मिहिर की तरफ से एक गाना सुनने की सलाह और
शाहरुख खान की एक बाइट ने मुझे संस्मरणों में मां के बजाय पापा को याद करने पर मजबूर किया। ऐसा कैसे हो सकता है कि जिस बाप ने मुझे पैदा करने से लेकर अपने नाप के जूते पहनने तक बड़ा किया उसकी याद इस शहर में रहकर नहीं आती है। सिनेमा हो या फिर मेरे अपने संस्मरण-मां की इतनी यादें इतनी हावी रहती है कि पापा को याद करने का मौका ही नहीं मिलता। उदास होने पर,खुश होने पर,कुछ हासिल होने पर,भावुक होने पर,दीवाली आने पर और यहां तक कि
मदर्स डे पर सिर्फ और सिर्फ मां की याद आती है,पापा की नहीं। मैं सोच-सोचकर परेशान रहता हूं कि मां और पापा की याद साथ-साथ क्यों नहीं आती? साथ न आए तो न आए अकेले फादर्स डे पर तक वो याद क्यों नहीं आते? मेरा एक दोस्त है जिसके पापा को मैं
अनुपम खेर कहता हूं जिन्होंने उसके प्यार के लिए हॉकी स्टिक से मार तक किया,वो कहता है- ये तुम्हारे वेहया होने की निशानी है। उसे मां के मुकाबले पापा की याद ज्यादा याद आती है। किताबें खरीदते वक्त,बुशर्ट खरीदते वक्त,लड़कियों पर बात करते वक्त,क्लासिकल सिनेमा पर बात करते वक्त। अबकी बार अगर मिले तो उसके आगे पैरोडी गाउंगा शायद-
पापा-पापा क्यों करते हो,पापा पे क्यों मरते हो,इतना तो मुझे बतला दे तू,पापा को कैसे याद करते हो?अगर मैं सपाट शब्दों में कह दूं कि मुझे सचमुच पापा की याद नहीं आती तो झूठा करार दिया जाउंगा। जिस घर में हर मोर्चे पर पापा मौजूद रहे,उनकी याद भला कैसे नहीं आ सकती है? मुझे थोड़ा साहित्यिक मिजाज के हो जाने की छूट दीजिए तब मैं एक ही लाइन कहूंगा- पता नहीं क्यों पापा को जब भी याद करता हूं तो मुझे अपने जीवन का कृष्ण पक्ष याद आता है,शुक्ल पक्ष याद ही नहीं आता। खुशी के मौके पर भी वो याद आते हैं तो मामला कृष्ण पक्ष का ही याद हो आता है। मसलन दीवाली के दिन मुझे मोटरसाइकिल पर बिठाकर घुमाते पापा याद नहीं आते,हाथ से पटाखे छीनते पापा याद आते हैं। सिनेमा देखते वक्त साथ में ले जाकर
अंजता सिनेमा(बिहारशरीफ)में गोद में बिठाकर पापड़ खिलाते पापा याद नहीं आते,बल्कि साईकिल के मडगार्ड में
'खुदा गवाह' की बरसाती लगाने पर अंधाधुन पीटते पापा याद आते हैं। कडकड़ाती ठंड में मां से छुपाकर अंडे खिलाते और बाद में कुल्ला कराते पापा याद नहीं आते बल्कि स्वेटर न पहनने पर-लाओ इसके सारे स्वेटर,मफलर चूल्हे में झोंक देते है,कहते पापा याद आते हैं। बालों में तेल लगाना ही छोड़ दिया क्योंकि तेल की खुशबू से ज्यादा जल्दी में शीशी का ढक्कन खुला छोड़ने पर पापा के थप्पड़ याद हो आते हैं। बाइक बहुत अच्छी चलानी आती है,दिल्ली में
