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कल यानी14 मार्च हिन्दी के युवा रचनाकारों के लिए खास दिन होगा। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित युवा रचनाकारों की कुल 13 रचनाओं जिनमें 6 कहानी संग्रह और 7 कविता संग्रह हैं का लोकार्पण एक ही साथ किया जाएगा। एक तो एक ही साथ 13 पुस्तकों का लोकार्पण औऱ दूसरा कि युवा रचनाकारों औऱ पाठकों का जमघट, इस नजरिए से ये लोकार्पण वाकई उत्साह पैदा करनेवाला होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि हिन्दी समाज में युवा रचनाकारों की जो नयी खेप आयी है वो साहित्य के नाम पर कोसने और बदलाव के लिए कलम चलाने के बजाय कोड़े बरसाने की संस्कृति से अपने को अलग रखेंगे। फिलहाल रचनाओं के शीर्षक से साफ झलकता है कि आनेवाली पीढ़ी हिन्दी का मतलब सिर्फ कविता औऱ कहानी से नहीं, कविता और कहानी का मतलब कोरे कल्पना और भाषिक लफ्फबाजी से नहीं ले रही है बल्कि रचनाओं के भीतर समाज और निजी अनुभव को सामाजिक आलेख के रुप में ले रहे हैं। आदर्श को जबरन थोपने के बजाय सामयिक यथार्थ को निपट रुप में रख देने के साहस के साथ इनकी रचनाएं सोशल डॉक्यूमेंट के तौर पर सामने आ रही हैं। संभव है इससे एक हद तक जड़ हो चुकी साहित्य की वर्जनाएं भी टूटे लेकिन हिन्दी और हिन्दी से इतर साहित्य में प्रैक्टिकल एप्रोच की तलाश कर रहे पाठकों के बीच एक नयी उम्मीद जगेगी। जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा और कहते हैं शहंशाह सो रहे थे जैसी रचनाओं को मिसाल के तौर पर लिया जा सकता है।
हिन्दी साहित्य की दुनिया में इन रचनाओं का लोकार्पण महज साहित्यिक जलसा न होकर ऐतिहासिक बदलाव का संकेत भी है। एक हद तक आनेवाले समय में युवा संस्कृति के कई संदर्भ इन रचनाओं और रचनाकारों के बीच से खोजे जा सकेंगे।

भारतीय ज्ञानपीठ
से प्रकाशित युवा रचनाकारों की पुस्तकें
कविता-
कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे- उमाशंकर चौधरी(पुरस्कृत)
यात्रा- रविकांत (पुरस्कृत)
खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएं- - हरेप्रकाश उपाध्याय
अनाज पकने का समय- नीलोत्पल
जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा- निशांत
जिस तरह घुलती है काया- वाज़दा ख़ान
पहली बार- संतोष कुमार चतुर्वेदी

कहानी


डर- विमल चंद्र(पुरस्कृत)
शहतूत- मनोज कुमार पांडेय
अकथ- रणविजय सिंह सत्यकेतु
कैरियर गर्लफ्रैंड और विद्रोह- अनुज
सौरी की कहानियां- नवीन कुमार नैथानी
ईस्ट इंडिया कम्पनी- पंकज सुबीर

आगामी 14 मार्च को हिन्दी भवन, नई दिल्ली में इन पुस्तकों का लोकार्पण श्रीमती शीला दीक्षित, मुख्यमंत्री, दिल्ली
के द्वारा होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुँवर नारायण करेंगे।
