यूजीसी की स्कॉलरशिप की स्कीम के तहत अब एम।फिल् और पीएच।डी करने वाले प्रत्येक रिसर्चर को प्रतिमाह ३००० और पांच हजार रुपये मिलेंगे। किताबें औऱ बाकी चीजों के लिए एक साल में दस हजार रुपये। थोड़ी देर के लिए अगर चैनलों में मिलनेवाली पैकजों की बात छोड़ दे तो ये किसी भी रिसर्चर के लिए उसेक जीवन का सबसे सुखद क्षण है। ये बात सही है कि चैनलों के मुताबिक पांच हजार रुपये कुछ भी नहीं है, इससे कहीं ज्यादा रकम वहॉ के ऑफिसों के लिए काम करनेवाले सर्विस ब्ऑय की होगी। लेकिन इस पांच हजार रुपये में एक रिसर्चर अपने मन मुताबिक वो सबकुछ कर सकता है जो कि पचास हजार रुपये मंथली मिलने पर भी कोई पत्रकार शायद ही कर पाता है।
मीडिया पर रिसर्चर कर रहे मेरे कुछ दोस्तों से बात हुई। उनका कहना है कि अभी उन्हें पिछले छ महीने का पैसा एक साथ जोड़कर मिलेगा। स्कॉलरशिप की ये स्कीम मार्च २००७ से लागू है लेकिन पैसे मिलने अब शुरु हुए हैं। इसलिए ६-६ महीने का एक साथ मिल जाएगा और उसके बाद महीने के हिसाब से। मेरे कुछ साथियों को एक ही साथ ४०-४५ हजार मिल रहे हैं, मिलनेवाले हैं। उनका कहना है कि इतने पैसे से तो कामलायक, ठीकठाक हैंडीकैम आ जाएंगे और अगली खेप में लैपटॉप के लिए सोचा जाएगा। हमारे आसपास, हरियाणा में, राजस्थान में, बिहार में और यहां तक कि दिल्ली में कई ऐसी घटनाएं होतीं रहती है जिन पर कि कायदे से नोटिस नहीं ली जाती। मेनस्ट्रीम की मीडिया का एक बनाया ट्रेंड है जिसमें दो या तीन लोगों की बाइट सहित डेढ़ से दो मिनट की पैकेज में सारी बातें डाल देगी। सूचनाएं तो चारों तरफ फैल जाती है, मानवीय संवेदना का पक्ष बिल्कुल छूट जाता है। अब तक तो बहुत हुआ तो अखबार में चिट्ठी लिखकर अपनी असहमति और पक्ष दर्ज कराते रहे लेकिन इन पैसों से अब डॉक्यूमेंटरी बनायी जा सकती है। बाकी ट्यूशन पढ़ाकर शोध-कार्य करना जारी रहेगा।
इस हिसाब से अगर विचार करें तो एम्।फिल या पीएचडी के दौरान रिसर्चर एक भी डॉक्यूमेंटरी बनाता है तो साल में कम से कम ७५-८० डॉक्यूमेंटकी बन जाएंगे। ....और अगले सालभर तक शहर के अलग-अलग हिस्सों में स्क्रीनिंग करा सकेंगे। किसी एक मुद्दे को या फिर अपने रिसर्च टॉपिक को लेकर ही अगर ये फिल्म बनाते हैं तो आज जो हम मेनस्ट्रीम की मीडिया के मोहताज बने है, उसके सही या गलत हर खबर पर हम अपनी राय बना लेतें हैं, इस पर थोड़ी रोक जरुर लगेगी। चाहे तो कुछ लोग मिलकर सामूहिक स्तर पर पत्रिका निकाल सकते हैं। ऐसा नहीं है कि विश्वविद्यालय में इस स्तर के काम कभी शुरु नहीं हुए लेकिन हर बार देखने में आया है कि पैसे के अभाव में उसे बीच में बंद करना पड़ गया। लेकिन अब इसकी पहल की जाती है तो लम्बा चलेगा।
