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बहुत ही कम समय की नोटिस में सीएसडीएस-सराय की ओर से 10 जनवरी, रविवार को ब्लॉगर्स मीट का आयोजन किया गया है। फोन से इस ख़बर की सूचना देते हुए रविकांत ने बताया कि दरअसल हमलोगों के यहां और भी कई कार्यक्रम चल रहे हैं, ऐसे में अचानक हमें ख्याल आया कि क्यों न इसी रौ में एक मिनी ब्लॉगर्स मीट करायी जाए। मीट के मक़सद को साफ करते हुए उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि इसी बहाने ब्लॉगर्स और साहित्यकार, लेखक, विमर्शकार आमने-सामने हो लें। अपनी-अपनी समझ पर बेबाक होकर राय जाहिर कर सकें। ब्लॉगर्स मीट की ख़ास बात होगी कि इसमें ब्लॉगर्स के अलावा उन लोगों की भी उपस्थिति होगी, जिनका ब्लॉग से सीधा-सीधा नाता नहीं है। जो भी राय बनी है, वो ब्लॉग के बारे में दूसरे माध्यमों मसलन अख़बार और पत्रिकाओं को पढ़ते हुए बनी है। इस ख़बर के साथ रविकांत ने ये भी बताया कि अब तक जिन लोगों से इस संबंध में बात की गयी है, उनमें से चर्चित कवि-कथाकार उदय प्रकाश, साहित्यकार अनिल जनविजय और कविता कोश के संस्थापक सदस्य ललित कुमार का आना तय है। उम्मीद है कि इतने कम समय में भी इस पोस्ट के जरिये जिन ब्लॉगर, पत्रकार और पाठकों तक ये ख़बर पहुंचेगी, वो समय निकाल कर आने की कोशिश करेंगे।

जगह होगी : सीएसडीएस-सराय, 29, राजपुर रोड (सिविल लाइंस मेट्रो से पांच मिनट की पैदल यात्रा), दिल्ली- 110054
वक्‍त होगा : दोपहर दो बजे

इस बारे में अधिक जानकारी के लिए ravikant@sarai.net पर संपर्क करें।

नोट : सराय में भाषा, तकनीक और साहित्य के अंतर्संबंधों पर कार्यक्रम सुबह 11 बजे से ही शुरू हो जाएगा। आपलोगों में जिन किसी को इन विषयों में दिलचस्पी और समय है, वो 11 बजे भी आ सकते हैं।
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न्यूज24 के मैंनेजिंग एडीटर अंजीत अंजुम ने टेलीविजन विमर्श के लिए कोई ब्लॉग या साइट बनाने के बजाय फेसबुक को ही अखाड़े के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं। कमेंट के लिहाज से देखें तो ये ब्लॉग या साइट से ज्यादा फायदेमंद सौदा है। ब्लॉग या साइट में अपनी बात लिखने और मॉडरेट करने के लिए कम से कम 20 से 25 मिनट चाहिए होते हैं। इस करीब आधे घंटे की माथापच्ची के बाद भी आपको कितने हिट्स मिलेंगे और कितने कमेंट इसके पीछे कई सारी चीजें काम करती हैं। जबकि फेसबुक में वनलाइनर थॉट देकर बहस की शुरुआत आसानी से की जा सकती है। पर्सनालिटी अगर दमदार हो तो इसी वन लाइनर में पचासों कमेंट बटोर ले जाएगा जिसके लिए ब्लॉग में दुनियाभर के पापड़ बेलने पड़ जाते हैं। अजीत अंजुम ने इस फायदे और चोखे असर को समझते हुए चीप एंड बेस्ट के फार्मूले पर टेलीविजन के अलग-अलग मुद्दों को लेकर बहस छेड़नी शुरु की है। ये बहस टीआरपी की मारामारी के बीच बननेवाली समझ से अलग है और जिस तरह से लोगों के रिस्पांस मिल रहे हैं वो इस समझ का विस्तार भी करेगा। दिलचस्प बात है कि यहां कमेंट करनेवाले लोगों में ibn7 के मैनेजिंग एडीटर आशुतोष से लेकर वाशिंगटन में बैठे व्ऑइस ऑफ अमेरिका के सीनियर मीडियाकर्मी आमिष श्रीवास्तव और अलग-अलग चैनल, मीडिया संस्थानों के इन्टर्न और ट्रेनी भी शामिल हैं। इस बहस से कुछ छलककर हासिल हो इस लोभ से हम जैसे मीडिया के स्टूडेंट भी इस बहस में कूद पड़े हैं। अजीत अंजुम के इस टेलीविजन अखाडे में सारा मामला खुल्ला-खेल फरुर्खाबादी है। जिसको जो जी में आए वो कहे। शर्त सिर्फ इतनी है कि बहस को बीच में छोड़कर न जाए और किसी भी तरह की अभद्र भाषा का प्रयोग न करे। यहां चैनल,एंकर,कार्यक्रम,टीआरपी,टेलीविजन कल्चर के आसपास मंडराते कई मुद्दे बहस में शामिल हैं। बात कहीं से भी शुरु की जा सकती है। लेकिन फिलहाल मुद्दे उठाने का काम अजीत अंजुम ही कर रहे हैं। हां ये जरुर है कि हम जैसे लोग उस पर कमेंट कर-करके उसे और भी गर्मा दिए दे रहे हैं। आपको अगर टेलीविजन विमर्श में दिलचस्पी है तो बिना अग्गा-पीच्छा सोचे इस अखाड़े में कूद जाइए। क्या पता कुछ छलककर आपके हाथ भी लग जाए। इस बहस से किताब,लेख औऱ शोध के कई सूत्र मिलने की संभावना है,बशर्ते की खुला महौल कायम रहे। फिलहास बहस का ये नमूना आपकी सुविधा के लिए-




Ajeet Anjum
अंग्रेजी चैनल पर अगर किसी विषय पर घंटों बहस होती रहती है, उसे रेटिंग मिलती है. हिन्दी चैनल पर डिबेट के कार्यक्रम को रेटिंग नहीं के बराबर मिलती है . क्या हिन्दी चैनल के दर्शक गंभीर मुद्दों पर बहस नहीं देखना चाहते ? टाइम्स नाऊ पर अरनव हर रोज घंटे भर बहस करते हैं , राजदीप , सागरिका या बाकी एंकर्स भी करते हैं लेकिन हिन्दी चैनल पर प्रसून , आशुतोष या विनोद दुआ , अभिज्ञान या कोई और एंकर , बहस को टीआरपी नहीं मिलती , क्यों ?
Yesterday at 10:51pm • Comment • Like
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Nabeel A. Khan
i guess programmes like Hum Log must be getting gud TRP
Yesterday at 10:55pm

Ajit Anjum
बुरी खबर , नहीं मिलती उसे टीआरपी . दिबांग के मुकाबला को भी नहीं . आईबीएन के मुद्दा को भी नहीं . मैं तुलनात्मक बात कर रहा हूं . क्या माना जाए कि अंग्रेजी के दर्शक न्यूज और डिबेट को लेकर ज्यादा सीरियस हैं ,हिन्दी की तुलना में .
Yesterday at 10:57pm

Ranjan Rituraj
बात सही है ! एक नज़र प्रिंट मीडिया पर डाल दें ! अंग्रेज़ी अखबार और हिंदी अखबार - जवाब आपके सामने होगा ! मुझे लगता है - हम भारतवासी "अंग्रेज़ी" में ज्यादा बढ़िया सोचते हैं ! या फिर ..अंग्रेज़ी एक बेहतर क्षेत्र को 'कवर' करती है ! हिंदी और अंग्रेज़ी का फर्क उतना ही जितना ...विनोद दुआ और प्रन्नोय रॉय में है ! ( याद रहे दोनों ने एक साथ दूरदर्शन में कदम रखा था )
Yesterday at 11:06pm

Nabeel A. Khan
I feel there are few factors which influences TRP- First-I dont think that the TRP is right approach to see weather a show is hit or not as I have strong reason for that as there over 134 million TV sets in India and TRP is calculated on few thousand sample TV sets.

Second-Times Now's News Hour is popular because of its presentation and aggressive style, raise, guests and topic picked up are strictly for a defined target audience as if we see other such debate shows dont do that good just take Barkha's show We the ppl, Nidhi's show Left Right Centre,

... See More
Third-English channel has mostly middle class viewer who are more interested in knowing about nationwide issues while Hindi speaking viewer who mostly reside in rural area or tier two cities and belong to lower middle class their more focus it to know about their region, or less serious issues which u have mentioned. The other reason hindi channel audience are more concerned about very base level issues of their region
Yesterday at 11:18pm

Nadim Akhter

aap ye maan ke chaliye ke angrezi daan log serious hain aur hindi waale RAKHI SAWANT jaisi cheez dhoondhte hain...ek rickshawala ya chaya waala ghar jaa ke kya dekhna chahega bhala...EK BAAT AUR...YE ANGREZI WAALE JO BAHAS DEKHTE HAIN...WOH VOTE KARNE NAHIN JAATE....
Yesterday at 11:28pm

Ajit Anjum
नबील , टीआरपी के पैमाना को मैं कभी सही नहीं मानता . मैं खुद कहता हूं दस हजार लोग सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश की पसंद - नापसंद तय नहीं कर सकते . लेकिन इसी टीआरपी से अंग्रेजी चैनल के कार्यक्रम की लोकप्रियता तय होती है , जहां सीरियस डिबेट को लोग देखते हैं . हिन्दी चैनल पर उतना नहीं देखते . यही बात मुझे खटकती है . हिन्दी राज्यो के लोग राजनीतिक खबरों के प्रति जागरूक रहते हैं फिर खांटी राजनीतिक खबरें देखते क्यों नहीं ( नाच - गाना या कॉमेडी की तुलना में ) ...बहुत बड़ा सवाल है .
Yesterday at 11:35pm

Deepak Singh

There is a massive and very substantial difference between the audiences of Hindi and English media. There is a bit rot that exists and the channels are as much responsible for the rot as the audiences themselves.

