शाम के करीब चार बजे मेरे बिस्तर पर पड़े अखबारों को पलटते हुए वो एकदम से चौंक गया। इतना कुछ हो गया और मुझे पता ही नहीं चला। आपने देखी थी खबर। कब हुआ येसब. फिर जानने के लिए बेचैन हो उठा कि अभी वहां का क्या हाल है। मैंने पूछा-तुम्हें सचमुच पता नहीं है कि कल रात क्या हुआ मुंबई में। उसने फिर दोहराया- नहीं बिल्कुल भी नहीं। मैंने बस इतना कहा- आश्चर्य है।
वो भीतर से बहुत ही परेशान महसूस कर रहा था और इस बात पर बार-बार अपसोस जता रहा था कि उसे येसब कैसे कुछ पता नहीं है। तुरंत उसने मुंबई में न्यूज चैनलों में काम कर रहे अपने दोस्तों को फोन किया- सब ठीक तो है न, सेफ हो न,लगे होगे रातभर से न्यूजरुम में। उधर से जबरदस्ती उत्साहित होते हुए आवाज आयी- हां यार,सब मस्त है, अपनी बता, दिल्ली में दिल्लगी हो रही है न, कब खुशखबरी सुना रहा है. अंत में भाभीजी का हाल पूछते हुए उसने कहा-चलो फिर बात करते हैं,. वो जल्दी से जल्दी टीवी देखना चाह रहा था। मेरे पास बहुत ही जल्दीबाजी में आया था. एत किताब लेनी थी बस। मैं उसे इस बात का लोभ देकर कमरे तक ले आया कि कपड़े बदलकर आज रात तुम्हारे पास चलूंगा और खाना बनाउंगा।
लेकिन इस जल्दबाजी में भी वो करीब पन्द्रह मिनट तक न्यूज चैनलों से चिपका रहा। फिर बताना शुरु किया- दरअसल हुआ ये कि आज अखबारवाले ने पेपर दिया ही नहीं। रात को नौ बजे जब एफएम रैनवो समाचार सुना तब ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। बाद में भी रेडियो सुनता रहा लेकिन कहीं से किसी भी चीज का आभास नहीं हुआ. मैंने फिर कहा-लेकिन यार, शाम के चार बज रहे हैं, घटना के हुए करीब 18 घंटे। इस बीच तुम यूनिवर्सिटी घूम आए। इसके पहले ऑटो में बैठकर आए। कहीं किसी ने कोई बात नहीं की. उसने कहा नहीं.
फोन की बात मैं नहीं कर सकता था क्योंकि अगर यही आतंकवादी हमले दिल्ली में होते तो लोग फोनकर पूछते- सेफ हो न तुम। लेकिन मुंबई में होने के कारण किसी ने इस संबंध में कोई बात नहीं की। यही कहानी शायद मेरे इस दोस्त के साथ भी हुआ होगा। ऐसे फोन करनेवालों की संख्या बहुत कम गयी है जो सीधे-सीधे सरोकार न होने पर भी बातचीत के लिहाज से फोन करते हैं। इसलिए घटना के करीब दिनभर बीत जाने पर भी अगर मेरे इस दोस्त को कोई जानकारी नहीं तो ये आश्चर्य की बात तो जरुर है लेकिन विश्वास करनेवाली बात है कि आज अगर आप किसी न किसी मीडिया से नहीं जुड़े हैं तो बहुत ही मुश्किल और लगभग असंभव है कि आपको किसी व्यक्ति के माध्यम से किसी घटना की जानकारी मिले। ग्लोबलाइजेशन के विरोध और समर्थन में खड़े लोगों ने लोकल, ग्लोबल से जुड़े कई मुहावरे तो जुटा लिए हैं लेकिन समाज के इस ढ़ांचे पर बिल्कुल चुप हैं। मीडिया में भारी पूंजी के निवेश औऱ इसके मुनाफे का रोजगार साबित करनेवाले मीडिया आलोचकों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है लेकिन वो भी इस बात पर चुप हैं कि व्यक्ति खुद भी एक माध्यम है। इसे किस रुप में संचार के प्रति सक्रिय बनाया जा सकता है. अब व्यक्ति ने आपस में डिस्कशन , बहस और शेयर करने कम कर दिए हैं। संभव है कि कुछ लोग इस बात के लिए भी मीडिया के बढ़ते प्रभाव और उसके नए रुपों को ही इसके लिए जिम्मेवार ठहराएं। मीडिया ने ही लोगों को अपने उपर इतना अधिक निर्भर होने की आदत डाल दी है कि व्यक्ति के भीतर अपने स्तर पर संचार करने की इच्छा मरने लगी है। चौक-चौराहे पर खड़े होकर किसी बात को जानने से बेहतर वो कमरे में इंटरनेट, टीवी फिर अखबारों के जरिए सूचनाओं में विश्वास करने लगा है।