दूसरी बात जो मैं समझता हूं कि मीडिया जैसे सेंशेटिव प्रोफेशन में एक बड़ी तादाद में खर-पतवार शामिल हैं, जिन्हें बेसिक चीजों की समझ नहीं है लेकिन देशभर के लोगों के लिए राय बनाने का काम कर रहें हैं। कहीं से भी सालभर की डिप्लोमा डिग्री लेकर समाज को रातोंरात बदलने का जज्बा लेकर आते हैं, वो समाज को कितना बदल पाते हैं, ये तो समाज ने बोलना शुरु कर दिया हैं लेकिन महीने दो-महीने के अंदर वो खुद कितना बदल जाते हैं इसका अंदाजा शायद उन्हें भी न होता होगा। अकादमिक स्तर पर भी मीडिया और उनसे जुड़े लोगों के रवैये पर लगातार विरोध और गुत्थम-गुत्थी चलती रहती है। इस स्कॉलरशिप से उन्हें एक नया स्पेस मिला है, काफी कुछ वो अपने मुताबिक कवर कर सकते हैं, लिख सकते हैं। ये भी संभव है कि गुजरात जैसे दंगे जिसका कि सामाजिक स्तर पर बड़ा प्रभाव रहा और जिसे लेकर मीडिया से भी शिकायत रही कि उसने चीजों को तोड़-मरोड़कर दिखाया। ऐसे मसले पर यूनिवर्सिटी के कुछ रिसर्चर टीम बनाकर, अपनी यूनिट लेकर खुद ऐसी जगहों पर जा सकते हैं और अपने तरीके से टीआरपी के दबाव से मुक्त होकर तटस्थ रुप से सारी चीजें लोगों के सामने रख सकते हैं।
तीन साल, चार साल जो भी समय लगता है एम् फिल पीएचडी में बाकी के लोगो की तरह गाजियाबाद में प्लॉट या फ्लैट न भी ले पाए तो भी इस दौरान मीडिया में काम करने का तरीका ढंग से मालूम हो जाएगा। इस बात का भी अंदाजा लग जाएगा कि क्या मीडिया को बनाए रखने के लिए बिना बाजार के गुलाम हुए सीधे-सीधे खबर देने से मामला बन जाएगा या फिर वाकई हर खबर एक खबर के बाद विज्ञापन के लिए ब्रेक लेना जरुरी है। इस बात का भी अंदाजा लग जाएगा कि बिना ताम-झाम के बिना लाग- लपेट पेज थ्री और फाइव सी में घुसी हमारी बातों और खबरों में लोगों की कितनी रुचि है। वाकई ऑडिएंस दिनभर जलवे देखना चाहती है या फिर चैनल उनके साथ जबरदस्ती करके अपनी बात थोपते आ रहे हैं।
यानि कुल बातों का लब्बोलुवाव इतना है कि रिसर्च के दौरान मिलनेवाले स्कॉलरशिप से रिसर्चर चाहे तो तरीके का वैकल्पिक मीडिया खड़ी कर सकता है। एक ऐसी मीडिया जो मानवीय संवेदना के ज्यादा करीब है। बिना फ्रशट्रेशन के अपने मन मुताबिक काम कर सकता है और चैनल में काम कर रहे साथी मीडिया के खोए हुए अर्थ को पाने की छटपटाहट में हैं, यूनिवर्सिटी में मीडिया पर शोध कर रहा रिसर्चर आसानी से वो अर्थ दे सकता है।....और सही तरीके से काम करता गया तो भविष्य में भी दुनियाभर की शर्तों पर किसी चैनल या अखबार में काम करने की नौबत नहीं आएगी।
एनडीटीवी भी ढोंग है ? इमैजिन पर छूटता है भोले बाबा का झोला
Posted On 10:08 pm by विनीत कुमार | 3 comments
