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मुंबई के थाने और कल्याण के केबल ऑपरेटरों ने शिवसेना जैसे कट्टर हिन्दूपंथी संगठन से डरकर,दबाव में आकर कलर्स चैनल दिखाना बंद कर दिया है। अब इन इलाकों की ऑडिएंस कलर्स चैनल को नहीं देख सकेंगे। चैनल बंद किए जाने की वजह है बिग बॉस। बिग बॉस ने जैसे ही सीजन-4 में पाकिस्तान की वीणा मल्लिक और बेगम नवाजिश अली के आने की बात कही,उसी समय से कट्टर हिन्दूवादी संगठन इसके विरोध में सक्रिय हो उठे। शिव सेना,एमएनएस सहित महाराष्ट्र के दूसरे हिन्दूवादी संगठन और उनके गुर्गे इसके विरोध में सड़कों पर उतरे। शिव सेना के दर्जनों सैनिकों ने लोनावना में बने बिग बॉस के घर को घेर लिया और हंगामा मचाने की कोशिश की। स्टूडियों के काम को रोकने की कोशिश की। उसके बाद बिग बॉस के घर का बाहरी इलाका मुंबई पुलिस की छावनी में तब्दील हो गयी। 24 सैनिकों पर बॉम्बे पुलिस एक्ट की धारा 68 के तहत मामला दर्ज किया गया और क्रिमिनल प्रोसिज्योर कोर्ट की सेक्शन 149 के तहत नोटिस भी भेजी गयी है। अब देखना होगा कि इस मामले में आगे उन पर किस तरह की कारवायी होती है। इंडियन टेलीविजन डॉट कॉम ने जहां-जहां हमने दबाव में आकर लिखा है,वहां रिक्वेस्ट शब्द का इस्तेमाल किया है। ये इस साइट की कार्पोरेट जुबान है जबकि हम जानते हैं कि शिव सेना और एमएनएस जैसे हिन्दूवादी संगठन की भाषा अनुरोध की नहीं रही है। टेलीविजन और साइट पर जो भी फुटेज हैं,उससे और भी साफ हो जाता है।

भारतीय संस्कृति और देशभक्ति के बचाने के नाम पर शिवसेना और एमएनएस की गुंड़ागर्दी की ये कोई नई और पहली कहानी नहीं है। इससे पहले भी उसने इस तरह की सस्ती लोकप्रियता बटोरने और सुर्खियों में बने रहने के लिए उलजलूल मुद्दों को लेकर विरोध और तोड़-फोड़ मचाए हैं जिसका शिकार लगातार हमारे टेलीविजन चैनल,सिनेमा और इंटरटेन्मेंट इन्डस्ट्री होती आयी है। इस पर कई लोग या तो बचते आए हैं या फिर खुलकर विरोध नहीं किया है। जूम ने अपनी एक स्टोरी में इस रवैये को लेकर वॉलीवुड को शिवसेना की कठपुतली बन जाने तक का करार दिया है। अमिताभ बच्चन की इस पूरे मामले में चुप्पी पर भी सवाल उठे। हमें अफसोस है कि हमारा टेलीविजन भी इसका लगातार शिकार होता जा रहा है। पहले ibn7 लोकमत और आजतक जैसे चैनल और अब फिर लगातार मनोरंजन चैनल। न्यूज चैनलों पर हमले और जो लगातार विरोध इन संगठनों की ओर से किए जाते हैं,उसके विरोध के पीछे तो एक हद तक बात समझ आती है कि वो इनके खिलाफ( जरुरी होने पर ही) स्टोरी दिखाते हैं जिससे उनके संगठन की इमेज करप्ट होती है। लेकिन मनोरंजन चैनलों पर उनकी ओर से किए गए हमले साफ करते हैं कि वो महज संस्कृति के नाम पर अपनी गुंडागर्दी कायम रखना चाहते हैं। गौर से देखें और कुछ घटनाओं पर विचार करें तो मामला साफ बनता है कि पहले जो शुरुआत में उन्होंने फायर और वाटर जैसी फिल्मों का संस्कृति का हवाला देकर विरोध किया,अब उसक दायरा तेजी से लगातार बढ़ता जा रहा है। सिनेमा के साथ फिर क्रिकेट शामिल हो गया। पाकिस्तान की क्रिकेट टीम को मुंबई में खेलने नहीं दिया। आइपीएल में शाहरुख खान के पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ी लिए जाने पर उसका जमकर विरोध किया,माइ नेम इज खान चलने नहीं दिया। और अब उन्होंने अपनी इस गुंड़ागर्दी में टेलीविजन के शो को भी शामिल कर लिया। पिछले दिनों बाल ठाकरे ने छोटे उस्ताद( अमूल व्ऑअस ऑफ इंडिया) में पाकिस्तान से आए बाल प्रतिभागी के विरोध में बयान दिया,कॉमेडी सर्कस में शकील सिद्दकी के आने का विरोध किया और अब बिग बॉस।

 इसके साथ ही उनके गुंडागर्दी किए जाने की फ्रीक्वेंसी तेजी से बढ़ रही है। अब महीने में कोई न कोई एक शो,सिनेमा या फिर चैनल इनके विरोध का शिकार हो जाता है। और इससे भी बड़ी अफसोस की बात है कि अब इसमें डिस्ट्रीब्यूशन के लोग भी लगभग सहमति जताने के अंदाज में हथियार डाल देते हैं। माइ नेम इज खान के विरोध पर सिनेमा मालिकों के नहीं दिखाए जाने के तर्क पर आप ध्यान दें तो उसमें उनके विरोध का डर से कहीं ज्यादा सहमति शामिल है। यही हाल अब केबल ऑपरेटरों के साथ भी है। ऐसे में सवाल है कि

एक चैनल या फिर सिनेमा अपने डिस्ट्रीब्यूटर को शो दिखाने के लिए पूरे पैसे देता है और डिस्ट्रीब्यूटर इन संगठनों के प्रेशर में आकर उन्हें प्रदर्शित नहीं करते तो क्या वो बाजार की शर्तों की धज्जियों नहीं उड़ाते? ऐसी खबरों के आते ही पुलिस की ओर से बयान आने शुरु हो जाते हैं कि कारवायी की जा रही है। लेकिन इन डिस्ट्रीब्यूटरों और केबल ऑपरेटरों के उपर क्या किसी तरह की कारवायी का मामला बनता है,इस पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। क्योंकि इनके लिए विरोध के डर का बहाना बनाकर एक तरह से उनका समर्थन करना बहुत ही आसान है। हिन्दी कट्टरपंथियों की जड़े इस तरह से मजबूत होती है। इसके साथ ही कलर्स जैसे कुछ चैनल ऐसे हैं जिसके लिए कि केबल ऑपरेटर एक्सट्रा चार्ज करते हैं। यहां तक कि टाटा स्काई में भी उसके लिए अलग से पैकेज लेने पड़ते हैं। इस स्थिति में एक कन्ज्यूमर के स्तर पर ऑडिएंस क्या करे,इस बारे में सोचने की जरुरत है।

