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साधु-संतों से किसी की क्या दुश्मनी हो सकती है भला? वैसे भी ये देश एक नंबर के मक्कार,दलाल, अय्याश,देह- व्यपार धंधे में लिप्त शख्स के साधु का वेश धरते ही पूजनेवाला रहा है। साधु का चोला पहनते ही सब पवित्र हो जाता है। इतना पवित्र,इतना मानवीय कि कई बार सांवैधानिक प्रावधान भी बौने नजर आने लगते हैं। लेकिन आर्ट ऑफ लिविंग के संत श्री श्री रविशंकर पर हमला जरुर चौंकानेवाला है। आजतक को दिए अपने फोनो में उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि उन पर किसने हमला किया ये पता नहीं। आजतक की ऑफिशियल साइट ने लिखा कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने उन पर हमला किया है जबकि आज बीबीसी से लेकर देश की प्रमुख साइट बता रही है कि ये श्री श्री रविशंकर पर हमला नहीं है। श्री श्री रविशंकर पूरी तरह सुरक्षित हैं और उन्‍हें किसी तरह की चोट नहीं आई है उन्हें किसी पर शक नहीं। हम देश के बाकी हमलों की तरह इस हमले की भी भर्त्सना करते हैं। हमारा ऐसा करना रुटीन का हिस्सा करार दिया जाए। लेकिन इसके आगे हम दूसरे सवाल की तरफ मुड़ना चाहेंगे।

ये देश शुरु से ही साधु-संन्यासियों का सम्मान करनेवाला देश रहा है। साधुओं के मामले में इतना लिबरल रहा है कि गलत से गलत काम किए जाने पर भी उसे बख्शता आया है। पौराणिक कथाओं में भी साधुओं ने अगर कोई गलती की तो उसकी सजा प्रशासन की ओर से न देकर उसे भगवान इसका हिसाब करेगा जैसी मान्यताओं के आधार पर छोड़ दिया गया। संभवतः इस मिली सुविधा की वजह से साधुता के खत्म होते जाने पर भी साधुओं की तादाद बढ़ती चली गयी। ऐसे हाल में भी ये विरला देश है जहां कि साधुओं के प्रति आस्था थोड़े-बहुत हिलने-डुलने के साथ भी बरकरार है। यह आमजनों की आस्था का ही नतीजा है कि साधु होना इस देश में सुरक्षा कवच के तौर पर इस्तेमाल किया गया विधान बनता चला गया। आप पत्रऔऱ कार हैं,डॉक्टर हैं,मास्टर हैं तो भी कभी भी जनता के हाथ से पिट सकते हैं लेकिन साधु होने की स्थिति में आप सुरक्षित हैं। साधुओं की ये सुरक्षा प्रशासन की ओर से शांति औऱ सुरक्षा बहाल किए जाने के दावे से कहीं आगे की चीज है क्योंकि ये पूरी तरह जनभावनाओं के बीच रहकर पाती है। शायद यही वजह है कि बाबाओं-साधुओं के आए दिन सेक्स स्कैंडल,तस्करी और दलाली जैसे काम में लिप्त होने पर लोकल स्तर के प्रशासन से लेकर केन्द्र तक की राजनीति हाथ डालने के पहले थोड़ी सकुचाती है,थर्राती है,जलजला आ जाने की धमकी से चुप मारकर बैठ जाती है। देशभर की मीडिया थोड़ी-बहुत मार खाती है और इन्हीं बाबाओं के चैनलों में शेयर खरीद लिए जैने पर चुप मारकर बैठ जाती है। ऐसे में जबकि चारों ओर से लोग बाबाओं और साधुओं पर हाथ डालने के पहले सौ बार सोचते हैं,उनके पास किसी भी बड़े नेता से ज्यादा मजबूत जनाधार होता है तो फिर उन पर कोई हमला कैसे कर सकता है?

श्री श्री रविशंकर पर जो हमला हुआ है उससे एक बात तो तत्काल साफ हो गयी है कि ये हमला उनके संत होने की वजह से नहीं हुआ है। आर्ट ऑफ लिविंग के जरिए जो शख्स लाखों लोगों के बीच अमन औऱ शांति बहाल करना चाहता है उस पर भला कोई क्यों हमला करेगा? ये देश तमाम तरह के दुगुर्णों को धारण करते हुए भी बदलाव के स्वर को पचाता आया है। आखिर इतने सारे अग्रदूतों की लाइनें ऐसे ही नहीं लग गयी है। ये हमला देश के किसी भी संत के बदलते चरित्र पर हमला है। बाबा और साधु का पदनाम धरकर जो साम्राज्य और बिजनेस का प्रसार का काम हो रहा है उस पर हमला है। दरअसल बाबाओं की लोकप्रियता का जो आधार है उसके पीछे उनका धंधा,उनसे होनेवाले मुनाफे और कमीशन जैसी सारी बातें शामिल हैं। अगर आप देश के किसी भी बड़े बाबा औऱ उनके ट्रस्ट की वर्किंग कल्चर पर गौर करें तो आपको अंदाजा लग जाएगा कि यहां भी सारे काम उसी तर्ज पर होते हैं जिस तर्ज पर देश में कोई साबुन,स्कीन क्रीम,कंडोम,गर्भनिरोधक गोली या फिर लग्जरी कार बनाने-बेचनेवाली कंपनी करती है। धर्म की आड में इन बाबाओं के बीच जबरदस्त किस्म की रायवलरी है। आपसी खींच-तान और कम्पटीशन है। हमले की जड़ यहां से पनपती है। अगर इस पूरी बात को एक लाइन में कहा जाए तो ये हमला उस संत के उपर है जिसका पदनाम संत का है लेकिन उसकी तमाम गतिविधियां कार्पोरेट,बाजार और किसी भी पूंजीपति से अलग नहीं है। ये धर्म और आस्था का रोजगार चलानेवाले एक प्रैक्टिसनर के उपर हमला है। कम से कम इस मौके पर इस देश को बख्श दीजिए कि ये देश किसी साधु-संन्यासी पर हमला करेगा।

