.


आउटलुक पत्रिका ने हिन्दी कवि-कथाकारों को लेकर एक सर्वे शुरु किया है। रंगनाथजी को इस सर्वे से इस बात को लेकर गहरी आपत्ति है क्योंकि वो साहित्य को बाजार के फार्मूले से देखने के खिलाफ हैं जबकि मेरी मान्यता है कि-
साहित्य को महान कहने के पहले अगर हम छपने-छपाने की राजनीति को समझ लें, तो हमें ये महान और अलग लगने के बजाय सांस्कृतिक उत्पाद से अलग कोई दूसरी चीज़ नहीं लगेगी। आप भी पढ़ें औऱ अपनी राय दें-


‘हमारे प्रिय रचानाकार’, ‘हमारे प्रिय कवि’, ‘हमारे प्रिय कथाकार’ जैसे शीर्षक से निबंध लिख-लिख कर हिंदी पट्टी का जो समाज स्कूली परीक्षा पास करता आया है, आज उसी समाज से आये हुए रंगनाथजी आउटलुक के साहित्यकार सर्वे पर सवालिया निशान खड़े करने में जुटे हैं। उनका विरोध जितना स्वाभाविक है, उतना ही अनिवार्य भी। स्कूली जीवन में जब ये समझ और साहस पैदा न कर सके कि वो मास्टर या परीक्षा बोर्ड के आगे जवाब तलब कर सकें कि ऐसा क्यों लिखें हम? अगर प्रेमचंद हमें सबसे ज़्यादा पसंद हैं तो इस निबंध में ये लिखने की कहां गुंजाइश बची रह जाती है कि रेणु भी मुझे उतने ही पसंद हैं। मुक्तिबोध अगर मेरे सबसे प्रिय कवि हैं, तो फिर इससे ये कैसे साबित करें कि नागार्जुन हमें उतने ही पसंद हैं। जाहिर है, उस समय चाहे रंगनाथजी हों या फिर देश का कोई और स्कूली बच्चा, नंबर पाने के आगे न तो उसका विरोध करेगा और न ही इतनी समझ बना पाएगा कि इस तरह के शीर्षक पर निबंध लिखने से हम बाकी के रचनाकारों के साथ क्या कर रहे होतें हैं। उस समय तो एक ऐसे फार्मूले और शब्दों के फेर में होते हैं कि चाहे किसी पर भी निबंध आ जाए, प्रेमचंद को रिप्लेस करो और वहां जैनेंद्र को लगा दो, अज्ञेय को हटाओ और रघुवीर सहाय को फिट कर दो। करनेवाले तो इस फार्मूले से यूजीसी की परीक्षा तक पास कर जाते हैं, हम फिलहाल इस बात पर बहस नहीं करना चाह रहे और न ही रंगनाथजी से इस बात पर हील-हुज्‍जत करना चाहेंगे कि वो स्कूली शिक्षा से अलग सोच क्यों रखते हैं? हां, इतना तो ज़रूर जानना चाहेंगे और अपने स्तर पर अनुमान लगाना चाहेंगे कि सर्वे के विरोध में खड़ा होने का उन्हें ज्ञान कहां से मिला और उन्हें क्यों लगता है कि साहित्यकारों को लेकर इस तरह का सर्वे वाहियात काम है?

यहां कुछ आगे कहने के पहले साफ कर दूं कि हिंदीवाला कहने का मतलब या हिंदी पढ़नेवाला से आशय सिर्फ उनलोगों से नहीं है, जो रचनाओं को पढ़ते हुए पचपन प्रतिशत लाने के मोहताज रहते हैं। जिनके लिए साहित्यिक रचनाओं और उनकी पंक्तियों से इतना भर का नाता है कि दसों साल से पूछे जा रहे सवालों के हिसाब से किस लाइन को निकाल कर किस सवाल के आगे भिड़ाना है, संदर्भ के लिए उपयोग में लाना है, उदाहरण देने हैं, कुल मिलाकर हलाल मीट या झटका मीट तैयार करने की विधि अपनानी है। यहां हिंदीवाला से आशय उन तमाम लोगों से है, जो इसमें दिलचस्पी रखते हैं, चाहे वो मांगकर, चाहे वो खरीदकर या फिर समीक्षा के नाम पर पुस्तकें लेकर पढ़ते हैं। ये सारे लोग हिंदीवालों में शामिल हैं।
अब बात आउटलुक की ओर से किये जा रहे साहित्यकार सर्वे और उस पर की जा रही असहमति पर करें।

रंगनाथजी का मानना है कि आउटलुक वालों को यह तो पता होना ही चाहिए कि टॉप तीन का फंडा सिर्फ उन्हीं चीज़ों पर लागू होता है, जो बाज़ारू हैं। यानी जो बेचने के लिए ही तैयार की जाती हैं। साहित्य की दुनिया तो ग़ालिब के उसूलों से चलती है-

न सताइश की तमन्ना न सिले की परवाह
नहीं मानी मेरे अशआर में नहीं न सही

रंगनाथजी की बात से अब आप समझ रहे होंगे कि वो इस सर्वे का विरोध क्यों कर रहे हैं। इसलिए कि इस तरह के सर्वे साहित्य जैसी विधा, मनुष्य की महान उपलब्धि को बाज़ार में घसीट लाने की प्रक्रिया है। बाज़ार में आते ही चीज़ें अपना महत्व खो देती हैं, उसकी तासीर ख़त्म हो जाती है। इसलिए ज़रूरी है कि साहित्य को बाज़ार से अलग रखा जाए। साहित्य लिखने-पढ़नेवालों की ये नैतिक जिम्मेदारी है कि वो साहित्य को बाज़ार में, उसकी शर्तों पर बिकने और अपनाने से रोका जाए और जो कोई ऐसा करता है, उसके प्रतिरोध में अपनी आवाज़ उठायी जाए। ऐसा बचाव हमें उसी तरह से करना चाहिए जैसे एक ज़माने में घर की किसी भी स्त्री के घर से बाहर जाने पर भ्रष्ट हो जाने, परपुरुषों से बात कर लेने पर बदचलन हो जाने के डर से करते रहे। जिन लोगों को ऐसा डर अभी भी बना हुआ है, वो इस तरह के बचाव कार्य में जी-जान से जुटे हैं। हमें साहित्य को हर हाल में शुचिता की सीकचों के बीच सुरक्षित रखना है, किसी हाल में बाज़ार की छाया इस पर नहीं पड़नी चाहिए।
साहित्य को लेकर जो समझ रंगनाथजी की बनी है, वो कोई नयी समझ नहीं है। आप हिंदी से जुड़ी किसी भी रचना को उठा कर देख लीजिए, उसमें बाज़ार के खिलाफ खड़े होने की बात अनिवार्य तौर पर मिल जाएगी। इसलिए अगर ये कहा जाए कि रंगनाथजी साहित्य के सच्चे पाठक और रक्षक हैं, तो मुझे नहीं लगता कि उन्हें कोई आपत्ति होगी। साहित्य पढ़ने का मतलब ही है कि आप बाज़ार के विरोध में खड़े हों, उन तमाम हरक़तों और ताक़तों के विरोध में खड़े हों जो कि साहित्य को बाज़ार के बीच ला पटकने के लिए आमादा हैं। जिस साहित्य को लोकमंगल की भावना से लिखा-पढ़ा जाता रहा, अगर वो लालाओं की जेब को गर्म करने लग गया है, तो हमें उसका हर हाल में विरोध किया जाना चाहिए। यहां तक हम रंगनाथजी के साथ हैं। लेकिन…
माफ कीजिएगा, हम चाहकर भी रंगनाथजी की मासूमियत पर फिदा होना नहीं चाहेंगे। गालिब का शेर ठोंक कर उन्होंने साहित्य का जो मान बढ़ाया है, हम उसके आगे कुछ बोलना नहीं चाहेंगे। बल्कि हम इससे अलग सिर्फ इतना भर जानना चाहेंगे कि वो किस साहित्य के लिए इस तरह के भारी-भरकम वैल्यू लोडेड शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उस साहित्य के लिए, जिसकी पांच सौ प्रति छाप कर (ये मुहावरा दिलीप मंडल का है), कुछ प्रति आलोचकों के हाथों मुफ्त बांटने और बाकी रैकेट के तहत लाइब्रेरियों में पहुंचाने के बाद चंद अख़बारों और पत्रिकाओं में हुआं-हुआं करके महान साबित करने का कर्मकांड पूरा किया जाता है। कहीं उस साहित्य के लिए तो नहीं, जिसे कि ठोस तौर पर पॉपुलर होने, एक ही झटके में बिकने और रातोंरात कुछ बटोर लेने की नीयत से लिखे जाते हैं? अगर ऐसा है, तो यक़ीन मानिए रंगनाथजी ने गालिब के शेर का अपमान किया है, उसका मान किसी भी हद तक बढ़ाने का काम नहीं किया है और इस साहित्य को बाज़ार क्या, सर्वे क्या, किसी भी शर्त पर परखने का काम किया जाए, मुझे कहीं से कोई आपत्ति नहीं होगी। ऐसे में कहीं कोई एक कहानी, कविता छपवा कर अकड़ जाता हो, अपने को गुलेरी की पांत में खड़ा करके नामवर और अशोक वाजपेयी को गरियाता है, तो ज़रूरी है कि उनलोगों की औकात बताने के लिए ऐसा सर्वे एक नहीं, एक पत्रिका की ओर से नहीं, कई और कई पत्रिकाओं और संस्थानों की ओर से किया जाने चाहिए।
रही बात साहित्यकारों को सूची में शामिल किये जाने की, तो अगर व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो किसी ने कुछ लिख कर क्रांति मचा देने का काम नहीं किया है। अपवादों में न जाएं, तो इन साहित्यकारों के लिखते रहने से हिंदी लेखन परंपरा भले ही मज़बूत हुई हो, लेकिन सामाजिक स्तर पर कहीं कोई रद्दोबदल का काम नहीं हुआ है और न ही उन्‍होंने उसके लिए आगे आने का काम किया है। इसलिए हमें साहित्य की परंपरा से इन साहित्यकारों को जोड़ने के पहले खास खयाल रखना होगा कि हम क्या करने जा रहे हैं। रंगनाथजी का मैं ज़ोरदार समर्थन करता हूं कि किसी के फूले हुए पेट को बॉडी, तो किसी की फूली हुई टांग को बॉडी और किसी के फूले हुए हाथ को बॉडी मानने का जो ग़ैरबराबरी का काम गीताश्री ने किया है, वो काम हमें नहीं करना चाहिए। लेकिन रंगनाथजी आपको भी इन सूचीबद्ध साहित्यकारों को हिंदी की पूरी परंपरा में शामिल करने के पहले ये सोचना होगा कि हम किस आधार पर उन्हें शामिल करने जा रहे हैं।

