्क्रीन पर नहीं दिखता था, उससे कहीं ज्यादा शराब के ठेके  में पड़े गत्ते पर लिखा मिलता था. सीएनएन ग्रुप प्रायोजित रुप से सिटिजन जर्नलिज्म कर रहा है, यंग लीडर का अवार्ड दे रहा है, जीवन बीमा कंपनियों से सांठ-गांठ करके उद्यमियों को पुरस्कार दे रहा है तो इधर आजतक को रह-रहकर देश से भ्रष्टाचार दूर करने का दौरा पड़ता है और बक्सा-पेटी लेकर सड़कों पर उतर आता है. लाफ्टर शो को लंगड़ी मारने के लिए चुटकुला और हास्य कविता के कार्यक्रम करवाता है. वो सबकुछ बचा रहा है, सबकुछ बना रहा है लेकिन न तो खबरों को बचाने में,पत्रकारिता को बचाने में उसकी दिलचस्पी है और न ही मीडिया को. जिस दिन कंपनियों,ठेकेदारों,बिल्डरों के चश्मे से पैसे का सोता फूटना बंद हो जाएगा,सारी चैरिटी खत्म.

 ये सब बस इसलिए क्योंकि इनमें से कुछ मीडिया संस्थानों को अपनी मदर कंपनी के मूल धंधे को बढ़ाना होता है या फिर जिन मीडिया संस्थानों का सिर्फ मीडिया का ही धंधा है,उन्हें रीयल एस्टेट, फाइनाइंस और दूसरे ऐसे क्षेत्र की कंपनियां मिल जाती है कि वो उनसे जुड़े धंधे को लेकर कैम्पेन शुरु करते हैं और बाजार पर उनकी पकड़ बनाने में हद तक मदद करते हैं. ये सब वो अपनी सुविधा,मुनाफे और धंधे को चमकाने के लिए करते हैं. सुनेत्रा चौधरी( एनडीटीवी 24x7) ने इलेक्शन बस 2009 के अनुभव को लेकर किताब लिखी है- A BUS, 2 GIRLS,15 THOUSAND KILOMETRES,715 MILLION VOTES !!!. इसमें संस्मरण की शक्ल में डॉ. प्रणय राय की एक बात शामिल की है- सुनेत्रा, अब हमारा एक फाइव स्टार होट से टाइअप हो गया है और तुम्हें देश के किसी भी हिस्से में जहां-जहां उसकी चेन है, रुकने में दिक्कत नहीं होगी. 

कार्पोरेट,हॉस्पीटल, रियल एस्टेट का ये गठजोड़ इसलिए भी कि मीडिया संस्थानों को हराम की सुविधा मिल सके और बदले में वो उन्हें और उनके प्रोमोशनल इवेंट को खबर की शक्ल में दिखाते रहें. रियल एस्टेट औऱ बिजनेस की अधिकांश खबरें और उन पर पलनेवाले चैनल इसी बिना पर फल-फूल रहे हैं. और ये सारी बातें सिर्फ हम नहीं कह रहे, मीडिया में भ्रष्टाचार के सवाल पर बोलते हुए आज से तीन साल पहले राजदीप सरदेसाई ने खुलेआम कहा था- आप सिर्फ न्यूज चैनलों की बात क्यों कर रहे हैं, मनोरंजन और बिजनेस चैनलों की तरफ भी नजर घुमाइए, आपको पेड न्यूज का नया नजारा दिखेगा..आप कुछ मत कीजिए, चैनलों पर जो विज्ञापन आते हैं, उन्हें ध्यान में रखिए और फिर बिजनेस से जुड़ी खबरें देखिए..आप पाएंगे कि उन कंपनियों के चेयरमैन,सीइओ और डायरेक्टर को इस अंदाज में पेश करते हैं जैसे कि समाज के हीरो वही हैं. राजदीप ने कभी दूरदर्शन और पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग का मजाक उड़ाते हुए और वो भी दूरदर्शन की ही परिचर्चा में कहा था कि जरुरी नहीं कि हर बुलटिन प्रधानमंत्री से ही शुरु हो..सही बात थी लेकिन प्रधानमंत्री को रिप्लेस करके जिनके चेहरे चमकाने का काम मीडिया कर रहा है, उनकी कितना अकाउंटबिलिटी है, कितनी साख है, इस पर भी तो बात होनी चाहिए. आज आप उन्हें हीरो की तरह पेश कर रहे हैं, कल वो कंपनी बंद करके चल देंगे, सैंकड़ों लोग सड़क पर आ जाएंगे, आप उनके बारे में खबरें प्रसारित करेंगे ? आप कहते हैं समाज करप्ट हो रहा है लेकिन इस करप्ट होते समाज के बीच मीडिया किन लोगों को बढ़ावा दे रहा है, कभी गौर करेंगे ? जो चैनल चलाता है, वही फर्जी लेन-देन में जेल चला जाता है औऱ उसका चैनल सरकार और व्यवस्था पर भ्रष्टाचार को लेकर स्टोरी चला रहा है..ये हद नहीं है क्या ?