बाजार की मार से कॉल सेंटर में तब्दील हो चुके न्यूज चैनलों के बीच भी एनडीटीवी की अपनी पहचान है। अभी भी आप देखेंगे कि बाकी चैनल जहां खबरों के नाम पर रियलिटी शो की उठापटक और फाइव सी तक सिमट जाते हैं, एनडीटीवी इसके बाहर की दुनिया की भी खबर ठीकठाक लेता है। आज भी आपको यहां खबर के नाम पर सनसनी और फेब्रिकेटेड आइटम कम मिलेंगे। बाकी चैनलों से किसान और हाशिए पर के लोग भले ही गायब होते जा रहे हों लेकिन एनडीटीवी आज भी इनसे जुड़े मसलों को बड़ी ही शिद्दत से उठाता है।....ऑडिएंस के बीच इसकी एमेज की बात करें तो ये देश का वो न्यूज चैनल है जिसे कि सबसे कम लोग गाली देते हैं। मेरी समझ से तो अगर दूरदर्शन से सरकारी तामझाम और पंजा तो कभी कमल बनती प्रक्रिया को हटा दें तो जो कुछ भी बचेगा वो सब एनडीटीवी में मौजूद है। इस अर्थ में एनडीटीवी पढ़े-लिखे लोगों के बीच सम्मानित चैनल है।
लेकिन कहते हैं न कि- अखंड कुछ भी नहीं है। न ही मंदिर जानेवालों की आस्था और न ही एनडीटीवी देखनेवालों का विश्वास। सो हम जैसे दर्शकों के साथ भी इधर ऐसा ही कुछ हो रहा है। एक बड़ी ही सामान्य सी बात है कि जब कोई भी कम्पनी, संगठन या सेवाएं बाजार में शामिल होती है तो उसकी सबसे बड़ी कोशिश होती है, ग्राहकों के बीच साख पैदा करना, अपनी ब्रांड इमेज बनाना। कई बार इमेज समय बीतने के साथ बनते हैं कि जो जितना पुराना होगा, वो उतना ही भरोसेमंद होगा। बाजार में बाटा के जूते, डाबर का हाजमोला, शहद और बाकी चीजें भी इसी बूते बिक रही हैं। जो बहुत नामी नहीं भी है, जिसने कोई ब्रांडिंग नहीं है वो भी अगर अपने दूकान के आगे लिख दे- ७० साल से आपकी सेवा में तो आपको थोड़ी देर के लिए भरोसा जरुर हो जाएगा। दिल्ली के चांदनी चौक में ऐसी सैंकडों दूकाने मिल जाएंगी जो इतिहास से जोड़कर अपनी ब्रांड इमेज बना रहीं हैं।
न्यूज चैनल के साथ मजबूरी है कि वो ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि न्यूज चैनलों के साथ जुम्मा-जुम्मा आठ रोजवाली कहावत लागू होती है। और लगभग सारे चैनलों की इमेज इसी आधार पर बनी है कि कम से कम समय में किसने समाज के बीच अपनी पहचान बनायी है, खबरों को दिखाकर समाज को साकारात्मक दिशा में बदलने का काम किया है, वगैरह॥वगैरह। इस मामले में भी दर्शकों ने एनडीटीवी को सही सम्मान दिया है।
लेकिन बाजार और कम्पनी के साथ एक दिक्कत है। वो ये कि अगर कम्पनी ने शुरु में तौलिया बनाया और बाजार में बेचा, उसकी दुकान जम गयी तो फिर बनियान भी बनाएगी, फिर लुंगी भी, फिर बिकनी भी, फिर जुरावें भी और पता नहीं क्या-क्या। इसके भी दो तरीके हैं। एक तो कि इससे जुडी बाकी चीजें भी बनाए। जैसे दूध बेच रहे हो तो मक्खन भी बनाओ, ब्रेड भी, शहद भी, दही भी, घी भी और धीरे-धीरे ऐसा करो कि नाश्ते की टेबल पर सिर्फ आपका ही प्रोडक्ट हो। दूसरा तरीका है कि वो सब कुछ बनाओ जिससे अलग-अलग पेशे और मिजाज के लोग जुड़ जाएं। अब चड्ड़ी तुम्हारे यहां से खरीद रहा है तो फिर चश्में के लिए कहां जाए। धूपबत्ती तुम्हारी जला रहा है तो अखबार किसी और की क्यों पढे। कैडवरी ने तो कह दिया कि दूसरे का नमक नहीं खाना और अब बाजार में उसकी नमकीन भी है। यानि ऐसा करो कि आप ग्राहक की जिंदगी में ज्यादा से ज्यादा शामिल हों।
