पैर रहते रेंगना बहुत मुश्किल होता है,जुबान रहते चुप रहना मुश्किल होता है, दिमाग रहते गलत-सही सब मान लेना मुश्किल होता है लेकिन मुश्किल नहीं होता कहना- कर लो जो करना है। हम अपनी लिखें और उन्हें जो जी में आए करने दें, आएं व्यवस्थित समाज के बीच बर्बर समाज बनाए, कुछ आप तोड़े, कुछ तोड़-फोड़ हम मचाएं-हां जी सर,हां जी सर कल्चर के खिलाफ बिगुल बजाएं..... हमें मेल करें-vineetdu@gmail.com

Sunday, July 12, 2009

कपिल सिब्बल की बात पर,बिफरिए मत कुर्बान अली


कल शाम,पत्रकार स्व.उदयन शर्मा की याद में हुए कार्यक्रम में कपिल सिब्बल की ओर से दिए गए बयान के बाद से पत्रकारों के बीच जबरदस्त बौखलाहट औऱ मलाल है। कुर्बान अली के शब्दों में - आज हमारी हालत ये हो गयी है कपिल सिब्बल आता है और हमारे मुंह पर तमाचा मारते हुए ये कहकर निकल जाता है कि आप कुछ भी छापते रहिए हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हम शर्मिंदा होने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते।

कल की संगोष्ठी में कपिल सिब्बल और आशुतोष,IBN7 की ओर से अपनी बात रखने के बाद जिस तरह का बवाल मचा उसे देखते,पढ़ते हुए आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आज की मीडिया को लेकर लोगों के बीच किस हद तक की झल्लाहट है। लिहाजा आशुतोष को अपनी बात अधूरी छोड़कर ही वापस बैठ जाना पड़ा। सोचिए ये स्थिति तब है जबकि दर्शक दीर्घा में किसी न किसी रुप में मीडिया से जुड़े लोग मौजूद रहे। यही बात अगर आम टेलीविजन दर्शकों और अखबार के पाठकों के बीच होती तो क्या नौबत होती। यहां आकर नामचीन पत्रकारों को ये खुशफहमी छोड़नी होगी कि वो जहां भी जाएंगें लोग उनसे एक नजर देख लेने भर के लिए आएंगे। मीडिया के स्टूडेंट ऑटोग्राफ के लिए मिलने आएंगे,उनसे उनका इमेल आइडी मांगेगें। सच्चाई ये है कि समाज के बीच तेजी से एक ऐसा वर्ग पनप रहा है जो मीडिया से जुड़े लोगों से हिसाब मांगने के मूड में है,आमने-सामने टकराने की तैयारी में है।

सुनिए सुनिए,मेरी बात भी सुनिए कहता रहा दो-तीन चैनलों का नाम लेते वक्त लोग जिस तरह से दांत पीसते हैं,यकीन मानिए अगर उनसे जुड़े लोग मिल जाएं तो पता नहीं उनके साथ क्या करेंगे। मुझे याद है पिछले साल जब हमने सफर के साथ तीन दिनों का मीडिया वर्कशॉप कराया और टेलीविजन रिपोर्टिंग की वर्कशॉप के लिए सबसे तेज कहे जानेवाले चैनल के पत्रकार को बुलाया तो दिल्ली के अलग-अलग संस्थानों से आए बच्चों ने उनकी बात सुनने के बजाय एक-एक करके इतने सवाल दाग दिए कि वो सिर्फ सुनिए,सुनिए मेरी बात भी तो सुनिए। इसे एक हद तक की बदतमीजी भी कह सकते हैं औऱ बच्चे जो कुछ भी पूछ रहे थे उसे सवाल न कहकर आप भड़ास निकालना कह सकते हैं। अंत में बीच-बचाव करते हुए मुझे कहना पड़ा कि-आपलोगों को इनके साथ इस तरह की बदतमीजी करने का अधिकार नहीं है,ये तो बस चैनल के लिए काम करते हैं, अगर आपको वाकई इन सवालों के जबाब चाहिए तो आप चैनल हेड से समय लीजिए औऱ उनके सामने अपनी बात रखिए. लेकिन इन सब बातों के वाबजूद पल्ला झाड़ते हुए खम ठोककर मीडिया को गरियाने के साथ ही आउटपुट के स्तर पर क्या निकलकर आता है?

विश्वविद्यालय और मीडिया संस्थानों में जो लोग भी मीडिया पढ़ा रहे हैं उन्हें बच्चों की ओर से सवाल दागने का ये अंदाज शायद बहुत पसंद आए। अपनी पढ़ायी गयी चीजों को लेकर सुकून हो कि जो और जिस एप्रोच से उन्होंने बच्चों को पत्रकारिता पढ़ाया,वो ठीक उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। वो इत्मिनान कर सकते हैं कि आनेवाले समय में ये बच्चे संतई पत्रकारिता करेंगे औऱ फिर से पत्रकारिता का स्वर्णिम युग आएगा। वर्कशॉप खत्म होने के बाद कुछ टीचरों ने कहा भी कि इन बच्चों के सामने क्या टिकेगें टीवीवाले? आज सही धोया इनको बच्चों ने। सच मानिए इस सीन को देखते हुए मेरे मन में बार-बार एक ही सवाल आया-तो फिर क्यों साल -दो- साल बाद ये बच्चे अपने मीडिया गुरुओं के बारे में कहते फिरते हैं-जिंदगी बर्बाद करते है भइया, मीडिया के नाम पर ऐसा पढ़ाया कि जिसकी इन्डस्ट्री में कोई जरुरत ही नहीं है। सब फालतू औऱ कोरे आदर्श से लदी-फदी बातें।

हर साल देशभर में करीब दो हजार भारतेन्दु औऱ गणेशशंकर विद्यार्थी जैसे लोगों लोगों की पत्रकारिता से प्रभावित होकर पत्रकारिता करने निकले बच्चे क्यों नहीं कुछ बदलाव कर पाते हैं। जाहिर है,संस्थान से बाहर आकर जिन परिस्थितियों औऱ शर्तों पर उन्हें काम करना पड़ता है,वो मीडिया गुरुओं की बातों से मेल नहीं खाती। वो न तो व्यावहारिक ही हुआ करती है औऱ न ही उनमें एप्रोच के स्तर पर समय के साथ-साथ बदलाव आने की गुंजाइश। नतीजा ये होता है कि संस्थान की पत्रकारिता औऱ गुरुओं के पत्रकारिता पाठ उसके लिए दो पाट बनते हैं जिनके बीच की स्थितियों के बीच वो लगातार डूबता-उतरता रहता है। मीडिया कोर्स के दौरान गुरु किसी भी रुप में बाजार, आर्थिक नीतियां औऱ दबाव औऱ विज्ञापन जैसे शब्द को स्टूडेंट के आसपास फटकने ही नहीं देते। अगर आ भी जाए तो उसके लिए पहले से ही बाजारवाद, अपसंस्कृति और उपभोक्तावाद जैसे शब्द पहले से तैयार रखते हैं जो कि उनके हिसाब से पत्रकारिता के अंदर जहर घोलने का काम करते हैं।

दूसरी तरफ पुराने पत्रकार जिन्होंने कि कभी बड़े घरानों से निकलनेवाले अखबारों औऱ पत्र-पत्रिकाओं के लिए कम पैसे में ही सही (उनके हिसाब से) लेकिन इत्मिनान की पत्रकारिता की है,सेमिनारों में उनका सारा जोर सिर्फ इस बात पर होता है कि वो आज के पत्रकारों खासकर टेलीविजन पत्रकारों को फूहड़,गैर-जिम्मेदार और पैसे के पीछे भागनेवाले पत्रकार साबित करने में होता है। अभी करीब पन्द्रह दिन पहले एस.पी.सिंह की याद में हुई संगोष्ठी में बुजुर्ग पत्रकार उमेश जोशी ने कहा कि - "उन्हें आज के पत्रकारों कहने में को पत्रकार कहने में शर्म शर्म आती है । एक-एक पत्रकार पचास लाख औऱ करोड़ रुपये की कोठी खरीद रहा है।" वो पानी पी-पीकर आज के पत्रकारों को गाली देते हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या इस तरह से गरियाने का आधार सिर्फ इसलिए बनता है कि आज का पत्रकार सम्पन्न हो रहा है। हमारे भीतर ऐसा कौन-सा माइंड सेट बन गया है कि हम पत्रकार औऱ साहित्यकार को सम्पन्न होना बर्दाश्त नहीं कर पाते। दूसरी बात कि अगर बुजुर्ग पत्रकारों से मेनस्ट्रीम की पत्रकारिता का नेतृत्व छिनता चला जा रहा है तो इसकी वजह उनका बुजुर्ग होना भर है या फिर बाजार की ताकतों को नहीं समझ पाने की उनकी कमजोरी है। मीडिया संस्थान अगर ये समझ पा रही है कि अगर मीडिया को चलाने के लिए बाजार को शामिल करना अनिवार्य है और उसके मिजाज से यंग जेनरेशन के ही पत्रकार काम लायक हो सकते हैं तो फिर बुजुर्ग पत्रकारों को लेकर कोई क्यों रिस्क उठाए।

