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भरोसा तोड़नेवालों की जमात

Posted On 3:27 pm by विनीत कुमार |

किताबों, टीचरों, घर के लोगों और समाज के कुछ अच्छे लोगों के बताने और समझाने के बाद आप भरोसा करना सीखते हैं,लोगों की मदद करना सीखते हैं। यह जानते हुए कि ये दुनिया बड़ी घाघ है, आप पर इनकी बातों का इतना असर होता है कि आप संभव होने पर लोगों की मदद कर देते हैं। लेकिन समाज में एक जमात ऐसा भी है जो आपके इस भरोसे को तोड़ता है औऱ तब आप गुस्से में सिर्फ इतना कह पाते हैं कि- आगे से मैं कसम खाता हूं कि किसी की भी मदद नहीं करुंगा। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। फिलहाल तो बहुत गुस्सा बहुत आ रहा है, कसम भी खाने का मन हो रहा है लेकिन अगर लिखने के बाद अगर गुस्सा कम हो जाए तो कसम खाने के बदले एक पोस्ट लिखने के पीछे ये दिलचस्प घटना भर रह जाएगी। तो पढ़िए और राय दीजिए, हमारी इस पोस्ट पर
मैं उस लड़के को पहले से नहीं जानता था, न तो उसका नाम सुना था और न ही मैंने उसे कभी देखा था। आज से छः दिन पहले मेरी एक दोस्त ने फोन करके बताया कि तुम्हारे पास एक लड़के को भेज रही हूं, बेचारा बहुत परेशान है, चार-पाच दिनों के लिए दिल्ली में रहना चाहता है, इसकी मदद कर दो। मैंने अपनी दोस्त से इतना ही भर कहा कि अभी मत भेजो, मैं पता करता हूं कि हमारे यहां गेस्ट रुम खाली है कि नहीं, उसके बाद भेजना। आमतौर मैं किसी को अपने कमरे में रखना नहीं चाहता, एक तो रोज की रुटीन खराब होती है, उसे समय देना पड़ता है और सबकुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसलिए बेहतर होता है कि किसी के आने पर गेस्ट रुम एलॉट करा लूं, भले ही रोज के सौ रुपये देने पड़े।
दोस्त से ये सब बातें हो ही रही थी कि ड्राइवर उसका सारा सामान मेरे कमरे में पहुंचा गया और पीछे से वो लड़का भी आ गया। मैं समझ गया कि मेरी सहमति-असहमति जाने बिना मेरी दोस्त ने उसे आने को कह दिया था। खैर,
उस लड़के जो मेरी बात हुई उसके मुताबिक वह मेयो कॉलेज अजमेर का स्टूडेंट है। वहां हॉकी का कैप्टन है। इस बार बारहवीं की परीक्षा दिया है और अब डीयू में एडमीशन लेने चाहता है। उसकी हॉकी प्रैक्टिस छूट न जाए इसलिए वह कैंपस के आसपास ही रहना चाहता छा। मैंने उसे सारी स्थिति समझा दी और बताया कि रोज के सौ रुपये देने होंगे। उसने यस सर कहा। मेरी दोस्त का ड्राइवर उसे यह कहकर साथ ले गया कि सुबह से कुछ खाया नहीं है मैं इसे कुछ खिलाकर लाता हूं, तब तक आप इसके नाम से रूम एलॉट करवा दो। मैंने कहा ठीक है औऱ एक बार फिर पूछ लिया कि बताओ- कितने दिनों के लिए एलॉट करना है। उसने कहा, भैया सात दिनों के लिए करा दीजिए। वैसे भी सात दिनों से ज्यादा हमारे यहां कोई रुक नहीं सकता है। मैंने नीचे आकर सात सौ रुपये जमा किए और उसके लिए कमरा बुक करा आया।
थोड़ी देर बाद वह आया और अपना सामान ले जाकर गेस्ट ऱुम में शिफ्ट हो गया। मैंने उसे मेस हॉल, कम्प्यूटर रुम, टॉयलेट और बाकी चीजें दिखा दी और कहा, बाकी किसी भी चीज की जरुरत हो, मेरे पास आ जाना। एक दिन बीत गया वह दुबारा मेरे कमरे में नहीं आया। वापस जाकर गेस्ट रुम में देखा तो कमरा लॉक था। मुझे कुछ अटपटा-सा लगा। सोचा शहर में नया-नया है, कहां चला गया। मैंने अपनी दोस्त को फोन किया।
मेरी दोस्त ने बताया कि वह अपना सारा सामान लेकर वहां से चला गया है, अब वह वहां नहीं रहेगा। आपको हैरानी होगी जानकर, उसने जो वजह बतायी। उसका कहना था कि कमरे में एक छिपकली थी और डरकर उसने खाली कर दिया। मैं मेयो कॉलेज में कई बार रुका हूं, वहां भी बहुत सारी छिपकली है औऱ फाइव तक के बच्चे आराम से रहते हैं। मुझे लगा, ये कोई वजह नहीं है। मैंने उस लड़के से बात करने की कोशिश की। उसने बताया कि मेरी मम्मा मुझे लेने आ गयी थी औऱ मैं चला आया। मैंने कहा- ममा, लेकिन तुम तो मेयो से आए थे न। उसने कहा हां, लेकिन ममा ग्रेटर नोएडा से लेने चली आयी और मैं आ गया। मेरा घर यही है।