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क्या गुरु, तुम तो कहते हो कि बीएचयू (बनारस) में हमलोग लेडिस लोग से बोलने-बतियाने के लिए तरस जाते थे और यहां देख रहे हैं कि न्यूज 24 पर मार लौंडे लोगों के साथ लेडिस लोग झूम रही है। मेरे फोन करते ही वो हड़बड़ा गया- अरे, ऐसे कैसे हो सकता है, हमरे टाइम में तो ऐसा नहीं हुआ। अभी पता करते हैं, अगर ऐसा है तो भाड़ में जाए मई का अश्वमेघ यज्ञ( यूपीएसी पीटी), वहीं जाकर पीएचडी में इनरॉल होते हैं। दो साल तो नेट के नाम पर ही डोरा डालनेवाला काम होगा। करीब दस मिनट बाद फोन आया- अरे भाई, उ सब म्यूजिक और फाइन आर्ट के लौंडे थे, अब उनकी बात कौन करे, उऩलोगों के बीच ऐसा कुछ नहीं होता है. वो तो तालिबानी शासन में भी लेडिस लोग के साथ नाचे तो कोई कुछ नहीं कहेगा। मैंने कहा- लेकिन गुरु नैचुरल नहीं लग रहा था, लग रहा था कि संकोच से गड़े जा रहे हैं दोनो। उसने फिर कहा- तब हिन्दीवाला लोग मिला हुआ होगा, उस टोली में। वही लोग विद्यापति पढ़कर अजमाना भी चाहता है और समाज से डरता भी है। मैंने जोड़ते हुए कहा- अगर घर में कोई पूछे भी तो कह देगी,कैमरेवाले भइया ने कहा था, थोड़ा नजदीक हो जाओ, फ्रेम में तभी आएगा। उसे ये तर्क एदम से पसंद आया, कहा- और क्या, वही कहें, यहां वसंत महिला महाविद्यालय के गेट पर घंटों अगोरे( इंतजार) किए तो कुछ नहीं हुआ और अब कामराज कैसे आ गया।
टेलीविजन की स्क्रीन पर आने की तड़प देश के कई हिस्से के लोगों में साफ दिखी। कहीं एक बार दिख जाए तो कहीं होली खेलते हुए दिख जाए। पटना कॉलेज की लड़कियां बोल्ड होकर कह रही थीं- होली है, अच्छा लगा देखकर। न्यूज 24 की संवाददाता रुबिका लियाकत रंगों से बचने की बात करती कि इसके पहले ही स्कूली लौंडे पिल पड़े और उसे भी रंग डाला। खबर कुछ भी नहीं थी, सिवाय ये बताने की रिपोर्टर भी दिल रखते हैं। जी न्यूज को सुबह तक चिंता बनी रही कि राधा की चोली कौन रंगेगा, साढ़े नौ बज गए हैं। इंडिया टीवी होली में कैसे मनाए दिवाली को लगातर फ्लैश करता रहा। कब जलाएं होलिका,शुभ मुहुर्त निकालकर बैठा रहा। इंडिया टीवी ने ज्योतिष नाम की खबर की अच्छी प्रजाति ढूंढ ली है। जैसे घरों में कुछ नहीं हो तो आलू, कहीं भी आलू, कभी भी आलू।
अभी हाल ही में एनडीटीवी इंडिया ने दर्द जताया था कि एक समय ऐसा आएगा कि देश के सारे रिपोर्टर यूट्यूब की खानों में खो जाएंगे, फील्ड की रिपोर्टिंग घट रही है। लेकिन विदेशों में कैसे मनायी गयी देशी होली के लिए यूट्यूब का सहारा लेना पड़ गया। अब ये क्रिकेट थोड़े ही है कि कवर करने कोई रिपोर्टर जाए। एनडी भी यूट्यूब की खाक छानता है। लेकिन ईमानदारी रही कि लिख दिया, सौजन्य से- यूट्यब। आजतक, स्टार सहित दूसरे चैनलों पर होली और राजनीति का कॉम्बी पैक बनाकर चलाया जाता रहा। चुनाव के लिहाज से होली को देखने-समझने की कोशिशें की गयी। इसी क्रम में बिग बी ने मुंबई आतंकवादी घटना को लेकर नहीं मनायी होली, कोशी से आहत हुए लालू ने कुर्ता-फाड़ होली को स्थगित किया और नीतिश बाबू भी इसी कदमताल में रहे, चैनलों ने इसे प्रमुखता से दिखाया। इस खबर से सबकी महानता में इजाफा हुआ।
