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तुम क्या लिए इस बार, पिछले सात-आठ सालों से दीवाली की सुबह फोन पर दीदी के इसी सवाल से शुरु होती है। पलटकर फिर मेरा सवाल तो तुमने क्या लिया? उसका अक्सर जबाब होता है-कुछ खास नहीं बस एक रिवाज है तो ले लिए कुछ। जाहिर है दीदी का ये कुछ मां के कुछ से बिल्कुल अलग होता है। मां को लगता है कि अग हम नहीं लेंगे तो घर में ये परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी जबकि दीदी महसूस करती है कि यही सब मौके होते हैं जिसमें हम एक-एक करके सामान जुटाते चले जाते हैं। दीदी की शादी के बाद से मैं लगातार देख रहा हूं कि किस तरह एक-एक करके सामान जुटाती आयी है और सबों की जानकारी मेरे दिल्ली बैठे देती आयी है।

दीदी की इस कुछ में शुरुआत के सालों में घर की बहुत ही जरुरी चीजें शामिल होती- मिक्सी ग्रांइडर,फ्रीज,टीवी और भी घर की चीजें। दीवाली से ठीक एक दिन पहले संयुक्त परिवार को जिस तरह उसे सबों से अलग होना पड़ा था उसकी टीस के साथ वो इन सामानों को जुटाती आयी। अब इस कुछ में जो चीजें शामिल होती है वो मेरी डिक्शनरी में कई बार गैरजरुरी है लेकिन दीदी की भाषा में एसेट है..चांदी के सिक्के,अनिवार्य तौर पर गहने..वगैरह। जूस सेट,डिनर सेट,नॉनस्टिक,यही सब। मां के शब्दों में कोढ़ा-कपार इससे अलग और दुनिया के उन तमाम लोगों से अलग जो सामान बाजार से खरीदते हैं,बाजार की सोच के हिसाब से खरीदते हैं,मेरी मां सामान तो बाजार से खरीदती है लेकिन उसके बारे में घर में बैठकर सोचती है। उसकी इस सोच में नितांत उसका अपना नजरिया है। मां के साथ दीवाली की सुबह धनतेरस के दिन की उस नसीहत से शुरु होती है- बोले थे,एक चम्मच भी खरीद लेना,नेग रहता है बेटा, त कुछ लिए कि नहीं?

पलटकर मैं भी सवाल करता हूं,मेरा छोड़ो- ये बताओ कि तुम क्या खरीदी इस साल? मां इस सवाल का जबाब मुझे याद नहीं पिछले कितने सालों से देती आयी है- कूकर,कड़ाही,कभी तांबे का तो कभी पीतल का लोटा,दूध गरम करने का बर्तन। मां की ग़हस्थी में बर्तनों की साइज के हिसाब से इतनी तेजी से बदलती रहती है कि धनतेरस में उसे खरीदना जरुरी हो जाता है। जो भी वो कूकर,कड़ाही,भगोने,स्टील के डिब्बे खरीदती है,उसके पीछे उसका एक तर्क होता है जिसके सुनने के बाद मैं सिर्फ यही कह पाता हूं- तो इतनी दिक्कत हो रही थी तो इतना इंतजार क्या कर रही थी,पहले ही खऱीद लेती?

मुझे याद है बोर्ड की परीक्षा तक मैं मां के साथ रहा- हर साल दीवाली,धनतेरस में मुझे सबसे विश्वसनीय संतान मानकर अपने साथ रखती। तब बिहारशरीफ में दुनियाभर की चमकदार दुकानें खुल गयीं थी,एक से एक ऑफर मिलते लेकिन मां उस दिन भी अपनी पुरानी सहेली के पति दिनेशवा का दूकान ही जाती। वहां मुझे कोई भी बर्तन पसंद न आता। मैं अक्सर टोकता- देखो तो कैसी कडाही है,कोई फिनिशिंग नहीं,मत लो। मां चिढ़ जाती- तुम ही जब एतना टांग अड़ाते हो तो जब तुमरी मौगी आएगी त सब बर्तन लगता है कूड़ा पर फेंक आएगी। तुम बनाओगे इसमें,हम बनाएंगे,हम लें रहे हैं। दिनेशवा जो कि उम्र में मेरे पापा का पड़ता,मैंने उसे कभी भी शहर के बच्चे की तरह न तो अंकल कहा और न ही कस्बाई आदत के हिसाब से चचा। मां भी पता नहीं क्यों,सहेली का पति होने पर भी दिनेशवा ही कहती। वही आदत मुझे भी लग गयी थी। मेरी बात सुनकर एकदम से चिढ़ जाता और कहता- जब पसंद नहीं आता है तो काहे आते हैं मंटू के माय। ले लीजिए वही से जहां बढ़िया सामान के नाम पर मूड़ी कतरता है( मंहगा देता है)। मेरी मां कहती- काहे,लड़कन-बुतरु के बात पर गोस्सा रहे हैं,इ हैइए है कलाहा। सब चीज में नुक्स निकाल के कलह पसारेगा। मुझे दिनेशवा की दूकान और उसके प्रति कभी सम्मान नहीं जगा क्योंकि हर साल उसने वही घिसी-पिटी टिफिन बॉक्स दिए जिसे ले जाने पर स्कूल की लड़किया चिढ़ाती- किचन से रोटी रखने का डब्बा चुरा लाए क्या,मां को टिफिन खरीदने नहीं कहते और फिर एक स्वर में ही ही ही ही,ठी ठी ठी ठी।

शहर बदला,घर में लोग बढ़े। भइया की शादी,फिर बच्चे। लोगों का आना-जाना बढ़ा। दीदी एक-एक करके ससुराल जाने लगीं। फैशनेबल भाभी से किचन का सौन्दर्यशास्त्र बदला। किचन में बर्तनों के नाम तेजी से बदलने लगे। बरगुन्ना,बटलोई,कठोती,तसली-तसला, सबके सब गायब होते चले गए। मुझे याद है मां की किचन में हर थाली,गिलास,कडाही का बाल-बच्चे की तरह अलग नाम होता- मंगउल्टा लोटा,उंचका गोड़ी का गिलास,टेढ़का मां के थाली,चुमउना परात...। समय के साथ हम स्टाइलिश हो गए। तसली को भगोना बोलने लग गए। थाली को प्लेट बोलने लग गए और देखते ही देखते पता नहीं वो सारे बर्तन कहां गए। सब एक साथ खाना खाते लेकिन जरुरी नहीं सबों की थाली एक हो। उम्र और अदब के हिसाब से थालियां होती। डिनर सेट ने इस समाजशास्त्र को खत्म कर दिया। अब पांच साल की खुशी और भइया की थाली की कोई अलग पहचान नहीं। किचन में अब न तो मां के खरीदे गए बर्तन दिखाई देते हैं और न उन बर्तनों के साथ वो भावनात्मक जुड़ाव बन पाता है। नहीं तो दादी( मां के शब्दों में मरकर देवता हो गयी) के गंगासागर से लायी लोटनी( लोटे का छोटा रुप) के अलावे पांच-छ साल तक किसी औऱ बर्तन में पानी नहीं पिया।..मां के खरीदे गयाब बर्तनों के बीच भी उसका अपने तरीके से खरीदना जारी है। अब वो दूध लाती है तो डोलनी,पहले से ज्यादा पूजा करती है तो अलग-अलग साइज की पीतल की थाली और परिवार के बढ़ते-घटते समीकरण के बीच वही कूकर कड़ाही। वो टीवी की मेरी तरह कट्टर दर्शक है,दैनिक जागरण पढ़ती है।  लेकिन उस पर बोझा का बोझा आए विज्ञापनों और ऑफरों का रत्तीभर भी असर नहीं।

