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अभी तक आपने पढ़ा कि एक अनुभवी और बुजुर्ग ब्लॉगर होने के नाते अविनाश भाई ने हम जैसे नौसिखुए ब्लॉगर को बराबर उत्साहित किया। यही वजह रही कि मोहल्ला से भावनात्मक स्तर पर जुड़ा रहा। (जब तब याद आता है मोहल्ला ) अब आगे पढ़िए।

इधर मैं दनादन पोस्ट लिखता रहा और उधर अविनाश भाई का इसके उपर कुशल संपादन होता रहा। कई बार तो संपादन इतनी बखूबी से होता कि हमें यकीन ही नहीं होता कि इसे मैंने लिखा है। मेरी मोटी अभिव्यक्ति को वो इतना महीन बना देते कि मजा आ जाता। ऐसी गाइडेंस किसी ट्रेनी या इन्टर्न को मिल जाए तो कुछ ही दिनों में बहुत ही बेहतर स्क्रिप्ट लिख सकता है। लेकिन कई बार मेरी लेखनी बीच से मसक जाती और उसमें अविनाश भाई की छवि झांकने लग जाती।

एक बार की बात है। नीलिमा ने अपने ब्लॉग लिंकित मन पर एक शोध लेख सीरीज में शामिल किया। ये लेख वाक् पत्रिका में भी प्रकाशित हो चुका है। बल्कि वाक् में प्रकाशित होने पर उसे हम पाठकों तक रखा। मुझे लगा कि नीलिमा ने जो ये शोध लेख लिखा है उसकी व्यापक पहुंच हिन्दी समाज तक होगी। हिन्दी पढ़ने-लिखनेवाले लोग भी जान सकेंगे कि आखिर ब्लॉग इतना महत्वपूर्ण कैसे है। मैं इस लेख को ब्लॉग का एक ऐतिहासिक संदर्भ मानता हूं। शायद इसलिए जब इसे पूरे लेख में नीलिमा ने मोहल्ला जैसे चर्चित ब्लॉग का एक बार भी नाम नहीं लिया तो मुझे अटपटा-सा लगा। अच्छा-बुरा जो भी है मोहल्ला का नाम इसमें आना चाहिए। इस बात को लेकर नीलिमा के लेख से मेरी असहमति हो गयी । लाख दलीलों के बावजूद असहमति ज्यों की त्यों बनी है। मैं अभी भी नहीं पचा पा रहा हूं कि बिना मोहल्ला का नाम लिए कोई कैसे ब्लॉग के बारे में बात कर सकता है। मैंने इस पर एक प्रति लेख लिखने का मन बनाया और सोचा कि इसे मोहल्ला पर ही डालना बेहतर होगा। लेख सॉरी पोस्ट मैंने अविनाश भाई को ड्राफ्ट की शक्ल में भेज दी और आवश्यक संशोधन करने की बात भी कही। अब देखिए बात कहां बिगड़ गयी। अविनाश भाई संपादन कला में दक्ष हैं। उनसे बेहतर भला कौन जान सकता है कि किस शब्द का, व्यक्ति के उपर क्या असर हो सकता है। पोस्ट लिखने के क्रम में जब मैंने मसिजीवी लिखा तो उन्होंने अपनी तरफ से ब्राइकेट में नीलिमा का पति जोड़ दिया। मुझे लगा ऐसा लिखना जरुरी नहीं था। दोनों को एक दूसरे से जोड़े बिना भी लोग समझते हैं। दोनों की स्वतंत्र पहचान है। साथ में पोस्ट की भूमिका के तौर पर लिखा भी कि विनीत ने ये पोस्ट मुझे कल ही भेजा था। मैंने इस पर विचार किया लेकिन बाद में उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हुए पोस्ट कर रहा हूं। मोहल्ला पर पोस्ट करते हुए भले-बुरे की पूरी जिम्मेवारी मेरे उपर आ गयी। कुछ हद तक कोहराम भी मची। मुझे इस बात का बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा। क्योंकि अगर कोई बंदा या बंदी मेरी एक पोस्ट से नाराज हो जाते है, संबंध खराब कर लेते है तो उसे ब्लॉगिंग छोड़ देना चाहिए। ब्लॉग की दुनिया में इतनी स्पेस तो हमेशा बची रहनी चाहिए कि कोई भी किसी की बात को लेकर अपनी ओर से सहमति या असहमति दर्ज कर सके। बेहतर स्थिति तो यही है कि ब्लॉग के पचड़े और किचकिच को असल जिंदगी में घुसने न दें, पोस्ट से आपस के संबंध तय होने न दें। ये अलग बात है कि हिन्दी ब्लॉगिंग इस बात के लिए मानसिक रुप से अभी तैयार नहीं हुआ है या कह लें अभी उतना मैच्योर नहीं हुआ है। इसलिए आप देखेंग कि पोस्ट के आधार पर ही लोगों में बातचीत तक बंद हो जाती है और कभी-कभी गाली-गलौज भी।बहरहाल।

