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"आपको जब सिंपल भाषा इतनी ही पसंद हो तो आप आर्टस या कॉमर्स कॉलेज ज्वायन कीजिए"- 
फिजिक्स टीचर, थ्री इडियट्स

इचक-दाना, बिचक-दाना( श्री 420 ) गाने में मिरची लिखा देख आप दुविधा में पड़ सकते हैं कि "मिर्ची" सही है या फिर सिनेमा की इस टीचर ने जो "मिरची" लिखा है, वो सही है.शायद शब्दकोश पलटने की जरुरत पड़ जाए. लेकिन इस गाने का ब्लैकबोर्ड आपको खींचता है, साथ ही साथ बहुत कुछ बताता चला जाता है.
लकड़ी के पाट से जोड़कर बनाया गया ये ब्लैकबोर्ड किसी सरकारी स्कूल का, बढ़ई लगाकर नहीं बनवाया गया है और न ही आज के स्कूलों की तरह इसके लिए लाखों में इसकी बजट होती है. आमतौर पर फलों की पेटियों से निकली तख्ती या इधर-उधर फेंकी गई लकड़ी की तख्ती से जोड़कर बनाया ये ब्लैकबोर्ड साफ इशारा करता है कि ये क्लासरूम अपनी सुविधा, पढ़ाने की ललक और इसी बहाने जीवकोपार्जन के लिए लगायी गयी है. इस ब्लैकबोर्ड में कितने जोड़ हैं, बिल्कुल सपाट नहीं है. चित्रों के जरिए वर्णमाला का ये वो पाठ है जिसे सिखाया तो जो रहा है उन बच्चों को जो खेल और पढ़ाई के बीच डूब-उतर रहे हैं लेकिन एक व्यापक संदर्भ में नए सिरे से पढ़ने( स्वाभाविक है जिंदगी) की कोशिश कर रहा है हवेली की खिड़की पर खड़ा वो श्री 420 जिसकी जिंदगी में ये वर्णमाला कब आए होंगे और कब गुजर गए होंगे. ये खुली पाठशाला संस्थान नहीं, समाज को शिक्षित करने की एक प्रक्रिया ज्यादा है.

इन विजुअल में पूरी की पूरी वायनरी है. वर्णमाला जैसे सहज चीज सीखाने के लिए जिस जुगाड़ और मुश्किल स्थितियों में बच्चों को सिखाने की कोशिश है, बड़े के लिए वो पाठ उतना ही दुरुह( सुविधाजनक स्थिति में रहकर भी दिमागी तौर पर उद्धत हो जाने की स्थिति). क्या पाठ के सहज होने के साथ ही संदर्भ की ये दुरुहता आगे की फिल्मों के क्लासरूम में इसी तरह दिखाई देते हैं ?

मैं हूं न में इचक दाना की तरह वर्णों की पहेलियां नहीं है और न ही क्लासरूम के बच्चे वर्णमाला का ज्ञान लेने आए हैं. यहां सवाल है कैल्शियम की एटॉमिक वेट क्या है ? इस एक सवाल के साथ-साथ ब्लैकबोर्ड का रंग, चॉक जो पेंसिल की तरह न होकर इचक दाना में पत्थर के टुकड़े की तरह थे, हम जिसे अपनी मगही भाषा में खल्ली कहा करते हैं, वो भी रंगीन, ग्लैमरस शिक्षक( सुष्मिता सेन) जिसकी केमेस्ट्री की क्लास में ही खुले बाल पर सौन्दर्य चर्चा की कोशिश की जाती है. ये भारी लागत से बने बोर्ड हैं जिन्हें ब्लैकबोर्ड कहने पर इसका समुद्री हरे रंग का होना शामिल नहीं हो पाया लेकिन अफसोस कि बोर्ड का रंग बदल जाने पर भी इसके लिए कोई नया नाम नहीं रखा गया है. क्लासरूम की पूरी कोशिश इसे मस्ती की पाठशाला में बदल देने की है और आगे चलकर ऐसा होता भी है और तब बोर्ड पर केमेस्ट्री के लिखे फॉर्मूले और कर्सिव इंग्लिश में लिखी परिभाषाओं को छोड़ दें तो पूरा नजारा किसी डिस्को थेक का हो जाता है.( फैंटेसी में ही सही )..इस बात के लिए आप हिन्दी सिनेमा पर आरोप लगा सकते हैं कि कॉलेजों, विश्वविद्यालयों को जो बाजार, ब्रांड और मीडिया के इवेंट स्पॉट भर बनाकर छोड़ देने की कवायद चल रही है, उसके ब्लूप्रिंट यही सिनेमा तैयार कर रहे हैं. खैर,