इधर कम्पनी की, एक प्रोडक्ट को लेकर जैसी इमेज बन गई वो चाहती है कि बाकी प्रोडक्ट जब बाजार में उतारे तो लोगों का वही भरोसा हासिल कर ले। टाटा की बनायी बाल्टी का हत्था नहीं उखड़ता तो फिर मोबाइल का नेटवर्क कैसे गायब हो जाएगा, किंगफिशर का पैग मारकर जब रात रंगीन हो जाती है तो एयरलांइस में बैठने पर सुबह हसीन होने में क्या दिक्कत है। हम ग्राहकों का भरोसा भी इसी तरह से पनपा है औऱ मजाक में कहते भी हैं कि अगर एडीडास कल से धोती बेचने लगे तो बाबूजी के लिए वही ले जाएंगे और अगर रिवलॉन मेंहदी बेचने लगे तो वही भाभी को ले जाकर देंगे। ब्रांड इमेज दोनों तरफ से ऐसे ही बनते और बरकरार रहते हैं।
एनडीवी और उसके नए इंटरटेनमेंट चैनल एनडीटीवी इमैजिन के साथ ऐसा ही हुआ है। एनडी को लगा कि खबर देखने तो हमारा ऑडिएंस यहां रेगुलर आता है लेकिन मनोरंजन के लिए फिर से स्टार या जी पर चला जाता है। क्यों न उसे ज्यादा से ज्यादा समय तक अपने घर में ही रोके रखें। सो उतर गया मनोरंजन की दुनिया में भी। इधर हम एनडी के दर्शकों को भी खटकता रहता कि न्यूज तो बहुत प्रोग्रेसिव तरीके का मिल जाता है लेकिन मनोरंजन करना होता है तो वही सास-बहू की हांय-हांय और पाखंडियों के चैनलों की ओर मुंह करना पड़ जाता है। कमजोर दिल के मेरे साथी डरते भी रहे कि कहीं हिन्दूवादी न हो जाएंगे। इसलिए इमैजिन ने जब रामायण दिखाना शुरु किया तो भी बुरा नहीं लगा क्योंकि दिमाग में था कि एनडी इसे अपने एप्रोच से दिखाएगा। जबरदस्ती के क्षेपकों को हटाकर एक तर्क के साथ पेश करेगा लेकिन दो-तीन एपिसोड के बाद देखना छोड़ दिया।
बाकी नच ले विद सरोज खान के साथ लगाव बना रहा। इधर मैं तेरी परछाई हूं, राधा की बेटियां कुछ कर दिखाएगी, धरमवीर, जस्सू बेन जयंतीलाल जोशी की ज्वाइंट फैमिली को भी बीच-बीच में देखता रहा औऱ प्रोग्रेसिव एलिमेंट खोजता रहा। इसी बीच कल रात में समझिए कांड ही हो गया।
एक नए आइडिया के साथ कि इमैजिन के जितने भी प्रोग्राम हैं, उनके जितने भी कलाकार हैं सबको मिलाकर होली पर एक स्पेशल प्रोग्राम बनाया। एक सीरियल की कहानी दूसरे से जुड़ी हुई और साथ में सरोज खान भी । आइडिया नया और बढ़िया था। लेकिन होली की मस्ती के नाम पर चड्ढा-चोपड़ा की फिल्मों वाली चकल्लस। फिल्मी गानों पर सारे कलाकारों का नाच-गाना।॥
