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भीख मांगते, मेरे बिरादरी के बच्चे

Posted On 12:54 pm by विनीत कुमार |

आठ साल की बच्ची ने मुनिरका रेडलाइट पर बांह पकड़कर हिलाया तब मेरा ध्यान टूटा। भइया, भइया कहा और फिर गुलाब के फूलों का एक गुच्छा मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहने लगी- ले लीजिए न भइया, ले लीजिए न। सिर्फ दस रुपये लेंगे आपसे, सिर्फ दस रुपये। मुनिरका रेडलाइट पर ऐसा आए दिन होता है, यह कोई नयी बात नहीं थी जो मेरे साथ हुई थी। आम तौर पर छः साल
से दस साल तक की लड़कियां गुलाब के फूलों का गुच्छा लिए आपसे खरीदने की जिद करती हुई दिख जाएगी।
मैंने उस लड़की से कहा, क्या करुंगा इन फूलों को लेकर, ये तो बर्बाद हो जाएंगे। फिर तुम्हारे फूल भी तो मुरझाए हुए हैं औऱ हॉस्टल ले जाते-जाते एकदम से और बासी हो जाएंगे। इसके लिए तुम्हें दस रुपये क्यों दे दूं। वैसे भी लम्बे समय से जेएनयू आता-जाता रहा हूं। 615 और 621 नं की ब्लूलाइन बसों में डीटीसी पास दिखाने पर कनडक्टर मान जाते हैं। मेरे दोस्त कहते आप डीयू की आइडी निकालकर अलग से रख लीजिए और सिर्फ पास दिखा दीजिएगा,पूछेगा तो बता दीजिएगा, यहीं जेएनयू में हैं। लेकिन यह झूठ बोलने की नौबत नहीं आयी, पास दिखाने से ही दस रुपये बच जाते। जब से जेआरएफ हुआ है,मेरा पास नहीं बनता और मुझे पैसे लगाकर वहां से आना होता है। मैं सोचने लगा कि कितनी मुश्किल से दस रुपये बचाया करता था और आज कह रही है कि दस रुपये का फूल खरीद लीजिए।
मैंने फिर कहा- अच्छा, तुम ही बताओ, मैं क्या करुंगा, तुम्हारे इस फूल को लेकर। आठ साल की उस लड़की ने बड़े ही सपाट ढंग से जबाब दिया, अपनी गलफेंड को दे दीजिएगा। मुझे एकदम से हंसी आ गयी और समझ में भी आ गया कि क्यों यहां दिनोंदिन फूल बेचनेवाली लड़कियों की संख्या बढ़ती जा रही है। मन ही मन सोचा, कोई गलफेंड तो है नहीं और अगर हो भी तो इस फूल को देने से रह भी नहीं जाएगी, हो सकता है मुंह पर फेंककर मार दे। मेट्रो का काम होने के कारण अच्छा-खासा जाम था, मैं एसी कार में बैठा था, कोई परेशानी नहीं हो रही थी, उस लड़की को जाम तक बात में फंसाए रखना चाहता था. मैंने कहा- तो क्या तुमसे सब गलफेंड के लिए ही फूल खरीदते हैं। लड़की ने कहा- नहीं कोई-कोई बायफेंड के लिए भी खरीदती है। अबकि मुझे और जोर से हंसी आ गयी।। तो ये बात बताओ, तब तुम सिर्फ जवान लोगों को ही पकड़ती होगी। लड़की का जबाब था- ऐसा नहीं है, बूढ़े को भी खरीदने कहते हैं। उसे तुम क्या कहकर खरीदने कहती हो- लड़की ने कहा- कहते हैं कि खरीद लो, भगवान के आगे मथ्था टेककर चढ़ा देना। औऱ वो न मानें तो-
तो क्या भइया, अंत में सबको यही कहते हैं, फूल खरीदने कौन कह रहा है तुमसे, पास में रोटी है,छोले खरीदने के लिए पांच रुपये दे दो, मेरा भाई बहुत भूखा है। फ्री में कार में बैठा था, सोचा चलो ये समझूंगा कि भाड़ा लगाकर आए हैं और मैंने उस लडकी के हाथ में दस रुपये धर दिए। इस बीच ग्रीन सिग्नल हो गया था औऱ हमारी गाड़ी आगे बढ़ गयी. लड़की तेजी से मेरी तरफ बढ़ी और आवाज दिया- भइया, आपने फूल तो लिया ही नहीं। मैंने भी जोर से कहा- कोई नहीं, किसी और को बेच देना, मैं लेकर क्या करुंगा।
मेरे साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। आप यों कहिए कि इस तरह से थोड़ी देर के लिए भावुक होकर मैंने कई बार छोटे बच्चों को पैसे दिए हैं। कभी पास बैठे लोगों को एहसास कराने के लिए कि- तुमसे हम बहुत अच्छे हैं, संवेदना मरी नहीं है हमारी, कभी खुश होने पर और कभी मानवता के नाते।
दिल्ली के तीन जगहों पर स्थायी तौर पर मैं ऐसा करता आया हूं। बाराखंभा रोड के रेडलाइट पर, रामकृष्ण आश्रम मेट्रो के पास और मुनिरका रेडलाइट पर। इन तीनों जगहों पर लम्बे समय से आता-जाता रहा हूं।
मीडिया की पढ़ाई करते समय मैं रोज बाराखंभा रोड़ से गुजरता। कभी पैदल, कभी बस और कभी एक-दो धनी लड़की दोस्त की कार से। पैदल गुजरता तो नहीं देता, धक्के लगने की गुंजाइश होती, कार में होता तो लड़कियों पर प्रभाव जमाने के लिए कि देखो, आदमीयत है हममे औऱ जब इनका ख्याल रख सकता हूं तो फिर....। ये अलग बात है कि मेरी दोस्त इस हरकत को मीडिल क्लास मेंटलिटी मानती और ताने मारकर कहती- झारखंड छूटा नहीं है, तुम्हारा। शीशे खोलता तो मना करती- एसी चल रही है, शीशा मत खोलो,कभी कहती, बहुत गंदे हैं ये लोग। लेकिन मैं तब और खोलता। बाराखंभा के जो बच्चे होते, वो पैसे मांगने के पहले बांह में पत्थर का टुकड़ा दबाते और दोनों को सटाकर बजाते- मैं निकला,गड्ड़ी लेके औऱ फिर समय होने पर हमसे और हमारी दोस्त से एक- दो लाइन जोड़कर गाते। मुझे मजा आता। एक दिन बस में बैठा। बहुत खुश था,इंटरनल में मुझे सबसे ज्यादा नंबर आए थे। बस में बच्चे आए और फिर शुरु हो गए- मैं निकला। रोज वो यही गाना गाते लेकिन मुझे अलग-अलग मनःस्थिति में होने के कारण अलग-अलग मजा मिलता। मैंने उस दिन उन्हें पचास का नोट पकड़ाया और जब बच्चे मुझे चालीस रुपये लौटाने लगे तो मैंने कहा रख लो। लेडिस सीट की तरफ बैठी दो लड़कियों ने एक-दूसरे को कोहनी मारी और ठहाके मारकर हंसने लगी। शायद मुझे बेउडा समझा। मैं सिर्फ इतना सुन पाया कि- नया-नया गिरा है, दिल्ली में।

