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रुह आफ़जा, एक मुसलमानी शर्बत

Posted On 12:50 pm by विनीत कुमार | 14 comments

तुम्हें कैसे रुह आफ़जा इतना पसंद है, मुझे तो इससे मुसममानी स्मेल आती है। मैंने पूछा, मुसलमानी मतलब, इत्र औऱ गुलाब जैसी खुशबू क्या। उसने कहा नहीं, वैसी नहीं स्मेल माने दुर्गंध। मुझे इससे मुसलमानी दुर्गंध आती है। उसने जातिगत तरीके से सुगंध और दुर्गंध पर रिसर्च कर लिया है तो उसके आगे मैंने कुछ भी कहना उचित नहीं समझा।

लेकिन क्या मुसलमानी दुर्गंध कुछ अलग से भी होती है .
कल लाइट नहीं थी, पूरा हॉस्टल हाउंटेड पैलेस की तरह लग रहा था। कोई बंदा अपने कमरे में टिकना नहीं चाह रहा था। फिर क्या हो गया बाहर लॉन में लोगों का जमावड़ा। मैं अपनी एथिनिसिटी बघारने के लिए एक ताड़ का पंखा ले आया। उसके बाद तो धीरे-धीरे हमलोग नॉस्टॉलजिया के शिकार होते गए। सब बताने लगे कि वो अपने घर में गर्मी के दिनों में क्या-क्या करते थे। आमझोर( दिल्ली में लोग आमपन्ना कहते हैं) से लेकर बेल का शर्बत, खजूर और ताड़ की ताडी तक आ गए। और फिर मामला ऐसा जमा कि लोग शर्बत को लेकर बातें करने लगे।

मेरे पास घर और शर्बत को लेकर सिर्फ एक ही याद है। छुटपन में मैं एक खाली गिलास और चम्मच लेकर मां के पीछे-पीछे घुमता रहता। मां से कहता कि शर्बत बनाने के लिए मेरे पास तो सबकुछ है कि, तुम सिर्फ जरा-सा रुह आफ़जा दे दो। मां घर के छोटे-मोटे काम करवाती और फिर नापकर दो ढक्कन रुह आफंजा दे देती। उससे शर्बत मीठा तो नहीं बनता सिर्फ लाल रंग आता। घर में जब कोई आते तब मां ज्यादा ड़लकर बनाती और बर्फ भी डालती। बाद में जब घर छूटा तो पांच साल रांची में रहना हुआ। ...और घर यानि जमशेदपुर से किसी न किसी का आना-जाना लगा रहता। सो हमेशा रुह-आफ़जा मां भेजा करती।

फिर तो ऐसा हो गया कि रुह आफ़जा के स्वाद से ज्यादा एक रुटीन-सा हो गया कि गर्मी के दिनों में बाहर से आने पर इसे पीना है। लेकिन दिल्ली आने पर मैंने कभी अपने से खरीदा नहीं। क्योंकि रुह आफ़जा के साथ मां भी याद आती है और फिर कौन इतनी व्यस्त जिंदगी में नॉस्टॉलडिया का शिकार होना चाहेगा।

लेकिन कल तो रुह आफ़जा को लेकर बिल्कुल नई बात हो गयी। किस आधार पर वो बंदा इसे मुसलमानी स्मेल वाली शर्बत कह रहा था। मैंने पूछा भी कि, हमदर्द का है इसलिए क्या। उसने कहा नहीं। अगर आप पीजिएगा तो लगेगा कि आसपास कोई मुसलमानी बैठी है। कैसी बेतुकी बाते करते हो यार। क्या हमदर्द ने उनके स्मेल पर रिसर्च करके ऐसा तैयार किया है। घुमा-फिराकर वो बंदा इसे अच्छी शर्बत नहीं कहना चाह रहा था। हो सकता है किसी को इसकी फ्लेवर पंसद न आए। लेकिन किसी खास समुदाय से खाने-पीने की चीजों को जोड़कर देखना, पता नहीं क्यों, मुझे अटपटा सा लगा।