लेकिन यकीन मानिए दिन-रात मीडिया को पानी पी-पीकर कोसनेवाले आलोचकों ने मैनुअली संचार की सक्रियता बढ़ाने के क्रम में कोई काम नहीं किया। छोटे स्तर पर सूचना तंत्र कैसे विकसित की जाए, इस संबंध में कोई मॉडल पेश नहीं कर पाए। सारा काम स्वयंसेवी संस्थाओं के भरोसे छोड़कर छुट्टी कर लिए. यही कारण है कि हम जब भी वैकल्पिक मीडिया की बात करते हैं तो हमें सिर्फ गांव के अनपढ़ लोग ही ध्यान में आते हैं, देश का वही कोना याद आता है जहां मीडिया की पहुंच नहीं है। हम शहर के स्तर पर भी वैकल्पक मीडिया या फिर व्यक्ति के स्तर पर संचार की जरुरत है, इसपर कभी बात ही नहीं करते। मीडिया कहने-पढ़ने और इसके बारे में बात करने का मतलब सिर्फ अखबार, चैनल और इंटरनेट के बारे में ही बात करना है। यहां तक आकर हमारी जरुरतें खत्म हो जाती है और जहां तक मामला मेरे दोस्त के कुछ भी न जान पानेका है तो इसे शहर का स्वभाव बोलकर छुट्टी पा लिया जा सकता है। कमलेश्वर की कहानी- दिल्ली में एक मौत से कितना आगे पीछे हो पाएं हैं हम और मीडिया को कोसते हुए सूचना का वैकल्पिक रुप कितना विकसित कर पाए हैं हम। सवाल एक नहीं कई हैं, सवाल ही सवाल है।

अंग्रेजी सहित देश के किसी भी न्यूज चैनलों के पास सुबह के सवा नौ बजे तक होटल ओबराय, होटल ताज और नारीमन हाउस के भीतर क्या हो रहा है, इसकी न तो खबर थी औ न ही कोई फुटेज। ले देकर सभी चैनलों के पास ताज होटल के उपर से उड़ते धुएं की फुटेज और दि टाइम्स ऑफ इंडिया के ऑफिस की खिड़की से ली गई एक हमलावर की तस्वीर थी। सारे चैनल इसी को लाल गोला बना-बनाकर चला रहे थे. सबों के पास लगभग एक से फुटेज थे। बहुत कोशिश करने पर इक्का-दुक्का चैनल उन खिड़कियों को जूम इन करके दिखाता जहां सुरक्षाकर्मी तैनात थे। बाकी वही सुनसान सड़के, पुलिस की गाडियां बेस्ट बसें और चैनल की गाडियां. इस आतंकवादी हमले में इस बार किसी भी चैनल ने खून से लथपथ तस्वीरें नहीं दिखायी।...
तभी इंडिया टीवी के फोन की घंटी बजती है। मुंबई से उस आतंकवादी का फोन था जिसने कि इस घटना का अंजाम दिया था। वो और उसके साथी ताज या ओबरॉय होटल के भीतर ही थे. वो इंडिया टीवी से बात करना चाह रहे थे। जबकि बाकी चैनलों ने बताया कि इन आतंवादियों ने अपनी तरफ से कोई अभी तक मांग नहीं रखी है। एक चैनल के एंकर ने अपने रिपोर्टर से सवाल भी किया कि ये तो और भी खतरनाक स्थिति है जबकि आतंकवादी कोई मांग न रखे. रिपोर्टर ने कहा- बिल्कुल सही कह रहे हैं आप. चैनल उस सरकार की अपील को दोहरा रहे थे जिसें ऐसा कहा गया था कि- मीडिया ऐसा कुछ भी न दिखाए जिससे कि आतंवादियों को ऑपरेशन के बारे में जानकारी मिल जाए.