इस देश में पैदा होनेवाला अपराधिक तत्व भी पता नहीं कौन सी घुट्टी पीकर बड़ा होता है कि अगर वो हत्या भी करता है,लूटपाट भी करता है,किसी की संपत्ति पर कब्जा भी करता है तो उसका एक हिस्सा धार्मिक कार्य में लगाता है,साधुओं को दान करता है। साधुओं और उसकी महिमा से डरता है। ये डर कमोवेश में बना ही रहता है। औऱ फिर अपराधिक ही क्यों,अपराध को रोकने में लगे लोगों के बीच भी यह भय काम करता है कि अगर उसने देश के इन साधुओं पर हाथ डाला तो उसका अनिष्ट होगा। ये बयान हमें किसी सरकारी या गैर सरकारी अधिकारियों से सुनने को नहीं मिला बल्कि इसका हवाला देश को वो बाबा जरुर जब-तब देते आए हैं जो जमीन हड़पने से लेकर हत्या करवाने के आरोप में शामिल रहे हैं। लेकिन श्री श्री रविशंकर पर हमला करनेवाले ने रत्तीभर भी नहीं सोचा कि इतने बड़े पहुंचे हुए बाबा पर हमला करने से उसे कुछ नुकसान हो जाएगा। उसके संतान अकाल मारे जाएंगे,उसके शरीर का कोई हिस्सा काम करना बंद कर देगा,उसकी आंख की रोशनी चली जाएगी। ये सारी बातें इसलिए कहना जरुरी है कि साधुओं के प्रति आस्था हमें इसी तरह भय दिखाकर पैदा की गयी है। इस पर कई तो फिल्में बनी है और कई धार्मिक सीरियलों में टुकड़ों-टुकड़ों में भी देखा है। हमला करनेवाले के भीतर से इस तरह के भय का खत्म होना दो तरह के संकेत देते हैं।

एक तो ये जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं कि ऐसे संत हम धर्म औऱ आस्था के प्रैक्टिसनर भर हैं। अगर इस देश में वाकई यशस्वी संतों की परंपरा रही है तो उससे इनका नाम जोड़ा जाना बेमानी है। लोगों को ये बात समझ आ रही है कि इन प्रैक्टिसनरों के पास अकूत सम्पत्ति है जिसे लूटा जा सकता है,धमकाकर हथिआया जा सकता है। इसके साथ ही ऐसे संत अपने साम्राज्य का विस्तार करने में जिन नीतियों का सहारा लेते हैं वो संतई और प्रवचन करने की आदि परंपरा से कही ज्यादा राजनीति,कूटनीति,मैनेजमेंट और जोड़-तोड़ के ज्यादा करीब हैं। यहीं पर आकर संत और बाकी वर्चस्वकारी,प्रभावी लोगों की स्थिति और उऩ पर होनेवाले हमले के बीच कोई फर्क नहीं रह जाता। इसलिए ये कोई आरोप नहीं है बल्कि मौजूदा दौर में बाबाओं के काम करने के तरीके पर सोचने का नजरिया भर है। ऐसे में ये बाबा और संत सिर्फ और सिर्फ नाम के स्तर पर संत औऱ साधु रह जाते हैं। भीतर-भीतर जो अंडर करन्ट प्रवाहित होता है वो पूंजीपति,राजनीतिक और इन्टरपेन्योर की स्ट्रैटजी है। ये अंडर करन्ट इस हमले से खुलकर सामने आया है। इस हमले ने एक हद तक साफ कर दिया है कि इस देश में संतई का पैटर्न पूरी तरह बदल चुका है। इसके भीतर भी जबरदस्त किस्म की प्रतिस्पर्धा है,कम्पटीशन है। मुझे ध्यान आता है कि आज से करीब आठ-नौ महीने पहले मैं सिर्फ कुछ घंटे के लिए हस्तिनापुर गया था। लेकिन बाद में वहां जो मठ और बाबागिरी का आलम देखा तो चार दिनों तक रुक गया। सिर्फ ये पता करने के लिए कि आखिर इतने मठों को बनाने के पीछे क्या मकसद है? हमें जानकर हैरानी हुई कि दिल्ली में जैसे जीटी करनाल रोड पर फार्महाउस बनाकर कमाने का जरिया बना लिया गया है,नोएडा और ओखला में फैक्ट्रियां डाल दी जाती है,वैसे ही यहां मठ डाल दिए जाते हैं। मठों के अंदर इस्तेमाल हुए शब्दों को सुनकर हैरानी हुई कि सबकुच कितना स्ट्रैटिजिकली किया जाता है। एक मठ का दूसरे मठ से जबरदस्त कम्पटीशन है। विचारधारा,धार्मिक मान्यताओं को लेकर तो बहुत पीछे की बात हो गयी। इसलिए थोड़े से भी उत्सुक हुए लोगों के लिए ये शोध का विषय है कि आखिर ऐसे संतों पर हमले होने क्यों शुरु हुए हैं? नतीजे तक पहुंचने का एक स्ट्रक्चर ये भी हो सकता है।
दूसरा ये कि ये हमला इसलिए नहीं हुआ कि श्री श्री रविशंकर ने लोगों की भावनाओं को किसी तरह से ठेस पहुंचाने का काम किया। संभव है कि ये हमला उस रुटीन के तहत किया गया जो आए दिन किसी न किसी दमदार शख्स के उपर किया जाता है। श्रद्धानत लोगों के लिए ये बात जरुर परेशान करेगी कि जिस देश में इतना बड़ा संत सुरक्षित नहीं है तो फिर उसकी क्या बिसात? लेकिन ऐसा होने से साधुओं का असर और आगे जाकर कहें तो शायद कुछ आतंक कम हो। पिछले छ महीने के भीतर देश के साधुओं/बाबाओं को लेकर आयी खबरों पर गौर करें तो कृपालु महाराज से लेकर आसाराम बापू तक,इनमें उन सेक्स स्कैंडल में फंसे साधुओं को भी शामिल कर लें तो ये साफ हो जाता है कि इन सबों को ठोस तौर पर कानूनी विधान से ही होकर गुजरना पड़ा है और अगर सबों की स्थिति बदतर होती है तो उसके पीछे कानूनी कारवायी ही होगी। अलग से कोई दैवी विधान नहीं होने जा रहा। श्री श्री रविशंकर के हमले के मामले में फिर भी इस बात की छूट मिलती है जिसे कि जरुर कोई नत्थी करके परोसेगा कि प्रभु की कृपा उन पर बनी है,लेकिन अगर घायल भक्त को शामिल कर लें तो आस्था जरुर डगमगाती है। ऐसे में आस्था की जमीन लगातार जरुर कमजोर होगी। ये बात भी है कि इस कमजोर होती जमीन का अंदाजा संतों को बेहतर तरीके से होने लगा है शायद इसलिए मैनेजमेंट और मीडिया के ऑक्सीजन से खुद को जिलाए रखने की कोशिशें तेज हुई हैं। हमले,अभी तो इन पर लेकिन कुछ दिनों पहले तांत्रिक के बयान पर कि संत आसाराम ने शिष्य ने फलां फलां के लिए मारक मंत्र इस्तेमाल करने को कहा था,कहे जाने पर तांत्रिक के आश्रम में हमले ये साफ करते हैं कि इस आस्था,धर्म और सद्भावनाओं की आढ़त चलानेवाले लोगों के बीच जो कि अपने को सांसारिकता से दूर रहने की बात करते हैं,सांसारिकता के जोड़-तोड़ जमकर चल रहे हैं। इस बात को सख्ती से प्रशासन और देश की आम जनता जितनी जल्दी समझ ले,उतना ही अच्छा है।
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एक चैनल जो आतंकवाद के साथ है

