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ये मीडिया में करप्शन के उजागर होने और बड़े-बड़े आयकन के ध्वस्त हो जाने का दौर चल रहा है। इस कड़ी में अब प्रसार भारती के सीइओ बीएस लाली भी शामिल हो गए हैं। बीएस लाली पर आरोप है कि उन्होंने निजी प्रसारण कपंनियों को फायदा पहुंचाने का काम किया है जिससे प्रसार भारती को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है। प्रसार भारती के भीतर उनकी मनमर्जी इस तरह से बनी रही कि उन्होंने प्रावधानों को ताक पर रखकर निजी स्पोर्ट्स चैनलों से सांठ-गांठ कर उन्हें फायदा पहुंचाया है। बीएस लाली का कोई एक कारनामा नहीं है जिसे कि बताया जाए,उनके कार्यकाल में दबंगई की लंबी सूची है जिसे देखकर हैरानी होती है कि सरकार ने अब जाकर क्यों कारवायी करने का मन बनाया है? यह काम बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। पहले राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की तरफ से बीएस लाली के खिलाफ जांच करने की सिग्नल मिलने के बाद शुक्रवार को सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी की तरफ से भी हरी झंडी दिखा दी गयी है। दो-तीन दिनों में ही साफ हो जाएगा कि लाली का निलंबन होना है कि नहीं। उसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में जाएगा।

 पब्लिक ब्राडकास्टिंग में पैसे के हेर-फेर को लेकर एनडीटीवी( प्रणय राय) के बाद ये दूसरा मौका है जब मामला कोर्ट तक जाने की स्थिति तक पहुंच गया है। एक प्रोडक्शन हाउस के तौर पर जब NDTV  दि वर्ल्ड दिस वीक बनाया करता औऱ लाइसेंस फीस देकर प्रसारित करता,उस दौरान भी पब्लिक ब्राडकास्टिंग के तौर पर दूरदर्शन को 47.8 मिलियन रुपये का नुकसान हुआ था और इसी तरह फायदा पहुंचाने का मामला बना था। तब दूरदर्शन के भीतर गठित कमेटी ने पूरे मामले को सीबीआई जांच के लिए सौंपने की बात की थी। तब जांच एजेंसी ने 9 जनवरी 1998 को दूरदर्शन के कुछ अधिकारियों औऱ प्रणय राय के खिलाफ मामला दर्ज करायी थी।( 43 वां रिपोर्ट, पब्लिक अकाउंटस कमेटी(2002-03), नई दिल्ली,लोकसभा सचिवालय,मार्च 2003 पे.-1-2)  बीएस लाली का दावा है कि वो सुप्रीम कोट में अपने को दूध का धुला साबित कर पाएंगे क्योंकि जो कुछ भी आरोप लगाए गए हैं,वो सबके सब कुछ बाहरी प्रभावी ताकतों की ओर से लगाए गए हैं।

अखबारी रिपोर्टों और प्रसार भारती से जुड़े लोगों की मानें तो बीएस लाली की पहचान शुरु से ही एक निरंकुश सीइओ के तौर पर रही है। प्रसार भारती को हमेशा अपने इशारे पर न केवल नचाने की कोशिश की है बल्कि जब जैसा मौका मिला निजी कंपनियों,चैनलों को फायदा पहुंचाने के फेर में उटपटांग और पब्लिक ब्राडकास्टिंग को नुकसान पहुंचानेवाले फैसले लिए हैं। अभी हाल ही में प्रसार भारती और आकाशवाणी ने 1 नबम्वर से सबसे लोकप्रिय एफएम गोल्ड की फ्रीक्वेंसी आनन-फानन में बदलने के फैसले लिए गए तो इस फैसले से अपना पल्ला झाड़ते हुए लाली ने कहा कि उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है। प्रसार भारती बोर्ड की अध्यक्ष मृणाल पांडे ने तो यहां तक कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी मीडिया के जरिए हुई। बाद में मेनस्ट्रीम मीडिया में इस बात का विरोध किए जाने के बाद एफएम गोल्ड की फ्रीक्वेंसी वहीं बनी रहने दी गयी लेकिन ऐसा करके एक बहुत बड़े स्तर पर हेरा-फेरी का होनेवाले धंधे पर पर्दा डालने का काम किया गया। दरअसल ये फ्रीक्वेंसी बीएजी फिल्मस के रेडियो चैनल रेडियो धमाल को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा था।
इसके साथ ही जिस फ्रीक्वेंसी 100.1 पर एफएम गोल्ड को शिफ्ट किया जा रहा था वो दरअसल राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े प्रसारण के लिए खोला गया था। फ्रीक्वेंसी बदलते समय तर्क दिया गया था कि ये ज्यादा बेहतर फ्रीक्वेंसी है लेकिन 6 नबम्वर को इस चैनल को बंद कर दिया गया। प्रसार भारती और आकाशवाणी से जुड़े लोगों के मुताबिक इस चैनल को खोलने में लाखों रुपये खर्च किए गए और इसके लिए मुंबई से कुछ चहेते लोग महीने भर तक होटल में आकर मौज करते रहे। आगे प्रसार भारती की तरफ से इस चैनल के बंद किए जाने को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं आया।

जिस राष्ट्रमंडल खेलों में करोड़ों रुपये के घोटाले की बात की जा रही है,उसमें अगर प्रसारण और प्रसार भारती के भीतर हुई दलाली और गड़बड़ियों को शामिल किया जाए तो बहुत संभव है कि उसमें बीएस लाली का भी नाम शामिल हो। वैसे भी लाली ने राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के निर्देशों को ताक पर रखते हुए अपनी चहेती कंपनी सिस लाइव को 246 करोड़ रुपये का प्रसारण अधिकार देने का काम किया है। राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान जिस मनमानी तरीके से कार्यक्रमों के बीच विज्ञापन ठूंसे गए और प्रति 10 सेकंड के विज्ञापन की कीमत को 60 हजार से ढाई लाख तक ले जाने का काम किया,लाली और प्रसार भारती के सामने इस बात का तर्क नहीं है कि 100 से 200 करोड़ तक की कमाई का दावा करने के बावजूद अगर 58.19 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ तो टार्गेट से आधी से भी कम और ओवरलोडेड विज्ञापनों के पीछे की क्या वजह रही है?

प्रसार भारती पर कॉन्ट्रेक्ट के स्तर पर काम कराए जाने और निजी कंपनियों के साथ समझौते कराने के मामले में भी लगातार आरोप लगते रहे हैं। स्पोर्ट्स चैनल इएसपीएन को फायदा पहुंचाने के लिए और इक्सक्लूसिव कवरेज के लिए दूरदर्शन ने अधिकार रहते हुए भी T-20 का प्रसारण नहीं किया। इसके अलावे लाली ने वकीलों को वाजिव रेट से कहीं ज्यादा भुगतान कराने का काम किया है। सेवंती निनन ने अपने लेख MEDIA MATTERS: CAN BE AFFORD PRASAR BHARTI? में इन सारी घटनाओं की विस्तार से चर्चा की है और नोट लगाकर यह भी लिखा कि जब इस मामले में बीएस लाली से बाचतीत करने की कोशिश की तो उन्होंने कोई रिस्पांस नहीं दिया। बीएस लाली के निरंकुश होने के किस्से कापरनिकस मार्ग,मंडी हाउस और संसद मार्ग आकाशवाणी में चाय पीते हुए लोग रोजमर्रा की रुटीन के तहत किया करते हैं।

