पैर रहते रेंगना बहुत मुश्किल होता है,जुबान रहते चुप रहना मुश्किल होता है, दिमाग रहते गलत-सही सब मान लेना मुश्किल होता है लेकिन मुश्किल नहीं होता कहना- कर लो जो करना है। हम अपनी लिखें और उन्हें जो जी में आए करने दें, आएं व्यवस्थित समाज के बीच बर्बर समाज बनाए, कुछ आप तोड़े, कुछ तोड़-फोड़ हम मचाएं-हां जी सर,हां जी सर कल्चर के खिलाफ बिगुल बजाएं..... हमें मेल करें-vineetdu@gmail.com

Monday, November 23, 2009

IBN7 पर हमला लोकतंत्र पर हमला नहीं है




मूलतः प्रकाशित मोहल्लाLIVE
पोस्टर- साभारः मीडियाखबर डॉट कॉम

IBN7 और IBN7 लोकमत के मुंबई और पुणे दफ्तर में शिवसेना के गुर्गे ने जो कुछ भी किया, वेब लेखन के जरिये हम उसका विरोध करते हैं। दफ्तर के अंदर घुसकर शिव सैनिकों ने महिला मीडियाकर्मियों के साथ जो दुर्व्यवहार किया, हम उसके ख़‍िलाफ़ न्याय की मांग करते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर गुंडई और जाहिलपने को लेकर आये दिन किये जानेवाले प्रयोग और पेश किये जानेवाले नमूनों का हम पुरज़ोर विरोध करते हैं। पिछले 15 दिनों के भीतर और उससे भी पहले शिवसेना और उसी की कोख से पैदा हुआ मनसे ने लोकतंत्र के दो स्तंभों – विधायिका और मीडिया को कुचलने और ध्वस्त करने की जो कोशिशें की है, हम उसका विरोध करते हैं। संजय राउत जैसे देश के उन तमाम संपादकों और पत्रकारों को धिक्कारते हैं, जिनकी औकात रहनुमाओं के पक्ष तक जाकर ख़त्म हो जाती है। दिमाग़़ी तौर पर सड़ चुके लोगों के लेखन को फर्जी करार देते हैं जिनके भीतर तर्क करने की ताक़त नहीं रह गयी है। हम चाहते हैं कि ऐसे लोगों को पत्रकारिता बिरादरी से तत्काल बेदखल किया जाए। हमारे इस विरोध के बावजूद अगर मुंबई सरकार इस दिशा में सक्रिय होकर कार्यवाही नहीं करती है तो हम अपनी आवाज़ और तेज़ करेंगे। हम मीडिया की आवाज़ को किसी भी स्तर पर दबने नहीं देंगे। हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी के हाथों का खिलौना बनने नहीं देंगे। हम देश की मीडिया को किसी भी रूप में तहस-नहस नहीं होने देंगे।

अपनी बात कहने और सच बयान करने की इच्छा रखनेवाले देश के बाकी पत्रकारों और मानव अधिकारों के पक्ष में बात करनेवालों की तरह मैं भी शिवसेना की बर्बरता का विरोध करता हूं। हम सबों को अपने-अपने स्तर से इस तरह की गतिविधियों को रोका जाना चाहिए। लेकिन ये सब लिखते-कहते हुए मैं उन शब्दों, अभिव्यक्तियों और मेटाफर पर थोड़ा इत्‍मीनान होकर सोचना चाहता हूं, जिसे कि मीडिया के लोग इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में मैं समर्थन के स्तर पर जज़्बाती होते हुए भी अभिव्यक्ति के स्तर पर तटस्थ होना चाहता हूं। मुझे लगता है कि ऐसा करना शिवसेना जैसी बवाल मचाने वाली पार्टी के समर्थन में जाने के बजाए मीडिया और खुद को देखने-समझने की कोशिश होगी। इसलिए तोड़फोड़ की घटना का लगातार दो दिनों तक विरोध किये जाने के बाद अब इस स्तर पर विचार करें कि हम किस लोकतंत्र पर हमले की बात कर रहे हैं? लोकतंत्र के पर्याय के तौर पर बतायी जानेवाली मीडिया के किस हिस्से पर हमला किये जाने का विरोध कर रहे हैं? मीडिया अपने ऊपर हुए हमले को लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बता रहा है, इसे किस रूप में समझा जाए? कुल मिलाकर हम पहले तो लोकतंत्र को रिडिफाइन करना चाहते हैं और उसके बाद उसके खांचे में काम कर रही मीडिया को समझना चाहते हैं?

एजेंडा (IBN7 का कार्यक्रम) में एंकर संदीप चौधरी ने कहा कि आगे जब हिंदी पत्रकारिता का इतिहास लिखा जाएगा तो इसे काला शुक्रवार के तौर पर समझा जाएगा। इसके पहले भी जो फ्लैश चलाये गये, उसमें बार-बार इस हमले को लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बताया गया। संदीप चौधरी ने काला शुक्रवार शब्द रूस की बोल्शेविक क्रांति से उधार के तौर पर लिया। बाकी के न्यूज़ प्रोड्यूसरों और रिपोर्टरों ने भी लोकतंत्र पर हमला या चौथे स्तंभ पर हमला जैसे शब्दों का प्रयोग कहीं न कहीं ऐतिहासिक संदर्भों से उठा कर किये। यहां दिक्कत इस बात की बिल्कुल भी नहीं है कि इतिहास से इस तरह के शब्द नहीं लिए जाने चाहिए। इतिहास के शब्दों और अभिव्यक्तियों को अगर मीडिया के लोग खींचकर वर्तमान तक लाते हैं तो हमें उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन असल सवाल है कि क्या जिस लोकतंत्र पर हमले और उसे बचाने की बात की जा रही है, वो महज कुछ वैल्यू लोडेड शब्दों के प्रयोग कर दिए जानेभर से जिंदा रहेगा? क्या हम लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आजादी इन सबों को सिर्फ शब्दों के तौर पर जिंदा रखना चाहते हैं? हम इसे बोलने के लिहाज से चटकीला भर बनाना चाहते हैं? क्या हम लोकतंत्र, सरोकार, मानवीयता और इस तरह के वैल्यू लोडेड शब्दों को पुतलों की शक्ल में बदलना चाहते हैं? ऐसे पुतले जिसे कि दागदार, धब्बे लगे, बदबूदार समाज और फ्रैक्चरड डेमोक्रेसी के बीच लाकर रख दिया जाए, तो सब कुछ अचानक से चमकीला हो जाए। चित्ते-चित्ते रंगों के बीच एकदम से चटकीले रंगों का प्रभाव पैदा हो जाए। क्या इन शब्दों का प्रयोग अपनी ज़ुबान को सिर्फ चटकीला बनाने भर के लिए है?

टेलीविजन मीडिया से ये सवाल पूछा जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि लोकतंत्र कोई वैक्यूम में पैदा हुई चीज नहीं है। इसके भीतर हाड़-मांस, दिल-दिमाग़, जज़्बात और सोच लिये लोग मौजूद होते हैं। इसलिए जैसे ही आप लोकतंत्र शब्द का प्रयोग करते हैं, आपको लोकतंत्र को लोकेट तो करना ही होगा। पहले तो आपको और फिर हमें समझाना होगा कि आप लोकतंत्र से क्या समझ रहे हैं? आप जिस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं, उसके भीतर कौन से लोग शामिल हैं? आप किसके वीहॉफ पर अपने को लोकतंत्र का पर्याय बता रहे हैं? क्या आप खुद से पैदा किये जानेवाले लोकतंत्र को संबोधित कर रहे हैं या फिर अभी भी देश के भीतर बहाल लोकतंत्र को लेकर बात कर रहे हैं? मुझे नहीं लगता कि मीडिया पर किये जानेवाले हर हमले को लंबे समय तक लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बताया जाना आगे जाकर आसान होगा। तत्काल जज़्बाती होकर हम मीडिया के पक्ष में होते हुए भी इत्‍मीनान होने पर सवाल तो ज़रूर करेंगे कि हम किस मीडिया के पक्ष में खड़े हैं? उसके सालभर का चरित्र क्या है? हम न तो लोकतंत्र को मुहावरे की शक्ल देना चाहते हैं और न ही मीडिया को मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल करने देना चाहते हैं? इसलिए ज़रूरी है कि हम ऐसे में हम मीडिया हमलों के बीच लोकतंत्र के संदर्भों को समझने की कोशिश करें।

