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कल तक आपने पढ़ा कि हिन्दी मीडिया का कलेजा इतना बड़ा नहीं है कि वो अपने मीडियाकर्मियों को रिसर्च के लिए प्रोत्साहित करे और न ही देश के विश्वविद्यालयों ने ऐसी कोई व्यवस्था की है कि अनुभवी पत्रकार चाहे तो साल-दो साल मीडिया प्रैक्टिस छोड़कर रिसर्च के काम में लगे। अब आगे-
हिन्दी वाले जब साहित्य पढ़कर मीडिया में आते हैं और अब जब मीडिया पर रिसर्च करने का मन बना रहे होते हैं तो उनके सामने कुछ बुनियादी परेशानियां सामने आती है। जैसे- हिन्दी में तो ढ़ंग का मटेरियल है ही नहीं जिससे कि मीडिया के प्रति समझ बन सके। कुछ किताबें लिखीं भी गई हैं तो इस प्रयास से कि इसे पढ़कर बस डिप्लोमा की परीक्षा में पास हुआ जा सकता है। कुछ बड़े लोगों ने लिखा भी है तो उसमें कहीं कोई रेफरेंस नहीं है। किताब के अंत में किताबों की सूची तो है लेकिन चैप्टर के भीतर ये साफ ही नहीं हो पाता है कौन सी बात वो खुद कह रहे हैं और कौन सी बात को बतौर रेफरेंस इस्तेमाल कर रहे हैं। इतना उलझन और अस्पष्ट मामला होता है कि वाकई हिन्दी अंग्रेजी पर भारी पड़ने लग जाती है। इन किताबों से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि जिस किसी ने भी इस किताब को लिखा है वो ये मानकर चल रहा है कि जिस भी पाठक को ये किताब हाथ लगेगी वो नौसिखुए किस्म का होगा और चाहे कुछ भी लिख दिया जाए,वो पचा जाएगा। मार उसमें भी साहित्य की अवधारणा ठूंसे जा रहे हैं। ऐसी ही किताबों को देखकर मैं अक्सर कहा करता हूं कि हिन्दी के बाबा हमारे नहीं पढ़ने की वजह से विद्वान हो गए हैं, अगर हम भी उनकी तरह कुछ पढ़ लें तो कई चीजें खुद-ब-खुद साफ हो जाएगी। वो उन लोगों का नाम लेने से बचते हैं जिनकी पंक्तियों को उठाकर उन्होंने अनुवाद किया है। शायद इसलिए कि ऐसा करने से उनकी आभा कम हो जाएगी। अपवाद में दो-तीन लेखक हैं जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा-समझा है, वो यहां शामिल नहीं हैं।
दूसरी बड़ी परेशानी हिन्दीवालों के सामने है, जो कि उनकी खुद की बनायी हुई है वो ये कि मीडिया के जो बेसिक शब्द हैं,जिसे आप पारिभाषिक शब्दावली भी कह सकते हैं,उसकी बिल्कुल समझ नहीं है। उसे या तो वो अंग्रेजी का हिन्दी का मतलब निकालकर समझ लेते हैं,अपने मन से अर्थ लगा लेते हैं या फिर उसमें भी कोई भारी-भरकम कॉन्सेप्ट खोंस देते हैं जिसकी बिल्कुल भी जरुरत नहीं होती। जरुरत होती है तो बस इस बात की कि वो एक-दो बार किसी मीडिया प्रोफेशनल से इस मामले में बात कर लें या फिर सप्ताह भर जाकर चैनल के अंदर खुद ही जाकर समझ लें।
तीसरी परेशानी है, अंग्रेजी में कमजोर होने की। अंग्रेजी में कमजोर होना कोई शर्म की बात नहीं, इसे प्रयास से दूर किया जा सकता है लेकिन दिक्कत इस बात की है कि जो संस्कार उन्होंने ग्रहण किए हैं उसके अनुसार अंग्रेजी हिन्दी की जूती है और इसे वो सम्मान नहीं दे सकते। अंग्रेजी में अपनी कमजोरी को दूर करने के बजाए अंग्रेजी को बार-बार गरियाकर जस्टिफाय कर लेते हैं। हिन्दी का स्वर इतना तेज कर लेते हैं कि अंग्रेजी न जानने की कुंठा उसके भीतर दब जाए औऱ तब वो घसीट-घसीटकर रिसर्च पूरी करते हैं। ये अलग बात है कि इतना सबकुछ कर लेने के बाद भी वो अंग्रेजी के आतंक से मुक्त नहीं हो पाते और कभी किसी जूनियर से या फिर कभी कम दाम पर अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद कराते-फिरते हैं।
आप लाख ड़ंका पीटते रह जाइए कि हमारी हिन्दी बहुत समृद्ध है और किसी दूसरी भाषा की ओर ताकने की जरुरत नहीं है लेकिन इतनी समझदारी तो लानी ही होगी कि भाषा के समृद्ध होने के बावजूद विद्वानों ने मीडिया और कल्चरल स्टडीज पर नहीं लिखा है तो आपको अंग्रेजी की तरफ तो जाना ही होगा। एक स्तर पर तो समझदारी आपको उसी भाषा में लिखी गई सामग्रियों से ही मिलेगी।