मुझे यकीन है कि पिछले चार-पांच सालों से मीडिया खबर दिखाने-बताने के धंधे को छोड़कर एक्टिविज्म और चैरिटी में कूद पड़ा है, सरकार इसे गंभीरता से नहीं लेने जा रही है क्योंकि अभी तक सरकार को सीधे-सीधे इससे कोई दिक्कत नहीं है..लेकिन सूचना और प्रसारण मंत्रालय बीच-बीच में ये सवाल उठाती है कि आपको लाइसेंस न्यूज चैनल का मिला है और आप मनोरंजन चैनलों जैसा कार्यक्रम दिखा रहे हैं, ठीक उसी तरह सवाल किए जाने चाहिए कि आपको लाइसेंस खबरों का धंधा करने के लिए मिला है, ये आप चैरिटी का काम क्यों कर रहे हैं ?

अगर किसी ने लाइव इंडिया को केस स्टडी बनाकर वहां हुए और हो रहे मानवाधिकार के उल्लंघन के मामले पर गौर करे तो आपको ये चैनल कम,बूचड़खाना ज्यादा जान पड़ेगा. दर्जनों मीडियाकर्मियों का हक मारा जा रहा है,मारा गया है. जिन शर्तों पर उनसे काम करवाया जाता है, वो बंधुआगिरी से कम बदतर नहीं है. आए दिन असुरक्षा के भाव ने उनके स्वाभिमान को बुरी तरह कुचल दिया है. आप इनसाइड स्टोरी करेंगे तो शायद नाम बताने की शर्त पर वो जुबान खोलें और कहें कि जितने पैसे चैनल इस तरह के भौंडे प्रोमोशन के लिए कर रहा है, उतने पैसे कार्यक्रम बनाने और एचआर पर करे तो चैनल की स्थिति सुधर सकती है.

लाइव इंडिया ने लाखों रुपये देकर दि टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले आधे पन्ने पर समरुद्धा जीवन ग्रुप के सीएमडी महेश मोटेवर की तस्वीर छपवायी है, आप पाठकों से अपील है कि इस तस्वीर को नजर में बसा लें, वो देश में किस-किस तरह के महान और समाज सेवा का काम करते हैं, नजर में रखें..ऐसे ही तारनहार कल को तर्क देंगे कि हमने तो मीडिया के जरिए समाज को बदलने की कोशिश की लेकिन जब हमे इससे करोड़ों का नुकसान होने लगा तो आखिर हम भी कब तक बर्दाश्त करते, मजबूरी में बंद करना पड़ा. पस्त सरकार और जर्जर व्यवस्था के बीच जो थोड़ा भला होगा, इन्हीं चैनलों और मीडिया के बूते और मीडिया का भला तभी तक होगा जब तक उसे धनपशु मिलते रहें इसलिए जरुरी है कि इस देश में पशुओं से कहीं ज्यादा धनपशुओं की सेवा की जाए.
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हीरोईन फिल्म देख ली. मैं भीतर से डरा हुआ हूं कि इस फिल्म के बाद मधुर भंडारकर की हालत रामगोपाल वर्मा जैसी न हो जाए. उनकी तरह ही मधुर की फिल्म से शॉट्स,डायलॉग के होने-न होने के तर्क तेजी से खत्म हो रहे हैं और कहीं वे सिनेमा बनाने के लिए सिनेमा न बनाते रह जाएं. हीरोईन में इसकी शुरुआत हो चुकी है. देखते हुए मुझे बार-बार ग्वायर हॉल हॉस्टल की सब्जियों की ग्रेवी की याद आ रही थी. चाहे मटर पनीर हो, मलाई कोफ्ता,अंडा करी या फिर चिकन या मछली ही क्यों न हो, सबों की ग्रेवी एक ही होती..बस अलग से दो पीस मछली के या कोफ्ता डाल दिए जाते. मधुर भंडारकर ने भी ऐसा ही करना शुरु कर दिया है. 

हीरोईन, फैशन से आगे और अलग नहीं बढ़ पाती है बल्कि कार्पोरेट, फैशन की राइम्स पढ़ती हुई डर्टी पिक्चर में जा धंसती है. कोई बारीकी नहीं, कोई गंभीर रिसर्च नहीं. एक लापरवाह परीक्षार्थी की तरह भंडारकर ने इसे हम दर्शकों के बीच परोस दिया कि हमने तो सारी पढ़ाई पहले ही कर ली है, अब अलग से परीक्षा की तैयारी क्या करनी ? सिनेमा के भीतर सिनेमा बनते हुए "तरन्नुम जान" को लेकर उम्मीद जगी थी कि शायद चमेली से आगे की कोई चीज देख सकेंगे लेकिन उसमें तपन दा को इस टिपिकल तरीके से दिखाया गया कि फिल्म के भीतर फिल्म देख न सके और रिलीज ही नहीं हो सकी. आप कह सकते हैं कि जब कार्पोरेट,फैशन इन्डस्ट्री और वॉलीबुड की लाइफ स्टाइल और उसकी बिडंबना एक सी है तो आखिर कितना नया और अलग दिखेगा ? लेकिन फिर तो इस देश में मजदूर,किसान, निम्न मध्यवर्ग..सबों की स्थिति एक सी ही है तो फिर रोटी,जंजीर से लेकर पीपली लाइव तक दर्जनों फिल्में बनाने की क्या जरुरत है ? 