दस साल पीछे जाकर देखता हूं तो किचन का संसार तेजी से बदला है। पहले मेरे घर में फाइवर,प्लास्टिक,कांच का कोई भी बर्तन नजर नहीं आता। मां द्रव्य( पीतल,कांसा,बाद में स्टील) के बर्तन का महत्व देती। इनके बारे में कहती कि छूतहर( अशुद्ध) लगता है। बढ़िया घर का आदमी इसमें थोड़ी ही खाता है। दूकान में चीजों के साथ कई सारी चीजें आती तो वो इधर-उधर हो जाते। लेकिन अब फाइवर,शीशे,प्लास्टिक के बर्तन मेरे यहां खरीदे जाते हैं। स्टील का रोटी का डब्बा को मिल्टन,सैलो के कैसरॉल और हॉटकेस ने रिप्लेस कर दिया। किचन में कई रंग के बर्तन,कंटेनर सब इसी फाइवर-प्लास्टिक की माया है। मैंने मां को थोड़ा उकसाया कि देखें इस पर उसकी क्या प्रतिक्रिया है- तो मां तुम अभी तक कूकर कड़ाही में ही फंसी हो.जमाना कहां से कहां चला गया। देखो तो एक बार बाजार जाकर,कितनी सारी नयी चीजें आ गयी हैं,उसमें दुनियाभर के ऑफर हैं,देखने में भी अच्छा लगता है। मां ने पहले थोड़े शांत स्वर में कहा- कितना भी कुछ आ जाए- प्लास्टिक तो प्लास्टिक ही रहेगा न,फाइवर का सामान में खाने में घिन लगता है,पीतल-कांसा के आगे कहां है मुकाबला? मैंने फिर उकसाया लेकिन इ कांसा-पीतल में फंसकर जब तुम बात करती हो तो लग रहा है कि अब तुम सचमुच बुढा गयी। अबकी बार मां थोड़ा सुलगती है- त रहि रहे हो दिल्ली में,आबेगी पूतोहू त लेगी सब रंग-बिरंगा सामान। उसको मत फंसाना,पीतल-कांसा में। फिर अचानक अपने पुराने बर्तनों और शब्दों के खो जाने की पीड़ा से भर जाती है- बाल-बच्चा के थोड़े बुझाता है,एक-एक करके माय-बाप सामान खरीदता है,कहां उडिया जाता है,पता चलता है।

मैंने फिर कहा-तुम्हारी जैसे महिला तो येरा,लॉओपेला,एलजी जैसी कंपनियों को तो बंद करा दोगी। कसइया के सरापे से गाय मरती है। हम नय लेंगे त पूरा दुनिया छोड़ देगा लेना औ फिर तुमरा जैसा अदमी इ सब समान का बराहिलगिरी(पैरवी) करनेवाला तो हैइए है न।.देखो,बात मत बनाओ,साफ-साफ कहते हैं। आज भोरे ही नहा लेना,सांझ के दिया जला लेना,एगो छोट गो मूर्ति लाके लक्ष्मीजी को गोड लग लेना औ मिठाय में मिलावट है तबेसन का लड्डू ले लेना एक पाव। ऐसे मत रह जाना।..घर भर के आदमी हियां दीवाली के तैयारी में जुटा है औ हमरा बुतरु..अकेले परदेस में। लगा अब मां ने रोना शुरु कर दिया है।...  
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कॉर्पोरेट मीडिया और टेलीविजन चैनलों के बीच समाचार4मीडिया की अपनी एक खास पहचान है। वो इनमें शामिल लोगों को अच्छा-खासा स्पेस देता आया है। तथाकथित नामचीन मीडियाकर्मी इस पर अपनी तस्वीर,इंटरव्यू या कोई खबर आने पर इसके लिंक शान से फेसबुक पर साझा करते हैं,मेल के जरिए लोगों को पढ़ने का अनुरोध करते हैं। कुल मिलाकर मीडिया इन्डस्ट्री में ये वेबसाइट एक ब्रांड है। अभी इस वेबसाइट के आए एक साल भी नहीं हुए लेकिन मीडिया से जुड़े लोगों के बीच इसने अपनी एक खास पहचान बना ली है। खासकर उनलोगों के बीच जो मीडिया को माध्यम से कहीं ज्यादा बिजनेस परफार्मेंस का हिस्सा मानते हैं। समाचार4मीडिया को इतने कम समय में जो पहचान मिली है उसकी बड़ी वजह उसकी खुद की कोशिश से कहीं ज्यादा exchange4media से विरासत के तौर पर मिली नेटवर्किंग है। बहरहाल

मीडिया इन्डस्ट्री के उपर के लेबल के गिने-चुने लोगों के बीच भले ही इसकी बेहतर पहुंच हो,बिजनेस परफॉर्मेंस में यकीन में रखनेवाले लोग इस साइट से अपने को नाक का सवाल जोड़कर देखते हों लेकिन आम इंटरनेट पाठकों, ब्लॉगरों और मीडिया की खबरों की जानकारी रखनेवाले लोगों के बीच इस साइट की कोई खास पहचान नहीं है। न तो लोग इसे रेगुलर पढ़ते हैं और न ही इसे अपनी मीडिया बहसों में शामिल करते हैं। इसकी बड़ी वजह है कि ये साइट मीडिया के मसलों पर बात करते हुए भी,उसकी खबरें छापते हुए भी उसके भीतर के सवालों को उठाने के बजाय उसकी पीआरगिरी में यकीन रखता है। मैंने कई बार महसूस किया कि उसने चैनलों औऱ मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर जब कई ऐसे मामले आए जिसमें कि उसके लिए काम करनेवाले लोगों के पक्ष सामने आने चाहिए ,इस साइट ने इसे या तो पूरी तरह नजरअंदाज किया या फिर चैनल के आलाकमान की राय छापी। ये शायद सबसे बड़ी वजह है कि मीडिया के सामान्य स्तर के मीडियाकर्मी इसे कभी भी अपनी साइट नहीं मानते। ये मीडिया मालिकों और आकाओं की साइट है,मीडियाकर्मियों की नहीं।