एक बात पर आप लगातार ग़ौर कर रहे होंगे कि पहले के मुकाबले निजी चैनलों पर राजनीतिक पार्टियों, धार्मिक संगठनों और संस्थाओं की ओर से हमले तेज़ हुए हैं। नलिन मेहता ने अपनी किताब INDIA ON TELEVISION और पुष्पराज ने अपनी किताब नंदीग्राम डायरी में सकी विस्तार से चर्चा की है। हाल ही में हमने देखा कि गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार ने आजतक को लंबे समय तक केबल पर आने से रोक लगा दी। आसाराम बापू के चेले-चपाटियों ने आजतक की संवाददाता पर हमले किये और घायल कर दिया। इसके पीछे की लंबी रणनीति हो सकती है। लेकिन एक समझ ये भी बनती है कि जिस तरह मीडिया और चैनलों के कार्पोरेट की शक्ल में तब्दील होने की प्रक्रिया तेज़ हुई है, राजनीतिक पार्टियों के प्रति उसकी निर्भरता पहले से कम हुई है। साधनों के स्तर पर तो कम से कम ज़रूर ही ऐसा हुआ है। दूसरी तरह कार्पोरेट और विश्व पूंजी की ताकत से इन चैनलों का मनोबल भी बढ़ा है। इसके आगे राजनीतिक पार्टियों की क्षमता का आकलन इनके लिए आसान हो गया है। इसलिए अब ये स्थिति बन जाती है कि कोई भी चैनल किसी राजनीतिक पार्टी, धार्मिक संगठन या संस्थानों पर बहुत ही साहसिक तरीके से स्टोरी कवर करता है, प्रसारित करता है। ऐसे में ये बिल्कुल नहीं होता कि राजनीति स्तर की निर्भरता उसकी एकदम से ख़त्म हो जाती है, लेकिन इतना ज़रूर होता है कि मैनेज कर पाना और संतुलन बना पाना पहले के मुकाबले आसान हो गया है। यहां राजनीति और मीडिया की ताक़त की आज़माइश होने के बजाय राजनीति और कार्पोरेट की आज़माइश होनी शुरु होती है। कार्पोरेट का पलड़ा मज़बूत होने की स्थिति में चैनल और मीडिया बहुत आगे तक राजनीतिक पार्टियों की धज्जियां उड़ाते हैं, धार्मिक संगठनों पर बरस पाते हैं। हमें ये सबकुछ लोकतंत्र का पक्षधर होने के स्तर पर दिखाया-बताया जाता है। एक हद तक सही भी है कि कम से कम राजनीतिक मामलों में दूरदर्शनी दिनों के मुकाबले निजी चैनल ज़्यादा मुखर हुए हैं। चैनल की इस बुलंदी का स्वागत किया जाना चाहिए।

लेकिन दूसरी स्थिति पहली स्थिति से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हैं। अगर बारीकी से समझा जाए तो ये लोकतंत्र के नहीं बचे रहने से जितना नुक़सान नहीं है उससे कहीं ज़्यादा नुकसान टेलीविज़न की ओर से पैदा किये जानेवाले और तेज़ी से पनपनेवाले लोकतंत्र से है। टेलीविज़न का लोकतंत्र, जनता के लोकतंत्र को लील जाने की फिराक में है। इसके हाल के कुछ नमूनों पर गौर करें तो हमें अंदाजा लग जाएगा। तालिबान और आतंकवाद पर स्पेशल स्टोरी दिखाते हुए एनडीटीवी इंडिया के रवीश कुमार ने कहा कि तालिबान में देश का कोई भी रिपोर्टर नहीं है लेकिन वहां की ख़बरें रोज़ दिखायी जा रही है। ये खबरें यूट्यूब की खानों से फुटेज निकालकर बनायी जा रही है। हंस के वार्षिक समारोह में अरुंधति राय ने कहा कि सलवाजुडूम इलाके में देश के किसी भी पत्रकार को जाने की इजाज़त नहीं है। पाखी के वार्षिकोत्सव में पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि विदर्भ को आइडियल शहर घोषित किया गया लेकिन वहां चालीस हज़ार किसानों ने आत्महत्याएं की। आज मीडिया में गांव नहीं है, मीडिया से जुड़े लोग गांव की स्थितियों को संवेदना के स्तर पर नहीं ला पा रहे हैं। 2 नवंबर को जब शर्मिला इरोम को बर्बर प्रशासन के खिलाफ़ अनशन पर बैठे दस साल पूरे हो गये, देशभर के अनुभवी मीडियाकर्मी शाहरुख खान के बर्थ केक काटने के फुटेज लेने के लिए बेकरार होते रहे। एक ही साथ नक्सलवाद और सरकारी कार्रवाइयों के ख़ौफ़ में झारखंड के आदिवासी आशंका के दिन खेप रहे होते हैं, देशभर के चैनल पी.चिदंबरम की बाइट को उलट-पुलट कर सुलझाने में जुटे रहे। देश के एक चैनल पर ताला लग जाने से करीब चार सौ मीडियाकर्मी रातोंरात सड़कों पर आ जाते हैं, वो कभी भी लोकतंत्र का हिस्सा नहीं बनने पाता। तो क्या ये मीडिया तय करेगा कि लोकतंत्र के भीतर का कौन सा हिस्सा टेलीविजन पर आकर लोकतंत्र की शक्ल लेगा और कौन सा नहीं? अगर सचमुच ऐसा है तो हमें मीडिया के लोकतंत्र पर नये सिरे से विचार करना होगा।

आप अगर चैनल की इन ख़बरों के बीच सरोकार से जुड़ी ख़बरों और हिस्सेदारी की मांग करेंगे तो टीआरपी का शैतान सामने आ जाएगा। इनमें से सारी घटनाएं टीआरपी पैदा करने के लिहाज से बांझ है। इसलिए टीआरपी तो उन्हीं ख़बरों से पैदा होती है, जिनमें कि मेट्रो और मध्यवर्ग की ऑडिएंस दिलचस्पी ले। संकेत साफ है। मंजर साफ है। फीदेल कास्त्रो के पद को उधार लेकर कहा जाए तो ये सांस्कृतिक संप्रभुता का संकट है। टेलीविज़न देश की संप्रभुता को बचाये रखने के दावे से लैस है। लेकिन उसके भीतर के ठोस के जार-जार हो जाने की चिंता बिल्कुल भी नहीं है।

देश की सत्तर फीसदी आबादी को जब पीने को पानी नहीं है, बच्चों के हाथों में स्लेट नहीं है, स्त्रियों की आंखों में सपने नहीं है – टेलीविजन पर कीनले है, विसलरी है, पॉकेमॉन है, बार्बी है, मानव रचना यूनिवर्सिटी है, लक्मे है, झुर्रियों को हटाने के लिए पॉन्डस है। एक धब्बेदार, बदबूदार और लाचार लोकतंत्र टेलीविज़न पर आते ही चमकीला हो उठता है। पिक्चर ट्यूब से गुज़रते ही देश का सारा मटमैलापन साफ हो जाता है। सवाल यहां बनते हैं कि टेलीविज़न के दम पर जो आइस संस्कृति (information, entertainment, consumerism) एक ठंडी संस्कृति के बतौर पनप रही है, क्या उसी लोकतंत्र पर हमला हो रहा है और उसी को बचाये जाने की बात की जा रही है? हम वर्गहीन समाज जैसे मार्क्सवादी यूटोपिया से बाहर निकलकर भी सोचें तो क्या ज़रूरी है कि इस आइस संस्कृति के बूते देशभर के लोगों को खींच-खींचकर मध्यवर्गीय मानसिकता के खांचे में लाया जाए। ये मानसिकता चार रुपये लगा कर अपनी पसंद और नापसंद जाहिर करे। क्या हमें इस लोकतंत्र पर हमला किये जाने से अफ़सोस होगा? दुर्भाग्य से इस लोकतंत्र पर हमला कभी नहीं होना है लेकिन बदकिस्मती है कि जिस लोकतंत्र पर हमले हो रहे हैं उसे शायद ही कभी बचाया जा सकेगा। इसलिए लोकतंत्र के रैपर में मीडिया जिसे बचाना चाहती है, पहले उसे साफ कर दे, तो पक्षधरता कायम करने में आमलोगों को सहूलियतें होगी। क्योंकि जज़्बाती होने की वैलिडिटी जल्द ही ख़त्म होने जा रही है।

Saturday, November 21, 2009

एक पुरुष डॉक्टर का फरमान- बेटा दो या तलाक दो


मीतू खुराना की जो कहानी है वो पितृसत्तात्मक समाज में लिंग-भेद और पुत्र कामना में अंधे हो चुके परिवार की कहानी से बिल्कुल भी अलग नहीं है। अलग है तो सिर्फ इतना भर कि मीतू खुराना खुद पेशे से डॉक्टर है,उसका पति भी डॉक्टर है। तथाकथित सभ्य समाज से ताल्लुक रखता है। लेकिन लड़का-बच्चा जनने और लड़की के पैदा होने की स्थिति में अपने परिवारे के लोगों के साथ वो खुद भी कितना बर्बर हो जाता है,ये हमारी उम्मीद को ध्वस्त करता है। उस कल्पना को चकनाचूर करता है जो कि साक्षरता को लेकर भारत सरकार की ओर से जारी किए गए विज्ञापनों में दिखाया-बताया जाता है। हम पढ़-लिखकर भी मानवीय नहीं हो सकते,संवेदनशील नहीं हो सकते। हम उसी बर्बर समाज का हिस्सा बने रहेंगे। ये सबकुछ सोचकर-जानकर कैसा लगता है?