मैंने उस समय उससे सिर्फ इतना ही कहा कि- चले गए लेकिन एक बार मुझसे मिलकर तो जाना चाहिए था, चाबी तो दे देनी थी। उसने कहा, ध्यान नहीं रहा सर। मैं आपको कल पक्का चाबी दे जाउंगा। उसके थोड़ी ही देर बाद मेरी दोस्त का फोन आया और उसने बताया कि वो तो चाबी देकर आया है। मैंने पूछा- कहां, उसने कहा, कांऱटर पर। मैं समझ गया कि ये हॉस्टल में रुकने को होटल में रुकना समझ रही है औऱ ये सब अपनी तरफ से कह रही है। मैंने उसे बताया कि हॉस्टल में चाबिय़ां कांउटर पर नहीं, ऑफिस में जमा कराना होता है जो कि मैं कराउंगा। उसके बाद उसने कहा, अच्छा चलो मैं पता करती हूं।
इस घटना के हुए दो दिन हो गए। मेरी दोस्त ने कोई फोन नहीं किया और न ही उस लड़के ने कोई फोन ही किया मुझे चिंता हुई कि क्या बात है, कुछ गड़बड़ तो नहीं है। मुझे थोड़ डर भी लगा क्योंकि आते ही उसने ड्राइवर के माध्यम से जानना चाहा था कि यहां वो किसी लड़की को ला सकता है कि नहीं। मैंने फिर जानना चाहा कि, चाबी कब तक पहुंचा रहा है।
फिर फोन किया, लड़के ने कहा कि सर आज पूरी कोशिश कर रहा हूं पहुंचाने की औऱमैं दिनभर उसका इंतजार करता रहा। अपने सात सौ रुपये की बात तो मैं भूल चुका था, मुझे चिंता इस बात की हो रही थी कि चाबी आ जाए बस। मेरी दोस्त के फोन करने पर, पता करती हूं और फोन रख दिया।
पिछले दो दिनों से मेरा दोस्त मुन्ना बीमार है, हॉस्पीटल लाने-ले जाने के चक्कर में मैं दुबारा पता करना भूल गया कि चाबी का क्या हुआ। आज सुबह ध्यान आया कि अरे, आज तो आखिरी दिन है , कल से तो ऑफिस वाले किसी और को कमरा एलॉट करेंगे तो मैंने तुरंत अपनी दोस्त को फोन किया-
यार क्या हुआ चाबी का, मैं तो परेशान हो गया हूं, प्लीज कमरे की चाबी दिलवा दो। उसका जबाब था- अरे, तुम्हें चाबी अभी तक नहीं मिली, दो दिनों से तुम्हारा कोई फोन नहीं आया तो मैंने सोचा कि मामला निबट गया होगा, अभी पता करती हूं। रुको फोन करके बताती हूं।
दोबारा फोन करने के बाद उसने कहा- विनीत मैंने लड़के के पापा को तुम्हारा नंबर दे दिया है, वो तुमसे बात कर लेंगे औऱ फिर जो बात होगी, हमें बताना।
लड़के के पापा ने फोन किया और कहा कि बेटा, मैंने अपने लड़के को खूब डांटा है। आज तो मैं बाहर हूं, ड्राइवर भी नहीं है, कल दस बजे तक दे दूं तो चलेगा। मैंने कहा- अंकलजी मैं तो आपकी मदद करके बुरी तरह परेशान हो गया हूं, आपको जो उचित लगे कीजिए लेकिन कल से किसी दूसरे के नाम से कमरा बुक होगा। उन्होंने कहा कि- मैं आज के लिए पूरी कोशिश करता हूं।
दोबारा फोन करके मैंने यही बात अपने दोस्त को बताया। उसने कहा- विनीत उनसे कहो कि चाबी घर में ही है न, हम आकर ले जा रहे हैं। मैं किसी आदमी को भेजती हूं, तुम टेंशन मत लेना। चाबी ले लेना बस, पैसे मैं दे दूंगी, तुम्हारे जेब से जाने नहीं दूंगी। मैंने उसकी बात का भरोसा किया औऱ निश्चिंत हो गया। लेकिन,
अभी दो घंटे पहले मेरी दोस्त का फोन आया और उसने फिर पूछा कि- विनीत कमरा तो कल सुबह तक के लिए बुक है न, तो चाबी कल सुबह दें दे तो कोई प्रोब्लम तो नहीं है। कल ही किसी आदमी को भेज देती हूं लाने के लिए। मैंने उससे कहा-तुम इसे सीरियसली नहीं रही हो, तुम इसे होटल समझ रही हो, जबकि तुम्हें पता नहीं है कि आगे से मुझे किसी के लिए रुम बुक कराने में कितनी परेशानी होगी। उसने कहा- कोई बात नहीं मैं आज ही किसी को भेजती हूं।
दस मिनट बाद फिर फोन आया औऱ उसने कहा- ऐसा है कि लड़के के पापा से मेरी ढंग से बात हुई है। उन्होंने कहा है कि- कल दस बजे से दस मिनट भी ज्यादा नहीं होगा, पक्का। मैं सोचती हूं कि जब वो कल चाबी पहुंचाने आ ही रहे हैं तो मेरे आदमी भेजने का कोई मतलब ही नहीं है। दस बजे तो चाबी आ ही जाएगी। औऱ वैसे भी तुम्हें चाबी आठ बजे शाम के पहले तो मिलेगी नहीं, ऑफिस में जमा भी नहीं करा पाओगे। ठीक है, परेशान मत होना, औऱ हां जब चाबी पहुंचाने आएं तो अपने सात सौ रुपये उनसे जरुर मांग लेना।
मेरे ही कमरे में, मेरे बिस्तर पर पड़ा मेरा दोस्त मुन्ना, पूरी बात को सुन रहा था और इस बीच अंदाजा लगा लिय कि मामला क्या है। उसने बस एक ही बात कही- सर, आपको दोस्ती के नाम पर इजी केक की तरह इस्तेमाल किया गया है। जहां-तहां इंसानियत मत झोंका कीजिए, वेवकूफ करार दिए जाएंगे। इतना कहकर उसने करवट बदल ली.
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9 Response to 'भरोसा तोड़नेवालों की जमात'
  1. भुवनेश शर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html?showComment=1213269060000#c82956023718911740'> 12 जून 2008 को 4:41 pm