 दूसरी तरफ मीडिया में दिलचस्पी रखनेवाले सामान्य इंटरनेट पाठक इस साइट पर रेगुलर नहीं आते,इसकी बड़ी वजह है कि ये उन्हें प्रेस रिलीज का अड्डा से ज्यादा कुछ नहीं लगता। इंटरव्यू भी आते हैं तो वो जानकारी कम,पीआरगिरी ज्यादा होती है। अगर पाठक को यहां आकर मीडिया के नाम पर वही सबकुछ पने को मिले तो कोई फिर चैनल या संबंद्ध मीडिया संस्थान की ऑफिशियल साइट पर जाकर क्यों न पढ़े। वैसे भी जो पाठक आए दिन मीडिया की गड़बड़ियों और भारी घपले से त्रस्त है,उसके बारे में चारण-चर्चा किए जाने पर भला कैसे रास आएगी? इसलिए अगर ये साइट लाखों रुपये खर्च इसकी पहुंच और आमलोगों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए करती भी है तो ये अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पाएगी। इसकी बड़ी वजह है कि ये पूरी तरह से मीडिया को लेकर अनक्रिटिकल साइट है। खैर
 हम इस साइट के अनक्रिटिकल और पीआरगिरी करने को लेकर यहां कोई सवाल खड़ी नहीं कर रहे। हमें पता है कि इस साइट की गर्दन लाखों रुपये की बिजनेस डील और विज्ञापन के बीच फंसी है। ऐसे में वो पीआरगिरी नहीं करेगी तो क्या करेगी? जिस मीडिया इन्डस्ट्री से इसके लिए धनवर्षा हो रही है,उस मीडिया को लेकर वो क्रिटिकल कैसे हो सकती है? ये उसकी अपनी समझ,बिजनेस पॉलिसी और मजबूरी है औऱ हो सकती है। हम यहां इससे अलग बिल्कुल दूसरी बात कर रहे हैं।

मीडिया की समीक्षा और उसकी आलोचना के लिए वर्चुअल स्पेस की अपनी दुनिया है जहां कई ऐसी वेबसाइट, ब्लॉग्स और फोरम बेबाक तरीके से अपनी बात रख रहे हैं। उनके आगे न तो कोई बिजनेस को लेकर मजबूरी है और न ही खेल खराब हो जाने की चिंता। समाचार4मीडिया की इन फोरम पर लगातार नजर बनी हुई है। अब उसने शुरु क्या किया है कि इन फोरम से माल उड़ाकर अपनी साइट पर छापना शुरु किया है। इससे उसे दो स्तर पर सीधा फायदा हो रहा है। एक तो मुफ्त में उसे बेहतर और काम के कंटेंट मिल जा रहे हैं,उसके लिए एक पैसा भी भुगतान नहीं करना पड़ रहा और दूसरा कि अगर किसी पोस्ट में कोई किसी चैनल के खिलाफ भी लिखता है तो उसका पूरा ठिकरा वो लिखनेवाले पर फोड़कर हाथ खड़ी कर देगा।.इधर थोड़ा क्रिटिकल होने की जो कमी है,उसकी भी भरपाई हो जाएगी।

इसी नीयत से अभी साइट ने रवीश कुमार की पोस्ट- हिन्दी न्यूज चैनलों की घड़ी ठीक हो गयी क्या? को अपनी साइट पर छापा। इतना ही नहीं साभार के साथ संपर्क भी दे डाला। बदले में उसने इसकी जानकारी न तो रवीश कुमार को दी और न ही पहले अनुमति ली और मुझे नहीं लगता कि इसके लिए उन्हें कुछ भुगतान ही किया होगा? यहां पर आकर कोई तर्क दे सकता है कि इंटरनेट में किसी का कुछ नहीं है,एक बार चीजें सार्वजनिक हुई नहीं कि आपका उस पर से कंट्रोव गया। सही बात है, लेकिन सवाल दूसरा है। सवाल ये कि कोई बिजनेस फोरम करोड़ों रुपये खर्च करता है,कंटेंट जेनरेट करनेवालों के लिए अलग से बजट रखता है और अब फ्री की सामग्री साभार छापता है तो इस पर बात होनी चाहिए कि नहीं? ऐसे में जो लेखक अपने ब्लॉग पर लिख रहा है,उसे यहां छपने का क्या लाभ मिलेगा? अगर साइट को फ्री की ही सामग्री छापकर अपनी दूकान चलानी है तो क्या वो इसकी चर्चा अपनी बैलेंस शीट में करेगा? मुझे याद है कि समाचार4मीडिया ने साइट लांच होने के पहले हम जैसे लोग जो कि इंटरनेट लेखन में कुछ ज्यादा ही सक्रिय है-मेल भेजा कि आप हमारी साइट के लिए लिखना चाहते हैं तो लिखें। मुझे इसमें दिलचस्पी नहीं थी सो हमने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन जो कुछ लोगों ने लिखना शुरु किया,हमें जानकारी मिली कि उसके लिए वो भुगतान करेंगे।..अब सवाल है कि तो इसी साइट पर अगर वो किसी का कहीं से कुछ लेकर छापते हैं तो वो लेखक भुगतान के दायरे में क्यों नहीं आता? इस पर गंभीरता से बात होनी चाहिए।
इस पूरे मामले में मेरी अपनी समझ है कि समाचार4मीडिया पूरी तरह बिजनेस करनेवाली साइट है इसलिए उसका चरित्र पूरी तरह बिजनेस के हिसाब से ही निर्धारित होते हैं। ऐसे में अगर वो फ्री में उठाकर सामग्री छापती है औऱ गैरव्यावसायिक फोरम को मिलनेवाली सुविधा का लाभ उठाती है तो इस पर उंगली उठाने की जरुरत है। इसका विरोध किया जाना चाहिए और अगर छापती है तो उसमें लेखक की शर्तें शामिल हों। उसक मर्जी शामिल हो कि वो ऐसी मीडिया की पीआरगिरी करनीवाली साइट पर छपना चाहता है भी या नहीं? कहीं यहां पर छपने से उसकी इमेज पर बट्टा तो नहीं लगता,उसके पाठक उसे अन्यथा तो नहीं ले रहे?
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रोज से अलग मैंने पहले हिन्दुस्तान अखबार को उठाया,फिर उसके बाद दि हिन्दू। हिन्दुस्तान में मैंने देखा कि वीर सिंघवी ने "अरुंधति के खेल में ना फंसे"शीर्षक से लेख लिखकर अरुंधित को लेकर मीडिया का क्या नजरिया है,उसका संकेत दे दिया। थोड़ी देर के लिए हम मान भी लें कि अरुंधति राय जो कुछ भी कह रही है और कर रही है वो एक लेखिका की हैसियत से नहीं बल्कि राजनीतिक कार्यकर्ता के दायरे में आता है,जिसकी बात सिंघवी ने की। लेकिन इससे ये कहीं भी साबित नहीं होता या होना चाहिए कि मीडिया इस पूरे मामले में दूध का धुला है। बल्कि ऐसे ही मौके पर मीडिया का असली चेहरा कैसा है,कितना डरानेवाला,खौफनाक है। लिहाजा आज दि हिन्दू में कल सुबह बीजेपी के गुंड़ों की ओर से हुए हमले के बारे में जब पढ़ा तो काफी चीजें निकलकर सामने आयी। अरुंधति ने बहुत ही स्पष्ट तौर पर कुछ मीडिया हाउस के कारनामे को उजागर किया है। मुझे लगा कि ये बात हिन्दी पाठकों के बीच भी साझा किया जाना चाहिए। मैं अरुंधति की बात का हिन्दी तर्जुमा पेश कर रहा हूं। आप भी मीडिया के इस चरित्र पर गौर फरमाएं-

