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एमए या फिर एम फिल् करने के बाद जो लोग डीयू से एम फिल् या पीएचडी करने की बाट जोह रहे हैं उन्हें खून के आंसू रोने पड़ सकते हैं। उन्हें नए सत्र में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए कम से कम छ महीने तक का इन्तजार करना पड़ सकता है।

कल की खबर दि टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक आनेवाले छ महीने में डीयू एम फिल् या पीएच डी के लिए कोई भी लिखित परीक्षा या इंटरव्यू नहीं कराने जा रही है। अखबार को मिली जानकारी के हिसाब से रजिस्ट्रेशन के पहले यूजीसी एम।फिल् और पीएचडी में रजिस्ट्रेशन की पूरी प्रक्रिया को रिवाइव करेगी, उस पर नए सिरे से विचार करेगी और जरुरी समझा गया तो उसमें कुछ जरुरी संशोधन भी करेगी। इस संबंध में यूजीसी विश्वविद्यालय को कुछ जरुरी निर्देश भी दे सकती है जिसमें इन्ट्रेंस की भी बात शामिल हो सकती है।

डीयू में अभी तक इन दोनों कोर्सों में रजिस्ट्रेशन के लिए लिखित परीक्षा का प्रावधान नहीं रहा है। एम।फिल् में फिर भी पिछले तीन सालों से लिखित परीक्षा का आयोजन होता रहा है लेकिन पीएचडी के लिए सिर्फ इंटरव्यू का प्रावधान रहा है।

खबर है कि यूजीसी ने ऐसा कदम इसलिए उठाया है कि रिसर्च के लिए जो वो स्कॉलरशिप दे रही है उसका बेहतर उपयोग किया जा सके और ये तभी संभव है जबकि रिसर्च के लिए काबिल लोग चुने जाएं। नहीं तो अभी तक कुछ हद तक लोग इसे वेतन वृद्धि और नौकरी पाने के जरिए के रुप में इस्तेमाल करते आ रहे हैं। चुनाव प्रक्रिया अगर दुरुस्त तरीके से होती है तभी ढंग के रिसर्च हमारे सामने आएंगे और रिसर्च के लिए दी जानेवाली राशि का बेहतर उपयोग हो सकेगा।

हाईअर स्टडी और रिसर्च की गुणवत्ता में सुधार के स्तर पर देखें तो यूजीसी का निर्णय वाकई स्वागत योग्य है। इससे न केवल रिसर्च की गुणवत्ता में सुधार होगा बल्कि जो लोग गंभीरता से रिसर्च वर्क में लगे हैं उनके काम का भी महत्व बढेगा और उनकी स्थापनाओं को गंभीरता से लिया जाएगा। विश्वविद्यालय में रिसर्च के नाम पर जो चलताउ ढंग से थीसिस लिखी जा रहे है उस पर रोकथाम लगेंगे।....और जो लोग रिसर्च में आकर भी इसे सेकेण्डरी वर्क मानकर काम करते हैं उनकी नकेल भी कसी जा सकेगी औऱ ज्यादा से ज्यादा वो ही लोग इस फील्ड में होंगे जो वाकई रिसर्च करना चाहते हैं और आगे चलकर एकेडमिक्स में अपना करियर बनाना चाहते हैं। यूजीसी के इस कदम को अगर गंभीरता से समझा जाए तो रिसर्चर और यूनिवर्सिटी दोनों पक्षों को फायदा है।

लेकिन तत्काल अगर पूरी स्थिति पर विचार किया जाए तो स्थिति बहुत ही संकटपूर्ण है। जो लोग आनेवाले महीने-दो महीने में पीएचडी की इंटरव्यू में शामिल होनेवाले थे और जून के बाद एम फिल् की प्रवेश परीक्षा में शामिल होनेवाले थे उनके साथ समस्या है कि अब वो क्या करें। छ महीने तक इंतजार करने का मतलब है कम से कम एक साल की बर्बादी। क्योंकि यूजीसी के कहे अनुसार अगर छ महीने में दुबारा प्रक्रिया शुरु हो भी जाती है तो भी लिखित परीक्षा और इंटरव्यू होने में कम से कम दो से तीन महीने लग जाएंगे और फाइनली डीयू की आइडी कार्ड हाथ में आते-आते सालभर का समय लग ही जाएगा। फिर इस बात की भी गारंटी नहीं है कि छ महीने बाद प्रक्रिया शुरु हो ही जाए।

