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दलितों का इतना ईमानदार विरोधी मुझे अभी तक नहीं मिला था। अपने डीयू कैंपस में तो फिर भी रिजर्वेशन के आधार पर किसी को नौकरी लग जाती है तो कुछ लोग गरियाते हैं, कोटे से हैं सो हो गया, वरना आता-जाता कुछ थोड़े ही न है। उनके गरियाने के वाबजूद भी मैंने उन्हें कई दलितों को समय पर मदद करते देखा है। परीक्षा के समय किताबें देते देखा है और यूजीसी का फार्म भरते समय पैसे देते देखा है। एक दो बार तो जो लोग दलित के नाम पर जिसे गरियाते हैं, उसी को मौके पर हॉस्पीटल पहुंचाते भी देखा है। ऐसी हालत में आप उन्हें दलितों का ईमानदारी विरोधी नहीं कह सकते हैं।लेकिन आजकल एक मुहावरा चल निकला है न कि- जो कहीं नहीं है, वो ब्लॉग पर है और जो कहीं नहीं होता वो ब्लॉग पर हो जाता है। दलित विरोधी के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है।....और ये ब्लॉग की महिमा ही देखिए ही हमें दलितों का धुरविरोधी मिल गया, खालिस औऱ ईमानदार विरोधी मिल गया।
कनकलता के मामले पर जब ब्लॉग पर चर्चा शुरु हुई, मोहल्ला और गाहे-बगाहे दोनों पर तब उसे लेकर एक सकारात्मक माहौल बना। तमाम अन्तर्विरोधों के वाबजूद कई ब्लॉगर एक साथ सामने आए। लोग कनकलता और उसके परिवार को लेकर संवेदनशील हुए, उनके पक्ष में खड़े होने की बात की। कई कमेंट्स से तो ऐसा लगा कि हम इस मसले पर उनसे जिस भी तरह की मदद चाहेंगे वो हमें करेंगे। उन्होंने कमेंट के दौरान अपना पता छोड़ा, मेल आइडी छोड़ी। कुछ लोगों ने व्यक्तिगत तौर पर फोन करके, मेल करके कनकलता से सम्पर्क करने की कोशिशें की, उसका मनोबल बढ़ाया। ऐसा करने से उसके लिए संघर्ष कर रहे हमलोगों का भी हौसला बढ़ा औऱ हम ब्लॉग के जरिए भी न्याय मिलने की उम्मीद करने लगे। इसी बीच ब्लॉग की दुनिया में एक पुरुष ब्लॉगर ने अवतार लिया। अबतक ब्लॉगर को मैं इस तरह से लिंग भेद करके नहीं देखता था लेकिन इनके साथ ऐसा जोड़ना बहुत जरुरी है क्योंकि जिस हिम्मत का काम वो कर रहे हैं उसकी क्रेडिट अब तक पुरुषों को ही मिलता आया है। लोग कमेंट पर कमेंट किए जा रहे हैं, कनकलता और दलितों के पक्ष में और बिल्कुल स्पष्ट कर दे रहे हैं ये मामला सिर्फ मकान-मालिक और किरायेदार के बीच का नहीं है, फिर भी ये अवतारी पुरुष लीला किए जा रहे हैं। अब अवतार लिया है तो लीला करना इनकी मजबूरी है। इनका कहना है कि कनकलता के बारे में हम जो कुछ भी लिख रहे हैं वो एक झूठी कहानी है औऱ सारा मामला एकपक्षीय है। वो हमें इस बात की भी राय दे रहे हैं बल्कि कहिए कि ललकार रहे हैं कि हम मकान-मालिक से जाकर पूछें और पता करें कि असल में मामला है क्या। इस भाई साहब जिनके ब्लॉग का नाम दृष्टिकोन है लगातार कनकलता के विरोध में बातें किए जा रहे हैं औऱ मकान-मालिक के पक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं। उनका कहना है कि दिल्ली में कोई भी मकान ११ महीने के लिए देता है और जब ये कांट्रेक्ट खत्म हो गया होगा तो मकान-मालिक ने घर खाली करने को कहा होगा औऱ फिर झगड़े हुए होंगे, इसे जबरदस्ती दलित उत्पीड़न और जातिगत दुर्व्यवहार का नाम दिया जा रहा है। अब इनको क्या समझाया जाए कि जब हमने कनकलता का हादसानामा मोहल्ला पर जारी किया था, उसी समय दुसरी ही पंक्ति में साफ कर दिया था कि जब उसने मकान-मालिक से कांट्रेक्ट की बात की और कहा कि हमलोग दे-तीन