इन सबके बावजूद इस फिल्म को वॉलीबुड से कहीं ज्यादा "मीडिया की छवि" कैसी बनाई गयी है, इसके लिए देखनी चाहिए..मैंने कभी कथादेश के मीडिया विशेषांक में एक लेख लिखा था- सिनेमा का नया खलनायक मीडिया, ये बात इस फिल्म में मजबूती से दिखाई देती है..सिनेमा के लोग चर्चा में बने रहने के लिए,पब्लिसिटी के लिए मीडिया का इस्तेमाल किस तरह से करते हैं और खुद भी होते हैं,ये अलग से समझने की जरुरत नहीं है लेकिन हिन्दी सिनेमा उसे लगातार एकतरफा ढंग से पोट्रे कर रहा है..रण,शोबिज जैसी फिल्में तो इसकी नकारात्मक छवि को बताने के लिए ही बनी है..बाकी पा,पीपली लाइव जैसी कम से कम दर्जन भर फिल्में हैं जिनमें मीडिया खलनायक की भूमिका में दिखाया-बताया गया है. 

मीडिया के चरित्र खासकर समाचार चैनलों से गहरी असहमति रखने के बावजूद महसूस कर रहा हूं कि अब कुछ ज्यादा हो रहा है..ये एकतरफा हो रहा है और अगर ये आगे भी होता रहा तो संभव है कि कोई "मीडिया पॉजेटिव" को लेकर फिल्म बनाए.

सिंगल स्क्रीन थिएटर या सिनेमाहॉल  में सिनेमा देखना का अपना सुख है. पीवीआर,मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखते वक्त लोग इतने चुप्प रहते हैं मानो स्क्रीन पर कोई फिल्म नहीं चल रही, लाश जल रही हो और दर्शक दाह-संस्कार के लिए जुटे हों. सिंगल स्क्रीन में अधिकांश लोग कुछ न कुछ बोलते हैं..आपको शायद ये शोर लगे लेकिन मैं जब भी बत्रा,अंबा,लिबर्टी जैसे सिनेमाहॉल में फिल्में देखता हूं तो लगता है मैं चारों तरफ हुडदंगिए दर्शकों से नहीं,सिनेमा समीक्षकों से घिरा हूं. सभ्य समाज से आनेवाले दर्शकों को ऐसी टिप्पणी परेशान कर सकती है कि सिर्फ टनाका माल होने से काम नहीं चलता है वेवो, प्यार पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है, बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है..तुम सोचोगी कि एकै साथ अर्जुनवा को भी पटाए रखें और उसको मोहरा बनाके डायरेक्टर को चूतिया बनाकर एक के बाद एक फिलिमो साइन करते रहें तो बाकी पब्लिक चूतिया नहीं है...

लेकिन इन टिप्पणियों से गुजरते हुए आप समझ पाते हैं कि जिन फिल्मों में संवाद और अर्थ तेजी से मर रहे हैं,ध्वस्त हो रहे हैं, उनके बीच ऑडिएंस कैसे संप्रेषण की संभावना खोज पाती है. संभव है कि ऐसी ऑडिएंस निखत,शुभ्रा और राजीव मसंद की रिव्यू पढ़कर सिनेमा देखने नहीं आती और पीवीर की ऑडिएंस की तरह मन ही मन उससे सिनेमा का मिलान करती हो लेकिन "स्टडी विफोर वॉचिंग" के बिना भी वो कदम-दर-कदम टिप्पणी करने से बाज नहीं आती..ये एक किस्म की लाइव समीक्षा होती है और अगर कोई इसी नीयत से मल्टीप्लेक्स,ओडियन,वेव और पीवीआर को छोड़कर टिपिकल सिनेमाहॉल में जाकर इन टिप्पणियों को नोट करे तो बड़ी ही दिलचस्प स्टडी निकलकर सामने आएगी..कोई बॉलकनी,डीसी की अलग से और रीयल स्टॉल,नीचे की अलग-अलग नोट कर सके तो टिकट में महज पच्चीस रुपये की फर्क के बीच कई स्तरों पर फर्क समझ सकता है.

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लप्रेक( लघु प्रेम कथा)

निखिल ! हां नीलिमा. एक बात बता,ये अपने पीएम अंकल हमारी तरह ही हनी सिंह के बिग फैन हैं क्या ?