दरअसल आज की संगोष्ठी औऱ इसके पहले की भी मीडिया संगोष्ठियों में टेलीविजन पत्रकारों को कोसने की जो रस्म अदायगी होती है,उसके पलटवार में जो टेलीविजन के पत्रकार उत्तेजित होते हैं, वो पुराने जेनरेशन और नए जेनरेशन के बीच की रस्साकशी है। वो पुराने जेनरेशन की ओर से मौजूदा जेनरेशन को नीचा औऱ पतित दिखाने और मौजूदा जेनरेशन की ओर से पुराने पत्रकारों को वस्तुस्थिति की समझ न होने की तोहमत जड़ने का लीला कीर्तन है। ये अपने-अपने स्तर पर खुद को जस्टिफाय करने की कोशिश है। लेकिन इससे भी बड़ा सच है कि आज की पत्रकारिता अगर बाजार के हाथों बिक गयी है,सारे नए पत्रकार उसकी कठपुतलियां बन गए हैं तो ये भी किसी न किसी रुप में बुजुर्ग पत्रकारों की ही हार है। अपनी हठधर्मिता की वजह से पत्रकारिता औऱ बाजार के बीच एक संतुलित संबंध नहीं बनाने का नतीजा है। औऱ फिर कौन जाने,ऐसी कोशिशें उन्होंने की भी होगी औऱ असफल हो जाने की स्थिति में बाकियों के साथ राग-मालकोश का रियाज करने में जुट गए हों।
दरअसल आज की संगोष्ठी औऱ इसके पहले की भी मीडिया संगोष्ठियों में टेलीविजन पत्रकारों को कोसने की जो रस्म अदायगी होती है,उसके पलटवार में जो टेलीविजन के पत्रकार उत्तेजित होते हैं, वो पुराने जेनरेशन और नए जेनरेशन के बीच की रस्साकशी है। वो पुराने जेनरेशन की ओर से मौजूदा जेनरेशन को नीचा औऱ पतित दिखाने और मौजूदा जेनरेशन की ओर से पुराने पत्रकारों को वस्तुस्थिति की समझ न होने की तोहमत जड़ने का लीला कीर्तन है। ये अपने-अपने स्तर पर खुद को जस्टिफाय करने की कोशिश है। लेकिन इससे भी बड़ा सच है कि आज की पत्रकारिता अगर बाजार के हाथों बिक गयी है,सारे नए पत्रकार उसकी कठपुतलियां बन गए हैं तो ये भी किसी न किसी रुप में बुजुर्ग पत्रकारों की ही हार है। अपनी हठधर्मिता की वजह से पत्रकारिता औऱ बाजार के बीच एक संतुलित संबंध नहीं बनाने का नतीजा है। औऱ फिर कौन जाने,ऐसी कोशिशें उन्होंने की भी होगी औऱ असफल हो जाने की स्थिति में बाकियों के साथ राग-मालकोश का रियाज करने में जुट गए हों।

बिकी हुई पत्रकारिता के बीच क्या बुजुर्ग पत्रकार कोई ऐसी मिसाल हमारे सामने रखते हों जिससे कि भारतेन्दु युग की पत्रकारिता की ट्रेनिंग लेकर निकला यूथ सीधे उनसे जुड़े। सिर्फ संपादकीय पन्नों पर लिखते रहने से बदलाव की गुंजाइश नहीं बन पाती। किसी ने किसी जमाने में रिस्क लेकर पत्रकारिता की लेकिन वर्तमान में प्रासंगिक बने रहने के लिए उन्हें नए-नए मिसाल बनाते रहने की जरुरत होती है। आज जरुरत इस बात की है कि बुजुर्ग पत्रकारों की ओऱ से वो सारे मंच तैयार किए जाएं जो बाजार की कठपुतली हुए बगैर पत्रकारिता कर सकें। तब देखिए कितने नए पत्रकार उनके साथ-साथ खड़े हो जाते हैं। लेकिन सच्चाई तो ये है कि सादगी के नाम पर पत्रिका का एक अंक निकाला नहीं कि मध्यप्रदेश और शास्त्री भवन के चक्कर लगाने लग गए।

अब बात रही कपिल सिब्बल के बयान और उस पर कुर्बान अली के बेचैन होने की तो मैं नहीं जानता कि कपिल सिब्बल ने इतना गैरजिम्मेदाराना बयान क्यों दिया? लेकिन दावे के साथ कह सकता हूं कि चाहे कपिल सिब्बल हों या फिर देश के कोई भी दूसरे नेता,उन्हें हमारे लिखे एक-एक शब्द का,बोली गयी एक-एक बात का फर्क पड़ता है। नहीं तो मामूली अखबारों और पत्रिकाओं जिसे कि आम बोलचाल की भाषा में अंडू-झंडू कहते हैं,उनके लोग उनकी कतरनें जुटाते फिरते। लाख कह लीजिए कि बाजार के हाथों मीडिया बिक चुकी है लेकिन लोग उसकी ताकत को अब भी समझते हैं। कपिल सिब्बल अभी हौसले में हैं,कुछ भी बोल सकते हैं लेकिन आप औऱ हम सच को समझते हैं। इसलिए कुर्बान अली जिस अंदाज में इस पर रिएक्ट कर रहे हैं उससे साफ जाहिर होता है कि वो नए जेनरेशन के पत्रकारों पर आरोप लगा रहे हैं कि आपने हमारा नाम डुबा दिया। उन्हें चाहिए कि कपिल सिब्बल की बात पर स्यापा करने के बजाय उनकी पॉलिटिक्स को समझें,ऐसा कहकर पत्रकारों का मनोबल तोड़ने का जो काम उन्होंने किया है,उसे मजबूत करें।

कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट जानने के लिए क्लिक करें- दिल्ली में पत्रकारों की गोष्ठी,टोका-टोकी के बीच टीवी पत्रकार आशुतोष ने भाषण बीच में छोड़ा

Saturday, July 11, 2009

फेसबुक की दोस्ती में आखिर रखा क्या है ?


फेसबुक के मामले में बात करते हुए देश के एक मशहूर टेलीविजन पत्रकार ने मुझसे कहा- मेरे ट्रेनी और इन्टर्न माइ फ्रैंड में करन जोहर को दोस्त बनाए हुए हैं। अब मैं ही उनसे महीने-दो महीने में बात करता हूं तो तुम सोचो कि करन जोहर से उसकी कितनी बात होती होगी..सब ऐसे ही हैं। होता ये है कि इंसान में इतनी सॉफ्टनेस तो होती ही है कि जब आप फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजो तो वो एक्सेप्ट कर लेता है,उसका जाता ही क्या है,बस कन्फर्म पर क्लिक ही तो करनी होती है। नहीं तो फेसबुक की इस दोस्ती में रखा क्या है?

