चार दिनों तक MA फर्स्ट ईअर के बच्चो के बीच ड्यूटी बजाने के बाद कल मुझे फ़ाइनल ईअर के बच्चो के बीच भेजा गया । यहाँ का अनुभव वहाँ से बिल्कुल अलग और मौलिक रहा । फ़ाइनल ईअर मे होता क्या है कि चार पेपर सबो का एक ही होता है लेकिन बाक़ी के चार पेपर आपकी मर्जी पर है कि आप क्या लेते है। क्या लेते है माने कि आगे जाकर आप किस रुप मी हिन्दी कि सेवा करना चाहते है । अगर मीडिया एक्सपर्ट के तौर पर तो जनसंचार लें , और नाटक मे माहिर होना चाहते है तो रंगमंच लें । कविता को लेकर गंभीर है और आपको लगता है कि कविता से दुनिया को बदला जा सकता है और हिन्दी कि सेवा भी कि जा सकती है तो आप आधुनिक कविता लें। एक बात और, आपको इस बात का अहसास हो गया है कि हिन्दी से ज्यादा बेहतर अंग्रेजी मे लिखा गया है और उसे हिन्दी मी लाने कि जरुरत है तो आप अनुवाद भी ले सकते है। बाक़ी हिंदुस्तान के रास-रंग को जानने के लिये रीतिकाल है ही.
आप जो भी आप्शन लेते है उसके साथ सपनो का पैकेज फ्री मे मिल जाता है। पहले ही क्लास मे आपको बता दिया जायेगा कि फलां आप्शन लेकर आप कितनी ऊँचाई पर पहुंच सकते है और साथ ही आपको आइवरी टावर पर बैठे कुछ लोंगो का नाम बता दिया जायेगा । ये लोग ज्यादातर दिल्ली विश्वविद्यालय मे मिलेंगे । आपको बात ज्यादा हकीकत की लगेगी। और आप वही से जोड़ना-घटाना शुरू कर देते है । और आपके भीतर वेज़-वियाग्रा कि ताकत आ जाती है। लाइफ बनी मालुम होती है। आपका मन हो तो बिहार-उपी जहा से भी आप आते हू, ख़त लिख सकते है कि बाबूजी अब तो एक्सपर्ट बनके ही लौटेंगे ।
लेकिन खेला कहा होता है और आपका नरक कहा हो जाता है सो देखिये। जैसा कि कल कल रंगमच के और अनुवाद के बच्चो के साथ हुआ।
रंगमंच के बच्चो ने सबाल मिलते ही हंगामा करना शुरू कर दिया । एक लड़की ने साफ - साफ कहा कि मैडम ने कहा था कि जितना डी सकस हुआ है उतना ही आयेगा और जो सबाल आया है उसकी तो चर्चा ही नही हुई है। मामला मेरे से थमा नही और मैंने गुरुओं को बुला लाया। उनसे बात हुई तो पता चला कि संस्कृत नाटक सबाल आया है और बच्चे ने तैयार नही किया है। इंचार्ज ने हैरानी से सबाल को देखा, मानो जानना चाह रहे हों कि पूरा नाटक जान गये, एक्सपर्ट होने का दाबा भी बन गया और संस्कृत नाटक पर कोई बात नही। खैर आप्शन मी ग्रीक नाटक देकर मामले को सल्ताया गया। कोई नही, रोटी-दाल न मिले पिज्जा ही खा लो , संस्कृत न सही ग्रीक ही लिख दो।
इधर अनुवाद के बच्चो के साथ अलग परेशानी, उनका कहना था कि एक सबाल के अलाबे बाक़ी के सबाल कल के पेपर के है। और लगे फिर शोर करने। बुलाया गुरुजी को, और उन्होने कहा कि इसमे बदलाब नही होगा। कुछ बच्चों ने कहा भी कोई बदलाब चाहते भी नही है। घर से तैयार करके आये थे।
मुझे तो इनके एक्सपर्ट बनने की उम्मीद जाती रही। कि भाया बात-बात एडजस्ट करना पड़े तब तो हुआ, और अपने ही आप्शन के सबाल मे लासक गये तो बाक़ी का क्या होगा। एक्सपर्ट बनने के लिये कुछ एक्स्ट्रा भी पड़ना परता है भाई। नही तो करू हल्ला कि संस्कृत नाटक के बारे मे तुम्हे कुछ नही आता। या फिर एक्सपर्ट बनने के बाद देखोगे, क्योकि इस्क्का भी ट्रेंड है भाई.....