अच्छा, इच्छुक सारे लोगों का एडमीशन होना नहीं है इसलिए उन्हें किसी दूसरे फील्ड में जाने के लिए नए सिरे से विचार करना होगा। और इसमें भी समय लगेगा। फिर किसी एक विषय से एमए या एम फिल् करने के बाद अचानक से दूसरे फील्ड में जाना भी आसान बात नहीं है। यूजीसी की इस घोषणा के आने के पहले ही जेएनयू जैसे कुछ बेहतर विश्वविद्यालयों में अप्लाई करने की तारीख समाप्त हो चुकी है। सबसे बड़ी बात है कि स्टूडेंट को इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि डीयू या फिर यूजीसी अचानक से ऐसी कोई घोषणा कर देगी। अपने करियर और भविष्य को लेकर जब स्टूडेंट बात कर रहे हैं तो उनके बीच एक अजीब सी निराशा और असंतोष का भाव है। वो खुद भी चाहते हैं कि इतना समय और साधन लगाकर जब वो रिसर्च करते हैं तो उसकी मार्केट वैल्यू हो, यूजीसी पूरी प्रक्रिया को दुरुस्त करे लेकिन स्टूडेंट को इसकी खबर पहले मिलनी चाहिए थी। पर्याप्त समय ताकि वो इस दौरान बेहतर तरीके से करियर को लेकर प्लान कर सकें।

सबसे बड़ी परेशानी तो डीयू के उन स्टूडेंट्स की है जो हॉस्टल में रह रहे हैं। अभी तक होता ये आया है कि मई-जून तक एम ए के इग्जाम्स या फिर एम फिल् का वायवा खत्म हो जाने के बाद महीने-दो महीने तक आगे की तैयारी करते। इस दौरान वो गेस्ट स्टेटस पर हॉस्टल में रहते। जिनका आगे की कोर्स में एडमीशन हो जाता उनका हॉस्टल भी कॉन्टीन्यू हो जाता। उन्हें रिसर्च के लिए रजिस्ट्रेशन कराने में और रहने में कोई खास परेशानी नहीं होती। लेकिन डीयू और यूजीसी इस नई रणनीति की वजह से हॉस्टलर्स बुरी तरह परेशानी में पड़ जाएंगे। इतने लमबे समय तक गेस्ट स्टेटस पर रहने नहीं दिया जाएगा, उन्हें हॉस्टल खाली करना पड़ेगा और दोबारा हॉस्टल में आने में कम से कम साल-डेढ़ साल लग जाएगें। उनका पूरी सेटअप तितर बितर हो जाएगा। फिर इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि उन्हें दोबारा हॉस्टल मिल ही जाए।

एक बार स्टूडेंट प्वाइंट ऑफ व्यू से देखें तो डीयू और यूजीसी की ये रणनीति भविष्य के लिए भले ही रिसर्चर और विश्वविद्यालय के पक्ष में हो लेकिन फिलहाल स्टूडेंट्स को अच्छी खासी परेशानी झेलनी पड़ सकती है। करियर के स्तर पर भी और रहने के स्तर पर भी। इसलिए जरुरी है कि यूजीसी इस मामले को देखते हुए कोई विकल्प या बीच का रास्ता निकाले जिससे की स्टूडेंट्स का साल-डेढ़ साल का कीमती समय बर्बाद होने से बच जाए।

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1 Response to 'कहना पड़ेगा- अपना सपना अब रिसर्च नहीं'
  1. अपराजिता
    http://taanabaana.blogspot.com/2008/04/blog-post_07.html?showComment=1216006920000#c3945524974255409807'> 14 जुलाई 2008 को 9:12 am

    डी यू की इस राजनीति से वही परिचित हो सकता है जो पी एच डी तक का सफर तय करे. मीडिया की जुबान से एक सुंदर स्वप्न बना दिया गया डी यू कैम्पस वास्तव में टुच्ची राजनीति (जालसाजी) का गढ़ है. जनता तक ये सच्चाई पहुंचाने के लिए बधाई.

     

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