लेकिन इंडिया टीवी का अवतारी चरित्र सामने आया। यहां आतंकवादी ने साफ कहा कि उनकी मांग है कि देश में जितने भी मुजाहिउद्दीन से जुड़े लोगों को पकड़ा गया है सरकार उन्हें तुरंत छोड़ दे, मुसलमानों को परेशान करना बंद कर दे। इंडिया टीवी के एंकर ने सवाल किया कि- आप भी इसी देश के हैं, आप बेकसूर लोगों को क्यों मार रहे हैं, इसमें आप के भी भाई हो सकते हैं. आतंकवादी ने जबाब दिया। मुझे इस देश से प्यार है. लेकिन जब लोग मेरी ही भाइयों को, मेरी ही बहू-बेटियों पर अत्याचार कर रहे थे तब क्यों नहीं सोचा कि ये सब गलत है। बाबरी मस्जिद गिराते समय क्यों नहीं सोचा कि वो गलत कर रहे हैं। ये बात उन्हें अभी ही क्यों याद आयी।
ये सब बातें हो ही रही थी कि इसी बीच इंडिया टीवी ने एक्सपर्ट जुटा लिए। बाबा रामदेव से लेकर फतेहपुर मस्जिद के इमाम और इस्लाम के दूसरे भी विद्वान इंडिया टीवी पर अपनी बात करने लगे। इनमें से एक ने कहा कि- ऐसा करके वो सिर्फ बेकसूरों को नहीं मार रहे बल्कि इस्लाम को मार रहे हैं। दूसरे ने साफ कर दिया कि- मैं भी देश में घूमता रहता हूं, मुझे भी पता है कि कहां के लोग किस तरह से, किस भाषा में बात करते हैं। ये आतंकवादी जो कुछ भी बोल रहे हैं, दरअसल वो हैदराबाद के है ही नहीं। ये सारी बातें बना कर बोल रहे हैं। दस-बारह जुमले सीख लिए हैं उन्हें बोल दे रहे हैं, बाकी चीजें बोल नहीं पा रहे। उनके हिसाब से या तो ये हैदराबाद के नहीं हैं या फिर....हम सोचें तो इंडिया टीवी पर फ्लैश आने शुरु हो गए- अपील का असर
आतंकवादियों ने की इंडिया टीवी से बातचीत
इंडिया टीवी के पास आतंवादियों के हैं मो। नंबर
आतंवादी देख रहे हैं इंडिया टीवी।
जितने एक्सपर्ट से इस मामले में राय ली जाती उतनी बार आतंकवादी और इंडिया टीवी के बीच हुई बातचीत को दोहराया जाता. डेढ़-घंटे पहले हुई बातचीत को भी लाइव बोलकर चलाया जाता रहा। बाद में इसकी एडिटिंग कुछ इस तरह से हुई कि सवाल-जबाब का क्रम भी चैनल के हिसाब से बदल गया। इन सबके बीच सीएनएन, टाइम्स नाउ और कुछ दूसरे हिन्दी चैनल घायल लोगों की बात कर रहे थे. एक हिन्दी चैनल ये भी बता रहा था कि बेस्ट बसों का इस्तेमाल भी जरुरत पड़ने पर एम्बुलेंस के रुप में किया जा सकता है। कुछ चैनल आतंकवाद के इतिहास से ९ बटा ११ जैसे मुहावरे खोजने में लगे थे।

करीब चार साल की एक बच्ची है इच्छा। उस बच्ची का समाज से सीधा सवाल है कि लोग उसे क्यों कहते हैं कि तुम्हारे सपने उससे बनते हैं जिसे लोग छोड़ देते हैं। यह वही बच्ची है जिसने कभी तीन वक्त का खाना नहीं खाया, जिसके जीवन में झक-झक सफेद रंग कभी नहीं आया, कभी बाल वाली गुडिया नहीं मिली और न ही कभी उसने रंग-बिरंगे फ्रांक पहने। उसके जिवन में बस एक ही रंग है मटमैला। दुनिया में होते होंगे दुनियाभर के रंग और सॉफ्टवेयर से जुड़े लोग आए दिन कम्प्यूटर की मदद से बना रहे होंगे कई नए रंग लेकिन इच्छा के पास सभी चीजें आकर एक ही रंग का हो जाता है मटमैला। एक ऐसा रंग जिसे मेरी मां मैलपच्चू रंग कहती है। वो रंग जिसमें दुनियाभर की गंदगी को पचा लेने की ताकत होती है। आप उस रंग के कपड़े को चाहे कितना भी गंदा क्यों न करो उसके रंग में कोई फर्क नहीं आता। कुछ ऐसे ही रंग हैं जो कि इच्छा की जिंदगी के चारो ओर फैले हैं।