नोट; इंग्लिश से हिन्दी ट्रांस करके लिख रह हू, कई के स्पेल्ल्लिंग सही नही बन पा रहे है, आप सुधार कर देखे, प्लीज.....
मुजफ्फरपुर के राम्लीलागाची मे चार लड़कियों ने मिलकर अपना न्यूज़ चैनल शुरू किया है । इनका कहना है कि बडे-बडे चैनल देश-दुनिया कि खबर दिखाते है लेकिन हमारे गाव की जो समस्याएँ है उनपर किसी का ध्यान नही जाता , इसलिये हमने सोचा कि अपना चैनल शुरू किया जाये। सच मे जहाँ बडे-बडे चैनल अपने हाथ खडे कर देते है, वहाँ लड़कियों का ये प्रयास काबिले तारीफ है।
इन लड़कियों के पास कोई ओबी वैन नही है, न कोई तेज रफ़्तार की गाड़ी है और न ही बहुत सारे कैमरे और रिपोर्टर्स । और तो और गाँव मे न तो बिजली रहती है और न ही लोगो के घर मे केबल कनेक्शन की पहुच है । ये लड़कियां सायीकल पर केमरा, माईक और बाक़ी चीज़ लेकर निकलती है और दिनभर न्यूज़ इकट्ठा कर शाम को सबसे ज्यादा भीड़ वाले इलाके मे प्रोजेक्टर पर दिखाती है । शुरू-शुरू मे तो इनका बहुत विरोध हुआ लेकिन लड़कियों कि लगातार कोशिशो कि बदौलत उनका ये अप्पन समाचार आज खासा पोपुलर होता जा रहा जा रहा है । खबर मिलने के बाद मैंने इसकी चर्चा दिल्ली मे लोगो से कि तो उन्हें भी बहुत हैरानी हुई । सफर के सेक्रेटरी राकेश सिंह ने उत्साह जताते हुये बताया कि दिसम्बर २२ से ३० तक बिहार मे जो वर्कशॉप हो रहा है , उसमे लोकल खबरों को कवर करने कि ट्रेनिंग दी जायेगी । वहाँ के बच्चे पहले से ही कोम्मुनिटी प्रोपर्टी को लेकर फिल्म बना रहे है । सफर खुद भी सामुदायिक टीवी चैनल शुरू करने जा रहा है ।
मुख्यधारा के बरक्स इस तरह के प्रयास पत्रकारिता को सही अर्थो मे स्थापित कर सकेंगे । बिहार कि इन लड़कियां को ढेर सारी शुभ काम नाएं ......
* SAFAR : वैकल्पिक मीडिया के लिये लगातार काम करनेवाला संगठन है .
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इन लड़कियों के पास कोई ओबी वैन नही है, न कोई तेज रफ़्तार की गाड़ी है और न ही बहुत सारे कैमरे और रिपोर्टर्स । और तो और गाँव मे न तो बिजली रहती है और न ही लोगो के घर मे केबल कनेक्शन की पहुच है । ये लड़कियां सायीकल पर केमरा, माईक और बाक़ी चीज़ लेकर निकलती है और दिनभर न्यूज़ इकट्ठा कर शाम को सबसे ज्यादा भीड़ वाले इलाके मे प्रोजेक्टर पर दिखाती है । शुरू-शुरू मे तो इनका बहुत विरोध हुआ लेकिन लड़कियों कि लगातार कोशिशो कि बदौलत उनका ये अप्पन समाचार आज खासा पोपुलर होता जा रहा जा रहा है । खबर मिलने के बाद मैंने इसकी चर्चा दिल्ली मे लोगो से कि तो उन्हें भी बहुत हैरानी हुई । सफर के सेक्रेटरी राकेश सिंह ने उत्साह जताते हुये बताया कि दिसम्बर २२ से ३० तक बिहार मे जो वर्कशॉप हो रहा है , उसमे लोकल खबरों को कवर करने कि ट्रेनिंग दी जायेगी । वहाँ के बच्चे पहले से ही कोम्मुनिटी प्रोपर्टी को लेकर फिल्म बना रहे है । सफर खुद भी सामुदायिक टीवी चैनल शुरू करने जा रहा है ।
मुख्यधारा के बरक्स इस तरह के प्रयास पत्रकारिता को सही अर्थो मे स्थापित कर सकेंगे । बिहार कि इन लड़कियां को ढेर सारी शुभ काम नाएं ......
