.

पिछले बुक फेयर के मुकाबले इस बुक फेयर में अपने को लेकर फर्क साफ देख रहा हूं और ऐसा हमारे दूसरे ब्लॉगर कम हिन्दी के साथी भी जरुर देख रहे होगें। लोगों के बीच ये मैसेज जा रहा है कि हिन्दी के रिसर्चर मास्टरों का झोला ढोने और पीछे-पीढे चलने का काम छोड़ रहे हैं।और बड़ी शिद्दत से अपनी पहचान बनाने में लगे हैं।
कल ही की तो बात है। मिहिर, मेरे लिए दोस्त और मास्टरजी के लिए विनीत का जूनियर ( कई बार टोक चुका हूं, उसकी पहचान मेरा जूनियर होने से नहीं है मिहिर होने से है, खैर) ने फोन किया कि चार बजे एक पत्रिका का लोकार्पण है और आप आएं। और बताया कि वो इस पत्रिका का सह-संपादक है।
पत्रिका के लोकार्पण हो जाने के बाद औपचारिक बातचीत के दौरान एक-दूसरे से परिचय का दौर शुरु हुआ। मेरे दो-तीन दोस्तों को साहित्यिक हलकों में लोग मेरे से ज्यादा जानते हैं सो मेरा परिचय कराने की जिम्मेवारी उन्होंने अपने उपर ले ली। ये है विनीत, डीयू से पीएचडी कर रहा है...मीडिया में विशेष रुचि है....और भी कुछ-कुछ ब्ला॥ब्ला॥। कुछ स्थापित साहित्यकारों को मेरी जाति की भनक लग गई थी मीडिया बोलते ही, मेरा नक्शा मेरे पूर्वजों से मिलाते इससे पहले ही मैं कट जाना उचित समझा।
एक साथी ने कोहनी से मारते हुए कहा कि अरे बताओ न अपने बारे में ...ऐसे सोचोगे कि कोई तुमको बुलाकर छाप दे तो कैसे होगा। उधर अखबार में नहीं छपे तो हॉय-हॉ कर रहे थे और इधर बातचीत से मामला बनना है तो इन्टरेस्ट ही नहीं ले रहे हो।
खैर, मेरे दोस्तों के पास बताने के लिए बहुत था कि सर आपने पिछला ज्ञानोदय का अंक देखा, पहल में भी ठीक मामला बन गया है सर। मेरी एक दोस्त को तो अशोक वाजपेयी ने वाकायदा कोट( अंग्रेजी के हिसाब से पढ़ें) किया है और हरिद्वार से अजीतजी का एसएमएस आया था। ये हैं .......एम।फिल् कर रहे हैं डीयू से। अरुण कमल ने इसकी कविता की नोटिस ली है और संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल किया है। इनसे मिलिए आधुनिकता पर अच्छा काम किया है, इंगलिशवालों से भी बढ़िया। मैं क्या बताता, जो बताता उन्हें चूतियापा लगता। जब मास्टरजी चालीस साल से लिख रहे हैं तो इन्हें लग रहा है तो हमारी लिखी बात की क्या बिसात। सच कहूं तो हिन्दी समाज में अपने लिए ऑक्सीजन की कमी होने लगती है।
अब तक आलम ये था कि बाबाओं के बीच अपना परिचय कराने का सीधा फंड़ा था कि ये फलां है डीयू से एम।फिल् कर रहे हैं ये फलां जेएनयू से पीएच।डी कर रहे हैं। बहुत हुआ तो टॉपिक पूछकर बाबा लोग बख्स देते। लेकिन इन दो सालों में कुच्छ दोस्तों ने लिखना शुरु कर दिया और छपने के लिए जी-जीन से लगे हुए तो मेरे प्रति भी बाबाओं की एक्सपेक्टेशन बढ़ गई है। सीधे पूछ बैठते हैं, इधर आपने क्या लिखा है। मेरा मन करता है कहूं कि- अजी उधर कब लिखा था कि इधर लिखने लगूं। ले देकर दो लेख छपी है जिसके बारे में लोगों की राय है कि एक तो एम।फिल् का ही काम है और दूसरा सेटिंग से छप गई है। एम।