इच्छा की जिंदगी की जिंदगी बदलती है। उसे अब बालवाली गुड़िया मिलती है। वो भी बहुत बड़ी। इतनी बड़ी कि एक बार में उसे संभाल नहीं पाती और एक नहीं दो-दो। एक फ्राक भी बिल्कुल हरा। मां के शब्दों में एकदम से कचूर हरा। अगर आप ताजे पत्ते को मसल दें तो वैसा ही रंग होगा. एक जोड़ी सफेद जोड़ी जूते भी। इच्छा के वो सारे सपने पूरे होते हैं जिसे देखने में उसने अपनी उम्र का अच्छा-खासा समय लगा दिया। अब वो खुश है।
लेकिन इससे पहले कि इन सारी चीजों को लेकर वो अपने दोस्तों के बीच धौस जमाती कि उसके पूरे हुए सपने पर बस्ती के बच्चे सेंध लगा जाते हैं। जूते दिखाती कि आगे से उन जूतों के बीच से उंगली निकाल देता है। हरे फ्रांक का पिछला हिस्सा, फैशन है या फिर रिजेक्टेड और दोनों बालवाली गुड़िया। ये वो गुड़िया है जो इच्छा के सपने में अक्सर आया करती रही या फिर किसी मनचले बच्चे की हिकारत की शिकार गुडिया जिसके बाल के साथ तो कोई छेड़छाड़ नहीं की लेकिन पता नहीं पेट ही फाड़ डाले या फिर उसे अंदरुनी चोट पहुंचाने की कोशिशक की है। इच्छा के पूरे होते सपने दोस्तों के बीच तहस-नहस हो जाते हैं। इच्छा फिर सवाल दोहराती है, लोग क्यों कहते हैं कि तुम्हारे सपने लोगों के छोड़ दी गयी चीजों से पूरे होते हैं।
यह कलर्स चैनल पर जल्द ही शुरु होनेवाले सीरियल उतरन का प्रोमो है। सीरियल ने समाज की जूठन समझी जानेवाली जमात में इच्छा जैसे चरित्र को गढ़ा है, बचपन, अभाव, सपने, समझदारी और जीवन सच्चाई को एक-दूसरे से नत्थी करके दिखाने की कोशिश में है।
इस समझदारी के साथ कि आनेवाले समय में टेलीविजन कोई भी क्रांति करने नहीं जा रहा या फिर करोड़ो रुपये लगाकर समाज के हाशिए पर के लोगों को नायक बनाने नहीं जा रहा, इतनाभर मानने में कोई परेशानी नहीं है कि टेलीविजन सीरियलों का चरित्र इधर एक साल में तेजी से बदल रहा है। अब तक हाइप्रोफाइल के लोगों को आधार बनाकर सीरियल प्रोड्यूस करने की बाढ़ सी रही। अगर कोई इन सीरियलों को लेकर कोई मजाक करना चाहे तो कह सकता है कि एक सीरियल को बनाने के लिए क्या-क्या चाहिए, दो तीन बड़े फार्म हाउस, दो-तीन फैशन डिजाइनर और गहनों-कपड़ों में लदी-फदी डेढ़ से दो दर्जन बिसूरनेवाली महिलाएं। अब जबकि सीरियल का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है। इस मामले में मैलोड्रामा ही सही, टेलीविजन ने फिर से आम आदमी के लिहाज से पटकथा का दामन पकड़ा है. उतरन उसी की एक कड़ी है.आगे भी जारी ........

