पैर रहते रेंगना बहुत मुश्किल होता है,जुबान रहते चुप रहना मुश्किल होता है, दिमाग रहते गलत-सही सब मान लेना मुश्किल होता है लेकिन मुश्किल नहीं होता कहना- कर लो जो करना है। हम अपनी लिखें और उन्हें जो जी में आए करने दें, आएं व्यवस्थित समाज के बीच बर्बर समाज बनाए, कुछ आप तोड़े, कुछ तोड़-फोड़ हम मचाएं-हां जी सर,हां जी सर कल्चर के खिलाफ बिगुल बजाएं..... हमें मेल करें-vineetdu@gmail.com

Sunday, November 8, 2009

प्रभाष जोशी का जाना जिस अखबार के लिए खबर नहीं



7 नवम्बर के नवभारत टाइम्स ने प्रभाष जोशी के निधन पर एक लाइन की भी खबर छापना जरुरी नहीं समझा। इसी प्रकाशन समूह का अखबार The Times Of India ने action on pitch cut short his acerbic pen शीर्षक से तस्वीर सहित करीब 600 शब्दों में खबर छापा है। नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉग कोना में पूजा प्रसाद ने कितने सीधे थे प्रभाष जोशी शीर्षक से पोस्ट लिखी है। दैनिक जागरण ने उनके लिए साइड में वमुश्किल से सौ शब्द छापे। ये दोनों देश के प्रमुख अखबारों में से है। रीडरशिप की दौड़ में रेस लगानेवाले हैं। अपनी ब्रांडिंग के लिए लाखों रुपये खर्च करते आए हैं। लेकिन आज ऐसा करते हुए जरा भी अपनी ब्रांड इमेज की चिंता नहीं की। कहने को कहा जा सकता है कि नहीं छापा तो नहीं छापा इसमें कौन-सा पहाड़ टूट गया? लेकिन सवाल है कि क्या देश की पत्रकारिता इसी तरह की किसी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के बूते चलती रहेगी ? हिन्दी पत्रकारिता में इसी तरह की बर्बरता बनी रहेगी?
यहां सवाल सिर्फ प्रभाष जोशी की खबर छापने या नहीं छापने भर से नहीं है। ये तो फिर भी मीडिया,पाठकों और प्रभाष जोशी को जानने-समझनेवाले लोगों के लिए बड़ी खबर है। हम जैसे देश के हजारों पाठक रोज कमरे तक न्यूजपेपर पहुंचाने वाले भैय्या के आने का इंतजार बर्दाश्त नहीं कर पाने की स्थिति में संभवतः खुद ही नजदीकी स्टॉल से चले गए होंगे। रोज एक या दो अखबार पढ़ने के अभ्यस्त आज सारे अखबारों को देखना-खरीदना चाह रहे होगें और पन्ने पलटते गए होंगे गए। तब जाकर पता चला होगा कि इन दोनों अखबारों ने इस तरह का खेल किया है। नहीं तो कहां पता चलनेवाला था कि कोई अखबार ऐसा भी कर सकता है? प्रभाष जोशी की खबर की तरह ही बाकी की कितनी खबरों के प्रति इतने संवेदनशील होते हैं,जानने-समझने के उत्सुक होते हैं। कितनी घटनाओं के प्रति हमारा सरोकार होता है? कितनी खबरों को लेकर हम एक ही दिन कई-कई अखबार पलटते हैं? मुझे नहीं लगता कि एक औसत पाठक दो-तीन अखबार से ज्यादा देख पाता होगा। तो क्या ऐसे में अखबार में काम करनेवाले मीडियाकर्मियों के पसंद-नापसंद के फार्मूले पर कई खबरें न छपने की बलि चढ़ जाती होगी? क्या यहां से हमें अखबारों के चरित्र को समझने के कोई सूत्र मिलते हैं? मास की बात करनेवाला अखबार,व्यावहारिक स्तर पर इतना इन्डीविजुअल हो सकता है? खबरों को दबाए औऱ कुचले जाने का काम व्यक्तिगत इच्छा-अनिच्छा की चीज बनती आयी है?

मीडिया के अलग-अलग मसलों पर लिखते हुए इधऱ कुछ दिनों से मैंने तय किया है कि इसकी समीक्षा इन्हीं की शर्तों पर की जाए। हमें मीडिया में सरोकारों के सवाल पर न तो हाथ में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो लेकर बात करनी है। न ही अपनी तरफ से कोई फार्मूला फिट करके मीडिया को देखने-परखने की जुगत भिड़ानी है। हमें मौजूदा मीडिया को उसी नजरिए से देख-समझकर बात करनी है,जिस नजरिए से मीडिया से जुड़े लोग हमें समझने का तर्क देते हैं। देखते हैं,इससे किस तरह के निष्कर्ष निकलकर सामने आते हैं? अभी चार दिन पहले ही देखिए, शाहरुख के केक काटने की लाइव कवरेज के नाम पर चैनलों ने बुजुर्ग पत्रकारों के टकले सिर दिखाए,पत्रकारों की पिछाड़ी दिखाए। ये अपने ही फार्मूल पर नहीं टिके रह सके। इधर अखबारों से जब आप खबरों की हिस्सेदारी की बात करेंगे,सामाजिक सरोकारों की बात करेंगे तो आपसे सीधा सवाल करेंगे कि जो चीजें पढ़ी ही नहीं जाती,उस पर लिखने-छापने से क्या फायदा? साहित्य,संस्कृति और कला से जुड़ी खबरें इसी तर्क के आधार पर अब प्रमुखता से खबर का हिस्सा नहीं रहा। हमें तो बाजार देखना होता है,हम क्या कर सकते हैं? मतलब साफ है कि वो उन्हीं खबरों को छापेंगे जो उन्हें रिटर्न देने की ताकत रखते हों। अब इसी फार्मूले से आप नवभारत टाइम्स और दैनिक जागरण से सवाल करें कि क्या प्रभाष जोशी की खबर बिकाउ नहीं है, मीडिया,खासकर अखबारों के लिए सेलेबुल आइटम नहीं रहा।(प्रभाष जोशी के निधन की खबर के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करने के लिए माफ करेंगे,लेकिन अखबार शायद इस तरह की भाषा ज्यादा आसानी से समझते हैं,बस इसलिए)।

सुबह उठकर पुष्कर जब समाचार अपार्टमेंट के पास के स्टॉल वाले से जनसत्ता की मांग करता है तो उसका जबाब होता है-नहीं है। आप से पहले पचासों लोग जनसत्ता खोजने आ चुके हैं। पता नहीं आज लोग क्यों इस अखबार को ज्यादा खोज रहे हैं? वैसे तो ये इतवार को ज्यादा बिकता है। देर रात जागने के बाद सुबह उठते ही सारे अखबार खरीदने के लिए पटेल चेस्ट की तरफ भागता हूं तो देखता हूं छात्रों की एक बड़ी जमात वहां पहले से मौजूद है जो कि फ्रंट पर खोजते हुए अंदर तक अखबारों में घुसती है,सिर्फ और सिर्फ प्रभाष जोशी की खबर को पढ़ने के लिए।..और दिनों के मुकाबले कल लोगों ने एक से ज्यादा अखबार पढ़े होंगे,खरीदे होंगे। मेरा ऐसा अनुमान है। ऐसे में अखबारों का सेलेबुल होने के आधार पर खबर को छापने वाला फार्मूला प्रभाष जोशी की खबर के साथ क्यों नहीं लागू किया गया? दिन-रात बाजार के दबाब का रोना रोनेवाले ये अखबार हमेशा बाजार को ध्यान में रखकर खबरें नहीं छापते हैं। इस घटना के आधार पर तो यही समझ बनती है कि अखबार संभवतः कई मौके पर व्यक्तिगत खुन्नस,जातीय,क्षेत्रीय और भाषाई स्तर के दुराग्रह की वजह से भी कई खबरों को नहीं छापता होगा। प्रभाष जोशी ने जीते-जी पैसे लेकर खबरें छापने और नहीं देने पर नहीं छापने की बात कही थी। उसे अपनी लेखनी से लगातार अभियान का रुप देने जा रहे थे। इस घटना में पैसे के फार्मूले के आगे व्यक्तिगत स्तर का पसंद-नापसंद वाला फार्मूला ज्यादा हावी नजर आया।

प्रभाष जोशी की खबर को नहीं छापने की घटना से हमारे सामने एक ही साथ कई सवाल खड़े हो जाते हैं? क्या अखबारों में खबरों को छापने और न छापने का आधार जाति,समुदाय,क्षेत्र,संप्रदाय और धर्म को लेकर पसंद और नापसंद भी होता है? अखबार में बहुसंख्यक समुदाय,जाति और विचारधारा के पसंद-नापसंद से खबरें प्रमुखता पाती है? क्या गुजरात का नरसंहार, 1984 के सिख विरोधी दंगे,बाबरी मस्जिद जैसे दर्जनों मनहूस घटनाएं होंगी जिसमें इसी पैटर्न को फॉलो करते हुए खबरें छापीं गयी होगीं,खारिज की गयी होगी? ऐसा सोचते ही सिहरन सी होने लग जा रही है?
मुझे नहीं पता कि प्रभाष जोशी को लेकर दैनिक जागरण औऱ नवभारत टाइम्स के शीर्ष पर बैठे लोगों के साथ क्या असहमति और रंजिशें रही होंगी। लेकिन तीन-साढ़े तीन रुपये देकर अखबार खरीदनेवाले ग्राहक के साथ न्याय तो कर देते। आप मीडिया एथिक्स तो दूर सही तरीके से प्रोफेशनल एथिक्स को भी फॉलो करने में यकीन नहीं रखते। प्रभाष जोशी का इससे तो कुछ हुआ नहीं,कम से कम अपनी साख में बट्टा लगने से तो अपने को बचा लिया होता।

नोटः- 7 नवम्बर के नवभारत टाइम्स ने प्रभाष जोशी को याद करते हुआ अभय कुमार दुबे का संस्मरण छापा है- वह खनक अभी भी बजती है। अब सवाल है कि क्या इसे ही खबर के तौर पर पढ़ा-समझा जाना चाहिए और इस बात का संतोष कर लिया जाना चाहिए कि,कोई बात नहीं चाहे किसी भी रुप में हो,याद तो किया।

Saturday, November 7, 2009

सरकार को देना होगा- कब कटेगी चौरासी का जवाब


मूलत: प्रकाशित- मोहल्लाlive

1984 के सिख दंगे के बारे में जिसे कि मैं दंगा नहीं नरसंहार मानता हूं, देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहीं कहा है कि हमें इसे भूल जाना चाहिए। मैं मानता हूं कि इतिहास भूलने की चीज़ नहीं होती। आज से पता नहीं कितने हज़ार साल पहले रावण ने ग़लती की और हम आज तक उसे जलाते हैं। बाबर ने कई सालों पहले जो किया, वो आज भी संदर्भ के तौर पर हम याद करते हैं। भारतीय कभी इतिहास को भूलते नहीं है। वो किसी न किसी रूप में दूसरे जेनरेशन और उसके बाद अगले से अगले जेनरेशन में जाता ही है। 1984 में सिक्खों के साथ जो कुछ भी हुआ, वो आगे के जेनरेशन में भी जाएगा और ये शायद ज़्यादा ख़तरनाक रूप में जाए। इसलिए इसे करेक्ट करने की ज़रूरत है। सिर्फ जस्टिस के जरिये ही इतिहास की इस भूल को करेक्ट किया जा सकता है। जरनैल सिंह ने ये बातें अपने किताब के लोकार्पण के मौके पर ज़ुबान की प्रकाशक और चर्चित लेखिका उर्वशी बुटालिया से पूछे गये सवालों का जबाब देते हुए कहीं।

पेंग्विन ने 84 के दंगे को लेकर जरनैल सिंह की लिखी किताब को कब कटेगी चौरासी : सिख क़त्लेआम का सच नाम से प्रकाशित किया है। मूलतः हिंदी में लिखी गयी इसी किताब को उसने अंग्रेजी अनुवाद I ACCUSE… The Anti-Sikh Violence Of 1984 से प्रकाशित किया गया है। 6 नवंबर को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में इस किताब का लोकार्पण किया गया। लोकार्पण के पहले जरनैल सिंह ने अपनी किताब, 84 के दंगे और पी चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले प्रकरण को लेकर वक्तव्य दिया। किताब का लोकार्पण हो जाने के बाद जरनैल सिंह और उर्वशी बुटालिया के बीच एक संवाद सत्र रखा गया, जिसमें उर्वशी बुटालिया की ओर से किताब और 84 के दंगे से जुड़े कई सवाल किये गये। बाद में ऑडिएंस के तौर पर मौजूद लोगों ने भी कई सवाल किये। इस तरह स्वतंत्र वक्तव्य और लोगों के सवाल-जबाब को मिला कर जरनैल सिंह ने किताब के लिखे जाने की वजह से लेकर न्याय, सरकार के रवैये, प्रशासन व्यवस्था और सामाजिक ज़‍िम्‍मेदारी जैसे मसलों पर विस्तारपूर्वक अपना पक्ष रखा।