* SAFAR : वैकल्पिक मीडिया के लिये लगातार काम करनेवाला संगठन है .
लेफ्ट, राइट, कमल, पंजा, कलम और टीवी पता नहीं किस-किस चश्मे से अब तक आपने गुजरात को देखा। बहुत हो गया, अब जरा चश्मा उतार फेंकिए और गुजरात को जहाज पर चढ़कर देखिए, आपको सब जगह हरियाली नजर आएगी।
एनडीवी पर गुजरात की गद्दी प्रोग्राम में अपने रवीश गुजरात में आणंद के लोगों से बात कर रहे थे। सब कुछ तो सामान्य ही था, जैसा कि और कार्यक्रमों में हुआ करता हैं। शुरुआत में कुछ मुद्दों पर बहसा-बहसी और फिर बाद में किसी एक बात को लेकर आपसी सहमति। लेकिन यहां एक नयी बात हो गई कि जब कांग्रेस ने बीजेपी यानि मोदी को पानी, बिजली के मुद्दे पर घेरना चाहा तो बीजेपी के एक बंदे ने एकदम से हटकर तर्क दे ड़ाला वो ये कि- गुजरात में अगर हरियाली देखनी है तो लोग जहाज पर बैठकर देंखे, सब जगह हरियाली नजर आएगी। और जब हरियाली है तो क्या वो बिना पानी बिजली के आ गयी। ऐसी बात को साहित्य में हमलोग वक्रोक्ति अलंकार कहते है। यहां कोई भी बात सीधे-सीधे नहीं कही जाती, कुंतक का पूरा दर्शन है इसके उपर। बंदे ने जब ऐसा कहा तो रवीश को भी अच्छा लगा कि बंदा कुछ क्रिएटिव किस्म का है। वैसे रवीश को एक महिला पहले ही क्रिएटिव मिल गई थी, जिसे कि कविता करने का सुझाव दिया, अच्छा बोल रही थी।खुश होकर एक छोटा-सा ब्रेक ले लिया।
हिन्दी में एक उपन्यास है रेणु का मैला आंचल। आपमें से कई लोगों ने पढ़ा भी होगा। रेणु ने पूर्णिया (बिहार) के एक छोटे से गांव मेरीगंज की चर्चा की है। एक तरह से यही उपन्यास का नायक भी है औऱ इसकी आंचलिक उपन्यास के रुप में पहचान बनी।
मुझे याद है जब हिन्दू कॉलेज के मास्टर साहब इसे पढ़ाया करते तो शुरु करने के पहले अक्सर कहा करते, इसे पढ़ने के लिए आपको मेरीगंज में बस या मोटर पर बैठकर नहीं पंगडंडियों पर चलकर समझना होगा, गांव को रेल की खिड़की से झांककर नहीं देखा जा सकता। तब बात समझ में नहीं आती और जिनकी पृष्ठभूमि शहर की होती उनको तो ये उपन्यास ही बहुत बकवास लगता। साल में मैला आंचल और राग दरबारी एक बार पढ़ना हो ही जाता है। बंदे ने जब ऐसी बात कर दी तो चीजें फिर से हरी हो गयी.