फिल का काम अगर छप जाए तो वो आर्टिकल नहीं होता और सेटिंग से छप जाने पर कुछ भी पढ़ने लायक नहीं रहता। सो अब मैंने उसकी चर्चा ही करनी छोड़ दी है। लेकिन एक बाबजी ने जब खोदकर पूछा कि पीएच।डी में आ गए हो और अभी तक कुछ लिखा ही नहीं तो बताना पड़ा कि लिखा है सरजी। उनका जबाब था कि लेकिन कहीं देखा नहीं। मैंने कहा-सरजी जिस मैगजीन में छपी है उसकी कीमत ४०० रुपये है और सब स्टॉल वाले रखते नहीं। संपादक सरजी जहां-तहां रिव्यू के नाम पर फ्री में नहीं भेजते। एक सेमिनार करायी थी इस पर औऱ अपील की थी कि सब लोग आएं। लोग आएं और वहीं पर इसका मूल्यांकन हो गया। इसलिए आपको दिखा नहीं, वैसे वाणी के स्टॉल पर है।
एक दोस्त ने गरिआया कि स्साले लिखते भी वहां हो जिसे लोग आसानी से( आसानी माने फ्री या कम दाम में) लोग खरीद न सकें। भाई लोगों को गुरुर था कि उन्हें साहित्य के तोप लोग जानते हैं। पानी के प्राचीर वाले लेखक जानते हैं, मतवाले की चक्की वाले संपादक जानते हैं और महान घोषित करने वाले आलोचक जानते हैं। एक ने तो कहा कि चार साल से डीयू में रहकर क्या उखाड़ रहे हो जी। किसी से परिचय नहीं।
पहले दिन भी वही हुआ था। सबको सबलोग जान रहे हैं। भाई लोग लेख का आर्डर ले रहे हैं, संपादक से समझ रहे हैं कि इसमें किसकी लेनी हैं, किस आलोचक का खंभा खिसकाना है और किससे सागर वाली दुश्मनी निकालनी है और किसे फिर से कासिम दवाखाना भेजना है। मैं बोतू बना अंगूर टूंग रहा था। उनके साथ चल रहा था। मेरी चुप्पी से संपादकों को लग रहा था कि लड़का सीरियस है, सब सुन-समझ रहा है, सो और जोश में समझा रहे थे। उन्हें नहीं पता था कि यहां मसाले की स्टोरिंग चल रही है।
बढ़ते-बढ़ते एक स्टॉल से आवाज आई कि मोहल्ले वाली बहस पर तुम क्या सोचते हो दिलीप। मैं रुक गया और बोला- रिजेक्ट माल और तब क्या था एक ही साथ- मसीजीवी, कस्बा, भड़ास,लिंकित मन कई नाम बुक फेयर के हॉल में गूंज गए। मनीषा थी, दिलीपजी से मिलवाया, दिलीपजी ने इरफान भाई से और फिर ब्लॉगर का पूरा कुनबा। सब गले मिले और कहने लगे बहुत सही लिखते हो गुरु, जमे रहो। अपनी-अपनी पोस्ट को लेकर बातें। दिलीप भाई ने कहा ऐसे कैसे जाने देंगे,चला फिर फोटो सेशन। लोग सहला रहे थे, प्यार कर रहे थे और शुभकामनाएं दे रहे थे। पीछे पलटकर देखा तो नवोदित आलोचक साथी खड़े थे। एक ने गरिआया- तुम सब स्साले भोसड़ी के चलते-फिरते प्रकाशक बनते हो। नो डाउट इसमें जेलसी का भी भाव था।
आधे घंटे के भीतर कई लोग मिले जो मुझे अलग-अलग वजहों से नहीं अलग-अलग पोस्टों को लेकर जान रहे थे। मैं थोड़ा डरा भी कि ये पहचान एकेडमिक्स में काम तो नहीं आएगी। सिर्फ पोस्ट तो नहीं लिखता और भी तो पढ़ता-लिखता हूं। लेकिन फिर खुशी हुई कि जाने दो फलां का झोला ढोता है उससे तो लाख गुनी बढ़िया है ये पहचान। इधर कल कर्मेंन्दु शिशिरजी ने सब कुछ सुन लेने के बाद कहा कि ये तो मोहल्ला पर लिखता है। अपना भी कोई ब्लॉग है, लिंक दे दो।.....