मौजूदा दौर में मीडिया के भीतर एक के बाद एक आयकन और मिथक तेजी से जिस तरह ध्वस्त हो रहे हैं,ऐसे में पब्लिक ब्राडकास्टिंग से जुड़े सबसे बड़े अधिकारी पर पैसे के हेर-फेर और अपने पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगना,कहीं से भी किसी तरह उम्मीद के नहीं बचे रहने की कहानी कहता है। अभी प्रणय राय और एनडीटी के महान होने का मिथक टूटा है, बरखा दत्त और वीर सांघवी सवालों के घेरे में हैं,राजदीप सरदेसाई के मीडिया के पक्ष में दिए गए सारे तर्क बंडलबाजी से ज्यादा कुछ नहीं लगता,ऐसे में पब्लिक ब्राडकास्टिंग के भीतर की सडांध का उघड़कर  आना मीडिया की सबसे बदतक स्थिति को सामने लाकर रख देता है। लेकिन इन सबके बीच जरुरी सवाल है कि क्या बीएस लाली पर होनेवाली कारवायी बलि का बकरा बनाए जाने या फिर एक को निबटाओ,बाकी मामला अपने आप शांत हो जाएगा कि रणनीति है या फिर प्रसार भारती और आकाशवाणी के भीतर और भी कई मगरमच्छ तैर रहे हैं जिनका बेनकाब होना जरुरी है।
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ICICI की मिलीभगत से कौडि़यों के शेयर सैकड़ों में बेचे, देश के बाहर हुआ सारा खेल
♦ विनीत कुमार
2G
स्पेक्ट्रम मामले में अपनी तेज तर्रार पत्रकार पर आरोपों के छींटे पड़ने से जो सदमा एनडीटीवी प्रबंधन को लगा था, उससे उबरने की सूरत तलाशी ही जा रही थी कि करोड़ों रुपये की जालसाजी के आरोपों ने प्रबंधन को नये सिरे से सकते में डाल दिया है। द संडे गार्जियन नाम के अखबार की साइट ने, जिसे कि इसी साल के जनवरी महीने (31 जनवरी 2010) में 3 रुपये की कीमत के साथ एमजे अकबर ने लांच किया, खबर दी है कि एनडीटीवी ने इस देश को करोड़ों रुपये का चूना लगाने का काम किया है। द संडे गार्जियन इस खबर को लगातार फॉलो कर रहा है और 6 दिसंबर तक इसकी ऑफिशियल साइट ने कुल तीन रिपोर्टें प्रकाशित की हैं। पहली बार 4 दिसंबर को साइट ने NDTV-ICICI loan chicanery saved Roys नाम से पहली रिपोर्ट प्रकाशित की और उसमें बताया कि कैसे उसे ICICI बैंक ने गलत तरीके से कर्ज दिये। इस खबर में ये भी बताया कि किस तरह से मनोरंजन चैनल (GEC) एनडीटीवी इमैजिन, जिसे कि अब TURNER GENERAL ENTERTAINMENT NETWORKS INDIA PRIVATE LIMITED के हाथों बेच दिया गया है, उसके शेयर की फेस वैल्यू यानी बाजार मूल्य 10 रुपये थे, उसे 776 रुपये में बेचे गये और ये सारा खेल देश के बाहर हुआ। भारत में जो निवेशक थे, जो कि यहां की कंपनी में थे, उन तक ये लाभ नहीं पहुंचा। रिपोर्ट ने बताया कि एनडीटीवी लगातार विदेशों में शेयरों की खरीद-बिक्री, कर्ज लेने का काम करता रहा है और ऐसी दरों पर शेयरों की खरीद-बिक्री की है, जिसका कि वास्तविक मूल्य से कोई तालमेल नहीं रहा है। इधर भारतीय बाजार में देखें, तो एनडीटीवी के शेयर लगातार तेजी से लुढ़कते रहे हैं। जाहिर सी बात है कि एनडीटीवी के जिंदा रहने के पीछे मूल रूप से विदेशों से हो रहे शेयरों की खरीद-बिक्री और लेन-देन रहे हैं।
ICICI बैंक से गलत तरीके से कर्ज लेने के मामले में रिपोर्ट में कहा गया है कि ये डील जुलाई और अक्टूबर 2008 के बीच हुई, जब एनडीटीवी ने अपने शेयर वापस खरीदने चाहे। तब एनडीटीवी के शेयर की कीमत 439 यानी वूम पर थी और उसे लग रहा था कि इसकी कीमत और बढ़ सकती है। लिहाजा एनडीटीवी ने चाहा कि वो अपने शेयर वापस खरीदे लेकिन उसके पास लिक्विड फंड नहीं था। तब उसने कुल 90,70,297 शेयर के बदले India Bulls Financial Services से 363 करोड़ रुपये उधार लिये। ये जुलाई 2008 की बात है। अगस्त 2008 में शेयर मार्केट बुरी तरह कोलैप्स कर गया। अमेरिका की वजह से पूरी दुनिया में शेयर बाजार की मिट्टी पलीद हो गयी। ऐसे में इंडिया बुल्स के पास गिरवी के तौर पर जो शेयर रखे गये थे, उसकी कीमत गिरकर 100 रुपये प्रति शेयर हो गया। इंडिया बुल्स ने अपने दिये हुए लोन की बात दोहरायी और कंपनी से पैसे की मांग की। एनडीटीवी के पास इतने पैसे कहां थे, जो कि वो इंडिया बुल को चुका पाता। लिहाजा उसने ICICI बैंक का हाथ थामा और बैंक ने अक्टूबर महीने में कुल 375 करोड़ रुपये एनडीटीवी को दिये। बदले में एनडीटीवी ने कुल 47,41,721 शेयर बैंक के पास गिरवी के तौर पर रखे, जिसकी औसत कीमत 439 रुपये लगायी गयी, जो कि लगभग 208 करोड़ रुपये होती है।
ये पहली बार था कि इस तरह से लगभग आधी रकम के शेयर के बदले इतनी रकम लोन के तौर पर दी गयी। द संडे गार्जियन का कहना है कि इसे वित्तीय जालसाजी न कहा जाए, तो और क्या कहा जाए। इतना ही नहीं, जिस समय एक शेयर की कीमत 439 रुपये लगायी गयी, उस समय (23 अक्टूबर 2008) बाजारू कीमत मात्र 99 रुपये थी। इस तरह शेयर की राशि बनती थी मात्र 46.94 करोड़ रुपये। इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्‍प पहलू है कि एनडीटीवी के जो भी शेयर इंडिया बुल्स को दिये गये, फिर बाद में ICICI बैंक को दिये गये, वो सबके सब RRPR Holding Private Limited के जिम्मे थे। ये वही कंपनी थी, जिसमें बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में दो ही लोग थे – मिस्टर रॉय और मिसेज रॉय। जुलाई 2008 के पहले इस कंपनी ने एनडीटीवी के एक भी शेयर नहीं खरीदे। मामले में एक और दिलचस्प पहलू है कि इंडिया बुल्स के भुगतान किये जाने के बाद RRRR के एक बोर्ड डायरेक्टर को 73.91 करोड़ रुपये बिना किसी ब्याज के लोन दिये गये। ये वही पैसे थे, जो ICICI बैंक से कर्ज के तौर पर लिये गये और जो SARFAESI Act 2002 का सीधा-सीधा उल्लंघन था।
इस मामले में चौंकानेवाली बात है कि मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को इन सारी सूचनाओं की जानकारी मिलती रही, लेकिन वे चुप रहे। एक बड़ा सवाल है कि बैंक ने इतनी आसानी से क्यों कर्ज दे दिया? द संडे गार्जियन का कहना है कि जब पिछले ही महीने 2000 करोड़ रुपये के लोन घोटाले में सीबीआई ने LIC और दूसरे बैंकों के आठ सीनियर मैनेजरों को गिरफ्तार किया, तो फिर क्या ये मामला उससे अलग है?
द संडे गार्जियन ने अपनी दूसरी रिपोर्ट जो कि 5 दिसंबर को प्रकाशित हुई है – NDTV juggles funds, shares abroad, avoids tax, उसमें बताया है कि NDTV किस तरह से फंड को लेकर चालबाजी करता आया है, विदेशों में शेयरों के लेन-देन करके भारत में अपने को टैक्स से बचाता है। इस रिपोर्ट में साइट ने एनडीटीवी के एक के बाद एक चैनल के खोलने और फिर उसके धड़ाधड़ हिस्सेदारी बेचने के पीछे की कहानी को विस्तार से बताया है। अपने विदेशी सहायक चैनलों और वेंचरों के माध्यम से कैसे उसने भारतीय टैक्स और कार्पोरेट कानून का उल्लंघन किया है, इसकी पूरी कहानी रिपोर्ट में दी गयी है? नवंबर 2006 में NDTV Network Plc, UK को स्थापित किया गया, जिसकी बैलेंस शीट भारत में फाइल नहीं की गयी। इस कंपनी ने बहुत पैसे अर्जित किये और NDTV Imagine (जो कि अब बिक गया), NDTV Lifestyle, NDTV Labs, NDTV Convergence और NGEN Media में बहुत पैसे लगाये भी। अधिकांश डील एनडीटीवी के नाम से हुए लेकिन एक भी पैसा भारत में टैक्स के तौर पर नहीं आया। एनडीटीवी इंडिया ग्रुप ने अप्रैल 2008 के दौरान 804.6 करोड़ रुपये उगाहे, जो कि सितंबर 2009 तक आते-आते 982.2 करोड़ रुपये हो गये। एनडीटीवी ने ये पैसे अपने विदेशी स्रोतों से अर्जित किये, जो कि यूके और नीदरलैंड में उसके सहयोगी चैनलों और वेंचरों की बदौलत आये थे। इस तरह भारत में एनडीटीवी के साथ इसकी बैलेंस शीट नहीं अटैच की गयी, तो दूसरी तरफ विदेशों में जो इसके सहयोगी वेंचर हुए, उसमें विस्तार से सब कुछ नहीं बताया गया। यहां तक कि यूके NDTV Network Plc में जो कंपनी खोली गयी, उसका अपना कोई कर्मचारी भी नहीं था। जो था वो एक ही साथ कई कंपनियों का भी काम संभालता था। एनडीटीवी ने नीदरलैंड में वेंचर मजबूत करने के लिए यूके के वेंचर का इस्तेमाल किया। यूके के वेंचर को मजबूती देने के लिए नीदरलैंड के वेंचर का इस्तेमाल किया और इस तरह एक-दूसरे के सपोर्ट से काम चलता रहा। लेकिन भारत में जो इसकी बैलेंस शीट थी, उसमें यह सब दर्ज नहीं था जबकि देखा जाए तो ये भारत की एनडीटीवी के ही सहयोगी वेंचर थे। इनमें से कइयों की साइट खोलने पर डीटेल के बजाय यही आता कि यह भारत की एनडीटीवी की सहयोगी कंपनियां हैं।
रिपोर्ट ने विस्तार से बताया कि कैसे देश के बाहर इसके वेंचर को मजबूती मिलती रही, जबकि यहां इसके शेयरधारकों को इसका कोई लाभ नहीं मिला क्योंकि जिस वेंचर को लाभ पहुंचते, उसका यहां जिक्र नहीं होता।
चार दिसंबर को ही साइट ने NDTV CEO gives reply, Guardian responds शीर्षक से एक और रिपोर्ट छापी है, जिसमें कि उसने एनडीटीवी से एक बेहतर पत्रकारिता की संभावना बनी रहे, इसलिए नौ सवालों के जवाब मांगे गये। एनडीटीवी के सीईओ ने द संडे गार्जियन की इस खबर को निराधार और फर्जी करार दिया और साथ में यह भी कहा कि पब्लिकेशन और व्यक्तिगत स्तर पर सिविल और क्रिमिनल दोनों कानूनों के तहत अदालती कार्रवाई की जाएगी। साइट ने एनडीटीवी के सीईओ केएल नारायण राव के जवाब को भी प्रकाशित किया है और उसके आगे लिखा है कि उन्होंने गोलमोल तरीके से जवाब दिया है।
30 नवंबर 2010 को जब बरखा दत्त NDTV 24X7 के कठघरे में एडिटर्स के सवालों के जवाब दे रही थीं, तो एंकर सोनिया सिंह ने कहा था कि संभव हो ये पूरा मामला कार्पोरेट वार का हिस्सा हो। वर्चुअल स्पेस पर जनतंत्र डॉट कॉम ने भी इसे इसी तरह से विस्तार देने की कोशिश की है और मीडिया के लोगों के नाम आने को बहुत ही छोटा खेल बताया जा रहा है। उसमें इस बात की आशंका जतायी गयी है कि संभव है कि ओपन और आउटलुक जैसी पत्रिका भी सत्ता की दलाली के लिए ये सब कर रहे हों, इस सवाल में एक सच्चाई यहां आकर जुड़ती है कि क्या द संडे गार्जियन भी कुछ ऐसा ही कर रहा है? जनवरी में शुरू हुए इस अखबार ने एनडीटीवी के 2007-08 की डील और बिजनेस का ब्योरा अब जाकर देते हुए सारी बातें सामने लायी हैं। बैलेंस शीट भी प्रकाशित किया है। अगर ऐसा है, तो कार्पोरेट वार के साथ-साथ मीडिया वार भी शुरू हो चुका है।
एमजे अकबर इन दिनों इंडिया टुडे ग्रुप में हैं। इससे पहले महीने भर के लिए इंडिया न्यूज को सेवा देकर आये हैं। प्रेस क्लब में राजदीप सरदेसाई, द संडे इंडियन में अरिंदम चौधरी के आरोपी पत्रकारों के बचाव में उतर आने और नीरा राडिया से पत्रकारों की बातचीत के टेप आने के करीब तीन सप्ताह बाद दैनिक भास्कर में 6 दिसंबर को दो पन्ने में एक्सक्लूसिव खबर छपने की घटना से अंदाजा लगाना चाहिए कि अब मीडिया वार शुरू हो गया है। ये मीडिया वार अब खबरों की दुनिया से आगे निकलकर एक-दूसरे को पूरी तरह तहस-नहस कर देने की नीयत से शुरू हुआ है। इसके पीछे की लीला शायद यह भी हो कि ऐसी स्थिति कर दी जाए कि इस देश में बिग पिक्चर, बिग सिनेमा, बिग टीवी के साथ-साथ सिर्फ बिग मीडिया रहे, बिग खबरें रहे, दूसरा कोई नहीं। इन सबों पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है। हालांकि द संडे गार्जियन की इस खबर पर कई ऐसे कमेंट आये हैं, जो इस खबर को बकवास बताते हैं लेकिन अगर ये खबर सच है तो समझिए कि हमारे सामने कितना बड़ा आदर्श ध्वस्त होता नजर आ रहा है?
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मीडिया इन्डस्ट्री में सबसे कमजोर,लाचार और निरीह कोई है तो वो हैं राजदीप सरदेसाई। आपको जानकर ये हैरानी होगी कि सैलरी,शख्सीयत और शोहरत के लिहाज से जिस टेलीविजन पत्रकार को सबसे मजबूत माना जाता है,लोगों के बीच इसी तरह की इमेज है,वो अपने को पिछले एक साल से सबसे मजबूर और लाचार बताता आ रहा है। मौका चाहे जगह-जगह मीडिया सेमिनार के नाम पर स्यापा करने और छाती कूटने का हो या फिर 2G स्पेक्ट्रम घोटाले मामले में दिग्गज मीडियाकर्मियों के नाम आने पर मीडिया की साख मिट्टी में मिल जाने पर सफाई के मकड़जाल बुनने के,राजदीप सरदेसाई सीधे तौर पर मानते हैं कि अब एडीटर मजबूर है,मीडिया के भीतर जिस तरह के ऑनरशिप का मॉडल बना है,उसमें एडीटर बहुत कुछ करने की स्थिति में नहीं है।