 क्यों क्या हुआ ? नहीं,वैसे ही पूछ रही हूं,मुझे लगा तो. देख न जबसे उसकी एल्बम "इन्टरनेशनल विलेजर" आयी है न, हम जैसी तो डीजे में बाकी किसी बिट्स पर हिलते तक नहीं और इसी बीच बजा दे कोई "प्यार तेनू करदे गबरु" फिर मजाल है कि हमारे पैरों को थिरकने से कोई रोक दे ? मुझे तो लगता है, अंकल ने हनी सिंह से ही एन्सपायर 
होकर ये एफडीआई वाला बीट शुरु किया न..और देख कैसे विपक्षी पार्टी से लेकर देश की जनता वावली हुई जा रही है.

 तुम उनके प्रतिरोध औऱ असहमति को थिरकना कहोगी नीलिमा ? तुम तो मस्ती में थिरकती हो लेकिन जनता मजबूरी और तकलीफ में विरोध कर रही है..

ओह,तूने मेरे कहने का सही से मतलब समझा नहीं. जैसे अपना हनी सिंह कह रहा है कि विलेजर का मतलब सिर्फ होरी महतो,धनिया,झुनिया और गोबर नहीं होता है..अब विलेजर भी ग्लोबल हो रहा है, इन्टरनेशनल हो रहा है..एफडीआइ से हमारे विलेजर्स ऑब्लिक किसान भी ग्लोबल होंगे..महिन्द्रा की ट्रैक्टर पर चढ़कर "न्यू बैलेंस" जूते पहनकर गीयर दबाएंगे. रोट्टी खाने के पहले हाथ धोएंगे तो ट्यूबल के पास टे हेग्यार की घड़ी खोलकर घड़ी रखेंगे. यार आदिदास( तू कालिदास का भाई न समझ लेना इस कंपनी के मालिक को) की महरून टीशर्ट में जब वो खेतों से मूली उखाड़गे तो कितने क्यूट लगेंगे न वो..और फिर प्यूमा की वॉटल ग्रीन टीशर्ट में वॉलमार्ट के एजेंटों से डील करेंगे. 

निखिल,पता है..अपने किसानों को इस तरह देखकर स्साले वॉल मार्टवाले भी टेंशन में आ जाएंगे..और ये तेरे फ्रेंड वैभव, लक्की, विकास सिंह सेल में खरीदी हुई टीशर्ट पहनकर चौड़े हुए फिरते हैं, अपने को राउडी राठौर समझते हैं, सब ऐंवें, टिल्ली-टिल्ली हो जाएंगे उनके सामने. मैं तो अभी से ही एक्साइटेड हूं खेतों में काम करते वक्त आदिदास, वालमार्ट में प्यूमा की टीशर्ट पहने..आह, हमारे यंग फार्मरस कितने कूल दिखेंगे न ? देखना तब नवाजउद्दीन को भी समझ आ जाएगा कि एक अकेला वही बिचली अड़ान से निकला हीरो नहीं है और एक अकेले अनुराग कश्यप का विजन नहीं है, कई और भी खोज सकते हैं नवाज जैसे हीरो..

ओह नीलिमा, तुम कहां की बात कहां जोड़ने लग जाती है. इतनी सीरियस इश्यू को ऐसे डायल्यूट करोगी ? क्या खेती सिर्फ युवा किसान ही करते हैं, कभी जाकर देखा है तुमने कि कितने बुजुर्ग खून लगाते हैं इसके पीछे. कमऑन निखिल, इसमें गलत क्या है ? क्या तुम नहीं चाहते कि हमारे विलेजर्स प्लस फारमर्स भी हमारी तरह ग्लैमरस दिखें,वही सब पहने और खाएं जो हम पहनते-खाते हैं..तुम तो बड़े इक्वलिटी की बात करते हो फिर यहां क्या एक्सक्लूसिव न रहने का खतरा हो रहा है ? बुजुर्ग होते हैं तो वो आदिदास नहीं फैब इंडिया के कुर्ते पहनेंगे पर दिखेंगे तो चटकीले ही. तुझे याद है डीडी पर गुलजार की तहरीरः मुंशी प्रेमचंद आयी थी. अपना होरी,गोबर,रुपा,झुनिया खादी इंडिया के कपड़ों में कैसे झक्कास दिख रहे थे. अगर गुलजार ने उन्हें फैब इंडिया के कपड़े पहनाए होते तो आय एम डैम श्योर कि कोई यकीन भी नहीं करता कि ये प्रेमचंद के गोदान के कैरेक्टर हैं या फिर अनुराग के गैंग्स ऑफ बासेपुर के. हां,इस बात पर तुम अंकल से शिकात कर सकते हो कि ऐसा करके हम मेट्रो के यंगस्टर्स की फैशन और लाइफ स्टाइल एक्सक्लूसिव नहीं रह जाएगी. जब हमारे विलेजर्स वाल मार्ट से डील करेंगे तो क्या सिर्फ उनसे पैसे ही लेगें, उनकी कल्चर और लाइफ स्टाइल भी तो एडॉप्ट करेंगे न.