    बच के रहिए जी....जमाना है बहुत खराब

     

  2. PD
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html?showComment=1213270980000#c7475894956730781570'> 12 जून 2008 को 5:13 pm

    मेरी सलाह माने तो मदद करना ना छोड़ें, मगर थोड़ा संभल कर करें.. आंखें मूंद कर नहीं..
    एक घटना सुनाता हूं.. मैं अपने एक मित्र के घर गया था बैंगलोर में.. मैं उससे लगभग 12-13 साल बाद मिल रहा था.. उसने बहुत संसय के साथ मुझे अपने घर पर ठहराया था.. बहुत बाद में उसने अपने उस व्यवहार के लिये माफी मागी और बताया कि एक बार अपने किसी मित्र के कहने पर उसने दो लड़कों को घर पर 1 हफ़्ते तक रूकने कि इजाजत दी थी मगर दूसरे ही दिन भगा दिया था.. क्योंकि उसके मित्र के दोस्त बेतिया में किसी का मर्डर करके छुपने की जगह ढूंढते हुये उसके घर पर ठिकाना बना रहे थे..
    जमाना सच में खराब है सो थोड़ा संभल कर चलें..

     

  3. nadeem
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html?showComment=1213271640000#c49335214887821274'> 12 जून 2008 को 5:24 pm

    वैसे तो मुन्ना ने आपको अच्छी सलाह दे ही दी है. हाँ मगर मदद करना न छोड वारने कोई जिसको वाकई में मदद चाहिए होगी परेशां होगा..आखिर यही तो हमें सिखाया गया है.