 मैं उनके मुख से मालिकों के आगे एडीटर के मजबूर हो जाने की बात पिछले छ महीने में चार बार सुन चुका हूं। उदयन शर्मा की याद में पहली बार कन्स्टीच्युशन क्लब में सुना तो एकबारगी तो उनकी इस ईमानदारी पर फिदा हो गया। लगा कि इस शख्स को इस बात का मलाल है कि जैसे-जैसे गाड़ी और फ्लैट की लंबाई बढ़ती जाती है,पत्रकार होने का कद छोटा होता जाता है। फिर दूसरी बार सुना तो लगा कि आजकल फैशन में इसे चालू मुहावरे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं कि अपनी ही पीठ पर आप ही कोड़े मारो ताकि लोग ईमानदारी पर लट्टू हो जाएं। लेकिन सवाल है कि इस स्वीकार के बाद राजदीप सरदेसाई या फिर उनके जैसा कोई भी पत्रकार सुधार की दिशा में क्या कर रहा है। जबाब है,कुछ भी नहीं। तो यकीन मानिए कि आज जब राडिया और मीडिया प्रकरण पर फिर प्रेस क्लब में हुई एडीटर्स गिल्ड की बैठक की फुटेज में राजदीप सरदेसाई को बोलते हुए सुना तो लगा कि बेहया हो जाना आज के जमाने की सबसे खूबसूरत और कारगार शैली है। इसी बीच जब IBN7 चैनल पर एक बार फिर आशुतोष के सवालों के जबाब देते सुना तो लगा कि राजदीप सरदेसाई ने मीडिया पर गंभीरता से सोचना-समझना पूरी तरह बंद कर दिया है।..और इस बंद कर देने में अपने नाम के दम पर यकीन रखते हैं कि वो जैसे चाहें मीडिया के प्रति लोगों की समझ को ड्राइव कर ले जाएंगे।