मुझे याद है जब हम भाई-बहन छोटे थे तो घर से आगे एक ब्रेड बनाने की फैक्ट्री थी। उसके मालिक का लड़का सादिक मेरा क्लासमेट था। वो अक्सर लंच में पांवरोटी जिसकी शक्ल बर्गर ने ले ली है। दिल्ली में लोग इसे मीठी ब्रेड कहते हैं। उपर एक चेरी का टुकड़ा खोंसा होता है। वही पांवरोटी, एकदम ताजी और मुलायम सादिक लेकर आता।...और हमलोग उससे टिफिन बदल लेते। बाद में हमलोग उसके यहां जाकर भी लाया करते।
मेरी दादी जिसे हमलोग भोंपा कहते। क्योंकि वो चुपचाप बैठकर सबों को सिर्फ नसीहतें देती रहतीं। हर बात के पीछे पड़ जाती। अगर आप आम काट रहे हैं तो देखते ही कहेगी-ठीक से अंगुरी कट जैतो। दूध पीते देख कहती- गरम है, मुंह जल जैतो। ....और अक्सर हमलोगों के साथ ऐसा होता। तब हम रोते हुए चिल्लाते, अब खुश।

पांवरोटी खाते भी देखकर नसीहतें देतीं। मत खाओ, गोड से यानि पैर से रौंदकर बनाता है सब। पता नहीं कहां-कहां से चलके आता होगा। हमलोग कहते, नहीं हम देखकर आते हैं, सादिक भी बताता है कि कोई पैर से नहीं रौंदकर बनाता है। तब आगे कहती- तयिओ तो बनाता तो मुसलमान ही है। आज जब उस बंदे ने स्मेल वाली बात कही तो अचानक से ये सब याद आ गया। आप इसे भी नॉस्टॉलजिया कह सकते हैं। लेकिन दादी की बात को समझना ज्यादा आसान था कि वो मुसलमानों के हाथ का बना खाने से परहेज करती है। ये अलग बात है कि जाने-अनजाने कितनी चीजें खा लिया करती। लेकिन इस बंदे के बारे में आप सीधे-सीधे नहीं कह सकते कि वो दादी की बात को दुहरा रहा है।

वो एक तरह से आरोप लगा रहा है कि मुसलमानों से एक स्मेल आती है। उसके हिसाब से गंदी स्मेल। कुछ-कुछ रुह आफ़जा की तरह या फिर मुसलमानों की तरह का रुह आफ़जा की स्मेल। अगर उसके दिमाग में स्मेल का संबंध गंदगी से है तो फिर हिन्दू बस्ती और उसके लोग क्यों नहीं आए। गंदगी उनके बीच कम है क्या। तो क्या गंदगी औऱ हमदर्द के होने की वजह साथ-साथ है।

जाति और समुदाय को लेकर बाजार कैसे खड़ी करता है, ब्रांड का मायाजाल॥
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हां, वो कनकलता ही है। मैंने उसे अक्सर किताबों के पन्नों के बीच उलझते देखा है। गाइड के इंतजार में डिपार्टमेंट के आगे इंतजार करते देखा है। लेकिन कभी उसकी आवाज नहीं सुनी।....जबकि कल से लेकर आज तक उसकी तस्वीर और दास्तान पूरी मीडिया में पसरी हुई है।

कल दोपहर को ही जब राकेश सर मुझे बुलाकर खुद घर से गायब हो गए तो मैंने पता किया कि भई, बात क्या है। दो घंटे बाद जब वो वापस लौटे तो बताया अभी-अभी मुकर्जीनगर से एक फोन आया है। मकान मालिक ने किराये पर रह रहे भाई-बहनों को बुरी तरह पीटा है। वजह सिर्फ इतनी है कि उसे पता चल गया कि वो लोग दलित हैं। शनिवार को हुई इस घटना की रिपोर्ट पुलिस ने अभी तक दर्ज नहीं की है। उसमें से एक डीयू से ही एम।फिल् कर रही है। उस समय ये पता नहीं चल पाया कि वो मेरे विभाग में ही है।