मीतू खुराना की दर्दनाक कहानी को झारखंड की चर्चित और जुझारु पत्रकार अनुपमा ने मोहल्लाlive पर पेश किया है। हम उसके एक हिस्से को साभार के साथ यहां पेश कर रहे हैं,बाकी आप सीधे लिंक के जरिए वहां जाकर पढ़ सकते हैं। पेश करने के पीछे सरोकार है कि हम अपने-अपने स्तर से मीतू की इस लड़ाई में समर्थन और सहयोग दे सकें।

हर लड़की यह सोचती है कि उसकी शादी अच्छे घर में हो। पति उसे चाहनेवाला हो और एक सपनों का घर हो। जिसे वह सजाये-संवारे और एक खुशहाल परिवार बनाये। मैंने भी कुछ ऐसे ही ख्‍़वाब बुने थे। अभी-अभी तो उसे संजोना और बुनना शुरू ही किया था मैंने। पर कब सब कुछ बिखरना शुरू हुआ, पता ही नहीं चला। खैर… सीधी-सीधी बात बताती हूं। शादी नवंबर 2004 में डॉ कमल खुराना से हुई। कहने को तो अच्छा घर था, पर यहां आते ही मुझे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा। मैं यह सब जुल्म चुपचाप सहती रही कि चलो कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। शादी के दो महीने बाद ही यानी जनवरी 2005 में मैं गर्भवती हो गयी। गर्भ के साथ ही मेरे सपने भी आकार ले रहे थे। छठवें सप्‍ताह में मेरा अल्‍ट्रासाउंड हुआ और यह पता लगा कि मेरे गर्भ में एक नहीं बल्कि दो-दो ज़‍िंदगियां पल रही हैं। मेरा उत्साह दुगना हो गया। मैं बहुत खुश थी। परंतु मेरी सास मुझ पर सेक्‍स डिटर्मिनेशन करवाने के लिए दबाव डालने लगीं। मैंने इसके लिए मना कर दिया। ऐसा करने पर मुझे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाने लगा। इसमें मेरे पति की भूमिका भी कम नहीं थी। मेरा दाना-पानी बंद कर दिया गया और रोज़-रोज़ झगड़े होने लगे। मुझे जीवित रखने के लिए रात को मुझे एक बर्फी और एक गिलास पानी दिया जाता था। गर्भावस्था में ऐसी प्रताड़ना का दुख आप खुद समझ सकते हैं। इस मुश्किल घड़ी में भी मेरे मायके के लोग हमेशा मेरे साथ रहे। शायद इसी वजह से मैं आज जीवित भी हूं।....

जब मैं गर्भ चयन के लिए प्रताड़ना के बाद भी राज़ी नहीं हुई तो इन लोगों ने एक तरकीब निकाली। यह जानते हुए कि मुझे अंडे से एलर्जी है, उन्होंने मुझे अंडेवाला केक खिलाया। मेरे बार-बार पूछने पर कि इसमें अंडा तो नहीं है, मुझसे कहा गया कि नहीं, यह अंडारहित केक है। केक खाते ही मेरी तबीयत बिगड़ने लगी। मुझमें एलर्जी के लक्षण नजर आने लगे। मझे पेट में दर्द, उल्टी व दस्त होने लगा। ऐसी हालत में मुझे रात भर अकेले ही छोड़ दिया गया। दूसरे दिन पति और सास मुझे अस्पताल ले गये। लेकिन वो अस्पताल नहीं था। वहां मेरा एंटी नेटल टेस्ट हुआ था। मुझे लेबर रूम में ले जाया गया। यहां पर गायनेकेलॉजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) ने मेरी जांच कर केयूबी (किडनी, यूरेटर, ब्लैडर) अल्‍ट्रासाउंड करने की सलाह दी। लेकिन वहां मौजूद रेडियोलॉजिस्ट ने सिर्फ मेरा फीटल अल्‍ट्रासाउंड किया और कहा कि अब आप जाइए। जब मैंने देखा और कहा कि गायनेकेलॉजिस्ट ने तो केयूबी अल्‍ट्रासाउंड के लिए कहा था, आपने किया नहीं, तो उसने कहा कि ठीक है आप लेट जाइए और उसके बाद उसने केयूबी किया।

इस घटना के बाद तो प्रताड़नाओं का दौर और भी बढ़ गया। मेरे पति व ससुराल वाले मुझे गर्भ गिराने (एमटीपी) के लिए ज़ोर देने लगे। मेरी सास ने तो मुझसे कई बार यह कहा कि यदि दोनों गर्भ नहीं गिरवा सकती, तो कम से कम एक को तो गर्भ में ही ख़त्म करवा लो। दबाव बनाने के लिए मेरा खाना-पीना बंद कर दिया गया। मेरे पति मुझसे अब दूरी बरतने लगे और एक दिन तो उन्होंने रात के 10 बजे मुझे यह कह कर घर से निकाल दिया कि जा अपने बाप के घर जा। जब मैंने उनसे आग्रह किया कि मुझे मेरा मोबाइल और अपने कार की चाभी ले लेने दीजिए, क्‍योंकि गर्भावस्था में मैं खड़ी नहीं रह पाऊंगी तो उन्होंने कहा कि इस घर की किसी चीज़ को हाथ लगाया तो थप्पड़ लगेगा… मेरे ससुर ने हस्तक्षेप किया और कहा कि इसे रात भर रहने दो, सुबह मैं इसके घर छोड़ दूंगा। उनके कहने पर मुझे रात भर रहने दिया गया। सास की दलील थी कि दो-दो लड़कियां घर के लिए बोझ बन जाएंगी, इसलिए मैं गर्भ गिरवा लूं। अगर दोनों को नहीं मार सकती तो कम से कम एक को तो ज़रूर ख़त्म करवा लूं। जब मैं इसके लिए राज़ी नहीं हुई तो उन्होंने मुझसे कहा कि ठीक है यदि जन्म देना ही है, तो दो, लेकिन एक को किसी और को दे दो।

आज भी मुझे वह भयानक रात याद है। तारीख थी 17 मई 2005… इतना गाली-गलौज और डांट के बाद मैं घबरा गयी थी और उस रात को ही मुझे ब्लीडिंग शुरू हो गयी। इतना खून बहने लगा कि एबॉर्शन का ख़तरा मंडराने लगा। खुद तो मदद करने की बात छोड़िए, चिकित्सकीय सहायता के लिए मेरे पिता को भी मुझे बुलाने की इजाज़त नहीं दी गयी। मैंने किसी तरह तड़पते-कराहते रात गुज़ारी और सुबह किसी तरह फोन कर पापा को बुला पायी। पापा के काफी देर तक मनुहार के बाद मेरे पति मुझे नर्सिंग होम ले जाने को तैयार हो गये। लेकिन खीज इतनी कि गाड़ी को सरसराती रफ्तार से रोहिणी से जनकपुरी तक ले आये। उस बीच मेरी जो दुर्गति हुई होगी, उसकी कल्पना आप खुद भी कर सकते हैं।

आगे पढ़ने के लिए चटकाएं- बेटा दो या तलाक दो

Tuesday, November 17, 2009

दुर्लभ प्रजाति का कविः यश मालवीय होंगे हमारे साथ



कल करीब चार घंटे के लिए यश मालवीय हमारे साथ होंगे। यश मालवीय देश के दुर्लभ प्रजाति के कवि-गीतकार हैं। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि इस देश में बेहतर लिखनेवाले कवि-गीतकार की कमी है।..और ऐसा भी नही है कि किसिम-किसिम की कविता और गीत बेचकर ठाठ से जीवन चलानेवाले कवि-गीतकारों की किल्लत है। इस मामले में बल्कि संख्या में लगातार इजाफा ही होता जा रहा है। बल्कि अगर आप इस जमात के कवियों की तुलना भारतीय क्रिकेटरों से करे तो एक सीरिज के खत्म होने के पहले ही दूसरे और तीसरे सीरिज की टिकट और आने-जाने के सारे इंतजाम तय होते है। शायद यही वजह है कि आजकल कवि सम्मेलनों में किसी कवि के सम्मान और परिचय में जब भी कुछ कहा जाता है तो साथ में ये जरुर बताया जाता है कि अभी टोरंटो,कनाडा, फिजी, जेनेवा से लौटे हैं और परसों फ्रैंक्फर्ट की रवानगी है।