Posted On 7:40 pm by विनीत कुमार | 2 comments


हम आतंकवाद के साथ हैं। किसी न्यूज चैनल के हेड का ऐसा कहना क्या सिर्फ जुबान के फिसल जाने का मामला है। यदि हां तो उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वो किस हैसियत से बात करते हैं और उन्हें बोलते वक्त सतर्क रहना चाहिए।..और अगर नहीं तो हमें सोचना होगा कि मीडिया इन्डस्ट्री में कैसे-कैसे चैनल हेड उग आए हैं जिन्हें इतना भी पता नहीं कि आतंकवाद क्या है? अगर कोई चैनल हेड कहे कि वो माओवाद के साथ हैं,उस माओवाद के साथ जिनकी पूरी क्रांति और बदलाव के सारी सोच मासूमों का खून बहाने तक जाकर खत्म हो जाती है फिर भी जमाने का जो चलन हैं उसमें उन्हें इन्टलैक्चुअल करार दे दिया जाएगा। लेकिन आतंकवाद के साथ होनेवाली बात मुझे नहीं लगता कि किसी आतंकवादी के पक्ष से केस लड़नेवाले वकील के अलावे कोई दूसरा शख्स कर सकता है। तो इसका मतलब ये साफ है कि मीडिया खबर ने जिस चैनल के बारे में हमें जानकारी दी है कि उन्होंने ये कहा कि हम आतंकवाद के साथ हैं,उन्हें ये पता ही नहीं कि आतंकवाद कोई विचारधारा है या फिर ग्लोबल स्तर का सबसे बड़ा संकट। इस साइट ने ऐेसे चैनल हेड पर लानतें-मलानते भेजते हुए जो कुछ भी लिखा है,उसके बड़े हिस्से से सहमति दर्ज करते हुए हमें लगता है कि इस पूरे मामले को थोड़ा और आगे जाकर सोचना चाहिए। किसी के लिए चैनल पापा का दिया हुआ गिफ्ट हो जाए,हमें इस सवाल से टकराना ही होगा कि फिर उसके औलाद इस गिफ्ट के साथ क्या करते हैं?

