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जरा पुरुष विमर्श हो जाए

Posted On 11:20 pm by विनीत कुमार |

शायद स्त्री-विमर्श के पुरोधा राजेन्द्र यादव भी नहीं चाहेंगे कि जिन स्त्रियों को उन्होंने अपने विमर्श में जगह दी, आज वो ही स्त्रियां स्त्री-विमर्श के नाम पर उन्हें काट खाने के लिए दौड़े। उनकी भी इच्छा नहीं होगी कि स्त्री-विमर्श के नाम पर कोई पुरुषविहीन समाज बने। इसलिए अब जरुरी है कि स्त्री-पुरुषों के बीच कॉर्डिनेशन की बात की जाए। बहन, बेटी, पत्नी और मां बनकर जिन स्त्रियों ने पुरुषों के आदत बिगाड़ दिए हैं, उन्हें जरुरत से ज्यादा लाड़-प्यार दिया है अब वो उन्हें दुरुस्त करें। स्त्री-विमर्श तो हो ही रहा है, अब थोड़ा पुरुष विमर्श चलाया जाए।
(प्रतिष्ठित कथाकार ममता कालिया का वक्तव्य)
जिन लोगों को स्त्री-विमर्श के नाम पर जो कुछ हो रहा है उन्हें देखते हुए घुटन होती है, चिढ़ होती है उन्हें सबकुछ ढकोसला लगता है और उसकी आलोचना के लिए बड़ी शिद्दत से रेफरेंस ढूढते-फिरते हैं उनके हिसाब से ममता कालिया ने उनके पक्ष में ही बात कही है। उन्हें लग सकता है कि ममता कालिया उनके साथ हैं। क्योंकि वो इसका अर्थ कुछ अलग तरीके से निकालते हैं-
एक तो ये कि स्त्रियां बहुत लम्बे समय से एक ही विमर्श को चलाते-चलाते बोर हो गईं हैं इसलिए जरुरी है कि टेस्ट बदलने के लिए अब पुरुष विमर्श चलाना चाहती है।
दूसरा ये भी कि स्त्रियों को अपनी औकात का पता चल गया है। घिस-घासकर, घसीटकर अगर वो विमर्श चला भी ले तो बिना पुरुषों के बिना घर और जीवन चलाना मुश्किल है।
स्त्रियों के लिए पुरुष के साथ होने का मसला उसके पसंद-नापसंद पर निर्भर नहीं है बल्कि उसकी नियति है, मजबूरी है कि वो पुरुषों के साथ एडजेस्ट होकर रहे।
तीसरा मतलब ये भी हो सकता है कि स्त्रियां विमर्श करने के लिए पैदा नहीं हुईं हैं, घर-परिवार और अपना जीवन चलाने के लिए, बच्चे पैदा करने के लिए पैदा हुईं हैं और इन सब कामों के लिए पुरुषों का होना जरुरी है। विमर्श बिना पुरुष सहयोग के हो भी जाए तो भी बाकी के ये सारे काम बिना उसके सहयोग के संभव ही नहीं है।
....और ये भी कि विमर्श चलाते-चलाते अब स्त्रियां थक चुकी है, अब वो और पुरुषों के खिलाफ बयानबाजी नहीं कर सकती। वो विमर्श चला भी रही हैं और इधर थक भी रहीं हैं। विमर्श की प्रक्रिया फिर भी धीमी है जबकि थकने की प्रक्रिया फिर भी उससे बहुत तेज और इस थकी हुई अवस्था में पुरुष ही काम में आएंगे।
इधर स्त्री-विमर्शकार ममता कालिया के इस वक्तव्य को स्त्री-विरोधी, आर्य समाजी सोच, नास्टॉलजिया की शिकार मानकर सिरे से खारिज कर सकती है। जिन स्त्रियों की मुठ्ठी अभी-अभी तनी है वो इस तरह के बुजुर्ग सलाह को मानना क्या, सीधे हम ऐसी बातों की परवाह नहीं करते बोलकर इसे नजरअंदाज कर सकती है। लेकिन तब वो ममता कालिया के इस वक्तव्य के बाद राजेन्द्र यादव ने जो कुछ भी कहा उसे पुरुष समाज और स्त्री-विमर्श से जुड़े लोग और भड़केंगे-
राजेन्द्र यादव ने सीधे-सीधे बेबाक किन्तु ढलती उम्र की वजह से विनम्र होते हुए कहा-
अगर स्त्रियों के सुधार में पुरुषों की एक पीढ़ी को स्त्रियां काट भी लें तो क्या बुरा है। मैं तो ममताजी का शुक्रगुजार रहूंगा। ये काम भी पुरुषों का शहादत ही माना जाएगा।
राजेन्द्रजी की इस बात पर तो दोनों लोग बजर राउंड की तरह एक साथ गरम हो जाएंगे।
पितृसत्तात्मक पुरुष वर्चस्ववादी समाज पर आस्था और भरोसा रखनेवाले लोगों का कहना होगा कि-
राजेन्द्रजी पर बुढापे का असर साफ दिख रहा है। उन्हें अपनी जिंदगी में जो कुछ भी लिखना-पढ़ना, बोलना और बटोरना था उसे तो उन्होंने कर लिया, अब हमलोगों की जिंदगी हलाल करने पर क्यों तुले हैं।
अच्छा राजेन्द्रजी प्रगतिशील मानसिकता के होते हुए भी मोक्षकामी इंसान है इसलिए जीवन के उत्तरार्द्ध में कुछ ऐसा कर जाना चाहते हैं कि सीधे बैकुंठ। उन्हें इस तरह के शब्दों से परहेज भले ही है लेकिन फैसिलिटी के मामले में कोई समझौता नहीं करना चाहते हैं।
राजेन्द्रजी के वक्तव्य को हिन्दी के इतर समाज ने अगर सुना होगा जो कि ऑडिएंस के हुलिए को देखकर संभव है, उनके दिमाग में ये बात जरुर आ रही होगी कि इस बंदे को किसने ये अधिकार दे दिया कि वो पुरुषों की एक पीढ़ी को महिलाओं से कटवाए। हिन्दी के हम युवा इस बात पर आस्था के वशीभूत होकर राजी हो भी जाएं तो भी हिन्दी के बाहर के लोगों को राजेन्द्रजी ने ऐसा क्या दे दिया है कि वो इस बात को मान लें।...हिन्दीवाले अगर बात मान भी ले तो इससे क्या फर्क पड़ जाता है। हिन्दी के बाहर तो राज इनका नहीं ही चलता है न।
इधर, राजेन्द्रजी पर बरसने के लिए स्त्री-विमर्शकार के हाथ में एक असरदार शब्द तो हाथ में लग ही गया है। शहादत शब्द ही राजेन्द्रजी पर गरम होने के लिए पर्याप्त है। वो सीधे सोच सकते हैं कि इतने दिनों तक स्त्री के पक्ष में बात करने के बाद भी राजेन्द्रजी पुरुष वर्चस्वादी मानसकिता से उबर नहीं पाए हैं। अब उन्हें शहादत का शौक लगा है और अलौकिक मुक्ति की इच्छा रखने लगे हैं। हम खूब समझते हैं, अंत तक आते-आते वो पुरुष समाज को यही मैसेज देना चाहते हैं कि- हे पुरुषों, मैंने स्त्रियों के पक्ष में जो कुछ भी किया जिससे हम तुम्हारे विरोधी भी दिखने लगे, अब इस तरह के कामों की वैलिडिटी खत्म हो गई है, अब मैं तुम्हारे साथ हूं।॥और आज मैंने जो कुछ भी कहा उसे तुम कॉन्फेशन स्टेटमेंट के तौर पर समझो।
यानि ममता कालिया और राजन्द्र यादव ने अपने-अपने तरीके से इस बुद्धिजीवी समाज को असहमत होने के लिए पर्याप्त सामग्री दे दी है। सच पूछिए तो उनके लिए भला ही किया है क्योंकि बिना असहमति के बुद्धिजीवी होना ऑलमोस्ट नामुनकिन है। आस्था और सहमति तो पुरानी पड़ गई और इसके बूते सिर्फ सभा, संगोष्ठी हो सकती है, विमर्श की ताकत इसमें कहां है जी।
पोस्ट की कच्ची सामग्री- ११ अप्रैल २००८, हिन्दी भवन
मौका- शीला सिद्धान्तकर स्मृति समारोह
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4 Response to 'जरा पुरुष विमर्श हो जाए'
  1. रचना
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_13.html?showComment=1208066640000#c2306890299234511334'> 13 अप्रैल 2008 को 11:34 am