आने के बाद राकेश सर मीडिया के रवैये से काफी नाराज थे। सारे लोग एक कागज के टुकडे के पीछे पड़े थे, पता नहीं उस कागज के टुकड़े में ऐसा क्या था. और जी-जान से उस कोशिश में लगे थे कि किसी तरह उस लड़की की बाइट मिल जाए। कुछ चैनल बार-बार एक ही बात दुहरा रहे थे कि इसका बेस क्या है। बेस और सुपरस्ट्रक्चर की तलाश के बीच मानवीय संवेदना की स्टोरी कितनी निकल पायी होगी इसका अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि समय बीतने के साथ ही घटना पर परत दर परत चढ़ते चले गए।॥....इन सबके वाबजूद संवेदना का पक्ष भले ही छूट जाए लेकिन खबर तो बनी ही कि एक डीयू की रिसर्चर और दूसरी सिविल की तैयारी करनेवाली दलित लड़कियों को दिल्ली के एक मकान मालिक ने बुरी तरह पीटा है।... और शुरुआत के कुछ घंटों में जिसे दलित जाति की जानकारी होने पर मकान मालिक द्वारा पीटे जाने की घटना बोलकर स्टोरी चली, बाद में उस कहानी के कई तार निकल आए और दैनिक सोने से पहले मैंने चौबीस घंटे चौबीस रिपोर्टर में ये खबर देखा कि मकान-मालिक ने उसे सिर्फ इसलिए पीटा क्योंकि वो दलित है। जबकि सुबह दैनिक हिन्दुस्तान ने मकान मालिक की बात को भी छापा कि- दरअसल मामला ये है कि एग्रीमेंट के मुताबिक करार खत्म हो गया था और इन्हें मकान खाली करनी थी और हमनें जब ऐसा करने को कहा तो ये जातिसूचक शब्दों के प्रयोग का आरोप लगा रही है। यानि कि मकान मालिक ने लड़की के दलित होने पर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं किया।

थोड़ी देर के लिए अगर इस बात पर भरोसा कर भी लिया जाए कि ऐसा ही हुआ होगा और लड़की और उसके भाई-बहन मकान छोड़ना नहीं चाह रहे होंगे और बात बढ़ गयी होगी। लेकिन तब उसका क्या करें जिसे कि पूरी मीडिया में दिखाया गया। लड़की का शरीर जगह-जगह से छिल गया है। हाथों पर भी चोटें आयी है। दूसरी बहन का चेहरा बुत बना हुआ है। मकान-मालिक अगर चाहे तो आगे भी जोड़ सकते हैं कि ये सारे घाव उसने खुद हमें फंसाने के लिए बनाए हैं। देश में एक तपका ऐसा भी है जो उनकी बातों को आसानी से मान लेगें कि- हांजी ऐसा ही हुआ होगा। बाहर से आकर ये लोग पढ़ाई के नाम पर दिल्ली के लोगों को फजीहत में डालते हैं।...और फिर,

महिलाओं और दलितों के मामले में ऐसा करना तो बहुत ही सामान्य-सी बात है। जब भी लड़की, स्त्री से कोई जुड़ा कोई मामला हो तो साफ कहो कि- अजी, मैं जानता हूं, वो चाल-चलन की ठीक नहीं थी और जब इस बात पर उंगली उठायी गयी तो फंसा दिया। चाल-चलन और चरित्र को लेकर न जाने कितनी स्त्रियां इंसाफ पाने से रह जाती है और पितृसत्तात्मक समाज की अकड़ मजबूत होती है। इधर प्रशासन भी बहुत ज्यादा खोजबीन के पचड़े से बच जाती है। और वैसे भी समाज के गिने-चुने इज्जतदार लोग कह दें कि हांजी, बात सही है तो फिर प्रशासन को मानने और पचाने में क्या परेशानी है।

तथाकथित समाज के इज्जतदार लोगों और रसूकदारों के बीच इतनी भी समझ नहीं बन पायी है और शायद कभी भी न बने कि एक स्त्री जो अपने चरित्र को लेकर इतनी कॉन्शस रहती है, एक दलित अपनी जाति को लेकर इतना इनस्क्योर रहता है वो इसे सरेआम कैसे होने देंगे। मकान मालिक को इस बात का अंदाजा ही कहां होगा कि जिस लड़की पर उसने झूठा होने का आरोप लगाया है उसकी जिंदगी का अच्छा-खासा समय अस्मिता की तलाश और उसके विमर्शों से होते हुए गुजरा है। हर साल मानवीय संवेदना का पक्ष लेते हुए परीक्षाएं पास की है। कितनी टूट-फूट मची होगी उसके भीतर और एक रिसर्चर होना भी उसे कितना खोखला लग रहा होगा। इन सब मसलों पर भला कहां सोच सकते हैं वो।

सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त लोग तमाम तरह की आधुनिकता से लैस होने के वाबजूद दलित और जाति व्यवस्था के सवाल पर अपने को बदल नहीं पाए और बदलना भी नहीं चाहते। क्योंकि सबकुछ तो गंवा ही चुके। एक यही जातिवाद तो पुरखों की निशानी है और इसे भी कैसे छोड़ दें।...वो भी वेवजह, जबकि छोड़ने का कोई लाभ ही नहीं है और उल्टे आनेवाले समय में परेशानी भले ही हो जाए। ऐसे में दिल्ली जैसे तथाकथित स्वच्छ दिल्ली, हमारी दिल्ली में भी कोई जातिवाद को जिंदा रखना चाह रहा है तो इसमें बेजा क्या है। आखिर जातिवाद उनके पुरखों की निशानी है।

लेकिन, इसके ठीक उलट दलित ही क्यों, शोषित समाज का कोई भी हिस्सा और उसकी पीढ़ी अपने पुरखों की निशानी को बचाना नहीं चाहती, उसे जल्द से जल्द धो-पोछना चाहती है।....और कनकलता इसी की कड़ी है। उसके जैसी लाखों देश की लड़कियां अपने पुरखों की निशानी को मिटाने के औजार खोजती आगे बढ़ रही है। सवर्णों के शोषण के हथियार से जब वो सर्ववाइवल के औजार बना रहीं हैं तो तो तकलीफ होगी ही। लेकिन बदलाव की बयार इसी तकलीफ के भीतर से होकर गुजरते हैं। ....और इसका असर भी तो दिखने लगा है। जैसे कि मुकर्जीनगर क्या, कहीं का भी मालिक ये भले ही कह दे कि ये जाति का मामला जोड़कर हमें फंसा रहे हैं लेकिन उसने ये हिम्मत खो दी है कि वो जबरदस्ती करके कहे कि ये घाव भी इसने खुद बनाए हैं।