We all know and have heard for ages -- "jo dikhta hai wo bikta hai"... and then we spoil the taste of the masses and then complain later on that it is something based on consumer demand... sadly but truly there are big factors behind this trend--

The difference between the ENGLISH and HINDI audiences is a big rift dividing the two. You like it or not, more of English viewers than Hindi are the ones closer to the issues, policies, development and global concerns; for their power, position, profession, money or the linkages with the global market. While largely the Hindi viewers are more interested in news, information, updates and scoops related to things closer to lives, personalities, entertainment and TV/showbiz etc..... Therefore, the attention span of the english audience will be higher than the hindi viewer when it comes to issues, themes and perspectives... An english viewer, for his/her certain level of knowledge, exposure and intellect won't tolerate nonsense as much a vernacular viewer will.. for example, stories like "bina driver ke chalne waali gaadi", "paani par chalne waale baba", "swarg ki seedhi", "chhajje mein fansi billo raani" and all the crap re-packaged cheap entertainment shows in the garb of news stories.. Yet, in terms of number of viewers, the actual eyeballs for hindi news channels will be very high... but hindi channels will need to cater to the taste and requirements of the hindi viewers in mind... NDTV is the biggest example how they brought themselves down by leaps and bounds in terms of content quality and formats... a show aiming at lower number of eyeballs but high quality (wealthy) viewers will need to be an english channel with quality content.. in the case of TRP of news channels it is always going to be a misleading show of statistics... as most of the locations with high viewership of hindi news channels are not really tapped by TAM data
Yesterday at 11:41pm

Nabeel A. Khan
@One of the reasons could be the ratio of population as we have a large population of youths in their early 20 who live life on "Just Chill" or "Masti mein jeena" terms and those who are really serious they mostly belong to the English channel audience. While the largest number of viewer constitute of women who are more tempeted to watch melodrama, cookery show, beauty show and lifestyle shows
Yesterday at 11:54pm

Nabeel A. Khan
moreover -I request all the journalists to come forward and press on the govt to review the TRP system. In the past they raised the issue but again it has been dumped. I think TRP is one of the major reasons for the deteriorating condition of TV journalism
Yesterday at 11:59pm

<a href="http://www.facebook.com/profile.php?id=1699161019">Harsh Vardhan Ojha >
It's all about bad management of TRP Ajit Jee.It has nothing to do with the quality of the programme believe me.
17 hours ago

Nadim Akhter

aap theek kah rahe hain Ajit bhai jaan..nt a bad one...bt Times now abhi tak nazar mein chadha nahin....ya phir yun kah sakte hain...its very subjective....SHAYAD LAMBE SAMAY TAK TIMES GROUP MEIN KAAM KARNE KA ASAR HAI...GHAR KI MURGI..DAAAL BARAABAR WAALI BAAT...
17 hours ago

Ashish Jain
मेले में भटके होता तो कोई घर तक पहुच देता ,हम अपने घर में भटके है ,ठोर ठिकाना कहा पायेंगे
17 hours ago

Amitabh Bharti
Please…sorry…excuse me …thank you….ye English ke sabd hai ..lekin hindi bolne wale bhi aksar iska istemaal kate paye jate hai…agar inhi sabdo ko hindi me translate karke kaha jaye to…sayad…utna asar nahi hoga…ye bhasa ki takat hai…ise hum branding bhi keh sakte hai…aaj English as a brand hindi se kafi age hai…English bolne wale …logon ko jayada credible…lagte hai…unhe ijjat milti hai…ek impression hai hamare desh me ..ki ...english me bolne wale intellectual hote hai. fir content ko lekar chahe kitni bhi badi galti ho koi fark nahi padta…log use ignore karte hai…khas kar woo..hindi bhasi …jo ..serious issues ko English channels par dekhna pasand karte hai…( halanki kuch log mahaj isliye English channels dekhte hai ki, isse english language par unki pakad badhegi ).
Jahir hai hindi ke darshak bahash to dekhna chante hai..lekin English channels par…issue anhors, content, presentation aur guests ko lekar bhi hai…kai guests to English speakers hi hote hai..we ya to …hindi me badhiya discussion nahi kar pate ya fir…hindi news channels ko avoid karte hai……
Agar example ke liye… australia me Indian students par attack ke mamle ko le…to discussion me English channels par australiam embassy ke higher officials se lekar ….australia me wahan ke Pm ya deputy pm tak live..dikh jayenge….english channels par aisa akshar hota hai….lekin hindi news channels …yahan chuk jate hai…jahir hai..muddon ko bada banana me english channels ki takat jayada hai…wo serious issues ke liye agenda ..set kar sakte hai.
15 hours ago

Yasser Usman
i feel the english news channels maintained the seriousness since the beginning and never went away from it while the hindi counterparts initially did a few frivolous things n because of it a general perception got established in the psyche of the people that - Ye hindi waaley to rakhi sawant type cheezein kartey hain, serious toh english channels hain. Though I think this perception is not right but people think like this and somewhere they cud not be completely blamed because yes there were some programmes that were really frivolous....
9 hours ago

Ajay Sharma
हो सकता है हिंदी भाषियों की बेल्ट विचारकों की बेल्ट न हो (उसने कई बार साबित किया है, हर तरह के चुनाव में करती है), हो सकता है कि हिंदीभाषी अंग्रेजीभाषी बेल्ट में स्थानांतरण की राह देखता रहा है उदारीकरण के बाद से, हो सकता है कि हिंदीभाषी बदलाव का हिमायती नहीं है, हो सकता है कि हिंदीभाषी हिंदी को भाषा मानता भी नहीं क्योंकि उसका काम अंग्रेजी से चलता है, हो सकता है कि हिंदीभाषी टीवी दर्शक हमेशा उत्तेजना चाहता है क्योंकि विचार की जगह उसने हमेशा मनोरंजन को दी है, हो सकता है और भी बहुत कुछ...
7 hours ago

Amish Srivastava
SPILIT PESONALITY SYNDROME
हालाँकि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है लेकिन कई मित्रों के सुझावों से मैं सहमत हूँ...लगभग तीन साल से मैं कोई भारतीय चेनल्स नहीं देख पाया हूँ...लेकिन २००७ मार्च तक अपने हिंदी चेनल्स का स्वरुप ये था कि वैसे तो दिन भर हम सारे चेनल्स ठोंक के मनोरंजक किस्म का चालू माल ढूंढते थे और दिखाते थे... और वो भी एक दुसरे की प्रतियोगिता में ,ताकि टी आर पी लूटी जा सके , कई बार तो बौसेस खुद खड़े होकर औसत feeds , जो की समाचार के नाम से कोसों दूर थीं और खुद उन अनुभवी boses के व्यक्तित्व से मेल नहीं खाती थी..काटो काटो चिल्लाते थे,.... शाम को वही बौसेस अपने अपने चेनल्स के बड़े चेहरों के साथ गंभीर कार्यक्रम या बहस पेश करने की कोशिश करते थे...इस चालूपने में सबकी आशा ये होती थी की दिन भर चालू और हल्का माल दिखाकर TRP लूटें और शाम को गंभीर बनकर...अब अपनी बनाई हुई split personality को हम चेनल्स तो नहीं समझ पाए लेकिन दर्शक ज़रूर समझ गए...हलके कार्यक्रमों की टी आर पी तो दी दर्शकों ने लेकिन गंभीर बहस पर गोल कर गए...सवाल है ऐसा क्यों हुआ ?? अब आप ही सोचिये की मनोरंजन स्टार राजू श्रीवास्तव भले हो लोगों का कितना ही बड़ा चहेता क्यों न हो लेकिन रात ९ बजे का कोई गंभीर खबर का कार्यक्रम कोई चेनेल हेड राजू से पढ्वायेगा क्या ? खबर कितनी ही गंभीर और सच्ची क्यों न हो...हम गंभीरता से नहीं लेंगे क्यों की राजू ने जो अपनी छवि बनाई है उसे देखते ही दिमाग कुछ और expect करता है,और जो राजू के चाहने वाले हैं वो उससे उसके उसी हलके अंदाज़ को बार बार देखना चाहते हैं ,गंभीर नहीं......अब आप ऐसा समझिये की हमने हिंदी चेनेल्स को राजू श्रीवास्तव बना दिया था...तो शाम के जिन कार्यक्रमों की चर्चा अजित जी ने की है उनमे से कुछ मैंने देखे हैं और वो शानदार भी थे लेकिन दर्शकों ने गंभीरता से नहीं लिया ....क्योंकि ज्यादा समय तो हमने अपने चेनेल की जो छवि बनाई उसमे सिर्फ मनोरंजक ख़बरें ही नहीं बल्कि गंभीर ख़बरों में भी हल्कापन ढूंढ कर और उन्हें मनोरंजन की तरह पॅकेज कर के दिखाया था...,तो हमारे चेनेल्स को चाहने वाले भी वैसे ही लोग इकठ्ठा हुए और जैसे ही उन्ही दर्शकों के सामने हमने अचानक गंभीर बनने की कोशिश की, उन्हें कहाँ समझ में आने वाला था ,वो खिसक लिए... उसी दौरान राखी सावंत ,क्राइम शोस जिसमे एंकर्स के पेश करने के ढंग की खास भूमिका होती थी..., भूत प्रेत ,और किसी भी entertainment channels (zee TV, sony,star plus ) जैसों के रिअलिटी लाइव शोस को काटे जाने के प्रचलन ने जन्म भी लिया था और ये परंपरा इन्ही दिनों पुष्ट भी हुयी ...मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि मैं भी इस दौर का एक हिस्सा रहा हूँ...तो मोटी बात ये है कि किसी इंसान की peronality या व्यक्तित्व की तरह ही हर चेनेल की एक personality होती है . हम उस व्यक्तित्व को जैसा विकसित करेंगे ,वैसे ही लोग उसे देखेंगे और चाहेंगे...मैंने देखा तो नहीं लेकिन जानना चाहता हूँ क्या और्नब ने वाकई Times Now का व्यक्तिव ऐसा तैयार किया है जिसपर गंभीर मुद्दों पर बहस ठीक लगती है ? और सबसे अच्छी खबर ये है कि उस व्यक्तित्व को बनाना हमारे ही हाथ में तो है...माफ़ कीजियेगा लगता है सन्देश थोडा लम्बा हो गया..
6 hours ago