दर्शक दीर्घा में बैठा हिन्दी समाज और कई बार उससे इतर का भी समाज मुंह बाये ये सब सुनता है। कभी साहित्य के नाम पर आलोचना पढ़ने भर से परेशान हो उठता है। अपने भीतर कवि मिजाज को कुरेद-कुरेदकर संभावना की उस बीज की तलाश करता है जिससे कि तुकबंदी करने और हिन्दी शब्दों और लाइनों को फिट करने की पौध उग आए। इसलिए बाकी तो नहीं लेकिन एमए के दौरान मैंने देखा कि हिन्दू कॉलेज में हर तीन में से एक स्टूडेंट कवि हो जाता। एमबीए के लड़के को अकड़ के साथ बताया जाता है कि पता है ये जो कवि है न,दस हजार से नीचे पर तो आता ही नहीं है। देश में कुछ कवि तो ऐसे जरुर हैं जो तय रेट से नीचे पर आते ही नहीं हैं। बाकी उन कवियों की अच्छी-खासी जमात है जो शुरुआती दौर में तो पकड़-पकड़कर कविता सुनाते हैं लेकिन बहुत जल्द ही संगत कल्चर के कवि समूहों में भर्ती होने के लिए बेचैन होने लग जाते हैं। संगत कल्चर में एकमुश्त पैसे मिल जाते हैं और उस्ताद कवि उन्हें कुछ-कुछ बांट देते हैं। हर लाइन और हर शब्द के पीछे दाम लगाकर कविता को एक पैकेज में तब्दील करने की कला कि एक सफल और बेहतर कवि-गीतकार की असल पहचान बनती है।
संभवतः यही वजह है कि देश के साहित्यिक रुझान और गंभीर किस्म के माने जानेवाले कवि इस तरह के मंचीय कवियों के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। उनके बारे में बात करते ही गंभीर कवियों का बुखार के वक्त की तरह मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है। वो उन पर कविता को कोठे पर बिठा देने का आरोप लगाते हैं। ये कवि बुद्धिजीवी समाज के बीच हाथों-हाथ लिए जाते हैं। सेमिनारों में बोलते हैं,अकादमियों में कविता की रचना-प्रक्रिया पर विमर्श करते हैं। वो कविता की औसत समझ रखनेवाले लोगों के बीच नहीं जाते। वो कविता करने और मुजरे के लिए लिखे जानेवाले बोल में फर्क करना जानते हैं,शायद। जीवन दोनों तरह के कवियों का चलता है। सक्रिय और जागरुक रहने पर दोनों तरह के कवियों की गाड़ियों की बढ़ती है।

यहीं पर आकर यश मालवीय के कवि और गीतकार होने की प्रजाति होने की प्रजाति अलग और दुर्लभ है। हजारों लोगों के बीच ये कवि अपनी कविता पढ़ना शुरु करता है। लोगों को इनकी कविताएं अटपटी लगती है। वो शोर-शराबा करने की कोशिश करते हैं। हरिवंश राय बच्चन हस्तक्षेप करते हैं कि आप ऐसा न करें। कली को खिलने का मौका तो दें। नवोदित कवि कविताएं सुनाता है और फिर अब के जमाने के वन्स मोर,वन्स मुहावरे में दोबारा पंक्तियों को सुनाने की फरमाइशें होती हैं। इस कवि को ये सब बिल्कुल भी अटपटा नहीं लगता। ये कवि कविता पाठ करने जाता है और लौटते हुए साथ में आटे की थैली लेकर घर घुसता है। उसे कभी भी कुंठा नहीं कि वो अपनी कविता को कोठे पर बेच आया है। उसने अपनी कविता की कीमत महज दो-तीन किलो के आटे का दाम लगाया। कभी कोई मलाल नहीं। कई बार किसी सम्मेलन में दस हजार तक मिल गए तो बड़ा और सिलेब्रेटी हो जाने का कोई गुरुर नहीं। सिर्फ आचमन पर ही घंटों रंग जमा देने के बाद इस बात पर कभी चिंता नहीं कि वो इस्तेमाल कर लिया गया है। फिल्म मोहनदास के लिए गाने लिखे,जगजीत सिंह के लिए गजल लिखा और फिल्म इंडस्ट्री से कई ऑफर मिले,ये सब कुछ बस रोजमर्रा के गपशप का हिस्साभर है। आपने इन गीतों के लिए बहुत ही कम पैसे लिए सर? मेरे ये कहे जाने पर उनका बहुत ही सपाट जबाब-हमसे मुंह ही नहीं खोला जाता। अविनाश के ये कहने पर कि आप पीए रखिए और वही बात करेगा,वो इस तरह के सुझाव से घबरा जाते हैं। उनकी अपनी सादगी दफ्न होती नजर आती है। यश मालवीय ने कवि भी अपनी कविताओं और लिखी गयी पंक्तियों के आगे प्राइस टैग नहीं लगाया। शब्दों की बसूली अनुवादक और सफल कवियों की तरह नहीं की।
मंच पर कविता करते हुए,बाइक चलाते हुए कविता सुनाते हुए,आचमन के लिए उत्साहित करते हुए इस कवि का सामाजिक सरोकार बुद्धिजीवी कवियों से रत्तीभर भी कम नहीं हुआ। कुछ नहीं तो कहो सदाशिव, उड़ान से पहले, राग-बोध के 2 भाग हाथ लग जाए तो पढ़िए,आपको अंदाजा लग जाएगा। कविता के दोनों पाटों पर रमनेवाला ये कवि एक जरा भी भयभीत नहीं होता कि अगर उसने मंच पर गमछा ओढ़ लोगों के साथ कविता पढ़ दिया तो उस पर नाक-भौं सिकोड़े जाएंगे। साहित्य अकादमी,हिन्दी अकादमी और विश्वविद्यालयों के मंचों से कविता पढ़ते हुए कभी इस बात का खतरा नहीं हुआ कि वो आम आदमी से दूर हो रहे हैं। ये सबकुछ उस आम आदमी के विकासक्रम के तौर पर बहुत ही सहज तरीके से चलता है। दरअसल यश मालवीय का क्लास फिक्स होने के बजाय रोटेट होता है,वो रोमिंग मोड में होता है। वो कभी भी बाकी कवियों की तरह फिक्स नहीं होता। अगर कुछ फिक्स या तय है तो कविता को लेकर तय किया गया उनका एजेंडा। कहीं से भी बोलो,किसी से भी बोलो,उनके सामने यही सवाल करो- दरी बिछानेवाले रामसुभग का क्या हुआ? छप्पन तरह के पकवाने लाने और खुद गम खाने वाले रामसुभग को लेकर आपकी क्या राय है? परिवेश और मंच बदलने के साथ यश मालवीय का सवाल नहीं बदलता,मिजाज नहीं बदलता। संभवतः यही उन्हें बाकी के कवियों से अलग करता है। इसलिए वो सिलेब्रेटी मंचीय कवियों की पांत से अलग हैं और बुद्धिजीवी कवियों की पंक्तियों में अलग से देखे जानेवाले कवि हैं। वो कविता के जरिए पैसा नहीं आदमी कमाते हैं। वो कविता के जरिए विचार नहीं सक्रियता पैदा करते हैं। इसलिए यश मालवीय दुर्लभ प्रजाति के कवि-गीतकार हैं।

नोट- कार्यक्रम की पूरी जानकारी के लिए पोस्ट पर चटकाकर बड़े साइज में देखें या फिर नीचे के लिए पर चटकाएं-
सफर का आयोजनः आमने-सामने में यश मालवीय

Sunday, November 8, 2009

प्रभाष जोशी का जाना जिस अखबार के लिए खबर नहीं



7 नवम्बर के नवभारत टाइम्स ने प्रभाष जोशी के निधन पर एक लाइन की भी खबर छापना जरुरी नहीं समझा। इसी प्रकाशन समूह का अखबार The Times Of India ने action on pitch cut short his acerbic pen शीर्षक से तस्वीर सहित करीब 600 शब्दों में खबर छापा है। नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉग कोना में पूजा प्रसाद ने कितने सीधे थे प्रभाष जोशी शीर्षक से पोस्ट लिखी है। दैनिक जागरण ने उनके लिए साइड में वमुश्किल से सौ शब्द छापे। ये दोनों देश के प्रमुख अखबारों में से है। रीडरशिप की दौड़ में रेस लगानेवाले हैं। अपनी ब्रांडिंग के लिए लाखों रुपये खर्च करते आए हैं। लेकिन आज ऐसा करते हुए जरा भी अपनी ब्रांड इमेज की चिंता नहीं की। कहने को कहा जा सकता है कि नहीं छापा तो नहीं छापा इसमें कौन-सा पहाड़ टूट गया? लेकिन सवाल है कि क्या देश की पत्रकारिता इसी तरह की किसी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के बूते चलती रहेगी ? हिन्दी पत्रकारिता में इसी तरह की बर्बरता बनी रहेगी?
यहां सवाल सिर्फ प्रभाष जोशी की खबर छापने या नहीं छापने भर से नहीं है। ये तो फिर भी मीडिया,पाठकों और प्रभाष जोशी को जानने-समझनेवाले लोगों के लिए बड़ी खबर है। हम जैसे देश के हजारों पाठक रोज कमरे तक न्यूजपेपर पहुंचाने वाले भैय्या के आने का इंतजार बर्दाश्त नहीं कर पाने की स्थिति में संभवतः खुद ही नजदीकी स्टॉल से चले गए होंगे। रोज एक या दो अखबार पढ़ने के अभ्यस्त आज सारे अखबारों को देखना-खरीदना चाह रहे होगें और पन्ने पलटते गए होंगे गए। तब जाकर पता चला होगा कि इन दोनों अखबारों ने इस तरह का खेल किया है। नहीं तो कहां पता चलनेवाला था कि कोई अखबार ऐसा भी कर सकता है? प्रभाष जोशी की खबर की तरह ही बाकी की कितनी खबरों के प्रति इतने संवेदनशील होते हैं,जानने-समझने के उत्सुक होते हैं। कितनी घटनाओं के प्रति हमारा सरोकार होता है? कितनी खबरों को लेकर हम एक ही दिन कई-कई अखबार पलटते हैं? मुझे नहीं लगता कि एक औसत पाठक दो-तीन अखबार से ज्यादा देख पाता होगा। तो क्या ऐसे में अखबार में काम करनेवाले मीडियाकर्मियों के पसंद-नापसंद के फार्मूले पर कई खबरें न छपने की बलि चढ़ जाती होगी? क्या यहां से हमें अखबारों के चरित्र को समझने के कोई सूत्र मिलते हैं? मास की बात करनेवाला अखबार,व्यावहारिक स्तर पर इतना इन्डीविजुअल हो सकता है? खबरों को दबाए औऱ कुचले जाने का काम व्यक्तिगत इच्छा-अनिच्छा की चीज बनती आयी है?