कोई माने या न माने, लेकिन ये सच है कि आज का साहित्यकार अपने रोज़मर्रा के जीवन में नून, तेल, मर्चा का सामान इसी बाज़ार में रहकर खरीद रहा है, खरीदने की ताक़त वो इसी बाज़ार में रहकर पैदा कर रहा है। एक बार नाम हो जाने पर (नाम होने का स्तर चाहे जो भी हो) इसी बाज़ार में बेमन से लिखे गये, कुछ भी लिखी, कही गयी चीज़ों को, एक ही चीज़ को कई लेबलों से छपवाने और बेचने का काम कर रहा है, जिसे कि नाम ले-लेकर दरियागंज में भटकनेवाले लोग बखूबी जानते हैं। ऐसे में उन पर बाज़ार की शर्तें लागू नहीं होनी चाहिए, उन्हें बाज़ार में खड़े होकर नहीं देखना चाहिए तो फिर क्या उस पर महान साहित्य होने का लेबल चस्पाना चाहिए। दरअसल साहित्य को बाज़ार की किसी भी चीज़ से अलग करके देखने की पूरी कवायद ही बेमानी है। अगर कोई लेखक अपनी बिकनेवाली प्रति के बारे में नहीं जानता, तो इसका मतलब ये नहीं कि वो साधु प्रवृत्त‍ि का है, बल्कि वो प्रकाशक के शोषण का शिकार हुआ है। वो दुनिया से लड़ते हुए भी प्रकाशक के विरोध में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है। साहित्य और साहित्यकारों को महान होने और कहने के पहले अगर हम छपने-छपाने की राजनीति को समझ लें, तो हमें ये साहित्य महान और अलग लगने के बजाय सांस्कृतिक उत्पाद से अलग कोई दूसरी चीज़ कभी नहीं लगेगी। हां इतना जरुर होगा कि इसका असर कार या जूते से अलग होगा, जिसे कि वाल्टर बेंजामिन ने विस्तार से समझाया है।
रंगनाथजी ने सरस सलिल और गुलशन नंदा को साहित्यिक पत्रिकाओं और साहित्यकारों के बीच घुसा कर एक बहुत ही चमकीला उदाहरण पेश किया है। ये काम भी उनका कोई नया प्रयोग नहीं है। यूनिवर्सिटी में मनोहर श्याम जोशी की तारीफ करने के बाद शिक्षकों से लताड़ सुनने के दौरान ऐसी मानसिकता को पहले ही समझ चुका हूं। हिंदी में जो लोकप्रिय है, जो ज़्यादा बिकाऊ है, उसे हिंदी के लोग घटिया साबित करने में दम लगा देते हैं। हिंदी में महान होने की पहली शर्त है दुर्लभ होना, गूढ़ होना, किसी के रेफरंस से महान बताया जाना। शुक्र कीजिए कि प्रेमचंद इस मानसिकता से काफी हद तक बच गये। ऊपरी तौर पर रंगनाथजी का ये उदाहरण बहुत ही सटीक लगता है कि सही में अगर ज़्यादा ही बिकना आधार है तो फिर गुलशन नंदा महान क्यों नहीं, सरस सलिल सबसे बेहतर पत्रिका क्यों नहीं। ऐसा करके वो सर्वे करानेवाली पत्रिका की ओछी समझ की तरफ इशारा कर रहे हैं। लेकिन मेरा अपना अनुभव है कि पढ़े-लिखे लोग क्या, दरियगंज में संडे मार्केट में भी हरेक माल 20 रुपये के तहत किताब बेचनेवाला बहुत ही कम पढ़ा-लिखा बंदा जानता है कि किस किताब की क्या औकात है। इसलिए बीस रुपये की किताब के बगल में ही पड़ी दि पार्शियल वूमेन पर हाथ लगाएंगे तो उसे अस्सी रुपये बताएगा। कहने का सिर्फ इतना ही मतलब है कि बाज़ार में आने के बाद ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि चीजें अपना महत्व खो देती है। जिस सरकाय लो खटिया जाड़ा लगे की सीडी मोजरवियर 30 रुपये में दे देता है, उसी मोजरवियर से आनेवाली गुलज़ार की सीडी के लिए 190 रुपये क्यों देने पड़ते हैं, इसे अगर आप समझ रहे हैं तो आपको रंगनाथजी का ये उदाहरण बकवास लगेगा।
कहानी सिर्फ इतनी भर है कि सब कुछ बाज़ार के दबाव के तहत खरीदने, पढ़ने और उस पर सोचनेवाले हम जैसे लाखों लोग अब साहित्य और पत्रकारिता में महान, लोकमंगल, जनहित जैसे लबादों के भीतर रहकर जीने से ऊब गए हैं। हमें बेचैनी होती है कि हमसे सारी चीज़ें बाज़ार के तहत लिया-वसूला जा रहा है और ज़बरदस्ती लोकहित और महान होने का पाखंड किया जा रहा है। साहित्य को बाबा रामदेव का योग मत साबित कीजिए, जहां दाम लेकर सांस लेने और छोड़ने की विधि बतायी जाती हो। और अगर ऐसा करते हैं, तो हमें और हमारी पीढ़ी को इसकी जानकारी होनी चाहिए। हमें और हमारी आनेवाली पीढ़ी को पता होना चाहिए कि जिस साहित्य को पढ़ कर हम संवेदनशील होते हैं, भावुक होते हैं, इसे महसूस करने के लिए हमें पैसे देने पड़े हैं, हमें इसकी उपयोगिता पर सवाल करने का हक़ है। हां, अब इस पर बात कीजिए कि कौन कितनी ईमानदारी से हमें भावुक, संवेदनशील और रस का आस्वाद करनेवाला बना पाया है।

…अंत में इतना ज़रूर कहूंगा, बल्कि रंगनाथजी की ही बात को दोहराना चाहूंगा कि सर्वे का आधार ग़लत है, उसकी सूची गड़बड़ हो सकती है और है। रंगनाथजी तो इस सिस्टम को ही उखाड़ फेंकने के पक्ष में हैं जबकि मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि आगे जब भी इस तरह के सर्वे किये हों, तो उसे और दुरुस्त, परफेक्ट और तर्कसंगत तरीके से किया जाए। आधा बाज़ार और आधा समाज का कॉकटेल (भले ही वो संकोच या डर से हो) बनाने के बजाय उसी तरह की पद्धति अपनाएं, जिस तरह की पद्धति मार्केटिंग के लोग अपनाते हैं। यक़ीन मानिए, इससे साहित्यकारों के बीच अवसाद पैदा होने के बजाय प्रोफेशनलिज़्म आएगा, जो कि ज़बरदस्ती की मठाधीशी से कई गुना अच्छा है.