भाई साहब, आप जहाज से गुजरात देखेंगे। आप अगर नेता आदमी हैं तब तो देख आइए, लेकिन आम जनता के साथ बहुत परेशानी है।
क्या गुजरात वाकई इतना विकास कर चुका है कि मोदी अपना गदा और मुकुट बेचकर फ्री में बस चलवा रहे हैं तो अब जहाज भी चलवा लेंगे।
जनाब सरकार की तरह जनता जायजा नहीं लेना चाहती जो कि हवाई दौरे से ली जाती है, वाकई पानी-बिजली चाहती है।
उबाल में तो आप बोल गए कि जहाज पर से देखो गुजरात को तो ये काम तो आप गुजरात नरसंहार के समय भी कर सकते थे। एक और बताउं-
मैं झारखंड से हूं, आप जहाज तो छोडिए, बस में बैठकर खिड़की से झांकेंगे तो पूरा झारखंड खूब हरा-भरा दिखेगा लेकिन सब जगह फसल नहीं है, कहीं जगहों पर तो सिर्फ झाडियां ही झाडियां ही है और लोगों के बीच खाने-पीने की किल्लत बनी रहती है। मैं ये नहीं कहता कि आपका गुजरात भी ऐसा ही है, है और होगा खुशहाल लेकिन भइया ढंग का तर्क दो। सिर्फ ताली पिटवाने के लिए आए थे तब तो कोई बात नहीं लेकिन मुद्दों पर बात करने आए थे तो कभी तो वोटर या जनता की तरह बात करो, अपना तो कुछ रहा ही नहीं, परेशानी रहते हुए पर भी सबों की जुबान पर नेता वचन इतना क्यों हावी है भाई।।।
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एनडीवी पर गुजरात की गद्दी प्रोग्राम में अपने रवीश गुजरात में आणंद के लोगों से बात कर रहे थे। सब कुछ तो सामान्य ही था, जैसा कि और कार्यक्रमों में हुआ करता हैं। शुरुआत में कुछ मुद्दों पर बहसा-बहसी और फिर बाद में किसी एक बात को लेकर आपसी सहमति। लेकिन यहां एक नयी बात हो गई कि जब कांग्रेस ने बीजेपी यानि मोदी को पानी, बिजली के मुद्दे पर घेरना चाहा तो बीजेपी के एक बंदे ने एकदम से हटकर तर्क दे ड़ाला वो ये कि- गुजरात में अगर हरियाली देखनी है तो लोग जहाज पर बैठकर देंखे, सब जगह हरियाली नजर आएगी। और जब हरियाली है तो क्या वो बिना पानी बिजली के आ गयी। ऐसी बात को साहित्य में हमलोग वक्रोक्ति अलंकार कहते है। यहां कोई भी बात सीधे-सीधे नहीं कही जाती, कुंतक का पूरा दर्शन है इसके उपर। बंदे ने जब ऐसा कहा तो रवीश को भी अच्छा लगा कि बंदा कुछ क्रिएटिव किस्म का है। वैसे रवीश को एक महिला पहले ही क्रिएटिव मिल गई थी, जिसे कि कविता करने का सुझाव दिया, अच्छा बोल रही थी।खुश होकर एक छोटा-सा ब्रेक ले लिया।
हिन्दी में एक उपन्यास है रेणु का मैला आंचल। आपमें से कई लोगों ने पढ़ा भी होगा। रेणु ने पूर्णिया (बिहार) के एक छोटे से गांव मेरीगंज की चर्चा की है। एक तरह से यही उपन्यास का नायक भी है औऱ इसकी आंचलिक उपन्यास के रुप में पहचान बनी।
मुझे याद है जब हिन्दू कॉलेज के मास्टर साहब इसे पढ़ाया करते तो शुरु करने के पहले अक्सर कहा करते, इसे पढ़ने के लिए आपको मेरीगंज में बस या मोटर पर बैठकर नहीं पंगडंडियों पर चलकर समझना होगा, गांव को रेल की खिड़की से झांककर नहीं देखा जा सकता। तब बात समझ में नहीं आती और जिनकी पृष्ठभूमि शहर की होती उनको तो ये उपन्यास ही बहुत बकवास लगता। साल में मैला आंचल और राग दरबारी एक बार पढ़ना हो ही जाता है। बंदे ने जब ऐसी बात कर दी तो चीजें फिर से हरी हो गयी.