अपने शुरुआती वक्तव्य में जरनैल सिंह ने कहा कि इस किताब में उन लोगों की दिल दहला देनेवाली कहानियां हैं, जिन्हें कि 25 साल बाद भी न्याय नहीं मिला। दो महीने के बच्चे को चूल्हे पर रखकर जला दिया गया, लोगों को टायर में फंसा कर आग लगा दी गयी। यह किताब उन सबों को पढ़ने के लिए है, जो कि इंसानियत के साथ खड़े होने में यक़ीन रखते हैं। हम अपने को दुनिया के सबसे सभ्य और संस्कृति वाले देश के लोग के तौर पर मानते हैं लेकिन ये कितनी बड़ी बिडंबना है, कितना बड़ा मजाक है कि इसी देश में 3000 लोगों को सरेआम कत्ल कर दिया गया लेकिन आज पच्चीस साल बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिला है। कहीं न कहीं हमारे देश की आत्मा मर गयी है, जो दोषी लोगों को सज़ा देने के बजाय उन्‍हें संसद में भेज देती है। किताब की प्रस्तावना में खुशवंत सिंह ने लिखा है कि जिन लोगों ने दंगाइयों की भीड़ का सक्रिय संचालन किया और गुरुद्वारों और सिख मोहल्लों पर हमला करवाया, उनकी करतूतों के लिए सज़ा देना तो दूर, उन्हें प्रधानमंत्री राजीव गांधी से इनाम के तौर पर मंत्रिमंडल में शामिल होने का अवसर मिला। (पेज नं-XIII)

जरनैल सिंह ने स्वीकार किया कि मेरे विरोध करने का जो तरीक़ा था वो ग़लत था लेकिन जिस बात के विरोध में मैं खड़ा हूं, उस पर मुझे आज भी गर्व है। विरोध का तरीक़ा ग़लत होने क बावजूद विरोध का कारण महत्वपूर्ण है। आखिर क्या वजह है कि 11 साल बाद इस घटना का एफआईआर दर्ज हुआ? इस घटना के 25 साल हो गये, न्याय मिलने की बात तो दूर देश का कोई भी प्रधानमंत्री एक बार भी उस विडोज़ कॉलोनी में क्यों नहीं गया? दर्शन कौर जो इस किताब का लोकार्पण कर रही हैं, उन्‍हें बार-बार क्यों धमकाया गया? उनके सामने क्यों 25 लाख रुपये का ऑफर दिया गया और बयान बदलने की बात कही गयी? (दर्शन कौर, 1984 के दंगों से प्रभावित और जीवित बच पायीं एक पीड़िता हैं।)

ये किताब इसलिए लिखी गयी कि उस समय मीडिया ने अपनी ज़‍िम्मेदारी नहीं निभायी। उसे सही तरीके से कवर नहीं किया गया। इस घटना में पीड़ितों का पक्ष संवेदनशील तरीके से नहीं रखा गया। इस मामले में दूरदर्शन का रवैया संदिग्ध रहा है। दूरदर्शन के चरित्र की चर्चा जरनैल ने किताब में भी की है। उन्होंने लिखा है कि दूरदर्शन नरसंहार भड़काने में अपनी भूमिका पूरी शिद्दत से निभा रहा था। लगातार इंदिरा गांधी का शव और उसके आसपास खून का बदला खून के लग रहे नारों को प्रसारित किया जा रहा था। नानवटी आयोग को दिये गये अपने हलफ़नामे में अवतार सिंह बीर ने इस बात का जिक्र किया है। दूरदर्शन बार-बार सिख सुरक्षाकर्मियों’ द्वारा हत्या की बात दोहरा रहा था, जबकि आमतौर पर दंगों में भी दो वर्गों की बात कही जाती है, किसी वर्ग का नाम नहीं लिया जाता। दूरदर्शन पर सिख क़त्लेआम की एक भी खबर नहीं दिखायी गयी। अख़बार भी सही खबर देने के अपने धर्म को भूल चुके थे।

जरनैल सिंह का मानना है कि ये दंगा न होकर सुनियोजित तरीके से सरकारी कत्लेआम था। खुलेआम सिखों की हत्या की जा रही थी। इसे रोकना क्या प्रशासन की ज़‍िम्मेदारी नहीं थी? इस किताब ने कत्लेआम के दौरान खाकी वर्दी, प्रशासन, सरकार और राजनीति से जुड़े लोगों के रवैयों की विस्तार से चर्चा की गयी है। 31 अक्टूबर की रात बाकायदा कांग्रेस नेताओं की बैठक कांग्रेसी विधायक रामपाल सरोज के घर पर हुई, जहां ये निर्देश जारी हुए कि अब पूरी सिख कौम को सबक सिखाना है। सिखों और उनके घरों को जलाने के लिए रसायनिक कारखानों से सफेद पाउडर की बोरियां मंगवा पूरी दिल्ली में बंटवायी गयीं। (पेज नं 103)

अन्यायकर्ता और न्यायकर्ता नाम से एक शीर्षक है, जिसके भीतर सिरों की कीमत, भगत से बदला, कत्लेआम और सत्ता की सीढ़ी, सदियों के भाईचारे पर दाग़, दंगाई खाकी, देखती रही फौज, वर्दी ही कफन बन गयी, असहाय राष्ट्रपति, मौन गृहमंत्री और दंगे नहीं उपसंहार नाम से उपशीर्षक हैं। इन उपशीर्षकों के भीतर दिल दहला देनेवाली घटनाओं की चर्चा है। नानावटी आयोग की रिपोर्ट में पेज नंबर 87 पर सुल्तानपुरी के बयान दर्ज है, जिसमें कहा गया है, “सज्जन कुमार ने वहां एकत्रित भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि जिसने भी रोशन सिंह और भाग सिंह की हत्या की है, उन्हें 5000 रूपये इनाम दिया जाएगा। जो बाकी सिखों को मारेंगे, उन्हें प्रति व्यक्ति 1000 रुपये का इनाम दिया जाएगा” (पेज नं-61)।

दंगे के सामाजिक स्तर की सक्रियता के सवाल पर जरनैल सिंह ने स्पष्ट किया कि आमतौर पर भारतीय तेवर इस तरह की गतिविधियों में सक्रिय होने का पक्षधर नहीं है। लेकिन इस घटना के विरोध में लोग खुलकर सामने नहीं आये, उसे रोका नहीं। आखिर क्या कारण है कि इस घटना को अपनी आंखों से देखनेवाले कई गैर-सिखों में से एक भी गवाह के तौर पर सामने नहीं आया? यह पूरी तरह पॉलिटिकल कॉन्‍सपीरेसी रही है। उर्वशी के पूछे गये इस सवाल पर कि आप हिंदू-सिख को घुले-मिले रूप में देखते हैं। ऐसे में आप सोचते हैं कि एक संवाद की गुंजाइश है? जरनैल सिंह का सीधा जबाब रहा कि भाईचारे को सिर्फ और सिर्फ जस्टिस के जरिये ही कायम किया जा सकता है।
किताब का एक बड़ा हिस्सा उन लोगों की दास्तान को दर्ज करता है, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने पति और बच्चे खो दिये, जिनके परिवार उजड़ गये। जो किसी भी हालत में इस सदमे से उबर नहीं पाये हैं। जज जब दर्शन कौर से भगत को पहचानने की बात करता है, तब भगत का एक-एक लफ्ज उसे याद आ रहा था। भगत कह रहा था, “किसी सरदार को मत छोड़ो। ये गद्दार हैं। मिट्टी का तेल, हथियार सब कुछ है, पुलिस तुम्हारे साथ है। सरदारों को कुचल डालो।” (पेज नं-68)

अपने परिवार के लोगों को कत्लेआम में गंवाने वाले सुरजीत सिंह का कहना है कि जिलाधिकारी ब्रजेंद्र पूरी तरह से दंगाइयों के साथ मिले हुए थे। (पेज नं-94)

1984 में दिल्ली के मशहूर वेंकेटेश्वर कॉलेज में बीएससी (द्वितीय वर्ष) में पढ़ते हुए फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली भोली-भाली निरप्रीत को नहीं मालूम था कि एक दिन वो इस तरह अपनी मां से तिहाड़ के अंदर मिलेगी। लेकिन 1984 के सिख कत्लेआम में पिता को दंगाइयों के हाथों तड़पते हुए मरता देख वह बागी हो चुकी थी। (पेज नं-51)

लोगों के सवालों का जवाब देते हुए जरनैल सिंह ने एक बार फिर कहा कि उनके विरोध करने का तरीक़ा ग़लत था लेकिन यह सच है कि उस प्रकरण के बाद ही ये मुद्दा फिर से हाइलाइट हुआ। जब सबने अपनी मर्यादा का उल्लंघन किया, तो हमें भी करना पड़ा। आखिर इस घटना के बाद ही सरकार को ये क्यों याद आया? हमारा कोई राजनीतिक मक़सद नहीं है, मैं किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ नहीं हूं। हम गृहमंत्री के विरोध में नहीं हैं। मैं इसके जरिये ऐसा दबाव बनाना चाहता हूं कि लोगों की सोयी हुई आत्मा जागे। दोषियों को सज़ा मिले, जिससे कि आनेवाले समय में दोबारा ऐसी हिम्मत नहीं करे। इस मामले में वो ये भी मानते हैं कि अगर 1984 के दोषियों को सज़ा मिल गयी होती तो संभव है गुजरात में जो कुछ भी हुआ, वो करने की हिम्मत लोग नहीं जुटा पाते। हम इसके जरिये नागरिक अधिकारों को सामने लाने की बात कर रहे हैं। एक महिला श्रोता की ओर से उठाये गये इस सवाल पर कि इससे पंजाबियों को क्यों अलग-थलग रखा जाता है? जरनैल सिंह ने जबाब दिया कि ये मसला सिर्फ सिखों से जुड़ा हुआ नहीं है। ये देश के उन तमाम लोगों से जुड़ा है, जिनके साथ इस तरह की घटनाएं हुई हैं और होती है। उर्वशी बुटालिया ने जरनैल सिंह के इस काम को एक बड़ा कमिटमेंट करार दिया और इस दिशा में लगातार आगे बढ़ते रहने की शुभकामनाएं दी। इस प्रयास का असर बताते हुए सभागार में मौजूद एक पत्रकार ने सूचना दी कि आज हम जिस जगदीश टाइटलर के विरोध में बात कर रहे हैं, ये जानकर खुशी हो रही है कि यूके ने 84 के दंगे में शामिल होने के आरोप में उन्‍हें वीज़ा देने से इनक़ार कर दिया है।

सवालों के दौर ख़त्‍म होने के साथ ही लोगों ने इच्‍छा जतायी कि जरनैल सिंह ने किताब के जरिये जिस मुद्दे को उठाया है, वो एक सही दिशा में जाकर विस्तार पाये। ये किसी भी रूप में न तो महज विवाद का हिस्सा बन कर रह जाए और न ही एक कौम की प्रतिक्रिया के तौर पर लोगों के सामने आये। ये व्यवस्था के आगे दबाव बनाने के माध्यम के तौर पर काम करे जिससे कि न्याय की प्रक्रिया तेज़ और सही दिशा में हो सके। इस मौके पर यात्रा प्रकाशन की संपादक नीता गुप्ता ने कहा कि जरनैल सिंह ने जो काम किया है, उसके लिए उनकी हिम्मत की दाद देनी होगी। हमें उम्मीद है कि किताब के प्रकाशन से आपके प्रयासों को मज़बूती मिलेगी। पूरे कार्यक्रम के दौरान रंजना(सीनियर कमिशनिंग एडिटर,पेंग्विन) वैशाली माथुर (सीनियर कमिशनिंग एडिटर, पेंग्विन), एसएस निरुपम (हिंदी एडीटर,पेंग्विन)के सक्रिय रहने के लिए धन्‍यवाद दिया। सभागार में मौजूद श्रोताओं और विशेष रूप से उर्वशी बुटालिया का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि हम सबकी की ये नैतिक ज़‍िम्मेदारी है कि अपने-अपने स्तर से इस काम को आगे बढ़ाएं। उम्मीद की जानी चाहिए कि जरनैल सिंह की ये किताब 1984 में सिख कत्लेआम के प्रति संवेदनशील होने और इसकी आड़ में होनेवाली राजनीति को समझने में एक नयी खिड़की का काम करेगी। कार्यक्रम के दौरान जितनी तेज़ी से इस किताब की बिक्री शुरू हुई, उससे ये साफ झलकता है कि लोग इस घटना के प्रति संवेदनशील हैं। बकौल जरनैल सिंह पंजाबी में छपी इसी किताब की अब तक 3000 प्रति निकल चुकी है।

लोगों के बीच किताबों की पहुंच के साथ अन्याय के खिलाफ, न्याय के पक्ष में लोगों के स्वर मज़बूत होंगे.