थ्री इडियट्स का सवाल भी अ से क्या होता है जैसा ही सरल है, मशीन क्या है ? रणछोड़दास( आमिर खान) इसे बाकायदा न केवल हिन्दी में बल्कि अपने रोजमर्रा के अनुभव से इसे परिभाषित करने की कोशिश करता है जिसका मजाक सारे स्टूडेंट्स तो उड़ाते ही हैं, फिजिक्स का शिक्षक अपनी पैंट की जिप उपर-नीचे करके ये कहते हुए कि अप-डाउन,अप-डाउन ये मशीन है, इग्जाम में यही लिखोगे.( हालांकि रणछोड़ पहले ये काम कर चुका होता है). यहां ब्लैकबोर्ड काले रंग का तो है लेकिन वही ब्लैकबोर्ड नहीं जो लकड़ी की तख्ती या पत्थर, सीमेंट को काले रंग से रंगकर बनाए जाते रहे हैं. बाकायदा लकड़ी के फ्रेम में जड़े जिस पर बार्निश की पॉलिश है. लिखा जिस पर अंग्रेजी में सिर्फ मशीन है..बाकी फिल्म के बीच-बीच में वो हिस्सा जरूर है जहां साइन थिटा, बिटा, पाइ, अंडरस्कोर जैसे चिन्हों से बोर्ड भरे हैं क्योंकि ये इंजीनियरिंग कॉलेज का नजारा है...यही नजारा तारे जमीन पर का भी है जिससे ये सारे चिन्ह उड़-उड़कर बाहर निकलते दिखाए जाते हैं.

स्टूडेंट ऑफ दि इयर में शक्ल तो बोर्ड जैसी ही दिखाई देती है लेकिन है वो पीपीटी( पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन) और इस पर जो कुछ भी लिखा है वो सिर्फ अंग्रेजी में लिखी परिभाषाएं, ये मैनेजमेंट की क्लास है. बोर्ड का आकार पूरी क्लासरूम की चौड़ाई जितनी है जिस पर कि बड़े आराम से "मेरी कोम" फिल्म प्रदर्शित की जा सकती है.

थोड़ी देर के लिए ये छोड़ दे कि हिन्दी सिनेमा के क्लासरूम में शिक्षक क्या पढ़ा रहे होते हैं, किस सब्जेक्ट की क्लास होती है तो भी सिर्फ ब्लैकबोर्ड के हुलिए से वो सबकुछ अंदाजा लग जाता है जो फिल्म स्टैब्लिश करना चाहती है. एकबारगी तो आपके मन में सवाल उठेगा कि 1955 में विद्य़ा( नरगिस) ने जो हिन्दी वर्णमाला सिखायी थी, वो बच्चे बाद में गए कहां ? क्या उन सबके सब ने साइंस या मैनेजमेंट ले लिया और उऩ्हीं कॉलेजों में घुस गए जहां करिअर का दवाब तो है लेकिन वो सहजता नही है जो वो अपनी विद्या मैम से सीखकर आए थे. क्या ये वो बच्चे हैं जो फिजिक्स, केमेस्ट्री की क्लास में भी मजाक का पात्र बनने की हद तक इंसानियत, जिंदगी जीने की कला और सौन्दर्यबोध की बात करते हैं. अब के हिन्दी सिनेमा में वर्णमाला, साहित्य और आर्ट्स विषय की कोई क्लास नहीं होती है..सिर्फ साइंस, मैनेजमेंट, इंंजीनियरिंग, मेडीकल की और अगर साहित्य या आर्ट्स की गलती से क्लास हो भी तो शिक्षक औऱ इस विषय का उपहास उड़ाने के लिए. आपको एक वक्त के लिए हताशा होती है लेकिन

दिलचस्प है कि इन साइंस, इंजीनियरिंग औऱ मैनेजमेंट की क्लास में भी कहानी उन्हीं मुद्दों पर जाकर घूमती है जो कि विषय नैतिक शिक्षा, साहित्य या समाज विज्ञान के होने पर घूमती. मुन्नाभाई एमबीबीएस से लेकर थ्री इडियट और स्टूडेंट ऑफ द इयर की यही कहानी है..तब आपको लगेगा कि इचक दाना के विद्या मैम के ये विद्यार्थी इंजीनियरिंग तो इन कॉलेजों में पढ़ रहे हैं लेकिन उनका पढ़ना एकतरफा नहीं है, वो अपने उन सारे साइंस शिक्षकों को इंसानियत का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं जो रिजल्ट, प्लेसमेंट, तरक्की के आगे न केवल भूल चुके हैं बल्कि इन सबको दो कौड़ी की चीज समझते हैं. विषय के गायब होने के बावजूद विषय की तासीर बचाए रखने के बीच हिन्दी सिनेमा के ब्लैकबोर्ड और क्लासरूम काफी कुछ कह जाते हैं. हम जैसे आर्ट्स के सिकंस के लिए कहिए तो खुशफहमी का एक पुड़िया तो थमा ही जाते हैं कि कल को हमारे बच्चे भले ही मैनेजमेंट, पीआर प्रैक्टिस और मीडिया बिजनेस के कोर्स में चले जाएंगे लेकिन अपनी इसी विद्या मैम और कोठी की खिड़की पर खड़े होकर रणवीर राज( राज कपूर) के बीच की इंटरटेक्टचुअलिटी( अंतर्पाठियता) को भी सहेजने, समेटने की कोशिश करेंगे..आखिर श्री 420 का रणवीर, मैं हूं न में मेजर रामप्रसाद शर्मा( शाहरुख खान) केमेस्ट्री का छात्र तो बनकर घुस ही आया है. 

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