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सरकार के बदलने के साथ ही दूरदर्शन की स्क्रीन के रंग भले ही कभी कुछ घट-बढ़ जाए, कुछ गाढ़ा या फीका हो जाए लेकिन एक बात कॉमन बनी रहती है और वो ये कि दूरदर्शन की आवाज और उसकी टोन सत्ता के पक्ष में ही होती है। इसलिए कई बार लगता है कि दूरदर्शन जनमाध्यम न होकर किसी राजनीतिक पार्टी विशेष के अजान देने का भोंपा है।...और जिसकी टेंडर बदलती रहती है। शुरुआती दौर से लेकर अब तक की सत्तारूढ़ पार्टियों ने दूरदर्शन का जितना बेजा इस्तेमाल किया है, जनता की आवाज को दबाने के चक्कर में अपनी आवाज इतनी तेज कर दी है कि कोई चाहे तो इस पर शोध कर सकता है। कई बार तो इन पार्टियों ने अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए दूरदर्शन का इस्तेमाल प्राथमिक स्तर पर किया है।
जबकि व्यवहार के स्तर पर किसी भी जनमाध्यम को सत्ता के प्रतिरोध में ही अपनी बात करनी चाहिए। अगर सरकार वाकई जनता के पक्ष में काम कर रही है तो उसके पास दसियों और माध्यम हो सकते हैं औऱ हैं जिसे लेकर अपने नाम की डंका बजा सकती है लेकिन आम आदमी के लिए जंतर-मंतर के इलाके और दूरदर्शन जैसे माध्यमों पर पूरा-पूरा अधिकार होना जरुरी है।
प्राइवेट चैनल्स जब अपने को जनसमाज का माध्यम बताते हैं तो सुनकर भौंडा-सा लगता है। हमारे सामने उसकी छवि कुछ ऐसे ही बनती है जैसे कि कोई भेडिया दिनभर शिकार कर लेने के बाद शाम को मुंह में तिनका खोंस लेता है। शुरुआती दौर से मीडिया की जो छवि आम लोगों के बीच बनी है कि ये हमेशा सच के साथ होगा, न्यूज चैनल उस मानसिकता को, उस मान्यता को चप्पल,चड्डी और शैम्पू के विज्ञापनों के साथ भुनाने लगी है। जनता ने इस रवैये को लेकर असहमति जतानी शुरु कर दी है। कभी तीन-चार दिन पहले ही अपने अनिल रघुराज ने वाकायदा आंकड़े सहित इस बात को सामने रखा कि हिन्दी चैनलों की व्यूअरशिप घट रही है। इसकी एक बड़ी वजह है कि लोगों की मानसिकता तेजी से बदल रही है और उन्होंने समझना शुरु कर दिया है कि विज्ञापन बटोरने के चक्कर में चैनल कुछ भी दिखा सकते हैं। मुंशीजी ने अपने हिसाब से बहुत सही समय पर चोट मारा है। ऐसा करके वो प्राइवेट चैनलों के विरोध में अच्छा-खासा जनादेश खड़ी कर लेंगे। न्यूज चैनलों से खार खायी ऑडिएंस जरुर कुछ कदम साथ चल लेगी। (लेकिन,यही बात जब दूरदर्शन करने लग जाता है तो प्राइवेट चैनलों से कुछ कम भौंड़ा नहीं लगता। क्योंकि दूरदर्शन को लेकर ऑडिएंस ने आम आदमी का माध्यम और सत्ता के माध्यम के बीच फर्क करना शुरु कर दिया है। इसे आप मीडिया लिटरेट होना भी कह सकते हैं।)
ये बात भी तय है कि वो कुछ कदम चलने के बाद औऱ आगे नहीं बढ़ेगी, ऐसा नहीं होगा कि थोड़ा और बढ़कर दूरदर्शन पर पहुंच जाएगी क्योंकि जो ऑडिएंस आज प्राइवेट न्यूज चैनलों से खार खा चुकी है वो पांच-दस साल पहले ही दूरदर्शन से उचटकर यहां तक पहुंची थी और अगर एक सर्वे कराकर ये पूछा जाए कि- हम मानते हैं कि प्राइवेट चैनल खबर के नाम पर जो कुछ भी दिखा रहे हैं, वो बकवास है तो भी अगर आपको ये कहा जाए कि दूरदर्शन और किसी भी प्राइवेट न्यूज चैनले के बीच आपको चुनना हो तो आप किसे चुनेंगे तो देखिएगा