Friday, November 6, 2009

बुजुर्ग पत्रकार प्रभाष जोशी नहीं रहे


देश के जाने-माने और हिन्दी के बुजुर्ग पत्रकार प्रभाष जोशी नहीं रहे। गुरुवार रात,भारत-आस्ट्रेलिया मैच देखने के दौरान दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। अफसोसनाक है कि जिस मैच को लेकर देर रात तक हॉस्टल में हो-हुडदंग होता रहा,उसी मैच के दौरान देश का एक बुद्धिजीवी पत्रकार हमेशा के लिए खामोश हो गया। पटना से जसवंत सिंह की लिखी विवादित किताब के लोकार्पण कार्यक्रम से करीब 11 बजे रात लौटने के बाद जोशी थकान महसूस कर रहे थे। घर के लोगों ने भी सलाह दी कि डॉ. से सम्पर्क करना चाहिए लेकिन मैच देखकर उस पर कुछ लिखने का लोभ वो रोक नहीं पाए।.. लेकिन दोनों में से कोई भी काम पूरा किए बगैर हमसे विदा हो लिए। जोशी ने जिस कागद-कारे स्तंभ से अपनी अलग पहचान बनायी उसका पहला लेख क्रिकेट पर ही था। अंत-अंत तक क्रिकेट उऩके जीवन के साथ जुड़ा रहा और एक हद तक क्रिकेट ही उनके मौत का कारण भी बना।
कहना न होगा कि प्रभाष जोशी उन गिने-चुने पत्रकारों में से रहे हैं जिनकी लोकप्रियता सिर्फ पठन-लेखन के स्तर पर नहीं रही है,उन्हें चाहने और माननेवालों की एक लंबी फेहरिस्त है। मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर सैकड़ों मीडियाकर्मी और पत्रकार ये कहते हुए आसानी से मिल जाएंगे कि आज वो जो कुछ भी है प्रभाषजी की बदौलत हैं। 12 सालों तक जनसत्ता अखबार का संपादन करते हुए उन्होंने एक खास तरह की पत्रकारिता का विस्तार किया। शिमला में उनसे जुड़े प्रसंगों को याद करते हुए अभय कुमार दुबे,संपादक सीएसडीएस ने हमें तब बताया था कि वो अकेले ऐसे संपादक थे जो किसी भी खबर के छप जाने के बाद माफी मांगने में यकीन नहीं रखते,छप गया सो छप गया। इसके साथ ही वो एक ऐसे संपादक थे जिन्होंने मालिक के आगे संपादक की कुर्सी को कभी भी छोटा नहीं होने दिया। बतौर बरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय, प्रभाष जोशी एक ऐसे पत्रकार रहे हैं जिनका भरोसा था कि पत्रकारिता के जरिए राजनीतिक स्थिति को भी बदला जा सकता है। वो पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे। इसलिए उन्होंने जितना लिखा उतना ही सामाजिक मसलों पर जाकर लोगों के सामने अपनी बात भी रखी। लोग उन्हें सुनने के लिए बुलाते थे।(एनडीटीवी इंडिया 9.20 बजे 6 नवम्बर 09)। आज से करीब एक साल पहले जब राजकमल की ओर से एक ही साथ पांच किताबों का लोकार्पण किया जा रहा था उस समय दिल्ली के त्रिवेणी सभाकार को मैंने इस तरह के कार्रयम में पहली बार खचाखाच भरा हुआ देखा था। इतना खचाखच कि देश के नामचीन पत्रकार से लेकर साहित्यकार सीढ़ियों पर बैठे नजर आए। स्वयं प्रभाष जोशी के शब्दों में आज चार पीढ़ी के लोग मौजूद हैं। कुछेक पत्रकारों को छोड़ दे तो सभागार में जनसत्ता-परंपरा के अधिकांश पत्रकार पहली बार वहां मौजूद नजर आए।
सत्ता में गहरी पैठ रखनेवाले पत्रकार प्रभाष जोशी जितने लोकप्रिय रहे हैं,अपने जीवनकाल उतने ही विवादों में बने रहनेवाले पत्रकार भी। बाबरी मस्जिद के दौरान जनसत्ता में छपनेवाली खबरों,उसकी प्रस्तुति को लेकर वो विवादों में आए,सती-प्रथा को लेकर छपे संपादकीय का लेकर वबेला मचा और हाल ही में एक साइट को दिए गए इंटरव्यू में आलोचना के शिकार हुए। प्रभाष जोशी की ऑइडियोलॉजी को लेकर भी काफी विवाद रहा है।अकादमिक क्षेत्र में राजकमल से प्रकाशित हिन्दू होने का धर्म उनकी लोकप्रिय किताबों में से है। लेकिन इधर पिछले दो सालों से हिन्दी स्वराज के पुर्नपाठ और विमर्श को लेकर काफी सक्रिय नजर आए। वो हिन्द स्वराज और गांधी के मार्ग के महत्वों की चर्चा करते हुए उनकी विचारधारा का विस्तार करने की बात करते रहे। बीते लोकसभा चुनावों में पैसे देकर पेड खबरें छापने और राजनीति का पिछलग्गू बन जानेवाले अखबारों को लेकर प्रभाष जोशी ने विरोध में एक मोर्चा खोल रखा था और उसे वो राष्ट्रीय स्तर पर एक अभियान का रुप देने जा रहे थे जिसके चिन्ह हमें हाल के लिखे गए उनके लेखों में साफ तौर पर दिखाई देने लगे थे। उनके इस अभियान में कुलदीप नैय्यर और हरिवंश जैसे वरिष्ठ पत्रकार भी शामिल रहे हैं।
इन सबके वाबजूद प्रभाष जोशी को एक ऐसे कर्मठ पत्रकार के तौर पर जाना जाएगा जो कि अपनी जिदों को व्यावहारिक रुप देता है,नई पीढ़ी के लोगों को गलत या असहमत होने पर खुल्लम-खुल्ला चैलेंज करता है,अपनी बात ठसक के साथ रखता है और सक्रियता को पूजा और अराधना को पर्याय मानता है। आज प्रभाष जोशी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि अगर हम उनके लेखन का पुनर्विश्लेषण करते हैं,पठन-पाठन के दौरान असहमति का स्वर जाहिर करते हैं,सहमति को व्यवहार के तौर पर अपनाते हैं और पैर पसारती कार्पोरेट मीडिया का प्रतिरोध करते हुए हिन्दी पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के तौर पर आगे ले जाते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मुझे उनका खास अंदाज में क्रिकेट पर लिखना,इनने,उनने और अपन जैसे शब्दों का प्रयोग अब तक एक खास किस्म की इन्डीविजुअलिटी को बनाए रखने के तौर पर लगा,कई बार इससे असहमत भी रहा लेकिन आगे से जनसत्ता में इन शब्दों के नहीं होने की कमी जरुर खलेगी। गरम खून के पत्रकारों के बीच कोई तो था जिसे बार-बार पटकनी देने की मंशा से लड़ते-भिड़ते और अपना कद बड़ा होने की खुशफहमी से फैल जाते। आज हमसे लड़ने-भिड़ने वाला नहीं रहा,फच्चर मत डालो को लिखकर चैलेंज करनेवाला नहीं रहा। अब बार-बार याद आएगा कागद-कारे..

Thursday, November 5, 2009

जरनैल सिंह की किताब का कल होगा लोकार्पण




एक पत्रकार की हैसियत से अपने लंबे मीडिया करियर के दौरान जरनैल सिंह ने क्या किया,किन-किन मसलों और मुद्दों को रिपोर्टिंग के दौरान लोगों के सामने लाने की कोशिश की,ये बताने की जरुरत शायद ही किसी न्यूज चैनल या अखबारों ने की हो। हमें सिर्फ इतना भर बताया गया कि जरनैल सिंह ने मौजूदा गृहमंत्री पर जूते फेंकने का काम किया और रातोंरात वो इसी काम को लेकर चर्चित कर दिए गए। इस हिसाब से पेंगुइन से प्रकाशित होनेवाली उनकी किताब कब कटेगी चौरासीः सिख क़त्लेआम का सच जिसका कि कल लोकार्पण होना है,जरनैल सिंह की कोशिश से ये दोतरफी कारवायी है। सिंह इस किताब के जरिए अपनी उस छवि को स्थापित करना चाहते हैं जिसमें कि उनके लंबे समय का लेखन और रिपोर्टिंग के अनुभव शामिल हैं,एक पत्रकार की हैसियत से राजनीतिक संदर्भों को विश्लेषित करने की कोशिश है और दूसरा अपनी उस छवि को ध्वस्त करना चाहते है जिसमें कि एक बेकाबू हो गए एक नागरिक/पत्रकार का सत्ता में बैठे लोगों के सामने गलत ही सही लेकिन अपने स्तर से विरोध दर्ज करना है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शुरु से उस फार्मूले पर काम करता आया है कि जो व्यक्ति जिस काम के लिए चर्चित हुआ है उसे उसी रुप में हायपरवॉलिक तरीके से ऑडिएंस/दर्शक के सामने पेश करे लेकिन ये फार्मूला कितना वाजिब है,इत्मिनान होकर सोचने की मांग करता है। बहरहाल,जरनैल सिंह की बनी नयी पहचान उन्हें किस हद तक परेशान करती है और अब तक के किए गए सारे काम,हालिया के एक काम के आगे कैसे फीका पड़ जाता है, ये सबकुछ शिद्दत से महसूस करने और उसे पाटने की कोशिश में ये किताब हमारे सामने है। ऐसे में अपनी रचनाधर्मिता और तार्किक समझ को इस जद्दोजहद के बीच बचाए रखना,जरनैल सिंह की उपलब्धि ही समझी जाएगी।
पेंग्विन से प्रकाशित,जरनैल सिंह की किताब कब कटेगी चौरासीः सिख क़त्लेआम का सच मूलतः हिन्दी में लिखी गयी है। इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद वैशाली माथुर ने I Accuse : The anti sikh voilence 0f 1984 नाम से किया है. लेखक/प्रकाशक के हिसाब से यह किताब 1984 के सिख क़त्लेआम से जुड़ी सच्चाईयों और सरकार की संवेदनशून्यता का एक सशक्त दस्तावेज़ है। क्योंकि 1884 का हुआ दंगा सिर्फ सिखों पर हुआ हमला नहीं था,बल्कि यह लोकतंत्र और इंसानियत पर हुआ हमला था। इस किताब के बारे में लिखते हुए मशहर कॉलमिस्ट और ट्रेन टू पाकिस्तान के लेखक खुशवंत सिंह का मानना है कि-'कब कटेगी चौरासी ऐसे घावों को हरा करती है जो आज तक नहीं भरे हैं। यह किताब उन सभी लोगों को पढ़नी चाहिए जो चाहते हैं कि ऐसे भयानक अपराध दोबारा न हो।
। जाहिर है किताब जिस सबूतों और संदर्भों को हमारे सामने पेश करती है और स्वयं लेखक जिस रुप में उसका विश्लेषण करता है उसके सामने इस दंगे में हताहत लोगों को दिया गया मुआवजा तुष्टिकरण की नीति का हिस्साभर है। ऐसा करके सरकार ने अपने विद्रूप चेहरे को ढंकने का भरसक प्रयास किया है। लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि यह किताब महज विवाद का हिस्सा बनने के बजाय उन कारवाईयों पर फिर से विचार करने का स्पेस पैदा करेगी जो कि लोकतंत्र की बहाली के नाम पर अंदुरुनी तौर पर उसका गला रेतने का काम करती है। जूता प्रकरण के हो-हंगामे के बीच जरनैल के जो सवाल दब गए वो सवाल उस किताब में फिर से सरकार के लिए एक चुनौती पैदा करते हैं- अब तक दोषियों का सजा क्या नहीं मिली? क्या प्रशासन तंत्र न्याय होने देगा? कब मिलेगा पीड़ितों को न्याय और कब कटेगी चौरासी? सरकार को इन सवालों को गंभीरता से लेने होंगे और इस किताब के जरिए 84 पर नए सिरे से बात होने की गुंजाइश पैदा हो सकेगी। इसके साथ ही हम उम्मीद करते है कि आनेवाले समय में जरनैल सिंह की पहचान केवल और केवल पी.चिदमबरम पर जूता फेंकनेवाले पत्रकार के तौर पर न होकर एक संवेदनशील और रिस्क कवर करते हुए तल्खी से अपनी बात रखनेवाले लेखक के तौर पर चिन्हित किया जा सकेगा।