फेसबुक में नामचीन हस्तियों की ओर से अपनी फ्रैंड रिक्वेस्ट स्वीकार लिए जाने पर जो लोग इधर-उधर इतराते फिरते हैं, फुलकर कुप्पा हो जाते हैं,उनके उपर इससे शायद ही कोई बड़ा व्यंग्य हो। दोस्ती-यारी में यही बात हम अपने बीच इतराने वाले लोगों को कहते तो या तो मुंह फुला लेता,हमें दुनियाभर की दलीलें देता,खुन्नस खा जाता या फिर ये भी दावा करता कि ऐसे थोड़े ही देस्ती कर लिए हैं,पर्सनली जानते हैं हमको। फेसबुक क्या, जीके उऩके घर जाकर खाना भी खाए हैं हम। गोरगांव से जब भी यहां आते हैं तो हमको जरुर फोन करते हैं। इस मामले में आप कह सकते हैं कि नामचीन हस्तियों के साथ अपने नाम जुड़ने की छटपटाहट और उस दम पर अपनी औकात बताने की बेचैनी हमें फेसबुक पर उन लोगों से जुड़ने के लिए उकसाती है जो कि एक बार रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर लेने के बाद आपकी तरफ ताकते तक नहीं हैं। आप उन्हें ऑनलाइन देखते हैं,आपका मन करता है कि उन्हें छेड़ें,उनसे पूछे कि सर आप कैसे हैं। अभी दो शब्द टाइप करते हैं कि आपकी उंगलियां रुक जाती है-कहीं वो बुरा न मान जाएं,कहीं हमें हटा न दें,हमें चेप न समझ लें।
फेसबुक की दोस्ती को लेकर टेलीविजन पत्रकार ने जो कुछ भी कहा उस संबंध मैंने सिर्फ इतना ही कहा- इसलिए सर,मैं अपने फेसबुक पर केवल उन्हीं लोगों को शामिल करता हूं जिनको या तो मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं,जिनसे मेरी पहले कई बार बात हो चुकी है,जो किसी मोड़ पर आकर भूल गए औऱ अब फिर से यहां मिल गए,ऐसे लोगों को रिक्वेस्ट भेजता हूं जो मेरी पहुंच के हैं और जिनसे मंडी हाउस,मीरी रोड या मुंबई चौपाटी पर बात हो सकती है। ऐसे किसी लोगों से फेसबुक पर नहीं जुड़ता जो नाम को लेकर बहुत बड़े हैं लेकिन जिनसे मेरा कोई सरोकार नहीं रहा है या फिर लिखने-पढ़ने और शेयरिंग के स्तर पर कोई कोई साबका नहीं पड़ सकता है।

सच पूछिए तो व्यक्तिगत स्तर पर फेसबुक मेरे लिए नए-नए दोस्त बनाने से कहीं ज्यादा पुराने दोस्तों को खोजने की जगह ज्यादा है। वो दोस्त जो एम.ए के दौरान हमेशा हमारे संभावित अफेयर के बीच मठ्ठा डालने का काम करता रहा, वो दोस्त जो डिवेट जीतने पर बीस प्रतिशत की कमीशन के लिए सिर पर सवार हो जाता,वो दोस्त जो कभी भी मेरे बारे में पूछनेवाली लड़कियों को सही-सही नहीं बताता कि मैं कहां हूं। ये अलग बात है कि मेरे पूछने पर कि वो कहां गयी,कहता पहले प्रॉमिस करो कि हंसराज वाली से मेरे बारे में बात करोगे। उन दोस्तों को खोजने के लिए फेसबुक का इस्तेमाल करता हूं जो चैनल की नौकरी करने के दौरान बॉस औऱ प्रोड्यूसरों की मां-बहन एक साथ सुनी। पैसे और लड़कियों के बीच इज्जत बचाने के लिए शाम के चार बजे(जबकि लंचटाइम खत्म हो जाता,वीडियोकॉन टॉवर के ठीक नीचे के ढाबे में साथ खाते। उन दोस्तों को याद करने के लिए जिनके साथ तीन स्क्रिप्ट लिखने के बाद पंडीजी की दूकान पर सुनियोजित तरीके से गरियाने पहुंचते। इस बीच साथ काम करनेवाली लड़की पूछती-कोई पूछेगा कि कहां गए हो तुम औऱ राणा तो क्या कहूंगी तो क्या कहूंगी। मैं कहता- कह देना भड़ास निकालने गया है। शुरुआती दौर में चैनलों में नौकरी करते हुए खाने-पीने और छुट्टी से भी सबसे ज्यादा किसी चीज की जरुरत होती है तो वो है भड़ास निकालने की। मैं तो दो-तीन स्टोरी के बाद पन्द्रह मिनट के लिए ही सही भड़ास न निकाल लूं तो आगे का काम ही नहीं होता। कई लोगों की जरुरत एक लत बन जाती है जिसे कि फ्रस्टू समझा जाने लग जाते है। आज मैं उस राणा और उस लड़की को खोजने के लिए फेसबुक पर आता हूं। वो लड़की जो वैसे दिनभर में तीन-चार बार बैग लेकर उठती तो मैं हर बार पूछता-घर जा रही हो क्या औऱ वो झल्ला जाती- नहीं,घर नहीं जा रही,यार तुम बहुत ही कमीने हो,जब जानते हो फिर भी पूछते हो,बड़े बेशर्म हो।

आज फेसबुक पर उस लड़की को खोजता हूं जो खुद होटल अशोका से मैंगो फेस्ट में आम खाकर आती और उसकी स्क्रिप्ट लिखते हुए,स्वाद को बताने के लिए हिन्दी में शब्द खोजने पड़ते,वो लड़की जो सेटिंग से बाय-बाय करती हुई अपने ब्ऑयफ्रैंड के साथ हाथ हिलाती हुई निकल जाती और कहती- विनीत जरा देख लियो। इस छोटी-सी जिंदगी में इतने सारे लोग,इतनी सारी यादें हैं कि उन सबको याद करने लग जाओ,उन्हें खोजने लग जाओ तो लगेगा कि फेसबुक तो बड़ी कमतर चीज है। काश कोई ऐसी चीज होती जिसके सर्च बॉक्स में जाते और नाम के साथ संदर्भ और यादों को लिखते,कुछ इस तरह- हिन्दू कॉलेज कैंटीन की याद,झंडेवालान में समोसे का खोंमचा औऱ तभी धड़धड़ाकर रिम्मी, जसलीन, प्रियंका, दीपा, राणा,शंभू,रंजन,नागिन,विजयालक्ष्मी,रावण, अबू सलेम सबों के लिंक,स्टेटस औऱ मेल आइडी निकल आते। लेकिन फेसबुक पर ऐसा कुछ नहीं होता। अब बताइए,अगर इस तरह की कल्पना करें तो फेसबुक है कोई बड़ी चीजे,नहीं न।

फिर भी फेसबुक पर लोग-बाग मार किए जा रहे हैं। जीमेल खोलो तो टोकरी के भाव मेल पड़े होते हैं। फलां हैज ऑलसो कमेंटेड ऑन फलां,एक्स हैज कमेंटेड ऑन योर स्टेटस। शुरु-शुरु में तो मैं खोलकर पढ़ता था कि देखें किस पर किसने क्या कमेंट किया है। लेकिन अब स्थिति दूसरी है। जिस फलां पर कमेंट किया है चलो उसे तो मैं जानता हूं लेकिन जिसने किया है,उससे मेरा कोई मतलब नहीं है। अब क्यों पढूं,ऐसे दर्जनों कमेंट को जिससे ये पता करना मुश्किल हो जाए कि अपनी किस पुरानी दोस्ती औऱ संदर्भ को याद करके दोनों कमेंट-कमेंट खेल रहे हैं। आपको बहुत बेकार लगेगा ऐसे में। कई बार होता है कि आप किसी से मिलने जाते हैं। आप आपका दोस्त औऱ एक औऱ आपका दोस्त। अब स्थिति ये बनती है कि वो दोनों आपस में हांके जा रहे हैं औऱ आपको है कि बातचीत का सिर-पैर ही समझ नहीं आ रहा। ऐसी स्थिति में लगेगा कि आसपास से सांस लेने के लिए हवा गुजरनी बंद हो गयी है। मेरी मां इसके लिए उठल्लू शब्द का प्रयोग करती है। इसे आप उल्लू भी समझ सकते हैं। आप सोचिए,ऐसे कमेंट औऱ मेल को पढ़-पढ़कर क्यों उल्लू या उठल्लू बनने जाए।

इन दिनों फेसबुक को जिस रुप में लिया जा रहा है वो तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है बताने से ज्यादा,दोस्ती के नाम पर किसी के वॉल पर कुछ लिख आने से ज्यादा ब्लॉग के विकल्प के रुप में इसे पॉपुलर करने में है। समय की कमी,पोस्ट न लिखने का आलस फेसबुक को अधिक पॉपुलर बना रहे हैं। जिस किसी को भी चर्चा में बने रहने की,अपना नाम लोगों के दिमाग में डाले रखने की आदत बन गयी है वो इन दोनों वजहों के होने के बावजूद नाम को लेकर कॉन्शस तो रहेगा ही। फेसबुक से बेहतर और अब ट्विटर से आसान कोई दूसरा माध्यम नहीं है। पूरी पोस्ट नहीं लिखना चाहते,कोई बात नहीं जो क्रक्स है उसे ही दो लाइन में लिख दो। बाकी उस पर चर्चा शुरु हो जाएगी। किसी भी मसले को लेकर यहां महौल बनाए जा सकते हैं औऱ उसका बतौर रेफरेंस इस्तेमाल किया जा सकता है जैसा कि रवीश कुमार ने एनडीटीवी इंडिया की स्टोरी के लिए किया भी और फेसबुक के लोगों का शुक्रिया भी अदा किया। फेसबुक की इस दो लाइन में भी आपको ब्लॉग करने का सुख मिलेगा।