इस पूरे मामले में सबसे जरुरी और बड़ा सवाल है कि आखिर उन दलालों,प्रोपर्टी डीलरों,बिल्डरों और एक का पांच बनाने वाले टाइप के लोगों के भीतर ये भरोसा किसने पैदा किया है कि अगर तुम्हारे पास डेढ़-दो सौ करोड़ रुपये हैं और अगर नहीं है तो अपनी ठसक के दम जुटा ले सकते हो तो चैनल खोल सकते हो,चला सकते हो और देश के किसी भी चुनिंदा कहे जानेवाले पत्रकार को अपनी जूती के नीचे,अपने तलबे से उसकी बजा सकते हो। नवरत्न पालने का शौक अकबर को भी रहा और उसके जखीरे में शामिल होने की ललक हर प्रतिभाशाली शख्स को रही होगी। अकबर का ये शौक आज अगर मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर प्रथा का रुप धारण कर चुका है तो सवाल ये है कि नवरत्न के तौर पर बहाल होनेवाले लोग ये समझे कि वो अपनी जमीर बचाते हुए ही उसमें शामिल होंगे। उन्हें फैसला लेने में थोड़ी भी उलझन होती हो तो बीरबल और तानसेन की जीवनी पढ़ लेनी चाहिए। दूसरी तरफ जो जखीरा बनाने का काम कर रहे हैं,उन्हें इस बात की तमीज होनी चाहिए कि ये देश अब सिर्फ शौक से नहीं बल्कि जरुरतों से चलेगा। ये देश दलाली,लूट-खसोट,गैरमानवीय तरीके से अकूत धन जुटाकर अय्य़ाशी करने की बात को तो फिर फिर घड़ी-दो घड़ी के लिए पचा ले जाएगा क्योंकि पचाएगा नहीं तो करेगा क्या लेकिन इस धन से शौकिया तौर पर मीडिया चैनल खोले जाएं इसके लिए न तो मानसिक तौर पर तैयार है और न ही इसके भीतर ऐसा बर्दाश्त कर लेने की ताकत आने पायी है। इस धन के दागदार चरित्र को पाक-साफ करार देने के लिए मीडिया हाउस खोले जाएंगे इसे कभी बर्दाश्त नहीं करेगा।

मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर आज कौन कितना बड़ा पत्रकार है,अगर पत्रकारिता बची भी रह गयी है तो भी इस बात से तय नहीं होता कि उसने साल में कितनी बड़ी स्टोरी दी है। ऐसी स्टोरी जिससे कि सत्ता और समाज के किसी भी हल्के में असर हुआ हो,बल्कि पूरा मामला इस बात से तय होता है कि वो कितने बड़े से बड़े पैकेज पर दूसरे चैनल में शिफ्ट हुआ है। हमारी बात अगर भाषण या बंडलबाजी लगती है तो एक तरफ नामचीन पत्रकारों की लिस्ट बनाइए और दूसरी तरफ उनकी स्टोरी की,आपको अंदाजा लग जाएगा। कभी जमाने में बेहतर पत्रकारिता के नजदीक मिसाल कायम करने जैसी चीज कुछ कर गए और अब जिंदगी भर उसे उपलब्धि की कमीई इस गलीच महौल में खाने की फिराक में पड़े हमें महान मीडियाकर्मियों पर सिर्फ घृणा ही नहीं आ रही है,बल्कि हमें वो उतने ही खतरनाक नजर आ रहे हैं जितनी खतरनाक शक्लें टेलीविजन और अखबारों में आए दिन दिखाए जाते हैं। क्योंकि ऐसे महान मीडियाकर्मियों ने दल्ला समाज के हाथों एक बहुत ही आसान फार्मूला थमा दिया है कि आप हमें इतनी रकम दें,बाकी पत्रकारिता का सारा काम हम देख लेंगे। तो पत्रकारिता को फार्महाउस की तरह ठेके पर लेने का जो काम ये महान पत्रकार कर रहे हैं वो ये नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके काम को अगर बारीकी से समझा जाए तो दलालों और दालमंडी में रुमाल फिराकर धंधा करनेवालों से वो कहीं ज्यादा घटिया काम कर रहे हैं।

मीडिया खबर ने जिस चैनल का जिक्र किया है,जिस चैनल के हेड की बात की है उसकी जूती के नीचे देश का एक बहुत ही अनुभवी पत्रकार मुखौटे की शक्ल में टांग दिया गया है। इस पत्रकार के जब तक पत्रकार बने रहने की गलत जानकारी हमारे पास रही,सामने से गुजरते हुए मैं भी सम्मान में खड़ा हो गया। लेकिन जब पता चला कि ये भी इस अनुभवहीन,बिगडैल और बदतमीज चैनल हेड के आगे जूते चटकाता है तो अपराधबोध से मन भर आया। हमें किसी के प्रति जल्दीबाजी में श्रद्धा व्यक्त नहीं करनी चाहिए,बल्कि ये मान लेना चाहिए कि जीता-जागता कोई भी शख्स इज्जत के लायक नहीं होता। हमें उसके मरने तक का इंतजार करना चाहिए क्योंकि उसके बाद गलीच से गलीच घटिया से घटिया शख्स भी स्वर्ग में जाने की वजह से भगवान के करीब हो जाता है। मरकर आदमी देवता बन जाता है,हमें अपनी नास्तिक विचारधारा को थोड़ी देर के लिए उतार फेंककर ऐसा ही सोचना चाहिए। ऐसे महान पत्रकार पूरी की पूरी पत्रकारों की पीढ़ी के स्वाभिमान को कैसे कुचलने का काम करते हैं,उनके मनोबल को ध्वस्त करते हैं,उनके भीतर फ्रस्ट्रेशन के लेबल को आगे तक ले जाते हैं इसका अंदाजा शायद अभी न हो।