अविनाश भाई के संपादन से एक ओर मेरी पोस्ट निखर जाती तो दूसरी ओर मैं जो कहना चाहता उसके अतिरिक्त कुछ और भी संदर्भ पैदा हो जाते। ऐसे समय में पता नहीं क्यों मुझे लगता कि मैं इस्तेमाल कर लिया गया हूं। ऐसा कहकर अपने को मैं मासूम घोषित नहीं कर रहा लेकिन कहीं न कहीं खटका बना रहता कि मैं तो बस इतना ही कहना चाहता था, इसे और आगे ले जाने की तो जरुरत थी नहीं। यहां अविनाश भाई पर कोई आरोप नहीं बल्कि मैंने देखा है कि कॉम्युनिटी ब्लॉग का हर मॉडरेटर दूसरों की पोस्ट को अपने को पॉलिटिकली करेक्ट घोषित करने के स्तर पर इस्तेमाल कर जाता है। कभी कुछ शब्द जोड़कर तो कभी कुछ इमेज डालकर या फिर अपने ढंग से पोस्ट को प्रकाशित करके। आमतौर पर हम ब्लॉगर इस बात को लेकर सावधान नहीं होते कि हमसे कॉम्युनिटी ब्लॉगर अपने यहां लिखने का, सदस्यता लेने का अनुरोध करते हैं बाद में हमारी इस संख्या को पावर प्रॉस्पेक्ट के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। कभी-कभी किसी पार्टी के कार्ड होल्डर की तरह डिसीप्लीन करने की कोशिश करते हैं। मॉडरेटर के इस चरित्र पर अलग से लिखने और शोध करने की जरुरत है।

जो भी हो, मोहल्ला से मेरी पहचान बन रही थी। मैं नया-नया ब्लॉग की दुनिया में शामिल हुआ था। मेरे भीतर ये गलतफहमी कहिए या फिर कुछ हद तक सच्चाई कि बड़े ब्लॉग पर लिखने से लोग हमें जल्दी जानने लगेंगे। कई बार ऐसा हुआ भी कि लोग मेरे ब्लॉग पर की पोस्ट को याद न रखकर , जो पोस्ट मैंने मोहल्ला पर लिखे उसे याद रखा। ये तो बाद में जब लोगों ने मेरी पोस्ट को पढ़ना शुरु किया तो मैंने महसूस किया कि एक स्तर के बाद पाठक ब्लॉग का नाम देखकर नहीं आते और न ही ब्लॉगर का नाम देखकर आते हैं। पोस्ट के कंटेट पर ही लोग भरोसा करते हैं और उसी के आधार पर लोग पोस्ट भी पढ़ते हैं। नहीं तो ऐसा नहीं होता कि मेरी कई पोस्ट मोहल्ला से ज्यादा गाहे-बगाहे पर पढी जाती।

मैं क्या लिखता हूं, कैसा लिखता हूं इस पर बात करने के लिए पाठक पूरी तरह आजाद हैं। जिसको मन होता है गरियाते हैं, जिनको मन होता है दाद भी देते हैं। जब मैं दूसरे ब्लॉगरों से मिलते-जुलते मसलों पर लिखता हूं तो वो लिखने के लिए आमंत्रित भी करते हैं और जिनकों लगता है कि मैं उनके मिजाज का ब्लॉगर हूं तो हवा भी देते हैं। अपने यहां लिखने के लिए आमंत्रित भी करते हैं।

ऐसी ही बात होती रही। मुम्बई से आशीष ने बोल हल्ला पर लिखने कहा, लिख दिया। दिल्ली से राकेश सर ने हफ्तावार में लिखने कहा लिख दिया। कईयों से वादा किया कि लिखूंगा आपके लिए भी। इसी बीच गुड़गांव के ब्लॉगर्स मीट में यशवंत दा से भेट हो गयी और भंड़ास पर लिखने कहा। उस समय मैंने साफ कहा कि अलग से लिखने का तो समय नहीं मिल पाएगा। यशवंत दा ने साफ कहा कि कोई बात नहीं, मीडिया से जुड़ी जो पोस्ट हो उसे भड़ास पर भी भेज दो। मैं वैसा ही करता लेकिन बाद में जनसत्ता विवाद को लेकर मैंने भड़ास पर भेजना बंद कर दिया। और अब सिर्फ अपने ब्लॉग के अतिरिक्त बोल हल्ला के लिए लिखता हूं।.....लेकिन अविनाश भाई के हिसाब से अब भी भड़ासी हूं और शायद ये भी एक वजह हो सकती है मोहल्ला से निकाल बाहर करने की। पढ़िए मेरी अगली पोस्ट में....क्रमशः