मीडिया के अलग-अलग मसलों पर लिखते हुए इधऱ कुछ दिनों से मैंने तय किया है कि इसकी समीक्षा इन्हीं की शर्तों पर की जाए। हमें मीडिया में सरोकारों के सवाल पर न तो हाथ में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो लेकर बात करनी है। न ही अपनी तरफ से कोई फार्मूला फिट करके मीडिया को देखने-परखने की जुगत भिड़ानी है। हमें मौजूदा मीडिया को उसी नजरिए से देख-समझकर बात करनी है,जिस नजरिए से मीडिया से जुड़े लोग हमें समझने का तर्क देते हैं। देखते हैं,इससे किस तरह के निष्कर्ष निकलकर सामने आते हैं? अभी चार दिन पहले ही देखिए, शाहरुख के केक काटने की लाइव कवरेज के नाम पर चैनलों ने बुजुर्ग पत्रकारों के टकले सिर दिखाए,पत्रकारों की पिछाड़ी दिखाए। ये अपने ही फार्मूल पर नहीं टिके रह सके। इधर अखबारों से जब आप खबरों की हिस्सेदारी की बात करेंगे,सामाजिक सरोकारों की बात करेंगे तो आपसे सीधा सवाल करेंगे कि जो चीजें पढ़ी ही नहीं जाती,उस पर लिखने-छापने से क्या फायदा? साहित्य,संस्कृति और कला से जुड़ी खबरें इसी तर्क के आधार पर अब प्रमुखता से खबर का हिस्सा नहीं रहा। हमें तो बाजार देखना होता है,हम क्या कर सकते हैं? मतलब साफ है कि वो उन्हीं खबरों को छापेंगे जो उन्हें रिटर्न देने की ताकत रखते हों। अब इसी फार्मूले से आप नवभारत टाइम्स और दैनिक जागरण से सवाल करें कि क्या प्रभाष जोशी की खबर बिकाउ नहीं है, मीडिया,खासकर अखबारों के लिए सेलेबुल आइटम नहीं रहा।(प्रभाष जोशी के निधन की खबर के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करने के लिए माफ करेंगे,लेकिन अखबार शायद इस तरह की भाषा ज्यादा आसानी से समझते हैं,बस इसलिए)।

सुबह उठकर पुष्कर जब समाचार अपार्टमेंट के पास के स्टॉल वाले से जनसत्ता की मांग करता है तो उसका जबाब होता है-नहीं है। आप से पहले पचासों लोग जनसत्ता खोजने आ चुके हैं। पता नहीं आज लोग क्यों इस अखबार को ज्यादा खोज रहे हैं? वैसे तो ये इतवार को ज्यादा बिकता है। देर रात जागने के बाद सुबह उठते ही सारे अखबार खरीदने के लिए पटेल चेस्ट की तरफ भागता हूं तो देखता हूं छात्रों की एक बड़ी जमात वहां पहले से मौजूद है जो कि फ्रंट पर खोजते हुए अंदर तक अखबारों में घुसती है,सिर्फ और सिर्फ प्रभाष जोशी की खबर को पढ़ने के लिए।..और दिनों के मुकाबले कल लोगों ने एक से ज्यादा अखबार पढ़े होंगे,खरीदे होंगे। मेरा ऐसा अनुमान है। ऐसे में अखबारों का सेलेबुल होने के आधार पर खबर को छापने वाला फार्मूला प्रभाष जोशी की खबर के साथ क्यों नहीं लागू किया गया? दिन-रात बाजार के दबाब का रोना रोनेवाले ये अखबार हमेशा बाजार को ध्यान में रखकर खबरें नहीं छापते हैं। इस घटना के आधार पर तो यही समझ बनती है कि अखबार संभवतः कई मौके पर व्यक्तिगत खुन्नस,जातीय,क्षेत्रीय और भाषाई स्तर के दुराग्रह की वजह से भी कई खबरों को नहीं छापता होगा। प्रभाष जोशी ने जीते-जी पैसे लेकर खबरें छापने और नहीं देने पर नहीं छापने की बात कही थी। उसे अपनी लेखनी से लगातार अभियान का रुप देने जा रहे थे। इस घटना में पैसे के फार्मूले के आगे व्यक्तिगत स्तर का पसंद-नापसंद वाला फार्मूला ज्यादा हावी नजर आया।

प्रभाष जोशी की खबर को नहीं छापने की घटना से हमारे सामने एक ही साथ कई सवाल खड़े हो जाते हैं? क्या अखबारों में खबरों को छापने और न छापने का आधार जाति,समुदाय,क्षेत्र,संप्रदाय और धर्म को लेकर पसंद और नापसंद भी होता है? अखबार में बहुसंख्यक समुदाय,जाति और विचारधारा के पसंद-नापसंद से खबरें प्रमुखता पाती है? क्या गुजरात का नरसंहार, 1984 के सिख विरोधी दंगे,बाबरी मस्जिद जैसे दर्जनों मनहूस घटनाएं होंगी जिसमें इसी पैटर्न को फॉलो करते हुए खबरें छापीं गयी होगीं,खारिज की गयी होगी? ऐसा सोचते ही सिहरन सी होने लग जा रही है?
मुझे नहीं पता कि प्रभाष जोशी को लेकर दैनिक जागरण औऱ नवभारत टाइम्स के शीर्ष पर बैठे लोगों के साथ क्या असहमति और रंजिशें रही होंगी। लेकिन तीन-साढ़े तीन रुपये देकर अखबार खरीदनेवाले ग्राहक के साथ न्याय तो कर देते। आप मीडिया एथिक्स तो दूर सही तरीके से प्रोफेशनल एथिक्स को भी फॉलो करने में यकीन नहीं रखते। प्रभाष जोशी का इससे तो कुछ हुआ नहीं,कम से कम अपनी साख में बट्टा लगने से तो अपने को बचा लिया होता।

नोटः- 7 नवम्बर के नवभारत टाइम्स ने प्रभाष जोशी को याद करते हुआ अभय कुमार दुबे का संस्मरण छापा है- वह खनक अभी भी बजती है। अब सवाल है कि क्या इसे ही खबर के तौर पर पढ़ा-समझा जाना चाहिए और इस बात का संतोष कर लिया जाना चाहिए कि,कोई बात नहीं चाहे किसी भी रुप में हो,याद तो किया।

Saturday, November 7, 2009

सरकार को देना होगा- कब कटेगी चौरासी का जवाब


मूलत: प्रकाशित- मोहल्लाlive

1984 के सिख दंगे के बारे में जिसे कि मैं दंगा नहीं नरसंहार मानता हूं, देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहीं कहा है कि हमें इसे भूल जाना चाहिए। मैं मानता हूं कि इतिहास भूलने की चीज़ नहीं होती। आज से पता नहीं कितने हज़ार साल पहले रावण ने ग़लती की और हम आज तक उसे जलाते हैं। बाबर ने कई सालों पहले जो किया, वो आज भी संदर्भ के तौर पर हम याद करते हैं। भारतीय कभी इतिहास को भूलते नहीं है। वो किसी न किसी रूप में दूसरे जेनरेशन और उसके बाद अगले से अगले जेनरेशन में जाता ही है। 1984 में सिक्खों के साथ जो कुछ भी हुआ, वो आगे के जेनरेशन में भी जाएगा और ये शायद ज़्यादा ख़तरनाक रूप में जाए। इसलिए इसे करेक्ट करने की ज़रूरत है। सिर्फ जस्टिस के जरिये ही इतिहास की इस भूल को करेक्ट किया जा सकता है। जरनैल सिंह ने ये बातें अपने किताब के लोकार्पण के मौके पर ज़ुबान की प्रकाशक और चर्चित लेखिका उर्वशी बुटालिया से पूछे गये सवालों का जबाब देते हुए कहीं।