 निखिल,कितना अजीब और एक्साइटिंग है न सबकुछ इस देश में. अब तक फारमर्स जो दिन-रात तेज धूप और बारिश में फसलें उगाकर न जाने कितने किलोमीटर जाकर इन्हें बेचते आए हैं, अब वो उस धूप से सीधे एसी में होंगे और ये बीबीए,एमबीए के लाखों स्टूडेंटस एसी कमरों में बिजनेस औऱ धंधे के गुर सीखते हैं वो मुरैना,बक्सर और भटिंडा की धूल-धक्कड भरी सफेद दाग की शिकार सड़कों के किनारे कंपनी की छतरी लगाकर वाइ वन गेट वन, टू थाउजेंड की रिचार्ज पर सिम फ्री और पानी साफ करने की मशीन बेचेंगे..जो हो निखिल, वट एटलिस्ट, आइ वना सी द होल सर्कस ऑफ दिस ग्रेट डेमोक्रेसी..

निखिल,तू भी कुछ बोल न..मैं क्या बोलूं ? कुछ भी..

कुछ भी क्यों नीलिमा, बोलूंगा तो तुम फिर कहोगी कि तू ज्ञान देने लग गया, पर तुम्हें नहीं लग रहा कि तुम कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो की लिखी एक-एक लाइन की इतनी बुरी तरह से मजाक उड़ा रही हो जितनी कि हमारे सहीपंथी यानी राइटिस्ट भी नहीं उड़ाते. तुम्हें कभी होश भी होता है कि तुम रौ में क्या-क्या बोल जाती हो ? तुम्हारे लिए ये सब सर्कस है..

निखिल ! मैं जानती थी तू फिर से शुरु हो जाएगा, स्साला तू कभी सार्केजम समझने के लिए तैयार ही नहीं होता यार..तुझे एक-एक सीरियस टोन में ही चाहिए होती है..हद हो गई यार.


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आज ब्लॉगिंग करते हुए कुल पांच साल हो गए. आज ही के दिन मैंने मेनस्ट्रीम मीडिया की मामूली( सैलरी के लिहाज से) नौकरी छोड़कर अकादमिक दुनिया में पूरी तरह वापस आने का फैसला लिया था. ब्लॉगिंग करते हुए साल-दर-साल गुजरते चले जा रहे हैं लेकिन मैं इस रात को और अगली सुबह को अक्सर याद करता हूं जब हम उस आदिम सपने से बाहर निकलकर कि बड़ा होकर पत्रकार बनना है, आजतक में काम करना है वर्चुअल स्पेस पर कीबोर्डघसीटी करने लग गए.

ब्लॉगिंग के जब भी साल पूरे होते हैं, मैं फ्लैशबैक में चला जाता हूं. मैं अपने पीछे के उन सालों को उसी क्रम में याद करने लग जाता हूं. इतनी जतन और सावधानी से जैसे कि इसके पहले की कोई तारीख या दिन मेरी जिंदगी के लिए कोई खास मायने नहीं रखते. इससे ठीक एक महीने पहले मेरा जन्मदिन आता है और हर बार घसीट-घसाटकर बीत जाता है. पिछले दो बार से तो हॉस्पीटल में और अबकी बार तो इतना खराब कि मैं शायद ही अपने जन्मदिन को याद करना चाहूंगा. दिनभर मयूर विहार के घर को छोड़ने और कचोटने में बीत गया. ये सच है कि हमारी मौत की तारीखें मुकर्रर नहीं होती लेकिन कुछ तारीखें ऐसी जरुर होती है जो अक्सर जिंदगी के आसपास नाचती रहती है और मौत जैसी ही तकलीफ देती रहती है. शायद इन तारीखों में से मेरे जन्मदिन की एक ऐसी ही तारीख है. खैर,