Pramod Chauhan
अजीत जी,मुझे लगता है कि हिन्दी के दर्शक भी बहस देखना चाहते है और वो रेटिंग भी देती है लेकिन विषय यदि बिकाऊ है तो ही रेंटिग आती है आजतक पर रविवार दस बजे बहस का कार्यक्रम है और जब भी इसमें राज ठाकरे,क्रिकेट या फिर आरुषि जैसे विषयों पर बहस हुई हमेशा बहुत अच्छी रेंटिग आई है.. हिन्दी का दर्शक भी डिबेट देखना चाहते है कई बार आईबीएन 7 का कार्यक्रम मुद्दा या फिर एनडीटीवी के कार्यक्रम मुकाबला ने अच्छी रेंटिग दी है..याद किजिए मुकाबला में जब हंसी के मुद्दे पर बहस हुई थी तो उस टाइम बैंड में वो नंबर वन पर पहुंच गया था.. शायद हिन्दी का दर्शक इतना जागरुक है कि उबाऊ विषयों पर बहस यहां नहीं बिकती है।
5 hours ago

Ajit Anjum
प्रमोद जी , आप तो अनभवी हैं , रेटिंग किस तरह के डिबेट को कितनी मिलती है , आपको भी पता भी होगा . आपने खुद कहा मुकाबला को कब और क्यों रेटिंग मिली थी . अगर मुकाबला जैसे जमे जमाए कार्यक्रम को रेटिंग हंसोड़ों का मजमा लगाकर मिले तो समझ सकते हैं रेटिंग बहस को मिल रही है या सुनील पाल , ख्याली जैसे लोगों को . मुझे याद कि जब उस एपिसोड को रेटिंग मिली थी , तो एनडीटीवी ने उसे खूब रिपीट किया था . दिबांग जैसे सीनियर जर्नलिस्ट का शो रेटिंग के लिए इन हंसोड़ों का मोहताज बन गया , तो क्या कहेंगे आप . मुद्दा को मैं अच्छा कार्यक्रम मानता हूं लेकिन उन्हें अपेक्षित रेटिंग नहीं मिलती . यही हाल एजेंडा और न्यूज प्वाइंट का भी है . ये सभी कार्यक्रम बेहतरीन माने जाते हैं लेकिन इन्हें वाजिब रेटिंग नहीं मिलती . जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है . उस टीआरपी के पैमाने से अंग्रेजी चैनल्स पर हो रही बहस को रेटिंग मिलती है . ये चिंताजनक है . क्या हिन्दी दर्शक गंभीर चीजें नहीं देखते ?इन सवालों से हम हर रोज जूझते हैं , आपके चैनल में लोग जूझते होंगे .
7 hours ago
5 hours ago

Vineet Kumar
हिन्दी चैनलों पर लोग बहस करने के बजाय ज्ञान देने की मुद्रा में आ जाते हैं। वो प्रीचिंग के मूड में आ जाते हैं। उन्हें लगता है कि सामने जो ऑडिएंस देख रही है वो अंगूठा छाप है। यकीन मानिए अंग्रेजी चैनल के लोग समझते हैं कि वो जो कुछ भी कह रहे हैं,उसे पढ़ी-लिखी ऑडिएंस देख-सुन रही है।...दूसरी बात,हिन्दी चैनल के लोग अमेरिका की बात करते-करते मुनिरका आ जाते हैं। अब आप ही बताइए कि जब टीआरपी के पीपल मीटर अर्वन एरिया,मिडिल और अपर मिडिल क्लास इलाके में लगे हैं तो ऑडिएंस वेवकूफ कैसे हो गयी।..
5 hours ago •

Ajit Anjum
विनीत मैं इस बात पूरी तरह असहमत हूं. हिन्दी चैनल पर अगर विनोद दुआ ,पंकज पचौरी , प्रसून , अभिज्ञान , आशुतोष , प्रभु चावला जैसे तमाम सीनियर पत्रकारों के लिए अगर आपकी ये राय है तो मैं उसे मानने को तैयार नहीं . राजदीप खुद भी कई बार आईबीएन -7...See More
5 hours ago

Ajit Anjum
अगर आप पहले से तय सोच और पूर्वग्रह के साथ ये मान लेंगे कि हिन्दी चैनल्स के पत्रकारों को बहस करने की तमीज नहीं तो हमें असहमति है .
5 hours ago

Vineet Kumar
आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं कि आपने जो मुद्दा उठाया है उस पर गंभीरतापूर्वक रिसर्च करने की जरुरत है।..संभवतः शुरुआती दौर पर हमने जो अनुभव किया है वो एक कारण तौर पर दिखायी देता है। हां ये जरुर है कि ये अकेले ही सबकुछ तय नहीं करता। ये पूरी तरह एक सोशियोलॉजिकल रिसर्च है। ऑडिएंस के मिजाज को जानन-समझने का मसला है। उसके बैग्ग्राउंड,वे ऑफ रिसीविंग का मामला है। इस पर काम होना चाहिए। अच्छा लग रहा है कि टेलीविजन पर लिखते-पढ़ते हुए मैं जिन सवालों पर बात करना चाह रहा हूं,उसे आगे ले जाना चाह रहा हूं वो सब आपकी तरफ से आ रहे हैं। मैं तो कई बार कह चुका हूं कि हमें सारे मामले को टीआरपी की छतरी के नीचे लाने के बजाय उन मुद्दों पर बात की जानी चाहिए जो कि सीधे-सीधे टीआरपी को लेकर होनेवाले बहस नहीं है। इस बहस को आगे ले जाने से हमें अंदाजा लग जाएगा कि हिन्दी टेलीविजन ने किस तरह की अभिरुचि का विकास किया है।
इन सब बातों के अलावे एक बात तो है कि बहस और विमर्श को लेकर हिन्दी चैनलों के जो कार्यक्रम फिक्स हैं उसे तो ऑडिएंस देखती ही है। टीआरपी का तो साफ-साफ नहीं कह सकता लेकिन हां इतना जरुर है कि वो लोगों के बीच पॉपुलर कार्यक्रम हैं। इसलिए सब कुछ ऑडिएंस पर थोप देना,इस पर असहमति है।
5 hours ago •

Amish Srivastava
मैं ये मानता हूँ कि हिंदी में talent कि कोई कमी नहीं है,लेकिन ये भी मानता हूँ कि भाषा में भी कमी नहीं है...कभी कभी ये लगता है कि हिंदी की इन्ही गंभीर बहसों को, कार्यक्रमों को अगर किसी अंग्रेजी चेनेल पर prime time दिखाया जाए तो मुझे लगता है हिंदी चेनेल्स के मुताबिक ज्यादा रेटिंग मिल सकती है...उन्होंने हमसे ज्यादा गंभीर दर्शक इकठ्ठा किये हैं..
5 hours ago

Vineet Kumar
एक बात और..ये बहस सिर्फ हिन्दी-अंग्रेजी चैनलों को लेकर नहीं है बल्कि पूरी नॉलेज इंडस्ट्री में है कि मनोरंजन के स्तर पर तो हिन्दी ठीक है लेकिन नॉलेज की भाषा अंग्रेजी होगी। ये टेलीविजन के भीतर भी है। अंग्रेजी आज भी प्रायमरी सोर्स की तरह काम करता है। बहस उसी का हिस्सा है। इसलिए इस बहस का एक सिरा भाषा को लेकर बननेवाली डेमोग्राफी से भी जुड़ती है।
5 hours ago •