मोहल्लाlive पर प्रकाशित
| | edit post

धीरे-धीरे,एक-एक करके सब कटते चले गए। जिनलोगों को दिनभर में पांच बार कभी कैंची,कभी फैबीकोल,कभी मूव और कभी फिल्मों की सीडी जैसी छोटी-मोटी चीजों की जरुरत होती,अब उन्होंने मुझे छोड़ किसी और को विकल्प के तौर पर चुन लिया है। उन्हें जैसे ही इस बात की जानकारी हुई कि मुझे पिछले पांच दिनों से बुखार है,छींकें आती हैं,रह-रहकर खांसी भी उठ जाती है यानी वो सबकुछ होता है जिसे दिखा-बताकर मरा-गिरा चैनल भी इन दिनों अपनी सेहत दुरुस्त करने में जुटा है,वो हमसे किनाराकशी करते चले गए। जाहिर सी बात है कि इतनी छोटी-मोटी चीजों के लिए वो अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहते। मुझे कुछ हो गया,मर-मुरा गए तो फिर भी ब्लॉगर-पत्रकार भाइयों के सहयोग से एक छोटी ही किन्तु शोक-सभा हो जाएगी,लोग मुझे याद भी करेंगे लेकिन बाकियों का क्या होगा जिसे कि कैंपस में ही दस आदमी भी ठीक से नहीं पहचानता। मजाक में ही सही,लेकिन उस बंदे ने बात तो सही ही कही,इसलिए बाकियों को हमसे दूर रहने और अधिक जीने और कुछ नाम-शोहरत कमाने का पूरा हक है।

जो कल तक हमारे संडे फ्रूट के उपर का ड्राइ फ्रूट छांट-छांटकर खाते रहे,चलिए डॉक्टर साहब आपको कमलानगर में कन्टाप-कन्टाप माल दिखाकर लाते हैं,मोमोज खिला लाते हैं,पटेल चेस्ट से घूमकर आते हैं,आज वो फोन से हाल जानना चाहते हैं-कहिए कैसे हैं। मेरी मिरमिरायी आवाज पर ठहाके लगाते हैं,अरे आपको कुछ नहीं हुआ है-आपको दू-चार दिन लेडिस-उडिस का साथ मिल जाएगा तो दुइए मिनट में टनमना जाइएगा। मेरा दोस्त देवघर में परेशान है,मैं फोन नहीं उठा पाता हूं। वो बताते हैं कि अभी डॉक्टर से अंदर दिखवा रहे हैं,कुछ खास नहीं हुआ है,बस ओही बीमारी..जिसका एक ही इलाज है...हा हा हा..आप तो सब जानवे करते हैं। धीरे-धीरे फोन भी आने बंद हो जाते हैं। रोग-बीमारी तो होता ही रहता है,आदमी कितना फोन करे,आखिर अपनी भी तो लाइफ है न।
ये हम जैसों का हाल है जिसे कि सरकार की ओर से लगभग सारी सुविधाएं प्राप्त है। आजतक के रिपोर्टर अमित चौधरी ने जब कहा कि दिल्ली के कई ऐसे परिवार हैं जो कि एक ही कमरे में गुजारा करते हैं,सरकार को चाहिए कि किसी एक के बीमार हो जाने पर बाकी लोगों के रहने का इंतजाम करें। क्या ये सवाल सिर्फ जगह मुहैय्या कराने भर का है या फिर कन्शसनेस के नाम पर अलग-थलग होने,पड़ जाने,कर दिए जाने या फिर बीमारी के बहाने कई चीजों के चटक जाने का है।

कमरे में अकेले पड़ा-पड़ा मैं कई चीजें याद करता हूं,एक साथ। बीमारी हमें फ्लैशबैक में जाने का भरपूर मौका देती है,बीती हुई जिंदगी को याद करने का मौका। इसे याद करना,एक-एक क्षणों को खोल-खोलकर याद करते हुए दुहराना कुछ-कुछ वैसा ही लगता है जैसे आप घर से आयी चीजों को एक-एक करके खोलते हैं। ऐसे समय में एल्बम देखना अच्छा लगता है। एक-एक सर्टिफिकेट को देखना अच्छा लगता है,आर्चिज औऱ हॉलमार्क के उन कार्डों को देखना अच्छा लगता है जिसके बारे में सोचते हुए आफ सिहर जाते हैं कि अगर इसे कभी होनेवाली पत्नी देख लेगी तो।..फिर आप जमाने को गाली देते हुए कहते है...चुतिए स्साले। क्या है ऐसा इसमें,किसी ने प्यार से दिया है तो इसमें दिक्कत क्या है,आप अपनी ही पीठ ठोकते हुए कहते हैं-होने दो शादी,सारे कार्ड दिखाउंगा,एक ही रजाई में दोनों प्राणी पैर डालकर साथ देखें और पढेंगे इन कार्डों को। पत्नी हम पर शक करने के बजाए उन लड़कियों पर हंसेगी,सो स्वीट। किसी कार्ड पर ठहाके लगाएगी..मेरी इच्छाओं की प्रतिध्वनि..ओह माइ गॉड,ये हिन्दीवाली भी न।..हम फुलकर कुप्पा हो जाते हैं,ऐसा सोचते हुए कि मेरी पत्नी कितनी ब्रॉडमाइंडेड होगी।
मां याद आती है,ऐसे समय में अक्सर। बीमारी के वक्त मां जब भी याद आती है तो बस एक ही मुद्रा में। ट्वायलेट के आगे रुपाली स्याही की खाली बोतल से बनी ढिबरी लिए मां। देर होने पर अधखुले दरवाजे होने पर भी कोई आवाज न आने पर घबराकर आवाज लगाती मां। वो सारी लड़कियां जिसने कभी भी हमें छुआ हो,अपनी सीट पर काम करते रहने की स्थिति में पीछे से कंधा दबाने वाली लड़की,जिससे ये कहने पर कि बहुत अच्छा लगता है,थोड़ा देर और दबाओ न,बिदककर कहनेवाली लड़की-शक्ल देखी है आइने में। बॉस के बार-बार कहने पर कि कितना क्यूट है-सीढ़ी पर एकांत में मेरी क्यूटनेस को महसूस करनेवाली लड़की। जाने दोगी कि नहीं,वो कहती-नहीं जाने दूंगी। लाचार होकर मैं कहता-अगर नहीं जाने दोगी तो मैं कुछ कर दूंगा। तभी वो कहती-सो क्यूट,क्या कर दोगे। उसी वक्त वो लड़कियां भी याद आती जिससे एक बार हाथभर छू जाए तो पता नहीं घर जाकर कितनी बार मेडिमिक्स से हाथ धोती होंगी। बीमारी के वक्त एक-एक करके सब याद आते हैं।
जिन्हें नहीं पता कि मैं बीमार हूं,वो अपने काम से फोन करते हैं। जैसा कि इंसान औपचारिक होने की स्थिति में कहता है-औऱ कैसे हो। मैं कहता हूं-बीमार हूं। किसी चीज की जरुरत हो,तुरंत बताना। ये बात उन्हें भी पता है कि हमें किस चीज की जरुरत होगी,जो भी बीमार हुआ है वो मेरी आज की पोस्ट की शैली पढ़कर समझ सकता है ऐसे में किसी को क्या चाहिए होता है। उस फेज से हम बाहर आ गए हैं,जब 200-500 रुपये के चलते सर्दी,खांसी,बुखार जैसी बीमारियों को लेकर बैठे हुए हैं।..तो फिर क्या चाहिए हमें। इसी बीच मुंबई से अजय ब्रह्मात्मज सर लगातार फोन करते हैं-कैसी है तबीयत,सुनो शहद के साथ हल्दी मिलाकर चाटा करो,इधर-उधर की बातें करके फिर फोन रख देते हैं। तीन घंटे बाद फिर फोन करते हैं- अरे सुनिए तो,गरम पानी नियमित चाय की तरह पिया कीजिए,आराम मिलेगा। फिर अगले दिन,आप बैचलर हैं,सांड की तरह रहा कीजिए,फिर गृहस्थी में तो फंसना ही है। मैं हंसने की कोशिश करता हूं,खांसी उठती है-सर,मत हंसाइए प्लीज। मुझे अच्छा लगता है।

मैं दो-चार दिनों में ठीक हो जाउंगा,तय है क्योंकि मौत आनेवाली बीमारी का आभास अलग तरीके का होता है लेकिन वाद-विवाद प्रतियोगिता में अक्सर बोला जानेवाला शेर मुझे अब कुछ इस तरह से याद आता है-
बस एक ही स्वाइन फ्लू काफी है,
बर्बाद हर रिश्ते के करने को
हर साल जो एक फ्लू आता है
अंजाम-ए-रिश्ता क्या होगा।

वैसे सच कहूं,हम जैसे लोगों को जो कि अक्सर गुमान होता है कि हमें दिल्ली में जाननेवाले लोग इतने हैं,ये मेरा सोशल कैपिटल है,हम फुलकर बारा हुए रहते हैं,जरुरी है कि कभी-कभी ऐसी बीमारी होती रहनी चाहिए ताकि हम अपने संबंधों के अकाउंट्स की ऑडिटिंग बेहतर तरीके से करते रह सकें। अब देखिए न,इतना बड़ा शहर,इतने लोग लेकिन सब...कोई दिक्कत हो तो बताना शैली में जीनेवाले लोग। कल को फिर कहने वाले लोग...हद करते हो यार,इतने दिनों तक बीमार रह गए और एक फोन तक नहीं किया,इट्स नॉ फेयर।...नो..नेवर
| | edit post