टीवी पत्रकार से बातचीत करने के बाद मैंने अपने फेसबुक दोस्तों की लिस्ट पर एक बार फिर से गौर किया। लगभग सबों को किसी न किसी रुप में बातचीत की। कुछ के लिए स्क्रैप भेजे। चार-पांच दिन तक इंतजार किया औऱ उधर से किसी तरह का कोई जबाब न मिलने की स्थिति में उन्हें डिलीट करता गया। आंकड़े कमजोर तो होते चले गए लेकिन भीतर से भरा-भरा महसूस कर रहा हूं कि अब फेसबुक पर जो भी लोग हैं,उन्हें मैं कह सकता हूं कि मैं उन्हें जानता हूं,मेरी उनसे बात होती रहती है और वो मेरे ऐसे दोस्त हैं जिनसे मैं अपने मन की बात कर सकता हूं। अक्लमंद आदमी कह सकता है कि- क्यों डिलीट कर दिया तुमने बहुत सारे लोगों के नाम को,कुछ नहीं तो तुम्हारे स्टेटस पर कमेंट करने के काम आते। देखकर अच्छा लगता कि इतने सारे लोगों ने कमेंट किए हैं। नहीं भई,मेरे पास अभी समय की कमी नहीं पड़ी है,मैं ब्लॉग लिखकर ही खुश हूं और मुझमे इतनी ताकत कहां है कि दोस्ती करने आए लोगों से कहूं- ले लीजिए न आप मेरी एक पॉलिसी,उसके लिए कलेजा चाहिए।...

Wednesday, July 8, 2009

आसाराम हुए बेलगाम,मीडिया को कहा कुत्ता




अब तक जिस मीडिया ने आसाराम को अपने जरिए लोगों के घर-घर तक पहुंचाने का काम किया,उनके संयम और प्रवचन की मार्केटिंग करते हुए,उनके नाम पर एक बड़ा बाजार पैदा करने में उनकी मदद की,आज वही मीडिया आसाराम की नजर में कुत्ता है। गुरु पूर्णिमा के मौके पर जब कि उनके हजारों भक्त गुरु वचन सुनने के लिए बेचैन होते रहे,संयमित जीवन औऱ जुबान रखने का पाठ सीखने आए,ऐसे मौके पर दुनियाभर के लोगों को संयम और संतुलन का पाठ पढ़ानेवाले आसाराम ने उनके सामने मीडिया को कुत्ता कहा। शायद वो समझ नहीं पा रहे हैं कि मीडिया के लिए वो जिस तरह की भाषा और जुबान का प्रयोग कर रहे हैं उसकी तासीर कैसी होगी और ये लोगों के बीच किस तरह का असर पैदा करेगा? उनके संयम औऱ संतई का जो लबादा जगह-जगह मसक रहा है उसके भीतर झांककर देखने की कोशिश में,मीडिया देश की ऑडिएंस के सामने किस एप्रोच के साथ पेश करेगा और ऑडिएंस उस पर किस तरह रिएक्ट करेगी,इसका अंदाजा शायद उन्हें नहीं है।


फेसबुक पर लिखी मेरी बात पर हरि जोशी ने कमेंट किया है कि -ऐसे बाबाओं को मालूम है कि उनके भक्त देख, सुन और समझ नहीं सकते। इस आधार पर मान लिया जा सकता है कि उनके खिलाफ जो भी चीजें निकलकर सामने आ रही है और आगे भी आने की संभावना बनी है और जो कुछ भी मीडिया के जरिए प्रसारित किया जा रहा है,उसका असर उनके भक्तों पर नहीं होगा। जैसा कि उनके भक्त लगातार कहते आ रहे हैं कि उनके पीछे मीडिया के लोग पड़ गए हैं और उन्हें फंसाने की जबरदस्ती कोशिश में लगे हैं। लेकिन अस्सी करोड़ से ज्यादा हिन्दू आबादी वाले इस देश में हर इंसान आसाराम का भक्त ही होगा,क्या ऐसी गारंटी कार्ड लेकर आसाराम की जुबान इतनी गैरजिम्मेदार होती चली जा रही है। क्या ऐसा वो उन शिष्यों के बूते कह रहे हैं जो कि अपनी दबंगई से न्यायिक फैसले को बाधित करने की कोशिश करेंगे,उन शिष्यों के भरोसे जहर उगल रहे हैं जो अपने हाथों से माला और छोला झटककर,अपनी सारी ताकत कैमरे को तोड़ने और चैनल के रिपोर्टरों को लहुलूहान करने में लगाते हैं,उनकी जुबान को बंद करने का कुचक्र रचते हैं। अगर वो ऐसा सोचते हैं जो कि व्यवहार के स्तर पर दिखता है तो संयम और दैवी आचरण का पाठ पढ़ते और पढ़ाते हुए देश के भीतर जो नस्ल तैयार हो रहा है,वो आसाराम की साधना पद्धति पर सवालिया निशान खड़ा करता है औऱ इसकी सफाई में बोलने के लिए कहीं कुछ नहीं बचता।

दूसरी बात, अगर इस गारंटी कार्ड को ध्यान में रखते हुए भी ये मान लें कि सब उनके भक्त और शिष्य ही हैं(जो कि नहीं होनेवाले लोगों पर तोहमत लगाना होगा)तो क्या लाइ डिटेक्टर में जिस तरह से तीन शिष्यों ने आश्रम में काला जादू होने की बात कही है,उन शिष्यों की संख्या में इजाफा होने में बहुत वक्त लगेगा। इस बात की संभावना कोई जादुई यथार्थ के तहत नहीं की जा रही है,हम किसी भी तरह से उस दिशा में नहीं जा रहे हैं कि आसाराम के शिष्यों को सद् बुद्धि मिलेगी और वो मानवीयता का पक्ष लेते हुए आश्राम के भीतर अगर कुछ गड़बड़ हो रहा है तो उसे हमारे सामने रखने का काम करेंगे। हम आसाराम सहित देश के दूसरे किसी भी तथाकथित संतों का विरोध इस स्तर पर नहीं कर रहे हैं कि उनका नैतिक रुप से पतन होता जा रहा है, वो जिस मानवीयता और संयम का पाठ पढ़ाते आ रहे हैं,जिस सादगी की शिक्षा देश औऱ दुनिया के लोगों को देते आ रहे हैं,व्यक्तिगत स्तर पर वो खुद बुरी तरह पिट चुके हैं। हम किसी तरह का कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं कि बिना वातानुकूलित आसन के इऩसे सादगी का प्रवचन नहीं दिया जाता। ऐसा कहना किसी भी इंसान के लिए मानसिक रुप से कमजोर होने की स्थिति में कोसने भर का काम होगा औऱ फिलहाल देश की एक बड़ी आबादी इस स्थिति में नहीं आयी है। हम इन सबसे बिल्कुल अलग बात कर रहे हैं।