हांलांकि हिन्दी समाज अब इस बात की चिंता किए वगैर कि अंग्रेजी पढ़ने से हमारी गरिमा कम होगी,हमारे विद्वानों के बजाए अंग्रेजी के विद्वानों के कोटेशन्स ज्यादा इस्तेमाल होने लगेंगे तो भी अंग्रेजी पढ़ने लगे हैं लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी है औऱ कुछ गिने-चुने विश्वविद्यालयों में ऐसा हो पाया है। वो अपने हिन्दी के बाबाओं की बाट जोहते रहते हैं कि कब ये इस मुद्दे पर कुछ लिखें और उनका नाम हम अपनी थीसिस में डालें।
क्योंकि देश के हिन्दी विभाग में एक बड़ी सच्चाई है कि रिसर्चर अपनी रिसर्च कितने ऑथेंटिक ढ़ंग से करता है इस सवाल के साथ ज्यादा जरुरी हो जाता है कि अपने विद्वानों को खुश कर पाया है कि नहीं। इसलिए आप देखेंगे कि थीसिस में कई ऐसे नाम भी आ जाएंगे, कई ऐसे किताबों को शामिल कर लिया जाएगा जिसका कि विषय से कोई लेना-देना ही नहीं है।
इसलिए हिन्दी समाज के लिए मीडिया में रिसर्च करते हुए जो परेशानियां सामने आती हैं, काफी हद तक वो वाकई में परेशानी है लेकिन परेशानी का बड़ा हिस्सा इस बात पर टिका होता है कि हिन्दी समाज अपनी मानसिकता से उपर उठ नहीं पाता। रिसर्च के टॉपिक को जितने साफ ढ़ंग से मीडिया को साहित्य से अलगा देता है, काम करते वक्त ऐसा नहीं कर पाता। इसलिए डिशक्शन के बिन्दु टेलीविजन के होते हुए भी रेफरेंस नवजागरण के एक्सपर्ट के याद आ जाते हैं।
हिन्दी मीडिया रिसर्च की ये दुनिया जब तक रिसर्च के स्तर पर अपने को साहित्य से अलग नहीं कर लेती,तब तक न तो उसके द्वारा किए गए रिसर्च को मान्यता मिल पाएगी, न तो इससे मीडिया को कोई लाभ होगा और न ही एकेडमिक स्तर पर मीडिया रिसर्च एक मतलब के काम के तौर पर स्थापित हो पाएगा।...और आनेवाली मीडिया रिसर्च की पीढ़ी शायद हमसे ज्यादा उबकर-चिढ़कर लिखे, क्योंकि आप तो उसका विषय भी छिन ले रहे हैं. तब तो कहेंगे कि न कि- सीनियर ने सब नरक कर दिया, मीडिया रिसर्च के नाम पर कागजी कतरन जमा किए हैं बस।।।.
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3 Response to 'कागजी कतरन जमा करते हैं मीडिया रिसर्चर ?'
  1. PD
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_10.html?showComment=1207806600000#c7813341151862686799'> 10 अप्रैल 2008 को 11:20 am

    sachchaai likh dali hai aapne.. main to saaf kahta hun ki main hindi me isliye likhta hun kyonki main english me itna achchha nahi likh sakta hun.. agar likh sakta to usme bhi jaroor likhta.. haan magar english se bhay bhi nahi khata hun.. aakhir meri vyavsaayik bhaashaa jo hai.. agar bhay khaunga to jinda nahi rah sakta, aakhir din me 15 ghnte english hi bolne parte hain..

     

  2. संजय तिवारी
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_10.html?showComment=1207810740000#c4585420904440587850'> 10 अप्रैल 2008 को 12:29 pm

    हमारे पहले की पीढ़ी में यही सब देखने को मिलता है जो आप लिख रहे हैं.
    हमारे अंदर वह दुर्गुण न आये इसकी कोशिश करनी चाहिए. अब जब बात समझ में आ गयी है तो दूसरों को समझाने से अच्छा काम शुरू कर दीजिए.

     

  3. अंशुमाली रस्तोगी
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_10.html?showComment=1207814280000#c8955836757109373720'> 10 अप्रैल 2008 को 1:28 pm

    अच्छा है। इसको चलाते रहें।

     

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