हंस की संगोष्ठी में नामवर सिंह के सावधान रहो इन लौंडों से कहे जाने के बाद मेरे सहित कई लोगों को इस बात से हैरानी हुई कि हमारे आलोचक का जिगर औऱ नजरिया इतना छोटा कैसे हो गया? अजय नावरिया औऱ राजेन्द्र यादव के लिए अपने-अपने राहुल जैसे मुहावरे का प्रयोग करने की जरुरत क्यों पड़ गयी? मोहल्लाlive पर ऐवाने-ग़ालिब में नामवर सिंह को हो क्‍या गया था? लिखे जाने के बाद रंगनाथ सिंह ने मेरे उपर राजेन्द्र यादव का आदमी औऱ हंस के इनहाउस लोगों की जुबान बोलने का लेबल लगाने में तत्परता दिखायी। जिस व्यक्तिवाद के प्रतिरोध में हमने बात करनी शुरु की,हम खुद ही कैसे इसके शिकार होते चले गए,आप भी पढ़ें और राय दें कि क्या हिन्दी मानसिकता कुछ इसी तरह की है कि तालाब पर विमर्श के लिए जुटनेवाले लोग अंत में अपने-अपने हिस्से का कुआं घेरने में लग जाते हैं।

रंगनाथ भाई
इतनी गंभीरता से पोस्ट पढ़ने के लिए शुक्रिया। मुझे इस बात की आशंका लिखने के पहले से ही थी कि हंस की संगोष्ठी में जो कुछ भी हुआ और नामवर सिंह ने जो बातें हमलोगों के सामने रखीं, अगर मैं उससे असहमत होते हुए कुछ लिखता हूं, तो लोग (जिसमें कि अब आप शामिल हैं) मेरे ऊपर हंस और राजेंद्र यादव का आदमी होने का लेबल लगा देंगे। इन सबके बावजूद मैंने इस पर लिखा, क्योंकि मुझे पता है कि इस तरह के स्टीगर हवा और पानी के संपर्क में आते ही बहुत जल्द ही उखड़ जाते हैं।

मुझे बहुत अफ़सोस नहीं है कि मैं अपनी बात जिस संदर्भ में करना चाह रहा हूं, आपने उससे ठीक उलट अर्थ लिया बल्कि लिया ही नहीं, अर्थ ही थोप डाला जिसे कि अरुंधति राय रिप्लेसिंग द मीनिंग ऑफ द वर्ड कह रही थीं। इसमें आपका कोई दोष भी नहीं है क्योंकि जिस परिवेश और औजार से हम निर्मित हुए, साहित्य की समझ जिस ढंग से हमारी बनी है, उसमें व्यापक संदर्भ के आते ही हम घबरा जाते हैं। हमारे हाथ में अभी तक तोड़ती पत्थर वाली साइज़ की छेनी और हथौड़ा है जबकि अब हमें आये दिन पहाड़ों से टकराना पड़ जाता है और हम तब निरस्त हो जाते हैं। कहने को तो हमारी साहित्यिक समझ और बौद्धिकता का विकास प्रकृति, मानवीय संवेदना और दुनिया के तमाम विचारों को लेने से हुआ है, जिसका कि कैनवास बहुत बड़ा है लेकिन सच्चाई ये है कि हम एक बड़े जंगल में एक ऐसा मचान बना कर रह रहे हैं, जहां कुछ ही लोग उस पर बैठे हैं, दिन-रात गप्प-शप करते हैं, हुक्का-सुक्का पीते हैं और बीहड़ जंगल में रहने के महानताबोध से अकड़े रहते हैं। दुनिया को बताते फिरते हैं कि हम जंगल में रहते हैं और कितना रिस्क कवर करते हैं। जबकि मेरी तरह इतना तो आप भी जानते होंगे कि जिस सेफ ज़ोन में रहकर हिंदी के हम जैसे अधिकांश लोग काम कर रहे हैं, वो खुशफहमी के अलावा कुछ भी नहीं है। हमने प्रकृति, जंगल और मानवीय संवेदना से भरे साहित्य के इस बड़े कैनवास को कितना छोटा कर लिया है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि नामवर सिंह को बोले चार दिन हो गये और अभी तक हम उसी को पकड़ कर बैठे हैं। ऐसा लगता है जैसे सचमुच हमारे पास कोई दूसरा काम नहीं है।

मुंबई और नोएडा फिल्म सिटी में काम करनेवाले मेरे दोस्त मेरी इस हालत पर अब हंस रहे हैं। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि साहित्यिक बहसें करने और रचने के नाम पर साहित्य का एक बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत स्तर की लल्लो-चप्पो और हील-हुज्‍ज़तों में जाया कर दिया गया है, जिसका कि एक समय के बाद कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इस नजरिए से अगर हम साहित्य को देखना शुरू करें, तो हमें अफ़सोस भी होगा।

कहने को तो साहित्य की इतनी बड़ी दुनिया, जिसमें इंद्रसभा से लेकर अमेरिका का साम्राज्यवाद तक समा जाए, लेकिन सच्चाई देखिए। महज दो सौ से ढाई सौ चेहरों के बीच पूरा का पूरा हिंदी साहित्य सिमट कर रह गया है। हम इन्हीं लोगों की बातों और गतिविधियों के बीच फंसे रह जाते हैं। इसमें बिडंबना है कि इतनी बड़ी दुनिया होने पर भी हम छत्तीसगढ़ के भीतर घुस नहीं पाते, जाकर कुछ लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। दिल्ली में बैठ कर चार दिन तक नामवर सिंह के पक्ष-विपक्ष में कबड्डी खेलना पसंद करते हैं लेकिन भोपाल, पटना में मर रहे किसी रचनाकर्मी को देख आने का जज्बा पैदा नहीं कर पाते। अपनी पोस्ट में मैं यही तो बताना चाह रहा था कि साहित्य के नाम पर हम कितने व्यक्तिवादी हो जाते हैं। नामवर सिंह जैसा आलोचक युवा का मतलब राहुल का मुहावरा इस्तेमाल किये बिना समझ नहीं पाते और युवा रचनाकार का मतलब सिर्फ अजय नावरिया से लगा लेते हैं। मैं अपनी उसी मानसिकता पर तो बात कर रहा था, जहां हिंदी समाज एक बड़े संदर्भ को कैसे संकुचित करता जाता है। अरुंधति राय ने भाषा के सवाल पर जो बात कही, उसकी चर्चा न करते हुए हम आलोचक नामवर सिंह की चुटकुलेबाज़ी में फंस कर रह जाते हैं क्योंकि उसमें हमारी व्यक्तिगत स्तर पर की जानेवाली चुगली का सार्वजनिक रूप दिखायी दे रहा था, हमें मज़ा आ रहा था। क्या हम साहित्य पढ़ते हुए चुगलखोर होते चले जाते हैं।

रंगनाथ भाई, विश्वविद्यालय सहित अब तक मैंने लिखने-पढ़ने के स्तर पर जितना भी समय बिताया है, उस आधार पर इतनी समझदारी तो बन ही गयी है कि हिंदी समाज में जीने-खाने और बने रहने के लिए आपको अपनी पीठ पर किसी न किसी का तो लेबल लगाना ही होगा। बहुत लंबे समय तक आपकी पीठ कोरी नहीं रह जाएगी। मेरी पीठ अब तक कोरी है, तो इसका मतलब कतई नहीं है कि मैं कोई महान किस्म का लिटरेचर प्रैक्टिसनर हूं। बल्कि सच बात तो ये है कि अब तक मैंने इसकी शिद्दत से ज़रूरत महसूस नहीं की है। जिस दिन करूंगा, उस दिन ज़रूर लगा लूंगा। इस बीच आप जैसे लोगों से बातचीत होती रही, तो ज़रूरत पड़ने पर आपसे राय भी लूंगा। लेकिन क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं कि मेरे ऊपर राजेंद्र यादव और हंस से जुड़े लोगों का लेबल लगाने का अधिकार किसने दिया। क्या साहित्य में हम इश्तहारों, लेबलों, स्टीकरों से अटी-पड़ी पीठ देखने के इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि हमें कोरी पीठ आंखों में चुभने लग जाती है।