और इन सबसे बड़ा सवाल कि सिनेमा और टेलीविजन के वेन्चर ग्लोबल स्तर पर बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउस और कन्ग्लामरट्स से टाइअप कर रहे हैं और हमें लग रहा है कि मीडिया और इन्टर्टेन्मेंट इंजस्ट्री बड़ी तेजी से ग्लोबल होती जा रही है। कंटेंट के स्तर पर ऐसा होता दिखायी भी दे रहा है,बाजार के स्तर पर भी ऐसा होता दिखाई दे रहा है। लेकिन इस ग्लोबल होने के दावे को अगर शिवसेना और एमएनएस जैसे संगठन जिसके सैनिक सैंकड़ों या दर्जनों में आकर धमकाते हैं और पूरी इन्डस्ट्री चुप्प मार जाती है तो ऐसे में हम मनोरंजन उद्योग के विस्तार पर कितना थै-थै कर सकते हैं,ये सोचना बहुत जरुरी है।

ये संगठन न केवल समाज के भीतर के आर्ट और विजुअल फार्म को एक उत्पात में तब्दील कर रहे हैं बल्कि ये साबित करने की घटिया कोशिश कर रहे हैं कि हमारे उपर कोई नहीं है। इसे सख्ती से तोड़ा जाना,कुचला जाना जरुरी है।

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कौन बनेगा करोड़पति की ओपनिंग यानी पहले ही शो में मनहूसियत-सी छा गयी। शो शुरु होते ही हम उत्साह के बजाय बहुत ही डार्क शॉरो में डूबते गए। स्टार प्लस को लांघकर केबीसी जिस सोनी इंटरटेन्मेंट पर पहुंचा है,उसमें कुछ अलग और बेहतर करने की तड़प तो साफ तौर पर दिखाई दिया। लेकिन हर अलग चीज ऑडिएंस को रास ही आए,इसकी गारंटी तो नहीं ही ली-दी जा सकती। लिहाजा,कौन बनेगा करोड़पति जितनी ग्रैबिटी के साथ और आम ऑडिएंस को जोड़नेवाला शो रहा है,बिना किसी अतिरिक्त ताम-झाम के भी अपने से बांधे रखनेवाला है,अबकी बार उसका कबाड़ा होते हमने देखा। अगले दस मिनट में ही मन उचट गया। पूरे एपीसोड को हमने बस इसलिए देखा कि जो कुछ बदलाव हुए हैं,उसे समझ भर लें। नहीं तो ये रेगुलर देखनेवाला शो तो नहीं बन पाएगा। इसके लिए अब रात नौ बजे तो सड़कें सूनी होने से रही। अमिताभ बच्चन ने इसे नौ हफ्ते तक चलने की बात कही है। ये नौ हफ्ते भी अपनी रोचकता के साथ,ऑडिएंस के बीच अपनी पकड़ बनाए रखेगा,इसमें मुझ शक है।शो में खेल शुरु होने से पहले अमिताभ बच्चन की बचपन से लेकर अब तक के सफर को दिखाया गया। जन्मदिन के मौक पर सुबह से ही हम वो सबकुछ देखते आए,इसलिए उसका हम पर खास असर होने के बजाय रिपीटेशन ही लगा।

कविताओं का वो मनहूस दौर

उसके बाद शो अमिताभ बच्चन के अपने बाबूजी यानी मधुशाला और हालावाद के कवि हरिवंश राय बच्चन की कविताओं के पाठ को लेकर आगे बढ़ता है। हिन्दी के कुछ मठाधीशों और फरमानी आलोचकों ने तमाम लोकप्रियता के वाबजूद हरिवंश राय बच्चन और उनकी कविताओं को जिस तरह से साहित्य की दुनिया से बेदखल किया, पिछले कुछ सालों से अमिताभ बाबूजी की उन्हीं कविताओं का लगातार पाठ करते आए हैं। शुरुआती दौर में तो ये उनके जीवन,कविता औऱ बाबूजी के प्रति संवेदना का हिस्सा रहा जिसे कि लोगों ने बहुत सराहा। पिछले दिनों जब उन्होंने,एश्वर्य राय बच्चन और अभिषेक बच्चन ने उनकी कविताओं का पाठ किया तो मुंबई में समा बंध गया। स्टार न्यूज ने इसे लगातार दिखाया और हमें एक न्यूज चैनल पर पहली बार कविता पाठ का आनंद मिला। टीआरपी चार्ट पलटकर देखें तो अंदाजा है कि उस शो को ठीक-ठाक टीआरपी मिली होगी। सोनी की क्रिएटिव टीम ने ओपनिंग शो के साथ कविता पाठ कराकर इसे इन्कैश कराने की कोशिश तो जरुर की लेकिन ये स्वाभाविक लगने के बजाय बहुत ही फूहड़ और उचाटने वाला साबित हुआ। अमिताभ की तरफ से कोशिशें जबरदस्त रही लेकिन कविताओं के पीछे जो बैग्ग्राउंड म्यूजिक चलते रहे- एक तो वो बहुत ही मातमी और दूसरा कि कविता और पंक्तियों के बदलते जाने के वाबजूद भी वही की वही धुने। मानों कोई धुन न होकर सिग्नेचर ट्यून बज रही हो।लड़कियों का सफेद पोशाक में लहराना और भी भारी लगा। सारा माहौल वहीं से खराब शुरु होता है।