लेकिन मैं महसूस कर रहा हूं मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर ये चलन तेजी से पनप रहा है कि जो कभी इस फील्ड में ग्लैमर और पैसा के फेर में आए या फिर कुछ सरोकार से जुड़े काम करने आए,उन्हें अब जैसे ही इससे कोई बेहतर या कई बार तो इससे कमतर भी विकल्प मिल रहे हैं तो वो यहां से जा रहे हैं। ये वो जमात है जो इस बात की चिंता नहीं करती कि ये जमाने के लिए महान पत्रकार है। बल्कि ये इस बात का खुलासा करती है कि महान कहलानेवाला पत्रकार एसी कमरे में बैठकर कैसे केंचुए की जिंदगी जी रहा है,उसकी रीढ़ की हड्डी न्यूज रुउम में पहुंचने से पहले ही दफना दी गयी और अब उसके शरीर का सिर्फ एक ही हिस्सा उपर उठता है जो बॉस के आने पर सर तक छूकर वापस लौट आता है। इसलिए भोपाल में आजकल जो पहल चल रही है कि महान पत्रकारों पर डॉक्यूमेंटरी बनायी जाए,उनकी जीवनियां लिखी जाए,बहुत जरुरी हो गया है कि उनके जीवन के इस किस्से की सही से जांच पड़ताल हो कि वो पत्रकारिता के भीतर रहकर उसके विरोध में किस हद तक उसकी जड़े खोद रहा है। पत्रकार के तौर पर जानेवाले शख्स के भीतर कैसे एक दलाल, चाटुकार,निरीह और बेशर्म शख्स की आत्मा घुस आयी है,इसकी शिनाख्त दलाल मीडिया मालिकों को उखाड़ने और उस पर कार्यवाही करने से कम जरुरी नहीं है। चैनल हेड ने जिस आतंकवाद का साथ गलतजुबानी और काहिली में कर दी,उसके भीतर का अनुभवी पत्रकार वाकई में आतंकवाद से कम घिनोना खेल नहीं रच रहा।
मूलतः प्रकाशित- मीडियाखबर डॉट कॉम
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सोचता हूं तो हैरानी होती है कि मैं कैसे कुछ महीने पहले तक रोज पोस्टें लिखा करता था. कई ब्लॉग्स भी पढ़ लेता,अलबत्ता कमेंट्स न के बराबर करता। मेरे दिमाग में रोज इतने सारे मुद्दे होते,इतना कुछ लिखने का मन करता कि लगता कि सबों पर अलग से ब्लॉग बना लूं। इसी क्रम में टेलीविजन पर लिखने के लिए टीवी प्लस बनाया। जिस दिन अपने ब्लॉग पर नहीं लिखा उस दिन मोहल्लालाइव या फिर मीडिया खबर के लिए लिखा। लेकिन अब रेगुलर बेसिस पर पोस्टें लिखना पहाड़ सा लगता है।...

मुझसे कई बार वर्चुअल स्पेस के जरिए जुड़े लोगों ने पूछा भी कि आप रोज-रोज कैसे लिख लेते हो,कैसे आपके दिमाग में रोज कुछ न कुछ लिखने को होता है। इसका जबाब मैंने या तो चैट बॉक्स पर दिया या फिर एक-दो बार सीधे-सीधे पोस्ट लिखकर ही साफ किया कि- ब्लॉगिंग की पैदाइश हूं,लिखूंगा नहीं तो मर जाउंगा। उस समय सचमुच रोज लिखना रोजमर्रा के काम में शामिल हो गया था।..और फिर समय भी कितना लगता,मुश्किल से बीस से पच्चीस मिनट। लाइनों की सतह तो पहले से तह लगकर दिमाग में पड़ी होती,लिखने बैठता तो लगता जैसे पापा साड़ी की गांठ खोलते हुए गिनती मिलाया करते हैं,मैं भी बस यही कर रहा हूं। लिखना मेरे लिए कोई अलग से विशेष एफर्ट कभी नहीं रहा। अगर मैं रिसर्च आर्टिकल को छोड़ दूं जिसमें कि कई स्तर पर संदर्भ देने होते हैं तो लिखने में और किसी के घर का खाना खाने के बीच कभी ज्यादा फर्क नहीं रहा। ये दोनों काम मैं चौबीस घंटे में कभी भी कर सकता हूं। उन दिनों ऐसा मेरे भरोसा जम गया था।

अकादमिक तौर पर जो लोग मुझसे जुड़ें हैं औऱ मैं जिनसे जुड़ा हूं उन्हें मेरी रोज की लिखने की आदत से ये ...फहमी पैदा हो गयी कि मैं बस दिनभर ब्लॉगिंग करता रहता हूं और कुछ भी पढ़ाई-लिखाई नहीं करता। एक मास्टर साहब ने तो इस काम को चैटिंग से भी बदतर लत करार दिया। मैंने कभी किसी को इस मामले में सफाई देने की जरुरत नहीं समझी। उनका ऐसा सोचना स्वाभाविक भी है क्योंकि हिन्दी समाज "कब्जीयत शैली" का शिकार समाज रहा है।