ओह माइ गॉड, दो लड़कों के बीच के प्रेम को देखने के लिए इतनी मारामारी, एक मिनट भी बर्दाश्त नहीं कर सकते लोग। बत्रा सिनेमा में घुसने के क्रम में जब मैंने ये लाइन कही तो मेरे आगे की तीन लड़कियां ठहाके मारकर हंसने लग गयी। वो पीछे मुड़कर देखना चाहती थी कि कौन बंदा है जो इतनी बेबाकी से अपनी बात कह रहा है। लेकिन जब तक वो मुड़ती, मेरी जगह प्रबुद्ध आ गया था और सारी क्रेडिट उसी के खाते चली गयी। मेले-ठेले, भीड़भाड़ इलाके में और खासकर जहां मामला इंटरटेन्मेंट का हो, मेरी तरह हजारों लोग हैं जो कुछ न कुछ कमेंट किया करते हैं। मां कहा करती है कि लड़कियों को देखते ही लड़के बौडा यानि बौरा जाते हैं. लेकिन यहां मैं येसब इसलिए कर रहा था कि कहीं मेरी नाजुक चप्पल इसे रेलम-पेल में शहीद न हो जाए।
बत्रा में नंबर के हिसाब से सीटिंग अरेंजमेंट नहीं है, जिसको जहां सीट मिले, लपक लो। अब संयोग देखिए कि वो तीनों लड़कियां मेरी ही लाइन में बैठी। उनलोगों को इस बात का एहसास हो कि उनके बगल में जो लोग बैठे हैं, क्रिएटिव किस्म के लोग हैं, सिर्फ सिनेमा देखने की नीयत से नहीं आए हैं, यहां से जाकर ब्लॉग लिखेंगे, दूसरा अखबार में लिख मारेगा और तीसरा तो यूथ और सिनेमा पर रिसर्च आर्टिकल की तैयारी में जुटा है, प्रबुद्ध ने कहा- जानते हैं विनीतजी, कुछ लोग इसलिए आपाधापी मचा रहे थे कि कहीं पोलियोवाला विज्ञापन छूट न जाए। पोल्टू दा ने कहा और औरतें तो इसलिए मारामारी कर रही थी कि वो अंदर जाकर जल्दी से अपने पति को नागिनवाला विज्ञापन दिखा सके और कहे कि- चुनो किसको चुनना है, हमें या फिर शराब को। वो लोग पति का आंख खोलने के लिए मारामारी कर रही थी। इन सबके बीच मैं अपने को थोड़ा कॉन्शनट्रेट करने में लगा था। इन तीनों लड़कियों सहित आजू-बाजू के लोगों की प्रतिक्रिया सुनना चाहता था।
फिल्म में जैसे ही नेहा यानि प्रियंका चोपड़ा ने अभिषेक और जॉन इब्राहिम से पूछा कि- इतने दिनों तक तुमलोग एक ही कमरे में रहे, तुमलोगों के बीच...मेरा मतलब है कि कभी...। तभी तीनों में से एक लड़की ने कहा- हाउ चीप। कोई लड़की कैसे किसी लड़के से ऐसा पूछ सकती है। कोहनी मारते हुए दूसरे से पूछा-बता न, तू पूछ लेगी। उनलोगों को जब लगा कि हम उनकी बातों को गौर से सुन रहे हैं तो कुछ ज्यादा जोर से ही बाते करने लगी। अब वो बातें कम और हमारे सामने क्योशचनआयर ज्यादा फेंक रही थी। प्रबुद्ध ने जबाब दागा- इसमें नया क्या है, हमारे हॉस्टल में तो कईयों की गर्लफ्रैंड कहती है और ठहाके लगाती है- पहले ही बता दो, पार्टनर के साथ कुछ चक्कर-वक्कर तो नहीं है। पता चला, एक सेमेस्टर बर्बाद भी किए और फिर तुम मासूम साबित हो जाओ.