| | edit post
बोलते-बोलते हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक विजयमोहन सिंहजी बोल गए कि- फेलोशिप किल्स दि टैलेंट। ये कोई नई बात नहीं है हिन्दी की दुनिया के लिए धन-दौलत माया है, ठगनी है। कोई बंदा हिन्दी में कालजयी होना चाहता है तो जरुरी है कि वो इन सबसे कोसों दूर रहे। लेखन के स्तर पर, असल जिंदगी में आपसे कौन हिसाब मांगने जा रहा है। लेकिन मुझे हैरानी विजयजी पर हुई कि जो विचार वो अब से चालीस-पचास साल पहले से देते आए हैं उसमें रत्ती-भर भी फेरबदल नहीं हुआ है।
मौका ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार समारोह का था। २ फरवरी की गुलाबी ठंड में हम सब कुछ घंटों के लिए नेशनल म्यूजियम का हिस्सा बन गए। साहित्य के बड़े-बड़े धुर्नधरों का जमावड़ा। बारह नए कहानीकारों को सम्मानित किया जा रहा था। सम्मान समारोह के बाद एक विषय भी रखा गया- युवा लेखन की चुनौतियां जिस पर कि प्रसिद्ध कथाकार और तद्भव के संपादक अखिलेश और वरिष्ठ आलोचक विजयमोहन सिंह ने अपने विचार दिए। कटेंट तो कुछ नया नहीं था और सुनकर ऐसा नहीं लगा कि पहली बार कुछ अलग सुना जा रहा है लेकिन आलोचकों के मुंह से साक्षात सुनने का अपना ही महत्व है, कुल मिलाकर मजा आया। लेकिन विजयमोहन सिंहजी ने जैसे ही कहा कि फैलोशिप किल्स द टैलेंट तो मेरे पूरे बदन में झुरझुरी सी आ गयी। एकदम से मुंह से निकला- क्या बात करते हैं। अफसोस भी हुआ कि काश ये आज के सन्दर्भ को समझकर कुछ कह जाते। अब कौन कंगाली के हालत में लिखना-पढ़ना चाहेगा। कुछ नहीं होगा तो कॉल सेंटर की नौकरी कर लेगा लेकिन घोर अभाव की स्थिति में रचनाकर्म आज कोई बिरले ही कर लें।
हमें असहज देखकर पीछे से कुछ सीनियर्स ने राय दी कि पूछो न जो पूछना चाहते हो। मेरे दिमाग में सवाल भी तैयार था कि- सरजी अगर फेलोशिप से किसी साहित्यकर्मी का हुलिया सुधर जाता है तो उससे आपको क्या परेशानी है, अगर वो एमबीए और कोई दूसरे प्रोफेशन की तरह जिंदगी गुजारता है तो इसमें क्या बुराई है। और बताइए कि क्या हिंदी में इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी ऐसी स्थिति बनी है कि कोई बंदा सिर्फ लिखकर ठीकठाक जिंदगी जी ले। लोग तो बताते हैं रचना छप जाने के बाद भी माल हाथ आने में दो से तीन महीने लग जाते हैं और वो भी इतना कम होता है कि काम ही न बने। बल्कि खर्चें में अब मोबाइल बिल भी जोड़ना होगा न। और अब बाबा नागार्जुन वाला जमाना रहा नहीं कि आपके घर में झोला रख दिए और तीन-तीन दिन तक गायब। हिन्दी प्रेमी खिला-पिला रहे हैं। अब तो खिलाना तो दूर चाय के लिए लोग कुनमुनाने लगते हैं।
अच्छा इस अभाव के बीच भी अगर कोई लिख भी दे तो अपने ही आलोचक उसे साफ करार देते हैं कि ये रचना निहायत ही आत्मकेन्द्रित होकर लिखी गयी है, फ्रसटेशन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। अभाव में अब राम की शक्तिपूजा नहीं लिखी जाती, पउवा पीकर आलोचकों को गरिया जाता है, देखा हूं कई बार ऐसा लोगों को करते हुए।