यहां लोग सीधे-सीधे जो जैसा सोचते हैं,वैसा बहुत ही कम लिखा करते है। पहले तो सोचते हैं,फिर विचारों और विमर्शों का तीर-तुक्का भिड़ाते हैं,फिर इस बात पर गुणा-गणित करते हैं कि अगर ऐसा लिखा तो किस-किस महंतों से खेल बिगड़ जाएगा। कुछ आलस्य का भी सम्मान करना होता है। कुछ लोगों के साथ ये भी दिक्कत है कि खुद हाथ से लिखा और चेले-चपाटियों से टाइपिंग करा ली।..तो ये सब में ले-देकर समय लग जाता है। यहां तो अपना मामला सीधा-सीधा था। जो करना था सो खुद ही।..और हम जैसे वेवकूफ को इस बात की चिंता क्यों सताने लगी कि मेरे लिखने से किस महंत की अनवरत साधना भंग होगी। अब महीनों तक तो यही भरोसा नहीं रहा कि मेरे लिखे को लोग पढ़ेगे और वो भी पढ़ेंगे जिनके पास किताबों की समीक्षा करने तक के लिए किताबें पढ़ने का समय नहीं। ये तो थोड़ी बहुत समझ तब पैदा हुई जब देखा कि कुछ लोग पटेल चेस्ट से मास्टरजी के लिए पोस्टों की प्रिंटआउट निकालकर सेवा में प्रेषित कर रहे हैं।..तो भी लिखता रहा,इस मिजाज से कि लिख ही तो रहा हूं किसी की जमीन थोड़े ही कब्जा ले रहा हूं और होए दिक्कत तो होए महंतों को। बाबूजी के साथ ब्रा,पैंटी और साड़ी-बिलाउज का धंधा जिंदाबाद। वैसे भी लंबे समय तक मुझे नक्कारा समझनेवाले पापा का मन अब बदल गया,मुझमें अब वो भविष्य देखते हैं। मैं उस सुख की कल्पना से रोमांचित हो जाता हूं जब किसी संतुष्ट ग्राहक के हाथ से पैसे लेकर पापा मुझे गल्ले में पैसे रखने कहते हैं और रात में बाइक पर उनके साथ लौटता हूं,वो भइया से भी ज्यादा स्पीड में स्पेल्डर चलाते हैं और मैं पीछे से लगातार कुछ न कुछ बोलता जाता हूं।

मैंने तब सबसे ज्यादा पोस्टें लिखी जब मैं सबसे ज्यादा व्यस्त रहा। जब पीएचडी की रिपोर्ट बना रहा होता,थीसिस के चैप्टर लिख रहा होता,पत्रिकाओं के लिए लेख लिख रहा होता,टीवी देख रहा होता। मैंने एक बार कहा भी कि जब मैं रोज पोस्टें लिख रहा हूं तो समझिए कि मेरी लाइफ में सबकुछ अच्छा-अच्छा और व्यस्त चल रहा है। व्यस्त होने पर हमारी सक्रियता बढ़ा जाती है औऱ हम एक ही साथ कई काम करने लग जाते हैं।..इसलिए जब जब भी किसी ने कहा कि अरे अभी बंडे हो,लिख ले रहे हो,देखना जब विजी हो जाओगे तो ब्लॉगिंग छूट जाएगी,मैं मन ही मन मुस्कराता और कहता देखना नहीं छूटेगी। लिखने के लिए समय से कहीं ज्यादा इच्छाशक्ति जरुरी है और हम कोशिश करेंगे कि वो कभी मरने न पाए।

लेकिन अबकी बार न जाने ऐसा क्या हुआ,दिन पर दिन बितते गए और देखते-देखते करीब १५ दिन हो गए और मैं कुछ भी लिख नहीं पाया। अगर मैं आपको वजह गिनाने लगूं तो बेमानी होगी। कायदे से मुझे जिन कारणों से रोज लिखना चाहिए था,मैं उसे ही वजह बताकर नहीं लिखा,ऐसा नहीं करना चाहता। कितने मुद्दे थे मेरे पास। तुरंत मिर्चपुर से खाप पंचायत और दलितों की जली बस्तियां देखकर लौटा था। उसके दो दिन बाद से ही दिल्ली में भरी दुपहरी में कमरा खोजने निकलना शुरु कर दिया था। चार दिनों तक प्रोपर्टी डीलर के पीछे चकरघिन्नी की तरह कैंस के इलाके मथ डाले थे। फिर हॉस्टल छोड़ दिया,नई जगह पर आ गया। तीन साल पहले चैनल की नौकरी के वक्त जो जिंदगी थी,खुद से खाना बनाना और टिफिन का इस्तेमाल करना,सब शुरु हो गया। १८ तारीख को मैंने एक जबरदस्त कार्यक्रम का संचालन किया। कितना कुछ था मेरे पास लिखने को। मैं एक-एक सामान जुटा रहा था। लेकिन नहीं,कुछ भी नहीं लिख पाया। पिछले तीन-चार दिनों से तो कीबोर्ड पर हाथ ही रुक से गए। मैं भीतर से हिल गया।..भीतर का अपाहिजपना तो नहीं,कोई दिमागी अटैक तो नहीं। मैं कोई कारणों की खोजबीन में उलझना नहीं चाहता। मैं बस रोज लिखना चाहता हूं,ये जानते हुए कि हिन्दी समाज में रोज औऱ बहुत पढ़ना तो अच्छी बात है लेकिन रोज लिखना अच्छा नहीं माना जाता।..
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खौफ के साये में है मिर्चपुर..