इन सबके बीच न्यज 24 ने एक नया प्रयोग किया। एक स्पेशल पैकेज तैयार किया। ब्लॉग औऱ डॉट कॉम के भाईयों नें प्रोमो भी किया- न्यूज रुम का रहस्य। प्लॉट है कि रामू यानि रामगोपाल वर्मा एक फिल्म बनाने जा रहे हैं और किस एंकर को क्या रोल मिलने जा रहा है। इसमें देश के प्रमुख टीवी पत्रकारों को लेकर एक प्रहसन तैयार किया गया। सबकी स्क्रीन के जरिए जो एक पॉपुलर छवि बन चुकी है, कुछ की ऑफिस में जो छवि बनी है, उसे भी समेटते हुए, चुटकी लेने की कोशिश की गयी। ऑडिएंस जो महसूस करती है कि सईद अंसारी में बहुत दम नहीं है उसे चैनल ने मजे में कह दिया- चाहते हैं कि लोग इन्हें सीरियसली लें लेकिन लेते नहीं। दिवांग नयी-नयी लड़कियों संत बनकर मीडिया ज्ञान देते नजर आते हैं। चैनल के लोगों के बीच टीआरपी औऱ स्टोरी को लेकर पहले हम, पहले हम की जोर मारकाट मची रहती है, ऐसे में गंगा जमुना संस्कृति की तहजीब बताने की लचर कोशिश की गयी। इस स्पेशल स्टोरी को अगर किसी ने गौर से देखा होगा तो मजाक में ही सही लेकिन सीरियसली समझ सकेगा कि मीडिया के भीतर किस-किस मानसिकता के लोग काम करते हैं, उनमें से कुछ आइटम भी हैं। इस स्पेशल का महत्व ऑडिएंस के लिए इसी रुप में है नहीं तो बाकी सबकुछ बोरिंग है, कुछ मजा नहीं आया देखकर, बिल्कुल भी ह्यूमरस नहीं था। लेकिन एक बात है कि इसमें शामिल पत्रकार अपनी हैसियत समझ रहे होंगे, इस संकेत को समझ रहे होंगे कि अगर देश के प्रमुख एंकर-पत्रकारों की सूचि बनेगी तो उनमे ये शामिल होंगे। क्योंकि शामिल करनेवाले चैनल के बाबा ही रहे होंगे। जो नहीं शामिल किए गए, वो अपने को छुच्छा समझ रहे होंगे। वाकई मीडिया के लोगों के लिए ये हैसियत समझनेवाली स्टोरी रही।
मनोरंजन चैनलों में लॉफ्टर चैलेंज पर आधारित शो को आज के दिन कूदने-फांदने का कुछ ज्यादा ही मौका मिल जाता है। ऐसा लगता है कि आज के दिन पर सबसे ज्यादा अधिकार इन्हीं का है. सोनी के कॉमेडी सर्कस औ स्टाऱ वन के लॉफ्टर चैलेंज में ये साबित हो गया। लेकिन कोई गुस्सा नहीं होता, ये सुनकर कि सुहागरात के दिन पत्नी के पास मैं स्क्रू ड्राइवर,हथौड़े और बाकी चीजें लेकर चला गया, जैसे मैं कोई इंजन खोलने जा रहा हूं। लल्ली अपने परवान पर नजर आयी। छोटे मियां की गंगूबाई सिलेब्रेटी के तौर पर स्टैब्लिश हो गयी है। रियलिटी शो के जरिए नाम कमा चुके सारे वडिंग्स और सिलेब्रिटी की महफिल इ-24 पर जमी, तरीके से गाना-बजाना हुआ। पैसे लेकर राजू श्रीवास्तव ने भी आजतक पर राजू स र्र र्र र्र में तरीके से होली खेली।
टीवी सीरियलों में ये पूरी तरह से स्टैब्लिश हो गया है कि जिस दिन जो त्योहार हो, उस दिन के एपिसोड में भी वही दिखाओ। जस्सू बेन जयंतीलाल जोशी की ज्वाइंट फैमिली( एनडी इमैजिन) में जस्सू बेन के यहां जमकर हई होली। पिछली बार एनडी इमैजिन ने नया प्रयोग किया था। अपने सारे कार्यक्रमों राधा की बेटियां कुछ कर दिखाएगी से लेकर नच ले वे विद सरोज खान तक के सारे कलाकारों को जस्सूबेन के घर जुटाया था और एक की कहानी दूसरे में नत्थी करके दिखाने की सफल कोशिश की थी। वाकई अलग लगा था ऐसा देखना कि राधा की बेटी रुचि, मैं तेरी परछाई हूं के सचिन को जस्सूबेन के घर जाकर पुचकारती है। अबकी बार जीटीवी ने ये काम किया। राणो विजय के सेट पर छोटी बहू को उतारा औऱ करीब साढ़े चार सौ लोगों को( अपने सारे सीरियलों के कलाकार) शामिल किया। समझिए सीरियलों का अब ये चालू फंडा हो गया है।