पटेल सर की बाइक को खूब पेरा है(बेरहमी से इस्तेमाल किया है) लेकिन कभी खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। क्लास टेन्थ तक तो खुले तौर पर साईकिल तक नहीं चलाने दी कि सीना कमजोर हो जाएगा और चलाता तो अक्सर पीछे से कहा करते- बाय में चलाओगे तो धक्का लग जाएगा। यकीन मानिए,थोड़ी दूर जाने पर मैं दीवार से टकरा जाता। मेरा दोस्त हता है-
वयं रक्षामं तो मेरे पापा ने पढ़ने को दिया था मुझे। पटना से वो
परसाई रचनावली लेकर आए थे। मैं बस इतना कहता कि पापा
रेणु,
प्रेमचंद,
नागर के उपन्यासों को पढञते देख भड़क जाते। मुझे पढ़ने के मामले में कभी भी उनकी तरफ का हौसला याद आने के बजाय रांची जाने के लिए पैर छूने और उनके मुंह फेर लेने की घटना याद आती है।..तो इस तरह से क्या नहीं याद आता है पापा को लेकर।..और वो जूतेवाला मामला भी तो। पिछली बार जब मैं
वूडलैंड के शोरुम से अपनी जिंदगी के सबसे मंहगे जूते औj वो भी अपनी कमाई से खरीदने के बाद बाहर निकलकर चहकर रहा था। मेरे साथ के दोस्त ने स्कूली जीवन के जूते की याद दिला दी। तब मुझे फिर पापा याद आए कि कैसे दो दिन पहन लेने के बाद पापा ने
बाटा के जूते के तलबे को मिट्टी तेल से साफ कराकर वापस करा दिया था। दूकानदार जान-पहचान का था इसलिए वापस ले लिया लेकिन इतना जरुर कहा कि ऐसे वापस थोड़े ही होता है। मुझे भी क्या पता कि ये जूते किसी और बच्चे के पैर को नसीब होगें।
बाटा के पहनने के पीछे एक ही तमन्ना थी कि जो दो-तीन कमीने मेरे दोस्त हैं उन्हें पीछे से टिकाकर पत्थर के ठोकर मारुंगा,सो कुछ प्रैक्टिस कर ली। बाद में
रामदास को पापा के साथ जाकर नाप दिया और 11 दिनों के इंतजार के बाद( मां के शब्दों में 11 दिनों तक आंख चीरने पर)वो जूता बनकर आया। ये सब याद करते हुए
वूडलैंड के जूते की सारी खुशी हवा हो जाती है। अब जब भी पापा पूछते हैं कि
घड़ी कितने में ली,जूता बहुत अच्छा है,कितने में लिया- मैं औसत से ज्यादा उंची आवाज करके बताता हूं- इतने में लिया। मां चिढ़कर कहती है-
सबको दुनिया के लोग से कम्पटीशन है,इसको सबसे ज्यादा अपने बाप से ही कम्पटीशन रहता है।..तो देखिए न,कहां-कहां पापा याद नहीं आते। लेकिन फिर वही बात हर बार वो कृष्ण पक्ष की तरह याद आते हैं और मैं हूं कि हमेशा संस्मरण की दुनिया में शुक्ल पक्ष की तरह भागा-भागा फिरता हूं। लेकिन दोबारा कहूं तो मिहिर के इस गाने को सुनने की सलाह और शाहरुख की उस बाइट ने मुझे पापा के संस्मरणों में शुक्ल पक्ष तलाशने के लिए बेचैन कर दिया।
इस्किया फिल्म का
ये गाना जिसकी लाइनें कुछ इस तरह से है-
ऐसी उलझी नजर उनसे हटती नहीं
दांत से रेशमी डोर कटती नहीं
उम्र कबकी बरस के सुफेद हो गयी
कारी बदरी जवानी की छंटती नहीं
......................
डर लगता है तन्हा सोने में जी
दिल तो बच्चा है जी,दिल तो बच्चा है जी
थोड़ा कच्चा है जी,दिल तो बच्चा है जी।......................