Wednesday, November 4, 2009

संघर्ष के दो साल पर संपादकीय




जामिया मीलिया इस्लामिया से मीडिया की पढ़ाई,जी न्यूज से इन्टर्नशिप,दूरदर्शन के लिए रिपोर्टिंग और TV9 के मुंबई ब्यूरों के लिए सर्वेसर्वा के तौर पर काम करनेवाले तेजतर्रार युवा मीडियाकर्मी पुष्कर पुष्प चाहते तो आज अपने दौर के बाकी मीडियाकर्मियों की तरह एक फार्मूला लाइफ जी सकते थे। उनकी गर्दन पर भी आज किसी चैनल के प्रोड्यूसर का पट्टा टंगा होता,एक गाड़ी होती जिसके लोन अब तक चुक गए होते और दिल्ली एनसीआर में एक फ्लैट होता। लेकिन पुष्कर पुष्प ने एक मीडियाकर्मी की उलब्धियों और विकासक्रम को इस रुप में देखने के बजाय कुछ अलग,मौलिक और रचनात्मक काम की ओर अपने को लगाया। सबकुछ छोड़कर नौकरी करते हुए जो भी थोड़े पैसे जोड़े उसे लेकर एक दिन सबकी खबर लेनेवाले मीडिया की ही खबर लेने के इरादे से मीडिया मंत्र नाम से पत्रिका शुरु कर दी। साधनों की सहजता और खबरों के इस बाढ़ में आज चाहे तो कोई भी ऐसा कर सकता है लेकिन आज से दो साल पहले की बात सोचिए जब ये बात कॉन्सेप्ट के तौर पर बाकी पत्रिकाओं से बिल्कुल जुदा रहा है कि मीडिया की खबरों को लेकर भी पत्रकारिता की जा सकती है? मीडिया मंत्र की निगाह में इडियट बॉक्स के ताजा अंक के साथ मीडिया मंत्र पत्रिका ने दो साल पूरे कर लिए। इस पत्रिका को जिंदा रखने के लिए पुष्कर पुष्प को किस-किस स्तर की परेशानियों को झेलना पड़ा है,इसके कुछ हिस्से को मैंने भी बहुत ही नजदीक से महसूस किया है। पत्रकारिता के तोड़-जोड़ का संड़ाध धंधा बन जाने के बीच विज्ञापन मिलने से कहीं ज्यादा मिले हुए विज्ञापनों पर की जानेवाली ओछी राजनीति का शिकार मीडिया मंत्र अचानक से कैसे लड़खड़ा जाता है,ये सबकुछ एक झटके में हमारे सामने घूम जाता है जिसकी विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने संघर्ष के दो साल नाम से संपादकीय में लिखा है। संपादकीय का एक हिस्सा भावुक अभिव्यक्तियों से भरा है,संभवतः इसलिए हम जैसे लोगों के मामूली सहयोग को उन्होंने अपनी नजर से बहुत बड़ा करके पेश कर दिया है। वाबजूद इसके इस संपादकीय को इसलिए पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि पत्रकारिता के जिस क्लासरुम में पत्रकार के तौर पर समाज प्रहरी बनने की ट्रेनिंग दी जाती है,जोश में ही सही ये पत्रिका कैसे उसे व्यवहार के तौर पर अपनाने की कोशिश करती है,परेशान होती है,कई बार लगता है कि ये सब छायावादी नजरिए को ढोते हुए जीने औऱ पत्रकारिता करने की कोशिश भर है लेकिन फिर से अपने को रिवाइव करती है। सिद्धस्थ मीडियाकर्मियों और समीक्षकों की निगाह में ये वावलापन है क्योंकि बिना बाजार की गोद में बैठकर,छोटे-मोटे समझौते करने की चिंता किए बगैर ये संभव नहीं है,कार्पोरेट मीडिया के आगे जबरदस्ती पीपीहीआ बाजा बजाने जैसा काम है। उनके ऐसा कहने से संपादक का मनोबल टूटता है,वो घबराता है लेकिन फिर सवाल करता है कि आपको तो विरासत में एक बेहतरीन पत्रकारिता पूर्वज मिल गए लेकिन आप आनेवाली पीढ़ी को क्या देने जा रहे है? संपादकीय में उठाया गया यही सवाल सिद्धस्थ मीडियाकर्मियों की बौद्धिकता पर कई गुना भारी पड़ता है और यहीं पर आकर पुष्कर पुष्प तमाम तरह की मानिसक और साधनगत परेशानियों के वाबजूद मन का रेडियो बजने देने पर खुश नजर आते हैं। उन्हे मीडिया मंत्र को लेकर इस बात का गुमान है कि उन्होंने बाकी मंचों की तरह दबाब बनाकर विज्ञापन नहीं जुटाए,धमिकयां देने और फिर मांग न पूरे किए जाने पर निगेटिव खबरें का खेल नहीं किया. पांच हजार-दस हजार के विज्ञापन के लिए अपनी पहचान और आत्म सम्मान को गिरवी नहीं रख दिया। हम चाहेंगे कि इस संपादकीय पर एक नजर आप भी दें और विरासत में मिलनेवाली मीडिया की समीक्षा की नाप-तौल शुरु करें-
मीडिया मंत्र ने अपने दो साल पूरे कर लिए. पिछले अंक में ही इसके दो साल पूरे हो गए. लेकिन समय पर पत्रिका नहीं निकल पाने की वजह से पाठकों तक नहीं पहुँच पायी. इसलिए मीडिया मंत्र से जुड़े अपने अनुभवों और उससे जुडी कई बातों को हम पाठकों से नहीं बाँट सकें. इस कमी को इस अंक में पूरा करने की हम कोशिश कर रहे हैं. आगे हमारी कोशिश रहेगी कि तमाम मुश्किलों के बावजूद दुबारा ऐसा नहीं हो और समय पर पत्रिका पाठकों तक पहुंचे.यह अंक निकालने की स्थिति में हम नहीं थे. लेकिन ईटी हिंदी.कॉम के संपादक दिलीप मंडल, न्यूज़ 24 के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम और दिल्ली विश्विद्यालय से मनोरंजन चैनलों की भाषिक संस्कृति पर पीएचडी कर रहे विनीत कुमार के नैतिक समर्थन, उत्साहवर्धन और सहयोग की वजह से पत्रिका को जारी रखने में सक्षम हो सके.

यह दो साल बेहद संघर्षपूर्ण रहे. हर महीने पत्रिका के लिए कंटेंट से लेकर उसके लिए पैसे जुटाने का काम बदस्तूर जारी रहा. पत्रिका के बंद होने की तलवार हमेशा लटकी रही. कई बार ऐसी नौबत भी आई कि लगा पत्रिका बंद हो जायेगी. लेकिन हर बार कोई-न-कोई रास्ता निकल आया. शायद यह मीडिया मंत्र के पाठकों और शुभचिंतकों की दुआओं का असर था. सच मानिये तो इतनी दूर निकल आयेंगे, ऐसा कभी सोंचा नहीं था. साल 2007 में दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पत्रिका का विमोचन प्रभाष जोशी, मार्क टली, अजित भट्टाचार्य, अशोक वाजपेयी और आनंद प्रधान जैसे अपने - अपने क्षेत्र के दिग्गजों के हाथों हुआ. प्रेस क्लब खचाखच भरा हुआ था. एक ऐसी पत्रिका का विमोचन हो रहा था, जिसके पीछे कोई कारपोरेट नहीं था. शुद्ध रूप से कुछ जोशीले नौजवान पत्रकारों द्वारा एक नया जोखिम भरा वैकल्पिक मीडिया का प्रयोग होने जा रहा था. एक ऐसा प्रयोग जिसके शुरुआत से ही इसके बंद होने के कयास लगाये जा रहे थे. ज्यादातर लोगों को उम्मीद नहीं थी कि पत्रिका लम्बे समय तक चल पाएगी, . दो साल की बात दूर दो महीने भी चल पाएगी कि नहीं, इसपर लोगों को शक था. यह सोंच गलत भी नहीं थी. सुना था कठिन काम है. बिना कारपोरेट के मदद के या बिना जुगाड़ फिट किये मामला आगे चल नहीं सकता. इन दोनों में से कुछ भी हमारे पास नहीं था. यदि कुछ था तो बस ढेर सारा उत्साह, थोडी सी जिद्द और थोडी सी हिम्मत. यही हमारी वास्तविक पूंजी थी.

दो-ढाई साल तक टेलीविजन की नौकरी करने के बाद जो थोडी बहुत बचत हुई थी, उस पूरी बचत को पत्रिका को शुरू करने में इस अतिशय उम्मीद के साथ लगा दिया कि आगे बढ़ते हैं कोई-न-कोई रास्ता जरूर निकेलगा. पत्रिका तो निकल गयी लेकिन दो अंक बाद ही इसके बंद होने का संकट सामने आ गया. पत्रिका के साथ जुड़े कई दोस्त किसी-न-किसी कारणवश दूर होते चले गए. अब सवाल सामने था कि पत्रिका को आगे चलाया जाए या नहीं. यदि चलाया जाए तो कैसे ? संसाधनों के नाम पर बहुत सीमित चीजें थी. आखिरकार निश्चय किया कि अंतिम दम तक पत्रिका को चलाने की कोशिश की जाए. ताकि जिंदगी में कभी इस बात का मलाल न रहे कि हमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश नहीं की और संघर्ष किये बिना ही मैदान छोड़कर चले गए.

फिर एक नए संघर्ष की शुरुआत हुई. पत्रिका को बचाने और उसे चलाने की जद्दोजहद. पत्रिका की कीमत को कम करने के लिए खुद ही सारे काम करना शुरू किया. संपादक, रिपोर्टर, टाइपिस्ट, कुरियर वाला, प्रूफ़ रीडर, आर्ट डिजाइनर, डिस्ट्रीब्यूटर सबकी भूमिका एक ही व्यक्ति निभा रहा था. चिलचिलाती धूप में फिल्म सिटी और न्यूज़ चैनलों के सामने स्टाल लगाकर पत्रिका को बेचना शुरू किया.वह अपने आप में एक बेहद अच्छा और सिखाने वाला अनुभव था. पत्रिका के संपादक को खुद स्टाल लगाकर अपनी पत्रिका को बेचते देखना कई पत्रकारों के लिए आश्चर्य की बात थी. स्टाल पर आकर कई पत्रकार मुझसे लगातार बात कर रहे थे. ऐसे प्रयास की दाद दे रहे थे. मुझे बिना किसी झिझक के ऐसा करते देखना उनके लिए आश्चर्य की बात थी. ऐसा आज भी भी कोई कर सकता है सहसा इसपर कई पत्रकार विश्वास नहीं कर पा रहे थे. रवींद्र, हरिश्चंद्र बर्णवाल, राजीव रंजन, निमिष कुमार, राजकमल चौधरी, राजेश राय, ओम प्रकाश, मुकेश चौरसिया, आशुतोष चौधरी जैसे कई ऐसे पत्रकार मित्र थे जो लगातार मेरे इस काम में मदद कर रहे थे. यह ऐसे मित्र हैं जिन्हें मेरी चिंता हैं और जो मीडिया मंत्र के साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़े हुए हैं. यह ऐसे मित्र हैं जिनका शुक्रिया भी अदा नहीं किया जा सकता.

लेकिन यह सब करने के बावजूद पत्रिका को आगे बढ़ाना मुश्किल हो रहा था. यह ऐसा समाज है जहाँ हौसला बढ़ाने वाले से ज्यादा हौसला तोड़ने वाले लोग मौजूद हैं. आपके कदम जरा डगमगाए नहीं कि ऐसे लोग आपको लताड़ना शुरू कर देते हैं. बिना पल गवाएं ये आपको निकम्मा, नाकाबिल और असफल करार देते हैं. ऐसा ही कुछ उस वक़्त मेरे साथ हो रहा था. ऐसे मोड़ पर दो ऐसे लोग आये जिन्होंने पत्रिका को फिर से खडा करने में अहम भूमिका निभाई. इनमें से एक ईटी हिंदी.कॉम के संपादक दिलीप मंडल और दूसरे टोटल टीवी के निदेशक विनोद मेहता. दिलीप मंडल ने उस वक्त न मेरा केवल हौसला बढाया, बल्कि आर्थिक मदद करने की भी पेशकश की. उनका सम्मान करते हुए मैंने मीडिया मंत्र के लिए 500 रुपये की राशि स्वीकार कर ली. वे हर महीने मीडिया मंत्र के लिए कुछ आर्थिक मदद देना चाहते थे. लेकिन मैंने उसे अस्वीकार करते हुए कहा कि अनुदान के आधार पर मीडिया मंत्र को मैं नहीं चलाना चाहता. कोशिश करते हैं, असफल रहे तो आपसे मदद जरूर मांगेंगे. उस वक़्त वह 500 रुपये का नोट मेरे लिए बेहद अहम था. हालाँकि आर्थिक रूप से वह कोई बड़ी मदद नहीं थी और न ही उससे पत्रिका को फिर से पटरी पर लाया जा सकता था. लेकिन नैतिक तौर पर बड़ा संबल था. एक संघर्षरत पत्रकार अपने से वरिष्ठ पत्रकार से इससे ज्यादा और क्या चाहेगा.

ऐसे ही कठिन परिस्थितियों में टोटल टीवी के निदेशक विनोद मेहता मदद करने के लिए सामने आये, जो शायद नहीं आते तो मीडिया मंत्र का सफर आगे नहीं बढ़ पाता. उस वक़्त उनसे कोई गहरी जान-पहचान नहीं थी. तीसरी ही मुलाकात थी. उस मुलाकात में जैसे ही वे परिस्थितियों से वाकिफ हुए तो उसी वक़्त उन्होंने एक चेक काटकर और साथ में टोटल टीवी का विज्ञापन देकर कहा कि यह एक बेहतर प्रयास है और इसे आगे जारी रखना जरूरी है. आप ईमानदारी से अपना काम करते रहिए और कभी ऐसा लगे कि अब कोई रास्ता नहीं बचा है तो मुझसे मदद मांगने में हिचकिचाना नहीं. आगे अपने इस वादे को उन्होंने निभाया भी.