इस बार सीरियल का नजारा कुछ अलग रहा। सीरियल होली को लेकर दो खेमे में बंट गए। एक में होली मनायी गयी, इसे धूमधाम से दिखाया गया। वंदिनी से लेकर जाने क्या बात हुई तक। लेकिन दूसरी तरफ कहानी उस मोड़ पर आकर अटक गयी है कि ऐसे में होली नहीं मनायी जा सकती। बालिका वधू की आनंदी के घर मातम है। सुगना के घर बारात आनेवाली है लेकिन रास्ते में ही उसके होनेवाले पति प्रताप को डाकुओं ने मार डाला। सुगना की जिंदगी उजड़ गयी। अब कैसे मनाए होली। होली के दिन मंदिर के लिए निकलती है, गांव भर के लोग दूर भागते हैं उससे। जीवनसाथी की मिराज सदमे से पागल हो गयी है, वो अपने गूंगे पति के साथ इधर-उधर भटकती है। उसकी मां को इन सब बातों की याद आती है और गुलाल से भरी थाल रख देती है। खुशी में भी गम को शामिल करना नया ट्रेंड है। के फैक्टर के सीरियलों में ऐसा नहीं था। इस दिन अब सीरियल वोलोग भी देख सकेंगे जिनके घर कभी आज के दिन कुछ................अप्रिय घटना हुयी है, टीवी उनके लिए भी है, फिर से याद करने के लिए, पब्लिक प्लेस में नहीं, फिर भी टेलीविजन के साथ शामिल होने के लिए.
इन सबके साथ धार्मिक सीरियलों नें भी सीरियल के इस पैटर्न को फॉलो किया है और पौराणिक कथाओं की पैश्चिच बनाते हुए वहां भी होली, दिवाली औऱ दूसरे त्योहारों के प्रसंग पैदा कर लिए हैं। कलर्स पर जय श्री कृष्णा को इसी रुप में देखा,चाची( राकेश सरजी की मां) से राधा-कृष्ण के भजन सुनते हुए। बमुश्किल तीन साल के कृष्ण, राधा की उंगली पकड़कर चल देते हैं, ब्रज की होली खेलने। ये हैं जज्बात के नए रंग........।।.
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गुजरात में इतना अधिक पोलराइजेशन है, चाहे वो ज्यूडिसरी को लेकर हो, रिसर्च को लेकर हो, राजनीति या फिर किसी और चीज को लेकर कि चीजों को सीधे या तो ब्लैक या फिर व्हाइट साबित कर दिया जाता है, बीच में कोई धरातल बचता ही नहीं है। यहां के लिए बीच की चीजों को समझने की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। सरुप बेन की किताब उम्मीद होगी कोई गुजरात 2002-2006 इसके बीच की धरातल मुहैया कराती है। गोधरा के बाद तो लगता है कि गुजरात में कोई उम्मीद है ही नहीं लेकिन सरुप बेन इसके बीच समझ और संवेदना की धरातल की खोज करती हुई रचना के तौर पर उम्मीद होगी कोई हमारे सामने पेश करती है। गोधरा पर लिखी गयी बाकी किताबों या फिर समाज विज्ञान के आधार पर लिखी गयी किसी दूसरी किताबों की तरह ये किताब हमारे सामने समाज विज्ञान के शोध का खांचा नहीं खींचती। इसे आप रिपोर्टिंग भी नहीं कह सकते। इतिहास लिखने के जो प्रचलित रुप हमारे सामने हैं, उस लिहाज से ये किताब इतिहास भी नहीं है। लेकिन इन सबके वाबजूद इसमें न तो समाज विज्ञान की ही कोई कमी है और न ही इतिहास की समझ की। दरअसल सरुप बेन ने गुजरात के दर्द को समझने और प्रस्तुत करने के लिए जिसे मेथड का इस्तेमाल किया है वो मेथड ही इसकी खासियत है। गुजरात की लेखिका औऱ संस्कृतिकर्मी सरुप बेन की किताब पर बात करते हुए प्रो.