आप याद कीजिए ये आज के वही मजबूर राजदीप सरदेसाई हैं जिन्होंने नब्बे के दशक में दूरदर्शन पर हुए टॉक शो में लगभग दहाड़ते हुए कहा था कि- हमें सरकार से कोई लेना-देना नहीं है जिसका समर्थन कांग्रेस के मुखौटे पत्रकार और मौजूदा नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता ने यह कहकर दिया कि टेलीविजन का मतलब सिर्फ खबर और राजनीतिक खबर नहीं है। भला हो दूरदर्शन का कि अपने 50 साल को याद करते हुए जब  “The Golden Trail , DD@50 :Special feature o Golden Jubilee of Doordarshan”  नाम से आधे घंटे की फीचर बनायी तो इस बातचीत को शामिल किया। राजदीप सरदेसाई ने निजी मीडिया की मार्केटिंग इसी तरह से की और निजी चैनलों को दूरदर्शन के विपक्ष के तौर पर खड़ी करने की कोशिश की। इसकी ताकत को इसी रुप में भुनाने की कोशिश की कि वो सरकार से पूरी तरह मुक्त है और दूरदर्शन से अलग सबसे मजबूत और स्वतंत्र माध्यम है। आज वही राजदीप सरदेसाई जिन्हें कि सरकार से कुछ भी लेना-देना नहीं था,पूरी तरह आजाद थे,कार्पोरेट की गोद में गिरते हैं और बनावटी तौर पर ही सही बिलबिलाने और मजबूर होने का नाटक करते हैं। निष्कर्ष ये है कि न तब मीडिया आजाद और मुक्त था और न आज था। तब उसे सरकार ने अपना भोंपू बनाया और आज ये कार्पोरेट का दुमछल्लो बना हुआ है।

 राजदीप सरदेसाई बहु ही खूबसूरती से ये बात मानते हैं कि 2G स्पेक्ट्रम घोटाला और नीरा राडिया के मामले में मीडिया के कुछ लोगों ने लक्ष्मण रेखा तोड़ी है,उन्होंने पत्रकार के तौर पर वो किया है जो कि उन्हें नहीं करनी चाहिए। लेकिन इसके आगे जो वो कहते हैं वो वही एजेंडा है जिसे कि सबसे पहले 30 दिसंबर को NDTV24X7 ने बरखा दत्त को अपना पक्ष रखने की बात के दौरान किया था। राजदीप का कहना है कि हालांकि जो कुछ भी हुआ है उसमें मीडिया पर उंगलियां उठ रही है लेकिन ये पूरे खेल का बहुत ही छोटा हिस्सा है,बड़ा हिस्सा है कि कैसे कार्पोरेट चीजों को अपने तरीके से बदलना चाहता है। हम सब उसमें बंधे हैं। फिर वो मीडिया के खर्चे, स्पान्सरशिप और मॉडल पर बात करते हैं जिसका निष्कर्ष ये है कि हम चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। यही पर आकर एडीटर सबसे लाचार हो जाता है। आज चैनल के रिपोर्टर्स पर अगर प्रेशर है तो वो इसलिए कि वो चाहकर भी मुस्तैदी से अपने तरीके से स्टैंड नहीं ले सकता। नहले पर दहला आज आशुतोष के भीतर पीपली लाइव के संवाददाता दीपक की आत्मा घुस आती है और ताल ठोककर कहते हैं कि ये भी तो देखिए कि आज इसी मीडिया ने डी राजा और स्पेक्ट्रम घोटाला की बातें आप तक पहुंचाने का काम किया।

 थोड़ी गंभीरता से विचार करें तो एक ही मीडिया हाउस का एक एडीटर कह रहा है कि वो कार्पोरेट के आगे मजबूर है लेकिन उसी मीडिया हाउस के एक चैनल का मैनेजिंग एडीटर कह रहा है कि इस मजबूरी में भी वो तीर मार लेने का काम कर ले रहा,ये क्या कम है? राडिया और मीडिया को लेकर आजतक न्यूज चैनलों पर इसी तरह के कर्मकांड जारी हैं और शुरु में बरखा दत्त ने 30 नबम्वर को जब अपनी बात हमसे साझा करने की कोशिश की तो लगा कि वो सचमुच हमारी गलतफहमियों को दूर करना चाहती है लेकिन अब एक के बाद एक चैनल जिस तरह से तुम मेरी खुजाओ,मैं तुम्हारी खुजाउं का काम कर रहे हैं,साफ लग रहा है कि एक नए किस्म की लाबिंग कर रहे हैं जिसमें ईरादा है कि सब झाड़कर खड़े हो जाओ और साबित कर दो कि या तो हमाम में सब नंग हैं या फिर हम बेदाग हैं। आप बस अपने को बेदाग साबित करने की इस जुगलबंदी पर गौर कीजिए,आपको मीडिया बेशर्मी के इस नए अध्याय से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