कि क्या नतीजे सामने आते हैं। मैं कोई घोषणा करने की स्थिति में नहीं हूं लेकिन ज्यादातर जनता कल्चर के नाम पर बिकनी, क्रिकेट,सिनेमा देख लेगी। जीएस के नाम पर घोटालों और स्टिंग को देख लेगी लेकिन खबरों के नाम पर दूरदर्शन का राजनीतिक आलाप, बयानबाजी और पीठसहलाउ पॉलिटिक्स की फुटेज उनसे नहीं देखी जाएगी। जिस बात को मैं लिख रहा हूं उसका अंदाजा सारे प्राइवेट न्यूज चैनल्स बहुत पहले से लगाकर अपनी दुकान लिए बैठे हैं। नहीं तो देखिए न, करीब तीन महीने में एक न्यूज चैनल कैसे हमारे सामने खड़े नजर आते हैं और देखते ही देखते उन पर दिखायी जानेवाली खबरों के रेफरेंस दिए जाने लगते हैं। मतलब साफ है कि प्राइवेट न्यूज चैनलों से उब चुकी जनता चेंज के लिए हर नए चैनलों को आजमाती है, उस पर कुछ दिन टाइम देती है लेकिन इस उम्मीद से लौटकर दूरदर्शन पर नहीं आती कि शायद यहां अब कुछ बेहतर हुआ होगा। अगर बेहतर हुआ भी है तो उसकी रफ्तार इतनी धीमी है कि ऑडिएंस की उम्मीद के आगे पिद्दी साबित होती है। इसलिए असंतुष्ट ऑडिएंस को खुश करने की गुंजाइश से दूरदर्शन बहुत पीछे छूट चुका है जबकि प्राइवेट न्यूज चैनल आए दिन प्रयोग करते नजर आते हैं। कोई ऑडिएंस भोपाल में बैठकर बतोलेबाजी करता नजर आता है तो ये चैनल उन्हें भी प्रतिभा पुत्र मानकर दस-दस मिनट तक दिखाते हैं। ऑडिएंस को तरजीह दिए जाने की वजह से ही इन चैनलों के प्रति लोगों का मन उब जाने के बाद भी मोह बना रहता है कि पता नहीं कब उसकी तस्वीर दिखा दी जाए। जबकि दूरदर्शन के कैनन में इनका कोई सेंस ही नहीं है।
नकार के बावजूद बार-बार पुचकार की शैली में सारे न्यूज चैनल हमारे सामने आते हैं और हम उन्हें माफ कर देते हैं कि- जाने दो अपना ही भाई है औऱ अगर दूरदर्शन को लेकर ऐसा नहीं करते तो इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि अफसरों, अधिकारियों और नेताओं की तरह ये भी हमसे बहुत दूर चला गया है, हमारी पहुंच, पकड़, जरुरत औऱ अभिरुचि से दूर, बहुत दूर। अब हममें वो भाव भी नहीं रह गया कि लोग इसे चाचा नेहरु का चैनल मानकर देखें और उनके सपनों से इसे जोड़कर देखें।
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3 Response to 'मुंशीजी, देखिए न, दूरदर्शन हमसे दूर हो गया'
  1. राकेश
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_2158.html?showComment=1209202500000#c7337760242137750224'> 26 अप्रैल 2008 को 3:05 pm

    बहुत बढिया लिखा विनीत बाबू. आपके विचार गंभीर विचार-विनिमय की मांग करते हैं.

     

  2. भुवनेश शर्मा
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_2158.html?showComment=1209218760000#c6099122512264137216'> 26 अप्रैल 2008 को 7:36 pm

    क्‍या मुंशीजी ने इसे पढ़ा ?
    उन्‍हें इसकी जरूरत भी क्‍या है. वे इतने भी नादान नहीं हैं और उन्‍हें इसकी कोई जरूरत भी नहीं है.

     

  3. अनूप शुक्ल
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_2158.html?showComment=1209344940000#c2682162603504679434'> 28 अप्रैल 2008 को 6:39 am

    सही!

     

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