     

  4. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html?showComment=1213272600000#c6609447336196656937'> 12 जून 2008 को 5:40 pm

    ख़ुद समझदार हो बाबु. पिछले हफ़्ते आपने इससे भी बड़ा नेक काम किया था.:) करते रहो. वैसे एक कहावत याद रही थी,

    'नेकी कर ..... (आगे क्या है)

    मुन्ना को क्या हुआ? शाम को मिलने की कोशिश करूंगा.

     

  5. ab inconvenienti
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html?showComment=1213273380000#c402687508582739420'> 12 जून 2008 को 5:53 pm

    यह तो बताया ही नहीं, आख़िर चाभी और सात सौ रुपये टाइम पर मिले या नहीं?

     

  6. सुशील कुमार छौक्कर
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html?showComment=1213273440000#c2950328408870729467'> 12 जून 2008 को 5:54 pm

    विनीत भाई

    पता नही दुनिया इतनी क्यो बदल रही है। मेरे पास तो किस्से ही किस्से है। खैर मदद करना मत छोडो बस सर्तक होके मदद करो। लोग मदद करना छोड देगे तो जरुरतमद का क्या होगा। जिन्हे वाकिये मदद की जरुरत है।

     

  7. निशाचर
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html?showComment=1213277280000#c588880477487487008'> 12 जून 2008 को 6:58 pm

    जनाब यूँ तो मुझे आपको मशविरा देने का कोई हक नहीं बनता फिर भी आपके साथ बीती घटना ने मुझे भी उद्वेलित कर दिया है. अपने स्कूल और कॉलेज की पढाई के लिए देहरादून प्रवास के दौरान ऐसी अनेको घटनाओं ने मुझे जीवन में अत्यंत ही व्यावहारिक बना दिया है और मैंने अपने लिए कुछ नियम बनाये है शायद आपके भी काम आये....
    १. "मदद मांगने से मिलती है" - मैं कभी भी अपनी तरफ से किसी को मदद की पेशकश नहीं करता .
    २. "मैं सन्यासी नहीं हूँ" - मदद करते वक़्त मैं अपना भला बुरा सोच कर ही मदद करता हूँ मतलब किसकी मदद करनी है और किस हद तक यह पहले ही तय कर लेता हूँ.
    ३. "स्पष्ट बोलो और सुखी रहो" - अगर कोई जबरदस्ती आपके ऊपर लदने की कोशिश कर रहा है तो उसे स्पष्ट रूप से " न " कहें. संकोच बरतने से आपको नुकसान ही उठाना पड़ेगा. पहली बार में ही न कहें क्योंकि जिसको आप मदद से इंकार कर रहें हैं वह जरूर बुरा मानेगा परन्तु वह इस बात को कतई याद नहीं रखेगा की आप उसकी पहले अनेक अवसरों पर मदद कर चुके हैं. ऐसे व्यक्तियों से संबंध रखने से एकांकी रहना ही भला.
    ४. मदद करने से पहले ये जरूर जांचे की क्या वास्तव में उसे मदद की जरूरत है या वह अपनी किसी असुविधा से बचने के लिए आपका इस्तेमाल कर रहा है. इसके लिए जरूरी है कि आप हर किसी को शक की निगाह से देखें. बात अटपटी है पर ये आपको परेशानियों से बचायेगी.
    ५. मदद करने के बाद उससे कभी किसी मदद की आशा न रखें. हो सकता है वो इंकार कर दे और आपको दुःख हो.

    जनाब इन पर गौर कीजियेगा, जरूरी नहीं की आप इन पर अमल भी करें............

     

  8. Udan Tashtari
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html?showComment=1213290000000#c2299712469081869848'> 12 जून 2008 को 10:30 pm

    बस इतना ही: मदद करना न छोड़ें.

     

  9. Sarvesh
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html?showComment=1213520160000#c3013012296814765536'> 15 जून 2008 को 2:26 pm

    मदद करना नहीं छोडे विनीत जी. हां थोडा पुछ ताछ कर लें ताकी लोग सुविधा का नजायज़ फायदा नहीं उठा सके. अगर दस जरुरतमन्दो कि मदद करते हैं तो एक आध ऐसे लोगो को सबक लेने के श्रेणी मे रखा जा सकता है.

     

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