Ashutosh Ashu
बहस को लोग तब देखते है जब समाज में कोई मुद्दा गरम हो और लोगों को छूता हो । ज्यादातर टीवी पर बहस सिर्फ बहस के लिये होती है । पाकिस्तान का उदाहरण ले । वहां सबसे ज्यादा लोकप्रिय शोज उनके टाक शोज है। लोग खूब बहस करते हैं और खूब देखते है क्योकि समाज संकट मे है , उसका अस्तित्व खतरे में है । लोग इन बहसों के जरिये संकट को समझना भी चाहते है और उसका निराकरण भी खोजना चाहते हैं । हिंदुस्तान का टीवी देखने वाला मिडिल क्लास इस समय फील गुड के मूड में है । उसकी चिंता अस्तित्व की नहीं है और समाज अपने को बेहतर महसूस कर रहा है। राजनीतिक आंदोलन और सामाजिक आलोढन कहां है तो बहस के लिये स्पेस कहां है ।
5 hours ago

Ajit Anjum
आशुतोष जी , अच्छा लगा , आप इस बहस में आए . अंग्रेजी चैनल पर टॉक शो को लोग क्यों देखते हैं , हिन्दी चैनल पर क्यों नहीं , ये एक सवाल है , जिस पर विचार करने की जरूरत है . जब मैं कह रहा हूं नहीं देखते हैं तो पब्लिक एट लार्ज की बात कर रहा होता हूं . टीआरपी के एक ही पैमाने पर अंग्रेजी चैनल हिट है लेकिन हिन्दी चैनल के टॉक शो को उतनी रेटिंग नहीं मिलती है ....See More
4 hours ago

Pushkar Sinha
हिंदी चैनल पर जब टॉक शो आता है तो कोई ना कोई दूसरा हिंदी चैनल कॉमेडी, रिएलिटी दिखा रहा होता है. पब्लिक उधर भाग जाती है. टॉक शो अंग्रेजी चैनल का हिस्सा लगता है. हिन्दी में लगता है हम न्यूज दिखाने के गरज से टॉक शो कर रहे हैं. वैसे स्तर में अंग्रेजी या हिंदी के टॉक शो बराबर होते हैं. हिंदी के टॉक शॉ कहीं कम नहीं होते. गेस्ट पर डिपेंड करता है शो कैसा होगा.
3 hours ago

Ashutosh Ram Tripathi
social serve ke jrurat hi....
3 hours ago

">Pramod Chauhan
अजीत जी, आपकी बात सही है लेकिन मेरा मानना है कि यदि बहस का विषय बिकाऊ है..और गेस्ट मजबूत है साथ ही चैनल की रिच ठीक है तो टीआरपी आती ही है.. बहस हिन्दी या अंग्रेजी टेलीविजन की तुलना के बजाए इस बात पर होना चाहिए कि क्या सिर्फ टीआरपी ही प्रोग्राम के हिट या फ्लॉप होने का पैमाना है ?
3 hours ago

Shail Rawat
ऐसा नहीं कि हिंदी न्यूज़ चैनल में होने वाली बहस की रेटिंग कम हैं ...रजत शर्मा का मशहूर शो" आपकी अदालत "की रेटिंग उनके चैनल में चलने वाले न्यूज़ की रेटिंग से हमेशा ज्यादा होती हैं ......अब जहाँ तक गंभीर मुद्दों पर बहस की बात हैं तो आपको दो चार अतिथि आपको हर चैनल में बाद विवाद करते हुए नजर आ जायेंगे ..बिषय कोई भी हो ..उनका ..कोई रिजल्ट नहीं निकलता ....फिर जनता उन प्रतिनिधियों को नकार देती हैं ...जहाँ तक रेटिंग का मुद्दा हैं तो ..कहना मुश्किल हैं रिमोट आपके हाथ में हैं .....
2 hours ago

Aasmohammad Kaif
Hindi wale jaggagenge tou dunia wale bhaggaenge.............
2 hours ago

Dheeraj Bhatnagar
अजीत जी का सवाल बेहद गंभीर है... जहाँ तक मैं समझ सकता हूँ, हिंदी चैनल्स पर गंभीर बहस के प्रोग्राम सिर्फ इसलिए नहीं देखे जाते, क्योंकि मादरी ज़ुबान में मसख़रे और हंसोड़ देखने वाली जनता को ज्यादा entertaining लगते है. क्योंकि, हिंदी चैनल्स ने entertainment को खबरों का हिस्सा बना दिया है, और अंग्रेजी चैनल्स के पास "रतन नूरा" और "ख्याली" के लिए कोई time-slot नहीं है... दुःख की बात तो ये है कि कई बार गंभीर ख़बर आने के बावजूद हिंदी टी.वी चैनल्स के लिए "हंसी की महफ़िल" का व्हील तोड़ना मुश्किल होता है... आख़िर TRP मीटर जो चल रहा है... जबकि अरनब गोस्वामी ख़बर पर टूट कर पड़ते है... और जब तक हिंदी चैनल्स ख़बर पर आते है... अंग्रेजी के चैनल उस ख़बर को मुद्दा बना कर बहस में जुट जाते है... और देश के वो लोग जिन्हें सिर्फ खबरों से सरोकार है... वो खुद को अंग्रेज़ी चैनल्स पर चल रही बहस का हिस्सा बना लेते है...
about an hour ago
इस मसले पर आगे भी बहस जारी है। मेरे लिखे और कमेंट चुने जाने तक इतना ही।..

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मिहिर की तरफ से एक गाना सुनने की सलाह और शाहरुख खान की एक बाइट ने मुझे संस्मरणों में मां के बजाय पापा को याद करने पर मजबूर किया। ऐसा कैसे हो सकता है कि जिस बाप ने मुझे पैदा करने से लेकर अपने नाप के जूते पहनने तक बड़ा किया उसकी याद इस शहर में रहकर नहीं आती है। सिनेमा हो या फिर मेरे अपने संस्मरण-मां की इतनी यादें इतनी हावी रहती है कि पापा को याद करने का मौका ही नहीं मिलता। उदास होने पर,खुश होने पर,कुछ हासिल होने पर,भावुक होने पर,दीवाली आने पर और यहां तक कि मदर्स डे पर सिर्फ और सिर्फ मां की याद आती है,पापा की नहीं। मैं सोच-सोचकर परेशान रहता हूं कि मां और पापा की याद साथ-साथ क्यों नहीं आती? साथ न आए तो न आए अकेले फादर्स डे पर तक वो याद क्यों नहीं आते? मेरा एक दोस्त है जिसके पापा को मैं अनुपम खेर कहता हूं जिन्होंने उसके प्यार के लिए हॉकी स्टिक से मार तक किया,वो कहता है- ये तुम्हारे वेहया होने की निशानी है। उसे मां के मुकाबले पापा की याद ज्यादा याद आती है। किताबें खरीदते वक्त,बुशर्ट खरीदते वक्त,लड़कियों पर बात करते वक्त,क्लासिकल सिनेमा पर बात करते वक्त। अबकी बार अगर मिले तो उसके आगे पैरोडी गाउंगा शायद- पापा-पापा क्यों करते हो,पापा पे क्यों मरते हो,इतना तो मुझे बतला दे तू,पापा को कैसे याद करते हो?