पेंग्विन ने 84 के दंगे को लेकर जरनैल सिंह की लिखी किताब को कब कटेगी चौरासी : सिख क़त्लेआम का सच नाम से प्रकाशित किया है। मूलतः हिंदी में लिखी गयी इसी किताब को उसने अंग्रेजी अनुवाद I ACCUSE… The Anti-Sikh Violence Of 1984 से प्रकाशित किया गया है। 6 नवंबर को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में इस किताब का लोकार्पण किया गया। लोकार्पण के पहले जरनैल सिंह ने अपनी किताब, 84 के दंगे और पी चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले प्रकरण को लेकर वक्तव्य दिया। किताब का लोकार्पण हो जाने के बाद जरनैल सिंह और उर्वशी बुटालिया के बीच एक संवाद सत्र रखा गया, जिसमें उर्वशी बुटालिया की ओर से किताब और 84 के दंगे से जुड़े कई सवाल किये गये। बाद में ऑडिएंस के तौर पर मौजूद लोगों ने भी कई सवाल किये। इस तरह स्वतंत्र वक्तव्य और लोगों के सवाल-जबाब को मिला कर जरनैल सिंह ने किताब के लिखे जाने की वजह से लेकर न्याय, सरकार के रवैये, प्रशासन व्यवस्था और सामाजिक ज़‍िम्‍मेदारी जैसे मसलों पर विस्तारपूर्वक अपना पक्ष रखा।

अपने शुरुआती वक्तव्य में जरनैल सिंह ने कहा कि इस किताब में उन लोगों की दिल दहला देनेवाली कहानियां हैं, जिन्हें कि 25 साल बाद भी न्याय नहीं मिला। दो महीने के बच्चे को चूल्हे पर रखकर जला दिया गया, लोगों को टायर में फंसा कर आग लगा दी गयी। यह किताब उन सबों को पढ़ने के लिए है, जो कि इंसानियत के साथ खड़े होने में यक़ीन रखते हैं। हम अपने को दुनिया के सबसे सभ्य और संस्कृति वाले देश के लोग के तौर पर मानते हैं लेकिन ये कितनी बड़ी बिडंबना है, कितना बड़ा मजाक है कि इसी देश में 3000 लोगों को सरेआम कत्ल कर दिया गया लेकिन आज पच्चीस साल बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिला है। कहीं न कहीं हमारे देश की आत्मा मर गयी है, जो दोषी लोगों को सज़ा देने के बजाय उन्‍हें संसद में भेज देती है। किताब की प्रस्तावना में खुशवंत सिंह ने लिखा है कि जिन लोगों ने दंगाइयों की भीड़ का सक्रिय संचालन किया और गुरुद्वारों और सिख मोहल्लों पर हमला करवाया, उनकी करतूतों के लिए सज़ा देना तो दूर, उन्हें प्रधानमंत्री राजीव गांधी से इनाम के तौर पर मंत्रिमंडल में शामिल होने का अवसर मिला। (पेज नं-XIII)

जरनैल सिंह ने स्वीकार किया कि मेरे विरोध करने का जो तरीक़ा था वो ग़लत था लेकिन जिस बात के विरोध में मैं खड़ा हूं, उस पर मुझे आज भी गर्व है। विरोध का तरीक़ा ग़लत होने क बावजूद विरोध का कारण महत्वपूर्ण है। आखिर क्या वजह है कि 11 साल बाद इस घटना का एफआईआर दर्ज हुआ? इस घटना के 25 साल हो गये, न्याय मिलने की बात तो दूर देश का कोई भी प्रधानमंत्री एक बार भी उस विडोज़ कॉलोनी में क्यों नहीं गया? दर्शन कौर जो इस किताब का लोकार्पण कर रही हैं, उन्‍हें बार-बार क्यों धमकाया गया? उनके सामने क्यों 25 लाख रुपये का ऑफर दिया गया और बयान बदलने की बात कही गयी? (दर्शन कौर, 1984 के दंगों से प्रभावित और जीवित बच पायीं एक पीड़िता हैं।)

ये किताब इसलिए लिखी गयी कि उस समय मीडिया ने अपनी ज़‍िम्मेदारी नहीं निभायी। उसे सही तरीके से कवर नहीं किया गया। इस घटना में पीड़ितों का पक्ष संवेदनशील तरीके से नहीं रखा गया। इस मामले में दूरदर्शन का रवैया संदिग्ध रहा है। दूरदर्शन के चरित्र की चर्चा जरनैल ने किताब में भी की है। उन्होंने लिखा है कि दूरदर्शन नरसंहार भड़काने में अपनी भूमिका पूरी शिद्दत से निभा रहा था। लगातार इंदिरा गांधी का शव और उसके आसपास खून का बदला खून के लग रहे नारों को प्रसारित किया जा रहा था। नानवटी आयोग को दिये गये अपने हलफ़नामे में अवतार सिंह बीर ने इस बात का जिक्र किया है। दूरदर्शन बार-बार सिख सुरक्षाकर्मियों’ द्वारा हत्या की बात दोहरा रहा था, जबकि आमतौर पर दंगों में भी दो वर्गों की बात कही जाती है, किसी वर्ग का नाम नहीं लिया जाता। दूरदर्शन पर सिख क़त्लेआम की एक भी खबर नहीं दिखायी गयी। अख़बार भी सही खबर देने के अपने धर्म को भूल चुके थे।

जरनैल सिंह का मानना है कि ये दंगा न होकर सुनियोजित तरीके से सरकारी कत्लेआम था। खुलेआम सिखों की हत्या की जा रही थी। इसे रोकना क्या प्रशासन की ज़‍िम्मेदारी नहीं थी? इस किताब ने कत्लेआम के दौरान खाकी वर्दी, प्रशासन, सरकार और राजनीति से जुड़े लोगों के रवैयों की विस्तार से चर्चा की गयी है। 31 अक्टूबर की रात बाकायदा कांग्रेस नेताओं की बैठक कांग्रेसी विधायक रामपाल सरोज के घर पर हुई, जहां ये निर्देश जारी हुए कि अब पूरी सिख कौम को सबक सिखाना है। सिखों और उनके घरों को जलाने के लिए रसायनिक कारखानों से सफेद पाउडर की बोरियां मंगवा पूरी दिल्ली में बंटवायी गयीं। (पेज नं 103)

अन्यायकर्ता और न्यायकर्ता नाम से एक शीर्षक है, जिसके भीतर सिरों की कीमत, भगत से बदला, कत्लेआम और सत्ता की सीढ़ी, सदियों के भाईचारे पर दाग़, दंगाई खाकी, देखती रही फौज, वर्दी ही कफन बन गयी, असहाय राष्ट्रपति, मौन गृहमंत्री और दंगे नहीं उपसंहार नाम से उपशीर्षक हैं। इन उपशीर्षकों के भीतर दिल दहला देनेवाली घटनाओं की चर्चा है। नानावटी आयोग की रिपोर्ट में पेज नंबर 87 पर सुल्तानपुरी के बयान दर्ज है, जिसमें कहा गया है, “सज्जन कुमार ने वहां एकत्रित भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि जिसने भी रोशन सिंह और भाग सिंह की हत्या की है, उन्हें 5000 रूपये इनाम दिया जाएगा। जो बाकी सिखों को मारेंगे, उन्हें प्रति व्यक्ति 1000 रुपये का इनाम दिया जाएगा” (पेज नं-61)।

दंगे के सामाजिक स्तर की सक्रियता के सवाल पर जरनैल सिंह ने स्पष्ट किया कि आमतौर पर भारतीय तेवर इस तरह की गतिविधियों में सक्रिय होने का पक्षधर नहीं है। लेकिन इस घटना के विरोध में लोग खुलकर सामने नहीं आये, उसे रोका नहीं। आखिर क्या कारण है कि इस घटना को अपनी आंखों से देखनेवाले कई गैर-सिखों में से एक भी गवाह के तौर पर सामने नहीं आया? यह पूरी तरह पॉलिटिकल कॉन्‍सपीरेसी रही है। उर्वशी के पूछे गये इस सवाल पर कि आप हिंदू-सिख को घुले-मिले रूप में देखते हैं। ऐसे में आप सोचते हैं कि एक संवाद की गुंजाइश है? जरनैल सिंह का सीधा जबाब रहा कि भाईचारे को सिर्फ और सिर्फ जस्टिस के जरिये ही कायम किया जा सकता है।
किताब का एक बड़ा हिस्सा उन लोगों की दास्तान को दर्ज करता है, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने पति और बच्चे खो दिये, जिनके परिवार उजड़ गये। जो किसी भी हालत में इस सदमे से उबर नहीं पाये हैं। जज जब दर्शन कौर से भगत को पहचानने की बात करता है, तब भगत का एक-एक लफ्ज उसे याद आ रहा था। भगत कह रहा था, “किसी सरदार को मत छोड़ो। ये गद्दार हैं। मिट्टी का तेल, हथियार सब कुछ है, पुलिस तुम्हारे साथ है। सरदारों को कुचल डालो।” (पेज नं-68)

