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अब तक के इतिहास में बहुत झोल है। जिसको जो मन में आया है लिख दिया। पुराने जमाने में पैसे लेकर और अब कोई पैसे देकर लिखवा लिया। किसी को कहा गया देश का इतिहास लिखने तो उसने राजा की जीवनी लिख दी और देश को उतना ही तक बताया जहां तक कि राजा के पैर पड़े। बाकियों के बारे में गोल है। किसी को मन में आया तो धर्म को ही इतिहास बता दिया और राजा को ईश्वर की संतान घोषित कर दिया। अब नतीजा ये हुआ कि राजा भ्रष्ट भी हो जाए तो भी उसके विरोध में कोई आवाज नहीं उठानी है....और इस बीच राजा को जो मन हुआ, अपने बारे में लिखा, लिखवाया।
एक शैक्षणिक परिषद् से झोल रहित इतिहास लिखवाने की कोशिश भी की जाती है तो पुस्तक न होकर बमगोला हो जाती है और अचानक से पूरा देश सुलगने लग जाता है। मध्ययुग के बारे में लिखा तो इतने राजाओं के मरने और जीनें की तारीखें जड़ दी कि बंदा उसी को याद करते-करते पस्त हो जाए। इतने बेटे-पोतों के रिलेशन्स जोड़ दिए कि ध्यान रखते-रखते आदमी तबाह हो जाए।
कुल मिलाकर अब तक का लिखा गया इतिहास इतना अटपटा, बेतरतीब, पक्षपाती और आंख फोड़ने पर समझ बनानेवाला है कि इसे निष्पक्ष, तटस्थ, विश्वसनीय और सेक्यूलर नहीं कहा जा सकता। उपर से इतना झेल है कि- दिन पढ़ो, रात सफा, रात पढ़ो दिन सफा। कोई इन्टरेस्ट ही पैदा नहीं होता।
अब इतिहास में ये सारी बातें कहां से आए जिसमें तटस्थता भी हो, सच कहने का साहस भी हो, किसी के दबाब में आकर न लिखा गया हो और पढ़ने में मजा भी आए। आज की तारीख में सिर्फ और सिर्फ मीडिया में दम है कि वो इन सब गुणों से लैस इतिहास लिखे और जो इतिहास मीडिया लिखेगी वो सबसे फ्रेश इतिहास होगा।
मीडिया द्वारा लिखे गए इतिहास में तटस्थता भी है, साहस भी है, मनोरंजन भी है, नयापन भी है और जानने-समझने के लिए आंख फोड़ने की जरुरत भी नहीं है। मीडिया ने इतिहास लिखने में ऐसा क्या कर दिया, आइए जानते हैं।
सबसे पहले बात करते है विषय और घटनाओं की। मीडिया ने इतिहास लिखने के क्रम में विषय और घटनाओं के जिक्र में भारी उलटफेर की है। अब तक के इतिहास में जितने शासकों, देशों के बनने की लम्बी फेहरिस्त है उससे आज की ऑडिएंस को क्या लेना-देना है। जो शासक मर गए उनके बारे में जानकर अपना भेजा फ्राई क्यों करना है। न तो वो हमारे कोई रिश्तेदार थे और न ही उन्होंने हमारे नाम से कोई प्रोपर्टी छोड़ रखी है। इस मिजाज से सोचें तो इतिहास का बड़ा हिस्सा बेमतलब का है, कूड़ा है और जो अपने मतलब का है उसे फेंको। सो मीडिया इतिहास में फ्रेशनेस लाने के लिए इतिहास के एक बड़े हिस्से को फेंकना जरुरी समझती है।
अच्छा, जब वो बड़े हिस्से को फेंकेगी तो उसके बदले में तो कुछ न कुछ डालना होगा न। मीडिया की प्रतिभा यहीं पर काम आती है। वो पकाउ विषयों की जगह मजेदार विषयों को शामिल करती है जिसमें मनोरंजन भी हो, आंखें भी न फोड़नी पड़े और तटस्थता का तो कोई सवाल ही पैदा हो। आइए एक बार इसके द्वारा बनाए गए चैप्टरों पर गौर कर लें-
अध्याय १
- चुम्बन लेने और मना करने का इतिहास
( वाल्यावस्था से शिल्पा रिचर्ड गैरी विवाद तक)
- चुम्बन शैली का तुलनात्मक अध्ययन
(प्लेजर की अधिकता और भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण)
- चांटा जड़ने और खाकर बिलखने का इतिहास
( सिनेमा, फैशन शो और क्रिकेट के विशेष संदर्भ में)
द्रौपदी युग से भज्जी-श्रीसंत युग तक
- गालियों का उद्भव, विकास, प्रयोग की अनिवार्यता और ऐतिहासिक महत्व
(दुर्जन शैली से मां-बहनवाद तक)
अध्याय २
- इज्जत, बेइज्जत और बलात्कार का इतिहास
(कौरव-सभा से लेकर बिग बॉस प्लस
अधेड़ी औरत से दुधमुंही बच्ची की चीख तक)
- सार्वजनिक वस्त्र मोह-मुक्त का इतिहास
( चंदनवन से रैप शो तक)
- स्त्री-देह सौन्दर्य औऱ कम वस्त्रों का अन्तर्संबंध
( कंचुकी काल से बिकनी काल तक)
- लिंग आकर्षण का सामाजिक इतिहास
( शूर्पनखा काल से जिगिलो काल तक)
अध्याय ३
- अपराध की दुनिया का आकर्षक इतिहास
( करने से लेकर बताने तक)
- नाजायज संबंधों का संक्षिप्त इतिहास
( हरम कल्चर से लेकर कोहली कल्चर तक)
- संभोग स्थलों का मार्मिक इतिहास
( परकोटे से लेकर डांस बार और फ्लाइ ओवर तक)
- यौन दुर्बलता, सुस्ती और गैरमर्दांनगी से मुक्ति का इतिहास
( शीलाजीत से लेकर वियग्रा तक का वैज्ञानिक विश्लेषण)
अध्याय ४, ५, ६ उपसंहार और संदर्भ-सामग्री की चर्चा कल होगी।
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4 Response to 'मीडिया लिखेगी फ्रेश इतिहास: हरम कल्चर से कोहली कल्चर तक'
  1. ritu
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_30.html?showComment=1209541140000#c7905708428794965924'> 30 अप्रैल 2008 को 1:09 pm