अगर मैं सपाट शब्दों में कह दूं कि मुझे सचमुच पापा की याद नहीं आती तो झूठा करार दिया जाउंगा। जिस घर में हर मोर्चे पर पापा मौजूद रहे,उनकी याद भला कैसे नहीं आ सकती है? मुझे थोड़ा साहित्यिक मिजाज के हो जाने की छूट दीजिए तब मैं एक ही लाइन कहूंगा- पता नहीं क्यों पापा को जब भी याद करता हूं तो मुझे अपने जीवन का कृष्ण पक्ष याद आता है,शुक्ल पक्ष याद ही नहीं आता। खुशी के मौके पर भी वो याद आते हैं तो मामला कृष्ण पक्ष का ही याद हो आता है। मसलन दीवाली के दिन मुझे मोटरसाइकिल पर बिठाकर घुमाते पापा याद नहीं आते,हाथ से पटाखे छीनते पापा याद आते हैं। सिनेमा देखते वक्त साथ में ले जाकर अंजता सिनेमा(बिहारशरीफ)में गोद में बिठाकर पापड़ खिलाते पापा याद नहीं आते,बल्कि साईकिल के मडगार्ड में 'खुदा गवाह' की बरसाती लगाने पर अंधाधुन पीटते पापा याद आते हैं। कडकड़ाती ठंड में मां से छुपाकर अंडे खिलाते और बाद में कुल्ला कराते पापा याद नहीं आते बल्कि स्वेटर न पहनने पर-लाओ इसके सारे स्वेटर,मफलर चूल्हे में झोंक देते है,कहते पापा याद आते हैं। बालों में तेल लगाना ही छोड़ दिया क्योंकि तेल की खुशबू से ज्यादा जल्दी में शीशी का ढक्कन खुला छोड़ने पर पापा के थप्पड़ याद हो आते हैं। बाइक बहुत अच्छी चलानी आती है,दिल्ली में पटेल सर की बाइक को खूब पेरा है(बेरहमी से इस्तेमाल किया है) लेकिन कभी खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। क्लास टेन्थ तक तो खुले तौर पर साईकिल तक नहीं चलाने दी कि सीना कमजोर हो जाएगा और चलाता तो अक्सर पीछे से कहा करते- बाय में चलाओगे तो धक्का लग जाएगा। यकीन मानिए,थोड़ी दूर जाने पर मैं दीवार से टकरा जाता। मेरा दोस्त हता है- वयं रक्षामं तो मेरे पापा ने पढ़ने को दिया था मुझे। पटना से वो परसाई रचनावली लेकर आए थे। मैं बस इतना कहता कि पापा रेणु,प्रेमचंद,नागर के उपन्यासों को पढञते देख भड़क जाते। मुझे पढ़ने के मामले में कभी भी उनकी तरफ का हौसला याद आने के बजाय रांची जाने के लिए पैर छूने और उनके मुंह फेर लेने की घटना याद आती है।..तो इस तरह से क्या नहीं याद आता है पापा को लेकर।..और वो जूतेवाला मामला भी तो। पिछली बार जब मैं वूडलैंड के शोरुम से अपनी जिंदगी के सबसे मंहगे जूते औj वो भी अपनी कमाई से खरीदने के बाद बाहर निकलकर चहकर रहा था। मेरे साथ के दोस्त ने स्कूली जीवन के जूते की याद दिला दी। तब मुझे फिर पापा याद आए कि कैसे दो दिन पहन लेने के बाद पापा ने बाटा के जूते के तलबे को मिट्टी तेल से साफ कराकर वापस करा दिया था। दूकानदार जान-पहचान का था इसलिए वापस ले लिया लेकिन इतना जरुर कहा कि ऐसे वापस थोड़े ही होता है। मुझे भी क्या पता कि ये जूते किसी और बच्चे के पैर को नसीब होगें। बाटा के पहनने के पीछे एक ही तमन्ना थी कि जो दो-तीन कमीने मेरे दोस्त हैं उन्हें पीछे से टिकाकर पत्थर के ठोकर मारुंगा,सो कुछ प्रैक्टिस कर ली। बाद में रामदास को पापा के साथ जाकर नाप दिया और 11 दिनों के इंतजार के बाद( मां के शब्दों में 11 दिनों तक आंख चीरने पर)वो जूता बनकर आया। ये सब याद करते हुए वूडलैंड के जूते की सारी खुशी हवा हो जाती है। अब जब भी पापा पूछते हैं कि घड़ी कितने में ली,जूता बहुत अच्छा है,कितने में लिया- मैं औसत से ज्यादा उंची आवाज करके बताता हूं- इतने में लिया। मां चिढ़कर कहती है- सबको दुनिया के लोग से कम्पटीशन है,इसको सबसे ज्यादा अपने बाप से ही कम्पटीशन रहता है।..तो देखिए न,कहां-कहां पापा याद नहीं आते। लेकिन फिर वही बात हर बार वो कृष्ण पक्ष की तरह याद आते हैं और मैं हूं कि हमेशा संस्मरण की दुनिया में शुक्ल पक्ष की तरह भागा-भागा फिरता हूं। लेकिन दोबारा कहूं तो मिहिर के इस गाने को सुनने की सलाह और शाहरुख की उस बाइट ने मुझे पापा के संस्मरणों में शुक्ल पक्ष तलाशने के लिए बेचैन कर दिया।

इस्किया फिल्म का ये गाना जिसकी लाइनें कुछ इस तरह से है-

ऐसी उलझी नजर उनसे हटती नहीं
दांत से रेशमी डोर कटती नहीं
उम्र कबकी बरस के सुफेद हो गयी
कारी बदरी जवानी की छंटती नहीं
......................
डर लगता है तन्हा सोने में जी
दिल तो बच्चा है जी,दिल तो बच्चा है जी
थोड़ा कच्चा है जी,दिल तो बच्चा है जी।

......................
दिल सा कोई कमीना नहीं
डर लगता है इश्क करने में जी
दिल तो बच्चा है जी।..


राहत फतेह अली खान के गाए इस गाने में पापा को लेकर कोई प्रसंग नहीं है। कोई एक शब्द और भाव नहीं। लेकिन पता नहीं क्यों इस गाने को सुनते हुए मैं महसूस करता हूं कि अगर देशभर के बाप को जमा करके बच्चे प्रार्थना-सभा में गाए जानेवाले गीत की जगह इस गाने को गाएंगे तो सारे बाप इमोशनल हो जाएंगे। प्यार,अफेयर,फ्लक्चुएशन,प्लेटॉनिक प्यार,इन सबमें चोट खाए एहसासों को झट से समझ जाएंगे। तुरंत अपना कंधा आगे कर देंगे। बहरहाल
इस गाने को सुनकर अब पापा के संस्मरण का शुक्ल पक्ष याद करता हूं। इंटरमीडिएट की परीक्षा हमने दे दी थी। कोई खास काम नहीं था। नानीघर से भी हो आए थे। तड़के उठने की आदत अभी भी बनी हुई थी लेकिन उठकर करें क्या,समझ नहीं आता। तब हमने बहुत ही धीमी आवाज में सेटमैक्स पर आनेवाली पुरानी फिल्में देख शुरु की। पापा दूसरे कमरे में होते लेकिन उन्हें आभास होने लगा था कि मैं सुबह तीन-चार बजे टीवी देखता हूं। सीडी डिस्क या फिर वीडियो का इंतजाम नहीं था इसलिए पापा निश्चिंत थे कि कुछ गंदा नहीं देखता होगा। एक बार आकर देखा तो गाइड फिल्म आ रही थी। वो भी बैठक देखने लगे। फिर अगले दिन तीसरी कसम...और फिर बाप-बेटे के फिल्म देखने का सिलसिला चल निकला। मां बहुत खुश होती उन दिनों कि चलों ठीक जम रहा है। पापा अपने जमाने के प्रसंग सुनाने लगे। सुरैया,नरगिस,मधुबाला का नाम लेने के बाद मैं पापा का चेहरा गौर से देखता..एक अजीब सी कसक। आज तो हम विपासा,कैटरीना,करीना का नाम लेकर कुछ भी फील नहीं करते। बहुत हुआ तो शी शी शी और बड़ी हॉट है बोलकर चुप मार जाते हैं। हीरोईनों को सम्मान के साथ उसका दीवाना हो जाने का भाव मैंने पापा के चेहरे पर अक्सर पढ़ा। तभी मैंने महसूस किया कि पापा के भीतर भी एक दूसरे किस्म की धारा बहती है जो उनके चट्टानी स्वभाव से अलग है। जीवन में पहली बार मुझे पापा से ज्यादा दोस्त लगे। ये अलग बात है कि तीन साल पहले से ही उनका बाटा सैंडक पहनता आ रहा था। दिल तो बच्चा है जी को सुनते हु्ए मुझे पापा के जमाने के गाने और फिल्में ज्यादा याद आते हैं। एफ एम के मुहावरे में कहूं तो आपके जमाने में बाप के जमाने के गाने याद आ जाएंगे,इसे आप सुनिए जरुर। मिहिर ने भी फेसबुक पर कमेंट देते हुए लिखा है कि-इस गाने को सुनकर तो राजकपूर के ज़माने याद हो आए!

शाहरुख खान ने अपनी बाइट में कहा कि अमिताभजी का मैं सम्मान करता हूं। अमिताभजी ने पिछले तीस साल में जो नहीं था वो फिल्म इन्डस्ट्री को दिया। उन्होंने हमें "पा" दिया,बाप दिया। शाहरुख खान की बाइट सुनकर मुझे अपहरण के उस प्रोफेसर बाप का ध्यान आता है जो ये जानते हुए भी मेरा बेटा अपहरण के धंधे में लग गया है। खुलेआम घो।णा करता है कि अब वो मेरा बेटा रहा कहां लेकिन सोए हुए उसी बेटे को चादर ओढ़ाता है। ऐसे बाप के कई प्रसंग हिन्दी सिनेमा में हैं। चादर ओढ़ाते हुए,अपने हिस्से की रोटी खिलाते हुए,बेटे को नहलाते हुए। मैं उन सारे सिनेमा के प्रसंगों को याद करना चाहता हूं। बाप-बेटे के सारे शॉट्स को खोजना चाहता हूं।..इस लोभ से नहीं कि कोई लेख लिखना है बल्कि उन एहसासों से गुजरने के लिए कि मां के साथ पापा का याद आना जरुरी है।..फिलहाल तो मन कर रहा है- इस्किया की सीडी या डीवीडी खरीदूं,लिफाफे में बंद करुं और उस पर लिखकर- पापा तुस्सी ग्रेट हो उनके पते पर स्पीड पोस्ट कर दूं।..
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मोहल्लाlive पर हमने लिखा-क्‍या IBN 7 के एंकर संदीप चौधरी में भाषाई शऊर नहीं है? देर रात इस पोस्ट को लिखने के पीछे का मकसद इतना भर था कि हम संदीप चौधरी की वेशउर भाषा से बुरी तरह आहत हुए। हम अपने पसंदीदा एंकरों की खत्म होती जा रही भाषा को लेकर चिंतित हुए। आक्रामक दिखने के लिए भाषाई स्तर वो दिनोंदिन इतने उथले होते जा रहे हैं कि उनके लिए किसी के प्रति सम्मान का भाव नहीं। पहले तो खुशामद करके एक्सपर्ट और गेस्ट को स्टूडियो में बुलाते हैं फिर उनकी उतारने में लग जाते हैं। अपने को गॉडफादर समझने लग जाते हैं। संदीप चौधरी ने बहुत शांत मिजाज में बात करनेवाले मशहूर लेखक और 3 इडियट्स की क्रेडिट को लेकर विवादों में आए चेतन भगत को कहा कि आप हल्ला कर रहे हैं। हम इस बात पर सोचने को मजबूर हो गए कि क्या देश के सबसे पॉपुलर लेखक के लिए ये भाषाई प्रयोग जायज है? लेकिन जैसा कि अब तक अन्तर्जाल की दुनिया में होता आया है कि आप किसी भी मुद्दे पर बात करें,कोई न कोई बंदा ऐसा अवतरित हो ही जाता है जो हसुआ के बियाह में खुरपी के गीत गाने लग जाता है। पोल खोल नाम से एक अनामी अपनी बात रखते इसके पहले ही घोषित कर दिया कि मुझे टेलीविजन का टी तक नहीं आता और पूरी बहस को टीआरपी तक टांगकर ले गए। हम चाहते हैं कि एंकरों की भाषा पर शुरु की बहस को आप पढ़े और उसे फिर से ट्रैक पर लाकर आगे बढ़ाएं-