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अवीनाश, भडास, एन डी टी वी ओर हिन्दी ब्लोगजगत पोस्ट में खुल के बोल ने लिखा कि
हिंन्दी ब्लॉगिंग के 5000 ब्लॉग्स मे से सिर्फ दो – मोहल्ला और भड़ास ही दर्शकों तक पहुँचाये गये । इसके अलावा अविनाश के करीबी यार रवीश , का ब्लॉग कस्बा का पता दिखाया गया ।
उनकी शिकायत है कि बाकी लोग कहां गए।...
खुल के बोल की जो पीड़ा है, इसे मैं पीड़ा न कहकर मलाल कहूं तो ज्यादा बेहतर होगा क्योंकि पीड़ा खुल के बोल को बहुत ही निरीह और असहाय बना देगा जो कि वो हैं नहीं। खैर, खुल के बोल का जो मलाल है वो हिन्दी समाज के लिए नया नहीं है। हिन्दी समाज इसका पुराना मरीज और मुरीद रहा है। आप एक राउंड लगा आइए हिन्दी वालों के बीच आपको इसका अंदाजा लग जाएगा कि हिन्दी समाज में ९० प्रतिशत से ज्यादा लोग मलाल और कुंठा में जीते हैं और इस बीच अगर कुछ लिखते भी है तो इससे गुजरते हुए। स्थापित तो स्थापित जिन्हें अभी लिखना शुरु किए जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुए वो आपको कहता मिल जाएगा-
देखिए जी, दस कहानियां लिख चुका, अभी तक राजेन्द्रजी ने कहीं कुछ कहा ही नहीं मेरे बारे में। पचासों कविताएं छप चुकी है, नामवरजी ने कभी नोटिस नहीं ली। अब तक पता नहीं किस मसले पर लिखता रहा लेकिन जैसे ही उसके दिमाग में ये बात आनी शुरु हो जाती है कि उसकी कोई नोटिस नहीं ले रहा, आगे से चाहे वो जिस किसी मुद्दे पर लिखे, उसमें जाने-अनजाने कुंठा,मलाल, नोटिस होने की छटपटाहट घुलने लगा जाती है। ये कितना सही है या गलत, पता नहीं लेकिन किताबी ज्ञान की बात करुं तो मम्मट, भामह से लेकर नए आचार्यों ने रचनाकार की उपलब्धि में बाकी चीजों के साथ यश की प्राप्ति बताया है। कोई बंदा इनके शास्त्र न भी पढ़ा हो तो लिखनेवालों के बीच यश पाने की लालसा जन्मजात होती है, यानि जब से वो लिखना शुरु करता है। इसका नतीजा होता है कि कई बार लिखनेवाले की रचना उसके मुद्दे और लिखने की वजह से खिसकते चले जाते हैं। कई उभरते रचनाकार इस हादसे के शिकार हो चुके हैं। जिन्हें इस बात का एहसास होने लगा कि नोटिस होने के लिए कुछ अलग लिखो, उटपटांग भी लिखो यो फिर नोटिस में आ गए हो तो नोटिस में बने रहने के लिए लिखो। ऐसे में वो अपने भीतर ही आए दिन अपने से लड़ता है, अपनी कुंठा से लड़ता है।
मैंने अपने एम.ए की पढ़ाई के दौरान कुछ ऐसे भी मास्टरों से शिक्षा ली है जिनका मलाल बना रहा कि उन्होंने कविता पर और वादों ( इज्म) पर इतनी सारी किताबें लिख दीं लेकिन साहित्य के इतिहासकारों ने उनके बारे में एक भी शब्द नहीं लिखा. एक दो ऐसे विद्वान और हिन्दी के बाबा मिल जाएंगे जिन्हें इस बात का मलाल है कि उनसे टटपूंजिए लोग प्रोफेसर बन गए और वो रीडर से ही रिटायर हो गए।... और उनकी ये कुंठा और मलाल इनकी राइटिंग में इतनी हावी हो जाती है कि वो हमें बता ही नहीं पाते कि वो कहना क्या चाह रहे हैं. मुद्दे से फिसलना इसे ही कहते हैं।
