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हिन्दी के बौखलाए मसीहा

Posted On 6:35 pm by विनीत कुमार |





हाय री हिन्दी, हमने तुम्हें इतने जतन से संभाले रखा लेकिन अंत में इन दुष्टों ने तुम्हें बाजार के कोठे पर बिठा ही दिया, तुम्हें पूंजीवाद के कसाईयों के हाथों बेच ही दिया, मीडिया पर रिसर्च कर-करके अपवित्र कर ही दिया, तुम्हें वर्जिन नहीं रहने दिया हिन्दी। हाय मैं क्या करुं, क्या-क्या नहीं किया तुम्हें बचाने के लिए , कौन-कौन से वाद नहीं झोंकें, तुम्हें शुद्ध रखने के लिए। इतना शुद्ध की बाजार की कभी काली छाया तुम्हारे उपर न पड़ने पाए।

...ये चित्कार है हिन्दी के एक बौखलाए हुए मसीहा की। एक ऐसे मसीहा की जिन्हें आज से साल-सवा साल पहले तक लगता रहा कि गोला बनाकर ज्ञान बांचने से हिन्दी को शीर्ष पर बैठाया जा सकता है, हिन्दी के जरिए शीर्ष पर बैठा जा सकता है, गोला कल्चर से वो हिन्दी जगत में क्रांति ला देंगे लेकिन यही गोला असफलता और हताशा की मार में जब टूटकर, छितराकर मलवे के रुप में इधर-उधर बिखरता नजर आ रहा है, इस गोले का केन्द्र खिसकता जान पड़ रहा है तो अब बिल-बिलाकर जहां तहां भकुआ रहे हैं। अपने जिन औजारों और तिकड़मों से वो खुद को हिन्दी की दुनिया में अजर-अमर होने का ख्बाव देखते रहे, जब उन औजारों का उल्टा असर उन पर पड़ा तो उसी औजार से हिन्दी को बचाने की प्रवंचना करने में लगे हैं। दुनिया को हिन्दी बचाने की हांक लगानेवाले ये मसीहा अप्रत्यक्ष रुप से अपने समर्थन में कुछ भीड़-भाड़ जुटाने में जुटे हैं।

लेकिन इसके लिए उन्होंने बौद्धिकता का रास्ता अपनाने के बजाए बल्ली मारान के उन दुकानदारों का रवैया अपनाना ज्यादा जरुरी समझा, शायद वो इसी में समर्थ हों, जो अपने माल पर से मक्खी उड़ाने के बजाय पड़ोस वाले दुकानदार के माल के बारे में कहते-फिरते हैं कि- अजी उसके यहां तो अरब की मक्खियां बैठती हैं, अपने यहां तो फिर भी देशी ही हैं, लोकल। औऱ जब दुकानदार इसी अरब को मतलब की जगह बताकर अपना माल इत्मिनान से बेचने में जुटा है तो वो बौखलाए हुए हैं।

आज २२ जून, जनसत्ता में संजय कुमार झा के लेख शोध का दायरा में इस मसीहा के विचार कुछ इसी तरह की मानसिकता को पुष्ट करते हैं। इससे आपको उनकी बौखलायी मानसिकता का अंदाजा तो लग ही जाएगा, साथ ही इस बात की भी समझ बढ़ेगी कि बौखलाने पर इंसान की समझदारी कैसे जाती रहती है।

संजय कुमारजी ने जो लेख लिखा है उसमें यह बताने का प्रयास किया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोध कर रहे रिसर्चर का विषय को लेकर मिजाज पहले से काफी बदला है। उनका रुझान पुराने और घिसे-पिटे विषयों के बजाय मीडिया, सिनेमा और नए माध्यमों की ओर बढ़ा है। मेरे हिसाब से विजुअल लिटरेचर को लेकर लोग पहले से बहुत अधिक कॉन्शस हुए हैं। हालांकि संजय कुमार ने विषयों को लेकर दोनों तरह के लोगों के विचार हम पाठकों के सामने रखे हैं। एक उनके विचार जो हिन्दी के भीतर मीडिया, सिनेमा और कल्चर के अध्ययन को ही नाजायज मानते हैं। उनके हिसाब से अव्वल ये साहित्य है ही नहीं तो फिर उनका हिन्दी में अध्ययन क्यों किया जाए और दूसरा उनकी भी जो बदलते समय के साथ नए विषयों पर शोध करने और करवाने के लिए उत्साहित हैं।