अपने जन्मदिन को लेकर मैं जितना ही शिथिल,बेपरवाह और लगभग उदास रहता हूं, ब्लॉगिंग की तारीख को लेकर उतना ही उत्साहित, संजीदा और तरल. मैं धीरे-धीरे अपने जन्मदिन की तारीख को खिसकाकर 19 सितंबर तक ले आना चाहता हूं ताकि 17 अगस्त के आसपास मौत जैसी तकलीफ नाचनी बंद हो जाए. मुझे अक्सर लगता है कि मेरी असल पैदाईश इसी दिन हुई. जिस विनीत को आप जानते हैं, वो इस तारीख के पहले आपके बीच नहीं था. वो पहले साहित्य का छात्र था, किसी चैनल का ट्रेनी थी, रिसर्चर था, मां का दुलारा बेटा था, पापा का दुत्कारा कुपुत्र था, बिहार-झारखंड छोड़कर हमेशा के लिए दिल्ली में बसने की चाहत लिए एक शख्स था. वो कदम-कदम पर प्रशांत प्रियदर्शी, ललित, गिरीन्द्र, शैलेश भारतवासी जैसे को परेशान करनेवाला ब्लॉगर नहीं था. वो बात/मुद्दे पीछे पोस्ट तान देनेवाला ब्लॉग राइटर नहीं था. मैं कभी-कभी सोचते हुए गहरे हताशा से भर जाता हूं कि मेरी पहचान किस हद तक सीमित है कि अगर मैंने अदना सा ये ब्लॉग शुरु नहीं करता तो जितने लोग मुझे अब जानते हैं, बमुश्किल उनमें से दस फीसद लोग मुझे जान रहे होते. इतना ही नहीं, चाहे जितने भी लोग किसी न किसी रुप में मेरे आसपास हैं उनमें से आधे से ज्यादा लोग ब्लॉगिंग न करने पर नहीं होते. सुख-दुख,छोटी-बड़ी दुनियाभर की न जाने कितनी सारी बातें मैं उनसे साझा करता हूं. लंबे समय तक जीमेल से उनसे चैट होती रही है इसलिए अब वे इस मंच से छूट भी गए हैं तो भी फोन करते हुए रत्तीभर भी ख्याल नहीं आता कि हम जबलपुर फोन कर रहे हैं कि गिरीन्द्र अब पूर्णिया चला गया है कि पीडी जब किस्सा सुनाना शुरु करता है तो कब चेन्नई से उठाकर पटना की जलेबीनुमा सड़कों और उतनी ही घुमावदार यादों की तरफ लेकर चला जाता है. मैं इन सबसे बिना पूछे रिश्तेदारी क्लेम करने लग जाउं तो आज इस देश का कोई भी ऐसा शहर/कस्बा नहीं है जहां कोई दोस्त न मिल जाए. मुझे तो अब देश के किसी भी कोने में जाने में हिचक ही नहीं होती..लगता है, मुसीबत आने पर उस शहर में ब्लॉगर तो होगा. हम इस अर्थ में अतिजातिवादी हो गए हैं और ब्लॉग नाम की जाति की तलाश और उम्मीद से पूरे देश में भटकते रहते हैं. अब तो फेसबुक ने पहले से भी ज्यादा मामले को आसान कर दिया है.

पिछले पांच साल की तरफ पलटकर देखता हूं तो लगता है इसी ब्लॉगिंग ने मेरे भीतर कितना साहस, कितने सारे जिद्दी धुन भर दिए हैं. सोचिए न, संत जेवियर्स कॉलेज,रांची के स्कूल जैसी सख्ती भरे माहौल से निकलकर आया ग्रेजुएट, हिन्दू कॉलेज दिल्ली में आकर सबकुछ नए सिरे से समझने की कोशिश करता है. बनने से पहले उसके भीतर की कई सारी चीजें टूटती है, चटकती है..इसी जद्दोजहद में कब पैसे कमाने की जरुरत होने लगी,पता तक नहीं चला. ये वो समय था जब जोड़-तोड़,चेला-चमचई, अग्गा-पिच्छा को आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता बताया जा रहा था. हम एक बेहतर लेखक,पत्रकार,रिसर्चर बनने के सपने लेकर,ट्रेनिंग लेकर तैयार हुए थे और अब हमें बने रहने और सफल होने के लिए निहायत अव्वल दर्जे का हरामी,कमीना, चाटुकार,सेटर बनना था. ऐसे में मुझे गहरी उदासी के बीच भी अपने ब्लॉग पर बेइतहां प्यार उमड़ता है- हुंकारः हां जी सर कल्चर के खिलाफ.

कभी-कभी तो मैं सोचकर कांप जाता हूं कि अगर मैंने ब्लॉगिंग न की होती तो देश-दुनिया और समाज को देखने का तरीका मेरा कितना अलग होता. अलग अभी जिस तरह से देख पा रहा हूं, उससे . नहीं तो जमाने के हिसाब से तो अधिकांश लोगों की तरह ही होता. हम हर शख्स को अकादमिक चश्में में कैद करके देखते- वो ब्राह्मण है, वो राजपूत है, वो भूमिहार है, ओबीसी है,दलित है. उसकी गर्लफ्रैंड एससी है, जान-बूझकर पटाया है कि कोई नहीं तो कम से कम एक की तो नौकरी पक्की हो जाए. उसका गाइड यूपी का है, बनारस-बनारस कार्ड खेला है. वो हरियाणा का है, वो जाट है, ये लड़की ओबीसी है..ब्ला,ब्ला. इस अकदामिक चश्मे से जो कि जाहिर तौर पर तमाम तरह के वैचारिक खुलेपन और देरिदा,फूको,ल्योतार की किताबों को सेल्फ में सजा लेने और वैल्यू लोडेड वर्ड्स के बीच-बीच में झोंकते रहने के बावजूद अलग से कुछ समझ नहीं आता. पूर्ववर्ती साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों के डिब्बाबंद विचार बस क्लासरुम और आगे चलकर उत्तर-पुस्तिकाओं/थीसिस तक में जाकर सिमट जाती है, मुझे लगता है इस ब्लॉग ने ही मुझे लोगों को,चीजों को इस चश्मे से देखने से मना कर दिया. इसे ऐसे कह लें कि अकादमिक दुनिया की वो बारीकी मेरे भीतर पैदा ही नहीं होने दी जिसमें इस तरह के भेदभाव को बरतते हुए भी ज्ञान की बदौलत प्रगतिशील होने के कला सीख-समझ सकें. ब्लॉगिंग ने एक ही साथ हमें साहसी और ठस्स बना दिया.