अमिताभ के डायलॉग ने छोड़ दिया उनका साथ

कविता पाठ के बाद अमिताभ के डायलॉग बोलने का काम शुरु होता है। अमिताभ ने पिछले तीस-चालीस साल में जिन फिल्मों के जरिए,जिन संवादों को गली-कूचे के बच्चे-लौंडो को किताबी पाठ की तरह दुहराने को मजबूर किया,उसे वो 2010 में आकर एक बार फिर से डिलीवर करते हैं। जैसे खुश तो बहुत होगे कि जिसने आज दिन तक....। अमिताभ बच्चन के लिहाज से सोचें तो ये एक जरुर ऐतिहासिक नजारा बनता है कि जिस इंसान ने अलग-अलग दौर में संघर्ष करते हुए अलग-अलग किस्म की फिल्में बनायी। उस दौरान उसकी मनोदशा एक फिल्म की दूसरी फिल्म से बहुत अलग रही होगी,आज 2010 में आकर जबकि वो पा फिल्म के लिए नेशनल फिल्म अवार्ड विनर है, पार्कर,रीड एंड टेलर,बिमानी सीमेंट,कैडवरी जैसे उत्पादों का ब्रांड एम्बेस्डर और एश्वर्य का श्वसुर और अभिषेक का बाप है,वो सब फिर से एक ही मनोदशा में दुहरा रहा है। लेकिन उस एहसास के इतिहास का एक हिस्साभर हो जाने के बाद जब वो डॉयलॉग अमिताभ बोल रहे होते हैं तो वो सारी की साफी लाइनें अमिताभ से जुदा होती चली जाती है,उन लाइनों को कभी अमिताभ ने ही डिलीवर किया था-हमें भरोसा नहीं होता। केबीसी की फीस भी उनमें बहुत खनक पैदा नहीं करने पाती।

खईके पान बनारसवालाः कुली और हेलेन का एक बेहूदा फ्यूजन

तीसरा नजारा होता है जब खइके पान बनारस वाला गाने की पॉप और देशी का फ्यूजन बनाया जाता है जिसकी कोरियोग्राफी में नया करने की कोशिश की जाती है। इस फ्यूजन को गाते हुए अमिताभ हमें एक घड़ी को बंटी-बबली में मैडम,आय एम योर एडम बोलनेवाले अंदाज में बिंदास जरुर नजर आते हैं लेकिन ये गाना औऱ कोरियोग्राफी भी पूरी तरह संभल नहीं पाती। पूरी टीम के साथ जो विजुअल्स हमारे सामने आते हैं,उसमें लगता है कि इतनी भारी संख्या में सपोर्टिव डांसर कुछ क्रिएटिव करने के बजाय भीड़ बन गए हैं जिसे कि हमारा टेलीविजन संभाल नहीं पा रहा है। देखते हुए बार-बार लग रहा था,कुछ लोग साइड हो जाओ यार। लड़कों के कपड़े कुली बने अमिताभ की याद दिलाते हैं और लड़कियां हेलेन की। हां जब पगे घुंघरु बांधे,मीरा नाचती है लाइन आती है और सारी हेलेननुमा लड़कियां दो-दो,तीन-तीन बित्ते की घुंघुरी पट्टियां बांधे पैरों को उठाती है तो हाथ में वीणा लिए भक्तिकाल की मीरा और गहरे तौर पर याद आती है।

मेरे अपने से ज्यादा रीड एंड टेलर के लगे अमिताभ

इस पूरे कर्मकांड में अमिताभ के करीब छ सूट और पोशाक बदल जाते हैं। पगे घुघरुं बांधते में सफेद रंग डांस के खत्म होते-होते डार्क मैगनेटिक ब्लैक में तब्दील हो जाता है और वो पुराने अमिताभ बच्चन की शक्ल में हमारे सामने होते हैं। कल दि हिन्दू के दूसरे पन्ने पर केबीसी के लिए खासतौर पर अमिताभ बच्चन के जितने ड्रेस डिजाइन किए हैं रवि बजाज,उनकी बातें डीटेल में छापी गयी है। उनके मुताबिक अमिताभ ज्यादातर डार्क शेड की सूट में होंगे। वैसे भी कैडवरी को छोड़ दें तो रीड एंड टेलर में लगातार उन्हें इस शक्ल में देखने के हम पहले से अभ्यस्त हैं।

आवाज में खनक बरकरार है

अमिताभ की आवाज में पहले की तरह खनक बरकरार है। अपने पुराने अंदाज को उन्होंने बखूबी संभालकर रखा है। लेकिन खेल में कुछ बदलावों,नए शब्दों मसलन घड़ी की बदली आवाज और घड़ी के लिए घड़ियालजी, ऑप्शन में दो डुबकी और लाइफ लाइन के तौर पर अपने गांव-मोहल्ले के लोगों को फोन लगाने के बजाय सीधे स्टूडियो में ही एक्सपर्ट होने जैसी बातों के वाबजूद बुनियादी तौर पर हमें इसमें कुछ नया नहीं लगा। रकम पांच करोड़ भी अंत में जाकर ध्यान खींच पाती है। कैडवरी के प्रेशर में अमिताभ की पहलीवाली लाइन- तो आइए हम और आप शुरु करते हैं कौन बनेगा करोड़पति अब शुभारंभ हो जाता है। स्क्रीन पर कैडवरी और आइडिया के ब्रांड कलर हावी हैं। हमें जिन दो बातों से खुशी हुई वो पहली तो ये कि इसे इंडियाटाइम्स के बूते सीधे इंटरनेट के जरिए भी देखा जा सकता है औऱ दूसरा कि अगर किसी ने अमिताभ या इंडिया टाइम्स के ब्लॉग पर लिखा और वो रास आया तो उसे शो के दौरान पढ़ा जाएगा। दो नए उभरते माध्यमों की ताकत मेनस्ट्रीम मीडिया समझ रहा है,हमारे लिए ये खुशी की बात है। केबीसी का लोगो अंग्रेजी के रुपीज की जगह हिन्दी का रुपया हो गया,अच्छा लगा देखकर।