आसाराम औऱ देश के बाकी दर्जनों तथाकथित संतों और महामानवों को लेकर श्रद्धा,भक्ति,विरोध या हिकारत पैदा करने के पहले इस बात को समझ लेना जरुरी है कि इनकी जो कुछ भी छवि हमारे सामने है वो पूरी तरह स्वयं उनके द्वारा निर्मित छवि नहीं है। इसे आप ये भी कह लीजिए कि साधना,आध्यात्म और ज्ञान के स्तर पर प्रसारित और विकसित छवि नहीं है। ये शुद्ध रुप से बाजार द्वारा पैदा की गयी छवि है,धार्मिक कर्मकांडों को रिवाइव करने की कोशिशों में इन महामानवों को स्टैब्लिश किया गया है। इस क्रम में मीडिया की भूमिका इस अर्थ में है कि ये महामानव क्या बोलते हैं औऱ वो कितना व्यावहारिक है जानने से ज्यादा जरुरी होता है कि कौन किस चैनल पर आ रहे हैं। चैनल पर देख-देखकर लोगों ने इन्हें बहुत बड़ा संत मानना शुरु किया है। क्योंकि टेलीविजन देखते वक्त ऑडिएंस के सामने एक आम धारणा बनती है कि किसी भी इंसान को अगर चैनल आधे घंटे या एक घंटे के प्रवचन के लिए बुलाता है तोजाहिर है उसमें कुछ न कुछ खास बात होगी। ये टेलीविजन की ताकत ही है जो कि आम को खास में कन्वर्ट करने का माद्दा रखता है। इसके साथ ही होता ये है कि जैसे-जैसे चैनल पर इन तथाकथित महानुभावों के आने की फ्रीक्वेंसी बढ़ती है,यानी रोज आने लगते हैं,एक निश्चित दर्शक वर्ग तैयार होने लग जाता है। ये दर्शक वर्ग इन महामानवों और संतों को न केवल उनकी बोली गयी बातों के आधार पर उन्हें पसंद करता है बल्कि उनके बोलने के अंदाज,बॉडी लैंग्वेज,एसेंट और स्क्रीन पर देखते हुए हुए आंखों को जो चीजें सुहाती है,उस आधार पर उसे पसंद करना शुरु करती है। चैनल पर आना किसी भी संत के लिए ब्रांडिंग का काम करता है। धीरे-धीरे ये दर्शक उनके भक्तों में कन्वर्ट होना शुरु करते हैं,लोगों के बीच उनकी साख जमती है और उनका नेटवर्क फैलता चला जाता है।

अपनी साख के दम पर संत लाइव प्रवचन करने का काम शुरु करते हैं,जगह-जगह जाकर प्रवचन करना शुरु करते हैं। देश के हर शहर में दो-चार धन्ना सेठ मिल ही जाता है जो उनके लिए तमाम तरह की सुविधाओं का प्रबंध करता है। उसके बीच भी भाव यही होता है कि वो टीवी में आनेवाले संत के लिए इंतजाम कर रहा है। टीवी पर आने की ताकत संतों के साथ हमेशा जुड़ी रहती है। ये टीवी पर आने की ताकत ही है कि किसी संत या बाबा को सोशल कमंटेटर के तौर पर जाना-समझा जाने लगता है,हर मसले पर उनकी बाइट ली जाती है। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि संतों के साथ मीडिया कर्म कितना बड़े स्तर पर जुड़ता है। प्रवचन एक मैनेजमेंट का हिस्सा बनता है और मीडिया मैनेजमेंट उसकी एक जरुरी कड़ी। यहां तक आते-आते संत की छवि,उनकी प्रसिद्धि और सामाजिक दबदबा काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि वो मीडिया के साथ अपने को किस हद तक फ्रैंडली कर पाते हैं।

आज आसाराम को लेकर टीवी चैनल्स और मीडिया ने जो भी रवैया अपनाया है,उसका आधार सिर्फ इतना नहीं है कि उनके आश्रम से बच्चे गायब हुए,वो लगातार जमीन विवादों में फंसते गए हैं,उनके नाम पर कई तरह की अनियमितताएं पायी गयी है। बल्कि इस सबके पीछे ठोस आधार है कि आसाराम मीडिया मैनेजमेंट के स्तर पर लगातार विफल होते जा रहे हैं। मीडिया ने जितनी विशाल छवि निर्मित की है,उसे वो संभाल नहीं पा रहे हैं। इसलिए आज फजीहत में पड़े आसाराम के लिए कोई जनशैलाव उमड़ पड़ता है तो इसे इस रुप में भी समझा जा सकता है कि आसाराम ने अपना मीडिया मैंनेजमेंट दुरुस्त कर लिया है। अगर उनके विरोध में देश की जनता खड़ी होती है तो इसका एक अर्थ ये भी है कि मीडिया के स्तर पर वो लगातार पिछड़ रहे हैं,यहां श्रद्धा के उपर छवि हावी हो रही है और कोई भी नहीं चाहेगा कि अपनी श्रद्धा टेलीविजन के हिसाब से बताए गए दागदार संत के आगे उड़ेल दे

Sunday, July 5, 2009

यकीन मानिए,वो गे नहीं है


रात के खाने के बाद अक्सर वो किसी न किसी बहाने मेरे पास रुकने की कोशिश किया करता। कभी कहता-भैय्या,अब रात में कार्यालय कौन जाए तो कभी कहता- इकॉनमिक्स में कुछ समझना है तो कभी कहता-नीचे ही बिछाकर सो जाएंगे,आप अपने बेड पर ही सोइएगा।

दिनभर की पढ़ाई और कॉलेज की थकान के बाद उसका आना मुझे अच्छा ही लगता कि चलो कोई तो बोलने बतियाने के लिए मिल जाता है। लेकिन पता नहीं क्यों,दिनभर कोई मुझसे कितनी भी बातें क्यों न कर ले, देर रात तक कितनी गप्पें न लडा ले,अपने यहां किसी का रातभर के लिए रुकना मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता। मैं नहीं चाहता कि कोई रात में मेरे यहां रुके। लेकिन वो रात में मेरे यहां रुकना चाहता औऱ मैं उसे किसी न किसी तरह वापस कार्यालय भेजना चाहता।

उसने मैट्रिक की पढ़ाई अपने घर पर ही रहकर की औऱ आगे वो बिगड़ न जाए इसकी चिंता से उसके मां-बाप ने उसे कार्यालय में भेज दिया। वैसे कार्यालय में रहने का नियम होता है कि आपके उपर जब तक किसी तरह की जिम्मेदारी नहीं है,आप लंबे समय तक वहां रुक नहीं सकते। वो जिस समय कार्यालय में रहने आया उसके पास कोई जिम्मेदारी नहीं थी। वैसे भी वो विचारधारा के प्रसार के लिए नहीं बल्कि पढ़ने आया था। लेकिन धीरे-धीरे उसे किसी न किसी काम में लगाया जाने लगा। महीना दो महीना होते-होते वो कार्यालय के काम में इतनी बुरी तरह फंस गया कि कोई भी देखता तो कहता कि ये भी औरों की तरह सबकुछ छोड़-छाड़कर सपनों का भारत बनाने की तैयारी में है। वैसे देखा जाए तो ऑफिसीयली अभी भी उसे कुछ भी नहीं करना होता। सब काम के लिए लोग लगे होते लेकिन उसके शब्दों में कहें तो- भइया इससे लाख गुणा अच्छा होता कि हम कॉलोनी जाकर दो-चार बच्चों को ट्यूशन पढ़ा लेते या फिर फोटो मशीन की दुकान में पांच-छह घंटे काम कर लेते। दिनभर किसी न किसी के आगे-पीछे डोलते ही रहना पड़ता है।

एक रात मैंने लगभग झिड़कते हुए कहा- वो सब तो ठीक है कि तुम दिनभर की परेशानी मुझे बता जाते हो,वो भी ऐसी जगह की परेशानी जिसे कि मैं अपने स्तर से दूर नहीं कर सकता लेकिन ये रात में आकर क्यों रुकने की बात करते हो। सच कहूं दोस्त, बुरा मत मानना, तू दिनभर मेरे कमरे में रह ले लेकिन रात में मुझे किसी का रुकना जरा भी अच्छा नहीं लगता। मैं देर रात तक जागता हूं और अपने उपर समय देता हूं। रात में किसी के रुकने से खलल पड़ जाती है। इसके पहले भी मैं उसे कुछ न कुछ कह दिया करता औऱ वो डर लगता है जाने में...और भी कुछ न कुछ कहकर बात टाल जाता। आज वो फफक-फफककर रोने लग गया।

आपको क्या लगता है भइया कि हम शौक से रुकते हैं,अब हम क्या बताएं आपको। कार्यालय में विचारधारा को मजबूत करनेवाले एक महाशय हैं। लोग उनका सम्मान करते हैं। रोज रात उनके सिर में दर्द होता है। सिरदर्द न भी हो तो प्यास लग जाती है। हमें बुलाते हैं और कभी शीशी और कभी पानी लेकर उनके पास जाता हूं। कुछ देर इधर-उधर की बातें करते हैं और फिर कहते हैं- यहीं बिछाकर सो जाओ। मैं कहता हूं-नहीं,बाहर बरामदे में सोता हूं मैं। कभी आदेश के लहजे में,कभी थोड़ा डांटते हुए और कभी-कभी घिघिआने के अंदाज में ऐसा कहते हैं। शुरु-शुरु में तो मैं एक-दो बार सो गया। अभी सोए थोड़ी ही देर हुए कि देखा कि हमें सहला रहे हैं। पहले तो अच्छा लगा कि इस अंजान शहर में कोई हमें पिता का प्यार दे रहा है,मुझे लगा कि उस अंधेरे में ही उठकर उनका पैर छू लूं। लेकिन फिर वो मुझे अपनी तरफ खींचने लगे। उसके बाद...छी..रहने दीजिए भइया। हांफती हुई सांसों में मुझे पिता के स्नेह से ज्यादा सालों से गंधा रहे किसी हवशी का सडांध महसूस हुआ,मैं बाहर आ गया। मैं दिन में भी उनकी नजरों से बचने लग गया। उनके सामने पड़ना ही नहीं चाहता। कभी रोते हुए,कभी सिसकियां लेके हुए वो सबकुछ एक सांस में बोल गया।

अब लोग मुझे देखकर फुसफुसाते हैं। मेरी उम्र के लोग मुझे देखकर मुस्कराते हैं। कोई कहता है- उसे जानते हो,बहुत अच्छा मालिश करता है और फिर ठहाके लगाने लग जाता है। कहते हैं अब मुझे कोई बसंती और बिजुरिया की जरुरत नहीं है,मेरा काम ऐसे ही चल जाएगा।....