एक बात और कि अगर किसी को फेलोशिप जिससे थोड़ी और चौड़ी करके समझे कि आय का साधन मिल जाता है तो उसके लिखने की प्रतिभा खत्म हो जाती है, ये आप कैसे तय कर लेते हैं, ये भी ठीक-ठीक लिखते हैं, ठीक-ठाक क्या जी बिकने-पढ़ने और पुरस्कार पाने लायक तो लिखते ही हैं । आज इसके अलावे भी कोई पैमाना है क्या उत्कृष्ट साहित्य होने का। साहित्य अभी भी पार्टटाइम एक्टिविटी है, जो फुलटाइमर हैं भी तो सिर्फ कहानी लिखकर नहीं सांस ले रहे हैं। इसलिए ऐसे वक्त में विजयजी की बात बड़ी ही अविश्वसनीय लगती है।अच्छा अगर हम पैसे से उपर उठ भी जाएं तो क्या बाकी के दबाब हमारे उपर से खत्म हो जाएंगे। आलोचकों के बीच हमारी रचना पहुंचें इसके लिए तो हमें कई शर्तों के हिसाब से लिखना ही होगा॥जिसमें संपादक की शर्तें यानि बाजार की मांग शामिल है। इसलिए सरजी रचना के तार जाने-अनजाने बाजार और मांग से जुड़ ही जाते हैं। अब आप इसका नाम न लेना न चाहें तो अलग बात है। कोई बंदा खुद ही सुलगाने और खुद ही बुझाने के लिए नहीं लिखता। और अगर नहीं लिखता तो हमारे और आपके हिसाब को ध्यान में रखकर लिखता है। मैं तो समझता हूं कि अगर कोई अपने ढंग से सुलगाने और बुझाने के लिए लिखता है तो फेलोशिप मिलने से उसे आसानी होगी। फेलोशिप पाना भी एक योग्यता ही है इसे आप दरबारी हो जाने की प्रक्रिया के रुप में क्यों ले रहे हैंधन मिलता रहे तो वो सिर्फ कहानीकार या कवि नहीं बनेगा, पढ़कर, रिसर्च करके आपकी करह आपसे कम उम्र में आलोचक भी बनेगा। एक युना कहानीकार को एक युवा आलोचक मिल जाए, इससे बेहतर औऐऱ क्या हो सकता है। आप नहीं चाहते कि ऐसा हो। मैं सच कहूं तो मुझे सम्मानित बारहों कहानीकार हुलिए से बहुत अच्छे लगे और अगर भीड़ में चलें तो आप अलग से पहचान नहीं पाएंगे कि ये हिन्दी के हैं जिसकी शिकायत अक्सर उदय प्रकाश को रहती है। ऐसा इसलिए कि ये सारे जीविका के लिए अलग से कुछ न कुछ करते हैं और आप भी इनकी लेखनी के कायल हो चुके। तो फिर जबरदस्ती का अंर्तविरोध क्यों फैला रहे हैं, सरजी..
| | edit post

ये झारखंड-फारखंड कहां से

Posted On 3:35 am by विनीत कुमार | 8 comments

कल वाणी प्रकाशन से प्रकाशित रणेन्द्रजी द्वारा संपादित किताब इन्साइक्लोपीडिया ऑफ झारखंड का लोकार्पण होना था। रणेन्द्रजी के साथ-साथ आसपास के लोग भी उत्साह में थे और इंतजार कर रहे थे कि नामवर सिंह आएं और किताब का लोकार्पण हो। मैं और मेरे एक-दो दोस्त स्टॉल पर पोस्टर लगाने में मदद कर रहे थे कि तभी दो लोग उधर से गुजरे और पोस्टर की सिर्फ पहली लाइन पढ़कर बोले- ये झारखंड-फारखंड के लोग वर्ल्ड बुक फेयर में कहां से। मतलब कि ये क्या करने आ गए। रणेन्द्रजी ने सुना और लोगों को बताया कि देखिए ये लोग क्या बोल कर गए। हमलोग भी थोड़े असहज हो गए। उन्हें बात लग गई कि कोई ऐसे कैसे बोल सकता है, वो भी सड़क पर नहीं विश्व पुस्तक मेले में, प्रगति मैंदान में और अपने को रोक नहीं पाए। इसलिए प्रकाशक अरुण माहेश्वरी ने जब उन्हें किताब और रचना प्रक्रिया के बारे में बोलने के लिए कहा तो सारी बातें बोलते हुए कि झारखंड के बिहार से अलग होने के बाद उसकी अपनी अलग पहचान बनी लेकिन इस पहचान को सामने लाने के लिए कोई मुकम्मल काम नहीं हुए, चार खंडों में झारखंड का ये इन्साइक्लोपीडिया लोगों को झारखंड के बदले परिदृश्य को समझने में मददगार होगें, साथ ही ये भी कह दिया कि अभी कुछ लोगों ने पोस्टर देखकर कहा कि वर्ल्ड बुक फेयर में झारखंड-फारखंड के लोग कैसे चले आते हैं। हम अपने को पहले देश का नागरिक मानते हैं लेकिन जहां से हम आते हैं वहां के बारे में कोई इस तरह के विचार रखे और प्रतिक्रिया देते हों तो बात दिल में लगनेवाली तो है ही।