क्या नामवर सिंह या फिर किसी भी दूसरे आलोचक की बात से असहमत होने के लिए हंस, राजेंद्र यादव या किसी दूसरे संस्थान और व्यक्ति का लेबल लगाना अनिवार्य है। बिना इसके हम अपनी बात नहीं कर सकते और अगर सचमुच नहीं कर सकते जिसकी घोषणा आपने अपनी पोस्ट में सरोगेट रूप में कर दी है तो क्या हमें इसके विरोध में कुछ काम नहीं करने चाहिए। बजाय इसके कि हम एक पोस्टर के लगने और दूसरे पोस्टर के उखड़ने का इंतज़ार करते रहें और हम अपनी इसी भूमिका को साहित्यिक भूमिका मान कर बौद्धिक होने और कहलाने का क्लेम करने लग जाएं, जैसा कि अधिकांश लोग करते आये हैं। आज आपको सुविधा हो गयी कि मैंने नामवर सिंह से असहमति जतायी नहीं कि दूसरी तरफ मेरी पीठ पर राजेंद्र यादव का लेबल चिपकाने के लिए मौक़ा मिल गया। संभव हो ये सुविधा आपको हमेशा मिलती रहे, क्योंकि कोई न कोई तो आयोजक होगा और जब हमें असहमति होगी, मैं लिखूंगा ही। इस हिसाब से आपको भविष्य में भी मुझे संघी, व्यक्तिवादी, कुंठित, फ्रस्ट्रेड और भी बहुत तरह के लेबल लगाने को मिल जाएंगे। लेकिन एक स्थिति ऐसी भी बनती है कि जब नामवर सिंह एक ऐसी किताब पर बोलने आते हैं, जिसे कि उन्होंने पढ़ा ही नहीं है। केवल इतनी-सी जानकारी के आधार पर 25 मिनट तक उस पर बोल जाते हैं कि इस किताब को दिल्ली की झुग्गियों में रहनेवाले अंडर मैट्रिकुलेशन के बच्चों ने मिल कर लिखी है। नामवर सिंह को किताब के शीर्षक पर आपत्ति होती है, उन्हें ये नाम धुंधला-धुंधला सा-नज़र आता है। आलोचक फिर भाषा पर बात करते हैं, इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कि इसे किस बैग्ग्राउंड के बच्चों ने कितनी शिद्दत से लिखा है। मैंने लोकार्पण के पांच घंटे बाद ही दीवान (सराय, सीएसडीएस के मेलिंग ग्रुप) पर लिखा, नामवर सिंह से घोर असहमति। बच्चे एक बुजुर्ग के मुख से भाषा-वाषा पर गंभीर बात सुनकर अवाक हो गये थे। रंगनाथ भाई, मैंने उस समय भी नामवर सिंह के रवैय पर असहमति जतायी। बताइए, आप होते तो कौन सा लेबल लगाते। ये भी संभव है कि हवा-पानी से ये लेबल और स्टीगर उखड़ते चले जाएं और आप नया लगाते चले जाएं। आप बिल्कुल नहीं थकें। लेकिन मैं आपसे अपील करता हूं कि प्लीज़ आप मेरी पीठ को एमसीडी की दीवार मत बनाइए। ऐसा करना आपके लिए जितना सुविधाजनक है, मेरे लिए उतनी ही तक़लीफ़देह और शायद हिंदी के नाम पर होनेवाले विमर्श के लिए ख़तरनाक भी।

देखिए न, ये कितनी बड़ी विडंबना है कि हममें से दोनों लोग व्यक्तिवाद के विरोध में लिख रहे होते हैं। हमें नामवर सिंह में व्यक्तिवाद की भनक लगी और आपको हंस में बोलनेवाले कुछ लोगों में। लेकिन अब जब हम लिख रहे हैं तो आप अपनी चिठ्ठी के लगभग हर पैरे में विनीत और विनीत कुमार लिख रहे हैं और मैं रंगनाथ भाई, रंगनाथ भाई किये जा रहा हूं। इससे अधिक और व्यक्तिवादी कैसे हुआ जा सकता है? हम क्यों साहित्य जैसे तालाब पर विमर्श के लिए जुटते हैं और अंत तक आते-आते उसमें मौजूद पानी, उसकी सड़ांध और पलनेवाले लोगों के बारे में बात करने के बजाय अपने-अपने हिस्से का कुंआ घेरने में लग जाते हैं। क्या हम इस बात की गुंजाइश पैदा नहीं कर सकते कि हम बेबाक तरीके से अपनी बात रख सकें, मेरी पीठ कोरी रह जाए और आपको बार-बार स्टीगर चिपकाने से मुक्ति मिल जाए। मुश्किल तो है लेकिन कोशिश करने में क्या हर्ज है।

बहुत हो गया। जिस तरह से अपन लोग बात कर रहे हैं, ये बहुत ही पर्सनल मामला बनता जा रहा है। इसे पढ़नेवाले जो लोग हमें जानते हैं, वो ज़रूर गरिआएंगे – स्साला, यहां दिखाने के लिए एक दूसरे पर पिल पड़े हैं जबकि मंडी हाउस में एक-दूसरे के पैसे से समोसे खाने के लिए खींचतान करेंगे। ये इनहाउस विज्ञापन हो जाएगा रंगनाथ भाई, कोशिश करते हैं कि हम औरों की तरह इससे बचें और अपना नाम चमकाने के बजाय मुद्दों को व्यापक और सही संदर्भ में समझें… है कि नहीं।
मोहल्लाlive पर प्रकाशित
| | edit post

युवा होने के नाते ये देख-सुन कर आपको भी हैरानी हो रही होगी कि हिंदी साहित्य के अमिताभ बच्चन माने जानेवाले आलोचक नामवर सिंह की जिस बात पर युवाओं से खचाखच भरे ऐवाने ग़ालिब में हंगामा हो जाना चाहिए था कि साहब आप क्या बात कर रहे हैं, नामवरजी ये आप क्या कह रहे हैं, ऐसा कैसे कह सकते हैं नामवरजी, अफ़सोस कि इस जमात के अधिकांश युवाओं ने स्तुति करते हुए ताली पीटने का काम किया। जिस ऐवाने में युवाओं की ओर से नामवर सिंह के ख़‍िलाफ प्रतिरोध के स्वर फूटने चाहिए थे, उसमें गदगद हो जाने का एक विस्मय कर देनेवाला नज़ारा सामने था। किसी के बुरी तरह लताड़े और लतियाये जाने के बीच भी वो कौन-सी मनःस्थिति होती है कि इंसान इससे तृप्त होता है, आनंद लेता है और श्रद्धा भाव से लतियाये जानेवाले की स्तुति करने लग जाता है, तीन साल तक काव्यशास्त्र तक पढ़ने के बाद भी न तो हमें उस स्थिति से कभी पाला पड़ा और न ही कभी उस रस का हमने पहले कभी स्वाद चखा।

सभागार से बाहर निकलने के बाद अधिकांश लोगों की ज़ुबान पर बस एक ही बात – हिला दिया आज नामवरजी ने, गजब का भाषण दिया नामवर ने, आज तो नामवरजी ने अजय नावरिया को ऐसी पटकनी दी है कि जल्दी उठकर पानी नहीं पी पाएगा… आदि-आदि। सभागार से बाहर निकल कर लोगों की बात सुनते हुए तब आपको अंदाजा लग जाता है कि आखिर क्यों नामवर सिंह की बात पर अधिकांश युवाओं को परेशानी होने के बजाय मज़ा आ रहा था और वो किसी भी तरह का विरोध करने के बजाय उनकी बातों को ताली पीटते हुए और शह दे रहे थे।

लंबे समय से वाचिक परंपरा की ताकत पर हिंदी साहित्य में अपना आसन बचाये रखने वाले आलोचक नामवर सिंह इस कला में सिद्धहस्‍त तो हैं ही कि वो ऐसी बात कहें, जिसे सुन कर सभागार में बैठे श्रोता वही अर्थ लें जो अर्थ वो खुद प्रेषित करना चाहते हैं। कहने और समझने के बीच कोई फर्क न होने की वजह से ही लंबे समय से हम जैसे लोग उनके मुरीद रहे हैं। संभवतः इसलिए जब वो सावधान रहो इन लौंडों से, बहुत ख़तरनाक रास्ता अपना रहे हैं आप, बहुत न बढ़ाइए इन लोगों को, साहित्य में चालू किस्म का नारा न लगाओ जैसी नसीहत युवा जो देखन मैं चला शीर्षक से संपादकीय लिखनेवाले हंस के संपादक राजेंद्र यादव को दिया, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