लेकिन जहां-जहां संजय कुमारजी ने अपनी राय देने की कोशिश की है वहां यह साबित हो जाता है कि वो भी इस तरह के विषयों पर शोध होने देने के पक्ष में नहीं हैं। वो भी हिन्दी को शुद्धतावादी नजरिए से देखने के अभ्यस्त नजर आते हैं। संजयजी ने एक पत्रकार की हैसियत से अपनी बात रखी है और उनकी बात को उनकी ही हैसियत के हिसाब से देखा जाएगा। वो चाहें तो लगातार लिखकर इस तरह के विषयों पर शोध होने के विरोध में माहौल तैयार कर सकते हैं, अब वो कितना वैधानिक होगा ये अलग मसला है। इसलिए संजय की बात को हम यहीं रोकते हैं क्योंकि वो सीधे-सीधे हस्तक्षेप करके विषय में फेरबदल नहीं कर सकते।

हम बात उन टीचरों की करना चाहते हैं जो रिसर्च कमेटी में शामिल होते है, इंटरव्यू में शामिल होते हैं, एक साक्षात्कार देने वाले बंदे के दांत से पसीना निकाल देते हैं, उनसे इतना सवाल करते हैं कि वो पीएच।डी कर लेने के बाद भी उसका सही-सही जबाब नहीं दे पाएगा। उससे वो सब कुछ पूछते हैं जिन्हें वो सवाल के तौर पर वाक्य के रुप में बना सकते हैं। अगर कोई बंदा रिसर्च के लिए मीडिया के विषय चुनता है तब तो उसे साहित्य का पथभ्रष्ट मानकर औऱ ही ज्यादा सवाल करते हैं। आप उसे सवाल करना न कहकर जलील करना कह सकते हैं। वो इन विषयों पर कुछ इस तरह से रिएक्ट करते हैं कि गोया ये कोई विषय न होकर व्यक्ति हो औऱ जिनसे उनकी अपनी खुन्नस निकालनी हो,इन विषयों के प्रति दुराग्रह, तंग नजरिया और हिकारत उनके चेहरे से साफ झलकती है। लेकिन इन सबके वाबजूद बंदा जबाब देता है और चयनित होता है। आज जो टीचर इस तरह के विषयों पर शोध किए जाने से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं वो परास्त मानसिकता की बौखलाहट है और कुछ भी नहीं।


जिस मसीहा ने असहमति के नाम पर यह कहा है कि- इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इन शोधों के जरिए यह स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है कि पॉपुलर कल्चर में जो भी है, वह अच्छा ही अच्छा है। कायदे से इन प्रसंगों पर किए गए शोध में पॉपुलर कल्चर की खामियों पर भी चर्चा होनी चाहिए। लेकिन शोधार्थी ऐसा करते हैं, इसमें संदेह है। कुछ शिक्षकों का कहना है कि ऐसा इसलिए है कि शोधार्थियों पर इस बात का दबाव होता है कि वे अपने शोध में ऐसा कुछ ना लिखें जो बाजारवादी सोच के खिलाफ हो। संजयजी की चतुरता देखिए कि उन्होंने पूरे लेख में इस बात का विरोध करने वाले केवल एक ही बौखलाए मसीहा का नाम लिया, बाकी को कुछ कहकर अपना काम चला लिया। अगर नाम ही देना था तो या तो फिर पूरे का या फिर किसी का भी नहीं।

संजयजी की इस काबिलियत के दो मायने निकलते हैं। एक तो है कि एक का नाम लेकर वो इस पूरे मामले को तमाशे की शक्ल में बदलना चाहते हैं जिससे कि आम पाठक मजे लें या फिर ऐसा लिखकर संजय एकमुश्त के बाकी बाबाओं से रार नहीं लेना चाहते। जिस मसीहा का उन्होंने नाम लिया है वो पहले भी अलग-अलग मसलों पर हिन्दी विभाग के खिलाफ बोलते आए हैं इसलिए यहां भी नाम आ जाए तो कोई हर्ज नहीं है, इससे उनकी निरंतरता और प्रतिबद्धता पर औऱ ढंग से मुहर लगेगी। लेकिन बाकियों को जो कुछ की श्रेणी में रखा है उन्हें अभी भी खुलकर सामने में हिचक आ रही हो, अपने को तैयार नहीं कर पाए हों कि वो खुलकर सामने आएं। ऐसा भी हो सकता है कि विशेषज्ञता किसी और क्षेत्र में होने के वाबजूद इन विषयों में भी हाथ आजमाने की कोशिश में हों और भविष्य को देखते हुए खामख्वाह अपना काम खराब नहीं करना चाहते हों। इसलिए संजयजी से कहा होगा कि विरोध में बोल तो दूंगा लेकिन नाम मत लेना। संजयजी को इस ग्रांउड पर माफ किया जा सकता है, जब रॉ ही मिलावटी मिला है तो फिर फाइनल कहां से प्योर देंगे।