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अक्टूबर की सुबह 11 बजे करीब सौ लोगों की उत्पाती भीड़ मेरे घर पहुंची। दरवाजे को तोड़ते हुए अंदर पहुंची और जमकर तोड़-फोड़ मचाया। सामने जो चीजें पड़ी मिलीं, उसे तहस-नहस किया। कश्मीर मामले पर मैंने जो अपने बयान दिये हैं, उसके विरोध में वो जमकर नारे लगा रहे थे और हमें सबक सिखाने की बात कह रहे थे। टाइम्स नाउ, एनडीटीवी और हिंदी न्यूज चैनल न्यूज 24 के ओबी वैन इस उत्पात को लाइव कवर करने के लिए पहले से ही तैनात नजर आये। टीवी में जो रिपोर्ट आये, उनके मुताबिक इसमें बड़ी संख्या में बीजेपी की महिला मोर्चा के लोग शामिल थे। जब वो लोग चले गये, तो पुलिसवालों ने हमें सलाह दी कि आगे से जब भी हमें चैनलों के ओबी वैन आसपास दिखाई दें, तो इसकी जानकारी हमें दें। ऐसा इसलिए क्योंकि ओबी वैन इस बात का संकेत देते हैं कि अगर वो हैं तो उसके पीछ जरूर रास्ते में भीड़ (उत्पात मचानेवाली) होगी। इसी साल के जून महीने में पीटीआई की एक झूठी खबर (जिसे कि तमाम अखबारों ने छापा) के बाद मोटरसाइकिल पर सवार दो लोगों ने मेरे घर की खिड़कियों पर पत्थरबाजी करने की कोशिश की। तब भी टेलीविजन के कैमरामैन साथ थे।