IBN7 के एंकर संदीप चौधरी के आक्रामक अंदाज़ का मैं कायल हूं। उनके इस अंदाज़ का असर मुझ पर कुछ इस कदर है कि अगर पहले से लेटकर टीवी देख रहा होता हूं तो उनके आते ही उठ कर सीधे बैठ जाता हूं। एक-एक वाक्य और उस हिसाब से चेहरे और नसों के खिंचाव को समझने औऱ महसूस करने की कोशिश करता हूं। लेकिन सच की आवाज़ हमेशा ऊंची होती है या फिर सच बोलने के लिए ज़रूरी है कि ऊंची आवाज़ में ही बात की जाए, इस फार्मूले पर भरोसा रखनेवाले संदीप चौधरी हमें कई बार व्‍यथित भी कर जाते हैं। कई बार महसूस होता है कि इस अंदाज़ को बरक़रार रखने में भाषाई स्तर पर वो बेहद खोखले और हल्के हो जाते हैं।

भारतीय टेलीविज़न में व्यक्ति आधारित समीक्षा या आलोचना की परंपरा विकसित नहीं हुई है। साहित्य या दूसरी विधाओं में एक कवि, कथाकार या आलोचक के ऊपर दर्जनों थीसिस लिखी जाती रही हैं। इसी अनुपात में उन पर शोध-पत्र और किताबें भी लिखी जाती रही हैं लेकिन भारतीय टेलीविज़न समीक्षा चंद मुहावरों, जार्गन और जुमले के बीच ही विश्लेषित कर दिये जाते हैं। आज संदीप चौधरी पर लिखकर टेलीविज़न के भीतर मैं व्यक्ति आधारित समीक्षा की न तो कोई शुरुआत करने जा रहा हूं और न ही साहित्यिक परंपराओं की कलम रोपने की कोशिश कर रहा हूं। मैं तो ऑडिएंस की उस समझ को सामने रख रहा हूं जो टेलीविज़न से हमेशा चैनल के नाम पर जुड़ने के बजाय उस पर आनेवाले लोगों के स्तर पर जुड़ता है। मसलन अगर IBN7 पर आशुतोष, संदीप चौधरी और ऋचा आना बंद कर दें तो मैं ख़बर देखने के लिए तो इस चैनल पर नहीं ही आऊंगा। उसी तरह प्राइम टाइम पर विनोद दुआ, अभिज्ञान और रवीश जैसे लोग आना छोड़ दें, तो एनडीटीवी इंडिया देखकर शाम ख़राब करने का कोई मतलब नहीं है। कहना सिर्फ इतना चाहता हूं कि आज न्‍यूज़ चैनलों की जो स्थिति है, उसमें लोग चैनलों के ब्रैंड से ज़्यादा व्यक्तिगत तौर पर आनेवाले एंकरों के हिसाब से जुड़ते हैं। ये बात पुण्य प्रसून जैसे एंकर के साथ आजमा कर देख लीजिए। पूरी ऑडिएंस का एक बड़ा हिस्सा है, जो कि इनके हिसाब से चैनल देखता है। ये जिस भी चैनल में जाएंगे, वो उन्हें देखेगी। वो पुण्य प्रसून को पहले देखती है, चैनल को बाद में।

बहरहाल, जिस संदीप चौधरी के अंदाज़ के हम कायल होते रहे हैं, वही संदीप चौधरी ने अपने भाषाई प्रयोग के स्तर पर हमें परेशान किया। हमें इस बात को अफ़सोस रहेगा कि एक अच्छा एंकर आक्रामक दिखने के लिए लगातार अपनी भाषा खोता जा रहा है। चेतन भगत और 3 इडियट्स को लेकर क्या कुछ चल रहा है, ये दुनिया जान रही है। दो जनवरी की रात मुद्दा कार्यक्रम के अंतर्गत संदीप चौधरी ने इसी मुद्दे पर बहस चलायी। उस बहस में क्या था और कौन लोग शामिल थे, इसकी तफसील में जाने से बेहतर है कि हम जो बात करना चाहते हैं, वही करें। आगे लिखने से पहले साफ कर दूं कि व्यक्तिगत तौर पर मुझे चेतन भगत की राइटिंग पसंद नहीं है। आज के हवाले से कहूं तो एक हद तक उनका अंदाज़ भी नहीं। लेकिन मेरे ऐसा कहने से चेतन भगत की हैसियत तय नहीं होती। मेरी क्या, शायद संदीप चौधरी के कहने से भी तय नहीं होती। ये अलग बात है कि मेरे कहने और संदीप चौधरी के कहने के असर में आसमान ज़मीन का फर्क है। लेकिन संदीप चौधरी के साथ देश के किसी भी मीडियाकर्मी को इस बात का एहसास होना चाहिए कि चेतन भगत का एक बड़ा पाठक वर्ग है। टेलीविज़न एंकरों को तो अपनी हार्डकोर ऑडिएंस पता करने में वक्त लग जाए लेकिन एक लेखक को मोटे तौर पर उसकी रीडरशिप की जानकारी होती है। इस हिसाब से बात करें तो चेतन भगत के पीछे रीडर्स का एक ज़बर्दस्त बैकअप है। इस हिसाब से चेतन भगत की हैसियत किसी भी मीडियाकर्मी से कम नहीं है।


चेतन भगत क्या लिख रहे हैं, उससे हमारी कितनी सहमति-असहमति है, इस बहस में न जाकर इतना मानने में क्या परेशानी है कि वो इस देश के एक सेलेब्रेटी लेखक हैं। एक ऐसे लेखक हैं, जो दुनिया के आगे साबित कर चुके हैं कि लिख कर आप कहां तक जा सकते हैं? देश का बच्चा-बच्चा (लिखने-पढ़नेवाला) उन्‍हें जानता है। आप सिर्फ कंटेट पर टिककर न बात करके ओवरऑल बात करें, तो वो एक सम्मानित और लोगों के चहेते लेखक हैं। पॉपुलरिटी के मामले में वो किसी भी पेशे के सिलेब्रेटी को टक्कर देने की हैसियत रखते हैं। पिछले साल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में अमिताभ बच्चन से मिलने के बाद जिसके लिए सबसे ज़्यादा होड़ मची थी, वो यही चेतन भगत थे। इसलिए उनकी राइटिंग से मानें या न मानें, पॉपुलरिटी से तो उन्‍हें बड़ा लेखक मान ही सकते हैं।

अब देखिए, मुद्दा में ज़ोर-शोर से बहस चल रही है। चेतन भगत नॉर्मल अंदाज़ में अपनी बात रख रहे हैं। इसी बीच संदीप चौधरी ने दूसरी ही तान छेड़ दी। हैलो फिल्म जब आयी थी तब भी आपको क्रेडिट नहीं दिया गया था, तब तो आप चुप थे लेकिन अब आप हल्ला कर रहे हैं। क्या 3 इडियट्स फिल्म अगर इतनी पॉपुलर नहीं होती तब भी आप ऐसा ही करते। मुझे याद आ रहा कि संदीप ने शायद ये भी कहा, पक्का नहीं कह सकता लेकिन भाव यही थे कि तब भी आप इसी वाल्यूम में बात करते। इसी के जवाब में चेतन ने कहा कि मैं कौन-सा छत पर जाकर चिल्ला रहा हूं। एक लेखक को अपनी बात रखने का हक़ है। लेकिन संदीप उन्‍हें सुनते ही नहीं, चिल्लाते हैं, अपनी ही रौ में बहे चले जाते हैं। सवाल ये है कि संदीप चौधरी या फिर देश का कोई भी मीडियाकर्मी जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है, क्या उसमें लेखक को अपनी बात रखने की आज़ादी शामिल नहीं है। फिर वो चिल्लाना कैसे हो गया? संदीप चौधरी का ये भाषाई प्रयोग जायज़ है? इस पर बात होनी चाहिए।

चेतन भगत ने ऐसा कौन सा अपराध कर दिया कि उसके लिए इस तरह की भाषा इस्तेमाल की जाए? तब फिर आपके ऊपर हमले होते हैं और दिन भर स्टोरी चलती है – लोकतंत्र पर हमला तो वो चिल्लाने से किस रूप में अलग है? बेबाकी और आक्रामक अंदाज़ का मतलब ये तो बिल्कुल भी नहीं कि आपके सामने जो पड़ जाए, उसकी उतार कर रख दें। यही काम उन्होंने आगे भी किया।