धीरुभाई सेठ ने जब गुजरात से बीच की जमीन के गायब हो जाने की बात की तो ये सवाल फिर से ताजा हो गया कि क्या किसी प्रदेश या राज्य का लोकतंत्र भी इतना खतरनाक हो सकता है कि उसके खरोच के निशान घाटियों की तरह इतने गहरे हो सकते हैं कि उसे पाट पाने की कहीं कोई उम्मीद नहीं झलकती। धीरुभाई इस निशान के बीच उम्मीद को किसी सरकारी योजना और राहत कार्य से पाटे जाने के बजाय उस दर्द को बार-बार याद किए जाने और संजोने के रुप में देखते हैं। संभव है गुजरात में टाटा नैनो की तरह और भी कई दर्जनों धकियायी और ठुकराई गयी कम्पनियां आ जाए लेकिन कहां है उम्मीद, ये उम्मीद क्या उन लोगों की झोली में गिरेंगे और अगर गिर भी गए तो क्या वो उम्मीद की ही शक्ल में होगी जिनकी नजरों के सामने अपनी बेटी का बलत्कार हुआ है, तुतलाती जुबान को साफ करने की कोशिश में लगा बच्चा खोया है। धीरुभाई के मुताबिक सरुप बेन उम्मीद की तलाश दर्द के बीच ही करती है,उसे कहीं और किसी रुप में विस्थापित करके नहीं।
किताब के संपादक रविकांत ने कहा- जब भी हिन्दुस्तान में गुजरात या फिर इस तरह के किसी औऱ घटना की चर्चा होती है उस पर अधिकांश विद्वानों द्वारा पार्टिशन जारी है जैसा लेबल चस्पा दिया जाता है। इसे देखकर हम जैसे लोग कुनमुनाते हैं, बार-बार ये ख्याल आता है कि क्या गुजरात के उपर इस तरह का लेबल चस्पाना सही तरीका है। रविकांत की बातों को समझें तो ये विभाजन के दर्द के मार्फत गुजरात और बाकी कांडो़ं के दर्द को समझने की सहुलियत देता है या फिर विश्लेषण का सरलीकरण करता है। क्या तात्कालिक दर्द औऱ टीस को स्मृति के दर्द के साथ जोड़कर महसूस किया जा सकता है। ऐसा करने से विश्लेषण में सुविधा होते हुए भी कहीं अनुभूति की गहराई को कमतर औऱ फार्मूलाबद्ध करने की कोशिश तो नहीं की जाती। किताब का संपादन करते हुए बकौल रविकांत कई बार रोए। क्या ये पार्टिशन के दर्द को याद करते हुए, उस स्मृति के बूते अभ्यस्त होते हुए, इसका भी जबाब वो स्वयं देते हैं। पहले तो मैंने सोचा कि बहुत हो गया रोना-धोना, अब नहीं रोना है मुझे इस तरह की बातों पर।....लेकिन फिर इस किताब से गुजरते हुए,कई बार रोया। बाद में दिमाग की चमड़ी मजबूत करके ही इसका संपादन कर सका। कौन मजबूर कर देता है रोने के लिए, सरुप बेन की प्रस्तुति, दो सौ परिवारों का दर्द जिसकी बातचीत को सरुप बेन ने संवेदनशील तरीके से किताब में टांका है या फिर पूरी किताब में उम्मीदी के मुकाबले नाउम्मीदी के मैजॉरिटी में होने की स्थिति या फिर लोकतंत्र के उपर भी वर्चस्ववादी कवर के चढ़ा दिए जाने की पीड़ा। इस पर विचार करना जरुरी है। फिलहाल, इसी कवर को हटाने की जद्दोजहद की स्थिति में अभिषेक कश्यप( संपादन सहयोग) तमाम खामियों के वाबजूद भी लोकतंत्र को बेहतर मानते हैं, जिसके तहत सरुप बेन किताब लिख सकीं।
किताब के भीतर दर्द, अथाह दर्द व्यक्ति स्तर का भी दर्द औऱ समाज के स्तर का भी दर्द, इस दर्द के कई रुप, कई परतें लेकिन ये दर्द हमारे बीच निराश का साम्राज्य फैलाने के बजाय उम्मीद पैदा करती है,उम्मीद की संभावना पैदा करती है। खत्म होती हुई उम्मीद के बीच उम्मीद के खत्म न होने की गुंजाइश की तलाश करती ये किताब उस जिद का एक बार फिर से दुहराती है- जीवन हर हाल में जिया जा सकता है। सबकुछ लूटने के वाबजूद भी, समेटने की साहस को संजोते हुए....