3 दिसंबर 2010 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में 11 बजे एडीटर्स गिल्ड की आम पत्रकारों से राडिया और मीडिया को लेकर बातचीत हुई। विनोद मेहता ने कहा कि हमें अलग से एथिक्स की बात करने और नियम की चर्चा रने की क्या जरुरत है,सबकुछ साफ है कि एक पत्रकार को क्या करना चाहिए,क्या नहीं करना चाहिए। पीआरओ अगर अपने एजेंडे के साथ आ रहा है तो हमें किस तरह से समझना है। प्रसार भारती बोर्ड की अध्यक्ष मृणाल पांडे जिन्होंने पिछले दिनों एफ एम गोल्ड मामले में दि हिन्दू अखबार से कहा था फ्रीक्वेंसी बदले जाने की बात उन्हें किसी ने नहीं बतायी और ये बात उन्हें मीडिया के जरिए पता चली,इस एडीटर्स गील्ड और  पत्रकारों की बातचीत में कहा कि आज दरअसल अंग्रेजी मीडिया के एडीटर मालिक हो गए हैं और हिन्दी मीडिया के मालिक एडीटर हो गए हैं। ये पूरी बातचीत IBN LIVE पर वीडियो की शक्ल में मौजूद है। इतने दिनों से चुप रहने के बाद जब NDTV24X7 ने बरखा दत्त पर लगे आरोप को लेकर एडीटर के साथ शो कराया तो फिर हेडलाइंस टुडे भी इसी तरह के शो कराए। उसके बाद तो समझिए कि इन दिनों चैनलों पर एक एक पैटर्न ही बन गया है कि मीडिया को लेकर स्पेशल स्टोरी की जाए। लिहाजा 3 दिसंबर की अधिकांश फुटेज और ओपन और आउटलुक पत्रिका की स्टिल फोटो का इस्तेमाल करते हुए आजतक ने प्राइम टाइम पर स्पेशल स्टोरी चलायी-"मीडिया की लक्ष्मण रेखा"। चैनल ने इस स्टोरी के जरिए ये साबित करने की कोशिश की कि मीडिया को लेकर जो कुछ भी कहा जा रहा है वो दरअसल कुछ लोगों के इसके एथिक्स के फॉलो नहीं किए जाने की वजह से हुआ है,नहीं तो मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी बहुत ही ईमानदारी से निभायी है,चाहे वो 2G स्पेक्ट्रम घोटाला मामला ही क्यों न हो।

इससे ठीक पहले IBN7 पर आशुतोष ने एजेंडा कार्यक्रम में मीडिया ट्रायल पर शो किया जिसमें कि श्रवण गर्ग(दैनिक भास्कर), एस के सिंह( इटीवी) और राजदीप सरदेसाई( CNN-IBN) को बहस के लिए शामिल किया। इस पूरी बातचीत में करीब 30 फीसदी आशुतोष ने बोला 40 फीसदी राजदीप ने और बाकी 
तीस फीसदी में दोनों को निबटा दिया गया। आशुतोष के भीतर आज नब्बे के दशक के पत्रकारों की सिम लगी थी। लिहाजा जिस तरह के सवाल किए,वो सारे सवाल एक टेलीविजन ऑडिएंस के मन में स्वाभाविक तौर पर उठनेवाले सवाल है। आशुतोष ने राजदीप सरदेसाई से साफ तौर पर पूछा कि मीडिया किसी भी तरह का फैसला आने के पहले ही अपनी तरफ से फैसला नहीं दे देता क्या,उसकी इमेज को,उसके करियर को पूरी तरह खत्म कर देता है,डी राजा के मामले में भी मीडिया ने खुद वही किया तो फिर मीडिया अपने मामले में ऐसा होने पर क्यों परेशान है? इस पर राजदीप सरदेसाई ने कहा कि जब तक आरोप दाखिल नहीं हो जाते,मीडिया ऐसा नहीं करता। हम सुनते हुए साफ तौर पर महसूस कर रहे थे कि वो बचाव करने की मुद्रा में बात कर रहे हैं। ल ही हमने स्टार न्यूज पर 'सेक्स का सॉफ्टवेयर' स्टोरी देखी जिसमें चैनल ने मॉडल भैरवी के लड़की सप्लाय के धंधे में होने की बात की और कहा कि हालांकि बातचीत की टेप अभी सीबीआई के पास भेजी गयी है कि ये उनकी और उसके पति विनीत कुमार की आवाज है या नहीं। लेकिन आधे घंटे की स्टोरी में चैनल ने कहा कि बिना किसी बिजनेस बैग्ग्रांउड के वो शेयर की कंपनी की सीइओ कैसे बन सकती है और लगभग साबित कर दिया कि भैरवी ने वही सब किया है जिस बात के आरोप लगे हैं। 

इसलिए राजदीप सरदेसाई हों या फिर कोई और ये बात दावे के साथ नहीं कह सकते कि चैनल जो कुछ भी दिखाते हैं,उनकी सत्यता की जांच पूरी तरह कर ली जाती है। आज वो ओपन और आउटलुक के मामले में मीडिया एथिक्स की बात कर रहे हैं। क्या कभी सिस्टर चैनल IBN7 ने आए दिन करनेवाले स्टिंग ऑपरेशन में शामिल करनेवालें लोगों को बताया कि वो उनके साथ क्या करने जा रहे हैं? घंटों यूट्यूब से फुटेज काटकर स्टोरी चलानेवाले चैनल जिसमें कि वर्ल्ड न्यूज के नाम पर भी चीजें शामिल होती हैं,कभी उस आवारा वीडियो की ऑथेंटिसिटी पर बात की?   

 श्रवण गर्ग ने साफ तौर पर कहा कि मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर बहुत सारे पत्रकार दलाली और लॉबिइंग के काम में लगे हैं,ये अलग बात है कि सबके सब वैसे नहीं है। मुझे आशुतोष के सवाल पर हंसी आयी कि वो पूछते है कि ऐसे कितने पत्रकार हैं? जैसे श्रवण गर्ग दलाल पत्रकारों की जनगणना में लगे हों। इतना होने पर भी श्रवण गर्ग को आज की मीडिया में उम्मीद दिखाई देती है,ऐसा नहीं है कि सबकुछ पूरी तरह खत्म हो गया है। उनकी इस बात  को मजबूती देते हुए एस के सिंह ने कहा कि अच्छे पत्रकार आज की पत्रकारिता को नई दिशा दे सकते हैं जिस पर कि आशुतोष ने संतोष जताते हुए कहा कि आज जबकि पिछले छह महीने में मीडिया ने बड़े-बड़े खुलासे किए लेकिन खुद संकट के दौर में आ गया..लेकिन मानना होगा कि इसी मीडिया ने 2G स्पेक्ट्रम घोटाला का पर्दाफाश किया। बातचीत करण जौहर और यश चोपड़ा की हैप्पी एन्डिंग सिनेमा की तरह खत्म हो जाती है।

2G स्पेक्ट्रम घोटाला और मीडिया को लेकर न्यूज चैनलों पर जितने भी शो चले,सबके सब इसी तरह कुछ कमेटी गठित करने,आदर्श बघारने और सेल्फ जजमेंट जैसे फफूंदी लगे शब्दों की रिपीटेशन के साथ खत्म हो जाते हैं। नतीजा कुछ भी निकलकर नहीं आता है। उल्टे ऑडिएंस को गहरी साजिश का एहसास होता है कि पूरे मामले को पूरी तरह सॉफ्ट किया जा रहा है। अब बताइए कि जो मीडिया किसी का नाम भर आ जाने से उसका पूरा जीवन,करिअर,परिवार,सोशल लाइफ सबकुछ लील जाता है,श्रवण गर्ग जैसे दमदार माने जानेवाले पत्रकार कहते है कि तो क्या इन पत्रकारों को नौकरी छोड़ देनी चाहिए,करियर छोड़ देना चाहिए? अर्थात् नहीं। गर्ग साहब तो क्या इन पत्रकारों को थाने में अठन्नी जमाकर करके सिर्फ सॉरी बोल लेना चाहिए कि मैंने एरर ऑफ जजमेंट का काम किया है,आगे से नहीं करुंगा।