ऐसे समय में मुझे मैंला आंचल की लक्ष्मी दासी याद आती है। धीरज धरो सेवादास,बोलती हुई लक्ष्मी। कभी कठोर,कभी लाचार होकर रोती हुई लक्ष्मी। रात के सन्नाटे में रोज अपने को बचाने की जद्दोजहद से लड़ती हुई लक्ष्मी। चित्रलेखा याद आती है। दुनियाभर की बदनामी से मुक्त होने के लिए आश्रम का शरण लेनेवाली चित्रलेखा। उपन्यास और सिनेमा के चरित्रों के बीच जब-तब वो भी याद आता है लेकिन अफसोस कि वो कभी अकेले याद नहीं आता। लगता है कतार के कतार चले आ रहे है उसी की शक्ल में,उसी की तरह मासूमियत लिए...और भी कई,सैंकड़ों,हजारों। अच्छा बनने,सामाजिक बनने,बिगड़ जाने के डर से बुजुर्गों के बीच रहने। इस बात से अंजान की सेवादास की तरह लाखों लोगों के सिर पर हवश सवार है जो लक्ष्मी से दूर रहकर और भी ज्यादा खूंखार होते चले जाते हैं।

Wednesday, July 1, 2009

कैसे पहचाने कि कौन हिन्दू होटल है,कौन मुसलमानों का होटल ?


हम तो बाहर जाने पर कहीं भी खाने से पहले देख लेते हैं कि होटल में किसका फोटो या मूर्ति लगाए हुए है। गणेश,लक्ष्मी या शिवजी का फोटो रहता है तो मन में तसल्ली हो जाती है कि-भले चाहें गंदा-संदा खाना दे लेकिन धरम तो बचा रह जाता है। नहीं तो गलती से खा लिए चांद-सितारा वाला लोगों के यहां तो सब दिन का किया कराया हो गया गुड़-गोबर

नवादा(बिहार) के सड़ियल औऱ धूल-धक्कड़ वाले बस स्टैंड पर प्यास लगने की स्थिति में भी सामने वाली दूकान पर जूस न पीने की स्थिति में भैय्या की परेशानी को देखते हुए हमारे साथ के एक रिश्तेदार ने ये बात कही। भैय्या जूस का आर्डर लगभग देने ही वाले थे,दाम पूछने के बाद पॉच ग्लास तैयार करने कहते कि इसके पहले उन्हें मस्जिद के पीछे चांद-सितारा वाली तस्वीर पर नजर पड़ गयी और रहने दो बोलकर बाहर निकल लिए। मेरी बड़ी इच्छा हुई कि जाकर एक नहीं दो गिलास उस दूकान से जूस पिउं लेकिन कई बार आप दुनिया के लिए क्रांति मचाते हुए भी घरेलू स्तर पर कितने निरीह हो जाते हैं,ये मुझे ऐसे ही मौके पर समझ में आता है। भैय्या को पता था कि यहां ये कुछ न कुछ जरुर तमाशा करेगा औऱ अपने को मानवीय और हमें सांप्रदायिक साबित करने में दिमाग लगाएगा,मैं थोड़ी ही देर बैठा था कि उन्होंने कहा- ओटो वाला बड़ी मुश्किल से तैयार हुआ है, अब चलो जल्दी। रास्ते में कुछ वैष्णवी ज्ञान देने लगे।

जीजाजी के एक ही साथ चार बोतल किनले खरीद लेने से सबों की प्यास तो बुझ गयी थी,ओटो पर बात करने के अलावे कुछ किया ही नहीं जा सकता था इसलिए सारी बातें हिन्दू-मुस्लिम के होटलों औऱ खाने पीने की जगह पर आकर अटक गयी औऱ तब सब अपने-अपने हिसाब रहस्यों का उदघाटन करने लगे। कौन कितना समझदार( आप इसे कट्टर हिन्दू ही समझिए) है,साबित करने में जुट गए। मैं उन्हें नही जानता था कि वो हमारे कौन लगेंगे इसलिए कभी भैय्या तो कभी सर बोलता रहा। उन्होंने मुंह को थोड़ा ज्यादा बड़ा करते हुए(जब आप गूगल अर्थ पर क्लिक करते हैं तो लगेगा कि धरती खुलती चली जा रही है,वैसे ही) कहा- आपलोग जो फोटू देखकर हिन्दू-मुस्लमान होटलों की पहचान करते हैं न,कभी-कभी गच्चा खा जाइएगा। गए थे हम अबकी बार जम्मू। वहां क्या देखते हैं कि सब होटल में डेढ़-डेढ़,दो-दो फीट की काली, हनुमान, वैष्णो देवी का फोटो लगा हुआ है। घुस गए अंदर,अभी खाने का आर्डर देते कि देखे कि कोने में एक टुइंया( लोटे जैसा जिसमें पानी के लिए अलग से टोटी लगी रहती है) रखा हुआ है। हमको समझने में एक भी मिनट देर नहीं लगा कि गलत जगह आ गए हैं। तुरंत पत्नी को कोहनी से इशारा किए और बाहर हो लिए औऱ फिर तेजी से आगे बढ़ गए। अब जमाना गया कि आप फोटू से जान जाइएगा कि ये हिन्दू होटल है या मुस्लिम होटल। सब जान गया है कि लोग यही देखकर घुसता है। इसलिए बिजनेस के लिए भगवान बदल देने में उसको दू मिनट भी नहीं लगता है।

घर के लोगों या बाकी रिश्तेदारों के साथ बहुत की कम कहीं जाना होता है लेकिन जब कभी भी जाना होता है तो खाने को लेकर दोहरे स्तर की समस्या होती है। दिल्ली में रहते हुए,बाकी दोस्तों के साथ हम सिर्फ खाने-पीने की जगह खोजा करते हैं लेकिन रिश्तेदारों के साथ जाने पर पहले होटल नहीं हिन्दू होटल खोजना होता है। नॉनवेज मैं भई नहीं खाता लेकिन चाहे किसी भी होटल में वेज की व्यवस्था हो जाए तो खाने में दिक्कत नहीं होती। इसलिए दो-तीन बार करीम में जाकर मिक्स वेज खाया तो दोस्तों ने इसे गोयठा में घी सुखाना कहा। मेरे क्या किसी भी रुढ़ि और परंपरागत परिवारों के बीच रहनेवाले लोगों के लिए ये अनुभव नया नहीं है। खाने को लेकर धार्मिक कट्टरता अपने चरम पर होती है। लेकिन मैं इसकी ब्रांडिंग पर सोच रहा हूं। अपनी सर्किल कुछ इस तरह की है कि मैं अकेला हूं जो नॉनवेज नहीं खाता। जो लोग खाते हैं उनके बीच नॉनवेज को लेकर एक समझ है कि ये मुस्लिम रेस्तरां में ज्यादा बेहतर मिलता है। इसलिए वो उन्हीं दुकानों से लेना पसंद करते हैं। उनके लिए मुस्लिम रेस्तरां एक ब्रांड है लेकिन परिवारवालों के बीच घृणा,परहेज और नाम ले लेने पर उबकाई आ जाने की मजबूरी। मैं तो सोच-सोचकर परेशान हो गया कि इस जूसवाले को अगर दिनभर में अगर पचास गिलास जूस बेचने होंगे तो पचास मुसलमान ग्राहक ही आए,तभी बात बनेगी। अब इसके लिए बाजार में चहल-पहल और तेजी का क्या मतलब है। अपनी तरफ तो अभी भी कई चीजों की दुकानें खोलने की हिम्मत मुस्लिम समाज के लोग जुटा नहीं पाते। कई दुकानें तो मैंने बंद होते देखी है।