साल यहां रहेंगे तो मकान-मालिक ने साफ कहा था कि हमसे आपलोगों को कोई दिक्कत नहीं होगी। इसके पहले भी हमने कोई कांट्रेक्ट नहीं बनवाया, आप आराम से रहो। भाई साहब ने शायद इसे नहीं पढ़ा है और पढ़ा भी होगा तो भी नजरअंदाज कर गए होंगे। दृष्टिकोन साहब जिस कांट्रेक्ट की रट बार-बार लगाए जा रहे हैं औऱ ११ महीने की बात कर रहे हैं, थोड़ी देर के लिए उनकी बात मान भी ली जाए, जो कि मानने लायक है ही नहीं तो भी कनकलता २००७ की जनवरी से रह रही थी औऱ रहते हुए उसे सवा साल होने जा रहे थे। मारपीट की घटना ३ मई २००८ को हुई। अगर मकान-मालिक को घर खाली ही कराना था तो सितंबर-अक्टूबर में ही कराना चाहिए था लेकिन नहीं कराया था। अब यहां मानवता वाला एंगिल मत झोकिएगा कि इस नाते उसने और दिनों के लिए मौका दिया। क्योंकि अगर मकान-मालिक में आदमियत होती तो सवा साल के बाद भी इतनी बुरी तरह बेईज्जत नहीं करता, पीटकर उल्टे पुलिस केस नहीं बनाता। भाई साहब ये सब तब हुआ जब उसे कनकलता की जाति का पता चला। अफसोस की बात देखिए कि ये भाई साहब सिर्फ कनकलता के मामले को लेकर हमसे असहमत नहीं है बल्कि इनका विरोध हमारे दलित समर्थन में होने से भी है। इसका नमूना भी इन्होंने हमारे ब्लॉग पर दिया है। ३१ मई की रात, ग्वायर हॉल, डीयू में एक कमजोर छात्र के पीटे जाने की घटना पर जब हमने पोस्ट लिखी तो भाई साहब ने टिप्पणी रही - अच्छा हुआ वो कमजोर छात्र दलित नहीं था, नहीं तो आप वहां भी दलित विमर्श करने लग जाते। इसका आप क्या अर्थ लगाते हैं। भाई साहब के हिसाब से तो दलितों के पक्ष में बात करने का मतलब हो-हल्ला मचाना है जो कि उन्होंने बहुत पहले ही साफ कर दिया था। इन सबके वाबजूद मुझे अच्छा लग रहा है कि इस डेमोक्रेटिक स्पेस में जहां कि सबको अपनी बात करने का हक है, एक भाई साहब बड़ी बहादुरी के साथ दलित-विरोधी, मानव-विरोधी विचार हमारे सामने रख रहे हैं। है आपमें इतनी हिम्मत, बीस-बीस दिन की ट्रेनिंग के बाद भी ऐसा करने में अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं जी।।..
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2 Response to 'एक ईमानदार दलित-विरोधी के लिए स्तुतिगान'
  1. Suresh Chiplunkar
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post.html?showComment=1212299460000#c2073620426290095625'> 1 जून 2008 को 11:21 am

    जब एक सच्चा व्यक्ति अपने मत पर ईमानदारी से अड़ा हुआ है (जबकि कुछ लोग तो मुँह देखकर आरती उतारते हैं) तो उसकी आलोचना नहीं करना चाहिये… वह साहब वाकई हिम्मती हैं जो अपने मन की बात खुलकर कह रहे हैं, बाकी लोग तो मुँह में राम बगल में छुरी वाले हैं… (मैं भी), मुझमें भी हिम्मत नहीं है कि सरेआम दलितों के खिलाफ़ बोलूं, और ऐसा मैं अकेला नहीं हूँ… उन "दृष्टिकोण" साहब को सलाम

     

  2. Sarvesh
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post.html?showComment=1212486180000#c7362862303606984544'> 3 जून 2008 को 3:13 pm

    jab aap blog likhate hain to har tarah ke log comment denge. kuchh log aapke baat se sahmat honge aur kuchh aapke baat se asahmat honge. Sabse badi baat hoti hai oosko sahmati me laana jo aapke vichar se asahmat hai. Aap prayaas jaari rakhen.

     

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