खुल के बोल जिस बात को आज रख रहे हैं कि ५००० ब्लॉगों के बीच केवल तीन ही चार ब्लॉग हैं जिसकी चर्चा एक नेशनल चैनल में की जानी चाहिए, ये मसला भी नहीं है। इनकी तरह मैं भी जब नया-नया ब्लॉग की दुनिया में आया तो नीलिमा के एक लेख पर गहरी आपत्ति दर्ज की थी कि उन्होंने करीब आठ-दस पन्ने में जो लेख लिखा उसमें मोहल्ला जैसे चर्चित ब्लॉग की कहीं कोई चर्चा ही नहीं की। मैं इस बात को पचा ही नहीं पा रहा था कि इतने पॉपुलर ब्लॉग को कोई कैसे छोड़ सकता है र तब मैंने मोहल्ला पर ही पोस्ट लिखी। वो लेख भी देशभर में बिकनेवाली नए विमर्शों की त्रैमासिक वाक् में छपी थी।... लेकिन धीरे- धीरे मैं समझने लगा कि हम या हम जैसे कोई भी नए लोग जब ब्लॉग की दुनिया में आते हैं तो उसे बहुत ही मासूम और इन्सेंट माध्यम मानने लगते हैं। इसी क्रम में,
कलम छोड़कर जब लोगों ने कीबोर्ड थामा तो एकबारगी तो ऐसा लगा कि अब हिन्दी समाज हीनता की ग्रंथि जल्द ही मुक्त हो जाएगा। क्योंकि अब कतरन फाड़कर दिखानेवाले भी औकात में आ जाएंगें जो अबतक मुनादी किए फिरते थे कि देखोजी, हमारा छपा है। यहां तो मामला एकदम से साफ है कि जिसको लिखना है लिखे, जैसा चाहे लिखे। जिसमें औकात होगी, उसे लोग पढ़ेंगे। संपादक जैसे किसी भी नॉलेज ब्राकर की जरुरत नहीं है। आप ही लेखक, आप ही संपादक और जो कुछ भी आर्थिक मुनाफा होगा, उसके हकदार आप ही। लेकिन, फिर उस कहावत का क्या होता-
चल जाओ चाहे नेपाल, रहेगा वही कपाल।
आमतौर पर हिन्दी समाज में कोई विचारधारा या तकनीक आती है तो उससे इस बात की उम्मीद कर ली जाती है कि अब क्या, इसके आते ही सारी झंझटें दूर हो जाएंगी। परिवार से लेकर व्यक्तिगत कुंठा तक सारी चीजें दूर हो जाएंगी। जबकि सच्चाई ये है कि जब भी हम किसी चीज को अपनाते हैं तो उसे अपनी मानसिकता के साथ शामिल करते हैं। इसलिए माध्यम के बदल जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता।
हिन्दी समाज में पॉपुलर होने का बहुत ही सीधा फंड़ा है। शुरु में लात खाओ और बाद में लात मारने की कला सीखो और फिर लात मारने और गलती से खा लेने पर बर्दाश्त करने की कला सीखो। इसे आप बने रहने का बेसिक फंड़ा भी कह सकते हैं और इसी में अगर बरकत होती रही तो बने रहने से आगे की स्टेप जिसे अपनी भाषा में मठाधीशी भी कहते हैं। इस फार्मूले के तहत लिखते-पढ़ते रहने से कभी मलाल नहीं होता, कुंठा कभी पनपने नहीं पाती।
खुल के बोल वाले भायजी अगर आप इतनी बात समझते हैं, समझते तो हैं ही, बस ध्यान से उतर गया होगा तो अब आपको समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि पांच हजार के ब्लॉग के बीच तीन ही क्यों।...और जबाब मिलते ही मलाल थूक दीजिएगा, प्लीज....।।।
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मथुरा में छः साल की बच्ची को आग में झोंक देने की घटना पर देशभर के चैनलों ने
स्क्रिप्ट लिखे। किसी ने कृष्णनगरी में राक्षस तो किसी ने दरिंदा शब्द का
प्रयोग किया। मेरे दोस्त ने भी स्क्रिप्ट लिखी। लेकिन उसकी स्क्रिप्ट को लेकर
मामला थोड़ा फंस गया।
मीडिया में इस खबर को लेकर जो कॉमन रही जिसे कि सारे चैनलों और अखबारों ने फालो
किया वो ये कि बच्ची के आगे दलित जोड़ना जरुरी है। सच पूछिए तो खबर बिकने के
लिए यही एक शब्द जरुरी था।इसके बिना खबर का कोई सौन्दर्य ही नहीं बनता। दोस्त
भी इस शब्द को छोड़ना नहीं चाहता था, न छोड़ना उसकी मजबूरी भी रही होगी। लेकिन
साथ में उसने जो किया वो ज्यादा रोचक है। उसने लिखा-
छः साल की बच्ची को सवर्णों ने आग में झोंक दिया। ये स्क्रिप्ट आगे गयी और बॉस
ने उसे काटकर दबंग कर दिया।
दोस्त का बहुत ही साफ तर्क है कि जब आप एक तरफ जातिगत शब्द का प्रयोग कर रहे
हैं तो दूसरी तरफ भी उसी के मुताबिक शब्द का प्रयोग करना होगा। यानि दलित के