दिल्ली में मैं देखता हूं कि एक बिहारी की पहचान कुली-कबाडी, रिक्शा चलानेवाले और मजदूरी करने वाले की और बिहार की इमेज एक भ्रष्ट राज्य के रुप है। इस पहचान के निशान लोगों के दिमाग में इतने गहरे हैं कि बाकी के पहचान पनप ही नहीं पाते, कई अच्छी चीजें सामने आ ही नहीं पाती, लोग उसकी नोटिस ही नहीं लेते। जहां भी गंदा या गंदगी है उसे बिहार और बिहारी का नाम दे देते हैं। ऐसा लिखकर बिहार की बाकी गंदगियों को, बुराइयों को नजरअंदाज नहीं कर रहा बल्कि मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि जब भी हम दिल्ली के बारे में बात करते हैं तो ग्रेटर कैलाश, संसद, मेट्रो और चौबीसों घंटे बिजली ही दिमाग में क्यों आते हैं, सीलमपुर की गंदगी और भजनपुरा का नरक ध्यान में क्यों नहीं आता। क्या ऐसा नहीं है कि हम दिल्ली के बाहर इन राज्यों को लेकर कुछ ज्यादा ही निगेटिव एप्रोच रखते हैं।
ऐसी ही मानसिकता झारखंड को लेकर भी है। झारखंड माने दिल्ली के लोगों( सब नहीं लेकिन अधिकांश) में है कि ये जंगली इलाका है, यहां के लोग असभ्य होते हैं और इनकी लाइफ स्टाइल पाषाण युग की होती है।
मुझे कॉलेज के दिनों की याद आ गयी। मैं नया-नया दिल्ली में आया था, हिन्दू कॉलेज में एम.ए
करने। डर से क्लास शुरु होने के पांच दिनों तक गया ही नहीं। मामला थोड़ा ठंड़ा पड़ गया तो पहुंचा। लोगों ने मुझे घोर आश्चर्य से देखा और एक लड़की ने कहा- अरे ये तो जैसे टीवी में झारखंड के लोगों को दिखाते हैं वैसा नहीं है, इसका रंग तो साफ है, वहां के लोग तो काले होते हैं और देखो ये जींस पहनकर आया है। उनके लिए मैं अजूबा था। फिर बारी-बारी से लोग मेरी शर्ट का कॉलर उलटकर देखने लगे और कहा-झारखंड में एरो की शर्ट मिलती है। एक लड़के ने टोका- अरे तुम भी ली-कूपर के जूते पहनते हो। उन्हें इस बात पर बड़ी हैरानी हो रही थी कि ये वो सबकुछ वैसा ही पहना है जैसा कि हम दिल्ली में रहकर पहनते हैं। यहां जोड़ दूं कि मेरे साथ ऐसा करनेवाले सिर्फ दिल्ली के ही लोग नहीं थे, कई लोग नए-नए देहलाइट हुए थे।
आज रणेन्द्रजी की किताब की पोस्टर देखकर लोगों ने जिस तरह से रिएक्ट किया, मेरे दिमाग में ठनका कि लोगों की ये सोच कहीं योजना, कुरुक्षेत्र या फिर दूसरी झारखंड विशेषांक पत्रिकाओं को देखकर तो नहीं बनी जिसमें ज्यादातर तस्वीरें लड़की के सिर पर बोझा ढ़ोते हुए या बहुत हुआ तो मांदल बजाते हुए छपते हैं। या फिर ऐसा वहां की गरीबी के कारण हुआ है, वहां की संस्कृति का देश की मुख्यधारा में शामिल नहीं होने के कारण हुआ है, किसी भी फिल्म में वहां की सम्पन्नता को न दिखाए जाने के कारण हुआ है या फिर वाकई इसके लिए वहां के लोग ही जिम्मेवार हैं।
फिलहाल तो दो ही बातें लगती हैं कि संभव है रणेन्द्रजी के इस प्रयास से लोगों का नजरिया कुछ बदले और दूसरा कि आनेवाले समय में इंडस्ट्री और रीयल स्टेट के टेंडर के पेपर भरने जब लोग झारखंड जाएं तो कुछ अलग तरीके से सोच पाएं। बाकी अपनी तरफ से कोशिशें तो जारी है ही।....
| | edit post

एक टेलीविजन शो ऐसा भी हो......