मीडिया मंत्र का आगे का सफर शायद और भी कठिन था. सवाल अब अपनी साख और ईमानदारी को बचाए रखते हुए आगे बढ़ने का था. कई ऐसे प्रस्ताव मिले जिन्हें स्वीकार कर आसानी से तमाम आर्थिक समस्याओं से छूटकारा पाया जा सकता था. लेकिन इन प्रस्तावों को स्वीकार करने का मतलब था, अपनी साख और ईमानदारी को गवां देना. इस दौरान कई लोगों के दोहरे चेहरे देखने का मौका भी मिला. ये वो लोग थे जो हरेक दूसरे मंच पर सच्ची पत्रकारिता और उससे जुडी बड़ी - बड़ी बातें करते नहीं थकते. लेकिन शायद यही लोग सबसे ज्यादा पत्रकारिता का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं. पत्रकारिता का एक तरह से गला घोंट रहे हैं. ऐसे लोगों की कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर है. ये लोग बेहद ताक़तवर हैं. लेकिन अपनी ताकत का इस्तेमाल अपनी स्वार्थसिद्धि में कर रहे हैं. इन्हें नए पत्रकारों से चरणवंदना की अपेक्षा है और जो यह नहीं करता उनकी नजर में वे पत्रकार बनने के लायक नहीं. यही लोग सबसे ज्यादा नयी पीढी के पत्रकारों को पानी पी-पी कर कोसते हैं. लेकिन यदि नयी पीढी के पत्रकार इस पीढी के पत्रकारों से सवाल पूछे कि आपने हमें क्या दिया है? आपको पत्रकारिता की एक शानदार विरासत मिली थी. लेकिन नयी पीढी के लिए आप कैसी विरासत छोड़कर जा रहे हैं.

पत्रकारीय विचार - विमर्श की दृष्टि से इस साल जून-जुलाई का महीना काफी गहमागहमी भरा रहा। ऐसे मौके कम ही आते हैं जब एक ही समयावधि में कई जगहों पर पत्रकारिता से जुड़े अलग-अलग मुद्दों पर लगातार चर्चा हो रही हो. जून - जुलाई महीने में तीन महत्वपूर्ण संगोष्ठियाँ हुई. पहली संगोष्ठी टेलीविजन पत्रकार स्व.शैलेन्द्र सिंह की स्मृति में हुई. हालाँकि यह एक शोकसभा थी, लेकिन न्यूज रूम के टेंशन को लेकर भी ऐसी बातें उठी, जो बेहद गंभीर है. बकौल आईबीएन-7 के एडिटर (स्पेशल एसाइनमेंट) प्रभात शुंगलू - 'हमलोग जिस न्यूज रूम में काम करते हैं वह नर्क बन चुका है'. प्रभात शुंगलू का यह बयान अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है. इस मुद्दे पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में इतना खुलकर बोलने की हिम्मत जुटा लेना अपने आप में बड़ी बात थी. दूसरे टेलीविजन पत्रकार इतनी खुलकर बोलने की हिम्मत तो नहीं जुटा पाए, लेकिन इशारा जरूर कर गए. दूसरी संगोष्ठी स्व.एस.पी.सिंह की 12 वीं पुण्यतिथि के मौके पर हुई. इसमें भी एस.पी.सिंह की पत्रकारिता और अब हो रही पत्रकारिता के संदर्भ में बात हुई. लेकिन 11 जुलाई को हुई तीसरी संगोष्ठी सर्वाधिक चर्चा और विवादों में रही. यह संगोष्ठी स्व.उदयन शर्मा के स्मृति में हुई. हरेक साल उदयन शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट उनके जन्मदिन वाले दिन यानि 11 जुलाई को एक स्मृति सभा का आयोजन करती है. इस मौके पर रफी मार्ग स्थित कॉन्सटीट्यूशन क्लब प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपादकों और पत्रकारों से खचाखच भरा हुआ था. संगोष्ठी में 'लोकसभा चुनाव और मीडिया को सबक' विषय पर परिचर्चा हुई और इस दौरान काफी गरमा - गर्मी भी हुई. अपनी - अपनी बारी आने पर वरिष्ठ पत्रकारों ने अपनी बात रखी. ज्यादातर वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों ने वर्तमान में हो रही पत्रकारिता पर चिंता व्यक्त की और वर्तमान पत्रकारिता को जी भर कर के कोसा. हम जैसे युवा पत्रकारों के लिए बड़े आर्श्चय की बात थी कि आखिर इस सभागार में पत्रकारिता के नाम पर जो आलाप किया जा रहा है, उसके लिए दोषी कौन है. पिछले 10-15 साल से यही लोग भारतीय पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे हैं. फिर दोष किसे दिया जा रहा है. चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय ने इसी सभा में एक बड़ी मार्के की बात कही - 'आज के कई संपादक एडिट पेज पर लिखकर नैतिकता की दुहाई देते हैं. लेकिन क्या अपने संस्थान में फैले अनैतिकता के खिलाफ आवाज उठाते हैं. हमको खुद को गालियाँ देनी चाहिए. अपने अंदर झाँकने की जरूरत है.' यह बात जितनी शिद्दत से कही गयी, काश उसको व्यवहार में भी लाया जा सकता तो पत्रकारिता के नाम पर आलाप करने की जरूरत ही नहीं पड़ती. उसी संगोष्ठी में एक दोहरा मापदंड भी देखने को मिला. संगोष्ठी के दौरान दो ऐसे बयान आये जिसपर वहां मौजूद कई पत्रकारों को कड़ी आपत्ति थी. एक बयान आईबीएन-7 के मैंनेजिंग एडिटर आशुतोष और दूसरा बयान केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल की तरफ से आया. आशुतोष ने आज के हालात में हो रही पत्रकारिता को कुछ जस्टिफाय करने की कोशिश करते हुए कहा कि क्या 1977 में ऐसा नहीं होता था. क्या उस समय प्रायोजित खबरें नहीं छपते थे. क्या उस समय ऐसे भ्रष्ट पत्रकार नहीं थे. यह बात वहां बैठे कुछ पत्रकारों को इतनी नागवार गुजरी और इतना शोर मचाया गया कि आशुतोष को अपनी बात अधूरी ही छोड़कर मंच से उतरना पड़ा. दूसरा बयान कपिल सिब्बल की तरफ से आया. कपिल सिब्बल पत्रकारों को ठेंगा दिखाते हुए कहते हैं कि आप क्या लिखते हैं, इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. इसपर भी वहां बैठे पत्रकारों को आपत्ति होती है. लेकिन विरोध कपिल सिब्बल के सभागार से चले जाने के बाद दर्ज कराया जाता है. यह वही पत्रकार थे जो आशुतोष की आवाज को शोर में दबा चुके थे. ऐसा नहीं है कि आशुतोष की बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ. लेकिन यहाँ सवाल दोहरे मापदंड का है. ऐसे सभागार में जहाँ पत्रकारिता और नैतिकता की बड़ी - बड़ी बातें की जा रही थी वहीँ पर एक सी परिस्थिति में दो तरह के मापदंड अपनाएं जा रहे थे. ऐसे में पत्रकारिता में सुधार की गुंजाईश की आप परिकल्पना भी आप कैसे कर सकते हैं. वैसे मेरा अपना मानना है कि बाहर ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जिसे आप पत्रकारिता के लिए शुभ संकेत मान सकते है. अच्छे और सच्चे पत्रकारों की कमी नहीं है. यदि जरूरत है तो सिर्फ इनको बढ़ावा देने की. पत्रकारिता की दुनिया अपने आप ही बदल जायेगी।

Wednesday, October 28, 2009

नए टीवी सीरियलः स्त्री-चिंता या छलना का पुनर्पाठ


मूलतः प्रकाशितः हंस,स्त्री विमर्शः अगला दौर स्मृति प्रभा खेतान
संपादकः राजेन्द्र यादव,अतिथि संपादकः अर्चना वर्मा,बलवंत कौर
मूल्यः35 रुपये/

भारतीय टेलीविजन में पिक्चर ट्यूब के दम पर पैदा की जानेवाली उत्सवधर्मिता के बीच पहले बालिका वधू और फिर उसका अनुसरण करते हुए उतरन,लाडो न आना इस देश में और अगले जनम मोहे बीटिया ही कीजौ जैसे दर्जनों समस्यामूलक सीरियलों के प्रसारण ने मौजूदा टेलीविजन विश्लेषण के लिए एक नया संदर्भ पैदा किया है। हालांकि समाज विज्ञान के लिहाज से इन संदर्भों में नया कुछ भी नहीं है लेकिन पिछले सात-आठ सालों में टीवी सीरियलों में सास-बहू चरित्रों की अतिशयता ने जहां इसे सास-बहू के प्रतिशोध,घरेलू झगड़ों औऱ विवाहेतर संबधों का पर्याय बना दिया,उच्च मध्यवर्ग के चरित्रों के बीच आए दिन की बदलती जीवन शैली ,जूलरी और पोशाकों ने इसे स्त्री-फैशन का संदर्भ कोश भर बनाकर छोड़ दिया,ऐसे में ये संदर्भ अपने आप ही अप्रासंगिक होते चले गए। इन सीरियलों से गुजरते हुए आप कभी भी स्त्री के वर्गीय चरित्र,घरेलू हिंसा एवं श्रम और बदलती सामाजिक संरचना के बीच स्त्री जैसे सवालों पर सोच नहीं सकते। सास-बहू सीरियलों ने स्त्री की छवि और उसकी उपस्थिति के दायरे को जितना सीमित किया है उसी अनुपात में विश्लेषण के दरवाजे भी छोटे होते चले गए। लेकिन पिछले एक साल में सास-बहू सीरियलों से अलग स्त्री-चिंता पर आधारित सीरियलों की जो नयी खेप आयी है,उसे देखते हुए इन सारे सवालों से गुजरना अनिवार्य लगता है। यहां से टेलीविजन के नए संदर्भ पैदा होते हैं।

मुख्यधारा की मीडिया का अनुसरण करते हुए अगर समस्यामूलक इन सीरियलों को सामाजिक विकास का माध्यम मान लिया जाए तो टेलीविजन फिर से उन एजेंडे की तरफ लौटता नजर आता है जिसे कि दूरदर्शन ने शुरु से अपनी प्रसारण नीति के लिए तय कर रखा है। स्त्री और सामाजिक समस्याओं को लेकर सीरियल प्रसारित करनेवाले निजी चैनल बिल्बर श्रैम के उन निर्देशों को पालन करते नजर आते हैं जिनके अनुसार विकासशील देशों में टेलीविजन का अर्थ अनिवार्य रुप से सामाजिक विकास करना है। लेकिन इतना तो हम भी जानते हैं कि निम्नवर्गीय स्त्रियों पर फीचर दिखाते हुए भी दूरदर्शन ने भी अपने घाटे की भरपाई के लिए शांति ,स्वाभिमान और वक्त की रफ्तार जैसे सीरियलों का प्रसारण किया और दूसरी तरफ उपभोक्ता संस्कृति और बाजारवाद के बीच करीब आठ-नौ सालों से टीवी सीरियल को ‘वूमेन स्पेस’ बनानेवाले चैनल इसे सामाजिक विकास का माध्यम के तौर पर क्यों प्रसारित करना चाहते हैं? फिर इन दोनों स्थितियों को जानते-समझते हुए भी मौजूदा टीवी सीरियलों में ऐसा क्या है जो कि इसे सामाजिक विकास का माध्यम और स्त्री दुनिया को समस्यामूलक विमर्शों के तहत विश्लेषित करने की ओर से जाते हैं?

पहली बात तो यह कि पिछले सात-आठ सालों में सास-बहू सीरियलों के जरिए टेलीविजन ने स्त्री की जिस छवि को स्थापित करने की कोशिश की है,जिन घटनाओं को समस्या के तौर पर उठाने का प्रयास किया है,समस्यामूलक सीरियलों ने उनके बरक्स कहीं बड़ी समस्याओं को लेकर दर्शकों को बांधने की कोशिश की है। उतरन के भरोसे पल रही इच्छा,शादी के झूठे दिलासे में ठाकुर के हाथों चंद रुपयों में बेच दी जानेवाली अगले जनम मोहे बीटिया ही कीजौ की ललिया, लड़का-बच्चा नहीं जनने की वजह से अम्मां के घर बहू बनकर रहने का सपना लिए और अब नौकरानी बनकर रहनेवाली न आना लाडो इस देश में की चंदा(चंदा-इस घर में बहू बनकर आना एक धोखा था और आज इस घर में नौकरानी बनकर रहना सच है) और बिरजू के नीची जाति की होने की वजह से प्रेम से बेदखल कर दी जानेवाली मितवा दो फूल कमल के की बेला,ऐसे दर्जनों चरित्र हैं जो कि दर्शकों की ओर से संवेदना बटोरने के स्तर पर सास के षड्यंत्रों की शिकार पार्वती, रानी, वैदेही, काकुल और आंचल को बहुत पीछे धकेल देती है। ललिया के मां-बाप और छोटे-छोटे भाई-बहनों सहित पूरे-पूरे दिन भूखे पेट काटने के आगे,अदना दो ठेकुए के लिए ‘हमहुं तो छोट जात हैं,हम कहां बामन-पंडित है’ बोलकर अपनी जाति बताने के आगे,पन्द्रह साल में ही सुगना के विधवा हो जाने के आगे, भरी महफिल में सात साल की हिचकी और बाद में अठारह साल की हो जानेवाली इच्छा के जलील किए जाने के आगे और हरियाणा के बीरपुर में अभी-अभी जन्मी बच्ची को जहरीले दूध के हवाले करनेवाली हजारों मांओं के आगे इन सारी सास-बहू सीरियलों के चरित्रों की तकलीफ दर्शकों के लिए बहुत स्वाभाविक नहीं रह जाते। जाति,वर्गीय-चरित्र,सामाजिक हैसियत,लिंग-भेद और सामाजिक कुप्रथा की शिकार इन स्त्री-चरित्रों के आगे, सात-सात,आठ-आठ सालों से आदर्श बहू,परिवार और विवाह संस्था को बचानेवाली स्त्री-चरित्र दर्शकों के भीतर संवेदना पैदा करने की ताकत खो देते हैं। अब की ये स्त्री चरित्र टेलीविजन दर्शकों के लिए ज्यादा स्वाभाविक लगते हैं। सास-बहू सीरियलों को ये चरित्र मेलोड्रामा करार देते हैं। यहां पर आकर टेलीविजन अपनी आलोचना स्वयं करता नजर आता है। ऐसे में उत्सवधर्मी सास-बहू सीरियलों और समस्यामूलक सीरियलों के बीच एक तुलनात्मक स्थिति बनती है जो यह बताती है कि स्त्रियों की समस्याओं का वर्गीय चरित्र होता है,देश की सारी स्त्रियों को देखने-समझने के एक ही आधार बिंदु तय नहीं किए जा सकते,स्त्री की पहले बुनियादी चिंता पेट,लिंग-भेद और जातिगत स्तर पर किए जानेवाले भेदभाव को लेकर है। पहले इसे समझना जरुरी है।