साथ सवर्ण। ये दबंग शब्द का तो कोई तुक ही नहीं बनता। लेकिन बॉस का कहना था कि
नहीं, सवर्ण कैसे लिखोगे, दबंग ही ठीक है।
इससे आप क्या अर्थ निकालते हैं। एक बात तो साफ है कि इस घिनौनी हरकत के साथ
सवर्ण शब्द जोड़ दिए जाएं ये बात ठीक नहीं है। हो सकता है इससे देशभर के सवर्ण
भड़क जाएं और दिखाए जानेवाले चैनल में आकर तोड़-फोड़ मचा दें।
लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि इससे खबर को बताते हुए भी एक खास तरह की सावधानी
या फिर मानसिकता को बनाने की कोशिश की गयी। इस बात को मान भी लिया जाए कि हिंसा
न भड़के इसलिए सवर्ण शब्द न लिखकर दबंग का प्रयोग किया गया। लेकिन,
दूसरी तरफ दलित लिखकर क्या साबित करना चाह रहे हैं। यही न कि चैनल दलितों को
लेकर बहुत ही सहानुभूति रखता है। वो भी वहां जहां की सरकार दलितों के हित में
हमेशा तैयार खड़ी है। ये तो आप सोचते हैं। हो सकता है इसका सामाजिक प्रभाव कुछ
और बनता हो।
इधर आप देखिए कि दलित-विमर्श के नाम पर दलितों की स्थिति मजबूत करने के बजाए
दलित नेतृत्व उन सारे प्रसंगों को खोज लाने में अपनी ताकत झोंकती नजर आती है
जहां सवर्णों ने उनका शोषण किया, उनका अपमान किया। इन्हीं संदर्भों को
खोजते-खोजते वो प्रेमचंद की रचना रंगभूमि और गोदान तक चले जाते हैं और एक हद तक
प्रेमचंद जैसे प्रगतिशील रचनाकार भी दलितविरोधी लगने लग जाते हैं। ऐसा करने से
दलितों का कितना भला होता है इसके आंकड़े हो सकता है उन नेताओं के पास हो।
लेकिन सवर्ण के प्रति दलित आक्रोश का ग्राफ जरुर बहुत उपर चला जाता है जो कि
दलितों के हित में कम और नेताओं के हित में ज्यादा है। इस ग्राफ के भीतर वो
विकास काम के प्रति अपने निकम्मेपन को छिपा ले जाते हैं। इस अर्थ में ये पूरी
कारवाई हिन्दूवादी रुझान की राजनीति करनेवालों से किसी भी मामले में अलग नहीं
है। जो एक तरफ अपनी गौरव गाथा बताने के साथ ही ये भी बता देते हैं कि आज हमारी
दुर्दशा किसने की है।...और बंदा अपनी स्थिति सुधारने के बजाए प्रतिशोध में कूद
पड़ता है और सारा मामला विकास बनाम प्रतिशोध बनकर रह जाता है।
इसलिए दलितों के प्रति सहानुभूति जताने का जो रवैया चल निकला है जिसमें कि
मीडिया भी शामिल है। आनेवाले समय में वो भी इस बात का संदर्भ बने कि इसने देश
में जातिवाद की जड़ को मजबूती दी है। क्योंकि सहानुभूति का छद्म आगे जाकर जरुर
चरमराएगा और दलित इस बात को समझने लगेंगे कि जहां-जहां दबंग शब्दों का मीडिया
ने प्रयोग किया है, दरअसल वहां सब के सब सवर्ण ही रहे हैं। इसलिए मीडिया को अभी
भले ही लग रहा हो कि शब्दों के कुछ उलटफेर से दलितों के प्रति सहानुभूति और
सवर्णों का बीच-बचाव एक साथ कर ले रही है लेकिन बहुत जल्द ही शब्दों की ये
कलाबाजी दलितों की समझ के भीतर होगी। हर दलित शोषण और अत्याचार से जुड़ी खबरों
को बाकी चीजों को छोड़कर अंधाधुन केवल दलित बोलकर चलाने और दूसरी तरफ सवर्ण की
जगह दबंग जोड़ने के पहले सोचना होगा। नहीं तो... अभी तो बाजारवाद, पूंजी और
अश्लीलता में लिपटी मीडिया को कोस ही रही है लेकिन कल को इस पर जातिवाद को
मजबूत करने का आरोप भी लग जाए, जातिगत आधार पर खबर प्रसारित करने का आरोप लग
जाए तो वो भी बेबुनियादी नहीं होंगे।
यही बात आज की जनसत्ता के संपादकीय उत्पीड़न के हाथ पर भी लागू होती है।