Posted On 9:26 pm by विनीत कुमार | 2 comments

टेलीविजन पर टैलेंट हंट शो की बाढ़-सी आई है जितने चैनल उतने टैलेंट हंट शो। कई चैनलों पर तो एक ही साथ कई शो, अलग-अलग मिजाज के बच्चों के लिए अलग-अलग हंट शो। मैं तो बस दो ही बातों का इंतजार कर रहा हूं। एक तो कि टेलीविजन पर इतने टैलेंट शो हो जाए और इतनी वरायटी की हो कि देश के सारे बच्चे उसमें शामिल हो सकें। जो रोज रियाज करता है वो भी और जिसने कभी रियाज नहीं किया वो भी, जो सबसे अच्छा गाता है वो भी और जो सबसे बेसुरा गाता है वो भी, जो फाइव स्टार स्कूल में पढ़ रहा है वो भी और जो सेंट बोरिस( जहां बैठने के लिए साथ में बोरी या दरी अपने साथ ले जाना पड़ता है) में पढ़ता है वो भी। टैलेंट की खोज और स्थापना तो हो। और दूसरी बात का जो इंतजार है वो इधर ही पनपा है, तारे जमीन पर देखने के बाद कि देश में जितने डिस्ऑर्डर बच्चे हैं उनके बीच टैलेंट हंट किया जाए और संभव हो आमिर को उस प्रोग्राम का हॉस्ट बनाया जाए। क्योंकि एक इशान अवस्थी तो उनका हीरो बन गया, अब क्यों न इसकी संख्या बढ़ायी जाए। मामला घाटे का नहीं होगा। देशभर के एनजीओ और सामाजिक कार्यकर्ता सामने आएंगे और बिना बड़े-बड़े बैनर के अच्छी पब्लिसिटी हो जाएगी। इसके लिए स्कूल के बच्चे सामने आएंगे और मुझे पूरा भरोसा है कि प्रोग्राम हिट रहेगा। ये एक ऐसा शो होगा जिसे जो भी चैनल कराएगा,उसकी ब्रांड इमेज बहुत ही बेहतर बनेगी। जिन चैनलों को लगातार गरिआया जाता है उनके लिए एक बेहतर मौका होगा।
सबसे बड़ी बात तो ये होगी कि लगे हाथ देशभर में इस तरह के बच्चों की खोज हो जाएगी और आगे उनके इलाज और सुधार में मदद मिल सकेगी। उनके बीच कुछ ऐसे इवेंट कराए जाएं जिसे कि एक सामान्य बच्चा नहीं कर सकता और अगर करे भी तो उसे बहुत मशक्कत करनी पड़ेगी। ये इवेंट सिर्फ गाने या नाचने तक सीमित नहीं होंगे। कई ऐसे इवेंट हैं जिसमें इन बच्चों को शामिल किया जा सकता है। आमिर ने तो अपने हिसाब से एक पेंटिंग आर्टिस्ट को खोज निकाला। क्या पता कोई बड़ा रंगकर्मी निकल आए, कोई अंच्छा डांसर, कोई अच्छा बांसुरी वादक, मंच का कवि या फिर वो कुछ जिसके होने और बनने की कल्पना एक सामान्य बच्चों में देखते हैं। ऑडिशन के लिए मनोचिकित्सक की मदद ली जा सकती है।
आगे ज्यादा क्या राय दूं जो भी चैनल इस ओर पहल करेंगे, उनकी पूरी टीम तो दिमाग लगाएगी ही। मेरे पास तो अचानक से आइडिया आया सो मैंने बता दिया। वैसे आइडिया बुरा नहीं है न.....