फिलहाल गंतव्य तक पहुंचने पर जो भायजी हमलोगों को लेने आए,उनसे भी इस बात की चर्चा की गयी। कहा कि आज तो बाल-बाल बचे। भैय्यी की तरफ इशारा करते हुए कि अगर ऐन मौके पर फोटू नहीं देख लेते तो सब गड़बड़ा जाता। भायजी थोड़े गंभीर हुए और सत्य का ज्ञान कराते हुए कहा- अब तो फोटू-फाटू बहुत पुरानी बात हो गयी है। आपलोग ऐसा किया कीजिए कि कहीं भी खाने जाइए औऱ आपको शक हो कि अपने समाज का होटल नहीं है तो फट से दुकानदार को बोलिए- हरि ओम। उसके बाद देखिए कि चेहरे पर क्या रिएक्शन होता है, उसी से ताड़ जाइए। एक-दो बार तो हरि ओम बोलते ही अस्सलाम बालेकुम बोल पड़ा औऱ हम खिसक गए। मेरे मन में एक सवाल आया कि पूछूं,अगर उसने राधे-राधे कह दिया तो फिर कैसे पहचानेंगे,कृष्ण भक्त को मुस्लिम प्रूफ करने का कोई लॉजिक बताइए भायजी।

Thursday, June 25, 2009

संवादधर्मी टेलीविजन के जनकः एस.पी.सिंह की याद में


एस.पी.पर संगोष्ठी : आमंत्रण


भारत में आधुनिक टेलीविजन पत्रकारिता के जनक माने जाने वाले एस.पी.सिंह की 12 वीं पुण्यतिथि के मौके पर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में एक संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है. इस अवसर पर मीडिया पर केंद्रित हिंदी की मासिक पत्रिका "मीडिया मंत्र" के जुलाई अंक का विमोचन भी किया जायेगा, जो कि एस.पी.सिंह पर केंद्रित है. संगोष्ठी में मीडिया जगत के जाने - माने लोग शामिल होंगे जो एस.पी से संबंधित अपने संस्मरणों को साझा करेंगे. इस अवसर पर आप सभी सादर आमंत्रित हैं.


स्थान : प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, रायसीना रोड, नई दिल्ली
तिथि : 27 जून, 2009
दिन : शनिवार
समय : 3 बजे
संपर्क : 9999177575


एस. पी. सिंह जैसे लोग किसी सरजमीन पर कभी-कभी ही पैदा होते हैं - संजय पुगलिया, संपादक, आवाज

एस. पी. की हिंदी पत्रकारिता में जो देन है उसे शब्दों में नहीं बयां नहीं किया जा सकता. - कमर वहीद नकवी, न्यूज़ डायरेक्टर, आजतक

मैं एस.पी.की जिंदगी का अर्जुन कभी नहीं बन पाया - आशुतोष, मैंनेजिंग एडिटर, आईबीएन-७

एसपी निष्पक्ष पत्रकार नहीं थे, इसलिए महत्वपूर्ण हैं - दिलीप मंडल, संपादक, ईटी हिंदी.कॉम

एसपी जितने बड़े पत्रकार थे, उससे ज्यादा बड़े इंसान थे। - सुप्रिय प्रसाद, न्यूज़ डायरेक्टर, न्यूज़ 24

एस.पी बहुत जीवंत और सहज व्यक्ति थे - दीपक चौरसिया, संपादक (राष्ट्रीय समाचार), स्टार न्यूज़

एस.पी एक ऐसे पत्रकार थे जो पहाड़ से संजीवनी बूटी निकाल लेते थे - अलका सक्सेना, कंसल्टिंग एडिटर, जी न्यूज़

बड़ी मुश्किल होती है जब किसी बेइंतहा करीबी के बारे में लिखना पड़े - चंदन प्रताप सिंह, राजनीतिक संपादक, टोटल टीवी

एस.पी ने जो काम किया वह एक पूरी पीढी के लिए आदर्श और प्रेरणा का स्रोत है. - परंजय गुहा ठाकुरता, वरिष्ठ पत्रकार
एस.पी. जर्नलिज्म में मेरे पितातुल्य - - अंजू पंकज, एंकर, समय



एस.पी.की याद में (मीडिया मंत्र)........


- संजय पुगलिया, संपादक, आवाज
- कमर वहीद नकवी, न्यूज़ डायरेक्टर, आजतक
- दिलीप मंडल, संपादक, ईटी हिंदी.कॉम
- चंदन प्रताप सिंह, राजनीतिक संपादक, टोटल टीवी
- राजेश त्रिपाठी, सन्मार्ग
- परंजय गुहा ठाकुरता, वरिष्ठ पत्रकार
- दीपक चौरसिया, संपादक (राष्ट्रीय समाचार), स्टार न्यूज़
- सुप्रिय प्रसाद, न्यूज़ डायरेक्टर, न्यूज़ 24
- आशुतोष, मैंनेजिंग एडिटर, आईबीएन-7
- अंजू पंकज, एंकर, समय
- अलका सक्सेना, कंसल्टिंग एडिटर, जी न्यूज़


* किसी भी तरह की जानकारी के लिए आप 9999177575 पर संपर्क कर सकते

Monday, June 22, 2009

हिन्दी मीडिया की नौकरी के लिए बिहारी होना ही काफी है


बीस हजार से लेकर दो लाख तक की फीस देकर कोर्स करनेवाले औऱ अब नौकरी के लिए दर-दर भटकनेवाले बिहार के मीडिया स्टूडेंट शायद पोस्ट की शीर्षक देखकर ही भड़क जाएं। उन्हें इस पर भारी आपत्ति और असहमति हो सकती है। संभव है हममे से कई लोग इसे आरोप के तौर पर लें, मीडिया हाउस के अंदर काम कर रहे लोगों को बदनाम करने की साजिश समझें लेकिन ऐसा क्या है कि हमने बिहारी हो न, तब चिंता काहे करते हो,तुम्हारी नौकरी तो रखी हुई है मीडिया में सुन-सुनकर कोर्स पूरा किया। कोर्स करने के दौरान जब भी हम चिंता जताने की कोशिश करते कि किसी तरह कोर्स तो कर ले रहे हैं लेकिन नौकरी कैसे मिलेगी,तभी साथ के कुछ लोग हमारे उपर पिल पड़ते- ज्यादा बनो मत,स्साले बिहारी,तुमलोगों को तो बुलाकर नौकरी दी जाएगी। इसी एक लाइन को सुन-सुनकर कुछेक साउथ इंडियन क्लासमेट में स्साले बिहारी बोलना सीख गयी थी और हम उन पर फिदा हो जाते जबकि किसी लौंडे के बोलने पर मार करने तक की नौबत आ जाती। नौकरी की बात चलते ही हमलोगों को ठीक उसी तरह ट्रीट किया जाता जैसे जेनरल से आनेवाले लोग कैटेगरी से आनेवाले लोगों के बारे में कहा करते हैं- उसका क्या, उसका तो कोटा है,नौकरी तो धरी हुई है उसकी,पढ़े चाहे नहीं पढ़े।