दोनों के किस लेने और पासपोर्ट के लिए ऐज ए कपल अप्लाय करने पर पीछे से एक लड़के ने कहा- अब लड़कियों को आएगा मजा। बहुत भाव खाती रही है अब तक। देखिएगा, बहुत जल्द ही सब लड़कियों का नेहवा वाला हाल होगा। हठ्ठा-कठ्ठा लड़का दोस्त तो बन जाएगा लेकिन बस देखने भर का, उसके लेके कोई सपना नहीं देख सकती है। हम पहले ही कहे थे आपको मर्द,मर्द होता है, बैठा नहीं रहेगा लड़कियों के भरोसे। देख नहीं रहे हैं, कैसे दोनों फ्री माइंड से अपना काम कर रहे हैं और नेहवा है कि लसफसा रही है। एक ने समर्थन किया- बाबा, आप तो बेकार में यूपीएसी के पीछ पड़े हैं, गांव का खेत बेचिए और दोस्ताना एक्स बोलके फिल्म बनाइए।
पब्लिक कमेंट्स की वजह से फिल्म की लाइन साफ-साफ सुनना मुश्किल होने लग गया था। फिल्म को समझने के लिए एकबार और देखने की जरुरत थी। पोल्टू दा लगातार कह रहे थे, तुमलोगों को पहले ही कहा- उपर देखते हैं लेकिन विनीतजी कहते है- अरे वहां कुछ नहीं मिलेगा। मसाला खोजने के चक्कर में इनको डीक्लास में घुसते एक मिनट भी नहीं लगता। तभी पीछे से फिर आवाज आयी-
गूगल बाबा, इ दोनों हीरो जो कर रहा है न किराया पर घर लेने के लिए, वो हमारे गांव में भी खूब होता है। इसको हमलोग मरउअल-मरअउल खेलना कहते हैं। बाकी गांव में कोई स्वीकार नहीं करता कि ऐसा हमलोग करते हैं। इ दोनों सही में असली मर्द है, करेजा ठोककर कह रहा है कि हां- हम गे हैं। अब करे जिसको जो करना है.
धीरे से एक ने कहा- आपको ये सब बात यहां नहीं करनी चाहिए, सामने आपकी भौजी लोग बैठी है, सुनेगी तो क्या सोचेगी। बन्दे ने तपाक से कहा- क्या सोचेगी, जब एतना ही आंख के कोर में पानी रहा तो घर में रहती, सीडी मंगाके देखती। सोचेगी कि लड़को से बराबरी भी करें और कुछ सुनना भी न पड़े तो ऐसे कैसे होगा। बाकी देखिएगा- धीरे-धीरे जो लोग हैं ,स्वीकार करने लगेंगे कि वो गे हैं. फिलिम का समाज पर असर तो होता ही है।
सुबह एनडीटीवी इंडिया की रिपोर्ट है कि मुंबई में दोस्ताना फिल्म की एक स्पेशल शो आयोजित की गयी और फिल्म की वजह से लोगों में हौसला बढ़ा है। हरीश अय्यर इसके पहले अपनी बहन को कभी नहीं बताया कि वो गे हैं। लेकिन फिल्म आने के बाद जैसे ही बताया तो उसकी बहन ने पूछा कि- आप कौन से गे हो अभिषेक की तरह या फिर जॉन की तरह। एक महिला की बाइट थी कि- मेरा बेटा अमेरिका मे रहता है और वो गे है. स्क्रीन पर सबके सामने एक्सेप्ट करती है। निर्माता तरुण मनसुखानी का मानना है कि फिल्म के कारण लोगों का नजरिया बदला है। उम्मीद कीजिए कि अगर कोई ओसामा पर फिल्म बनाये तो उसका हृदय परिवर्तन हो और वो किसी चैनल पर आत्मसमर्पण करता दिख जाए।