कुछेक हजार में ठाकुर के हाथों बेच दी गयी ललिया अब दक्खिन टोला के बजाय महल में रहती है लेकिन लाखों रुपये दहेज में देने के वाबजूद सास लीलावती के कुचक्र की शिकार हुई वो रहनेवाली महलों की की रानी के झोपड़पट्टी में रहने के दर्द पर ललिया के महल में रहने का दर्द कितना गुना भारी पड़ता है,यहां स्त्री के वर्गीय चरित्र और जातिगत समस्याओं को देखने का एक नया संदर्भ बनता है। स्त्री-छवि के सवाल पर यहां दोनों तरह के सीरियलों को शामिल करें तो वायनरी ऑपोजिशन का फार्मूला चरित्रों के बजाय परिस्थितियों पर आकर लागू होता है और समस्या का दायरा परिवार से बढ़कर समाज तक जाता है। सास-बहू सीरियलों के लगभग सारे स्त्री-चरित्र घरेलू कुचक्र की शिकार होती हैं। ये सारे चरित्र उच्च मध्यवर्ग से आते हैं,खाने-पीने और पहनने के स्तर पर कहीं कोई परेशानी नहीं है। भौतिक स्तर का अभाव नहीं है। आंसुओं को ढोती हुई भी वो गहनों और कीमती पोशाकों से लदी-फदी स्त्रियां है जो बौद्धिक क्षमता और शिक्षा के स्तर पर यह देश की औसत स्त्रियों से कई गुना आगे है लेकिन सास की कारवाईयों के आगे घुटने टेक देती हैं। पति के विवाहेतर संबंधों को चुपचाप बर्दाश्त करती है और कई जगहों पर उसके प्रति सहानुभूति भी व्यक्त करती है लेकिन कहीं भी किसी भी बात के लिए प्रतिरोध जाहिर नहीं करती और दिलचस्प है कि करीब सात-आठ सालों तक इन चरित्रों पर आदर्श बहू का लेबल चस्पाया जाता रहा। मीहान इस तरह की स्त्रियों का विस्तार से चर्चा करती हैं और स्पष्ट करती हैं कि सीरियल ऐसे चरित्रों को अच्छी स्त्री का दर्जा देता है। दूसरी तरफ ललिया सास-बहू सीरियलों की चरित्रों- काकुल(जिया जले),रानी(वो रहनेवाली महलों की) और वैष्णवी(माता की चौकी सजा के रखना) जैसी चरित्रों की हैसियत के आगे कुछ भी नहीं है। उसके गले में पीतल की ताबीज से लटकी लाल सूत भर है, निपट है,समाज जिसे सामाजिक तौर पर साक्षर मानता है वो नहीं है लेकिन सामाजिक तौर पर पितृसत्ता से लगातार टकराती है। उतरन की हिचकी, अम्मो के दर्द को समझते हुए चमकी के साथ काम करती है,बड़ी होकर स्कूल में पढ़ाती है। पन्द्रह साल में ही वैधव्य धारण करनेवाली सुगना(बालिका वधू), श्याम से पहले प्रेम और फिर पुर्नविवाह करने का साहस जुटाती है। बसंत की तीसरी पत्नी बनकर आयी गहना(बालिका वधू) बसंत की इच्छाओं का प्रतिरोध करती है। ये चरित्र स्त्री-मुक्ति की संभावनाओं का विस्तार करती नजर आती है जिसे कि स्त्री-विमर्श की मान्यताओं को भी समर्थन प्राप्त है।

समस्यामूलक सीरियलों के ये वो संदर्भ हैं जो कि भारत सरकार की ओर से सामाजिक न्याय,पुनर्विवाह,स्त्री अधिकार और साक्षरता मिशन के अधिनियमों को मजबूती प्रदान करते हैं। सास-बहू सीरियलों के चरित्र जहां परंपरा और संस्कार के नाम पर विवाह और परिवार संस्था को बचाने की कोशिश में लगे रहे,स्त्री-मुक्ति के नाम पर अपने को मन का पहनने और शॉपिंग करने तक सीमित कर दिया वहीं समस्यामूलक सीरियलों के चरित्र जमीनी स्तर पर बदलाव करते नजर आते हैं। टेलीविजन की स्त्री-दर्शक मूलतः नागरिक हैं और उनके लिए इसी हैसियत से कार्यक्रम प्रसारित किए जाने चाहिए,इस भरोसे के साथ प्रसारित किए जानेवाले इन नए सीरियलों ने अपने को सामाजिक विकास के साथ जोड़कर देखने की गुंजिश पैदा की है। इन सीरियलों ने स्त्री के स्टेटस के सवाल को स्त्री अधिकारों पर लाकर खड़ा किया है।

लेकिन सामाजिक कुरीतियों और समस्याओं को आधार बनाकर दिखाए जानेवाले सीरियलों पर दूसरे पक्ष से विचार करें तो कुछ अलग ही समझ बनती है। पहली बात तो यह कि हमें यह ठीक से समझ लेना होगा सास-बहू सीरियलों के एक-एक करके बंद होते जाने के पीछे टीवी समीक्षकों के प्रयासों के बजाय स्वयं टेलीविजन का अर्थशास्त्र है जिसने उसे आगे चलने की स्थिति में नहीं रहने दिया और दूसरा समस्यामूलक सीरियलों के लगातार लोकप्रिय होते रहने की बड़ी वजह टेलीविजन की स्वाभाविकता के संदर्भ बिन्दु बदल जाने की घटना है। जब हम इन दोनों बातों पर गौर करते हैं तो समस्यामूलक सीरियलों को सामाजिक विकास का पर्याय मानने में थोड़ी परेशानी जरुर होती है।

टेलीविजन का एक सर्वभौम फार्मूला है कि वह संदर्भों और घटनाओं को स्वाभाविक बनाने का काम करे। सास-बहू की लोकप्रियता के जो भी आधार बने और जिसने सीरियल देखने की संस्कृति को स्थापित किया उसके पीछे भी टेलीविजन का यही फार्मूला काम करता रहा। करवाचौथ में सारी स्त्रियां उसी तरह से व्रत रखती हैं,उसी तरह से सजती-संवरती हैं,परिवार को बचाए रखने के लिए उसी रानी की तरह घुट-घुटकर जीती है जैसा कि क्योंकि सास भी कभी बहू थी,कहानी घर-घर की और वो रहनेवाली महलों की जैसे सीरियलों में दिखाया जाता है। नतीजा यह होता है कि इसके जरिए एक नए ढंग की टेलीविजन की प्रस्तावित संस्कृति तो जरुर पनपने लग जाती है जो कि हमें बदलते फैशन और व्यवहार के तौर पर दिखाई देते हैं लेकिन इससे समाजे के भीतर के अन्तर्विरोध कम नहीं होते और संभावनाओं के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। ऐसे में टेलीविजन समाज की अच्छाई और बुराईयों का विभाजन करने और उसे रेखांकित करने के बजाय उसे स्वाभाविक करार देता नजर आता है। सास-बहू सीरियलों की अधिकांश स्थापनाएं स्त्री के विरोध में है लेकिन वो इतनी स्वाभाविक है कि दर्शकों की ओर से इसे लंबे समय तक स्वीकृति मिल जाती है। इसके ठीक बाद समस्यामूलक सीरियलों की प्रासंगिकता बढ़ती है तो उसके पीछे भी टेलीविजन द्वारा स्वाभाविकता के संदर्भ बिन्दु तलाशने का ही फार्मूला काम आता है।

बालिका वधू एक सामाजिक और स्वाभाविक सच है,उतरन के भरोसे सपने बुननेवाले बच्चों की दुनिया एक स्वाभाविक सच है,शादी-ब्याह में छोटी जाति की स्त्रियों की जरुरत एक स्वाभाविक सच है(ठकुराइन-धनिया,लड़की को नहाने का पानी डालने के लिए किसी छोट जात की औरत को लेकर आ..अगले जनम मोहे बीटिया ही कीजौ) और स्त्री के बच्चा नहीं जनने पर उसे छोड़कर बच्चा पैदा करनेवाली स्त्री के तौर पर दूसरे खिलौने को लाना स्वाभाविक सच है,( अम्मां- तू बस पुराने खिलौने की जिद पकड़कर बैठ गया। म तो तनै नया खिलौना दे रही थी।..लाडो न आना इस देश में) समस्यामूलक सीरियलों में ये सारी स्वाभाविकता शामिल हैं और शुरुआत के एपिसोड को देखकर इसके प्रतिरोध में कारवाई होने की गुंजाईश बनती नजर आती है। लेकिन तीस-पैंतीस एपिसोड तक समस्याओं के स्वाभाविक तौर पर उठाए जाने के बाद अतिरेकीपन-आनंदी,ललिया,अम्मो की व्यथा और दादी सा,अम्माजी और ठकुराइन जैसे चरित्रों के अतिशय क्रूरता के बीच उलझकर रह जाते हैं। किसी भी स्तर पर प्रतिरोध के बजाय उस संरचना के भीतर जीने की स्वाभाविकता ज्यादा प्रभावी हो जाती है। ऐसे में स्त्रियों की ये छवि वास्तविकता को खत्म कर देती हैं और औसत यथार्थ में बदल जाती है। सूसन सौंटगै छवियों के जरिए व्यक्त वास्तविकता को इसी रुप में विश्लेषित करती हैं। इसके साथ ही यहां आकर ये सीरियल सास-बहू सीरियलों की स्वाभाकिता की राह पकड़ लेते हैं जहां आकर दर्शक इन सीरियलों को सिर्फ परिधान,परिवेश और संदर्भों के स्तर पर इसे अलग पाता है नहीं तो यहां भी उत्सवधर्मिता है, हरेक मौके पर ईश्वर के आगे जाने का रिवाज यहां भी कायम है, मुसीबत में भगवान भरोसे छोड़ देने की आदतें है और अपनी बेहतरी का अंतिम विकल्प पुरुषों की छत्रछाया ही साबित होती है। टश्मान के शब्दों में इस तरह घिसी-पिटी छवियों को स्थापित करके उसके सांकेतिक विनाश(symbolic annihilation of women) का काम किया जाता है। यहां भी स्त्री की कोई स्वतंत्र छवि नहीं बनने पाती है और पुनर्विवाह के लिए हिम्मत जुटानेवाली बालिका वधू की सुगना भी ‘मेरी वजह से मायकेवालों का सिर कभी नीचा न होगा’ के संकल्प के साथ घर से विदा लेती है। यही पर आकर इन नए समस्यामूलक सीरियलों के लिए जज्बात के बदलते रंग,टीआरपी का नया फार्मूला और स्त्री समस्याओं को ‘प्लेजर मोड’ में बदल देने जैसे पदबंधों के इस्तेमाल शुरु हो जाते हैं। शुरुआती एपीसोड में सीरियलों के लैंडस्केप बदलने के साथ ही इसके कस्बाई,झुग्गियों और टोलों में स्त्री चरित्र को समझने की जो उम्मीद बंधती है वो पन्द्रह से बीस एपीसोड तक आते-आते शहर और महलों के सेंट्रिक होकर रह जाते हैं। यहीं पर आकर सामाजिक विकास के फार्मूले पर सीरियलों की बात करना बेमानी लगने लग जाते हैं। हां इन सबके वाबजूद इतना जरुर होता है कि स्त्री-दर्शकों का दायरा बढ़ता है,पुरुष दर्शकों की सीरियल देखने के प्रति मरी इच्छाएं फिर से जन्म लेने लग जाती है और छद्म ही सही, व्यापक स्तर पर टेलीविजन मनोरंजन के जरिए जागरुकता पैदा करने का काम करता है,यह भ्रम व्यापक स्तर पर प्रसारित होता है।