चेतन भगत के ये बार-बार कहे जाने पर कि राजू (राजकुमार हीरानी, प्रोड्यूसर : 3 इडियट्स) सिर्फ इतना कह दें कि वो तीसरे नंबर पर यानी अभिजीत जोशी और स्वयं राजकुमार हीरानी के बाद मेरा नाम डाल देंगे, तो सारा झंझट ही ख़त्म हो जाएगा। संदीप चौधरी ने प्रोड्यूसर से पता करके बताया कि वो उठ कर चले गये हैं। कुछ ही देर बाद राजकुमार हीरानी का फोनो चलता है, जिसमें वो बताते हैं कि मेरी पत्नी टीवी पर ये सब देख कर शॉक्ड है। मैं घर पर टीवी देख रहा हूं और मैं भी शॉक्ड हूं कि मैं तो लाइव था ही नहीं, फिर आपने कैसे कह दिया कि मैं उठ कर चला गया? संदीप चौधरी बस इतना भर कहते हैं कि हम कोई ग़लती करते हैं तो इज़हार कर लेते हैं। अब देखिए, जब वो चेतन भगत से बात करते हैं, तो लगता है कि वो पूरी तरह से हीरानी के फेवर में बात कर रहे हैं क्योंकि चेतन के प्रति बहुत ही बेरुखी भाषा अपनाते हैं। लेकिन हीरानी की बात आने पर उठकर चले गये, फिर उनके प्रति भी यही रवैया। हीरानी अपनी पूरी बात करते, इसके पहले संदीप चौधरी शो समेट-समाट कर चल देते हैं। इसी क्रम में हीरानी बता जाते हैं कि चैनल ने उनके साथ क्या किया? मतलब ये कि अगर कोई कॉन्शस न रहे तो लाइन, दो लाइन के प्रयोग से किसी की भी बत्ती लगाने में चैनल को दो मिनट का भी समय नहीं लगता। सवाल ये कि क्या तटस्थ होने या ऑडिएंस को दिखलाने के लिए भाषाई स्तर पर अपने को ख़त्म कर लेना ज़रूरी है? ऐसा लोगों को वाजिब सम्मान देते हुए नहीं किया जा सकता क्या? ये ज़रूरी है कि एंकर हर शो में ये साबित करे कि वो एंकर है और उससे बात करनेवाले जो भी लोग हैं, उनसे नीचे की कतार में खड़े हैं। देखा-देखी में पूरी की पूरी पीढ़ी तटस्थ होने का मतलब भाषाई स्तर पर लोगों की उतार देना समझा करेगी। लोगों को सम्मान देने और भाषाई स्तर पर सभ्य होने का हुनर क्यों खत्म कर रहे हैं हमारे एंकर, जरा सोचिए।
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इस दिल्ली शहर में जो दारु नहीं पीता हो और साथ में कोई चमचमाती लडकी नहीं हो उसके लिए नए साल का क्या मतलब रह जाता है डॉक्टर साहब? नया साल क्या आधे दर्जन से ज्यादा उत्सवों का कोई मतलब नहीं रह जाता। ऐसे मौके हमें घर की याद नहीं दिलाते बल्कि बीए और एम.ए.की याद दिलाते हैं कि हमने बाकियों जैसा ही किसी के साथ कुछ क्यों नहीं किया? अगर किए होते तो बंड़े नहीं घूमते। यकीन मानिए ऐसे मौके पर बहुत टूअर-टापर फील कर रहे हैं। माल रोड़ पर दस रुपये जोड़ी के दो उबले अंडे खाकर जैसे ही उसने दोना फेंका तो यही सब कहने लगा। फिर अपने उपर गर्व होने का बोध कि हम दारु नहीं पीते हैं, औरों की तरह बन-ठनकर लड़कियों के साथ मस्ती नहीं करते। इस वक्त मैं बौद्धिक होना नहीं चाहता था। मेरा कुछ भी बोलने का मन नहीं कर रहा था। वैसे भी आज दोपहर में कोठारी हॉस्टल के सीनियरों ने बहुत दिनों बाद मिलने के नाम पर पकड़कर बहुत पकाया। विश्वविद्यालय की पॉलिटिक्स से लेकर मीडिया को गरियाने का काम और एक-एक प्रोफेसर के नाम पर मां-बहन करके बुरी तरह फ्रस्ट्रेट कर दिया था। मैं उस मनहूस महौल से निकलने के लिए छटपटा रहा था। वहां से भागा तो किस्मत देखिए कमरे पर आए दोस्त ने फिर से वही सब चर्चा छोड़ दी। नौकरी,फ्लैट,गाड़ी शादी। हम एक-एक करके अपने उन दोस्तों को याद करने लग गए जो अब सेटल्ड हो गए हैं। कुछ तो पलटकर कभी फोन तक नहीं करते। ओह..यार पहले कमरे से निकलो। आज हम ये सब क्यों डिस्कश कर रहे हैं। चलो बाहर चलते हैं। बाहर कहां,वही मियां की दौड़ मस्जिद पर। अब यहां भी फिर से...मूड नहीं था। मैं बस माल रोड पर बुके खरीदती लड़कियों,लड़के को कोहनी मारते हुए..ज्यादा बनो मत,यू नो,आइ मीन की गिटपिट अंग्रेजी सुनना चाह रहा था। मैंने कहा- दोस्त,ऐसा करते हैं,घूमते हैं। उसने पूछा कहां- मैंने कहा,आसपास। कमलानगर के शोरुम्स में चक्कर लगाते हैं।..तो चलिए फिर और हम निकल पड़े।

उस पर थोड़ा प्रेशर डाला और लिवाइस की एक कार्गो खरीदने के लिए राजी कर लिया। उसे कार्गो तो बहुत पसंद आ गया। अंदर से खुश भी हो रहा था कि चलो बहुत दिनों बाद कुछ कायदे का पसंद आया। लेकिन फिर कहा-आपके साथ आने से यही दिक्कत है,आप सीधे जेब पर चोट करते हैं। अब आप भी कुछ खरीदिए..ऐसे कैसे होगा। चलो खरीदते हैं और फिर कन्वर्ज की स्लीपर खरीदकर वापस हॉस्टल की तरफ। चारो तरफ हॉस्टलों में डीजे की बहुत ही तेज आवाजें,तेज धुनें। वो एक बार फिर से उदास हो गया। कार्गो खरीदने से हासिल खुशी गायब। बार-बार एक ही बात कहने लगा। आज पता नहीं बाबूजी को क्या हो गया है? सुबह ही फोन करके कहा कि बारह बजे फोन ऑन रखना,नए साल पर फोन करेंगे। हमें डर लगने लगा कि कहीं हम एक बार फिर उदासी की तरफ तो नहीं जा रहे हैं। मैं उससे एकदम से उबरना चाह रहा था। मैं देर रात टीवी देखना चाहता था। उसने फिर उदासी से कहा- डॉक्टर साहब, स्टार वन पर महाभारत खत्म हो गया। मतलब साफ था कि अब क्या करके मन बहलाए....। मेरा मन उसके साथ बिताने का था लेकिन शर्त थी कि मैं किसी भी हालत में सीरियस नहीं होना चाहता था,उदास भी नहीं,नए साल में मां याद नहीं आती कि कोई संस्मरण लिख लिया जाए। ये अपने ढंग का मेरे लिए अकेला उत्सवी महौल है जिसे कि अपने दम पर खेपना होता है। मैंने उसे बाय-बाय कहा और कहा कि रात में धावा बोलते हैं तुम्हारे यहां।

तय कर लिया था कि क्या करना है। फ्लासक में खौलता हुआ पानी भरा। बगल में टी बैग और शक्कर पॉट। लैपटॉप ऑन कर लिया। मुझे कुछ नहीं करना है। जमकर टीवी देखनी है और लगातार फेसबुक पर कुछ न कुछ लिखते जाना है।
हॉस्टल के इस कमरे में ढाई साल से रह रहा हूं। बहुत ही संयमित होकर टीवी,सीडी और रेडियो बजाता आया हूं। लेकिन आज मैंने तीनों रिमोट के फुल वाल्यूम किया। फेसबुक को दूहने की तैयारी शुरु। बिना इस बात की चिंता किए कि लोग इतनी जल्दी-जल्दी स्टेटस बदलने पर कमेंट करेंगे या नहीं। मैं धीरे-धीरे टीवी में डूबता चला जाता हूं। फेसबुक पर स्टेटस बदलना शुरु- टीवी को चलाने के मेरे पास तीन रिमोट हैं- एक टीवी का,दूसरा टीवी रिकार्डर का और तीसरा टाटा स्काई का। दो साल में आज पहली बार मैंने तीनों को लास्ट पर लाकर बजा रहा हूं। एम टीवी फुल..है लव मेरा हिट,हिट...तौबा मेरी तौबा कुड़ी है तू सेक्सी.
शू शू के लिए कमरे से बाहर निकलता हूं। चारो तरफ डीजे की आवाज और शोर से घिरा मेरा हॉस्टल। वापस आकर टीवी की आवाज कम करता हूं। एफ.एम का हाल समझना चाहता हूं। फेसबुक पर लिखता हूं- आइ वना फक यू,आइ वना किस यू, आहूं,आहूं,आहूं...बारी बरसी खटन गियासी..हॉस्टल के चारो के हॉस्टल की आवाजें। मेरे हॉस्टल की ऑथिरिटी ने पढ़ने-लिखने की जगह पर डीजे लगवाने से मना कर दिया। पड़ोस के कमरे से पापा कहते हैं बेटा नाम करेगा और मेरे कमरे में लगातार एफ एम...मन का रेडियो बजने दे जरा।..