हिंदी समाज, जो अब तक अरुंधति राय की बात को अपने इलाके का गपशप नहीं जान कर कुम्हाने लग गया था, नामवर सिंह की इस बात पर अचानक से खिल उठा। ये हुई न बात, इसको कहते हैं वक्ता के अंदाज़ में पूरा सभागार अहो, अहो हो उठा। नामवर सिंह ने युवा जैसे व्यापक शब्द को अजय नावरिया के पर्याय रूप में इस्तेमाल करते हुए व्यक्तिगत बना दिया, सभागार में बैठे युवाओं ने भी उसका अर्थ उतने ही व्यक्तिगत तौर पर लिया। नामवर सिंह की संगत और लगातार संगोष्ठी में आने-जानेवाली युवा पीढ़ी शायद बेहतर तरीके से समझती है कि किस शब्द के अर्थ को कितना फैलाकर या सिकोड़ कर समझना है। इसलिए यहां तक आते-आते नामवर सिंह की बात पर अगर किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई तो ये मान लिया गया कि युवा के नाम पर नामवर सिंह ने जो फुफकार मारी है, उसका ज़हर सिर्फ अजय नावरिया पर चढ़ेगा, बाकी के युवा ताली पीटने के लिए पहले की तरह ही सलामत रहेंगे। युवा रचनाशीलता और नैतिक मूल्य विषय पर इससे अधिक बड़ा क्या मज़ाक हो सकता है कि हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा आलोचक ये तय कर दे कि मौजूदा युवा पीढ़ी को किस शब्द का अर्थ किस हद तक जाकर लेना है, कौन-से शब्द का अर्थ किस मुहाने पर ले जाकर छोड़ देना हैं और किस शब्द के अर्थ को गुठली और गूदे के रूप में लेना और छोड़ देना है। हिंदी समाज में व्यक्तिवादी सोच की इससे और अधिक पराकाष्ठा और क्या हो सकती है कि अगर देश का एक युवा कहते ही राहुल गांधी को पर्याय के तौर पर इस्तेमाल करता है, तो सबसे बड़ा आलोचक भी विरोध करने के नाम पर अपने-अपने राहुल जैसे मुहावरे का प्रयोग करने से अपने को रोक नहीं पाता।

नामवर सिंह अक्सर रचनाकर्म के पहले भाषा की तमीज होने और लाने की बाद करते हैं। आज के अलावा भी दो-तीन जगहों पर कहानीकारों और उपन्यासों को ये तमीज सीखने और न सीखने में झड़प लगा चुके हैं। वो हमेशा से इस एप्रोच के ख़‍िलाफ़ रहे हैं कि साहित्य में चालू किस्म के नारे नहीं लगाने चाहिए। नामवर सिंह की तर्ज पर मीडिया आलोचना करनेवालों की एक छोटी किंतु कर्कश जमात पैदा हो चुकी है, जो समय-असमय उसे लताड़ती रहती है कि वो भाषा के नाम पर बाज़ारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, वो बाज़ारूपन के शिकार हैं। नामवर सिंह और उनसे प्रभावित होकर आलोचना करनेवाले लोगों की बातों को अगर कोई सचमुच में सीरियसली ले रहा है, तो उसे तब तक कुछ नहीं लिखना चाहिए जब तक कि नामवर सिंह उसके लिए भाषाई तमीज और तालीम अख्ति‍यार कर लेने का सर्टिफिकेट न जारी कर देते हों। अब आप इस बहस में मत जाइए कि जिसकी सधी भाषा नहीं है लेकिन व्यक्त करने की छटपटाहट बहुत ज्यादा है, इतना ज्यादा कि अगर लिखे नहीं तो मर जाएगा… तो वो क्या करेगा? बजाय इसके अब वो किस भाषापीठ से सिद्धहस्‍त होकर आये – इस मामले की तहकीकात शुरू कर दे।

बहुत संभव है कि अजय नावरिया ने हंस के जिस युवा विशेषांक का संपादन किया है, वो अधकचरे साहित्य और मीडिया वेस्टेज की रिसाइकिल करके कोई नई चीज़ पेश करने की कोशिश भर हो। ये भी संभव है कि नयी नज़र का नया नज़रिया जो अनुप्रास अलंकार के तौर पर भाषाई प्रयोग किया गया है, उससे नामवर सिंह को तकलीफ हुई हो। वैसे अंक देख कर एकबारगी तो ज़रूर लगता है कि साहित्य के नाम पर चश्मा गोला साबुन के विज्ञापन लिखने वाली भाषा की ज़रुरत क्यों पड़ गयी। नामवर सिंह को इस बात से भी तकलीफ हुई होगी जब अजय नावरिया 35 से 40 मिनट तक मासूम वजह बताते हुए लिखा हुआ पेपर पढ़ते जाते हैं, जिसे कि फारिग होने के लिए सभागार से बाहर आये लोग विमर्श के लिए तैयार की गयी कुंजी कह रहे थे, सारे कोटेशन्स को अंबेडर की एक ही कितबिया से चेंपा हुआ आइटम बता रहे थे। नामवर सिंह की नाराज़गी भी इस बात से साफ तौर पर रही कि अजय नावरिया ने जाति की तरह युवाओं की कई कैटगरी गिना दी, विशेषज्ञ होने का ये रवैया जितना हास्यास्पद था उतना ही छिछला भी। इन सबके बावजूद नामवर सिंह जैसे आलोचक का युवा, रचनाशीलता, नैतिक मूल्य और संभावना जैसे बड़े शब्दों और संदर्भों को अजय नावरिया, हंस पत्रिका, राजेंद्र यादव और अपने-अपने राहुल तक सीमित कर देना क्या भाषा को लेकर खेला जानेवाला एक खतरनाक खेल नहीं है?

हमें सिर्फ इस बात की जानकारी हो जाए कि किस तरह की भाषा बोलने से तालियां पिटवायी जा सकती है और हम उसी भाषा का प्रयोग करने लग जाएं तो क्या तालियों की वो आवाज़ अर्थ की ताक़त को भी मज़बूत कर रही होती है। अगर ऐसा है तो हिंदी साहित्य पढ़नेवाले हममें से हर किसी को रूटीन के तहत लाफ्टर चैलेंज शो देखना चाहिए।

भाषा, उसके प्रयोग की राजनीति और उसके अर्थ को निगल जाने की राजनीति को इसी संगोष्ठी में अरुंधति राय व्यापक स्तर पर उठाती हैं। अरुंधति का साफ मानना रहा कि स्टेट मशीनरी किस तरह से किसी शब्द के अर्थ को रिड्यूस करने का काम करती है। वो हमारे शब्दों को हमारे बीच से लेती है, उसका अपने तरीके से अर्थ देती है और फिर हम उस शब्द का सिर्फ वही अर्थ लेते हैं जिसे कि स्टेट मशीनरी तय कर देती है। हम विकास, न्याय और समानता जैसे शब्दों को रिप्लेस करते हैं। ऐसा करना ठीक उसी तरह से होता है जिस तरह से कि किसी जेनुसाइड के पहले ऐसा महौल बनाया जाता है कि जिसमें बीस-पच्चीस औऱ पचास लोगों के मरने, क़त्ल किये जाने को आम घटना मान लिया जाए। भाषा और उसके अर्थ इसी तरीके़ से ख़त्म किये जा रहे हैं।

ये वो समय है जब हमें अपनी भाषा को फिर से पाना होगा… दिस इज द टाइम टू रिक्लेम दि लैंग्वेज। हमें भाषा और विचार के बीच के गैप को ख़त्म करना होगा क्योंकि ऐसा नहीं किये जाने पर हम कुछ भी करने की स्थिति नहीं होगें। इसलिए सवाल बांग्ला, अंग्रेजी, हिंदी या फिर किसी दूसरी भाषा के प्रयोग से नहीं है, सवाल उस एप्रोच से है जहां हम कंटेंट के ओछेपन को ढोते हुए भाषा को बहुत ही बौना बना देते हैं। अरुंधति राय की भाषा की इसी समझदारी के बीच से रचनाशीलता और नैतिकता के मूल्यों के सवाल का जवाब मिलता है।

अब सवाल है कि इस पूरे प्रसंग से क्या ये समझा जा सकता है कि हिंदी समाज, उसके भीतर जीनेवाले लोग, नियम तय करनेवाले आचार्य जो दिन-रात बाजारवाद के ख़‍िलाफ़, विज्ञापन और नारे की भाषा के विरोध में बात करते आए हैं, वो काफी हद तक जाने और कई बार अनजाने उसी भाषा की सवारी करने लग गये हैं। स्टेट मशीनरी की तरह संभवतः वो भी शब्दों के अर्थ को रिप्लेस करने में जुटे हैं। शायद यही वजह है कि नैतिक मूल्य के नाम पर बहुत ही बारीक और महीन शब्दों के प्रयोग करने के बावजूद हिंदी के आचार्य उन अर्थों तक जाने से रह जाते हैं, जिसे कि अरुंधति सिर्फ एक लाइन में कि – now morality has become luxury that can’t afford – बोल कर विश्लेषित कर जाती हैं। इतना होने के बावजूद भी अगर सभागार से बाहर निकल कर लोग अरुंधति की बात पर चर्चा करने के बजाय हिला दिये नामवर जैसे हेडलाइन रचते हैं तो ये मान लिया जाए कि स्टेट मशीनरी की तरह नामचीन आलोचकों ने शब्दों के अर्थ को व्यक्तिवादी होते हुए रिप्लेस करने का काम किया है और दुर्भाग्य से जिसे पहचानने तक की ताकत युवाओं की एक बड़े जमात के बीच नहीं पैदा हो पायी है। क्या हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा आलोचक जिसे पढ़कर हम खुद को लगातार बेहतर करने की कोशिश में लगे रहे,उसका जिगर इतना छोटा है जो जवानी को मूल्य बताते हुए भी उसे इतना पर्सनल और व्यक्तिगत तौर पर विश्लेषित करता है?
| | edit post