अपने परिवार के लोगों को कत्लेआम में गंवाने वाले सुरजीत सिंह का कहना है कि जिलाधिकारी ब्रजेंद्र पूरी तरह से दंगाइयों के साथ मिले हुए थे। (पेज नं-94)

1984 में दिल्ली के मशहूर वेंकेटेश्वर कॉलेज में बीएससी (द्वितीय वर्ष) में पढ़ते हुए फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली भोली-भाली निरप्रीत को नहीं मालूम था कि एक दिन वो इस तरह अपनी मां से तिहाड़ के अंदर मिलेगी। लेकिन 1984 के सिख कत्लेआम में पिता को दंगाइयों के हाथों तड़पते हुए मरता देख वह बागी हो चुकी थी। (पेज नं-51)

लोगों के सवालों का जवाब देते हुए जरनैल सिंह ने एक बार फिर कहा कि उनके विरोध करने का तरीक़ा ग़लत था लेकिन यह सच है कि उस प्रकरण के बाद ही ये मुद्दा फिर से हाइलाइट हुआ। जब सबने अपनी मर्यादा का उल्लंघन किया, तो हमें भी करना पड़ा। आखिर इस घटना के बाद ही सरकार को ये क्यों याद आया? हमारा कोई राजनीतिक मक़सद नहीं है, मैं किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ नहीं हूं। हम गृहमंत्री के विरोध में नहीं हैं। मैं इसके जरिये ऐसा दबाव बनाना चाहता हूं कि लोगों की सोयी हुई आत्मा जागे। दोषियों को सज़ा मिले, जिससे कि आनेवाले समय में दोबारा ऐसी हिम्मत नहीं करे। इस मामले में वो ये भी मानते हैं कि अगर 1984 के दोषियों को सज़ा मिल गयी होती तो संभव है गुजरात में जो कुछ भी हुआ, वो करने की हिम्मत लोग नहीं जुटा पाते। हम इसके जरिये नागरिक अधिकारों को सामने लाने की बात कर रहे हैं। एक महिला श्रोता की ओर से उठाये गये इस सवाल पर कि इससे पंजाबियों को क्यों अलग-थलग रखा जाता है? जरनैल सिंह ने जबाब दिया कि ये मसला सिर्फ सिखों से जुड़ा हुआ नहीं है। ये देश के उन तमाम लोगों से जुड़ा है, जिनके साथ इस तरह की घटनाएं हुई हैं और होती है। उर्वशी बुटालिया ने जरनैल सिंह के इस काम को एक बड़ा कमिटमेंट करार दिया और इस दिशा में लगातार आगे बढ़ते रहने की शुभकामनाएं दी। इस प्रयास का असर बताते हुए सभागार में मौजूद एक पत्रकार ने सूचना दी कि आज हम जिस जगदीश टाइटलर के विरोध में बात कर रहे हैं, ये जानकर खुशी हो रही है कि यूके ने 84 के दंगे में शामिल होने के आरोप में उन्‍हें वीज़ा देने से इनक़ार कर दिया है।

सवालों के दौर ख़त्‍म होने के साथ ही लोगों ने इच्‍छा जतायी कि जरनैल सिंह ने किताब के जरिये जिस मुद्दे को उठाया है, वो एक सही दिशा में जाकर विस्तार पाये। ये किसी भी रूप में न तो महज विवाद का हिस्सा बन कर रह जाए और न ही एक कौम की प्रतिक्रिया के तौर पर लोगों के सामने आये। ये व्यवस्था के आगे दबाव बनाने के माध्यम के तौर पर काम करे जिससे कि न्याय की प्रक्रिया तेज़ और सही दिशा में हो सके। इस मौके पर यात्रा प्रकाशन की संपादक नीता गुप्ता ने कहा कि जरनैल सिंह ने जो काम किया है, उसके लिए उनकी हिम्मत की दाद देनी होगी। हमें उम्मीद है कि किताब के प्रकाशन से आपके प्रयासों को मज़बूती मिलेगी। पूरे कार्यक्रम के दौरान रंजना(सीनियर कमिशनिंग एडिटर,पेंग्विन) वैशाली माथुर (सीनियर कमिशनिंग एडिटर, पेंग्विन), एसएस निरुपम (हिंदी एडीटर,पेंग्विन)के सक्रिय रहने के लिए धन्‍यवाद दिया। सभागार में मौजूद श्रोताओं और विशेष रूप से उर्वशी बुटालिया का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि हम सबकी की ये नैतिक ज़‍िम्मेदारी है कि अपने-अपने स्तर से इस काम को आगे बढ़ाएं। उम्मीद की जानी चाहिए कि जरनैल सिंह की ये किताब 1984 में सिख कत्लेआम के प्रति संवेदनशील होने और इसकी आड़ में होनेवाली राजनीति को समझने में एक नयी खिड़की का काम करेगी। कार्यक्रम के दौरान जितनी तेज़ी से इस किताब की बिक्री शुरू हुई, उससे ये साफ झलकता है कि लोग इस घटना के प्रति संवेदनशील हैं। बकौल जरनैल सिंह पंजाबी में छपी इसी किताब की अब तक 3000 प्रति निकल चुकी है।

लोगों के बीच किताबों की पहुंच के साथ अन्याय के खिलाफ, न्याय के पक्ष में लोगों के स्वर मज़बूत होंगे.