ऐसी स्थिति में जाति और क्षेत्र पर भरोसा न होते हुए भी भीतर ही भीतर एक निश्चिंतता बोध पैदा होता कि चलो,नौकरी तो मिलनी ही है। वो नौकरी जिसमें कोर्स अच्छी तरह करने से ज्यादा बिहारी होने की क्रेडिट पर मिलनी है। कोर्स में तो फिर भी किसी तरह की झंझट और प्रोजेक्ट में हमसे ज्यादा लड़कियों को नंबर देकर आगे-पीछे किया जा सकता है लेकिन हमसे,हमारे बिहारी होने की क्रेडिट कोई छिन नहीं सकता। लेकिन इससे अलग एक दूसरी स्थिति ये भी बनती कि साथ के लोगों को जिनमें से ज्यादा बिहार के नहीं होते,नौकरी के मामले में हमलोगों से बराबर इर्ष्या का भाव बना रहता। जब वो कहते,हिन्दी मीडिया में नौकरी करनी है तो बिहार से पैदा होकर आओ तो कभी तो अच्छा लगता कि चलो इन्हें कहीं न कहीं बिहार की औकात का अंदाजा तो लेकिन बाद में जिस रुप में हमने चीजों को समझा,व्यवहार को जानने की कोशिश की,उससे साफ अंदाजा लग गया कि ये हमारे लिए कितनी खतरनाक स्थिति है। हमारी नौकरी मिलने से पहले ही हमें कैसे नौकरी मिली है का लेबल चस्पा दिया गया है। अफसोस कि ऐसी मानसिकता पैदा करने के हम ही जिम्मेदार रहे हैं। हमें ही चैनल का नाम लेते ही उसमें अपनी बिरादरी का कोई भाई,चचा या फूफा याद आ जाता है। हम जाति और क्षेत्र आधारित पीआर बनाने में फंसे रह जाते हैं, प्रोफेशन के स्तर पर अपने को कम ही चमकाते हैं। जिस किसी में कम योग्यता है,वो इसे रिप्लेस करते हुए संबंध,जाति और क्षेत्र की प्लेसिंग करने लग जाता है। ऐसा करके वो जुनइन बिहार के लोगों ( मीडिया के लिए) की जड़ो में मठ्ठा घोलने का काम करते हैं,इसका अंदाजा नहीं लगा पाते। जो जब-तब नफरत और उपेक्षा के तौर पर सामने आता है। ऐसे में अब आप लाख कहते रह जाइए कि हमने इंटरव्यू में ये कर दिया,वो कर दिया फर्क नहीं पड़ता। दिल्ली के भारतीय विद्या भवन में हमने इसी महौल में रखकर कोर्स पूरा किया।

लेकिन इससे ठीक पहले की पोस्ट खांडेकर जैसे संपादक किसकी जुबान बोल रहे हैं पढ़कर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय,भोपाल से मीडिया कोर्स करने अब भोपाल में ही अखबार में काम करनेवाले एक साथी ने फोन करके बताया- आप खांडेकर का विरोध कर रहे हैं, हमें अच्छा लग रहा है, इस तरह की क्षेत्रवाद से प्रभावित राइटिंग को हमें किसी भी हद तक विरोध करना चाहिए लेकिन एक बात आपको बताउं। माखनलाल में जब लोग मीडिया का कोर्स करने आते हैं तो बिहार के लोगों का दबदबा इतना अधिक होता है कि भोपाल और एमपी के दूसरे हिस्से से आए लोग अपने को बहुत ही नेग्लेक्टेड फील करते हैं। नतीजा ये होता है कि पूरी क्लास या बैच दो खेमें में बंट जाती है- बिहार से आए लोग एक तरफ और देश के बाकी हिस्सों से आए लोग एक तरफ। आपको लगेगा ही नहीं कि वो मीडिया में काम करने के लिए अपने को तैयार कर रहे हैं,लगेगा कि अखाड़े में लड़ने के लिए अपने को तैयार कर रहे हैं। बात अगर व्यक्तिगत स्तर पर करुं तो बिहारी औऱ नॉनबिहारी को लेकर खेमेबाजी मैंने देश के तीन-चार संस्थानों में स्पष्ट तौर पर देखा है, पता नहीं बाकी संस्थानों की क्या स्थिति है ?
जातिवाद और क्षेत्रवाद का विरोध करने के वाबजूद भी अगर आपकी नौकरी का संबंध जाति और क्षेत्र से हैं-मतलब कि अगर आपको ये लगे कि सामने बैठा बंदा जिसके हाथ में नौकरी देने की ताकत है वो हमारी जाति या क्षेत्र का है तो इंटरव्यू के दौरान आप ज्यादा कॉन्फीडेंस फील करते हैं। अपने एक क्लासमेट की भाषा में कहूं तो- अरे इसको इंटरव्यू नहींए कहो तो सही रहेगा, जात-बिरादरी का मामला था,हो गया।। नौकरी के लिए जिन्होंने इंटरव्यू लिया उन्होंने मेरा प्रोफाइल देखते ही कहा- मैंने भी हिन्दी से ही एमए किया है। इतना सुनते ही मेरे भीतर जाति और क्षेत्रवाला आत्मविश्वास पहले खत्म हो गया था क्योंकि बातचीत के दौरान पहले राउंड में उंटरव्यू देकर आए लोगों ने बता दिया था कि वो बिहार से नहीं हैं और मेरी जानकारी के लिए ये भी बता दिया कि वो तुम्हारे बिरादरी से नहीं है। हिन्दी सुनकर खोया हुआ आत्मविश्वास फिर से लौट आया- मन ही मन सोचा,एक हिन्दीवाला, हिन्दीवाले की प्रतिभा और दर्द को नहीं समझेगा तो कौन समझेगा और वो भी ऐसे महौल में जहां ऑडिएंस के सामने आउटपुट के तौर पर हिन्दी में चीजें लानी होती है लेकिन अंदर का महौल अंग्रेजीदां होता है। ऐसे में हम जाति और क्षेत्र से उपर उठकर विषय पर आकर स्थिर हो गए। मौके के हिसाब से हमारा आत्मविश्वास क्षेत्र के बजाय सब्जेक्ट पर आकर शिफ्ट हो गया। लेकिन इतना तय था कि जिंदगी में हर जगह इंटरव्यू लेनेवाला हिन्दी का नहीं होगा। खैर,
चैनल के भीतर काम करते हुए हमने देश के तमाम मीडिया हाउस को उसके नाम के अलावा अलग ढंग से जाना। ये जानना किस हद तक सही था, बता नहीं सकता लेकिन इतना जरुर था कि कोर्स के दौरान पूरी हिन्दी मीडिया खासकर न्यूज चैनलों के मामले में हम जो समझते आए कि बिहार का होने से मामला आसानी से बन जाता है, धीरे-धीरे भरभराकर टूट जाता है। हममें से कोई भी जो कि क्षेत्रवाद पर भरोसा नहीं करता है, उसे लगता है कि उसे उसकी योग्यता के हिसाब से जाना-पहचाना जाना चाहिए, उसे ऐसी स्थिति में खुश होना चाहिए। लेकिन चैनलों की जो समझ हमें आसपास के लोगों से मिल रही थी उसके हिसाब से कोई चैनल झा तक है, कोई भूमियार 24 इनटू 7, कोई राजपूत न्यूज तो को बाबाजी कम्युनिकेशन। हैरत तो तब हुई जब हममे से कई लोग अपनी जाति औऱ बिरादरी के हिसाब से उन चैनलों में जाने के लिए छटपटाते नजर आए। वो ऐसा करके अपने को सेफ जोन में मानते। उनके हिसाब से नौकरी मिल जाना ही काफी नहीं है, उसे बनाए,बचाए और उसकी जड़ों को मजबूत करते रहना ज्यादा जरुरी है। लोग जब हमसे पूछते हैं कि ये बड़े-बड़े पत्रकार जो देश बदल देने का दावा करते हैं, इधर-उधर कूंद-फांद क्यों मचाए रहते हैं। इसके जबाब में मैं सैलरी पैकेज और इगो प्रॉब्लम के अलावे कोई और कारण नहीं बता पाता। लेकिन जो नए पत्रकार हैं,बीच की स्थिति में हैं, उनके इधर से उधर जाने की वजह हैरान करनेवाली लगी। अपनी बिरादरी का बॉस खोजने में हमारे साथियों ने जो उर्जा लगाया उसे देखकर हैरानी होती है।
इन सबके वाबजूद हम खांडेकर के भोपाल के जंगलराज के लिए बिहार शब्द का प्रयोग किए जाने पर प्रतिरोध में खड़े हैं। हम इसका विश्लेषण महाराष्ट्र,बिहार और पूर्वांचल की राजनीति को लेकर विश्लेषण करने में जुटे हैं। लेकिन अगर कोई मीडिया हाउस की अंदरुनी स्थिति के लिहाज से इस शब्द प्रयोग पर विचार करना शुरु करे तो एक नए किस्म की स्थिति सामने आएगी। लगेगा कि क्षेत्र और जाति को लेकर सिर्फ देशभर के लोग ही एक-दूसरे पर नहीं उबल रहे हैं, मीडिया हाउस के भीतर भी खदबदाहट जारी है और इस मामले में पत्रकार कभी-कभी इतना पर्सनली लेने शुरु करते हैं कि वो एक मुहावरा बनकर सामने आता है। ऐसे में अगर हम ये कहें कि देश से जातिवाद, क्षेत्रवाद और अलगाववाद जब खत्म होंगे तब होंगे लेकिन फिलहाल अगर मीडिया हाउस से ये खत्म हो जाएं तो यकीन मानिए ऐसे शब्दों और वाक्यों के प्रयोग होने एक हद तक बंद हो जाएंगे।