टेलीविजन से अब भी लोगों को हैं उम्मीदें

कल तो हमने दो ही प्रतिभागियों को देखा। शो में कुछ नया नहीं होने के वाबजूद और अगले दिन फिर देखेंगे जैसी टेम्पटेशन पैदा न होने के वाबजूद भी ये शो एक बार फिर गांव और दूरदराज के लोगों के चेहरे को टेलीविजन स्क्रीन पर जगह देता है जो कि इसका सबसे बड़ा उजला पक्ष है। नहीं तो दूरदराज और गांव के लोग न्यूज चैनलों पर या तो अपराध करते नजर आते हैं या फिर नाव बह जाने,बेटी के वहशी के हाथों पड़ जाने या बेटे के बेमौत मर जाने पर विलाप करते हुए। राजेश चौहान ने बताया कि वो पिछले दस सालों से इसकी तैयारी कर रहे थे। मास कॉम के स्टूडेंट आलोक कुमार ने कहा कि जब वो इसमें आना चाहते थे तो उनकी उम्र 18 साल नहीं हुई थी। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अभी भी इंतजार करती हुई एक पीढ़ी मौजूद है जो कि केबीसी जैसे टेलीविजन कार्यक्रमों के बूते अपनी किस्मत को बदलने की उम्मीद रखते हैं। इनकी संख्या 60 लाख है। टेलीविजन के रियलिटी शो इसी उम्मीद से अपना खाद-पानी खींचते हैं। बहरहाल ऑडिएंस का मनोरंजन के स्तर पर ये शो हमें निराश करता है। अमिताभ बच्चन में रिपिटेशन वैल्यू खत्म हुआ है लेकिन जिन्हें उम्मीद हैं,उन उम्मीदों के दम पर सोनी कुछ अच्छा कर जाए।..और क्या कह सकते हैं।

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ओमपुरी ने सिर्फ इतना कहा कि देवियों और इस संबोधन के बाद वे बोले, यहां तो देवियां ही देवियां हैं, देवता तो मुझे कहीं दिखाई ही नहीं दे रहे – तो मैंने भी पीछे मुड़कर एक बार नजर घुमायी। मुझे सचमुच कोई भी मेल ऑडिएंस दिखाई नहीं दिया। दो-चार जो भी थे, वो सबके सब आगे मंच-काज में रमे हुए या फिर सोफा में धंसे हुए। बाकी करीब छह सौ की संख्या में सिर्फ और सिर्फ लड़कियां। आगे की पहली लाइन और कुछ आती-जाती फीमेल ऑडिएंस को छोड़ दें तो सबके सब बीए और बाहर से आयीं कुछ एमए लड़कियां। इन लड़कियों को शायद पता भी नहीं होगा कि वो जिस तरह से सिनेमा देख रही हैं, वो किसी भी स्त्री-विमर्शकार के लिए कितना मौजूं मुद्दा हो सकता है? और फिर सिनेमा देखने के दौरान जो उनकी एक्टिविटी और हरकतें हम नोटिस करते रहे, उसे भी डिकोड कर काफी-कुछ मायने निकाले जा सकते हैं।