Posted On 5:54 pm by विनीत कुमार | 6 comments


हरियाणा में हिसार जिले के गांव मिरचपुर के दलितों को उनकी मांग के मुताबिक जल्द से जल्द हिसार शहर में जमीन देकर बसाया जाए। ये लोग गांव में खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर रहे हैं। उन्हें शक है कि आने वाले दिनों में उन पर फिर हमले हो सकते हैं। वे अपने परिवार की महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा को लेकर खास तौर पर चिंतित हैं। मिरचपुर दलित हत्याकांड और उसके बाद हरियाणा पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही है, इसलिए आवश्यक है कि जब तक इन दलित परिवारों को कहीं और न बसाया जाए, तब तक उनकी सुरक्षा के लिए गांव में केंद्रीय पुलिस बल को तैनात किया जाए।

बीते रविवार 9 मई 2010 को दिल्ली से मानवाधिकार समर्थकों की एक टीम ने रविवार को हिसार जिले के मिरचपुर गांव का दौरा किया। इस गांव में पिछले महीने की 21 तारीख (21 अप्रैल 2010) को दबंग जातियों के हमलावरों ने दलितों की बस्ती पर हमला किया था और 18 घरों को आग लगा दी थी। इस दौरान बारहवीं में पढ़ रही विकलांग दलित लड़की सुमन और उसके साठ वर्षीय पिता ताराचंद की जलाकर हत्या कर दी गई। दलितों की संपत्ति को काफी नुकसान पहुंचाया गया और कई लोगों को चोटें आईं।
मिरचपुर का दौरा करने और अलग अलग पक्षों से बात करने के बाद इस जांच टीम ने पाया कि :

1. दलितों पर हमले और आगजनी की घटना के लगभग तीन हफ्ते बाद भी मिरचपुर गांव में जबर्दस्त तनाव है। इस गांव के कुछ दलित परिवार प्रशानस के दबाव की वजह से लौट आए हैं, लेकिन उन्होंने अपने परिवार की युवतियों और लड़कियों को गांव से बाहर रिश्तेदारों के पास रखने का रास्ता चुना है। उन्हें नहीं लगता कि दलित युवतियां और बच्चियां गांव में सुरक्षित रह सकती हैं।

2. मिरचपुर में दलित उत्पीड़न का लंबा इतिहास रहा है। इससे पहले भी यहां दलितों के साथ मारपीट की घटनाएं होती रही हैं और खासकर दलित महिलाओं को यौन उत्पीड़न झेलना पड़ा है। महिलाओं के साथ बलात्कार और उन्हें नंगा करके घुमाने जैसी घटनाओं की पृष्ठभूमि और ऐसी तमाम घटनाओं में पुलिस और प्रशासन की भूमिका की वजह से मिरचपुर के दलित अब गांव छोड़ना चाहते हैं।

3. मिरचपुर में 21 अप्रैल को हुई आगजनी और हिंसा की घटनाओं के ज्यादातर आरोपी अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। दलितों का आरोप है कि इस घटना के मास्टरमाइंड अब भी खुलेआम घूम रहे हैं और लोगों को धमका रहे हैँ।

4. प्रशासन और पुलिस इस घटना को दबाने में जुटी है। इस घटना के बाद से ही हिसार के जिलाधिकारी कार्यालय में धरने पर बैठे दलितों को 20 अप्रैल को जबर्दस्ती वहां से हटा दिया गया और डरा-धमकाकर गांव लौटने को मजबूर किया गया, ताकि दुनिया को ये बताया जा सके कि मिरचपुर में सब कुछ सामान्य है। दलितों को बाध्य किया जा रहा है कि वे हमलावरों के साथ समझौता कर लें।

5. सर्व जाति सर्व खाप पंचायत की 9 मई को मिरचपुर में हुई सभा में ये कहा गया कि दलितों ने अब समझौता कर लिया है और वे “भाईचारे के साथ” गांव में रहने को तैयार हो गए हैं। मिरचपुर से दलितों ने जांच टीम को बताया कि पीड़ित परिवारों से कोई भी इस पंचायत में नहीं गया है और वे समझौते के लिए तैयार नहीं है। वाल्मीकियों के नेता सुरेश वाल्मीकि को उनलोगों ने अपने पक्ष में कर लिया और इसे वो पूरी वाल्मीकि समाज की सहमति करार दे रहे हैं। इस पंचायत को सर्वजाति पंचायत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें दलितों की हिस्सेदारी नहीं थी। मिरचपुर के दलितों का कहना है कि इस कांड के दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। इस बात पर किसी तरह का समझौता नहीं हो सकता।

6. राहत के नाम पर मिरचपुर के दलितों को प्रति परिवार दो बोरी गेहूं दिए गए हैं। राहत की बाकी घोषणाएं अब तक कागज पर ही हैं।

7. मिरचपुर के दलित इस घटना के सिलसिले में मौजूदा राजनीतिक दलों की भूमिका से नाराज हैं। उनका गुस्सा खास तौर पर सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के खिलाफ है। पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों की मौजूदगी में हुए इस हत्याकांड से उनका विश्वास हिल गया है।

8. कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने घटना के बाद मिरचपुर का दौरा किया था, लेकिन गांव के दलितों का कहना है कि राहुल गांधी के दौरे के बाद भी प्रशासन और पुलिस का रवैया पहले जैसा है और वे अब भी सहमे हुए हैं।

9. पूछने पर दलित बस्ती के लोगों ने बताया कि वे अपनी मर्जी से वोट भी नहीं डाल सकते हैं। अपनी मर्जी से वोट डालने की मांग करने पर उनके साथ मारपीट होती है और उनका वोट जबरन डाल दिया जाता है।

