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वोडाफोन का हचपपी लोगों की मदद करके हैप्पी टू हेल्प होता है। बच्ची की टाई छूटने पर पहुंचाकर, थूक से डाक टिकट छिपकाकर वो लोगों की खूब मदद करता है। हैप्पी उसके संस्कार में है औऱ यही संस्कार आजकल आपको डीयू कैंपस में देखने को मिल जाएंगे।
दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमीशन फीवर शुरु हो गया है। कैंपस में हूं इसलिए इसका सीधा असर देख और समझ पाता हूं. हर कॉलेज के आगे बड़े-बड़े स्टॉल लगे हैं। इंस्टीट्यूट के, कोल्डड्रिंक के औऱ सबसे ज्यादा मोबाईल कंपनियों के। हर दस कदम पर आपको किसी न किसी चैनल या अखबार के लोग घूमते-खोजते और परेशान होते दिख जाएंगे। जो जहां से है उसकी टीशर्ट पर कुछ न कुछ लिखा है। औऱ सबके उपर एक वाक्य लिखा है- मे आई हेल्प यू। वोडाफोनवालों की टीशर्ट पर हचपपी बना है और लिखा है हैप्पी टू हेल्प। इन दिनों डीयू कैंपस हेल्पिंग कल्चर में जी रहा है। हर पांच कदम पर आपको कोई न कोई हेल्प करने के लिए तैयार खड़ा है। हैल्प करने के लिए लोगों को इतना बेताब होते पहले कभी नहीं देखा।
कल अपने गाइड से मिलने गया था. चार-पांच दिनों से कहीं चलना-फिरना हुआ नहीं था सो सोचा, पैदल ही मार लूं। दस दूना बीस रुपये की आमदनी भी हो जाएगी। हॉस्टल से सर के पास तक पहुंचने में पांच कंपनियों की मदद का शिकार हो गया। उनके स्टॉल से गुजरता तो उन्हें लगता कि वो हमारी तरफ ही आ रहे हैं और फिर एक ही सवाल पूछते कि आर यू स्टूडेंट सर औऱ फिर शुरु हो जाते. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि मैं इधर क्यों आया हूं, क्या काम है, जल्दी में हूं,रुकने का मन नहीं कर रहा। स्टूडेंट हूं तो भी मुझे एडमीशन नहीं लेने हैं,ये सब कुछ भी जानना नहीं चाह रहे हैं।
सीधा यह कि सर दिस इज स्पेशली फॉर कैंपस पीपुल। ये स्टूडेंट ऑफर है सर। औऱ फिर बताने लग जाते कि क्या-क्या फायदे हैं इस स्कीम को ले लेने से।
कोई इंस्टीट्यूट वाले मिल जाएंगे और फिर एमबीए के पैकेज,मैनेजमेंट के पैकेज और ऑफर आदि की बात करने लग जाएंगे। आपसे ये भी नहीं जानना चाहेंगे कि आप किस चीज की पढाई कर रहे हो औऱ ये आपके काम का है भी कि नहीं। आप कुछ बोलेंगे इसके पहले कि वो आपको ढेर सारे ब्राउसर पकड़ा देंगे, या तो उसे आप पढ़िए या फिर सड़कों पर फेंक दीजिए, इससे उनको कोई खास फर्क नहीं पड़ता। वो मशीन की तरह मूढ़ होकर आपको थमाते चले जाएंगे। कई बार तो एक ही संस्थान या कंपनी के लोग इतनी नजदीकी पर स्टॉल लगाते हैं कि रास्ते में जाते हुए आपको कई बार एक ही सामग्री बार-बार मिल जाएगी। मैं उसे बर्बाद नहीं करना चाहता इसलिए हाथ में ही रखता हूं और दोबारा देने पर कहता हूं- नहीं है मेरे पास। कुछ तो मुस्करा देते हैं लेकिन कुछ कहते हैं, कोई बात नहीं सर, दोस्तों को दे दीजिएगा।