टीआरपी के मसले पर भाजपा नेता और टेलीविजन स्क्रीन पर अक्सर देखे जानेवाले रविशंकर प्रसाद सहित राजीव शुक्ला और वृंदा कारत ने जो बात कही, उस पर सोचते हुए मुझे लगता है कि वो दूरदर्शन को लेकर नास्‍टेल्जिक होने से अभी तक अपने को रोक नहीं पाये हैं। अभी तक वो इसी के इर्द-गिर्द रखकर नियामक बनाने का अभ्यास करने में जुटे हैं। राजीव शुक्ला की बात पर हमें अपने चचेरे भाइयों की याद आ रही है जो भरी दुपहरिया में मां के लाख कहने पर कि सो जाओ, हम उनके साथ लूड़ो खेलते और हारने की स्थिति में, गोटी लाल न होने कि स्थिति में (लूडो में चार रंगों की चार चार-गोटियां होती हैं जिसे होम तक लाना होता है, इसे गोटी लाल करना कहते हैं) खेला भंडूल (खेल बिगाड़ना) कर देते। पहले तो हमलोगों में बहसबाजी होती, फिर हाथापाई। मामला जब कंट्रोल से बाहर हो जाता, तो मां या चाची को बीच-बचाव के लिए आना पड़ता और वो लूड़ो को चार टुकड़ों में करते हुए कहती – ये लो, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। टीआरपी के मामले में राजीव शुक्ला संभवतः इसी तरह की समझ रखते हैं। लेकिन गौर से समझिए तो इसमें न तो लूड़ो का कोई कसूर है और न ही ऐसा है कि लूड़ो के फाड़ देने से मामला ख़त्म हो जाएगा। अगले दिन हम फिर चंदा करते, फिर लूड़ो खरीदते, फिर लड़ते, मां फिर लूड़ो फाड़ती और फिर देखते ही देखते हम बड़े हो गये। टीआरपी का खेल अभी ढंग से शुरू भी नहीं हुआ है कि राजीव शुक्ला इसे विलेन बता कर भंडुल करना चाहते हैं। जिसे कि रंगनाथ सिंह के नजरिये से कि क्या ऐसा करते हुए इलाज की तरफ बढ़ा जा रहा है या फिर लक्षणों को ही लगातार दबाने की कोशिशें जा रही है के रूप में समझा जा सकता है। इस पूरे मामले में मुझे लगता है कि क्या इसकी संभावना है कि जिस तरह हम लड़ते-भिड़ेते एक दिन बड़े हो गये, मैच्योर हो गये, टीआरपी के खेल में शामिल चैनल और लोग वैसे ही हो जाएंगे। टीआरपी को जी का जंजाल मान कर इसे हटाने की पैरवी करने से पहले हमें इस सिरे से भी सोचने की ज़रूरत है।

टेलीविजन और चैनलों को बेहतर बनाने की कोशिश में सांसदों ने जो कुछ भी कहा है, उसे पढ़ते-समझते हुए मुझे दो-तीन बातों पर ग़ौर करना ज़रूरी लगता है। इस पर कायदे से बात किये बिना रेगुलेशन के लिए कमेटी गठित करने, महीने में एक बार टीआरपी लाने या फिर एकदम से हटा देने की बात सारे चैनलों को दूरदर्शन मार्का रंग से पोतने के अलावे कोई नयी कोशिश नहीं होगी।

पहली बात तो ये कि सांसद, राजनीति से जुड़े लोग या फिर देश की जनता के लिए कायदे-कानून बनाने वाले लोगों को जनता शब्द को डिफाइन करना होगा। रविशंकर प्रसाद जब ये कहते हैं कि – जब हम संसद में बैठते हैं तो हमारी जवाबदेही देश के प्रति बनती है। उन्हें ये पहले स्पष्ट कर देना होगा कि ये जवाबदेही किस तरह की है। आम नागरिक के लिए जीवन की मूलभूत सुविधाओं को जुटाने की कोशिश में सहयोग करने की, पानी-बिजली, सड़क या फिर दूसरे मसलों को दुरुस्त करने की या फिर संसद में बैठकर ये तय करने की कि कल से देश के नागरिक सच का सामना देखेंगे कि नहीं, बालिका वधू आगे प्रसारित होने चाहिए कि नहीं। वो संसद में बैठकर जीने के स्तर पर ज़रूरत को लेकर बात करना चाहते हैं या फिर मनोरंजन के स्तर पर जनता की अभिरुचि को लेकर, इसे पहले तय करना ज़रूरी है। राजीव शुक्‍ला की समझ पर रंगनाथ सिंह ने अपनी पोस्‍ट में लिखा कि बिहार-बंगाल में टीआरपी के बक्से लगाने ज्यादा ज़रूरी हैं या फिर पानी, बिजली और सड़क की गारंटी देना। जाहिर तौर पर टीआरपी का संबंध सिर्फ बक्से के लगाने और नहीं लगाने से नहीं है। इसे आप हाल में आये टीआरपी की रिपोर्ट से समझ सकते हैं…

…सूर्य ग्रहण को लगभग सारे हिंदी चैनलों ने तीन दिनों तक लगातार दिखाया। सबों को औसत दिनों की अपेक्षा ज़्यादा टीआरपी मिली। आजतक और इंडिया टीवी चैनलों ने इसे अंधविश्वास और पाखंड को हवा देते हुए दिखाया। उन विश्वासों के समर्थन में स्टोरी चलायी, जो कि कर्मकांड को मज़बूत देते हैं। इसकी टीआरपी क्रमशः 19.4 प्रतिशत 16.6 प्रतिशत रही, जबकि स्टार न्यूज़, एनडीटीवी और जी न्यूज ने कर्मकांडों के विरोध में स्टोरी ब्राडकास्ट की, जिसकी टीआरपी क्रमशः 14.4, 9.4 और 10.3 प्रतिशत रही। रविशंकर प्रसाद बताते हैं कि टीआरपी के बक्से बिहार, बंगाल या फिर देश के किसी भी छोटे इलाके में नहीं हैं। इसे अगर आप साक्षरता दर के लिहाज से देखें, तो जाहिर तौर पर इन इलाकों से ज़्यादा पढ़े-लिखे लोगों ने इस पाखंड और कर्मकांड से जुड़ी स्टोरी को देखा। अब सासंदों का ये फार्मूला फेल हो गया कि पढ़-लिख कर लोग बेहतर चीजें देखते हैं या देखेंगे। जिस टीआरपी को आप बाज़ार का पहरुआ साबित कर रहे हैं जो कि है भी, आप उसी टीआरपी से उन कारणों का भी पता लगा सकते हैं कि शिक्षा और संचार के स्तर पर संपन्‍न समाज भी अगर पाखंड और कर्मकांड से जुड़ी ख़बरों को ज़्यादा देख रहा है तो इसके पीछे क्या कारण हैं। तब आपको समझ आएगा कि हमें सोशल इंजीनियरिंग के स्तर पर क्या-क्या काम करने हैं। इस मामले में परसों की कमाल खान (एनडीटीवी इंडिया) की स्पेशल स्टोरी पर गौर कीजिए। स्टोरी में साफ तौर पर दिखाया गया कि ब्राह्मण मिश्रा से लेकर कायस्‍थ तक ने किस तरह मायावती के पैर छुए और उनके लिए कसीदे पढ़े लेकिन दूसरी तरफ ये भी स्थिति है कि बदहाली के बावजूद एक राजपूत गांव से पचास किलोमीटर जाकर रंगाई का काम कर सकता है, लेकिन वहीं रह कर मज़दूरी नहीं कर सकता क्योंकि दलितों के साथ काम करने में उनके बाप-दादाओं की इज्ज़त में बट्टा लगता है। रंगनाथ सिंह जिस ज़रूरत को पानी, बिजली और सड़क से जोड़ कर देख रहे हैं, मैं उसे सामाजिक संरचना और उसके भीतर की कल्चरल प्रैक्टिस के स्तर पर बात करना चाहता हूं और ऐसा करते हुए मुझे बार-बार लगता है कि संसद में बहस कर रहे लोगों को किताबों में लिखी संस्कृति और मूल्यों का हवाला देने के बजाय उसकी प्रैक्टिस को लेकर बात करनी चाहिए।