.....और तो और जब ये स्पेशल खत्म होने को है तो जस्सूबेन कहती है कि इस बार शिवजी ने दर्शन नहीं दिए। जयंतीलाल समझाता है कि इस बार खुशियों के रुप में भोलेबाबा हमारे घर आए। मुझे लगा कि एनडी ने अपना असर दिखाया। लेकिन तभी आया एक झोला लेकर आती है और बताती है कि सारे मेहमानों से पूछ लिया- किसी का नहीं है। जस्सूबेन खोलती है तो पाती है कि उसमें एक शंख है जिस पर काले रंग की एक शिवलिंग बनी है। गले से लगाते हुए जस्सूबेन कहती है...पधारिए भोलेबाबा।
क्या वाकई एनडीटीवी २४ इनटू ७ देखने वाले दर्शकों को इसकी जरुरत थी। चैनल चाहे तो तर्क दे सकता है कि हमें बाजार में बने रहने के लिए दिखाना पड़ेगा। आपकी बात तो ठीक है लेकिन दर्शक तो आपके इस एप्रोच को एनडीटीवी के चरित्र से जोड़कर देखेगी। और फिर आपने ये कैसे मान लिया कि आप जो कुछ भी दिखाएंगे, हम उसे प्रोग्रेसिव मान लेंगे। हमें तो यही लगता है कि ये पाखंड साथ-साथ चल जाए तो गनीमत है, चैनल चल भी जाए तो आपकी आइडियोलॉजी तो पिट ही जाएगी, अब शायद आपको इसकी जरुरत न हो।॥हम तो मनोरंजन चैनल को लेकर अनाथ के अनाथ ही रह गए।
एक्सचेंज ऑफर, बूढ़े मां-बाप जमा करो, नवजात शिशु ले जाओ
Posted On 11:17 pm by विनीत कुमार | 2 comments
आपके घर में आजकल एक नया चैनल आ रहा होगा- एनडीटीवी इमैजिन। आपकी माताजी को पता होगा क्योंकि वो रामायण भी दिखा रहा है। तो सुनिए...सात से आठ उसी चैनल पर एक प्रोग्राम आता है- नच ले वे विद सरोज खान। पूरा दिखा सकें तब तो सोने पे सुहागा हो जाए नहीं तो शुरुआत का कम से कम दस मिनट जरुर दिखाएं। आपको ऑफिस से लौटने में देर हो जाती है तो कोई बात नहीं, सुषमा तो तब तक स्कूल से आ जाती है, उसी को बोल दें। ये दस मिनट उनके लिए होता है जो डांस को रगड़कर तो नहीं सीख पाते लेकिन दस मिनट के अभ्यास से मोटा-मोटी स्टेप्स सीख जाते हैं।॥उतना कि देखकर लगे कि बंदे को डांस की समझ है। अच्छा, अपनी सरोज सीखाती भी वही सारे स्टेप्स हैं जो ऑनडिमांड होते हैं। मसलन मौजा-मौजा या फिर सलामे इश्क,इश्क,इश्क सलामें इश्क। अगर मा-बाबूजी ने इतना सीख लिया तो समझिए चारों धाम की चौखट पूरी हो गई।
इतना सबकुछ हो जाने पर ऑफिसीयली तौर पर अपनी फैमिली को रॉक एन रॉल फैमिली घोषित कर दीजिए। आपको तो नाचना आता ही है, एक-दो घूंट गुर्दे की दवाई मिल गई तो अच्छा नाच ही लेंगे। सुषमा कत्थक में डिप्लोमा है ही और आरुशि को रेगुलर डांस क्लास में भेज ही रहे हो। इधर मां-बाबूजी का पैकेज तैयार हो ही गया है। बस अब आप हो गए तीन पीढियों की ऐसी फैमिली जिस पर खानदान को गर्व हो सकता है।
अब आज से प्रत्येक शुक्रवार और शनिवार को जीटीवी ९ से दस बजे तक के लिए बैठ जाइए। आज आपके लिए पहला दिन होगा। आजसे आपको मिलेंगे अजय देवगण, काजोल और तनुजा। अजय और काजोल भारत के लिए सबसे बेजोड़ और आदर्श पति-पत्नी हैं। मेरे हिसाब से तो राम और सीता से भी ज्यादा बेजोड़ क्योंकि दोनों मिलकर फ्रीज और फोन बेचते हैं। कंधे से कंधा मिलाकर। राम की तरह नहीं कि वो कंदमूल लेने चले गए और इधर सीता के माथे गोबर से घर लीपने का काम पड़ गया। आपको मन है तो कह सकते हैं कि अजय भगवान राम से ज्यादा प्रोग्रेसिव है और इधर काजोल ने भी साबित कर दिया है कि वृद्ध पूंजीवाद की परवरिश बिना स्त्रियों के सहयोग के नहीं की जा सकती।....