नोटः- असहमति का आलेख, अच्छा होता कान पकने न देती नीलिमा मोहल्ला के स्टोर रुम में है। रात बहुत हो रही है। मैं खोज पाने में असमर्थ हूं कि आपको लिंक दे दूं।

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8 Response to 'मेरी पोस्ट मसक जाती और अविनाश भाई झांकने लगते'
  1. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html?showComment=1207274280000#c2468782066330350637'> 4 अप्रैल 2008 को 7:28 am

    ब्लॉग की दुनिया में इतनी स्पेस तो हमेशा बची रहनी चाहिए कि कोई भी किसी की बात को लेकर अपनी ओर से सहमति या असहमति दर्ज कर सके। बेहतर स्थिति तो यही है कि ब्लॉग के पचड़े और किचकिच को असल जिंदगी में घुसने न दें, पोस्ट से आपस के संबंध तय होने न दें।
    यह सही लिखा है।

     

  2. Tarun
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html?showComment=1207281780000#c6273596164606874941'> 4 अप्रैल 2008 को 9:33 am

    हमारी वाली बात को अनुपजी ने पहले ही बोल्ड करके दुबारा टिप्पिया दिया है, हम भी सहमत हैं।

     

  3. सुजाता
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html?showComment=1207283160000#c6165218083057270881'> 4 अप्रैल 2008 को 9:56 am

    यहां अविनाश भाई पर कोई आरोप नहीं बल्कि मैंने देखा है कि कॉम्युनिटी ब्लॉग का हर मॉडरेटर दूसरों की पोस्ट को अपने को पॉलिटिकली करेक्ट घोषित करने के स्तर पर इस्तेमाल कर जाता है। कभी कुछ शब्द जोड़कर तो कभी कुछ इमेज डालकर या फिर अपने ढंग से पोस्ट को प्रकाशित करके।
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    यह बात सोचने लायक है । सहमत हूँ । पर सम्पादन करना और मॉडरेट करना अलग अलग बात है ।मुझे नही लगता कि किसी की किसी पोस्ट को सम्पादित करना चाहिये ।
    बस यह ज़रूरी है कि एक कम्यूनिटी ब्ळॉग जिसमें शामिल लोगों की आपस में कोई जान पहचान और कोई बात चीत नही या बहुत कम है , और जो दुनिया के अलग अलग कोनों में बसे हैं जब एक मंच पर एक साथ आये तो केऑस जैसा न दिखाई दे,भीड़ न लग कर एक संतुलित और सुविचारित लेखन लगे । इसके लिए वाकई हम सब को सावधान रहना चाहिये ।
    अनूप जी से भी सहमत हूँ ।

     

  4. आशीष
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html?showComment=1207285500000#c5503199564075036194'> 4 अप्रैल 2008 को 10:35 am

    विनीत बाबू इंसान को हमेशा अपनी शर्तों पर ही जीना चाहिए। पत्रकारिता की तरह ब्‍लॉगिंग में भी गंदगी फैलती जा रही है। ऐसे में बस अपना काम ईमानदारी से करते जाइए और पाठकों पर छोड़ दिजीए।

     

  5. काकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html?showComment=1207287900000#c5024182005985382315'> 4 अप्रैल 2008 को 11:15 am

    अनूप जी और आशीष की बात से सहमति.

     

  6. रचना
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html?showComment=1207290480000#c5121359671928531873'> 4 अप्रैल 2008 को 11:58 am

    maene apne personal experience sae paaya haen ki hindi blogging mae kaments karney wanle bahut sae anami dushasaan bhi haen jinka moderation jurihaen , post ka sampadan jitna jarurii haen utna hee jarurii haen kii ham apni aayee post per kaments ko review avshya kare

     

  7. Sanjeet Tripathi
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html?showComment=1207303680000#c1607256490701198230'> 4 अप्रैल 2008 को 3:38 pm

    अपने ब्लॉग को ही अपना मुखपत्र बनाए रखें साहिब!
    जितना ज्यादा जगह लिखेंगे उतना ही दिक्कतें हैं उससे बेहतर है सिर्फ़ अपने ब्लॉग पर लिखा जाए!!
    यह मेरा अपना नज़रिया है!!

     

  8. निशान्त
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html?showComment=1207324860000#c6739279055029690282'> 4 अप्रैल 2008 को 9:31 pm

    मैं भी उन कई लोगों में से हूँ जो गाहे-बगाहे पर आ कर आपको पढ जाता हूँ. अच्छा लगता है आपको पड़ना. पर, इस बार, आपसे सहानभूति कम ही हुई गुस्सा ज्यादा आया. गुस्सा इस वजह से आया कि आपने अपने को इस्तेमाल होने दिया. वैसे कॉम्युनिटी ब्लॉग मेरे हिसाब से सहकारी होना चाहिए संपादित नहीं.

     

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