तभी मुंबई से अजय ब्रह्मात्मज का फोन। हुलसती आवाज। कैसे हो,नए साल पर क्या कर रहे हो। मैं जबाब देता हूं-कुछ नहीं सर,पिछले आठ दिनों से किसी न किसी बहाने बाहर डिनर कर रहा हूं। बहुत मिलना-जुलना हो गया लोगों से। आज नहीं सिर्फ और सिर्फ टीवी और हॉस्टल में खाना। और आप क्या कर रहे है। मैं-मैंने आज कटहल बिरयानी बनवायी है,रास्ते में उतरकर कहीं छेने की मिठाई लूंगा,केक खाने से ज्यादा नुकसान है। दिल्ली से एक बहुत अच्छी दारु लाया हूं। दोनों बच्चे अपने दोस्तों के साथ मस्ती कर रहे हैं। मैंने सोसाइटी के बुजुर्गों को अपने यहां बुलाया है। जमकर होगी पार्टी। अजय एक ऐसे शख्स हैं जो किसी भी इंसान को कभी बूढ़ा होने नहीं देते,थका महसूस होने नहीं देते। पिछले सप्ताह तीन दिन बिताए हैं उनके साथ मैंने,मेमरेबल डेज इन माई लाइफ। मैंने चुटकी ली,आप तो दुनियाभर के जवान और लौंडों से मिलते हैं,आज बुजुर्गों के साथ क्यों। वो उत्साहित हो जाते हैं,अरे तुम नहीं समझते. बहुत मजा आएगा। मानो सबों को जवान होने का एहसास कराने जा रहे हों।..और सुनो,एक खुशखबरी,मुझे मदर इंडिया का ऑरिजिनल पोस्टर मिल गया। मेरे बच्चों ने इसे अगर संभाल कर रख लिया तो एक प्रोप्रटी हो जाएगी।...और आप एकदम अकेले हो,एकाकीपन ठीक है लेकिन अकेलापन नहीं। मैंने कहा जी। फिर ढेर सारी बातें। सिनेमा पर,पोस्टरों पर,लोगों पर। मैं हंस-हंसकर दोहराता जाता हूं। वो ठहाके लगाते हैं..यानी ऑल इज वेल की टिप्स। मैं जोशिया जाता हूं। रेडियो की आवाज मेरी इस खुशी में साथ नहीं देगा। फिर से टीवी फुल करना होगा।...एम टीवी पर नगाड़ा बजा..नगाड़ा बजा...। तभी न्यूज चैनलों का हाल जानने की इच्छा। एक और फेसबुक पर स्टेटस-
नया साल शुरु होने के पहले एक खुशखबरी- सज्जन कुमार के खिलाफ फिर चलेगा मुकदमा।..मुझे जरनैल सिंह और उसके प्रयास याद आते हैं। सभी न्यूज चैनलों ने अपने-अपने स्तर से मोर्चा संभाल लिया है। जी गानों के पीछे पड़ा है। आजतक राजू श्रीवास्तव का मौगापन लगातार दिखाए जा रहा है। न्यूज24 पर गंगूबाई। आइबीएन7 गोवा की पार्टी में मैनेजमेंट स्टूडेंट की मौत पर लगा हुआ है। एनडीटीवी पर रवीश का व्ऑइस ओवर। अच्छा लगता है सुनना। ठहर जाता हूं। रवीश का थोड़ा व्यंग्यात्मक अंदाज है। राजनीति,जीरो फीगर,चांद-फिजा को लेकर। विनोद दुआ भी ऐसे ही होते जा रहे हैं। एनडी के लोग आजकल व्यंग्यकार हो गए हैं। 09 की नौटंकी का एंकर भी खुद ही व्यंग्य बनकर आया है। फेसबुक पर स्टेटस बदलता हूं-
बार्बी के जीरो साइज पर रवीश कुमार के जबरदस्त शब्द..2009 का लेखा-जोखा दे रहे हैं रवीश..सिर्फ व्ऑइस ओवर का मजा मिल रहा है।..। तभी एक और खुशखबरी- जमीन पर अवैध कब्जे के मामले में आसाराम बापू पर खबर,हटाने के आदेश।. आजतक ने घड़ी लगा रखी है। श्वेता सिंह बताती है कि आज एग्जैक्ट टाइम पर विश कर सकें इसलिए ये घड़ी चलती रहेगी। बहुत हो गया न्यूज चैनल। अब एक नजर मनोरंजन चैनलों पर-
सोनी पर टेली अवार्ड। सारे टेलीविजन कलाकारों की मौजूदगी। जो बसंत की तीसरी पत्नी गहना बालिका वधू में दिन-रात रोती रहती है,यहां जबरदस्त तरीके से नाच रही है। यूटीवी बिंदास पर लगातार 50 गाने एक के बाद एक जारी है। स्टार वन पर राजू श्रीवास्तव। पवित्र रिश्ता का पुराना राग जारी है। डांस पर डांस में जज की फटकार- ये किसका कॉन्सेप्ट था। लड़की जबाब देती है-सर मैं। जज- बहुत ही घटिया आइडिया है। जूनियर दोस्तों ने दरवाजा पीटना शुरु कर दिया। घड़ी देखी,बारह बज गए। फेसबुक पर 2009 का अंतिम स्टेटस अपडेट- लो भइया,अब 2009 गया तेल लेने। अब जो भी जोर-जबरदस्ती करनी हो,2010 के खाते में जाएगा।..
जल्दी लकड़ियों को घेरे हुए मेरे हॉस्टलर दोस्त। मुझे देखते ही चिल्लाते हैं-अरे विनीत आ गया। अब जमेगी महफिल। जमकर होगी बकचोदी। मैंने कहा- सुनो,अपने यहां तो डीजे आया नहीं है। पीजी मेन्ज वालों को बोलो कि आवाज थोड़ी तेज कर दे,हम दो चार सौ रुपये दे देंगे। सब ठहाके लगाते हैं। मैंने कहा-यार एक बार उधार की धुन पर नाचकर तो देखो। फिर ठहाके। तभी एमबीए का एक प्यारा बंदा नहीं। नहीं सर,इंतजाम है। कमरे से साउंड बॉक्स ले आया है। लैप्टॉप से जोड़कर गाने बजने शुरु होते है- पैसा,पैसा क्यों करती है,पैसे पे क्यों मरती है। पीछे से जोर से- पूजा आइ लव यू..मिस यू। आग को पार करता है..आइ वना फक यू आइ वना फक यू। सब एक-दूसरे को काटकर केक खिलाते हैं। अमित सबसे प्यारा जूनियर दोस्त है। गाल पर केक मलता है। मैं कहता हूं-अबे चूतिए,बर्बाद मत कर,मेस बिल ज्यादा आएगा। जबरदस्ती में थोड़े ठुमके लगाता हूं। बाकी के हॉस्टल का हाल लेने के लिए गेट के बाहर। पीजी मेन्ज में ज्यादा रौनक है। रंग-बिरंगी लाइटों के बीच थिरकते रिसर्चर। एक भी हिन्दी गाना नहीं,खालिस पंजाबी औऱ हरयाणवी। जुबली हॉल में मेरे दोस्त इंतजार में हैं। पहुंचते ही एक स्वर में- तोहफा कबूल करें डॉक्टर साहब। लेकिन स्साले सब ललचाकर कॉफी का कप पकड़ा देते हैं। फिर नाचने की जिद। मेरी शॉल एक के गिरफ्त में आ जाती है और मुझे जबरदस्ती नाचना होता है। यहां गानों का मामला अलग है। भोजपुरी पॉपुलर बज रहा है यहां। पूरबिया रंग जमा है। सानिया मिर्जा कट नथुनिया जान मारे ले बीट के पीछे रिसर्चर दिवाने हो जाते हैं। पीछे से हॉस्टल ऑथिरिटी की तारीफ,वो भी यहां ठुमके लगाकर गयी है।...थककर चूर। फिर वीसी ऑफिस का एक चक्कर,वापस हॉस्टल।

मीडिया पर लिखी जेम्स कर्रन और जीन सीटॉन की किताब पॉवर विदाउट रिस्पान्सिविलिटी पढ़ते-पढ़ते पता नहीं कब सो गया। ओह तो ये है नए साल की नई सुबह। किसी भी बाथरुम में जाने का मन नहीं कर रहा। बेसिन में सिर्फ उल्टियां। सारे ट्वायलेट से सिगरेट,वोमेटिंग और शराब की मिली-जुली बेचैन कर देनेवाली बदबू। बेतहाशा पानी मारता जाता हूं। वापस कमरे में आकर सकुचाते और लजाते हुए पुष्कर की दी हुई परफ्यूम को पुश करता हूं,अद्भुत..स्वर्ग सी अनुभूति। एक लड़की दोस्त का फोन,तुम दिनोंदिन कमीने होते जा रहे हो। स्साले एक फोन नहीं कर सकते हो,नए साल पर। एनी वे मुबारक हो ये नया साल और एक दिन बहुत बड़े,बहुत बड़े,बहुत ही बड़े.............बनो।..
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