साहसी इस अर्थ में कि जब हम अपनी लैपटॉप पर घुप्प अंधेरे में बैठकर किसी भी मठाधीश पर लिख रहे होते हैं तो दिमाग में रत्तीभर भी ख्याल नहीं आता कि वो मेरा किस हद तक नुकसान करेंगे ? बस एक किस्म का इत्मिनान होता है कि इस कमरे तक किसी की पहुंच नहीं है और अगर हो भी तो तब तक हम अपनी बात तो कह लेंगे. दुनिया की व्यावहारिकता से पूरी तरह निस्संग तो नहीं लेकिन हां एक हद तक इसने हमें पूरी तरह उसमें लिथड़ने से बचा लिया..आज हम ब्लॉगिंग करते हुए अच्छा चाहे खराब जो कि बहुत ही सब्जेक्टिव मामला है, वो हो पाए जो कि खालिस रिसर्चर होते हुए शायद कभी नहीं हो पाते..इसने हमारे भीतर वो अकूत ताकत पैदा की है कि हम किसी भी घटना और व्यक्ति के प्रति असहमत होने की स्थिति में लिख सकते हैं, प्रतिरोध जाहिर कर सकते हैं. निराला, बाबा नागार्जुन, मुक्तिबोध, प्रेमचंद, रेणू जैसे  अपने पुराने साहित्यकारों में अस्वीकार का जो साहस रहा है, अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का जो माद्दा रहा है, वो उनकी रचनाओं के पढ़ने के बाद क्लासरुम और अकादमिक दुनिया से नहीं, इसी ब्लॉगिंग से थोड़ा-बहुत ही सही अपने भीतर संरक्षित रह पाया.

और ठस्स इस अर्थ में कि इसने मेरे भीतर वो कभी कलात्मक बोध पैदा नहीं होने दिया जिसका इस्तेमाल हम भाषिक सौन्दर्य विधान पैदा करने के बजाय उस झीने पर्दे की तरह करते जो हमें स्टैंड राइटिंग के बजाय मैनेज्ड राइटिंग की तरफ ले जाता. हम सिर्फ उन्हीं रचनाओं,लेखकों और मूर्धन्यों के बारे में लिखते जो हमारी जेब की सेहत और बौद्धिक छवि दुरुस्त करने के काम आते. मतलब हम चूजी राइटर होने से बच गए और इससे हुआ ये कि हमारे हिस्से कई ऐसे मुद्दे,कई ऐसे लोग आ गए जो मेनस्ट्रीम मीडिया की डस्टबिन में फेक दिए गए थे, जो अकामदिक दुनिया में सिरमौर करार दे दिए गए थे, जो मीडिया में मसीहा नाम से समादृत थे. हमने लेखन के नाम पर ठिठई ज्यादा की है और ये सब बस इसलिए कि ब्लॉग नाम की एक चीज हमारे पास थी और जिसके उपर किसी की सत्ता नहीं थी. ये अलग बात है कि अब इस विधा में भी एक से एक लड़भक और लड़चट लोग आ गए हैं. मैं तो अपने उन पुराने ब्लॉगर साथियों को याद करता हूं जो अपनी भाषिक खूबसूरती के साथ ऐसी धज्जियां उड़ाते थे कि पायजामे का सिला बुश्शर्ट तक को पता न चले. हम इस अकेले ब्लॉग की बदौलत( आर्थिक रुप से जेआरएफ की बदौलत) लंबे समय तक सिस्टम का कल-पुर्जा,चेला-चपाटी बनने से बचते रहे. नहीं तो हम कभी ब्लॉगर नहीं, चम्पू या फिर जमाने पहले ही एस्सिटेंट/ एसोशिएट पदनाम से सुशोभित हो गए होते.