कल पढ़िए स्वयं रचनाकार क्या कहती है उम्मीद होगी कोई के बारे में, इतिहासकार अविनाश कुमार और समाजशास्त्री प्रो. शैल मायाराम के विचार। उसके बाद किताबों पर चर्चा
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मूलतः नया ज्ञानोदय,मार्च में प्रकाशित
लम्बे समय से टेलीविजन को इडियट बॉक्स या फिर बुद्धू बक्सा के रुप में बदनाम कर रहे टीवी सीरियल्स अब इसकी छवि को सुधारने में जुटे हैं। पिछले सात-आठ महीनों में नए सीरियलों की खेप पर गौर करें तो ऑडिएंस के प्रति जिम्मेवारी औऱ सामाजिक संदर्भ के मामले में निजी मनोरंजन चैनल्स दूरदर्शन से भी कहीं आगे निकलते नजर आ रहे हैं। इस बीच कुछ पुराने अखबारों की कतरने हाथ लग जाए जिसमें दूरदर्शन से जुड़ी खबरें प्रकाशित की गयी हैं तो आपका भरोसा और मजबूत हो जाएगा। आपको अंदाजा लग जाएगा कि स्वस्थ मनोरंजन औऱ सामाजिक जागरुकता के नाम पर दूरदर्शन ने भी कभी काफी कुछ वो कार्यक्रम दिखाए,जो किसी भी लिहाज से ऑडिएंस के लिए जरुरी नहीं थे। यह जानते हुए कि यह अंतहीन और अतार्किक कहानी है औऱ इसका कोई भी सामाजिक सरोकार नहीं है। महज अपने घाटे की भारपाई के लिए शांति और स्वाभिमान जैसे सीरियल्स लंबे समय तक प्रसारित किए.( शांति से प्रतिदिन पचास हजार से एक लाख और स्वाभिमान से तीन लाख रुपये मिलते रहे और दूरदर्शन ने इसे जारी रखा।Lengthy DD soaps shouldn't bore viewers'PRESS TRUST OF INDIA, Saturday, February 27, 1999)। सामाजिक सरोकार तो दूर इसने ऑडिएंस की अभिरुचि को भी ताक पर रखकर इसे प्रसारित किया। इस बीच ऑडिएंस मनोरंजन के नाम पर या तो बोर होती रही या फिर वो सब कुछ भी देखती रही जिसे दिखाने के खिलाफ स्वयं दूरदर्शन रहा है। दूरदर्शन के मुकाबले निजी मनोरंजन चैनल्स के सीरियल ज्यादा रोचक और अर्थपूर्ण जान पड़ते हैं। पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें- नया ज्ञानोदय मार्च 08. पेज न. 56-59 तक
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टेलीविजन पर होनेवाले लटके-झटके को देखकर और अक्सर बिना देखे ही कोसनेवालों की कमी नहीं है। लेकिन उस लड़की ने अपने नाचने के पीछे के मकसद को बताया तो इस लटके-झटके का एक नया अर्थ निकलकर सामने आया। उसका कहना था कि हमारे नाचने से खिलाडियों में जोश आता है, हम उनमें उत्साह भरना चाहते हैं। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए एक दूसरी लड़की ने कहा- हमारे नाचने से कई बार खिलाड़ी चौके,छक्के भी मारते हैं। खिलाड़ियों को हमारी जरुरत तब सबसे ज्यादा होती है जब वो थोड़े परेशान होते हैं, चीयर लीडर्स के रुप में ये लड़कियां इससे उबारने का काम करती हैं। इस नाचने में नए अर्थ के खुलने से विनोद दुआ की उस बात में बहुत दम नहीं रह जाता जो कि उन्होंने मुहावरे के तौर पर स्लमडॉग मिलेनियर को लेकर हिन्दुस्तानी जश्न के बारे में कहा था कि- आखिर हम भारतीय नाच-नाचकर इतना परेशान क्यों हैं। इसका जबाब मुझे कामेडी सर्कस में एक प्रतिभागी के मसखरई में मिलता है जिस पर चंकी पांडे ठहाके लगाते हुए उलटने-पलटने लग जाते हैं। एक गुजराती के घर क सांप निकला और वो पार्टी मनाने लगा। मतलब ये कि गुजराती को पार्टी मनाने के लिए बहानों की कमी नहीं है। इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि क्या गुजराती इतने सम्पन्न होते हैं कि बात-बेबात पार्टी मनाने के लिए तैयार होते हैं। तो क्या हम ये मानकर चलें कि हिन्दुस्तान इतना सम्पन्न होता जा रहा है कि वो बात-बेबात पार्टी मनाने और नाच-नाचकर थक जाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यहां हम हिन्दुस्तानियों की समझ के बारे में कोई बात नहीं कर रहे।
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