भाई साहब, आप जहाज से गुजरात देखेंगे। आप अगर नेता आदमी हैं तब तो देख आइए, लेकिन आम जनता के साथ बहुत परेशानी है।
क्या गुजरात वाकई इतना विकास कर चुका है कि मोदी अपना गदा और मुकुट बेचकर फ्री में बस चलवा रहे हैं तो अब जहाज भी चलवा लेंगे।
जनाब सरकार की तरह जनता जायजा नहीं लेना चाहती जो कि हवाई दौरे से ली जाती है, वाकई पानी-बिजली चाहती है।
उबाल में तो आप बोल गए कि जहाज पर से देखो गुजरात को तो ये काम तो आप गुजरात नरसंहार के समय भी कर सकते थे। एक और बताउं-
मैं झारखंड से हूं, आप जहाज तो छोडिए, बस में बैठकर खिड़की से झांकेंगे तो पूरा झारखंड खूब हरा-भरा दिखेगा लेकिन सब जगह फसल नहीं है, कहीं जगहों पर तो सिर्फ झाडियां ही झाडियां ही है और लोगों के बीच खाने-पीने की किल्लत बनी रहती है। मैं ये नहीं कहता कि आपका गुजरात भी ऐसा ही है, है और होगा खुशहाल लेकिन भइया ढंग का तर्क दो। सिर्फ ताली पिटवाने के लिए आए थे तब तो कोई बात नहीं लेकिन मुद्दों पर बात करने आए थे तो कभी तो वोटर या जनता की तरह बात करो, अपना तो कुछ रहा ही नहीं, परेशानी रहते हुए पर भी सबों की जुबान पर नेता वचन इतना क्यों हावी है भाई।।।
दो दिनों से विभाग की ड्यूटी बजा रहा हूं। एम ए इन्टरनल की परिक्षाएं चल रही है। यही हाल रहा तो मैं बहुत जल्द ही सरकार का दामाद वाला शब्द वापस ले लूंगा। लेकिन अभी इतनी जल्दी नहीं।
खैर, अब मैं किसी काम को बेकार नहीं मानता और झेल से झेल काम करने में भी बोर नहीं होता। इस उम्मीद से मन लगाकर करता हूं कि ब्लॉग का माल निकल ही आएगा। परीक्षक का काम इसी नीयत से ले लिया। सोचा, चलो साहित्य की जो नई फसलें तैयार हो रही है, उसे देखने-समझने का मौका मिलेगा।
नई फसल को समझने का एक ही तरीका था कि जो बच्चे लिख रहे हैं, उसे बीच-बीच में पढ़ा जाए। मौका तो बहुत कम मिला लेकिन कोशिश में लगा रहा। ज्यादा पढ़ने में लगा रहता तो बच्चे शोर मचाना शुरु कर देते और मास्टरजी बीच में आ जाते तो फिर हमें ही लताड़ते, जब कॉपी-सवाल बांटने पर कंन्ट्रोल नहीं कर सकते तो फिर पढ़ाओगे कैसे भइया और इंटरव्यू में जाउं तो कहने लगें कि पहले एक-दो साल कॉपी-सवाल बांटकर बच्चों को शांत रखना सीखो। लेकिन कहते हैं न-
जहां न पहुंचे,
कवि औ डॉलर
वहां पहुंचे ब्लॉगर।।
सो मैं भी कुछ-कुछ पढ़ने लगा। दोनों दिन मेरी ड्यूटी एम ए प्रीवियस के बच्चों के बीच रही। पहले दिन आदिकाल का पेपर था। विद्यापति, रासो वगैरह लिखना था। आधे से ज्यादा बच्चों ने तो घंटेभर से ज्यादा में विद्यापति की राधा के आंचल को ढलकाया। एक बच्ची ने तो सीधे लिखा कि-
राधा के झुकते ही आंचल ढलक गया और उसके पुष्ट उरोज पर कृष्ण की नजर पड़ गयी लेकिन राधा ने उसे तुरंत ढंक लिया। कृष्ण ठीक से देख नहीं पाए, ऐसा लगा जैसे अचानक बिजली कौंध गयी हो और इसी बात को लेकर वे बेचैन हैं।
एक बंदा थोड़ा समझदार था और थोड़ा साहित्यकार किस्म का। उसने इसी बात को लिखा-
राधा के झुकते ही आंचल ढलक गया और कृष्ण को उसका सौन्दर्य दिख गया। बिम्ब के लिए प्रभाव का बढिया प्रयोग।