और जिन बूढ़े दर्शकों को उनके नाती-पोतों ने सोनी मैक्स से जबरदस्ती घसीटकर हंगामा, बिंदास और कार्टून नेटवर्क पर ला पटका है उन बुजुर्गों का खोया हुआ सम्मान ये जीटीवी वाले दिलाएंगे। तनुजा को लाएंगे और बुजुर्गों का मन एक बार फिर से हरा होगा, माताजी फिर तनुजा के सौन्दर्य से डाह करेगी और बहू की तरह ब्यूटी कॉन्सस हो जाएगी, फिर बूढ़े बाप का मन कहीं न भटकेगा और रात की कराह ओ मेरी सिद्धेश्वरी में तब्दील हो जाया करेंगे। ओल्ड एज एक बार फिर से गोल्ड एज में प्रवेश करेगा। बूढ़ी मां के प्रिंटेड ब्लॉउज के लिए एक बार फिर बाबूजी पार्टटाइम नौकरी के लिए जुगत भिड़ाने में लग जाएंगे, सुषमा को फिर राहत मिलेगी और मांजी भी सुषमा से कुमकुम नहीं मांगेगी, अपने पति की बूढ़ी कमायी से शिल्पा चार चांद लगाएगी।....इतना मजा, फायदा और बदलाव तो तब आएगा जब आपकी रॉक एन रॉल फैमिली महज दर्शक की हैसियत से जीटीवी को ९ से १० देखती है और अगर दीपासती माई की किरपा से प्रोग्राम में पार्टिसीपेट करने का मौका मिल गया तब तो आपके ये बूढ़े मां-बाप दो-चार ठुमके लगाकर ही चैनल से इतने पैसे दिलवा देंगे कि बड़ी होने पर आपकी आरुशि भी एयर हॉस्टेस, टीवी एंकर या फिर इवेंट मैनेजर बनकर नहीं कमा पाएगी और अगर तरक्की मिल भी गई तो बदनामी भी साथ लाएगी।
इसलिए हे पाठकों, मेरी आपसे बस इतनी ही अपील है कि बूढ़े मां-बाप को दुरुस्त करके एनडीटीवी और जीटीवी की खुराक जरुर लगाएं, यकीन मानिए उनके मरझाए चेहरे पर रौनक फिर से लौट आएगी। ....और बाकी तो चैनल खुद साबित कर ही रहा है कि आपके बूढ़े मां-बाप भी आपको बना सकते हैं धन्ना सेठ। इसलिए ये कब काम आ जाएं आप भी नहीं जानते। हो सकता है कल को कोई एनजीओ ऑफर निकाल दे कि अपने बूढ़े मां-बाप को जमा कीजिए और जिनको लड़का-बच्चा नहीं हो रहा वो नवजात शिशु ले जाए, एक्सचेंज ऑफर
आगे पढिए बदलते समाज में बुजुर्गों की हैसियत
इतना काम आप सप्ताह दिन के अंदर कर लीजिए।
अब जब मां- बाबूजी आ जाएं तो बाबूजी को फैब इंडिया ले जाइए। चटक, झक-झक रंग के दो-तीन कुर्ते खरीद दें, खादिम या बाटा से एक बढ़िया चप्पल भी। मांजी को बाबा खड्गसिंह मार्ग के इम्पोरियम से दो-तीन ढ़ंग की हैंडलूम साडियां। अगर कहीं से लोन का जुगाड़ बन जाता है तो आप थोड़ा हल्का ही सही एक ब्रेसलेट खरीद दें। फसल बचाने के चक्कर में सब गंवा चुकी होंगी। कुल मिलाकर मां-बाबूजी का हुलिया इतना दुरुस्त कर दें कि लगने लगें कि वो आप ही के मां-बाबूजी हैं।...और आरुशि भी शान से कह सके कि ये मेरे ग्रैंड पा हैं।