आनंदी, जगदीसिया सहित दर्जनों टीवी के बाल कलाकार पिछले चार-पांच दिनों से हमसे हाथ जोड़कर माफी मांग रहे हैं। वो बार-बार कह रहे हैं कि बहुत जल्द ही हम आपको नए एपीसोड दिखाएंगे। नीचे स्क्रीन पर कैप्शन आ रहा होता है कि- क्यों आपके मनपसंदीदा कार्यक्रमों के नए एपिसोड नहीं दिखाए जा रहे हैं। दोनों चीजों को एक-दूसरे से जोड़कर देखें तो लगेगा कि इसके लिए जूनियर आर्टिस्ट ही पूरी तरह जिम्मेवार हैं जो कि अपनी मांगों को लेकर अडे हुए हैं। ये बाल कलाकार चैनल द्वारा लिखकर दी गयी स्क्रिप्ट का मतलब भी समझते होंगे। और अगर समझते भी हैं तो उनके पास इतनी समझ नहीं बन पायी है कि वो सही और गलत को अलगा सकें। रियलिटी शो, सोप ओपेरा सहित विज्ञापनों में आपको ऐसी कई बातें बच्चों के जुबान से सुनने को मिल जाएगी जिसे सुनकर आप एकदम से कहेंगे- जानते-समझते कुछ नहीं जो चैनलवालों ने बोलने के लिए कहा-बस बक दिया। ये बच्चे तो शुरु से ही एक बर्फ के गोले में ही बहक जाते हैं और अब जब उन्हें लाखों में रकम मिलने लगे हैं तो क्यों न बोले। पांच से छः साल का बच्चा हमारे आपके जैसे नौजवान लड़के-लड़कियों को अफेयर के टिप्स देते नजर आ जाएंगे। ये सिलेब्रेटी बच्चे हैं। ये पेज थ्री के बच्चे हैं। आज ही दि टाइम्स ऑफ इंडिया ने ऐसे बच्चों की आमदनी का ठीक-ठाक अनुमान लगाया है। हम उसके पर्सनल लाइफ के बारे में जानना चाहते हैं। सात साल की आयु में भी स्ट्रगल के किस्से सुनना चाहते है। ये बच्चे अभी से ही बाइट देने में सिद्धस्थ हो गए हैं, अभी से ही इनकी विपरीत लिंगों के प्रति कमेस्ट्री बनने लगी है।ये मीडिया के बच्चे हैं.
धूल में लोटते हुए, रुपये-दो रुपये का फोकना( बलून) के लिए तीन-चार थप्पड़ खाने के बाद देश में लाखों बच्चे चीखते हैं, चिल्लाते हैं और अपनी मां को धमकी देते हैं कि- और मारोगी तो घर छोड़कर भाग जाएंगे। संभव है ये बच्चे नहीं जानते कि घर छोड़कर भागना क्या होता है। हजारों लड़के बच्चे सम्पन्न और रईसजादों के बच्चों को चॉकोबार खाते हुए देखकर अपने फुन्नू( लिंग) को मरोड़ते हुए चुपचाप खड़े रहते हैं। लड़कियां दिऔटे पर से दो रुपये चुराती है और बैनाथ साहू के यहां से लाल रीबन लेकर आती है। अभी वो मनमुताबिक फूल बना ही रही होता है कि पीछे से धांय-धांय उसकी मां धौल जमाती है। लगातार चिल्लाती है कि-कलमुंही रक्ख कर गए थे कि बिरजूआ के लिए संकटमोचन लाएंगे, दो दिन से पेट धोइना हो गया है और इसको सिंगार-पटार सूझा है। हजारों लड़कियां मार खाकर बिना बाल बांधे जिसे की हम मधुमक्खी का छत्ता कहते हैं, लिए देश में घूम रही है। ये नेहरु के बच्चे हैं।जी हां, चाचा नेहरु के बच्चे।
बाल दिवस के मौके पर हम अपनी इसी मोटी समझ को लेकर स्टोरी बनाने में भिड़ जाते। मीडिया के भीतर जो हम जैसे लोग हैं, जो बात-बात में आम आदमी पर उतर आते हैं, जो समझते हैं कि घठ्ठे पड़े लोगों को स्क्रीन पर लाने से उनके दुख दूर हो जाएंगे, उन्हें ऐसे मौकों पर भजनपुरा, पुरानी दिल्ली, मुनिरका के पीछे की जुग्गी जैसे इलाकों में भेजा जाता। हमें वहां के बच्चों के बाल-दिवस को खोजना होता। हम उनके बीच ज्यादा