मेरे लिए ये पहला अनुभव रहा, जब हम डीएवी गर्ल्स कॉलेज, यमुनानगर जैसे लड़कियों के कॉलेज में, इस तरह की खचाखच भरी ऑडिएंस के बीच सिनेमा देख रहे थे और कुछ-कुछ वैसा ही महसूस करते रहे जैसे आमतौर पर लड़कियां मर्दों के जमावड़े के बीच होने पर करती हैं। मर्दों की मसखरई के बीच पड़कर कोई लड़की कैसा महसूस करती है, इसे समझने के लिए ऐसे जमावड़े में पड़ना और सिनेमा देखना मुझे सबसे ज्यादा जरूरी लगा। मेरी बॉडी लैंग्वेज सिकुड़ती है और हम अतिरिक्त तौर पर सतर्क होते हैं। हमारे लिए ये बहुत आसान था कि हम इससे उबरने के लिए हॉल से बाहर निकल जाएं। लेकिन रोजमर्रा तौर पर लड़कियों और स्त्रियों की ये बेचैनी कैसे दूर होती होगी, कहां-कहां से निकलकर किधर-किधर भागने के बारे में सोचती होगी, ये सवाल हमें लगातार मथे जा रहा था। बहरहाल…
ओमपुरी और फिर हरियाणा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल के डायरेक्टर अजीत राय के छोटे से वक्तव्य के बाद उदयन प्रसाद की फिल्म My Son the Fanatic की स्क्रीनिंग शुरू हो जाती है। एक टैक्सी ड्राइवर की भूमिका में ओमपुरी पक्के पोस्टमार्डनिस्ट साबित होते हैं। हम अगले करीब ढाई घंटे के लिए घुप्प अंधेरे में पर्दे पर बदलते मंजरों के हवाले खुद को कर देते हैं। बीच-बीच में लोगों की आवाजाही बनी रहती है और इसकी जो रोशनी इस अंधेरे को काटती है तो मेरा लोभ उन बैठी करीब छह सौ लड़कियों के बीच जहां-तहां से चेहरे के भाव पढ़ने का लोभ बनता जाता है। हम सिनेमा का तत्काल रिएक्शन उन पर क्या हो रहा है, पढ़ना चाहते हैं, जो कि आसान काम नहीं होता है। कोई सीधे कहे कि या तो सिनेमा देख लो या फिर उन चेहरों की टोह ही लेते रहो। लेकिन उन लड़कियों और आगे बैठी स्त्रियों के रिएक्शन को समझने का एक सतही की सही, फार्मूला हमें मिलता दिखाई देता है।
मेरे ठीक पीछे बैठी स्त्रियां जिनमें से कुछ उस कॉलेज की लेक्चरर भी होती हैं, जिस सीन को देखकर फुसफुसाना शुरू करती हैं, ठीक उसी सीन पर पीछे से लड़कियों के ठहाके शुरू होते हैं। उन ठहाकों में अगर आधी लड़कियों की भी गूंज शामिल हैं, तो ये विश्लेषण की एक कच्ची सामग्री है ही। अधेड़, तीस साल पार स्त्रियों के लिए सिनेमा के जो सीन्स फुसफुसाहट पैदा करते हैं, ठीक पीछे बैठी लड़कियां उन पर ठहाके लगाती हैं। मैंने लेडिज सीट पर बैठकर दीदी की सहेलियों और सबसे ज्यादा मां के साथ दर्जनों फिल्में देखीं है। मुझे तब याद है कि जब हीरो किस भी नहीं लेता, सिर्फ उसकी बांह पकड़कर अपनी ओर खींचता तो हीरोइन कहती – कोई देख लेगा… बाबूजी आते होंगे… (विवाहित होने पर) मांजी बुला रही है, तो इधर दर्शक दीर्घा में लड़कियां समीज से सरक आये दुपट्टे को दुरुस्त करतीं और महिलाएं साड़ी के पल्लू को ब्लॉउज पर जमातीं।
यहां सीन ये है कि हीरो और हीरोइन बिल्‍कुल नंगे एक-दूसरे से लेटे-लिपटे जा रहे हैं और पीछे बैठी स्त्रियां फुसफुसाना शुरू करती हैं – बोल्ड सीन है। दूसरी ने कहा कि हां, इंग्लिश फिल्मों में ऐसा होती ही होता है जबकि लड़कियों के ठहाके साफ कर देते हैं कि मर्डर जैसी हिंदी फिल्म में ये तो कॉमन है। फिर इरफान हाशमी, मल्लिका शेरावत पैसे किस बात के लेते हैं? इतना तो छोड़ो, अब तो हीरोइन गद्दे लेकर खेत भी जाने लगी है। मुझे लग रहा था कि दुपट्टे दुरुस्त करनेवाली तब की लड़कियां अब अधेड़ फुसफुसानेवाली महिला में तब्दील हो चुकी है और टीनएजर्स और कॉलेज की लड़कियों की बिल्कुल एक नयी खेप पैदा हो रही है, जो कि इनसे जुदा है। ऐसे सीन्स को देखकर उनकी कनपटी लाल नहीं होती बल्कि इसे इजी टू सी मानकर आगे बढ़ जाती है। इसे आप बेशर्मी कहें या फिर ऑडिएंस के स्तर की मैच्योरिटी, लेकिन इसमें मैं एक आजाद ख्याल के चिन्ह जरूर देखता हूं।
इतना ही नहीं, यमुनानगर पहुंचने के दौरान जो हमें क्वांरा चौक मिला और उस नाम पर हमने ठहाके लगाये – मेरे मन में एक घड़ी ये ख्याल भी आया कि गर्ल्स कॉलेज के ठीक पहले क्वांरा चौक, ये युवा पीढ़ी पर किस तरह का शोषण है? वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी तो बीएचयू के महिला कॉलेज को याद करते हुए पीएमसी (पिया मिलन चौक) की उम्मीद कर रहे थे। खैर, हमें अंदर एक खुला माहौल दिखाई दिया। दिल्ली अगर खुलेपन का पर्याय मानी जाती है तो माफ कीजिएगा – कुछ इलाकों और कॉलेजों में हमें वो बहुत ही बंधा-फंसा, कंजर्वेटिव नजारा दिखाई देता है, यमुनानगर का ये कॉलेज उसे उलाहने देता नजर आया। गर्ल्स कॉलेज के भीतर फेस्टिवल के नाम पर ही सही, बाहर के बहुत सारे लड़के कॉरीडोर में लड़कियों से आराम से गप्‍पें लड़ाते नजर आये। लड़कियों के बात करने का अंदाज साफ बता रहा था कि ये कोई नया परिचय नहीं है बल्कि पुराना परिचय नये माहौल में रम गया है। अब बाउंडरी बॉल से छड़प-तड़पकर सिनेमा देखने की जरूरत नहीं रह गयी है।
डीएवी के कॉलेज, स्कूलों को लेकर जब भी सोचना शुरू करता हूं तो पहला शब्द हवन-पूजन याद आता है लेकिन यहां बर्गमैन से लेकर रोनॉल्ड जॉफी की फिल्में बड़े इत्‍मीनान से देखी और शेयर की जा रही थीं। पहुंचनेवाली रात जब अजीत राय हमसे मिले, तो फेस्टिवल को लेकर कुछ प्रसंगों की चर्चा की। एक प्रसंग ये भी कि वो जो फिल्म दिखाना चाह रहे थे, उसमें हीरोइन आग से बचने के लिए बिल्कुल नंगी दौड़ रही है। उन्होंने उस फिल्म का नाम भी बताया, मुझे याद नहीं। इसे दिखाने, न दिखाने पर जब बात हुई, तो कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ सुषमा आर्य का जवाब था कि ये किसी तरह की उत्तेजना या अश्लीलता पैदा नहीं करता बल्कि इसमें तो दहशत का माहौल दिखाया गया है। ओमपुरी ने भी ‘माय सन द फैनेटिक’ की स्क्रीनिंग के पहले यही बात कही कि आज जबकि लगभग हर सिनेमा में कुछ बोल्ड सीन एक फार्मूला बन गया है, इस फिल्म में भी कुछ सीन हैं लेकिन ये आपको अलग से, फार्मूला के नहीं लगेंगे, बहुत ही स्वाभाविक और जरूरत के हिसाब से हैं। सिनेमा को लेकर प्रिंसिपल की जो राय रही, वो हमें कॉलेज कैंपस के भीतर भी दिखाई दिया। मुझे नहीं पता कि ये कितना स्वाभाविक या फिर मौके भर के लिए था। लेकिन जो बॉडी लैंग्वेज, बात करने के तरीके और कॉनफीडेंस लड़कियों के बीच हमने देखे, वो रातोंरात, कोई एक दिन में इनबिल्ट चीज नहीं थी।
हां, इस पूरे 13-14 घंटे तक करीब छह सौ लड़कियों और दर्जनों महिला लेक्चररों के बीच गुजारते हुए हमें दो बातें जरूर चुभ गयीं। एक तो ये कि कुछ कोर्स ने कैसे पहले ही दिन से लड़कियों की शक्ल बदल दी है। प्रोफेशनल कोर्स उन पर इतना हावी है कि वो पहले ही दिन से अपने कब्जे में कर लेता है। एक ही कैंपस में इन कोर्स की लड़कियां ट्राउजर, शर्ट, टाई और हॉफ ब्लेजर में नजर आयीं, जो कि उनका ड्रेस कोड था तो बाकी सलवार सूट या फिर जींस शर्ट में। सलवार-कमीज वाली लड़कियों को संभव है कि कॉम्प्लेक्स होता हो और ट्राउजर पहनती लड़कियों को कोर्स चुने जाने पर फख्र। लेकिन हमें अफसोस इन्हें देखकर हो रहा था कि अभी से ही इन्हें वेटर जैसी शक्ल देने की क्या जरूरत है? फैमिली बैकग्राउंड का प्रेशर उन्हें ऐसे में मॉड बनाने के बजाय लाचार शक्ल देता है। और दूसरी बात कि जिन लड़कियों ने सिनेमा देखते हुए ठहाके लगाये, उनसे सिनेमा को लेकर राय ली जानी चाहिए थी, विमर्श जरूरी था। वो एक बड़ा और अलग काम कर रही हैं, उन्हें एक एकेडमिक, इंटलेक्चुअल टच दिया जाना जरूरी है।
वैसे आप यकीन नहीं करेंगे कि इससे पहले जिस हरियाणा में मैं सुमन को जिंदा जला दिये जाने की घटना के बाद देखने-समझने के लिए गया था, अबकी बार उसी हरियाणा में सिनेमा के बीच खिलखिलाती छह सौ सुमन को देखकर कितना अच्छा महसूस कर रहा हूं। हरियाणा में स्त्री-सत्ता को मजबूती देने के लिए इस गर्ल्स कॉलेज में सिनेमा फेस्टिवल का आयोजन एक जरूरी कदम है। हवन, धार्मिक कर्मकांड तो इनके अधिकारों को लील गये, उम्मीद है कि मीडिया कल्चर के बीच जीने की अनिवार्यता में सिनेमा उनकी दावेदारी को मजबूत करेगा।