शाम को पांच से छः के बीच अगर आप कैंपस से गुजरते हैं तो आपको कॉलेजों के आसपास की जमीन दिखायी नहीं देगी, वहां पोस्टरों का अंबार लगा होता है। ब्राउसर फैले होते हैं जिसे कि हम और आप जैसे लोग पढ़कर या फिर बिन पढ़े फेंक देते हैं। ऐसी स्थिति यहां डूसू चुनाव के समय होती है, जब गाडियों पर चढ़कर लोग अपनी पार्टी या फिर प्रत्याशी की पोस्टरें अंधाधुन उड़ाते हैं। थोड़ी देर के लिए अगर आप सड़कों पर फैले इन पोस्टरों पर गौर करेंगे तो आपको एहसास हो जाएगा कि ये पोस्टर और संस्थानों के ब्राउसर लोगों को जानकारी देने के लिए नहीं छापे जाते बल्कि शक्ति प्रदर्शन के लिए बांटे जाते हैं, फैलाए जाते हैं। आपको इन कंपनियों और संस्थानों पर भरोसा होने लग जाए कि जब ये लाखों रुपये पोस्टरों पर खर्च कर देती है तो फिर इसकी हैसियत कितनी होगी। संस्थानों के प्रति आपका भरोसा बढ़ता है.
दूसरी तरफ एक कंपनी के मुकाबले जब दूसरी कंपनी दुगने स्तर से पोस्टरें बांटना शुरु करती है तो सारा मामला बाजार की प्रतिस्पर्धा में बदल जाती है. आपको लगने लग जाएगा कि दिन में किस तरह का एक बर्बर माहौल बना होगा। लोग मदद करने की आपाधापी में, पोस्टरें बांटने की होड़ मचाए होंगे। अपनी कंपनी को सामने वाली कंपनी से बेहतर दिखाने की मारकाट शैली विकसित हुई होगी।
इस पूरे सीन में सूचना के लिए पोस्टर और मदद के लिए हेल्प और मदद करने पर खुश होनेवाले संस्कार गायब होते जाते होंगे, इन सबका अंदाजा आप सिर्फ शाम को कॉलेज के आगे बिखरे पोस्टरों के ढेर से लगा सकते हैं। ये पोस्टर जो कि सुबह के लिए सबसे बड़ी सूचना बनने की दौड में थे शाम को सूचनाविहीन कूड़े के ढेर में तब्दील हो गए हैं। आप इसे लेट कैपिटलिज्म का कचरा कह सकते हैं जो दूसरों की मदद के लिए बेताब तो है लेकिन शाम तक खुद ही लाचार हो जाते हैं,अर्थहीन हो जाते हैं,कुछ-कुछ पोस्टरों की तरह, ब्राउसर के माफिक।.।
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3 Response to 'एडमीशन लेना बाद में, पहले कनेक्शन ले लो'
  1. Rajesh Roshan
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_06.html?showComment=1212736740000#c7036650119586159895'> 6 जून 2008 को 12:49 pm

    अर्थ और बाजार का दबाव

     

  2. हरिमोहन सिंह
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_06.html?showComment=1212739320000#c4763823119230590064'> 6 जून 2008 को 1:32 pm

    सुबह के लिए सबसे बड़ी सूचना बनने की दौड में थे शाम को सूचनाविहीन कूड़े के ढेर में तब्दील हो गए हैं। लिखे तो जबरदस्‍त हो भैया

     

  3. Udan Tashtari
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/06/blog-post_06.html?showComment=1212760740000#c8237317772962711695'> 6 जून 2008 को 7:29 pm

    ये पोस्टर जो कि सुबह के लिए सबसे बड़ी सूचना बनने की दौड में थे शाम को सूचनाविहीन कूड़े के ढेर में तब्दील हो गए हैं।

    -बहुत उम्दा लिखा है.

     

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