Friday, November 6, 2009

बुजुर्ग पत्रकार प्रभाष जोशी नहीं रहे


देश के जाने-माने और हिन्दी के बुजुर्ग पत्रकार प्रभाष जोशी नहीं रहे। गुरुवार रात,भारत-आस्ट्रेलिया मैच देखने के दौरान दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। अफसोसनाक है कि जिस मैच को लेकर देर रात तक हॉस्टल में हो-हुडदंग होता रहा,उसी मैच के दौरान देश का एक बुद्धिजीवी पत्रकार हमेशा के लिए खामोश हो गया। पटना से जसवंत सिंह की लिखी विवादित किताब के लोकार्पण कार्यक्रम से करीब 11 बजे रात लौटने के बाद जोशी थकान महसूस कर रहे थे। घर के लोगों ने भी सलाह दी कि डॉ. से सम्पर्क करना चाहिए लेकिन मैच देखकर उस पर कुछ लिखने का लोभ वो रोक नहीं पाए।.. लेकिन दोनों में से कोई भी काम पूरा किए बगैर हमसे विदा हो लिए। जोशी ने जिस कागद-कारे स्तंभ से अपनी अलग पहचान बनायी उसका पहला लेख क्रिकेट पर ही था। अंत-अंत तक क्रिकेट उऩके जीवन के साथ जुड़ा रहा और एक हद तक क्रिकेट ही उनके मौत का कारण भी बना।
कहना न होगा कि प्रभाष जोशी उन गिने-चुने पत्रकारों में से रहे हैं जिनकी लोकप्रियता सिर्फ पठन-लेखन के स्तर पर नहीं रही है,उन्हें चाहने और माननेवालों की एक लंबी फेहरिस्त है। मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर सैकड़ों मीडियाकर्मी और पत्रकार ये कहते हुए आसानी से मिल जाएंगे कि आज वो जो कुछ भी है प्रभाषजी की बदौलत हैं। 12 सालों तक जनसत्ता अखबार का संपादन करते हुए उन्होंने एक खास तरह की पत्रकारिता का विस्तार किया। शिमला में उनसे जुड़े प्रसंगों को याद करते हुए अभय कुमार दुबे,संपादक सीएसडीएस ने हमें तब बताया था कि वो अकेले ऐसे संपादक थे जो किसी भी खबर के छप जाने के बाद माफी मांगने में यकीन नहीं रखते,छप गया सो छप गया। इसके साथ ही वो एक ऐसे संपादक थे जिन्होंने मालिक के आगे संपादक की कुर्सी को कभी भी छोटा नहीं होने दिया। बतौर बरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय, प्रभाष जोशी एक ऐसे पत्रकार रहे हैं जिनका भरोसा था कि पत्रकारिता के जरिए राजनीतिक स्थिति को भी बदला जा सकता है। वो पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे। इसलिए उन्होंने जितना लिखा उतना ही सामाजिक मसलों पर जाकर लोगों के सामने अपनी बात भी रखी। लोग उन्हें सुनने के लिए बुलाते थे।(एनडीटीवी इंडिया 9.20 बजे 6 नवम्बर 09)। आज से करीब एक साल पहले जब राजकमल की ओर से एक ही साथ पांच किताबों का लोकार्पण किया जा रहा था उस समय दिल्ली के त्रिवेणी सभाकार को मैंने इस तरह के कार्रयम में पहली बार खचाखाच भरा हुआ देखा था। इतना खचाखच कि देश के नामचीन पत्रकार से लेकर साहित्यकार सीढ़ियों पर बैठे नजर आए। स्वयं प्रभाष जोशी के शब्दों में आज चार पीढ़ी के लोग मौजूद हैं। कुछेक पत्रकारों को छोड़ दे तो सभागार में जनसत्ता-परंपरा के अधिकांश पत्रकार पहली बार वहां मौजूद नजर आए।
सत्ता में गहरी पैठ रखनेवाले पत्रकार प्रभाष जोशी जितने लोकप्रिय रहे हैं,अपने जीवनकाल उतने ही विवादों में बने रहनेवाले पत्रकार भी। बाबरी मस्जिद के दौरान जनसत्ता में छपनेवाली खबरों,उसकी प्रस्तुति को लेकर वो विवादों में आए,सती-प्रथा को लेकर छपे संपादकीय का लेकर वबेला मचा और हाल ही में एक साइट को दिए गए इंटरव्यू में आलोचना के शिकार हुए। प्रभाष जोशी की ऑइडियोलॉजी को लेकर भी काफी विवाद रहा है।अकादमिक क्षेत्र में राजकमल से प्रकाशित हिन्दू होने का धर्म उनकी लोकप्रिय किताबों में से है। लेकिन इधर पिछले दो सालों से हिन्दी स्वराज के पुर्नपाठ और विमर्श को लेकर काफी सक्रिय नजर आए। वो हिन्द स्वराज और गांधी के मार्ग के महत्वों की चर्चा करते हुए उनकी विचारधारा का विस्तार करने की बात करते रहे। बीते लोकसभा चुनावों में पैसे देकर पेड खबरें छापने और राजनीति का पिछलग्गू बन जानेवाले अखबारों को लेकर प्रभाष जोशी ने विरोध में एक मोर्चा खोल रखा था और उसे वो राष्ट्रीय स्तर पर एक अभियान का रुप देने जा रहे थे जिसके चिन्ह हमें हाल के लिखे गए उनके लेखों में साफ तौर पर दिखाई देने लगे थे। उनके इस अभियान में कुलदीप नैय्यर और हरिवंश जैसे वरिष्ठ पत्रकार भी शामिल रहे हैं।
इन सबके वाबजूद प्रभाष जोशी को एक ऐसे कर्मठ पत्रकार के तौर पर जाना जाएगा जो कि अपनी जिदों को व्यावहारिक रुप देता है,नई पीढ़ी के लोगों को गलत या असहमत होने पर खुल्लम-खुल्ला चैलेंज करता है,अपनी बात ठसक के साथ रखता है और सक्रियता को पूजा और अराधना को पर्याय मानता है। आज प्रभाष जोशी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि अगर हम उनके लेखन का पुनर्विश्लेषण करते हैं,पठन-पाठन के दौरान असहमति का स्वर जाहिर करते हैं,सहमति को व्यवहार के तौर पर अपनाते हैं और पैर पसारती कार्पोरेट मीडिया का प्रतिरोध करते हुए हिन्दी पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के तौर पर आगे ले जाते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मुझे उनका खास अंदाज में क्रिकेट पर लिखना,इनने,उनने और अपन जैसे शब्दों का प्रयोग अब तक एक खास किस्म की इन्डीविजुअलिटी को बनाए रखने के तौर पर लगा,कई बार इससे असहमत भी रहा लेकिन आगे से जनसत्ता में इन शब्दों के नहीं होने की कमी जरुर खलेगी। गरम खून के पत्रकारों के बीच कोई तो था जिसे बार-बार पटकनी देने की मंशा से लड़ते-भिड़ते और अपना कद बड़ा होने की खुशफहमी से फैल जाते। आज हमसे लड़ने-भिड़ने वाला नहीं रहा,फच्चर मत डालो को लिखकर चैलेंज करनेवाला नहीं रहा। अब बार-बार याद आएगा कागद-कारे..

Thursday, November 5, 2009

जरनैल सिंह की किताब का कल होगा लोकार्पण




एक पत्रकार की हैसियत से अपने लंबे मीडिया करियर के दौरान जरनैल सिंह ने क्या किया,किन-किन मसलों और मुद्दों को रिपोर्टिंग के दौरान लोगों के सामने लाने की कोशिश की,ये बताने की जरुरत शायद ही किसी न्यूज चैनल या अखबारों ने की हो। हमें सिर्फ इतना भर बताया गया कि जरनैल सिंह ने मौजूदा गृहमंत्री पर जूते फेंकने का काम किया और रातोंरात वो इसी काम को लेकर चर्चित कर दिए गए। इस हिसाब से पेंगुइन से प्रकाशित होनेवाली उनकी किताब कब कटेगी चौरासीः सिख क़त्लेआम का सच जिसका कि कल लोकार्पण होना है,जरनैल सिंह की कोशिश से ये दोतरफी कारवायी है। सिंह इस किताब के जरिए अपनी उस छवि को स्थापित करना चाहते हैं जिसमें कि उनके लंबे समय का लेखन और रिपोर्टिंग के अनुभव शामिल हैं,एक पत्रकार की हैसियत से राजनीतिक संदर्भों को विश्लेषित करने की कोशिश है और दूसरा अपनी उस छवि को ध्वस्त करना चाहते है जिसमें कि एक बेकाबू हो गए एक नागरिक/पत्रकार का सत्ता में बैठे लोगों के सामने गलत ही सही लेकिन अपने स्तर से विरोध दर्ज करना है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शुरु से उस फार्मूले पर काम करता आया है कि जो व्यक्ति जिस काम के लिए चर्चित हुआ है उसे उसी रुप में हायपरवॉलिक तरीके से ऑडिएंस/दर्शक के सामने पेश करे लेकिन ये फार्मूला कितना वाजिब है,इत्मिनान होकर सोचने की मांग करता है। बहरहाल,जरनैल सिंह की बनी नयी पहचान उन्हें किस हद तक परेशान करती है और अब तक के किए गए सारे काम,हालिया के एक काम के आगे कैसे फीका पड़ जाता है, ये सबकुछ शिद्दत से महसूस करने और उसे पाटने की कोशिश में ये किताब हमारे सामने है। ऐसे में अपनी रचनाधर्मिता और तार्किक समझ को इस जद्दोजहद के बीच बचाए रखना,जरनैल सिंह की उपलब्धि ही समझी जाएगी।
पेंग्विन से प्रकाशित,जरनैल सिंह की किताब कब कटेगी चौरासीः सिख क़त्लेआम का सच मूलतः हिन्दी में लिखी गयी है। इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद वैशाली माथुर ने I Accuse : The anti sikh voilence 0f 1984 नाम से किया है. लेखक/प्रकाशक के हिसाब से यह किताब 1984 के सिख क़त्लेआम से जुड़ी सच्चाईयों और सरकार की संवेदनशून्यता का एक सशक्त दस्तावेज़ है। क्योंकि 1884 का हुआ दंगा सिर्फ सिखों पर हुआ हमला नहीं था,बल्कि यह लोकतंत्र और इंसानियत पर हुआ हमला था। इस किताब के बारे में लिखते हुए मशहर कॉलमिस्ट और ट्रेन टू पाकिस्तान के लेखक खुशवंत सिंह का मानना है कि-'कब कटेगी चौरासी ऐसे घावों को हरा करती है जो आज तक नहीं भरे हैं। यह किताब उन सभी लोगों को पढ़नी चाहिए जो चाहते हैं कि ऐसे भयानक अपराध दोबारा न हो।
। जाहिर है किताब जिस सबूतों और संदर्भों को हमारे सामने पेश करती है और स्वयं लेखक जिस रुप में उसका विश्लेषण करता है उसके सामने इस दंगे में हताहत लोगों को दिया गया मुआवजा तुष्टिकरण की नीति का हिस्साभर है। ऐसा करके सरकार ने अपने विद्रूप चेहरे को ढंकने का भरसक प्रयास किया है। लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि यह किताब महज विवाद का हिस्सा बनने के बजाय उन कारवाईयों पर फिर से विचार करने का स्पेस पैदा करेगी जो कि लोकतंत्र की बहाली के नाम पर अंदुरुनी तौर पर उसका गला रेतने का काम करती है। जूता प्रकरण के हो-हंगामे के बीच जरनैल के जो सवाल दब गए वो सवाल उस किताब में फिर से सरकार के लिए एक चुनौती पैदा करते हैं- अब तक दोषियों का सजा क्या नहीं मिली? क्या प्रशासन तंत्र न्याय होने देगा? कब मिलेगा पीड़ितों को न्याय और कब कटेगी चौरासी? सरकार को इन सवालों को गंभीरता से लेने होंगे और इस किताब के जरिए 84 पर नए सिरे से बात होने की गुंजाइश पैदा हो सकेगी। इसके साथ ही हम उम्मीद करते है कि आनेवाले समय में जरनैल सिंह की पहचान केवल और केवल पी.चिदमबरम पर जूता फेंकनेवाले पत्रकार के तौर पर न होकर एक संवेदनशील और रिस्क कवर करते हुए तल्खी से अपनी बात रखनेवाले लेखक के तौर पर चिन्हित किया जा सकेगा।