रामकृष्ण आश्रम के पास के बच्चे पैसे बड़े ही कलात्मक औऱ जोखिम तरीके से मांगते। जैसे ही रेडलाइट होती, तीन बच्चे आ जाते जिनके हाथ में बहुत ही छोटा लोहे का छल्ला होता। पहले एक उसके भीतर से गुजरता और उसके बाद एक ही साथ हो गुजर जाते. एक ढोल बजाता और फिर दो लोग छल्ले से बाहर- भीतर करके नाचने लगते। मैं एकटक देखता रहता। ये नजारा देखने के लिए मैं झंडेवालान जहां मुझे अपनी ऑफिस के लिए उतरना होता, वहां न उतरकर यहां उतरता और फिर यह सब देखकर पैदल जाता। बच्चे मुझे पहचान गए थे और दूर से ही चिल्लाते- रिपोटर भैय्या आ गए, बाकी लोग सुनते और उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आता।
पुरुलिया से गुजरते हुए एक लड़की हारमोनियम पर रवीन्द्र संगीत गाती और मैं तब भी पांच-दस पकड़ा देता। एक दिन बैठकर मैंने इस बारे में सोचा औऱ पाया कि मैं उन बच्चों को कभी पचास पैसे भी नहीं देता जो मेरे सामने यह कहते कि भैय्या, कुछ खाने के दे दो, बहुत अधिक भावुक भी नहीं होता उन्हें देखकर, जबकि गाने-बजाने, कुछ करतब दिखानेवाले बच्चों को पचास रुपये तक बड़ी आसानी से दे देता। तो क्या मैं ऐसा इसलिए करता हूं कि मुझे लगता है, ये मेरे जाति-बिरादरी के लोग हैं।
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6 Response to 'भीख मांगते, मेरे बिरादरी के बच्चे'
  1. सुशील कुमार छौक्कर
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_4917.html?showComment=1213345560000#c7382954856604396167'> 13 जून 2008 को 1:56 pm

    विनीत भाई आपने एक अच्छा वाक्या बताया। और चौराहो का आँखो देखा हाल बता दिया। अगर समय हो तो हमारा भी बाक्या भी पढीऐगा। लिंक दे रहा हूँ और आपकी पोस्ट ब्लोगवानी पर नही खुल रही क्या बात है
    http://meri-talash.blogspot.com/2008/05/blog-post_23.html#links

     

  2. PD
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_4917.html?showComment=1213346340000#c1083035585866435610'> 13 जून 2008 को 2:09 pm

    आपकी सोच इस मामले में मेरी सोच से बहुत मेल खाती है.. मैं तो ये सोचकर दे देता हूं कि कम से कम कुछ काम करने कि कोशिश तो कर रहें हैं.. हां लोगों कि परवाह कभी नहीं कि की वो क्या सोच रहे होंगे..

     

  3. DR.ANURAG
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_4917.html?showComment=1213347540000#c6414517283306748145'> 13 जून 2008 को 2:29 pm

    मेरे तजुर्बे बड़े है मेरी उम्र से......वाली बात है इन बच्चो मे .....

     

  4. arth
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_4917.html?showComment=1213353300000#c4147885113609505760'> 13 जून 2008 को 4:05 pm

    Vineet sir aapke anubhav bhi bemisal hai.kal ka ye waqaya aur kal hee BAL SHRAM DIVAS uspar aapki dariyadili kafi tasalli milti hai ki aaj bhi ese log maojud hai jo professionality k muh par imotionality bhara tamacha marte hai.

     

  5. Udan Tashtari
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_4917.html?showComment=1213365360000#c268010239247372200'> 13 जून 2008 को 7:26 pm

    यह आप नहीं आपका संवेदनशील हृदय करवाता है आपसे. इसे ऐसे ही रहने दें और करते रहें..

     

  6. भुवनेश शर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_4917.html?showComment=1213373460000#c1816123201919993156'> 13 जून 2008 को 9:41 pm

    बिरादरी तो इनकी, आपकी और हमारी एक ही है...अंतर ये है कि ये बेचारे किस्‍मत के मारे हैं.

     

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