इस तरह का हंगामा मचानेवाली उत्पाती भीड़, तमाशा पैदा करनेवाले इन लोगों और इस तरह के मीडिया के बीच का जो सांठ-गांठ है, आखिर उसका चरित्र कैसा है? इस तरह के तमाशे के बीच मीडिया अपनी भूमिका जिस तरह से एडवांस के तौर पर निर्धारित करता है, क्या वो इस बात की गारंटी दे सकता है कि जो भी विरोध प्रदर्शन और हमले होंगे, वो अहिंसक होंगे? अगर इस तरह से आपराधिक सक्रियता बनती है, हंगामे किये जाते हैं जैसा कि आज हुआ, इससे भी बदतर हो सकते हैं – तो क्या हम मानकर चलें कि मीडिया दरअसल अब अपराध का ही एक औजार बन गया है। ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ टीवी चैनल और अखबार बड़ी ही बेशर्मी और ढिठाई से लोगों को मेरे खिलाफ उकसाने में सक्रिय हैं। खबरों में सनसनी पैदा करने की उनकी आपसी छटपटाहट और अंधी दौड़ ने खबर देने और खबर पैदा करने के बीच के फर्क को ब्लर कर दिया है, खत्म कर दिया है। इनके लिए फिर क्या फर्क पड़ता है, अगर इस टीआरपी की बेदी पर कुछ लोगों की बलि चढ़ जाती है?
सरकार की तरफ से जब इस बात के संकेत मिले कि कश्मीर मसले पर मैंने और दूसरे वक्ताओं ने कश्मीर के लिए आजादी विषयक सेमिनार में जो कुछ भी कहा, अपने वक्तव्य दिये, उसके आधार पर हमारे ऊपर राजद्रोह का मामला नहीं बनने जा रहा है, तब मुझे मेरी अपनी अभिव्यक्ति के लिए दंडित किये जाने का जिम्मा दक्षिणपंथी हंगामा माचनेवाले अगुआइयों ने अपने ऊपर ले लिया। बजरंग दल और आरएसएस के लोगों ने खुलेआम एलान किया है कि वो मुझे निबटाने (to fix me) जा रहे हैं। इस निबटा देने में देशभर में मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने से लेकर बाकी तमाम बातें भी शामिल हैं। पूरे देश ने देखा है कि वो क्या कर सकते हैं और कहां तक जा सकते हैं? इसलिए अब जब सरकार कुछ हद तक मैच्योरिटी दिखा रही है, ऐसे में क्‍या मीडिया और लोकतंत्र की मशीनरी ऐसे लोगों के हाथों भाड़े का टट्टू बनने जा रही है, जो कि उपद्रवी भीड़ के न्याय में यकीन रखते हैं। मैं समझ सकती हूं कि बीजेपी की महिला मोर्चा मुझ पर हमला करके इसका इस्तेमाल लोगों का ध्यान आरएसएस के वरिष्ठ कार्यकर्ता इन्द्रेश कुमार की तरफ से हटाने के लिए कर रही है, जिनका नाम अजमेरशरीफ में हुए बम ब्लास्ट, जिसमें कि कई लोगों की जानें गयीं और जख्मी हुए, में सीबीआई की चार्टशीट में शामिल है। लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया का ये गुट ठीक यही काम क्यों कर रहा है? क्या इस देश में एक लेखक का औरों से अलग विचार, बम ब्लास्ट के आरोप में फंसे व्यक्ति से ज्यादा खतरनाक है? या फिर विचारधारा के स्तर पर इन सबका एक ही कतार में खड़े हो जाना है।
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मैं
पवन कुमार वर्मा की किताब भारतीयता की ओर पढ़ने के बाद बहसतलब 6 में उन्हें इस नीयत से बिल्कुल सुनने नहीं गया था कि किताब पढ़ने के बाद जो कई सवाल मेरे मन में लगातार उठ रहे हैं, उसका समाधान वो करेंगे, उस पर अपनी राय रखेंगे। लेकिन हां, इतनी बदतर उम्मीद भी नहीं थी कि मेरी लंबी-चौड़ी टिप्पणी के बीच घुले कई सवालों को गौर से सुनने के बाद (गौर से सुना, ये उनके ही शब्द हैं) एक शायरी कहते हुए कहेंगे कि मुझे तो याद नहीं कि सवाल क्या थे? मैं वहां मौजूद लोगों और इस पोस्ट को पढ़नेवाले अपने तमाम लोगों से सॉरी कहता हूं कि मैंने बहुत अधिक वक्त लिया। शायद मुझे उतना अधिक नहीं बोलना चाहिए था लेकिन
 मैं कल लगभग समझिए कि बिफर गया। दिमाग में बस एक ही बात घूमती रही कि अगर इसी किताब को कोई हिंदी का लेखक लिखता तो क्या अंग्रेजी समाज और खुद हिंदी समाज उसे इस तरह से सिर पर बिठा लेता। यकीनन उनकी भारी फजीहत होती और आलोचना की पहली लाइन होती – ये एचएमटी (हिंदी मीडियम टाइप) लेखक अभी तक भारतीयता और पाश्‍चात्य के बीच एक वर्जिन स्पेस खोजने में लगे हैं। लेकिन नहीं, लोग वहां इस बात को लेकर गदगद हो रहे थे कि एक अंग्रेजी लेखक ने अंग्रेजी में लिखते हुए अंग्रेजी को गरियाकर हिंदी को बेहतर बताया है। ये भी एक किस्म की गुलाम मानसिकता है। पवन वर्मा के हिसाब से आज अगर ये देश अंग्रेजी की उपनिवेशवादी दबाब से मुक्त नहीं हुआ है तो वही पढ़े-लिखे लेकिन लोभ-लाभ में पड़े लोगों के बीच से सामंती चारण का संस्कार गया नहीं, बल्कि महीन तरीके से बरकरार है। इसलिए ये अकारण नहीं था कि जिस किताब में दुनियाभर के झोल हैं, कई तथ्यात्यमक गलतियां हैं, उस किताब को हाथोंहाथ लिये जाने के लिए जबरदस्त माहौल बनाने की कोशिशें की गयीं।
मैंने टिप्पणी क्या की थी, कुछ चालू जार्गन का इस्तेमाल करते हुए (जिसे नहीं भी किया जाता तो बात हो सकती थी) पवन कुमार वर्मा की समझ, नास्टैल्जिक होकर हिंदी, भारतीयता, ऐतिहासिक आदतों और अस्मिता के सवाल और जीवन शैलियों को बेहतर करार देने पर असहमति दर्ज की थी। ये असहमतियां बहसतलब से निकलने के बाद और मजबूत और तल्ख हुई है। किताब का एक अध्याय पढ़ने के बाद पवन वर्मा पर मैंने जो मोहल्ला लाइव पर लिखा, उस पर कुछ जो कमेंट आये, उसका मिजाज ये साफ तौर पर बताना था कि एक अध्याय पढ़कर लिखना सिर्फ अपने को चर्चा और पवन कुमार वर्मा से नजदीकियां बनाना भर है। दो दिन बाद जब पूरी किताब पढ़ी तो लगा कि इस पर और तल्खी से लिखे जा सकते हैं।
सवाल और असहमतियां बहुत साफ हैं कि अगर पवन कुमार वर्मा को भारतीय अस्मिता की इतनी गहरी चिंता है तो उस अस्मिता के दायरे में स्त्री अस्मिता, दलित अस्मिता और आदिवासी अस्मिता (आदिवासी संस्कृति को अगर आप पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिहाज से देखें, तो सबसे बेहतर संस्कृति जान पड़ेगी) के सवाल क्यों नहीं आते? क्या ये अकारण है कि जब भी वो भारतीय संस्कृति और उसकी धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं तो उसमें हिंदू और उनके रीति-रिवाज एक-दूसरे से घुल-मिल जाते हैं और निष्कर्ष के तौर पर हिंदू संस्कृति, भारतीय संस्कृति का पर्याय के तौर पर दिखाई देते हैं। माफ कीजिएगा, गालिब पर किताब लिखकर और शुरुआती अध्याय में मुगलों के आने से कला के विस्तार की चर्चा करके पवन कुमार वर्मा को इस बात की कतई छूट नहीं मिल जाती कि आगे वो भारतीय संस्कृति पर बात करने के लिए हिंदू संस्‍कृति को हाइवे की तरह इस्तेमाल करें। ये नजरिया विभूति नारायण राय से अलग नहीं है, जो कि शहर में कर्फ्यू लिखने के बाद उसकी जिंदगी भर की कमाई जाति आधारित फैसले लेने और लेखिकाओं को जलील करने में लगाएं। लेखन कोई जाति प्रमाण पत्र या ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है कि एक बार मिल जाने के बाद आप उसे हर फॉर्म के साथ चिपका दें। जैसे वहां रिन्यूअल की जरूरत होती है, लेखन में भी आपको लगातार उस स्टैंड को लेते हुए सक्रिय बने रहना होता है।