अब इतना हो जाने पर मां-बाबूजी को थोड़ी अंग्रेजी सिखाएं। ज्यादा नहीं,यू नो, आइ मीन, ओके, एक्चुअली, फक यार,थैंक्स, बट...ब्ला.ब्ला..। आप जानते हैं, सुषमा भी इसमें आपकी मदद करेगी। बाबूजी को थोड़ा सिविल सोसाइटी के मैनर्स सीखाएं। मसलन किसी के हाथ में झोला देखकर ये न पूछने लग जाएं-क्या ले जा रहे हो बेटा। रात में कोई बंदा लड़खड़कर चल रहा हो तो न पूछें-तबीयत तो ठीक है न बेटा। बेसमेंट में खेलते बच्चे से न पूछे कि आज तुम्हारी मम्मी ने कौन-सी सब्जी बनायी है। मां को सुषमा देख लेगी। वो भी अपार्टमेंट की महिलाओं से ज्यादा मिक्स-अप न हो जाए। किसी ने कह दिया कि मांजी आप तिलभोगे के लड्डू बनाती है और आप चल न दें बनाने के लिए। किसी के यहां साग टूंगने की कोई जरुरत नहीं है। बोलिए कि जब समय मिले तो कुछ क्लासिक नॉवेल पढ़े,कल्ट फिल्में देखे। इतना कुछ अगर आप मेहनत से कर देते हैं तो लगेगा नहीं कि आपके मां-बाबूजी गांव से हैं। बच्चे तो आपके हैं ही देहलाइट।...तो हो गई आपकी रॉक- एन रॉल फैमिली। अब कल बताता हूं कि आगे क्या करना है। तब तक आप भी दिमाग लगाइए कि मां-बाबूजी को इलीट बेटे का मां-बाबूजी दिखने के लिए क्या करना सही रहेगा।.....(क्रमश:)1
८ मार्च को महिला दिवस है, इसकी मुनादी मीडिया तीन-चार दिन पहले से ही कर रही है। आज तो कइयो ने चाबी बनाकर, भारत का नक्शा बनाकर बीच में कुमकुम लगाई हुई महिला की तस्वीर छापी है। तमाम अखबारों और चैनलों के ग्राफिक्स के बंदों ने रातभर खूब दिमाग लगाया है। देशभर के स्त्री विशेषज्ञों को जुटाया है। उन सफल महिलाओं की सूची बनाई है और अखबारों ने फोटो सहित छोटी-छोटी राय प्रकाशित की है।
इधर दिल्ली महिला आयोग ने तो बकायदा मेला लगाया है जिसमें स्त्री और लड़की के हाथों से बनी चीजों की प्रदर्शनी लगायी है। मेरी कुछ दोस्त ने अपनी बुटिक और शोरुम बंद रखे हैं और घर पर ही कुछ करने का मन बनाया है। फोन करके कहा कि शाम को कहीं मत जाना। जोधा-अकबर अभी नहीं देखे हो न। एक को तो सुबह-सुबह ही उसके पति ने पर्ल सेट दिया है इस मौके पर। मेरे कुछ दोस्तों ने बताया कि अगर मूड बन गया तो आज छुट्टी ले लेंगे और खाना भी बाहर खाएंगे या फिर खुद ही कुछ ट्राय करेंगे लेकिन पत्नी को आजभर के लिए बख्श देंगे, हाथ जलाने नहीं देगें।
मीडिया का महिला अभियान बहुत ही व्यवस्थित तरीके से शुरु होता है। कुछ दिन पहले वे ये खोजते हैं कि रिक्शा चलानेवाली पहली महिला कौन है और फिर पहाड़ पर चढ़नेवाली पहली महिला कौन है। और फिर इस तर्ज पर शुरु हो जाता है कि देश की पहली फलां...कौन... पहली फलां कौन.....। अखबार तो उससे सम्पर्क करके उनके संघर्ष की कहानी छाप देते हैं लेकिन चैनल के लिए काम थोड़ा बढ़ जाता है। वो उन तमाम महिलाओं से चैट की कोशिश करते हैं जिन-जिन के घर में चैनल की ओबी वैन पहुंच पाती है या फिर वो महिला खुद स्टूडियो तक आ जाए फिर दिनभर एक ही बात की रगड़ाई।