मूलतः प्रकाशित- मोहल्लाLIVE
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देखिए,बहस या सेमिनार का मुद्दा चाहे जो भी हो,वो किसी भी रुप में अकारथ नहीं जाता। ये सवाल अक्सर किसी के भी मन में आया करते हैं कि इन सेमिनारों और चर्चाओं से भला होता क्या है, जो जहां पत्थर तोड़ रही होती है,जो जहां कूड़े बीन रहा होता है,वो सालों से बीनता-तोड़ता चला आता है..तो फिर क्यों करते हो उनके नाम पर चर्चा या सेमिनार? यही सवाल यहां भी उठते हैं कि जब कोई आचार संहिता मानने को तैयार ही नहीं है,आचार संहिता जैसी बात पर सहमत ही नहीं है तो फिर क्यों करा रहे हैं इस पर विमर्श?
इस मामले में मेरी अपनी राय है-
इस तरह के मुद्दे पर विमर्श करने से न तो लिखने के चलन में कोई फर्क आनेवाला है और न ही इस संहिता को ध्यान में रखकर लिखना शुरु करेंगे। लिखेंगे वही जो महसूस करेंगे और जो महसूस करेंगे वो संहिता के सींकचे में ही हो,उनकी सहमति की मोहताज हो,जरुरी नहीं।..तब तो फिर हो गया वर्चुअल स्पेस पर लेखन भला।
तो फिर...

जैसा पहले भी कहा कि कोई भी सेमिनार न तो अकारथ जाती है और न इस नीयत से कराए जाते हैं। इस तरह के मुद्दे पर भी कराने से ऐसा ही होगा। कुछ लोग पंडितई की पांत में आगे बढ़ जाएंगे। कल को वो संहिता बनानेवाली कमेटी में घुस-घुसा दिए जाएंगे। उसके विशेषज्ञ करार दिए जाएंगे..कई और सभाओं में अपनी शक्ल चमकाएंगे और इस तरह अभी महज जो गैरजरुरी मुद्दा है वो कल को एक सांस्थानिक शक्ल के तौर पर हमारे सामने होगें। पेड न्यूज,आदिवासी अस्तिमता विमर्श,दलित औऱ स्त्री-विमर्श करने में माहिर लोग इसे बेहतर समझ सकते हैं।

संहिता के होने या न होने का संबंध सीधे वर्चुअल स्पेस पर लिखनेवाले लोगों से है। ये कोई एक राज्यकीय स्पेस नहीं है कि कोई खाप पंचायती करने बैठ जाए। ये खुली दुनिया है। ये अलग बात है कि हम तीस-चालीस ब्लॉगरों को शक्ल,नाम और पता ठिकाने को जान लेते हैं तो बस इसे ही दुनिया मान लेते हैं। अगर कन्सेप्चुअली वर्चुअल स्पेस को समझने की कोशिश करें तो आचार संहिता पूरी तरह वर्चुअल स्पेस की अवधारणा के खिलाफ बात करनेवाला मुद्दा है।

व्यावहारिक तौर पर देखें तो आपको कुछ ब्लॉगरों को नाम-पता सब ठीक-ठीक मालूम है तो आप लाद दें उन पर आचार संहिता और बाकियों के साथ आप क्या करेंगे? या फिर देर रात उस लेखक की नीयत बिगड़ जाए और बेनामी होकर कुछ लिख जाए तो आप क्या कर लेंगे? आप तकनीकी रुप से उसे आइडेंटिफाय भी कर लें तो फिर उससे ये कहां साबित हो सकेगा कि उसने ऐसा किस मनःस्थिति में रहकर किया? आप किसी की मनोदशा,उसकी चलन पर आचार संहिता लागू नहीं कर सकते। ये जब नागरिक संहिता के तहत जीनेवाले इंसान के बीच संभव नहीं हो पाता है तो आप मन की बारीकियों पर कैसे लागू कर सकेंगे?

ये एक ग्लोबल माध्यम हैं,जिसमें आए दिन रगड़े होंगे और ये रगड़े जरुरी नहीं कि बलिया, बक्सर, बनारस, दिल्ली का ही लेखक करे और जिसका निपटारा वर्धा,इलाहाबाद में किया जाए? ये अमेरिका की समस्या पर मुनिरका( दिल्ली में एक स्टूडेंट प्रो इलाका)में बैठकर ताल ठोंकने का काम होगा। इसलिए मेरी अपनी समझ है कि ये मुद्दा वर्चुअल स्पेस की पूरी अवधारणा को बहुत ही सीमित और फ्रैक्चरड तरीके से देखने की कोशिश करता है। मुझे तो यहा तक लगता है कि जो कोई भी बेबाक तरीके से ब्लॉगिंग करता आया है,उसके दिमाग में इस मुद्दे का आना ही उसके लिखने पर प्रश्नचिन्ह लगा देता है।..