    लगता है हिंदुस्‍तान का नया इतिहास छपने से पहले ही बेस्‍टसेलर की लिस्‍ट में आ जायेगा.

     

  2. भुवनेश शर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_30.html?showComment=1209541320000#c1433797424159865693'> 30 अप्रैल 2008 को 1:12 pm

    हैरी पॉटर के बाद यदि सबसे ज्‍यादा कुछ बिकेगा तो यही बिकेगा.

     

  3. अरुण
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_30.html?showComment=1209612600000#c8516046093460059936'> 1 मई 2008 को 9:00 am

    विनीट जी मेरा मेल आई डी aroonarora@gamil.com hai
    और मेरा ब्लोगस्पोट वाला पंगेबाज अब यही रुक जायेगा मै अब हमेशा पंगेबाज डाट काम पर ही आब सब से मुखातिब हूंगा,यही मतलब था मेरा :)
    आप बेकार परेशान है ये लेख कही पे निगाहे कही पे निशाना शैली का था < जिसको जो कहना था हम कह चुके समझने वाला समझ गया होगा ,आप दिल पर ना ले ,:)

     

  4. जेपी नारायण
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_30.html?showComment=1209613200000#c7615096005674939896'> 1 मई 2008 को 9:10 am

    मीडिया लिखेगा क्या, धड़ाधड़ लिख रहा है। इन कंपनीबाजों के पास अपराध और देह बेचने के अलावा और बचा भी क्या है। बेचो-बेचो सेठों के गुर्गे।

     

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