| | edit post
दो दिनों बाद ब्लॉग की दुनिया में वापस आया तो देखा कि जनसत्ता से जुड़े लोगों पर मैंने जो पोस्ट लिखी और जिसको लेकर विवाद हुआ, सब मामला रफा दफा हो गया और मंगल गान गाए जा रहे हैं॥शुभ हो, सब कुशल रहे। ये अलग बात है कि ब्लॉग से निकली बात को लेकर अब फोन करने,पर्सनल मेल करने, सुझाव देने और कुछ हद तक अलग-अलग माध्यमों से दबाव बनाने की कोशिशें जारी है। भड़ास का मेन मॉडरेटर होने के नाते यशवंतदा ने डॉ मान्धाता सिंह के सुझाव को मान लिया और लिखा -
विनीत कुमार की जिस पोस्ट पर गर्मागर्म बहस चल रही है, उसके बारे में मेरा अपना निजी खयाल यही है कि भड़ास पर किसी मीडिया हाउस का नाम लेकर उसे कोसने के बजाय जिस सज्जन से दिक्कत है, पीड़ा है, उनका नाम कोटकर लिखा जाए तो शायद ज्यादा ठीक रहेगा क्योंकि किसी मीडिया हाउस को किसी एक दो खराब टाइप के सज्जनों के कारण गरियाना, नाम उछालना, बदनाम करना उचित नहीं। ........उम्मीद है इस विवाद को यहीं खत्म समझा जाएगा। अगर फिर भी किसी को कुछ कहना है तो उसका स्वागत है।
यशवंतदा की इस घोषणा के बाद डॉ मान्धाता सिंहजी ने इसे गंगा में नहाने का असर बताते हुए जुग-जुग जीने का आशीर्वाद दिया-
यशवंतजी यही आप से उम्मीद थी। जनसत्ता वाले मामले में अब आपने एक सतर्क माडरेटर जैसा जबाव दिया है। गंगा में जो नहा के आए हैं। जुग-जुग जिएं आप, खूब तरक्की करे
लेकिन क्या आज के इस पोस्ट मार्डन कंडिशन में वाकई किसी बहस की उम्र दो या तीन दिन से ज्यादा नहीं होगी। थोड़ी देर तक हलचल के बाद सब खत्म और फिर सब पहले की करह ही मौजा-मौजा। हम मंगल-मंगल के लिए इतने उतावले क्यों हैं।
विवाद मेरी पोस्ट से ही शुरु हुई थी इसलिए जरुरी समझा कि समापन की विधिवत घोषणा के बाद भी कुछ लिखूं। ब्लॉगिंग को कचहरी की शक्ल में बदलना हो तो हर बात के पीछे तर्क खड़ी करने में कोई परेशानी नहीं होगी। ब्लॉग लिखते-लिखते तो इतना माद्दा सबमें आ ही गया है लेकिन अभी इसे कचहरी नहीं होना है। हां इतना जरुर है कि एक बात को देर तक, दूर तक न भी खींचे तो भी जितना कुछ हुआ, उसके ऑटपुट पर एक नजर जरुर डाल लिया जाए।
जनसत्ता पर पोस्ट लिखने के बाद जो सबसे तीखी प्रतिक्रिया हुई वो मेरी भाषा को लेकर। एक सभ्य समाज इस तरह की भाषा सुनने को अभ्यस्त नहीं है। सो इस सभ्य समाज के लोगों ने मेरी इस भाषा को अकादमिक हलको तक पहुंचाया। भाषा की नारको टेस्टिंग वहीं होनी है। लेकिन उन्हें रिपोर्ट मेरी भाषा की नहीं, मेरी चाहिए थी। कुछ का मानना था कि इसमें कई चीजें अनर्गल है। कुछ को पोस्ट ही ढीली लगी,कुछ ने कहा कि इस पर और मेहनत की जरुरत थी तो कुछ ने ये भी कहा...और फाडो सालों को, वगैरह॥वगैरह।मैं अपनी भाषा को लेकर कोई तर्क नहीं देना चाहता हूं, आपको कभी एसी कार में बैठे इंसान ने आपके पैदल चलने पर ठोक दिया हो और वहां आपके मुंह से क्या निकलता है, आप सब जानते हैं। सिर्फ अकादमिक योग्यता हमारी भाषा तय नहीं करती, एक खास परिस्थिति में हर आदमी वही बोलता या लिखता है जो भाषा आप और हम किसी से ठुकने पर इस्तेमाल करते हैं।
इस पूरे प्रकरण को मैं थोड़ा दूसरे ढ़ंग से ले रहा हूं। पहला तो ये कि भाषा यहां कोई मसला ही नहीं है।
सीधे-सीधे आउटपुट को लेकर बात करुं तो कुछ सवाल और कुछ नए तथ्य हमारे सामने आए हैं-