पवन वर्मा की इस बात से मैं सौ फीसदी सहमत हूं प्रेम करना इस देश की अपनी स्वायत्त संस्कृति है तो फिर अलग से वेलेंटाइन डे की चोंचलेबाजी क्यों? सही बात है, लेकिन पवन वर्मा से सीधे तौर पर सवाल करें कि अगर प्रेम इस देश की संस्कृति है तो फिर ऑनर किलिंग किस देश की संस्कृति है? निरुपमा जैसी एक युवा पत्रकार का जाति के दबाब में जान लेना-देना किस देश की संस्कृति है? गर्व करने को मैं भी हिंदी के अपने उन तमाम कवियों पर गर्व कर सकता हूं, जिन्होंने प्रेम को लेकर कालजयी रचनाएं की लेकिन क्या मैं उन कवियों और आलाचकों पर गर्व कर सकता हूं जो इन कविताओं पर बात करते हुए, ऐसी कविताओं लिखते भार-विभोर हो उठते हैं जबकि दिल्ली से सटे मेरठ में प्रेमी की हत्या कर दी जाती है तो एक लाइन लिखना जरूरी नहीं समझते। इस तरह के झोल सिर्फ प्रेम को लेकर ही नहीं बल्कि भारतीयता की उन तमाम सर्किट में हैं, जिस पर कि पवन वर्मा को गर्व है।
पवन वर्मा का कहना है कि कुछ घटनाओं को छोड़ दे तो ये देश धर्मनिरपेख है,यहां के हिन्दुओं ने धर्मांतरण का काम नहीं करवाया। इस देश की संस्कृति अगर उदार और सहोदर है,इसका पैमाना सिर्फ हिंदू बरक्स मुस्लिम,हिंदू बरक्स इसाई के तौर पर ही देखा जाना चाहिए क्या? इस बात पर सवाल नहीं की जानी चाहिए कि खुद हिंदू अपने भीतर जाति,मान्यताओं,रिवाजों को लेकर एक-दूसरे क्यों इतना कट्टर है? अगर सामंजस्य हिन्दुओं की संस्कृति है तो इंटर में पढ़ाई करनेवाली एक विकलांग दलित लड़की सुमन को उसके घर में जिंदा जला देने की संस्कृति किस देश के हिस्से में आती है? गोहाना,मिर्चपुर में हुआ,वो देश का कौन सा हिस्सा है? 84 के दंगों में जिस गर्व करनेवाले हिन्दुओं ने सिक्खों के साथ जो कुछ किया वो किस देश का हिस्सा है जिसकी चर्चा जरनैल सिंह ने अपनी किताब कब कटेगी चौरासी में विस्तार से की है। मैं फिर कहता हूं पवन वर्मा जिस भारतीयता की बात करते हैं वो मध्यवर्ग की चोचलेबाजी को ही सांस्कृति नकल का हिस्सा मानकर डिफाइन करना भर है। संस्कृति को लेकर समाज में जो आये दिन टेंशन्स पनपते हैं, संस्कृति और तनाव एक-दूसरे से गूंथे हुए हैं, वो सिरे से गायब है। ये सबकुछ अकारण नहीं है बल्कि नास्टॉल्जिया का शिकार होने की वजह से हुआ है जो कि हिंदी भाषा के विश्लेषण में साफ तौर पर दिखाई देता है।
वो एक जगह लिखते हैं कि एक सर्वे के मुताबिक जीटीवी के समाचार में 70 फीसदी शब्द अंग्रेजी के प्रयोग किये जाते हैं यानी कि चैनल ने हिंदी का कबाड़ा किया है। आगे कुछ पन्ने बढ़कर लिखते हैं कि टेलीविजन और सिनेमा ने हिंदी को लोकप्रिय बनाया है यानी कि हिंदी के प्रसार में उसका योगदान है। ये परस्पर विरोधी बातें इसलिए आती हैं कि वो तय नहीं कर पाते हैं कि दरअसल हिंदी के विकास के ड्राइविंग फोर्स के रूप में कौन काम करते हैं। पवन वर्मा का कहना है कि ऊंचे ओहदे पर बैठे लोग अपनी भाषा यानी हिंदी, बांग्ला… आदि का एक भी अखबार नहीं पढ़ते। इसे वो खुद भी साबित कर देते हैं, ये अलग बात है कि ये हिंदी के प्रति अतिरिक्त प्रेम दिखाने से चूक हुई है। उन्होंने लिखा कि इस तरह की गड़बड़ियां अंग्रेजी के अखबार अक्सर किया करते हैं लेकिन देशी भाषा के अखबार नहीं करते। …ये कौन सा भाषाई प्रेम है जो कि गड़बड़ियों पर पर्दा डालने का काम करते हैं। एक-दो अखबारों को छोड़कर पवन वर्मा को कोई बताये कि अंधिकांश हिंदी अखबार, बाकी के बारे में जानकारी नहीं, किस तरह अंग्रेजी अखबारों की रिप्लिका बनने की छटपटाहट में होते हैं और आये दिन भारी गड़बड़ियां करते हैं। लेकिन पवन वर्मा का ये अतिरिक्त भारतीय और भाषाई प्रेम इसे देख नहीं पाता और वो हिंदी समाज की मनोदशा को ताड़ते हुए उन्हें खुश कर जाते हैं।
दरअसल अंग्रेजी में एक छोटा ही सही लेकिन खिलाड़ी लेखक तेजी से उभर रहा है जिसने कि अब हिंदी भाषा और साहित्य के मसले पर अंग्रेजी में बात करनी शुरू कर दी है। इरादा साफ है कि ग्लोबल स्तर पर जब भी वर्नाकुलर, हिंदी भाषा और साहित्य की बात हो तो वो जाकर मलाई काटें और इधर टिपिकल हिंदी का लेखक और मास्टर त्रिवेणी, इंडिया हैबिटेट की बहसों और मानदेय में ही फंसा रह जाए। हिंदी समाज जिस अंग्रेजी लेखकों को अपने ऊपर किया गया एहसान समझ रहा है, वो दरअसल उसके स्पेस को पूरी तरह हाइजैक करने का मामला है। इस खेल में हरीश त्रिवेदी भी एक मंजे खिलाड़ी हैं और हिंदी नेशनलिज्म के बहाने अलोक राय की दावेदारी से हम सब परिचित हैं। हरीश त्रिवेदी जब हिंदी पर स्यापा करते हैं, तो वो इतना कलात्मक होता है कि हिंदी समाज अभिभूत हो उठता है लेकिन जैसे ही इसके विस्तार पर जश्न मनाने की बारी आती है, वो इसका क्रेडिट आजतक चैनल और विज्ञापनों को दे डालते हैं। ये खेल महीन है, इसलिए इसे समझने में थोड़ा वक्त तो जरूर लगेगा लेकिन कायदे से अगर ये खेल समझ आ गया तो ये अकादमिक जगत की औपनिवेशिक, भूमंडलीकृत और सामंती मानसिकता एक कॉकटेल के तौर पर दिखाई देंगी। अभी हिंदी समाज को पवन वर्मा की भारतीयता की चिंता इसलिए रास आ रही है क्योंकि वो हिंदी समाज की छाती कूटने की अभ्यस्त आदतों से मेल खाती है।
इन तमाम असहमतियों और सवालों के बीच एक बड़ा सवाल कि भारतीयता और भारतीय संस्कृति को लेकर अब तक जो भी किताबें लिखी गयी हैं, उसके बीच पवन वर्मा की ये किताब पूरी बहस को किस तरह से आगे बढ़ाती है? बढ़ाती भी है या नहीं कि सिर्फ छपाई के स्तर पर एक नयी किताब है, बहस के स्तर पर वही चालीस-पचास साल से चली आ रही पुरानी दलीलें। हटिंग्टन की क्लैशेज ऑफ सिविलाइजेशन और फीदेल कास्त्रो की कल्चरल सॉब्रेंटी की बात सिर्फ छौंक लगाने के लिए है या फिर उसकी गहराई से जांच भी करती है? अगर हां, तो फिर अब ग्लोबल स्तर पर तकनीक के जरिये लोकतंत्र की जो बहस छिड़ी है, वो सब सिरे से गायब क्यों है? भूमंडलीकरण क्यों वन वे फ्री फ्लो की तर्ज पर ही दिखाई देता है, प्रतिरोध के जो छोटे-छोटे पॉकेट्स बने हैं और सक्रिय है, पवन वर्मा को उन सब पर बात करना क्यों जरूरी नहीं लगता? हम अपनी संस्कृति छोड़कर पाश्चात्य के नकलची बनते जा रहे हैं, ये सारी बातें अनुवाद के जरिये हिंदी के उन लोगों के बीच लाने की क्या जरूरत है, जो कि अपनी लाख कोशिशों के बावजूद भारतीयता के टेढ़े-मेढ़े खांचे के बीच जीने के लिए अभिशप्त हैं। उनके भीतर ये कॉम्प्लेक्स पैदा करने की कोशिश तो नहीं कि तुम जो हो पतित हो, घटिया हो, नकलची हो। ये नजरिया पवन वर्मा को एक एलीटिस्ट सोच में बंधे लेखक से क्यों अलग नहीं है, इसे खोजने की जरूरत है। जिसकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा रोज भारतीयता को जीते-ओढ़ते बीतता है, उसके आगे पवन वर्मा की भारतीयता क्यों एक ब्यूरोक्रेट की नसीहत से ज्यादा नहीं लगती? कहीं पवन कुमार वर्मा प्रशासन के डिक्टेटरशिप फार्मूले को अकादमिक जगत पर लागू तो नहीं कर रहे कि हम संहिता बना रहे हैं और तुम्हें उस हिसाब से जीना होगा।
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करवा चौथ के नाम पर एकाध हिन्दी चैनलों को छोड़कर बाकियों ने जमकर गंध मचाये। चूंकि ऐसे मौके के लिए आजतक और इंडिया टीवी को महारथ हासिल है इसलिए उन पर इस त्यौहार का रंग कुछ ज्यादा ही गाढ़े तौर पर चढ़ा। टेलीविजन पर से ऐतिहासिक तथ्य तो गायब हो ही गए हैं,मौके की खासियत भी खत्म हो गयी है। जहां लिखा है प्यार,वहां लिख दो सड़क की तर्ज पर पूरी टेलीविजन इन्डस्ट्री बदहवाश काम किए जा रही है। ऐसे में पूरी कोशिशें इस बात की है कि कौन कितने ज्यादा वॉल्यूम में गंध मचा सकता है। कीचड़ में लीथ-लीथकर लोटने की आदत कोई मजबूरी नहीं बलिक शौक का हिस्सा बन गया है। लिहाजा करवा चौथ की कवरेज पर एक नजर