Sunday, October 25, 2009

तो इस तरह खत्म हुआ इलाहाबाद का ब्लॉग मंथन




ब्लॉग-विमर्श के लिहाज से पहले दिन के मुकाबले दूसरे दिन के सत्र ज्यादा कारगार साबित हुए। इसकी एक वजह तो समय से सत्र का शुरु होना रहा,अधिक वक्ताओं के विचार आए। इसके साथ ही तकनीकी सत्र में जिस बारीकी से रविरतलामी, मसिजीवी, ज्ञानदत्त पांडेय और संजय तिवारी ने सूचना,तकनीक औऱ अभिव्यक्ति के बीच के अन्तर्संबंधों को बताया वो नॉन-ब्लॉगरों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण रहे। लेकिन पहले दिन वक्ताओं को बोलने देने में जितनी दरियादिली दिखायी गयी अगले दिन उसकी गाज भाषा,साहित्य और संप्रेषणियता के सवाल पर बोलने आए वक्ताओं पर गिरी। जाहिर तौर पर उसका शिकार मैं भी हुआ। विश्वविद्यालय की ओर से जो न्योता हमें भेजा गया था उसमें ये साफ तौर पर लिखा था कि आप जो भी बातचीत करेंगे उसे प्रकाशित किया जाएगा इसलिए हमनें अपने स्तर से बीस मिनट बोलने के लिहाज से तैयारी की थी जबकि हमें पांच मिनट,सात मिनट के भीतर,गहरे दबाबों के बीच अपनी बात खत्म करनी पड़ी। मैंने तो फिर भी पांच मिनट के निर्धारित समय होने पर भी हील-हुज्जत करके ढाई मिनट आगे तक जारी रहा लेकिन बाद के वक्ताओं से कहा गया कि आप एक-एक मिनट में अपनी बात रखें। दिल्ली से चलते हुए सोचकर ही कितना अच्छा लग रहा था कि हम देश में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होनेवाली चिट्ठाकारी संगोष्ठी में विमर्श करने जा रहे हैं जिसे कि पाठ के रुप में तैयार किया जाएगा लेकिन आप समझ सकते हैं कि बोलते वक्त हमने ऐसा महसूस किया कि खून,पेशाब,थूक और खखार की तरह यहां अपने विचारों की सैम्पलिंग भर देने आए हैं। वहां मौजूद कुछ लोगों ने ये तर्क दिया कि जब आप पांच मिनट में पढ़नेवाली पोस्ट लिख सकते हैं तो फिर अपनी बात क्यों नहीं रख सकते। पांच मिनट ही क्यों भई,टेलीविजन के हिसाब से सोचें तो 25-30 सेकेंड काफी हैं,इससे ज्यादा की बाइट तो चलती भी नहीं। लेकिन क्या चिट्ठाकारी को जब हम विमर्श और अकादमिक दुनिया में शामिल कर रहे हैं तो उसे निपटाने के अंदाज में ही बात करनी होगी। अब बिडंबना देखिए कि रियाजउल हक जैसा गंभीर ब्लॉगर वक्ता जब ये कह रहा है कि आप हिन्दी ब्लॉग्स पर नजर डालें तो कहीं से इस बात का अंदाजा नहीं लगेगा कि ये उसी देश की अभिव्यक्ति है जहां हजारों किसानों ने कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर ली,दलित समाज का एक तबका आज भी पचास साल पहले के भारत में जीने के लिए अभिशप्त है। हिन्दी ब्लॉगिंग करते हुए जो खतरे हमें उठाने चाहिए,अभी तक हम नहीं उठा रहे हैं और उसके बाद वो पूरी बातचीत को सामाजिक सरोकार और प्रतिबद्ध लेखन की ओर मोड़ना चाह रहे थे,महज दो मिनट के भीतर उन्हे दबाब में आकर बात खत्म करनी पड़ गयी लेकिन वही दूसरे सत्र में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार इस बात की घोषणा करते हुए भी कि उन्हें ब्लॉग के बारे में कुछ भी नहीं पता है,करीब पच्चीस मिनट तक बोल गए। इस पच्चीस मिनट में ऐसा कुछ भी नहीं था जो कि ब्लॉग को लेकर चलनेवाली बहस को आगे ले जाता हो,विमर्श के दायरे का विस्तार करता हो,वही सब जिम्मेदारी का एहसास,लेखन में विवेक का प्रयोग और दुनियाभर के नैतिक आग्रह जिसकी चर्चा पहले दिन ही विस्तार से की गयी। ब्लॉगरों की भाषा में इसे नामवर सिंह की पायरेसी करार दिया गया। औपचारिकता,हिन्दी साहित्य-समाज से आक्रांत दोनों दिनों की इस संगोष्ठी ने ब्लॉग विमर्श के स्पेस को बहुत ही संकुचित कर दिया। हमें बार-बार इस बात का एहसास कराया गया कि हम हिन्दी साहित्य-समाज के लोगों के बीच रहकर अपनी बात कर रहे हैं तभी तो कुलपति,विभागाध्यक्ष से लेकर एमए तक के स्टूडेंट ने हमें आगाह किया कि आप अनुशासित बनिए। संतोष नाम के एक स्टूडेंट ने जब मुझे मंच से अनुशासित होने और धैर्य से दस मिनट नहीं बैठने लायक करार दिया तो हमें इस बात का यकीन हो गया कि आनेवाले समय में हिन्दी साहित्य से जुड़ी संस्थाएं और विभाग अगर चिट्ठाकारी पर किसी भी तरह का आयोजन करती है तो इसका बंटाधार कर देगी। मैंने उन्हें बस इतना ही कि हम यहां योग और साधना शिविर में नहीं आएं हैं कि हिलना-डुलना बंद कर दें,हम विचलन की स्थिति में जी रहे हैं और उन्हीं सबके बीच अपनी बात रखनी है। हिन्दी समाज में चिट्ठाकारी को साहित्यिक मापदंड़ों के खांचे में फिट करने की इतनी अधिक छटपटाहट है कि वो ब्लॉग की तकनीकी, सुविधाओं, शर्तों और शैलियों को उसी रुप में अपनाए जाने के वाबजूद जिस रुप में दुनिया अपना रही है महज ब्लॉग की जगह चिट्ठाकारी शब्द प्रयोग कर थै-थै नाच रहे हैं। नामवर सिंह इस शब्द के प्रयोग को एतिहासिक करार देते हुए इसका श्रेय म.गां.अं.विश्वविद्यालय को देते हैं। हमें तो ब्लॉग के बजाए चिट्ठाकारी टाइप करने में असुविधा हो रही है। आते समय डेस्क पर पड़ी एक रिपोर्ट पर नजर गयी,शीर्षक था- चिट्ठाकारी से साहित्य को कोई खतरा नहीं। अब बताइए चिट्ठाकारी को साहित्य के बरक्स खड़ी करने की क्यों जरुरत पड़ गयी? इस पर गंभीरता से चर्चा की जानी चाहिए। बहरहा



दूसरे दिन के पहले सत्र चिट्ठाकारीः भाषा और साहित्य के सवाल पर प्रथम वक्ता के तौर पर मसिजीवी नाम से मशहूर ब्लॉगर विजेन्द्र सिंह चौहान ने अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कई बार हमें लगता है कि चिट्ठाकारी की बिल्कुल कोई नयी और अलग भाषा है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? ये उसी रुप में नयी है जिस रुप में ये हंस में नहीं आती,कथादेश में नहीं आती,साहित्य की किताबों में नहीं आता। लेकिन गंभीरता से विचार करें तो ब्लॉग की कोई नयी भाषा नहीं है। ये बोली जानेवाली भाषा,कई अलग-अलग जगहों पर बोली जानेवाली भाषा का ही रुप है। इसलिए भाषा के सवाल पर हमें इस लिहाज से भी सोचना होगा। उन्होंने कहा कि हम चिट्ठाकारी में टाइप करते हुए छोटी-मोटी गलतियां करते हैं लेकिन ये कोई बड़ी बात नहीं है। हां,दिक्कत तब है जब हम इस पर गर्व करने लग जाते हैं। मसिजीवी ने 2.0 भाषा फार्मूले के हिसाब को भी समझना जरुरी बताया।

गिरिजेश राव ने स्पष्ट किया कि मैं साहित्य से नहीं हूं,पेशे से इंजीनियर हूं लेकिन मैं जुनूनी तौर पर चिट्ठाकारिता से जुड़ा हूं। मेरे जैसे कई लोग जिनका कि साहित्य से कुछ भी लेना-देना नहीं है वो भी ये काम कर रहे हैं। इसलिए सवाल ये है कि क्या ब्लॉगिंग पर जब हम बात कर रहे हैं तो उन तथ्यों को ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए। ब्लॉगरी को सर्व समावेशी है जहाँ सबके लिए जगह है।
(2) ब्लॉगरी और साहित्य के विवाद को बेमानी बताया । ब्लॉगरी अभिव्यक्ति का एक माध्यम है जिससे साहित्य भी कहा जा सकता है।
(3) हिन्दी की जातीयता के कारण भाषा स्रोत के रूप में मैंने संस्कृत की महत्ता बताई। अंग्रेजी को भी स्वीकारा।
(4) आम जीवन से ही शब्दों को लेकर बात कहने की वकालत की - टेलीफोन धुन में हँसने वाली....
(5) एस एम एस भाषा की बात भी की ।
(6) ब्लॉगरी के भीतर से ही इसकी भाषा विकसित होने की बात की । खड़ी बोली से हिन्दी बनने में महावीर प्रसाद द्विवेदी के योगदान की बात की । यह भी कहा कि अब कोई द्विवेदी ब्लॉगरी के लिए नहीं होगा, हमें खुद अनुशासन रखते हुए विकसित होना होगा... महावीर प्रसाद के नाम लेने पर बाद में कुछ जुमले भी आए ।

हिमांशु को चिट्ठाकारी में कविता और उसकी भाषा के संदर्भ में बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने चिट्ठाकारी पर मौजूद कविताओं का पाठ भी किया लेकिन मनीषा पांडेय के ये कहे जाने पर कि आप अपनी बात कीजिए,सिर्फ कविता क्यों सुना रहे हैं तो उन्होंने कहा कि मैं अभी इसे समझ ही रहा हूं इसलिए सीधे-सीधे इस पर बात नहीं कर सकता। मनीषा को उनका ये नॉनसीरियस रवैया पसंद नहीं आया। ये अलग बात है कि अंत तक हिमांशु का कविता सुनाना जारी रहा।

वक्ता के तौर पर चिट्ठाकारीः भाषा और संप्रेषणीयता के सवाल पर मुझे बोलने के लिए बुलाया गया। भाषा पर बातचीत करने के पहले मैंने स्पष्ट करने की कोशिश की कि- मैं हिन्दी चिट्ठाकारी को बनाम की जुमलेबाजी से अलग करके देखना चाहता हूं। मैं न तो इसे साहित्य बनाम ब्लॉग,न तो मीडिया बनाम ब्लॉग और न ही समाज सेवा बनाम ब्लॉग के तौर पर देख रहा हूं। मैं इसे इसी रुप में देख रहा हूं जिस रुप में देख रहा हूं। हिमांश का इस संबंध में मानना रहा कि मैं अलग से ब्लॉग को नहीं लेता। अगर वो कहीं छप गयी तो कविता है,कहानी है,नहीं छपी है,नेट पर है तो वही पोस्ट है। दूसरी बात जो कि मुझे लगी वो ये कि हमें हिन्दी चिट्ठाकारी पर बात करते हुए संदर्भों की तलाश करनी चाहिए। सिर्फ सतहीपन,अनर्गल और कुंठासुर जैसे सरलीकृत नजरिए को पेश करके हम इस पर बात नहीं कर सकते। दूसरे दिन में अब तक की बहस पर स्त्री के सवालों पर लिखी जानेवाली पोस्टों पर किसी ने कुछ नहीं कहा। रियाजउल,अशोक पांडेय,गिरीन्द्र,राकेश कुमार सिंह जैसे लोग समाज औऱ सरोकार पर जो कुछ भी लिख रहे हैं,उसकी कहीं कोई चर्चा नहीं की गयी। ऐसा न किया जाना भी एक राजनीति का हिस्सा हो सकता है। संभव है इस तरह के आयोजन हमारे भीतर एक लोभ पैदा करते हों कि आप अगर चीजों को एक खास संदर्भ में देखते हैं तो आपके पक्ष में कई संभावनाएं हैं। आज ब्लॉगिंग ने मीडिया औऱ टेलीविजन आलोचना के लिए जितना बड़ा स्पेस तैयार किया है उतना शायद ही अखबारों औऱ किताबों के जरिए हुआ होगा। रवीश कुमार इस पेशे से जुड़कर भी मीडिया और टेलीविजन की सीमा औऱ संभावनाओं पर लगातार बात कर रहे हैं,उन्हें टीवी अखबार लगने लगा है। बड़े स्तर पर नास्टॉलजिक राइटिंग की जा रही है,स्ट्रैटजी के साथ लेखन किया जा रहा है, रविरतलामी जैसे लोग भाषा-प्रौद्योगिकी का पाठ तैयार कर रहे हैं,उस पर आप बात ही नहीं कर रहे। हमें भाषा को इसी सिरे से पकड़ने की जरुरत है कि इन संदर्भों के बीच ब्लॉग की भाषा किस रुप में निर्मित हो रही है?
साइंस की भाषा पर बात करने के लिए अरविंद मिश्रा को आमंत्रित किया गया है। उऩके बारे में फुरसतिया ने लिखा कि-अरविन्दजी ने अपने ब्लाग का प्रचार किया केवल कि हमारे साइंस ब्लाग में ये किया जा रहा है, वो किया जा रहा है। मैं फुरसतिया के'प्रचार'शब्द से असहमति जताते हुए कहूंगा कि अरविंदमिश्रा ने ये बात विस्तार से बताने की कोशिश की कि विज्ञान की दुनिया में जो कुछ भी नया चल रहा है हिन्दी में वो साइंस ब्लॉग में मौजूद है। ये बात काफी हद तक सही भी है कि हिन्दी में साइंस पर का लेखन बहुत कम दिखाई देते हैं। हां इस लेखन की चर्चा करते हुए अरविंद मिश्रा ने बाकी ब्लॉगरों के नाम लेने के वाबजूद लगभग सारे उदाहरण अपने साइंस ब्लॉग से दिए। गिरिजेश राव बोल रहे थे कि मैं अपने खोए हुए रिकार्डर की ताकीद में ऑफिस के लोगों से बीतचीत में उलझ गया और वापस आने पर संतोष की ओर से मेरे लिए की गयी व्यक्तिगत टिप्पणी को लेकर उत्तेजित औऱ परेशान हो गया। विपिन की बात को मैं सुन नहीं पाया इसके लिए माफ करेंगे। आप वहां मौजूद ब्लॉगरों से अपील है कि इनके साथ जो छूट गए हैं उनकी बात कमेंट कर दें ताकि हम उन्हें भी पोस्ट में शामिल कर सकें। इस पूरे सत्र की अध्यक्षता प्रियंकर पालीवाल ने की और पूरे सत्र तक जमे रहे जबकि इरफान ने मंच संचालन करते हुए,अपनी खूबसूरत आवाज से हमारे भीतर चल रहे उठापटक को लगातार संतुलित करने का काम किया।