जैसा कि रविशंकर ने चैनल से जुड़े लोगों के आगे सवाल रखा कि-आपको किसने यह अधिकार दे दिया कि देश क्‍या देखना चाहता है, इसकी सही समझ आपको ही है। ये सवाल हम अपने सांसदों से नहीं कर सकते, करनी भी नहीं चाहिए, यहां हम मतदान के महत्व को झुठलाना नहीं चाहते। लेकिन इतना तो ज़रूर जानना चाहेंगे कि आखिर क्या वजह है कि आपके प्रसारण मशीनरी को इस बात की समझ होते हुए भी कि (अगर वाकई समझ है तो) देश क्या देखना चाहता है वो खबरों के मामले में, अब तो कार्यक्रमों के मामले में भी कोई उदाहरण पेश नहीं कर पाता। यहां भी घाटे की भारपाई के लिए जुनून, शांति और स्वाभिमान जैसे संस्कृति विरोधी सीरियल (आप ही की परिभाषा के आधार पर) चलाए गये। आखिर क्या कारण है कि दूरदर्शन को देखना एक मजबूरी का मनोरंजन होता जा रहा है। जितनी तेजी से लोग केवल नेटवर्क और डिश टेलीविजन से जुड़ते जा रहे हैं, वो दूरदर्शन की ओर पलट कर नहीं आते। ये बात मैं पूरी जिम्मेवारी और रिसर्च के आधार पर कह रहा हूं कि जिन-जिन घरों में निजी चैनल देखने की सुविधा है, उनमें से इक्का-दुक्का ही होंगे जो कि दूरदर्शन देखते होंगे जबकि तमाम आलोचना के बाद भी वो निजी चैनलों को देखना ही पसंद करते हैं। इस बात पर भी बहस करने की ज़रूरत है कि दूरदर्शन पर तो कभी भी टीआरपी का दबाव नहीं रहा, उनसे जुड़े लोगों को कभी अपने मालिकों के आगे कमाऊ पत्रकार साबित करने की जद्दोजहद नहीं झेलनी पड़ी लेकिन आख़‍िर ऐसा क्यों है कि लोग रोज़मर्रा की चर्चा में इसका रेफरेंस तक नहीं देते, इसकी ख़बरें पत्रकारिता की मिसाल नहीं बन पातीं।

मुझे लगता है कि टेलीविज़न पर जब भी चिंता की जाती है और जैसे ही इसमें देश के लोग और परिवार, संस्कार, मूल्यों और नैतिकता जैसे सवालों के लिहाज से विचार करने का काम शुरू किया जाता है, तो उसे नागरिकशास्त्र की किताबों में व्याख्यायित शब्दावली के हिसाब से देखने की कोशिश की जाती है। इस बात को मानने के लिए हम तैयार नहीं हैं कि क्रमशः सभी स्तरों पर चाहे वो परिवार हो, मूल्य हो या फिर संस्कृति – अब वो रूप नहीं रह गया है। इसलिए जाहिर है कि विश्लेषण का ये फार्मूला भी नहीं होना चाहिए। नेशन स्टेट की संस्कृति नागरिक के जीने की संस्कृति से बिल्कुल अलग है और होती है। संभवः है कि देश के भीतर, सांसदों के बनाये नियमों के भीतर जीनेवाली देश की जनता उसे मानने और उसी हिसाब से सोचने के लिए बाध्य है लेकिन वही नागरिक जब टेलीविजन देख रहा होता है, तो वो देश का नागरिक होने के पहले ऑडिएंस हो जाता है। घंटे-दो घंटे के लिए एक नागिरक की प्राथमिकताएं परे हटकर एक ऑडिएंस की पसंद, इच्छा और अनिच्छा ज्यादा मज़बूती से सामने आती है। इसलिए टेलीविज़न पर दिखाये जानेवाले कार्यक्रमों और संसद में बैठकर तय करनेवाली नीतियों के बीच की रस्साकशी दरअसल एक नागरिक की ज़रूरत और एक ऑडिएंस की पसंद-नापसंद को समझने और नहीं समझने के बीच का विधान है। हममें से कौन चाहेगा कि एक तेज़तर्रार लड़के को पकड़ कर ज़बरदस्ती शादी कर दे! एक बार कल्पना तो कीजिए, तो रूह कांप जाती है लेकिन टेलीविजन पर भाग्यविधाता की टीआरपी अच्छी जाती है, लोगों के बीच खूब पॉपुलर भी है। किसी लड़की को दूसरे के हाथों, दूसरे के आगे तीसरे के हाथों बेचे जाने की घटना पर हम दुख जाहिर करते हैं, ऐसा न होने की भरपूर कोशिश करते हैं लेकिन अगले जनम मोहे बीटिया ही कीजो देखना हमें अच्छा लगता है। इसलिए ज़रूरी नहीं कि एक नागरिक की जो ज़रूरत है, वही एक ऑडिएंस की भी ज़रूरत हो। इसे बहुत पहले ही अरस्तू ने कार्थासिस (विरेचन) के जरिए समझाने का प्रयास किया और बताया कि कई बार ट्रैजडी को नाटक रूप में देख कर हम भीतर से विरेचित होते हैं, परफेक्ट होते हैं। टेलीविज़न के ऐसे कार्यक्रमों पर हाय-तौबा मचाने से पहले हमें इस प्रोसेस से भी टेलीविजन को देखना होगा, तब सच का सामना के सवाल भी हमें अटपटे नहीं लगेंगे। टेलीविजन को दुरुस्त करनेवाले लोगों को नागरिक और ऑडिएंस के फर्क को समझना जरुरी है और उसमें अभिरुचि शब्द को भी जोड़कर देखना होगा।

अब हम टेलीविजन को टीआरपी से जुदा करके रेगुलेशन पर बात करें, तो वृंदा कारत ने साफ कहा है कि सेल्फ रेगुलेशन का मामला पूरी तरह असफल रहा है इसलिए अब हमें रेगुलेशन बनाने की ज़रूरत है। इस तरह के रेगुलेशन बनने से पहले दूरदर्शन से एक बार ज़रूर सवाल करना चाहिए कि उनकी विफलता किस स्तर की है कि सबों की जुबान पर चाहे वो किसी भी रूप में क्यों न हो, निजी चैनलों का ही नाम होता है। सांसदों को ये बात भले ही बुरी लगे लेकिन सच है कि आज अगर देश की जनता सब्सिडी पर दिये गये दो रुपये-तीन रुपये किलो का चावल खाकर उसे वोट दे ही दे, इसकी तो कोई गारंटी नहीं – तो फिर डेढ़ सौ-दौ सौ रुपये महीने लगाकर उनके मुताबिक कार्यक्रम देखें – इसकी क्या गारंटी है? और फिर बेहतर कार्यक्रम का मतलब सिर्फ रामायण और बाबा रामदेव का योग ही तो नहीं होता, इसे तय करने के लिए कैनवास को बड़ा करके देखने की ज़रूरत है। दरअसल टेलीविजन और ऑडिएंस के बीच जो नये संबंध बने हैं, संसद में बहस करने वाले लोग इस संबंध को या तो समझना नहीं चाह रहे या फिर समझ कर इसे नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। रविशंकर प्रसाद को अब युवाओं के पैर की थिरकन महसूस हो रही है लेकिन, तो, फिर भी… लगाकर उस लिहाज से सोचने से अपने को रोकते हैं, वो संबंध शुद्ध रूप से एक उपभोक्ता और आपूर्तिकर्ता का संबंध है। करोड़ों रुपये लगाने के बाद चैनल जहां संतई काम करने के लिए नहीं आये हैं, वहीं महीने में ढाई-तीन सौ रुपये लगानेवाली ऑडिएंस महज एक नागरिक की हैसियत से टेलीविजन देखने के पक्ष में नहीं है तो टेलीविजन में लगनेवाली पूंजी से लेकर उसके काम करने के तरीके पर विचार करना होगा।

टीआरपी को हटाकर चैनल को बेहतर होने की गारंटी कार्ड तैयार करना न सिर्फ सहूलियत के लिए निकाला गया हल होगा बल्कि उसे पहले से और अधिक बर्बर बनाना होगा। वैसे भी टैम की रिपोर्ट मानने के लिए आप बाध्य तो हैं नहीं, आप इसी तरह से कई और ऐजेंसियों के हाथों रिपोर्ट लाने की दिशा में पहल करें। केबल ऑपरेटिंग सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए जब टाटा स्काई, बिग टीवी और डिश टीवी को एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं तो फिर टीआरपी के मामले में क्यों नहीं। पूरी तरह पूंजीवादी खेल में शामिल टेलीविजन चैनलों को लेकर आज अगर परेशानी आ रही है, तो इसका हल भी इसी की शक्ल और मिजाज के बीच से खोजने होगे। पूंजीवादी टेलीविजन और समाजवादी विचार का कॉकटेल न तो संभव है और न ही किसी को रास आएगा। शायद टीआरपी हटाये जाने की संभावना पर खुश होनेवाले चैनलों को भी नहीं क्योंकि वो टीआरपी का डंडा फिर भी बर्दाश्त कर ले रहे हैं लेकिन नेशन स्टेट का शायद ही कर पाएं। क्योंकि उन्हें पूंजीवाद से पैदा होनेवाली अड़चनों को झेलने की धीरे-धीरे आदत होती जा रही है, नेशन स्टेट का दखल उनके लिए ज्यादा भारी पड़ जाएगा। भरोसा न हो तो सर्वे करा लीजिए
| | edit post