 आजतक की दो एंकर सोलह सिंगार के अंदाज में स्क्रीन पर काबिज हुई और उसी अंदाज में एंकरिग किया। किस रंग के रत्न,जेवर पहनने से और कब पहनने से इस व्रत का सही आउटपुट मिलेगा,इसके लिए पेड पंडित को स्टूडियो में हायर किया। फिर एक के बाद एक पैकेज।
मसलन टेलीविजन की हस्तियों का करवाचौथ,बॉलीवुड की पत्नियों का करवाचौथ। फिर लगातार अपील आजतक छोड़कर कहीं मत जाइए,आपको चांद देखने के लिए बालकनी या छत पर नहीं जाना होगा,हम यहीं बताएंगे कि चांद निकला या नहीं,बस देखते रहिए आजतक। ऑडिएंस को अपने पर कितना भरोसा है,नहीं पता लेकिन चैनल को अपने उपर भरोसा रत्तीभर भी नहीं,इसलिए लगा कि इतनी मनुहार के बाद भी कहीं वो छिटक न जाए तो सीधे ऑफर किया- आजतक देखो,सोना जीतो।

कोई हिन्दी चैनल लाख कोशिशें कर लें,गंध मचाने के मामले में मैं इंडिया टीवी को सबका बाप मानता हूं। उसके आगे अब आजतक भी पायरेसी लगती है और आइबीएन7 इन दोनों चैनलों की कॉकटेल। इसलिए अगर आपको हिन्दी न्यूज चैनलों की गंध मचाई का मौलिक वर्जन देखना हो तो इंडिया टीवी के आगे कोई विकल्प नहीं।    इंडिया टीवी ने करवा चौथ को ईद के बराबर में लाकर खड़ा कर दिया। एक ही साथ स्क्रीन पर दस शहरों में कब,कहां चाद निकलेगा इसकी जानकारी देने में जुट गया और फिर शार्टकट में ही सही सभी जगहों का नजारा। पेड पंडित यहां भी बताने लग गए कि बस तीन मिनट बाकी है लखनउ में चांद निकलने में जबकि दिल्ली के लोग देख सकते हैं अभी चांद। इसके बाद वो सीधे खाने पर उतर गया।

किस राशि की महिला कौन सा आइटम खाकर अपना व्रत तोड़ेगी तो उसके दाम्पत्य जीवन के लिए बेहतर होगा और फिर एक-एक राशियों के हिसाब से उसकी चर्चा। ये अब एक कॉमन फार्मूला हो गया है खासकर इंडिया टीवी और आजतक के लिए कि चाहे सूर्यग्रहण हो,चाहे कोई व्रत हो सभी राशियों को लेकर एक पैकेज बना दो,पेड पंडित को बिठा लो। राशियों पर आधारित कार्यक्रमों की टीआरपी अच्छी होती है। एक सेलबुल एलीमेंट हैं।