से ज्यादा बदहाली देखने की कोशिश करते, उन्हें ज्यादा से ज्यादा विद्रुप दिखाने की कोशिश करते। इतना विद्रुप कि जिसे देखकर आज के समाज को संवेदना से ज्यादा घृणा का भाव पैदा हो। औऱ फिर सोफे पर बैठे अपने बच्चे को पुचकारने लग जाएं- उसके मुलायम गालों में खो जाएं। बदहाल बच्चे को खोजने की तिकड़म हम ऑफिस से निकलने के साथ ही शुरु कर देते। और इंडिया गेट के पास कोई न कोई बच्चा कुछ बेचते हुए, रिरियाते हुए मिल ही जाता। हम वहीं से शुरु हो जाते। इनकी बदहाली को दूर करने में दुनियाभर के एनजीओ लगे हैं। इस दिन हमें उनकी भी पीठ ठोकनी होती। हम वहां भी जाते और बॉस के बताए एनजीओ और उनके लोगों को स्टोरी में शामिल कर लेते। हम बच्चों के कपड़े का एक ही रंग दिखाते-मटमैला और अगर लाल-पीले रंग दिखाने होते तो उसके पहले एनजीओ के बैनर जरुर दिखाते जो कि इनके जीवन में रंग भरने का काम करते. हमारी स्टोरी बनती, कभी चलती और कभी नहीं भी चलती। लेकिन हम नेहरु के बच्चों पर जरुर स्टोरी बनाते।
दूसरी तरफ आइ मीन यू नो कल्चर की लड़कियां और कुछ लड़के भी होते। जो टीवी और सिनेमा में काम कर रहे बच्चों पर स्टोरी बनाते। उन्हें अक्सर फील्ड में जाने की जरुरत नहीं पड़ती। नेट पर से दुनियाभर की चीजें खोज लेते। रियलिटी शो और फिल्मों के फुटेज लाइब्रेरी से मिल जाते। तारे जमीं पर और लिटिल चैम्पस इनमें खूब मददगार साबित होते। फिर देशभर के लिटिल चैम्पस( सारेगम के अलावे) को लाइन अप करने की कोशिश की जाती। अगर तीन-चार भी मिल गए तो इनका काम हो गया. पहले तो लाइनअप करने की बड़ी हाय-तौबा मचती थी, सारे चैनल लाइव ही लेना चाहते। लेकिन अब तो चैम्पस की संख्या इतनी अधिक हो गयी है कि सबको कोई न कोई हाथ लग ही जाता है. इसके साथ ही चैनलों की म्यूचुअल अंडर्स्टैंडिंग भी पहले से बढ़ी है. काम बन जाता औऱ शाम होते-होते चैनल के स्क्रीन चमचमा उठते।उन चैम्पस से उनके टीवी सफर के बारे में पूछा जाता। अलग-अलग ब्यूरो में बैठे चैम्पस से एक-दूसरे के अफेयर के बारे में पूछा जाता। कोई चैम्पस ओवर स्मार्ट होता, दिनरात गाने में लगा रहता और बताता कि मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनना चाहता हूं. किसी भी एंकर को इतनी हिम्मत या समझ नहीं होती कि वो उससे पूछे कि वो दिनभर में कितने घंटे की पढ़ाई करते हैं। उल्टे ऐसा कहने से उनकी तारीफों के पुल बांधने लग जाते। तब हमें नेहरु के बच्चों पर की गयी स्टोरी बहुत ही फीकी लगने लग जाती। ऑफिस के भीतर ऐसा महौल बनता कि उन बदरंग बच्चों की तरह हम और हमारी स्टोरी भी बदरंग हो जाती। हम आइएमसीसी से आए लोगों के साथ अफसोस जताते- इन बच्चों का कुछ नहीं सकता, ये बदरंग ही रहेंगे। पीछे से एक-दो लड़कियां चिल्लाती- अबे अपनी सोच, ऐसा ही स्टोरी करेगा तो तेरा भी कुछ नहीं होगा।..एक काम कर तू ऐसे चैनल खोज जहां नेहरु के बच्चों की सुध ली जाती है।

