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टीआरपी को प्ले गेम और न्यूज चैनलों को सांप, सपेरे दिखाए जाने पर मुंशीजी भले ही उन पर अपनी भड़ास निकाल लें लेकिन दूरदर्शन में भी इतनी काबिलियत नहीं है कि वो न्यूज चैनलों के सामने खड़ी करके कहें- देखो इसे कहते हैं न्यूज चैनल।
न्यूज चैनल खबर के नाम पर जो कुछ भी दिखा रहे हैं और उससे मुंशीजी की जो असहमति हैं, अगर हम भी उनके साथ हो लें तो भी इस बात पर तो हम कभी राजी नहीं होंगे कि प्राइवेट न्यूज चैनल जो कुछ कर रहे हैं, दूरदर्शन ने इससे हटकर बहुत बेहतर काम किया है। ये सही है कि दूरदर्शन ने ऑडिएंस को कभी सांप-सपेरे की खबरें नहीं दिखाया, स्वर्ग की सीढ़ी के दर्शन नहीं कराए, महादेव से नहीं मिलवाया, शराबी बकरे को नहीं दिखाया,नाश्ते में ढ़ाई किलो तम्बाकू खाती बकरी नहीं दिखाए तो भी ऐसा कुछ बेहतरीन काम नहीं कर दिया कि मुंशीजी उसे लेकर उदाहरण के तौर पर न्यूज चैनलों के सामने रख सकें और कहें कि- इसकी खबरों से सीखो और इसी की राह पर चलो।
मुंशीजी मीडिया को दुरुस्त, पारदर्शी और सामाजिक विकास का माध्यम बनाने के नाम पर प्राइवेट न्यूज चैनलों को जब-तब लताड़ भी दें तो भी उनके पास कोई ऐसा विजन साफ नहीं है जिसे वो उनके सामने रख सकें। अगर ऐसा होता तो देश की ऑडिएंस इतनी भी नासमझ नहीं है कि फ्री टू एयर चैनल दूरदर्शन को छोड़कर प्राइवेट न्यूज चैनलों को देखे। मुंशीजी क्या किसी भी सूचना एवं प्रसारण मंत्री के पास इस बात की विजन होती कि बदलते समाज में लोगों की अभिरुचि क्या है और उनके बीच सामाजिक मसलों, बदलते परिदृश्यों और खबरों की सच्चाई को कैसे दिखाना है तो आज खर- पतवार चैनलों के बीच दूरदर्शन गुम नहीं हो जाता। दरअसल मुंशीजी और इनके पहले के भी लोग खबरों की तटस्थता की बात कहते आ रहे हैं। ये सरकारी महकमें जिसे खबरों की तटस्थता बता रहें हैं,वो दरअसल काफी हद तक खबरों को लेकर निष्क्रियता, बेपरवाह और खबरों के नाम पर खानापूर्ति वाला रवैया रहा है। नहीं तो क्या कारण है कि प्राइवेट न्यूज चैनल महीने भर में ही एक स्टिंग ऑपरेशन कर देते हैं। (ये अलग बात क इसमें से कुछ स्टिंग ऑपरेशन फर्जी साबित हो जाते हैं। तो भी आप उनके एफर्ट को नकार नहीं सकते।)जबकि दूरदर्शन ऐसा कुछ भी नहीं कर पाता।
दूरदर्शन के पास लम्बा अनुभव रहा है। चाहता तो वो इसका बेहतर इस्तेमाल कर सकता था और मुंशीजी जिस सामाजिक विकास का पाठ न्यूज चैनलों को पढ़ा रहे हैं उसकी शुरुआत दूरदर्शन से ही शुरु हो तो ज्यादा बेहतर है। हालांकि दूरदर्शन का मैं कोई सीरियस ऑडिएंस नहीं हूं लेकिन बीच-बीच में देखकर इतना जरुर जानता हूं कि दूरदर्शन पर सामाजिक विकास के नाम पर सरकार की योजनाओं को विज्ञापन के अंदाज में पेश करने के अलावे कभी भी उसने आलोचनात्मक तरीके से पक्ष ऑडिएंस के सामने नहीं रखा. नहीं तो आप ही बताइए, देशभर में इतने क्राइम होते हैं, कानून की धज्जियां उड़ाई जाती है। आम आदमी की तो छोडिए अफसर और नेता तक इसमें शामिल होते हैं। इतना होने पर भी दूरदर्शन को कोई ऐसी खबर नहीं मिलती, कोई ऐसा आइडिया सामने नहीं आता कि वो इन सब चीजों का पर्दाफाश कर सके. ऐसी खबरों को खोजने लग जाएं तो आप हैरान रह जाएंगे कि फीता काटनेवाली खबरों और विमान से उतरती हुए मिनिस्टरों की फुटेज थोक भाव में दूरदर्शन की स्क्रीन पर बिखरे पड़े होते हैं।
जिस मीडिया को मुंशीजी आम आदमी के लिए होने की बात कर रहे हैं, दरअसल हमारे सामने एक स्थापना दे रहे हैं कि प्राइवेट न्यूज चैनल आम आदमी के पक्ष में नहीं है जबकि दूरदर्शन और आकाशवाणी ऐसा कर रहे हैं। इससे बड़ी भारी गलतफहमी पैदा हो रही है और वो ये कि सरकार की मीडिया को आम आदमी की मीडिया मान लिया जा रहा है। सच्चाई तो यही है कि इस दूरदर्शन में भी आम आदमी वैसे ही गायब है जैसे अब बनने वाली सरकारी योजनाओं में और लागू होनेवाले तरीकों में....और अगर दूरदर्शन पर कभी-कभार आम आदमी की तकलीफें आ भी जाती है तो वहीं तक जहां तक के लिए सरकार जिम्मेवार न होकर अप्रत्यक्ष रुप से आम आदमी ही जिम्मेवार होते हैं और जो अज्ञानता, गरीबी, बेरोजगारी और अंधविश्वास जैसे आदिम समस्याओं के कारण होते हैं।..और ऐसा दिखाने में सरकार का ही पक्ष मजबूत होता है क्योंकि इसे फिर अगले पांच साल बाद दिखानी होती है कि देखो वोटरों, तुम्हारी आज से पांच साल पहले हालत ऐसी थी... और पांच साल बाद खाद के जोर से लहलहाते हुए पंजाब के खेतों को दिखाकर बताना कि अब ऐसी हो गयी है। देश के चोट खाए और घिसे-पिटे चेहरे दूरदर्शन पर आकर एनजीओ की तरह इस्तेमाल हो जाते हैं। ये खबरें सचमुच इनकी तस्वीर बदलते हैं ऐसा मानने के लिए थोड़ा वक्त दीजिए।
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2 Response to 'दूरदर्शन को लेकर कब बोलेंगे मुंशीजी'
  1. Rajesh Roshan
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_26.html?showComment=1209111840000#c7687334676897482952'> 25 अप्रैल 2008 को 1:54 pm

    आपको पढने के बाद पता नही ऐसा क्यों लगा की आप केवल बोलने के लिए बोल रहे हैं

     

  2. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_26.html?showComment=1209201540000#c8262201207023264428'> 26 अप्रैल 2008 को 2:49 pm

    राजेशजी ज़रा ग़ौर करें तो शायद विनीत की दलील समझ जाएंगे आप. विनीत बाबू ने जो बताया क्या उसके अलावा सचमूच दूरदर्शन कुछ दिखा पाता है.

     

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