मेरी बात पढ़कर आप कहेंगे कि मैं तब लिखने के नाम पर फुलटाइम,फुलटू,फुलस्पीड में आवारगी की डिमांड कर रहा हूं। नहीं,ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। कोई भी लेखक जब इस स्पेस पर लिखता है तो लिखने के साथ उसकी किसी न किसी रुप में प्रतिबद्धता होती है। बल्कि लिखना अपने आप में एक प्रतिबद्धता का काम है,खास तरीके की कमिटमेंट है। ये संहिता से कहीं आगे और बड़ी चीज है। संभव है कि ये प्रतिबद्धता हर किसी के लिखने में अलग-अलग तरीके और साइज के हो। कोई लिखकर किसी एक या दो शख्स की कनपटी गरम करना चाह रहा हो तो कोई अपने लेखन से पूरी सिस्टम को हिलाकर रख देने की मंशा रखता हो। ऐसे में मुझे लगता है कि हमें उसकी उस प्रतिबद्धता को लेकर बात करनी चाहिए,संहिता की नहीं।

संहिता वाली बात संभव है जिस किसी के दिमाग में उपजी है,संभव है कि वो कुछ अश्लील और गालियों के इस्तेमाल किए जानेवाले शब्द को लेकर भी पनपी हो। लेकिन आप इन गालियों को प्रोत्साहित न करते हुए भी इसके समाजशास्त्र और लिखनेवाले के एग्रेशन लेबल तक ले जाकर सोचेंगे तो पूरे विमर्श का आधार ही बदल जाएगा। संहिता की बात करना दरअसल ब्लॉगिंग के भीतर की बनती संभावित कॉम्प्लीकेटेड बहस को सतही तौर पर जेनरलाइज और सतही कर देना होगा।

हां इस पूरी बहस में एक चीज का जरुर पक्षधर हूं और वो भी किसी नियम के तहत नहीं,एक अपील भर कि लिखने के साथ-साथ अगर अकांउटबिलिटी आ जाए तो कुछ स्थिति और बेहतर हो सकती है। क्योंकि अनामी होकर हर कोई बहुत गहरी और व्यापक सरोकार की बात करेगा,जरुरी नहीं। अगर न भी अकांउटेबल होते हैं तो फिर बहुत दिक्कत नहीं है। हां बस अगर वो बम धमाके की तरह आतंकवादी संगठन जैसे जिम्मेदारी अपने-आप ले लेते हैं तो इससे व्यक्तिगत स्तर पर ब्लॉगरों की ताकत में जरुर इजाफा होगा और टेलीविजन के अतिरिक्त "वर्चुअल स्पेस पर स्टिंग ऑपरेशन" होते रहने का भय बना रहेगा।.

सिद्धार्थजी का मैं शुक्रिया अदा करने के साथ माफी मांगता हूं कि आ न सका। हम लाख तार्किक बातों के बीच रहते,करते हुए भी कुछ मामलों में अपने फैसले इमोशन के आधार पर ही लेते रहते हैं। मैं यूपीएससी पास करनेवाले उन लौंड़ों में से नहीं हूं जो कि इमोशन को अपने व्यक्तित्व की खोट मानते हैं। मैं इसे अपनी पूंजी के तौर पर लेता हूं और बची रहे,इसकी लगातार कोशिश रहती है। दिल्ली से यशवंत गए हैं,हम यहां बैठे-बैठे उम्मीद और भरोसा करते हैं कि वो अपनी बात में मेरा भी तेवर शामिल करेंगे। बाकी ब्लॉगर गुर्गे तो अपनी बात कह ही रहे हैं। उम्मीद करता हूं कि उनके मुंह से भी हमारी ही जुबान निकलेगी।

आप जितना महसूस करें,जैसा अनुभव रहे,उसके एक-एक रेशे को भाषिक रुप दें,इसी उम्मीद के साथ
आप सबका,
विनीत
( ये पीस दरअसल कमेंट के तौर पर चिठ्ठाचर्चा के बक्से में जाकर लिखा। लेकिन सेंटियाकर लंबा लिखता चला गया तो पोस्ट करने से मना कर दिया। लिहाजा बना हुआ भोजन और लिखा हुआ माल बेकार न चली जाए,पोस्ट की शक्ल में आपके सामने धर दिया )
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दीपक चौरसिया टेलीविजन का जाना-पहचाना और सबसे पॉपुलर चेहरा है। वो इतना पॉपुलर तो जरुर है कि फिल्म पीपली लाइव में उनके आस-पास का एक कैरक्टर गढ़ा जाता है और स्वाभाविक तौर पर उसका भी नाम दीपक रखा जाता है जिसकी ठसक एक-दो बार चैनल हेड से उपर तक की दिखाई जाती है,जिसके उपर मंत्रीजी की विशेष कृपा है। सिनेमा है इसलिए सीधे-सीधे हम असली दीपक चौरसिया से इसे जोड़कर देखें तो बेमानी होगी। लेकिन आज जो अभी हम शो देख रहे हैं उससे ये बात जरुर समझ आ जाती है कि दीपक चौरसिया पर सिस्टम की खास मेहरबानी जरुर है।

"बाइक पर आया जॉन" नाम से एक खास शो आ रहा है जिसमें वो जॉन इब्राहिम के साथ बाइक पर बैठकर इंटरव्यू ले रहे हैं। एक ऑडिएंस के तौर पर हमारी सबसे पहली नजर जिस बात पर जाती है वो ये कि एक तो दोनों में से किसी ने हेमलेट नहीं पहने हैं और दूसरी कि उनकी बाइक के पीछे चलनेवाली गाडियां परेशानी झेल रही है। स्टार न्यूज इतना स्मार्ट चैनल तो जरुर है कि उसे पता है कि इस नजारे को देखते ही ऑडिएंस एकदम से भड़क जाएगी कि जो मीडिया हमें दिन-रात नियमों के पालन की नसीहतें देता रहता है वो खुद सरेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है। इसलिए स्क्रीन के नीचे पीले रंग से मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा आता है कि- इस कार्यक्रम के लिए चैनल ने विशेष अनुमति ले रखी है,दर्शकों से अनुरोध है कि बिना हेलमेट बाइक की सवारी न करें। इस लाइन को पढ़ते हुए हमें बस यही मुहावरा याद आता है- सइंया भए कोतवाल, तो अब डर काहे का। जब अनुमति ले ही ली है तो देश का सबसे नामी टेलीविजन चेहरा अगर नियमों को अपनी जेब में रखकर घूमता है तो क्या फर्क पड़ता है? हम दीपक चौरसिया सहित स्टार न्यूज को किसी भी तरह से कानूनी स्तर पर चैलेंज नहीं कर सकते क्योंकि उसने कुछ भी नियम से हटकर नहीं किया है? उनके पास संभवतः सारे लिखित दस्तावेज होंगे जिसमें बिना हेलमेट के काला चश्मा लगाए लौंडे टाइप से जॉन इब्राहिम के साथ बाइम में बैठकर इंटरव्यू ले सकेंगे। हम तो बस उस अधिकारी की डिसीजन लेने की क्षमता और उसकी बुद्धि की बलिहारी पर रो सकते हैं जिसने कि चैनल या दीपक चौरसिया से एक बार भी ये सवाल नहीं किया कि क्या ऐसा करना इतना जरुरी है कि बिना हेलमेट के सड़कों पर मनमाने ढंग से बाइक चलाने,बात करने की अनुमति दी जा सके। मैं लगतार देख रहा हूं उनके इस तरह बातचीत करने से पीछे की गाड़ियां, ट्रैफिक डिस्टर्ब हो रही है। दीपक चौरसिया और स्टार न्यूज उस लिखित अनुमति और हमसे बिना हेलमेट के बाइक की सवारी न करने की नसीहत देकर एक तरह से हमें ठेंगा दिखाने का काम करते हैं। साथ ही ये भी बताने की कोशिश भी कि अगर आपके पास ऐसा करने की इजाजत है तो घंटा कोई कुछ कर सकता है। लेकिन सवाल दूसरा है-