अब संयोग देखिए कि मीडिया और पॉपुलर कल्चर के लिए संजयजी ने जिन दो विषयों को उदाहरण के तौर पर पेश किया है वो सीधे-सीधे मेरे रिसर्च के काम से जुड़ें हैं। संजयजी ने लिखा है कि- टेलीविजन की भाषा और एफ एम चैनलों के बीच अंतर पर पीएचडी हो रही है। एफ एम पर मैंने एम फिल में काम किया है और टेलीविजन की भाषा पर पीएचडी कर रहा हूं। इस विषय के बारे में संजयजी ने शिक्षकों की जो राय रखी है वो यह कि-फिल्म टेलीविजन और या एफ एम रेडियो के जिन प्रसंगों पर शोध किए जा रहे हैं, क्या उन्हें साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। क्या इन विषयों पर शोध को बढ़वा देना हिन्दी विभाग का काम है।....

...आगे संजयजी ने लिखा है कि दरअसल इन लोगों की चिंता यह है कि यह सब बाजार के इशारे पर किया जा रहा है। संजयजी ने जिस मसीहा का वाकायदा नाम लिया है, सबसे पहले तो वो मेरी तरफ से उन्हें शुक्रिया का संदेश पहुंचाएं कि उन्होंने अपने रिसर्चर के काम के अलावे हम जैसे लोगों के काम को भी पढ़ा। वरना हिन्दी क्या, कई विभाग के लोग अपने ही स्टूडेंट का काम पढ़ते तक नहीं। इस मसीहा जैसे लोग हिन्दी में दो-चार हो -जाएं तो रिसर्चर की पीड़ा ही खत्म हो जाए जो बहुत मेहनत से काम करने के बाद पछताते-फिरते हैं कि बेकार में इतनी मेहनत से काम किए, गाइड ने पल्टा तक नहीं। हम उनकी बौद्धिक क्षमता के भी कायल हैं जो बिना रिसर्च पूरा हुए पता लगा ले रहे हैं कि हम क्या निष्कर्ष निकालेंगे। लेकिन उनसे कहिएगा कि हम रिसर्च कर रहे हैं किसी कम्पनी का प्रोजेक्ट नहीं बना रहे, जहां सबकुछ पहले से तय है।

संजयजी प्लीज एक और बात के लिए धन्यवाद दीजिएगा कि- हम दुष्टों में उन्होंने इस योग्यता को देख लिया कि हम हिन्दी को बाजार के लिए तैयार कर रहे हैं या फिर हम बाजार के हिसाब से तैयार हो रहे हैं। वरना अभी तक तो हिन्दी के लोग अपने भिखमंगई लुक के लिए विश्वविख्यात हैं ही औऱ उस जड़ता के शिकार भी की हम झोला ढोते-ढोते मर जाएंगे, गोला बनाते-बनाते मिट जाएंगे लेकिन रोजी-रोजगार के लिए अपने को तैयार नहीं करेंगे।संजयजी, जाते-जाते एक सवाल आप जरुर पूछिएगा उस बौखलाए मसीहा से कि- क्या वो जो कुछ भी कह रहे हैं, हिन्दी और हिन्दी विभाग को जिस रुप में बनाना चाह रहे हैं क्या उसके केन्द्र में वाकई छात्र हित है या फिर उनकी व्यक्तिगत कुंठा, फ्रसट्रेशन और नो डाउट उनकी बौखलाहट।।

आगे पढ़िए- क्यों बौखलाए हिन्दी के मसीहा
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1 Response to 'हिन्दी के बौखलाए मसीहा'
  1. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_22.html?showComment=1214220300000#c5765034922764187031'> 23 जून 2008 को 4:55 pm

    बढिया रहा. स्थिति बदल रही है, मसीहों को सुहा (नहीं) रहा है !!

    पता नहीं कौन-कौन कालीन कविताओं में क्या-क्या प्रवृत्ति ढूंढा जाता है आज भी हिंदी विभागों के खोदरों में.

    ऐसे शोध करने वाले हमारे एक मित्र ने हमारे एक वरिष्ठ मित्र से उनकी होने वाली प‍त्नी के बारे में पूछा था, 'साथी आपकी होने वाली पत्नी की प्रवृत्ति कैसी है ?'

    बिल्कुल सच कह रहा हूं. वैसे हिंदी-मसीना ने आप पर बाज़ार की तैयारी या बाज़ार के लिए तैयारी का ही आरोप लगाया न, आज कल तो एक और आरोप लग रहा है एनजीओ की तैयारी का !!!

     

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