जो चैनल सीधे-सीधे इस ट्रेंड में कूदना नहीं चाहते और उन्हे लगता है कि महिला दिवस के नाम पर ये सारे तामझाम बेकार हैं वो शहर के कोलाहल से थोड़ी दूर चले जाते हैं और फिर शुरु होता हैं पैकेज। आज हम दुनिया भर में महिला दिवस मना रहे हैं और देश का एक ऐसा भी हिस्सा है जहां की महिलाएं इसका मतलब नहीं जानतीं। अब भी शौच के लिए घर से तीन किलोमीटर चलकर जाती है, इसके लिए उन्हें सुबह चार बजे ही उठना पड़ता है। जीडीपी ९ प्रतिशत हो जाने के बाबजूद बेहाल हैं, दो जून की रोटी तक मय्यसर नहीं।...ऑडिएंस की नजर में सबसे बेहतर दिखने और लगने के लिए जी-जान लगाते एंकर-रिपोर्टर।
विचारधारा के स्तर पर अगर बात होती है तो बहस की गुंजाइश भी बन सकती है कि इसे बनाओ, इसे मत मनाओ लेकिन अब तो इसमें बाजार भी शामिल है और सच कहें तो सबसे ज्यादा तरीके से सक्रिय है। वो बाजार जो विचारधारा और तर्कों पर नहीं खपत पर चलता है। इसलिए आपको जो मन में आए दिन और दिवस मनाइए इससे बाजार को कोई परेशानी नहीं है। जहां राधा-कृष्ण की जोड़ी बिक रही थी अब महिला दिवस के नाम पर लक्क्षीमाई की तस्वीर बिकती है तो क्या दिक्कत है, भंवरीदेवी का टैटो बिकती है तो वही बेचो।
सारे बड़े मॉल में कुछ न कुछ इवेंट होगें। एक-दो साल और होने दीजिए, अभी कायदे से मार्केट की नजर इस पर गई नहीं है। नहीं तो महिला दिवस के सात दिन पहले से सात दिन बाद तक कूकर- कड़ाही, नॉनस्टिक पैन, फ्रीज, वॉशिंग मशीन और घर की तमाम चीजों पर छूट मिलने लगेंगे। स्टेफी महिला मैराथन कराएगा, अयूर हर्वल गांव में गोरापन के लिए शिविर लगाएगा।.....वो सब कुछ होगा, कराया जाएगा जिससे देश की महिलाओं और महिला दिवस के नाम पर अच्छी-खासी खरीदारी की जा सके। अभी गिफ्ट और कार्ड की कम्पनियों का ढंग से कूदना बाकी है।
......इधर सरकारी कोशिशें भी तेज है। इस दिन बड़ी-बड़ी घोषनाएं करो, देश की बेटियों के पक्ष में, गर्भवती होने पर राहत की बात करो, उनसे कहो कि तुम चटाई बनाओ, बाजार हम देंगे। घर में मसाला पीसो, पैकिंग करके बेचने की व्यवस्था हम कर देंगे। दो-चार पुल महिला के नाम पर बना दो। वो सब कुछ करो जिससे लगे कि पितृसत्तात्मक समाज में महिला के लिए भी पूरा स्पेस है। ऐसा महौल तैयार करो कि महिलाएं सूचना अधिकार को लेकर सवाल न करे, विवाह संस्था पर उंगली न उठाए, कचहरी जाने की बात न करे, थानेदार के भद्दे-भद्दे कमेंट पर भी न लजाए और बनी रहे।.....८ मार्च को खूब मौजा-मौजा कर दो, सालभर असर रहेगा। वैसे भी भारतीय जनमानस उत्सवधर्मी माहौल का कायल रहा है। आप इसका वास्तविक संदर्भ न भी बताएंगे तो भी.........