 सवाल ये है कि क्या स्टार न्यूज कोई फिल्म प्रोडक्शन हाउस है या फिर दिखाया जानेवाला शो सिनेमा है कि उन्हें शूटिंग करने के लिए इस तरह की इजाजत दे दी जाए? क्या चैनल ने इसके लिए फिल्मों की शूटिंग इतनी रकम अदा की है,इसे चैनल को साफ करना चाहिए? स्टार न्यूज को कल को ये क्रेडिट भले ही मिल जाए कि वो ऐसा करने का ट्रेंड सेटर है लेकिन ये किस तरह की ट्रेंड होगी इस पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। इस देश में जितने भी चैनल हैं उनमें से लगभग सबों के पास इतनी हैसियत और आकात है कि वो इस तरह की परमीशन ले सके। अब ऐसा करना बाकी चैनलों ने भी शुरु कर दिया तो फिर आगे कहां जाकर थमेगा? माफ कीजिएगा,मैं किसी भी तरह के कठमुल्लेपन की तरफ नहीं जा रहा लेकिन कल आप जॉन इब्राहिम ही क्यों,बिकनी के साथ विपाशा वसु को बिठाकर इंटरव्यू लें..लेकिन टीआरपी के कुछ टुकड़ों के अलावे आप बाकी क्या देना चाहते हैं,इस पर बात करनी जरुरी है। इस शो में इस रवैये को मैं प्रशासन और ट्रैफिक नियम की धज्जियां उड़ाने का मामला मानता हूं। साथ ही शख्स की हैसियत के हिसाब से नियम बदल जाते हैं,ये भी मामला बनता है।

दूसरी बात ये दोनों शख्स जिस मसले पर बात कर रहे हैं, उसका किसी विपदा या इमरजेंसी से संबंध नहीं है कि मजबूरी में ही सही इसकी इजाजत दे देनी चाहिए। माफ करेंगे मैं किसी भी तरह से सरोकारी पत्रकारिता की बात नहीं कर रहा क्योंकि देखते और लिखते हुए इसकी उम्मीद बहुत पहले से जाती रही है,लेकिन मीडिया के भीतर घटनाओं का जो महत्व है उसका आप क्या करेंगे? फिर तो दिनभर में चार बार ऐसी जरुरत पड़ेगी हरेक चैनल को एक सिलेब्रेटी,एक बाइक और बिना हेलमेट की फुटेज की जरुरत पड़ेगी। अगर प्रशासन उन्हें इस बात की अनुमति नहीं देती तो फिर उसकी तटस्थता कहां तक रह जाती है? स्टार न्यूज को इसकी इजाजत देकर उसने एक बहुत ही बेहुदे परंपरा की नींव रखी है जिसमें कि चैनल और वो बराबर का जिम्मेवार है।

तीसरी बात कि दीपक साहब, आज आपने कानूनी इजाजत ले ली है औऱ नंगे सिर सड़क पर लहरा रहे हैं, हमें ठेंगा दिखाकर आगे बढ़े जा रहे हैं लेकिन ऑडिएंस आपको कानून और नियमों के आइने में देखकर पसंद-नापसंद नहीं करती है बल्कि वो आपको इसलिए पसंद करती है कि आप उनके मसले को संवेदनशील तरीके से उठाते हैं। इसे मैं आपके एक अच्छा इंसान होने के तौर पर नहीं एक अच्छी ब्रांड इमेज के तौर पर लेता हूं जिसे कि आज आपने ध्वस्त कर दिया। आज आपने एक पट्टी चलाकर अपने को एक जिम्मेदार नागरिक घोषित कर दिया लेकिन कभी पीछे पलटकर देखा कि आपके ऐसा करने से कितने लोग फॉलो कर रहे हैं?

फुटेज में हमें दिखाई दिया कि कई लोग बिना हेलमेट के चले आ रहे है? क्या सबों के पास ऐसा करने की परमीशन थी? एक बंदा हेलमेट उतारता है और जॉन इब्राहिम सवाल करते हैं कि आप हेलमेट क्यों उतार रहे हैं?  उनके चेहरे से साफ झलकता है कि इजाजत ले लेने के वाबजूद भी कुछ गलत करने का बोध पैदा हो रहा है। दीपक साहब, हम आपसे गांधी बन जाने की उम्मीद नहीं करते कि दूसरों को नसीहत देने के पहले खुद सुधरो, बच्चे को मीठा खाने से मना करने के पहले खुद खाना बंद करो। ये अलग बात है कि आपने ठीक गांधी जयंती के मौके पर ऐसा किया है। लेकिन इतना तो जरुर कह सकते हैं कि आपको क्या कभी नैतिक अधिकार होगा कि आप लोगों से देश की किसी भी सामाजिक बुराईयों को रोकने के लिए,नियम से चलने की बात कर सकें। मुझे इतना तो पता ही है कि जॉन इब्राहिम फिर भी किसी मैराथन के एंमबेसडर बनेंगे, रेसलाइन में दौड़ेंगे या साइकिल चलाएंगे लेकिन आप?..

दरअसल आप जिस जॉन इब्राहिम की सबसे बेहतर बाइक राइडर की इमेज को भुनाना चाह रहे हैं,उससे आपकी खुद की इमेज न केवल करप्ट हुई है बल्कि एक न्यूज चैनल की साख को बट्टा लगा है। दिनभर नंबर तीन चैनल हो जाने की कुंठा से मुक्त होने की जुगाड़ों के लिए क्या भूत होते हैं से चैनल को तो जूझते देखा ही,प्राइम टाइम में इस तरह का कबाड़ा।..अफसोस होता है,एक पॉलिटिकल कॉरेसपॉडेंट का इस तरह से पतन होते हुए देखकर..

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