एक बंदा बार-बार विद्यापति की तुलना बायरन से करना चाह रहा था और बार-बार बयारन लिख रहा था। मास्टर इंग्लिश राइटर का नाम देखकर इंप्रेस हों इसके लिए वो बयारन को अंडरलाइन कर रहा था।
इंटरडिसिप्लीन का सबसे बेहतर नमूना दिखा, कोने में बैठे एक बंदे की कॉपी पर। हर सवाल में कोई न कोई मैप या कोई ग्राफ बनाता। विद्यापति की रचना कहां-कहां लोकप्रिय हुई, इसके लिए भारत का नक्शा बनाया और गोला बना-बनाकर सबसे अधिक, अधिक और सबसे कम प्रभावित क्षेत्र को दिखाया।
ऐसा नक्शा मैं सिर्फ मौसम आजतक में देखा करता हूं।
दूसरे सवाल में कि विद्यापति किस-किस विचारधारा से प्रभावित हुए, बंदे ने सीएनबीसी की तरह एक ग्राफ बनाया और एक्स, बाई और बीच में जीरो लिखा। फिर ग्राफ के जरिए न केवल ये बताया कि किस-किस से प्रभावित हुए बल्कि चढ़ाव-उतार से मात्रा तक बता दिया। लो भाई करो चेक कॉपी। भूगोल तो जानते हो न, नहीं तो तुम्हारे बूते का काम नहीं है, मास्टर को खुल्ला चैलेंज।
कल भकितकाल के पेपर में एक बंदे ने कबीर की सामाजिकरता पर बात करते हुए लिखा-
कबीर ने हिन्दुओं को प्रताडित करते हुए लिखा कि-
पोती पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित कोई नहीं हुआ।
लग रहा था बंदा पढ़कर नहीं प्रवचन और कमल मार्का भाषण सुनकर आ गया है। अब ऐसे में कोई कबीर को हिन्दुओं का दुश्मन मान ले तो क्या बेजा है।
ज्यादातर बच्चे बार-बार रामचरित्र का प्रयोग करते नजर आए। कुछ तो बार-बार दिमाग को ठोकते
नजर आए। मानो आईआईटी का पेपर लिख रहे हों या फिर हमें इम्प्रेस करना चाह रहे हों कि देखो कितना मुश्किल पेपर लिख रहा हूं, होगा आपसे।
कुछ लोग बीच-बीच में यू नो, आइ मीन बोलते दिख गए।
मैंने जो मतलब निकाला वो ये कि-
ये बच्चे मानकर चलते हैं कि कुछ भी लिख दो, मास्टर छांटकर नंबर दे ही देगा। मास्टर को सिरफ हिन्दी ही आती है, इसलिए नक्शे और ग्राफ बना दो।
इंगलीस तो पढ़ा नहीं होगा इसलिए बयारन को भी बीच-बीच में झोंको।
और सबसे ज्यादा तो कि ये बंदा जो कॉपी बांट रहा है, छोटू है एमए पास होगा ही नहीं।
तो सरजी, मैडमजी ये है हिन्दी की नई फसल। इसमें कुछ बच्चे काबिल और होनहार हैं, उनपर मेरी कोई भी बातें लागू नहीं होती। उनके लिए ढेर सारी शुभकामनाएं।।।
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खैर, अब मैं किसी काम को बेकार नहीं मानता और झेल से झेल काम करने में भी बोर नहीं होता। इस उम्मीद से मन लगाकर करता हूं कि ब्लॉग का माल निकल ही आएगा। परीक्षक का काम इसी नीयत से ले लिया। सोचा, चलो साहित्य की जो नई फसलें तैयार हो रही है, उसे देखने-समझने का मौका मिलेगा।
नई फसल को समझने का एक ही तरीका था कि जो बच्चे लिख रहे हैं, उसे बीच-बीच में पढ़ा जाए। मौका तो बहुत कम मिला लेकिन कोशिश में लगा रहा। ज्यादा पढ़ने में लगा रहता तो बच्चे शोर मचाना शुरु कर देते और मास्टरजी बीच में आ जाते तो फिर हमें ही लताड़ते, जब कॉपी-सवाल बांटने पर कंन्ट्रोल नहीं कर सकते तो फिर पढ़ाओगे कैसे भइया और इंटरव्यू में जाउं तो कहने लगें कि पहले एक-दो साल कॉपी-सवाल बांटकर बच्चों को शांत रखना सीखो। लेकिन कहते हैं न-