दिल सा कोई कमीना नहीं
डर लगता है इश्क करने में जी
दिल तो बच्चा है जी।..राहत फतेह अली खान के गाए इस गाने में पापा को लेकर कोई प्रसंग नहीं है। कोई एक शब्द और भाव नहीं। लेकिन पता नहीं क्यों इस गाने को सुनते हुए मैं महसूस करता हूं कि अगर देशभर के बाप को जमा करके बच्चे प्रार्थना-सभा में गाए जानेवाले गीत की जगह इस गाने को गाएंगे तो सारे बाप इमोशनल हो जाएंगे। प्यार,अफेयर,फ्लक्चुएशन,प्लेटॉनिक प्यार,इन सबमें चोट खाए एहसासों को झट से समझ जाएंगे। तुरंत अपना कंधा आगे कर देंगे। बहरहाल
इस गाने को सुनकर अब पापा के संस्मरण का शुक्ल पक्ष याद करता हूं। इंटरमीडिएट की परीक्षा हमने दे दी थी। कोई खास काम नहीं था। नानीघर से भी हो आए थे। तड़के उठने की आदत अभी भी बनी हुई थी लेकिन उठकर करें क्या,समझ नहीं आता। तब हमने बहुत ही धीमी आवाज में
सेटमैक्स पर आनेवाली पुरानी फिल्में देख शुरु की। पापा दूसरे कमरे में होते लेकिन उन्हें आभास होने लगा था कि मैं सुबह तीन-चार बजे टीवी देखता हूं। सीडी डिस्क या फिर वीडियो का इंतजाम नहीं था इसलिए पापा निश्चिंत थे कि कुछ गंदा नहीं देखता होगा। एक बार आकर देखा तो
गाइड फिल्म आ रही थी। वो भी बैठक देखने लगे। फिर अगले दिन
तीसरी कसम...और फिर बाप-बेटे के फिल्म देखने का सिलसिला चल निकला। मां बहुत खुश होती उन दिनों कि चलों ठीक जम रहा है। पापा अपने जमाने के प्रसंग सुनाने लगे।
सुरैया,
नरगिस,
मधुबाला का नाम लेने के बाद मैं पापा का चेहरा गौर से देखता..एक अजीब सी कसक। आज तो हम
विपासा,
कैटरीना,
करीना का नाम लेकर कुछ भी फील नहीं करते। बहुत हुआ तो शी शी शी और बड़ी हॉट है बोलकर चुप मार जाते हैं। हीरोईनों को सम्मान के साथ उसका दीवाना हो जाने का भाव मैंने पापा के चेहरे पर अक्सर पढ़ा। तभी मैंने महसूस किया कि पापा के भीतर भी एक दूसरे किस्म की धारा बहती है जो उनके चट्टानी स्वभाव से अलग है। जीवन में पहली बार मुझे पापा से ज्यादा दोस्त लगे। ये अलग बात है कि तीन साल पहले से ही उनका
बाटा सैंडक पहनता आ रहा था। दिल तो बच्चा है जी को सुनते हु्ए मुझे पापा के जमाने के गाने और फिल्में ज्यादा याद आते हैं।
एफ एम के मुहावरे में कहूं तो आपके जमाने में बाप के जमाने के गाने याद आ जाएंगे,इसे आप सुनिए जरुर। मिहिर ने भी फेसबुक पर कमेंट देते हुए लिखा है कि-
इस गाने को सुनकर तो राजकपूर के ज़माने याद हो आए!शाहरुख खान ने अपनी बाइट में कहा कि
अमिताभजी का मैं सम्मान करता हूं।
अमिताभजी ने पिछले तीस साल में जो नहीं था वो फिल्म इन्डस्ट्री को दिया। उन्होंने हमें "
पा" दिया,बाप दिया। शाहरुख खान की बाइट सुनकर मुझे
अपहरण के उस प्रोफेसर बाप का ध्यान आता है जो ये जानते हुए भी मेरा बेटा अपहरण के धंधे में लग गया है। खुलेआम घो।णा करता है कि अब वो मेरा बेटा रहा कहां लेकिन सोए हुए उसी बेटे को चादर ओढ़ाता है। ऐसे बाप के कई प्रसंग हिन्दी सिनेमा में हैं। चादर ओढ़ाते हुए,अपने हिस्से की रोटी खिलाते हुए,बेटे को नहलाते हुए। मैं उन सारे सिनेमा के प्रसंगों को याद करना चाहता हूं। बाप-बेटे के सारे शॉट्स को खोजना चाहता हूं।..इस लोभ से नहीं कि कोई लेख लिखना है बल्कि उन एहसासों से गुजरने के लिए कि मां के साथ पापा का याद आना जरुरी है।..फिलहाल तो मन कर रहा है- इस्किया की सीडी या डीवीडी खरीदूं,लिफाफे में बंद करुं और उस पर लिखकर-
पापा तुस्सी ग्रेट हो उनके पते पर स्पीड पोस्ट कर दूं।..