 मैंने पहले भी कहा था और अब भी कहता हूं कि जिस नैतिकता की बात राजदीप सरदेसाई से लेकर एम जे अकबर, श्रवण गर्ग और बाकी के पत्रकार बघार रहे हैं, उस नैतिकता में जब तक वो पूरी तरह पाक-साफ करार नहीं दे दिए जाते,उन्हें कहानी-कविता-चुटकुले के बीच अपना समय बिताना चाहिए। किसी से सवाल करने का न तो हक है और न कि किसी को उनका जबाब देने की अनिवार्यता। उन्हें समझना चाहिए कि उन्होंने सोशली अपना एक बहुत बड़ा अधिकार खो दिया है। इस तरह की नैतिकता की बात करके हमारे ये महान मीडियाकर्मी जिस तरह से पूरे मामले पर पर्दा डालने के लिए बेचैन हो रहे हैं,उसमें ये भी चिंता शामिल है कि अभी दो मामला दो-तीन पत्रकारों के नाम भर आने का है,आए दिन लाबिइंग और दलाली के बीच होनेवाली पत्रकारिता की शक्ल उघड़कर सामने आ जाएगा तो क्या होगा? हमें ये लोग जो मीडिया को कार्पोरेट से अलग बता रहे हैं,आज मीडिया खुद कार्पोरेट है। कार्पोरेट का पक्ष लेते हुए वो एक तरह से अपना ही पक्ष ले रहे होते हैं। इस मामले में 3 दिसंबर 2010 को पी साईनाथ का दि हिन्दू में लिखा लेख- THE REPUBLIC ON A BANANA PEEL पढ़ा जाना चाहिए। कुल मिलाकर मेरी अपनी समझ है कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जैसी लगभग अब फर्जी हो चली बात को छोड़कर मीडिया एथिक्स के बजाय मीडिया बिजनेस एथिक्स की बात करनी चाहिए और हमें एक रीडर और ऑडिएंस के बजाय एक कन्ज्यूमर के तौर पर ईमानदारी से प्रोडक्ट मुहैया कराने चाहिए।
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कल NDTV24X7 पर बरखा दत्त को कटघरे में लाने के बाद 1 दिसंबर की रात 9 बजे हेडलाइंस टुडे ने आजतक पर सीधी बात करनेवाले प्रभु चावला और कार्पोरेट पत्रकार वीर सांघवी को अपने पक्ष में बात रखने के लिए बुलाया। इन दोनों से सवाल-जबाव करने के लिए  एमजे अकबर, एन राम, किरन बेदी और दिलीप चेरियन को पैनल में शामिल किया गया और 2G स्पेक्ट्रम मामले के बाहने मीडिया एथिक्स पर बात की गयी। उपरी तौर पर देखने से तो ऐसा लगता है कि न्यूज चैनल्स और मीडिया संस्थानों  इस पूरे मामले में अपने नाम आने से चिंतित हैं और वो नहीं चाहते कि उनकी बदनामी हो,संभवतः इसलिए वो पूरे मामले को ऑडिएंस के सामने रख दे रहे हैं।

 कथित तौर पर जो भी मीडियाकर्मी शक के घेरे में हैं,उन्हें आडिएंस के सामने ला दे रहे हैं ताकि किसी तरह की कोई शंका न रह जाए। कल एनडीटीवी की एंकर सोनिया सिंह ने कहा भी कि जब हम इस पर बात नहीं कर रहे थे तो लोगों को लगा कि हम कुछ छुपा रहे हैं,इसलिए इस तरह से शो करना जरुरी समझा। चैनलों के इतिहास के तौर पर देखें तो ये शायद पहला मौका है जब मीडियाकर्मी अपनी सफाई में खुद अपने-अपने चैनल के कटघरे में एक आरोपी के तौर पर खड़े हैं और पैनल के लोगों के सवालों के जबाव दे रहे हैं। कल जब हमने दिन में एनडीटीवी की साइट पर बरखा दत्त के इसी तरह एक खास शो में सवालों के जबाव देने की बात पढ़ी तो हमें भी अच्छा लगा कि चलो इसी बहाने कई चीजें साफ होगी। लेकिन देर रात जब हमने शो देखा तो महसूस किया कि ऐसा करके न तो बरखा दत्त औऱ न ही चैनल किसी तरह का भरोसा कायम कर पाए हैं तो वह हमें पाखंड से ज्यादा कुछ भी नहीं लगा। 1 दिसंबर को NDTV24X7 ने बरखा दत्त की दलील को लिखित तौर पर अपनी ऑफिशियल साइट में लगायी है लेकिन पाठकों के लिए कमेंट के ऑप्शन नहीं दिए। अब 1 दिसंबर को हेडलाइंस टुडे ने लाइव शो के इसी पाखंड को दोहराया।

चैनलों पर आकर शक के घेरे में आए पत्रकारों जिसमें अभी तक बरखा दत्त,वीर सांघवी औऱ प्रभु चावला का नाम विशेष तौर पर लिया जा रहा है,अपनी बात रखने में कोई हर्ज नहीं है औऱ न ही हम इनकी नीयत पर कोई शक कर रहे हैं लेकिन चैनल अगर ये सबकुछ अपनी ब्रांड इमेज को मजबूत करने औऱ पहले की तरह बरकरार करने के लिए कर रहे हैं तो उन्हें इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा। साफतौर पर शो को देखकर लगता है कि ये सब कार्पोरेट हाउसेज में जो नुकसान हो रहे हैं,उसे डैमेज कंट्रोल के लिए ये सब किया जा रहा है लेकिन आम ऑडिएंस और पाठक के बीच जो इनकी साख गिरी है,उसे दोबारा हासिल कर पाना फिलहाल नामुमकिन है। ऐसे में थोड़ी गहराई में ाकर पूरी बात समझें तो कुछ दूसरा ही खेल नजर आता है।

सबसे पहले तो ये कि 2G स्पेक्ट्रम घोटाला देश के भीतर कुछ प्रभावी लोगों और संस्थानों की ओर से किया गया एक बड़ा करप्शन है जिसमें कि करोड़ों रुपये के घोटाले उनलोगों के पैसे के किए गए हैं जो कि दिन-रात एक औशत जिंदगी जीकर-खटकर सरकार को टैक्स के तौर पर अदा करते हैं। ये कोई रामगोपाल वर्मा की बनायी फिल्म रण नहीं है जिसमें कि विजय हर्षवर्धन मलिक( अमिताभ बच्चन) आए और बहुत ही भावुक तरीके से लाइव माफी माग ले कि हमने अपने चैनल के माध्यम से जो कुछ भी किया,वह गलत है। अभी जो चैनलों ने अपने पक्ष में बात रखने का काम शुरु किया है वह इस पूरे मामले का स्वाभाविक हिस्सा न होकर कर्मकांड भर है। और उससे भी खतरनाक बात ये कि ऐसा करके पूरे मामले को सॉफ्ट करने और उसकी हवा निकालने की कोशिश है। आप खुद ही सोचिए न,जिन मीडियाकर्मियों पर नीरा राडिया के साथ संवाद करने और दो पार्टियों के बीच कौन क्या बनेगा,उसके लिए लॉबिंग करने के आरोप हैं,वह सीधे-सीधे अपराध का मामला है,इसमें मीडिया एथिक्स पर क्या बहस करनी है? लेकिन नहीं आज हेडलाइंस टुडे ने मीडिया एथिक्स पर  अपने को फोकस रखा और कल बरखा दत्त पूरी बहस को इसी दिशा में ले जाने की कोशिश करती नजर आयी। ये तो स्वप्न दासगुप्ता ने कहा कि आज हम यहां मीडिया एथिक्स पर बात करने नहीं आए हैं,तब जाकर मुद्दे पर बात हो सकी। इस पूरे मामले को मीडिया एथिक्स काम मामला बनाने का मतलब है कि मुद्दे को सॉफ्ट स्टोरी या परिचर्चा में तब्दील करने की साजिश की जा रही है। ऐसी परिचर्चा आए दिन दूरदर्शन और लोकसभी चैनल पर होते रहते हैं,इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है। इसलिए सबसे जरुरी बात है कि इस पर मीडिया एथिक्स का मामला न बताकर अपराध या मीडिया अपराध का मामला बताकर बात करनी होगी। ऐसा करके चैनल एक-दूसरे के लिए डीफेंड करने का ही काम करते हैं और आपसी बचाव के लिए माहौल बनाने का काम कर रहे हैं।