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कल तक आपने पढ़ा कि मीडिया जो फ्रेश इतिहास लिखेगी उसमें इतिहास के नाम पर ऑडियालॉजी नहीं झोंकी जाएगी और मनोरंजन का पूरा ध्यान रखा जाएगा कि कोई पढ़ते-पढ़ते सो न जाए बल्कि सोते हुए बंदे के बगल में बोलकर पढ़ा जाए तो वो भी जाग जाए। इसके साथ ही हमने तीन अध्यायों की भी चर्चा कर दी थी कि क्या-क्या कंटेंट होंगे. अब आगे-
अध्याय- 4
घूस, घोटाले,कबूतरबाजी और नजराने का इतिहास
- सिंधु घाटी संभ्यता से लेकर चारा, ताबूद और डॉ.गुर्दा कारनामे तक
- वैदिक काल से लेकर विधान-सभा और संसद तक
- खानाबदोश जीवनशैली से बंगारु लक्ष्मण और हॉकी हंगामें तक
ठुल्लों, ट्रैफिक जाम,शराबी चालकों का इतिहास
- राजप्रासाद प्रहरी से लेकर इंडिया गेट ट्रैफिक पुलिस तक
- मोहनजोदड़ों की सड़क व्यवस्था से बीराटी सड़कों तक
- सोमरस से लेकर वृद्ध भिक्षु तक के सेवन तक
- अठपहिए रथ से लेकर बीएमडब्ल्यू कार तक
अध्याय-5
चमचे, चटुकारों औऱ मसाज़मैन का इतिहास
-शकुनी,मंथरा युग से राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों तक
- प्राइमरी स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक
- गांव की पंचायत से लेकर संसद तक
निकम्मे, नालायक, निठ्ठलों और दलालों का रोचक इतिहास
- अजगर करै नचाकरी सभ्यता से बड़ा बाबू तक का सफर
- मुरेठा एज से लेकर खाकी फेज तक
- मशालची से लेकर पर्चीबाबू तक का इतिहास
सामाजिक अपंगता की निर्मिति का इतिहास
-भांग, चरस, अफीम से लेकर टीआरपीवाद तक
-जुआ समाज से लेकर मॉल-मल्टीप्लेक्स एरा तक
अध्याय- 6
अफवाह,सनसनी,मातम,उन्माद तकनीक का सुलभ इतिहास
-मुनादी तकनीक से मल्टीकैम तकनीक तक
-मदारी कला से लेकर एक्सपर्ट पैनल तक
-मुर्गेबाजी कौशल से फोनलाइन तक
- जहर मिलाने से लेकर न्यूज घोलने तक
नोट- अध्याय 6 में प्रकाशक की इच्छानुसार बदले जा सकते हैं।
उपसंहार-
जरुरी नहीं है कि देश की हालात को बदलने के लिए कोई क्रांति की जाए। ये भी जरुरी नहीं है कि लोग सड़कों पर आकर धरना-प्रदर्शन करने लगें। जो इतिहास में घटित हो चुका है उसे स्टूडेंट के बीच पढ़ाकर उसे बोर किया जाएष बेहतर होगा कि उन सारे विषयों को शामिल किए जाएं जिससे आज का युवा इतिहास कता मजा ले सके। और इसके लिए जरुरी है कि सिनेमा, क्रिकेट,सनसनी औऱ धमाकों को तरजीह दी जाए। सामाजिक बदलाव का एक ही रास्ता है कि लोग अरबों रुपये खर्च करके मल्टीनेशनल्स ने जो कम्पनियां बनाए हैं, उसमें खूब मेहनत करके काम किया जाए। छोटी-मोटी चीजों के लिए सरकार पर निर्भर रहने के बजाए बम खुद उसे खरीदें और ऐसी क्षमता पैदा करें। और सबसे जरुरी है कि मीडिया के इस इतिहास को और मजबूत और लोकप्रिय बनाने के लिए बेहतर की जगह वस्तुस्थिति के हिसाब से सोचना शुरु करें।
संदर्भ- सामग्री
1. दुनियाभर के क्रिकेट मैंदान, पवेलियन,बांडरी वॉल औऱ बाजार
2. देशभर के सिलेब्रिटियों के टायलेट,बेडऱुम और लॉन
3. नेताओं के दफ्तर, आवास और गैरेज
4. कम्पनियों की ऑफिसें,बीयर बार, डिस्को थेक
5. ब्यूटी पार्लर, स्वीमिंग पुल, पांचसितारा होटलें
6. बड़ी गाडियां, काले शीशों के भीतर के दृश्य और फ्लाई ओवर
7. गार्डन पार्क,दालमंडी औऱ दलाल पथ
( ये सारे संदर्भ इतिहास की किताबों से गायब हैं, बिना इनके इतिहास लिखने और होने का दावा करना बेमानी है।
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