अबकी बार टीआरपी के मैदान में सहारा ने न्यूज24 की कनपटी गरम कर दी है और उसे धकियाकर उसके आगे काबिज हो गया है। लिहाजा चैनल के भीतर कुछ अलग और डिफरेंट करने की जबरदस्त बेचैनी है जो कि चैनल के एंकरों सहित पैकेज में साफ तौर पर दिखाई देता है। लेकिन चैनल के भीतर एक भी दमदार प्रोड्यूसर नहीं है,इस सच को टेलीविजन देख रही ऑडिएंस भी बेहतर तरीके से समझती है। कायदे के एक-एक करके खिसक गए आजतक रिटर्न प्रोड्यूसर की कमी पैकेज को एक बेउडे मटीरियल की शक्ल में बदल देती है। वो आपको दिख जाएगा।..तो इसी डिफरेंट दिखने की बेचैनी ने उसे आज की सावित्री खोजने पर विवश किया। उसने स्पेशल पैकेज के तौर पर हॉस्पीटल की बेड पर पड़ी एक ऐसी महिला की स्टोरी दिखायी जो कि अपने पति के खराब लीवर की जानकारी के बाद अपने लीवर का पचास फीसदी हिस्सा देकर उसकी जान बचाती है। जाहिर तौर पर ये अच्छी और मानवीयता की बात है। ये मध्यवर्ग के बीच की गाथा है। लेकिन चैनल इस पैकेज को संभाल नहीं पाता है। डॉक्टर की बाइट और लगातार हॉस्पीटल के फुटेज, करवाचौथ के लाल और चटकीले रंगों के बीच सफेद,लाइट ब्लू रंग मनहुसियत पैदा करते हैं। नतीजा,लिजलिजे पैकेज और इस मनहूसियत से मन उखड़ जाता है जिसका फायदा सीधे तौर पर इंडिया टीवी उठाता है उसी स्टोरी को ज्यादा रोचक तरीके से पेश करता है। हां,सिेनेमा ने कैसे इस करवाचौथ को एक नेशन कल्चरल व्रत बनाया,करवाचौथ के एक दिन पहले की स्टोरी ज्यादा बेहतर और देखने लायक थी।

स्टार न्यूज पर बिहार चुनाव का सुरुर अभी भी सवार है लेकिन करवा चौथ भला उसके इस सुरुर से रुक तो नहीं जाएगा। लिहाजा वहां भी पैकेज चले। कुछ ऐतिहासिक तथ्यों तो कुछ फिल्मी हस्तियों की कहानी को जोड़ते हुए। लेकिन आजतक का मूवी मसाला इस मामले में बाजी मार गया। दीपिका कैसे अपने फिल्म प्रोमोशन-खेले हम जी जान से के लिए इस व्रत को भुनाती है,ढंग से बताया। मल्लिका को कैसे करवाचौथ के नाम पर सुरसुरी छूट जाती है और मातमी शक्ल में नजर आने लगती है,आजतक की इस खोजी पत्रकारिता( हंसिए मत प्लीज) के स्टार न्यूज फीका पड़ गया। हां,उसकी बॉल सबसे बेहतरीन और कलात्मक लगी

देशभर में जहां-जहां भी महिलाओं ने करवा चौथ मनाएं और मेंहदी से शुरु होनेवाले सोलह सिंगार किए,उनमें से एक भी सांवली या काली त्वचा वाली महिला ने या तो मेंहदी नहीं लगाए या फिर व्रत नहीं किया। न्यूज चैनलों की करवा चौथ कवरेज से मेरी तो यही समझ बनी। ये त्योहार सिर्फ गोरी महिलाओं के लिए है और गोरी कलाइयों पर ही मेंहदी का रंग चढ़ सकता है। पूरे टेलीविजन में मुझे सिर्फ नकुषा( लागी तुझसे लगन) ही ऐसी लड़की नजर आती है जिसे कि काली और कुरुप होते हुए भी सिंगार करने का अधिकार है,मेंहदी रचा सकती है।

करवाचौथ का एक एक्सटेंशन वेलेंटाइन डे के तौर पर ही हुआ है और संभव है कि आनेवाले समय में ये आइडिय लव फॉर लाइव डे के तौर पर इमर्ज कर जाए। इसलिए एक मजबूत स्टोरी बनती है जिसे कि चैनलों ने दिखाया कि कैसे अब पति भी अपनी पत्नी के लिए ये व्रत करते हैं और चैनलों ने उन पतियों को उस दिन का हीरो बना दिया जो कि पत्नी के साथ व्रत रखे हैं। दूसरा कि अब सिर्फ अच्छा पति के लिए नहीं,अच्छा पति मिलने की कामना के लिए भी व्रत रखा जाता है। चैनल इस कॉन्सेप्ट को विस्तार देते हैं और इस पर भी जमकर स्टोरी चली और जोड़े विदाउट मैरिज खोजे गए।

इस करवाचौथ में देशभर की महिलाओं ने सोलह सिंगार किए,लंहगें और चटकीले रंगों की साडियां पहनी। फैशन की मार में काले रंग की भी साडियों पहनी,अपशगुन का कोई लोचा नहीं रहा। धोनी ने भी पहली बार व्रत कर रही  अपनी पत्नी साक्षी के लिए सूरत से खासतौर पर साडियां खरीदीं लेकिन चैनलों ने उसे साड़ी या जोड़े में दिखाने के बजाय दो दिन पहले की गोवा बीच वाली अधनंगी दिखती फुटेज ही दिखाए। चैनल की कुंठा के आगे साक्षी करवा चौथ में भी सोलह सिंगार नहीं कर सकी,धोनी की लायी हुई साड़ी नहीं पहन सकी। इसका अफसोस है।
इस पूरे प्रकरण में मुझे अमिताभ बच्चन के घर के आगे ब्लू टीशर्ट पहनी आजतक की रिपोर्टर बहुत ही लाचार नजर आयी,उस पर तरस आया। देशभर की लड़कियां,महिलाएं उस्तवी माहौल में रंगी है,वो बाइट न मिल पाने की स्थिति में लाचार और पुअर बाइट बेगर के तौर पर दिखाई देती है। तमाम चैनलों पर एंकर को जिस अंदाज में पेश किया गया,उनके चेहरे पर प्रोफेशन के अलावे निजी जिंदगी की कामना( फ्राइड की भाषा में लिबिडो), ललचायी इरादे ंसाफ तौर पर झलक गए। कई व्ऑइस ओवर को सुनकर महसूस किया कि वो मानो कह रही हो- क्या हर लड़की की जिंदगी त्योहारों के लिए बस आवाज देने के लिए है,उसकी अपनी आवाज नहीं है।

चैनल की इस पूरी चिरकुटई को मीडिया आधारित साइट मीडियाखबर ने बेहतर तरीके से पकड़ा और कल्पना किया कि अगर चैनल के मालिक और बड़े पत्रकार नए फैशन के हिसाब से करवाचौथ करेंगे तो वो अपनी चंदा को देखकर क्या मांगेंगे,लिहाजा- रजत शर्मा का करवाचौथ।.
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