दूसरी बात कि चैनलों पर जिस तरह से पंचायती दौर शुरु हुआ है उससे ऐसा लग रहा है कि चैनल पर आकर कुछ लोग जो तय कर देंगे वही इन मीडियाकर्मियों के लिए अंतिम फैसला होगा। ये मुझे यूनिवर्सिटी कैंपस में पांच साल रहते हुए उसी तरह का मामला लग रहा है कि दबंग टाइप के ग्रुप कमजोर को दमभर मारते और फिर आपसी सुलह कर लेने के नाम पर पूरे मामले को दबा दिया जाता। ये मामला सिर्फ नैतिक नहीं है और जब तक पूरा फैसला आ नहीं जाता,अपराध के घेरे में ही आता है। इसलिए इस पर सिर्फ और सिर्फ नैतिक आधार पर बात करने का मतलब है पूरे मामले से ऑडिएंस की नजर को भटकाना और केस को कमजोर करना। ये मामला उस आधार पर नैतिक जरुर है कि जब तक फैसला आ नहीं जाता,बरखा दत्त,वीर सांघवी,प्रभु चावला औऱ बाद में जितनों के भी नाम आएं नैतिकता के आधार पर पत्रकारिता कर्म छोड़ दें। चैनलों पर वी दि पीपुल औऱ सीधी बात करने से अपने को अलग कर लें। वो मान लें कि जब तक उनके दामन को पाक-साफ करार नहीं दिया जाता,तब तक वो दूसरों से सवाल-जबाब नहीं करेंगे। ये नैतिक औऱ मीडिया एथिक्स के दायरे में आएगा। ये कभी नहीं आएगा कि जो बाकी के लोगों के लिए अपराध है औऱ जिसे मीडियाकर्मियों ने किया है वह बस मीडिया एथिक्स का हिस्सा है।

आप समझिए न कि ये मीडिया की ओर से कितनी बड़ी चालबाजी है कि देश के तमाम लोगों के लिए फैसला देने का काम कानून और जूडिशियरी करती है और मीडिया के लोग आप ही पंचायती करने बैठ गए हैं। ये कोई रजत शर्मा की आप की अदालत शो है कि किसी बड़ी शख्सियत को बुलाऔ और कहो कि आप पर मुकदमा चलेगा और अंत में बाइज्जत बरी कर दो। ये कर्मकांड औऱ चोचलेबाजी उस खास दिन में चैनल की टीआरपी बढ़ाे के काम जरुर आएंगे लेकिन लोगों का भरोसा हासिल होने के बजाय इस साजिश पर उंगली उठाने का मौका मिलेगा। ऐसे शो करके मीडिया संस्थान न केवल अपने को पाक-साफ करार देने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि मामले को बिना फैसले के प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। उन सबों की नैतिकता वहीं तक है कि सब फैसले आने तक अपने को जर्नलिज्म से दूर रखे, फिक्शन लिखें। इसके आगे वो जो कुछ भी करते हैं वह अपने को बचाने के लिए कोशिश औऱ साजिश का हिस्सा होगा,इससे ज्यादा कुछ नहीं। कानून को अपने तरीके से काम करने देना चाहिए। अभी यही सबकुछ एक औसत व्यक्ति के साथ होता जिसके फुटपाथ पर गोभी बेचने से छ आदमी के पेट पलते हैं तो सलाखों के भीतर होता,पुलिस की रोज पूछताछ होती। खुद चैनल के भीतर ही औसत हैसियत के साथ काम करनेवालों की छुट्टी हो जाती लेकिन चूंकि इसमें कई सेक्टर के लोगों की गर्दन फंसी हुई है और उनकी हैसियत से इन मीडियाकर्मियों की हैसियत मेल खाती है इसलिए चैनल ने ड्रामेबाजी शुरु कर दी है। इन्हें चाहिए कि ये सब नाटक बंद कर सीधे अपने संस्थानों से इन सबों को फैसले आने तक अलग कर दें।......नैतिकता भी इससे कम की मांग नहीं करती।

हेडलाइंस टुडे पर बातचीत की वीडियो देखने के लिए चटकाएं- हेडलाइंस टुडे पर नाडिया-मीडिया मामला
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मुझे लगता है कि मैं जबाब देती हुई थोड़ी लाउड हो रही हूं। मनु जोसेफ का जबाब देते हुए बरखा दत्त ने जब माहौल को थोड़ा हल्का करने की कोशिश की तो मनु जोसेफ ने भी उसी अंदाज में कहां- इट्स योर ऑफिस। बरखा ने इसे अनफेयर बताया और फिर सवाल-जबाब का सिललिला आगे बढ़ता रहा। पूरी बातचीत क्या हूं इसे मैं देर रात की थकान में ट्रांसक्रिप्ट नहीं कर सकता लेकिन ये लिखते हुए कि अपनी पूरी बातचीत में बरखा दत्त हमें इस बात का भरोसा नहीं दिला पायी कि ओपन मैगजीन ने टेप के माध्यम से जो बात कही है वो पूरी तरह से निराधार है और इसे सिरे से खारिज किया जाना चाहिए। जिस तरह से पत्रिका ये कहती है और आज संपादक मनु जोसेफ ने भी दोहराया कि हम बरखा दत्त के बारे में ये बिल्कुल नहीं कह रहे कि कोई करप्शन किया है,उसी तरह से हम भी यही बात दोहराते हैं। लेकिन बरखा ने आज जिस तरह से अपनी बात रखी उससे कई सवाल अभी भी ज्यों के त्यों बने रह जाते हैं। कुछ मामूली टिप्पणी और ऑब्जर्वेन्स के साथ आपके बीच ऑडियो औऱ वीडियो लिंक रख दे रहा हूं। आप खुद भी इसे देख-सुनकर अपनी राय कायम कर सकेंगे।

30 दिसंबर रात दस बजे NDTV24X7 ने नीरा राडिया और 2G स्पेक्ट्रम घोटाला को लेकर बरखा दत्त का नाम सामने आने के बाद एक कार्यक्रम प्रायोजित किया। RADIA TAPE CONTROVERSY नाम से प्रसारित इस कार्यक्रम में संजय बारू,(संपादक बिजनेस स्टैन्डर्ड, स्‍वपन दासगुप्‍ता( सीनियर जर्नलिस्ट), दिलीप पडगांवकर( पूर्व संपादक दि टाइम्स ऑफ इंडिया) और मनु जोसेफ( संपादक, ओपन मैगजीन) को बरखा दत्त से सवाल-जबाब के लिए पैनल में शामिल किया गया। आउटलुक के विनोद मेहता को भी इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बुलाया गया लेकिन उन्होंने आने से मना कर दिया। बहरहाल