भोजन अवकाश के बाद गांव को लेकर एक किस्म की जो फैंटेसी शहर के लोगों के बीच होती है और शहरी मानसिकता पनपनी शुरु होती है,इस गंभीर सच की थीम पर बनी फिल्म सरपत की स्क्रीनिंग की गयी। अभय तिवारी ने इस फिल्म के जरिए गांव को एक परिभाषा में बदल दिए जाने की कवायद को शिद्दत के साथ देखने की कोशिश की है। 18 मिनट की इस फिल्म के दिखाए जाने के बाद चिट्ठाकारीः तकनीकी पक्ष का सत्र शुरु होता है।

दोनों दिनों के कुल सत्रों को अगर हम मिलाकर तुलना करें तो ये सबसे ज्यादा गंभीर सत्र रहा। ये अलग बात है कि इस सत्र के हिस्से मैं मैं स्वयं 15 मिनट के लिए एजी ऑफिस के पास जूस पीने चला गया,यशवंत सिविल लाइन्स के लिए रिक्शा खोजने निकले,मनीषा चायवाले बाबा के साथ कटबहसी कर रही थी,इरफान मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,सेमिनार की थकान,धुएं में उड़ाता गया के अंदाज में बाहर दिखे, मेरी ओर से मनीषा को दी गयी किताब भूपेन को इतनी जरुरी लगी कि बाहर फोटोकॉपी की मशीन ढूंढने में व्यस्त नजर आए,अविनाश देखते ही देखते अलोप हो गए,समरेन्द्र मामू लोग से मिलने निकल पड़े। ब्लॉगरों ने इस सत्र को ट्यूटोरियल क्लास की तरह लिया,मनो हो तो रहो नहीं तो निकल लो। लेकिन जूस पीने के बाद जब मैं अंदर आकर बैठा तो महसूस किया कि चिट्ठाकारी के नाम पर जो हम बौद्धिक बहसें कर रहे हैं,अपनी बौद्धिकता झाड़ रहे हैं,उन सबसे हटकर हम ब्लॉगरों को एक साल तक लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर ब्लॉग-शिविर लगाने चाहिए। क्योंकि ब्लॉगरों के नदारद होने के वाबजूद भी इस सत्र में कुर्सी लगभग भरी हुई थी। लोग चीजों को गौर से सुन रहे थे और नहीं समझ में आने पर सवाल भी कर रहे थे। हां ऐसे मौके पर अफलातून जो कि हमारे हीरो करार दिए गए,थोड़ा उन्हें बर्दाश्त करना चाहिए था और तकनीकी मसले के बीच में भावुक प्रसंग छेड़ने से अपने को रोकना चाहिए था। मंच से उनका रोना हमें अचानक से दूसरी दुनिया की तरफ खींच ले गया और मन भारी हो गया। खैर,

इस सत्र में रविरतलामी ने यूनीकोड को लेकर विस्तार से बताया,फांट को लेकर सुझाव दिए और हमें हिन्दी की वर्तनी को किस तरह से चेक करें,दिल्ली में उस सॉफ्टवेयर को कहां से खरीदें,ये सबकुछ बताया। ज्ञानदत्त पांडेय ने ब्लॉगिंग में समय प्रबंधन के महत्व और उसके तरीके को सटीक तौर पर बताया। मसिजीवी के लिखने औप पढ़ने के बीच के समय-अनुपात को समझाया। मसिजीवी ने स्टेप वाइज स्टेप ब्लॉग बनाने,नियंत्रित किए जाने और उसे जिंदा रखने के तरीकों पर चर्चा की और डेमो के जरिए इसे प्रयोग करके बताया। इस सत्र में संजय तिवारी की ओर से इंटरनेट के चालीस साल होने और उसके विविध पड़ावों से गुजरने की घटना को गंभीरता से देखने-समझने को अनिवार्य बताया। संजय तिवारी ने यह कहते हुए कि हम बुरे दौर से गुजर रहे हैं जिसे कि इन्होंने पहले सत्र में भी कहा था इसके विकल्पों की तलाश करने की प्रक्रिया पर भी अपनी बात रखी। एक ब्लॉग के बना लेने के बाद हम तीसमार खां नहीं हो जाते,हमें इंटरनेट की दुनिया को बारीकी से समझने की जरुरत है,संजय तिवारी की बात से ये पक्ष बार-बार उभरकर सामने आया। ब्लॉग-तकनीक से जुड़े करीब 8 सवालों(मेरी मौजूदगी में)के पूछे जाने और वक्ताओं की ओर से विस्तार से चर्चा किए जाने के बाद सत्र समाप्ति की औपचारिक घोषणा की जाती है। उसके बाद हिन्दी के प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार फिर से उन सारे हिदायतों को दोहराते हैं जिसे कि नामवर सिंह ने उद्घाटन सत्र के दौरान हमें दिए थे। यहां मुझे नब्बे साल से पंडितजी नाम से मशहूर उस गोलगप्पा और चाट खिलानेवाले बाबा की याद आ जाती है,जब मैंने पांच गोलगप्पे खाने के बाद पूछा कि हो गया बाबा? बाबा ने जबाब दिया था कि जहां से शुरु किए हैं वहीं से खत्म करेंगे न बेटा। उन्होंने खट्टे पानी से खिलाना शुरु किया था,बीच में मीठा पानी,फिर घुघनी भरके,फिर दही डालकर..मैंने तभी सवाल किया था और उन्होंने वापस खट्टे पानी पर लौटने की बात की थी।


दूसरे सत्र की समाप्ति के बाद हम ब्लॉगरों को स्मृति चिन्ह और प्रशस्ति पत्र लेने के लिए बारी-बारी से मंच पर बुलाया गया। इस कार्यक्रम के सह-संयोजक सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने एक बार फिर से हम ब्लॉगरों के बारे में परिचय दिया। ये परिचय ब्लॉग और लिंक के परिचय से अलग था। इन दोनों के भीतर जो भी अपनी पहचान बनी थी,उससे लोगों को अवगत कराया। हमने अपनी-अपनी कमाई बटोरी और कार्यक्रम खत्म होने की घोषणा के साथ ही बाहर आए।


बाहर आकर एक अजीब किस्म की भावुकता से मैं भर गया। लग रहा था कि पता नहीं अब कब किससे मिलना हो। रवि रतलामी के साथ तस्वीर खींचावाने की इच्छा थी जो कि मैंने उन्हें पहले से ही जता दी थी। उनकी गाड़ी स्टार्ट हो चुकी थी,मुझे देखकर उन्हें मेरी बात याद आ गयी और एक-एक करके सब उतर गए। बांह में भरकर उन्होंने तस्वीर खिंचायी...और फिर सबों ने साथ-साथ। फिर विदा हुए।
इधर ब्लॉगरों की एक गैंग सीनेट हॉल में होनेवाले मुशायरे में घुसपैठ के लिए बेताब नजर आया। हम भी उनके साथ हो लिए। साढ़े नौ बजे प्रयागराज से लौटना था..लेकिन अभी छ ही बजे थे। रास्ते में मसिजीवी इस बात पर अफसोस कर रहे थे कि एक दिन और क्यों रुकना पड़ गया और मैं अफसोस कर रहा था कि मैं क्यो नहीं रुक गया? कल को कोई पूछे कि इलाहाबाद में क्या देखा तो कुछ भी नहीं बता पाउंगा।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय देखकर आंखें चौंधिया गयी। मसिजीवी ने मेरी तस्वीरें लीं। फिर अंदर दाखिल हुए। मुशायरा शुरु हो चला था। नजर के सामने नाचता रिकार्डर,लोगों से अलग होने पर एक बाजिब किस्म की भावुकता और लंबी थकान के बीच मुशायरे ने मुझ पर कोई असर नहीं किया। मन उचट गया। उधर से अविनाश और यश मालवीय भी बाहर जाते दिखे। उन्होंने भी कहा कि मजा नहीं आया चट गए। मैंने कहा- चट गए हैं तो क्यों न फिर चाट खाने चलें। अजय ब्रह्मात्मज ने कहा था कि इलाहाबाद में चाट जरुर खाना। बिना हैलमेट के यश भाई की बाइक पर हम दोनों लग गए। नब्बे साल की पुरानी पंडितजी की चाट दूकान पहुंचने तक यश भाई की कविताओं और हाथ लहरा-लहराकर गीत गाने का सिलसिला जारी रहा- पिंजरा में देखो बोले,राम नाम टुइयां
शहरों से भलो हमरो गांव मोरी गुइयां.
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चाट खाने के बाद हम मस्त हो गए फिर विश्राम होटल तक यश भाई और उनके गीतों के साथ। होटल पहुंचने पर एक घंटे के लिए क्या शुरु किया जाए..सुनने-सुनाने का दौर? लेकिन ऐसे ही सूखा-सूखी। यश भाई ने कहा कि आपलोग यात्रा पर जा रहे हैं,आचमन करना ठीक नहीं होगा। लेकिन बीयर तो चल ही सकती है इस संकल्प के साथ..हेस्टी-टेस्टी पर धावा। आधा से ज्यादा चखना मैं ही खा गया,अदने एक सेवेन अप को पचाने के लिए। बाहर आकर यश भाई को भाभी का हवाला देकर हम उन्हें विदा होने की बात करते हैं,वो हमें स्टेशन तक छोड़ने की जिद करते हैं। फिर कई कविताओं के टुकड़े एक के बाद एक। वो कहते हैं-दुनिया पैसे कमाती है,हम कहते हैं आदमी कमाते हैं।..उनसे विदा होते वक्त मेरी आंखों के कोर भींग जाते हैं।
वापस आकर दस मिनट के भीतर समान समेटते हैं,समरेन्द्र भाई के दोस्त की गाड़ी पर लदते हैं और फिर इलाहाबाद स्टेशन। तीन थाली पैक कराकर फिर प्रयागराज के भीतर। बातचीत का दौर,आसपास की लड़कियों से थोड़ा भी सट जाने पर टोका-टोकी का दौर शुरु। हम बातें करना चाहते हैं लोग सोना चाहते हैं। हम ठहाके लगाना चाहते हैं,वो खर्राटे लगाने लग जाते हैं। हम तीनों ट्वॉयलेट के पास खड़े होकर देर रात तक बातें करते हैं। रेलवे के कर्मचारी के साथ गप्पें मारते हैं और फिर वापस आकर अपने-अपने बिस्तर में दुबक जाते हैं।
अपने हॉस्टल के कमरे के सामने पांच अखबार पड़े हैं। ओह..आज तो संडे है,तभी तो पांच अखबार। इन चार दिनों में दिल्ली में क्या हुआ,नहीं मालूम,हॉस्टल में क्या हुआ नहीं पता..तब से लेकर अब तक तो इस पोस्ट को लेकर ही भिड़ा रहा।..पुरानी दुनिया में वापस।।।..आगे ब्लॉगिंग की दुनिया में इस संगोष्ठी से निकलकर आए सवालों पर विमर्श जारी रहेगा।

डिस्क्लेमर- ये रिपोर्ट पूरी तरह स्मृति पर आधारित हैं। नोट की गयी फाइल अचानक सिस्टम के बंद हो जाने से सेव नहीं हो पायी। ऐसे में जरुरी नहीं कि वक्ता के शब्दशः प्रयोग यहां पर मौजूद हों लेकिन कोशिश है उन संदर्भों और भावों की जो कि वो व्यक्त करना चाह रहे थे। वाबजूद इसके अगर कहीं कोई गलती और अलग अर्थ प्रेषित हो रहे हों तो आप सबसे,खासकर वहां मौजूद ब्लॉगरों से अनुरोध है कि आप कमेंट करें जिसे पढ़कर हम तत्काल दुरुस्त कर देंगे।