जहां न पहुंचे,
कवि औ डॉलर
वहां पहुंचे ब्लॉगर।।
सो मैं भी कुछ-कुछ पढ़ने लगा। दोनों दिन मेरी ड्यूटी एम ए प्रीवियस के बच्चों के बीच रही। पहले दिन आदिकाल का पेपर था। विद्यापति, रासो वगैरह लिखना था। आधे से ज्यादा बच्चों ने तो घंटेभर से ज्यादा में विद्यापति की राधा के आंचल को ढलकाया। एक बच्ची ने तो सीधे लिखा कि-
राधा के झुकते ही आंचल ढलक गया और उसके पुष्ट उरोज पर कृष्ण की नजर पड़ गयी लेकिन राधा ने उसे तुरंत ढंक लिया। कृष्ण ठीक से देख नहीं पाए, ऐसा लगा जैसे अचानक बिजली कौंध गयी हो और इसी बात को लेकर वे बेचैन हैं।
एक बंदा थोड़ा समझदार था और थोड़ा साहित्यकार किस्म का। उसने इसी बात को लिखा-
राधा के झुकते ही आंचल ढलक गया और कृष्ण को उसका सौन्दर्य दिख गया। बिम्ब के लिए प्रभाव का बढिया प्रयोग।
एक बंदा बार-बार विद्यापति की तुलना बायरन से करना चाह रहा था और बार-बार बयारन लिख रहा था। मास्टर इंग्लिश राइटर का नाम देखकर इंप्रेस हों इसके लिए वो बयारन को अंडरलाइन कर रहा था।
इंटरडिसिप्लीन का सबसे बेहतर नमूना दिखा, कोने में बैठे एक बंदे की कॉपी पर। हर सवाल में कोई न कोई मैप या कोई ग्राफ बनाता। विद्यापति की रचना कहां-कहां लोकप्रिय हुई, इसके लिए भारत का नक्शा बनाया और गोला बना-बनाकर सबसे अधिक, अधिक और सबसे कम प्रभावित क्षेत्र को दिखाया।
ऐसा नक्शा मैं सिर्फ मौसम आजतक में देखा करता हूं।
दूसरे सवाल में कि विद्यापति किस-किस विचारधारा से प्रभावित हुए, बंदे ने सीएनबीसी की तरह एक ग्राफ बनाया और एक्स, बाई और बीच में जीरो लिखा। फिर ग्राफ के जरिए न केवल ये बताया कि किस-किस से प्रभावित हुए बल्कि चढ़ाव-उतार से मात्रा तक बता दिया। लो भाई करो चेक कॉपी। भूगोल तो जानते हो न, नहीं तो तुम्हारे बूते का काम नहीं है, मास्टर को खुल्ला चैलेंज।
कल भकितकाल के पेपर में एक बंदे ने कबीर की सामाजिकरता पर बात करते हुए लिखा-
कबीर ने हिन्दुओं को प्रताडित करते हुए लिखा कि-
पोती पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित कोई नहीं हुआ।
लग रहा था बंदा पढ़कर नहीं प्रवचन और कमल मार्का भाषण सुनकर आ गया है। अब ऐसे में कोई कबीर को हिन्दुओं का दुश्मन मान ले तो क्या बेजा है।
ज्यादातर बच्चे बार-बार रामचरित्र का प्रयोग करते नजर आए। कुछ तो बार-बार दिमाग को ठोकते
नजर आए। मानो आईआईटी का पेपर लिख रहे हों या फिर हमें इम्प्रेस करना चाह रहे हों कि देखो कितना मुश्किल पेपर लिख रहा हूं, होगा आपसे।
कुछ लोग बीच-बीच में यू नो, आइ मीन बोलते दिख गए।
मैंने जो मतलब निकाला वो ये कि-
ये बच्चे मानकर चलते हैं कि कुछ भी लिख दो, मास्टर छांटकर नंबर दे ही देगा। मास्टर को सिरफ हिन्दी ही आती है, इसलिए नक्शे और ग्राफ बना दो।
इंगलीस तो पढ़ा नहीं होगा इसलिए बयारन को भी बीच-बीच में झोंको।
और सबसे ज्यादा तो कि ये बंदा जो कॉपी बांट रहा है, छोटू है एमए पास होगा ही नहीं।
तो सरजी, मैडमजी ये है हिन्दी की नई फसल। इसमें कुछ बच्चे काबिल और होनहार हैं, उनपर मेरी कोई भी बातें लागू नहीं होती। उनके लिए ढेर सारी शुभकामनाएं।।।