इस पूरी बातचीत में ERROR OF JUDGEMENT शब्द को बार-बार दोहराया गया और अंत में संजय बारु ने कहा भी कि हम सबसे गलतियां होती रहती है,बरा तुम्हें चाहिए कि इसे एरर ऑफ जजमेंट मानकर अपने दर्शकों से माफी माग लें, जस्ट से- SORRY। बरखा दत्त ने कहा कि वो जरुर माफी मागती है लेकिन इस बात पर बिल्कुल भी नहीं कि कौन एडीटर क्या स्टोरी करेंगे और कौन नहीं,ये कोई और बताए। दरअसल पूरी बातचीत का ए बड़ा हिस्सा इस बात पर आकर अटक गया जिसे कि मनु जोसेफ ने उठाया कि एक कार्पोरेट की पीआर,अंबानी कंपनी की पीआर को इस बात में दिलचस्पी है कि दो पार्टियों में से किस पार्टी का कौन क्या बनेगा जो कि इस शताब्दी की बड़ी स्टोरी हो सकती है,वो आपके लिए कोई स्टोरी नहीं है? ये कैसे हो सकता है? मनु अपने सवाल में बरखा दत्त से इसी बात का जबाब चाह रहे थे जिसे कि बरखा दत्त ने कई तरीके से घुमाने-फिराने की कोशिश की। पहले तो ये कहा कि उसके पास कई तरह के लोगों के फोन आते रहते हैं और कहते हैं कि फलां ये बन रहा है,फलां वहां जा रहा है,लेकिन इस पर ध्यान देने की जरुरत मैं नहीं समझती। लेकिन जब मनु ने दोबारा दोहराया कि अंबानी ग्रुप की पीआर ये जानना चाह रही है कि कौन क्या बनेगा और ये स्टोरी नहीं है? उसके बाद बरखा दत्त ने कहा कि कौन स्टोरी है औऱ कौन नहीं ये चुनाव करने का हर एडीटर और पत्रकार को अपना निजी नजरिया होता है। मैं भी उसी तरह से सवाल कर सकती हूं कि बिजनेस स्टैन्डर्ड ने ये स्टोरी क्यों नहीं छापी,ओपन ने वो क्यों नहीं छापी। ये कोई तर्क नहीं हैं। बरखा मनु के इस सवाल में जाल पैदा करती है और जिसे लेकर मनु जोसेफ अंत तक असंतुष्ट नजर आए।

बरखा ने शुरुआत में ही कहा कि मीडिया ने इसे तोड़-मरोड़कर पेश किया है,सभी ने नहीं भी तो कुछ ने ऐसा जरुर किया है और सबसे बड़ी बात है कि ये रॉ टेप हैं। बरखा दत्त के ऐसा कहने का मतलब है कि इसमें संभव है कि छेड़छाड़ की गयी हो,इसकी ऑथेंटिसिटी को लेकर भी सवाल किए जा सकते हैं। उसने यहां तक कहा कि मेरे साथ ये सब जोड़कर स्टोरी क्रिएट की गयी है और भी 40 पत्रकारों की बातचीत हुई,उनके टेप क्यों नहीं जारी हुए? यहां पर आकर एक राजनीतिक पर्सनालिटी और बरखा दत्त में कोई खास फर्क नहीं रह जाता और वो भी दूसरे पत्रकारों के शामिल किए जाने की मांग और मीडिया को इसके लिए जिम्मेदार बताती नजर आयी। ये बहुत ही दिलचस्प और हास्यास्पद है कि आज एक मीडिया की बड़ी शख्सीयत मीडिया के काम करने के तरीके पर सवाल खड़ी कर रही है। इस बातचीत का एक हिस्सा मीडिया एथिक्स की तरफ जाता हुआ दिखाई देने लगा जिसमें बरखा दत्त ने ओपन पर आरोप लगाते हुए कहा कि उसने इस एथिक्स को नजरअंदाज करने का काम किया है और बिना उसकी बात जाने प्रकाशित किया। किसी को किसी के व्यक्तित्व के साथ ऐसा करने का अधिकार नहीं है। अपने 16 साल के करियर का हवाला देते हुए उसने अपनी समान सोच और निष्पक्ष समझ की बातें शामिल की। लेकिन बरखा रौ में ये सब जब कुछ बोल रही थी तो हमें पता नहीं क्यों भरोसा नहीं जम रहा था। आगे स्वप्न दासगुप्ता ने कहा भी कि हम यहां मीडिया एथिक्स पर बात करने नहीं आए हैं,हम बात करने आए हैं बरखा दत्त औऱ राडिया टेप को लेकर जो हुआ है। बरखा दत्त ये मानती रही कि मीडिया एथिक्स का सवाल इन सबसे अलग नहीं है।

मनु जोसेफ का यह सवाल धरा का धरा ही रह गया कि यदि ये एरर ऑफ जजमेंट था तो फिर 2010 में भी ये स्टोरी क्यों नहीं चली? मनु जोसेफ ने साफ कहा कि सॉरी,मैं आपके जबाब से खुश नहीं हूं। बरखा दत्त के पास इस बात का भी साफ-साफ जबाब नहीं था जिसे कि दिलीप पडगांवकर ने उठाया कि एक पत्रकार की सीमा रेखा कहां जाकर ब्लर हो जाती है। ये एक जेनरल पर्सपशेन बनी है कि ऐसा हुआ है। सवाल ये भी है कि एक पीआर और एक एडीटर के बात करने के तरीके में कोई फर्क नहीं होगा क्या? इसके साथ ही वो एक पीआर को ये क्यों बता रही हैं कि मेरे जर्नलिस्ट क्या कहते हैं? स्वपन दासगुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के जज के मामले में जो बातचीत हुई उसे लेकर एक ग्रुप एडीटर की बातचीत में और एक पीआर के बात करने में क्या फर्क होने चाहिए,इस पर सोचना होगा। इस सवाल ने भी जोर पकड़ा कि आखिर नीरा राडिया ने बरखा दत्त को ही क्यों फोन किया? बरखा दत्त अपने तर्कों में बार-बार में कवरेज को ईमानदारीपूर्वक देखने की बात करती है।
हालांकि अंत में चैनल की तरफ से एंकर सोनिया सिंह ने इस बात की तरफ हमारा इशारा जरुर किया कि संभव हो कि ये कॉर्पोरेट वॉर हो लेकिन उन इस इशारे की खोज में हम आए नहीं थे। हम आए थे कि बरखा पर जितने भी तरह के आरोप लगे और लगाए जा रहे हैं,उसे लेकर वो अपना पक्ष किस तरह से रखती है? बरखा दत्त ने बार-बार कहा कि उसका 2G स्पेक्ट्रम, डी राजा और ऐसे तमाम मामलों औऱ घोटालों के साथ जोड़कर देखना नाइंसाफी होगी। पैनल में मनु जोसेफ सहित किसी ने भी नहीं कहा कि उसका संबंध करप्शन से हैं लेकिन जिस बरखा दत्त की स्टोरी,उसके बोलने के अंदाज के हम जमाने से कायल रहे हें,अपना ही पक्ष लेती हुई हमें इस तरह से निराश करेगी, इसकी हमें उम्मीद नहीं थी। बरखा दत्त को नेताओं और बच्चों की तरह उसके कपड़े भी मैले हैं कोई उसे क्यों नहीं कहता के अंदाज में बात करने के बजाय मजबूती से अपने पक्ष रखने चाहिए थे। चैनल ने इस तरह का कार्यक्रम आयोजित करके भले ही विश्वास जुटाने की कोशिश की हो लेकिन हमारा भरोसा कार्यक्रम देखने के बाद बढ़ा नहीं है। हममें से जो लोग फेस रीडिंग औऱ बॉडी लैंग्वेज के जानकर हैं वो बरखा दत्त और इस शो में उसके रवैये से भी काफी कुछ मायने निकाल सकते हैं। हालांकि उसने नार्मल होने की पूरी कोशिश की लेकिन हमारी आंखें भी तो कुछ फर्क करना जानती है न। बाकी आप नीचें की वीडियो लिंक पर चटकाकर पूरी स्टोरी खुद देखें और अपनी राय दें-

वीडियो के लिए चटकाएं- बरखा दत्त विवाद
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