10. मिरचपुर के सार्वजनिक शिव मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित है। गांव के दलित अपना मंदिर बनाना चाहते हैं। लेकिन उन्हें अपना मंदिर नहीं बनाने दिया जा रहा है। इस वजह से गांव में दलितों का मंदिर अधूरा बना हुआ है। मिरचपुर गांव के स्कूल में एक भी दलित शिक्षक नहीं है। सरकारी नियुक्तियों में आरक्षण के बावजूद ऐसा होना राज्य में दलितों के साथ हो रहे भेदभाव का एक और प्रमाण है।

इस जांच टीम में नेशनल फेडरेडशन ऑफ़ दलित वुमेन (एनएफ़डीडब्लेयू) की उत्तर भारत संयोजिका एवं मानवाधिकार वकील सुश्री चंद्रा निगम,शोधकर्ता विनीत कुमार,सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह,पत्रकार अरविंद शेष तथा वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल शामिल थे। इस रिपोर्ट को अनुसूचित जाति आयोग और मानवाधिकार आयोग को भी भेज दिया गया है।

(प्रेस रिलीज: 9 मई को मिर्चपुर से लौटकर दिलीप मंडल,राकेश कुमार सिंह,विनीत कुमार,चंद्रा निगम और अरविंद शेष की ओर से जारी)
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यूपीएससी की परीक्षा में 9 वीं रैंक और हिन्दी माध्यम के लिहाज से प्रथम स्थान पानेवाले जयप्रकाश मौर्य का दर्द इस बात को लेकर है कि अभी तक उनसे किसी भी मीडिया ने सम्पर्क नहीं किया। ऐसे में संभव है कि आप जयप्रकाश मौर्य के भीतर खबर में आने की चाहत का अंदाजा लगाने लग जाएं। लेकिन गहराई से देखें तो ये साफ झलकता है कि खबरों को लेकर मीडिया के पास कोई होमवर्क नहीं है। फैजल के प्रथम स्थान पाने की खबर ही उसके लिए काफी है। वो टॉप करनेवाला पहला कश्मीरी है,उसके पिता आतंकवादी इन्काउंटर में मारे गए। कल कसाब के लिए फांसी की सजा सुनाने का दिन था। इसलिए ये सब कुछ मिलाकर जिसमें कि खबरों को लेकर कई एंगिल बनते थे,मीडिया के लिए एक बिकाउ पैकेज बन गया। लेकिन ऐसे में कोई ये दावा करे कि मीडिया ने यूपीएससी के रिजल्ट की पूरी लिस्ट नहीं देखी तो ताज्जुब करने के लिए कोई बड़ी बात नहीं होगी।

खबरों को फ्रैक्चरड करने की मीडिया को आदत सी लग गयी है। खबरों के बीच से अपने मतलब का पोर्शन उठाकर उसे एक चमचमाती पैकेज की शक्ल में तब्दील कर देना एक शगल है। संभवतः इसलिए फैजल ने मीडिया को जो बाईट दिए औऱ मीडिया ने जो उसका विश्लेषण किया उसमें जमीन-आसमान का फर्क नजर आया। फैजल का सिर्फ इतना कहना था कि जब उसके पिता की मौत हुई तो उसके सामने अपनी जिंदगी को देखने के दो ही तरीके मौजूद थे। एक तो यह कि वो इस पूरी घटना को एक डिप्रेशन की तरह देखे और उसी में डूबता चला जाए और दूसरा कि वो ये सब समझते हुए भी नयी जिंदगी की शुरुआत करे,कुछ बेहतर करे। शाह फैजल ने दूसरे नजरिए को तब्बजो दिया और आज वो सफल है। एक इंसान के भीतर की सच्चाई को मीडिया ने आतंकवाद के विरुद्ध जीत,आतंकवाद को दी शिकस्त जैसे शब्दों से लाद-लादकर उसे इतना भारी बना दिया कि कई सारी स्वाभाविक चीजें दबकर रह गयी। उसमें खुद फैजल का संघर्ष और वो मनःस्थिति सामने नहीं आने पायी और उसी चपेट में हिन्दी माध्यम में प्रथम स्थान आनेवाले जयप्रकाश मौर्य की भी कहानी मीडिया मंचों पर सामने नहीं आने पायी। इसे आप खबरों को फ्रैक्चरड करके पेश करने के साथ-साथ भाषायी स्तर पर दुर्व्यवहार करने का भी मामला मान सकते हैं। यूपीएससी ने तो फिर भी जयप्रकाश मौर्य को अपना लिया लेकिन मीडिया...?

जयप्रकाश मौर्य ने पिछली बार भी यूपीएसी की परीक्षा दी थी लेकिन अंग्रेजी उन्हें गच्चा दे गयी। अब एक साल तक उन्होंने किस स्तर की तैयारी की और इस बीच उनके भीतर किस तरह के विचार बनते-बदलते रहे,ये सब एक हिन्दी पट्टी से आनेवाले शख्स के लिए कम दिलचस्प नहीं है। खासकर ऐसे लोगों के लिए जो अपनी असफलता का ठिकरा पूरी तरह अंग्रेजी न जानने के उपर थोप देते हैं। जयप्रकाश मौर्य भी चाहते तो ऐसा कर सकते थे और चुप मारकर बैठ जाते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसे चुनौती के तौर पर लिया और नतीजा आपके सामने है। ये घटना अगर मीडिया में आती तो देश के करोड़ों हिन्दी पाठकों और दर्शकों के बीच एक रोमांचकारी घटना के तौर पर असर करती लेकिन मीडिया में रोमांच तो सिर्फ क्रिकेट,ग्लैमर और देश की समस्याओं को सीरियल औऱ रियलिटी शो की शक्ल में बदलने से ही आते हैं।
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