कई बार कुछ घटनाएं,कुछ प्रसंग बहुत ही ज्यादा मन को कचोटती है. लगता है किससे कहें. मोबाइल की टच स्क्रीन पर उंगलियां सरकने लग जाती है. फिर हम उसे साइड कर देते हैं जैसे कि किसी पर यकीन न हो और फिर एक नई पोस्ट लिख देते हैं. कौन ऐसा पात्र खोजने जाए जो ठीक-ठीक मेरी मनःस्थिति को समझ सकेगा,लाओ यहीं उतार दो. आप जो मुझे लगातर पढ़ते हैं न, कई बार वो मेरे मन की कबाड़ है, उचाट मन को उचटने न देने की कवायद. उसमें न तो रिपोर्टिंग है, न खबर है, न कथा है और न ही साहित्यिकता. उसमें वो सब है,जिससे हम छूटना चाहते हैं, जिसके छूटते जाने पर भारी तकलीफ होती है.

अपने इस ब्लॉग के एक कोने में अक्सर मेरी मां होती है. न्यूज बुलेटिन की तरह खेल,राजनीति,मनोरंजन की तरह एक अनिवार्य सेग्मेंट. वो मां जो अक्सर मजाक में कहा करती है- तुमको पैदा तो किए लेकिन चीन्हें( पहचानना) बहुत बाद में. वो इसके जरिए मुझे रोज चीन्ह रही है. जमशेदपुर के चार कमरे की फ्लैट में, बालकनी में बैठकर गुजरती बकरियों,गाड़ियों और डॉगिज को देखते हुए. प्रभात खबर,हिन्दुस्तान,जागरण में छपी मेरी पोस्टों से गुजरते हुए. मुझे लगता है कि अगर मैं ब्लॉगिंग नहीं कर रहा होता तो मां के इस कोने को कहां व्यक्त कर पाता. कौन माई का लाल मेरी इस "बिसूरन कथा" को छापता. बचपन की मेरी उन फटीचर यादों को अपने अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पर जगह देता.

हम सबके बीच साग-सब्जी-दूध-फल-गाड़ी-मोटर के बाजारों के बीच अफवाहों का भी एक बड़ा बाजार है. ये बाजार बिना किसी ईंधन के अफवाहों से गर्म रहता है. इसी बाजार में अक्सर अटकलें लगती हैं. इन्हीं में  ये अटकल अक्सर लगती रही है- ये कुछ दिन का खेल है, देखिएगा लाइफ सेट होते ही ब्लॉग-स्लॉग सब छोड़ देगा. अरे देख नहीं रहे हैं, जनसत्ता,तहलका में लिखने और चैनल पर आने के बाद से कितना कम हो गया है लिखना ? बनने दिए एस्सिटेंट प्रोफेसर, सब ब्लॉगिंग पर बरफ जम जाएगा. इन अटकलों का हम क्या कर सकते हैं ? वैसे भी अफवाहें और अटकलें जब तक जिंदा रहे, उसी शक्ल में जिंदा रहे तो अच्छा है. उनका रुपांतरण घातक ही है..लेकिन

इतना तो जरुर है कि हम ब्लॉगिंग तो तभी छोड़ सकते हैं न जब मीडिया में किसी घटना से गुजरने के बाद उबाल आने बंद हो जाएं. आसपास की चीजों के चटकने के बाद भीतर से कुछ रिसने का एहसास खत्म हो जाए. मां के फोन पर यादों की गलियों में गुम होने बंद हो जाए..जब तक ये होते रहेंगे, आखिर विचारों के कबाड़ और कचोट को कहां रखेंगे. यहीं न. ऐसे में तो हम बस इतना ही कह सकते हैं न कि हमारी निरंतरता भले ही टूटती-अटकती रहे लेकिन तासीर बनी रहे, मैं अपनी कोशिश तो बस इतनी ही कर सकता हूं और अटकलों के बाजार के बीच आप मेरे लिए यही कामना कर सकते हैं, बाकी का क्या है ?

मेरे इस ब्लॉग में और ब्लॉगिंग करते हुए कई संबंध दर्ज है, कईयों से जुड़ने के संबंध और कईयों से जुड़कर अलग होने के संदर्भ. कुछ हमारे रोज के टिप्पणीकार हुआ करते थे, अब वे भूले-बिसरे गीत की तरह बनकर रह गए हैं. कुछ हमारे लेखन के बीच अचानक से संदर्भहीन हो गए हैं. अगर किसी रात मैं उन तमाम पुरानी पोस्टों को एक-एक करके पढ़ना शुरु करुं तो ऐसा लगेगा कि हम किसी कस्बे से गुजर रहे हैं जहां कभी हमारी गली हुआ करती थी, अब वो किसी का मकान हो गया है. जिसके साथ कभी हम अक्सर लुकाछिपी खेला करते थे वो हमारी पकड़ से छूट गए हैं. ये इतिहास जैसा प्रामाणिक न होते हुए भी, उससे कम दिलचस्प नहीं है. देर रात उन सबको याद करना कभी पागलपन लगता है और कभी हाथ गर्दन की तरफ बढ़ते हैं कि कोई दुपट्टा रखा होगा कि हम भभका मारकर रोने से पहले ही उसे अपने मुंह में ठूंस लें. संभावनाओं का ऐसा एल्बम सच में कितना दिलचस्प है न. !
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