    rajendr yaadav . rajendra yaadav naa hotey agar manu bhandaari naa hotee

     

  2. rakhshanda
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_13.html?showComment=1208074620000#c5247677296621716730'> 13 अप्रैल 2008 को 1:47 pm

    main Rachna ji se poori tarah sahmat hun.

     

  3. डा० अमर कुमार
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_13.html?showComment=1208089200000#c1896468530848823625'> 13 अप्रैल 2008 को 5:50 pm

    आँखें खोल देने वाला पोस्ट !

     

  4. अंशुमाली रस्तोगी
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_13.html?showComment=1208096160000#c8890532585590242510'> 13 अप्रैल 2008 को 7:46 pm

    बंधु, राजेंद्र यादव ने स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श चलाया जरूर मगर इसकी 'मलाई' भी तो खुद ही बैठकर खाई। हंस में केवल उन्हीं महिलाओं, दलित लेखकों को जगह दी जो आए दिन उनकी चाकरी में लगे रहते हैं। अन्य किसी के लिए हंस के पन्नों पर कितनी जगह है जरा बताइए। मजा देखिए, राजेंद्र यादव और उनकी सहेलियों को स्त्री में सिवाए सेक्स और यौनिकता के कुछ नजर नहीं आता।
    मुझको तो उन लोगों की सोच पर बड़ी दया आती है जो राजेंद्र यादव से सहमत दिखते हैं। राजेंद्र यादव के लेखन में ऐसा कुछ है भी; जिससे सहमत होआ जा सके। कोरा चुतियापा है वहां। ये बूढ़े इतने ज्यादा नैतिकतावादी है कि पूछिए मत!
    स्त्री-विमर्श का झंडा हाथों में थामे दिल्ली में चहलकदमी करते रहते हैं लेकिन जब नंदीग्राम पर लिखने-कहने की बात आती है तो इन्हें सांप सूंघ जाता है। दरअसल, नंदीग्राम पर बोलकर वो शोहरत नहीं मिल सकती जो स्त्री के शरीर का नाप-जोख लिखकर मिल सकती है। क्यों सही है न।
    ममताजी के बारे में क्या कहूं। सभी स्त्री और पुरुष-विमर्श को भुनाने में लगे हैं। मुद्दे की बात कोई नहीं करता।

     

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