सबसे पहले तो इसके जरिए अखबार का दोहरा चरित्र उभरकर सामने आया है। आपको सुप्रीम कोर्ट से तुरंत फैसला चाहिए, सरकार से जबाब चाहिए, शोषण और भ्रष्टाचार को लेकर आप कुछ करना चाहते हैं, खत्म करना चाहते हैं। लेकिन आप खुद एक रिज्यूमे भेजने वाले को पचासों बार दौड़ाएंगे, तब तक जब तक वो फोन या मेल करना न छोड़ दे। आप उससे कभी न नहीं बोलेंगे और समझने पर मजबूर करेंगे कि देख लेंगे का मतलब नजरअंदाज करना होता है। आप समाज को सिखाएंगे कि निडर बनो, विरोध करो और आपने पत्रकारिता को एक व्यवस्थित पेशा बनाने के क्रम में खुद इसके दरवाजे इतने छोटे कर दिए कि निहुरकर( झुककर) अंदर घुसना पड़े और इस क्रम में हम बिना रीढ़ के आदमी हो जाएं। ये तो हमने लिखा तो बात अकादमिक हलकों तक घसीटकर ले गए, क्योंकि आपने मेरी बातों का मेल या ब्ल़ॉग के जरिए बात करने से ज्यादा जरुरी समझा। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अखबार में काम करनेवाला बंदा कितना निडर होकर लिख सकता है, मेरे जैसे को तो आपको निकालने में घंटा भर भी नहीं लगेगा। कुल मिलाकर आप समाज को समझाते रहिए व्यवस्था से लड़ना और विरोध करना और आपके हाउस में काम करने वाला बंदा पालतू बनता चला जाए और देखते-देखते इसकी एक फौज खड़ी हो जाए जो कि आपके मुताबिक काम करें अनुकूलित हो जाए, आपके हिसाब से। इसी के बूते क्रांति करेंगे आप। आपकी इस मान्यता को ब्लॉग ध्वस्त करता है आगे भी करेगा।
अखबार के मनमानेपन को हमने ट्रेस करना शुरु कर दिया है , उसकी मानसिकता से रुबरु हो रहा हूं और अब बेचारा पाठक की हैसियत से नहीं एक ब्लॉगर की हैसियत से लिख रहा हूं क्योंकि आपने खुद इसकी ताकत को हौसला दिया है। अनसुनी आवाजों को रोने की जरुरत नहीं कि वे कहां जाएं, हमें अपनी अभिव्यक्ति का औजार मिल गया है।
दबाब बनेंगें हमारे उपर, ये दबाब सत्ता की नहीं होगी, उस अखबार की होगी जो गलत के लिए लड़ता आया है लेकिन ब्लॉगिंग करते हुए इसे भी झेलना होगा, कई दबाब एक साथ लेकिन अब कीपैड भला कहां रुकनेवाला।
यशवंतदा सहित सारे ब्लॉगर साथियों से एक वादा कि अब ये कीपैड किसी मीडिया संस्था के नाम को लेकर नहीं । आप गारंटी देगें कि सारे लोग अपनी पहचान के पहले गर्व से बताना छोड़ देंगे कि मैं फलां हाउस में काम करता हूं।खैर., इसका मतलब ये भी नहीं कि भाषा उसकी जो सड़ी मानसिकता है, का समर्थन करेगी। माफ कीजिएगा, मैं कोई बड़ा बुद्धिजीवी आदमी नहीं कि भाषा में परिष्कार के नाम पर कूटनीति की भाषा ईजाद कर लूं। भाषा में कच्चापन होगा, हमेशा परिष्कृत ही हो , इसकी कोई गारंटी नहीं लेकिन मठाधीशी मानसिकता के खिलाफ होगी, इसकी सौ फीसदी की गारंटी है। रिसर्च फेलो हूं, क्रांति की शुरुआत जंतर-मंतर के पास चिल्लाने के लिए नारे लिखने से पहले डाटा कलेक्शन, आइडिंटीफिकेशन से होकर गुजरुंगा। हममें उन बुद्धिजीवियों की शक्ल न हीं देखें तो मेरे उपर एहसान होगा जो बदलाव तो चाहते हैं लेकिन शुरुआत दूसरों के घरों से करना चाहते हैं, शाकाहारी क्रांति में विश्वास रखते हैं। बड़े-बड़े मुद्दों पर बात करने से अपने घरेलू मुद्दे गायब हो जाते हैं जिसका कि अपने से सीधा सरोकार होता है। मैं बड़े मुद्दों पर गोलमोल लिख नहीं सकता।....लिखते हुए याद आ गया-
या तो अ ब स की तरह जीना है
या सुकरात की तरह जहर पीना है।।
कीपैड से लिखना बिजली चले जाने पर बंद भले ही हो जाए लेकिन वैसे तो कभी नहीं........
| | edit post